अम्बिका खण्ड · अध्याय 67
कौशिकी का अभिषेक
श्लोक 1 (skanda.8.67.1)
सनत्कुमार उवाच । आजग्मुः कौशिकीं द्रष्टुमथ विन्ध्यं दिवौकसः । आदित्या वसवो रुद्रा मरुत्वान् मरुतोश्विनौ
sanatkumāra uvāca | ājagmuḥ kauśikīṁ draṣṭumatha vindhyaṁ divaukasaḥ | ādityā vasavo rudrā marutvān marutośvinau
सनत्कुमार ने कहा - तब स्वर्गवासी कौशिकी के दर्शन के लिए विंध्य पर्वत पर आए - आदित्य, वसु, रुद्र, इंद्र (मरुत्वान्), मरुद्गण और दोनों अश्विनीकुमार,
श्लोक 2 (skanda.8.67.2)
धर्माङ्गिरोशनो दक्षवसिष्ठभृगुकश्यपाः । पुलस्त्यपुलहागस्त्यसनकात्रिसनन्दनाः
dharmāṅgirośano dakṣavasiṣṭhabhṛgukaśyapāḥ | pulastyapulahāgastyasanakātrisanandanāḥ
धर्म, अंगिरा, उशना, दक्ष, वसिष्ठ, भृगु, कश्यप, पुलस्त्य, पुलह, अगस्त्य, सनक, अत्रि और सनंदन,
श्लोक 3 (skanda.8.67.3)
अप्सरोयक्षगर्न्वाः सिद्धा नागा महोरगाः । उपवेदाश्च यज्ञाश्च वेदा विद्या सरस्वती
apsaroyakṣagarnvāḥ siddhā nāgā mahoragāḥ | upavedāśca yajñāśca vedā vidyā sarasvatī
अप्सराएँ, यक्ष, गंधर्व, सिद्ध, नाग, महानाग, उपवेद, यज्ञ, वेद, विद्या और सरस्वती,
श्लोक 4 (skanda.8.67.4)
समुद्राः सरितः शैलास्तीर्थानि विविधानि च । मातरो लोकपालाश्च नक्षत्राणि ध्रुवो ग्रहाः
samudrāḥ saritaḥ śailāstīrthāni vividhāni ca | mātaro lokapālāśca nakṣatrāṇi dhruvo grahāḥ
समुद्र, नदियाँ, पर्वत, विविध तीर्थ, मातृ-देवियाँ, लोकपाल, नक्षत्र, ध्रुव और ग्रह भी।
श्लोक 5 (skanda.8.67.5)
अथोचुर्देवता देवीं द्युतिमत्यो महाद्युतिम् । प्रहृष्टा हृष्टमनसामासीनामसुरद्विषः
athocurdevatā devīṁ dyutimatyo mahādyutim | prahṛṣṭā hṛṣṭamanasāmāsīnāmasuradviṣaḥ
तब वे तेजस्वी देवगण, प्रसन्नचित्त होकर, असुर-शत्रुओं के बीच बैठी उस महातेजस्वी देवी से प्रसन्नतापूर्वक बोले -
श्लोक 6 (skanda.8.67.6)
दानवेन्द्रौ महासत्वौ त्वया त्रैलोक्यकण्टकौ । निघ्नत्या देवि लोकानां दुःखशल्यमपाकृतम्
dānavendrau mahāsatvau tvayā trailokyakaṇṭakau | nighnatyā devi lokānāṁ duḥkhaśalyamapākṛtam
'हे देवी, त्रैलोक्य के कंटक-स्वरूप उन दोनों महाबली दानवेंद्रों को मारकर आपने लोकों के दुःख-शल्य को दूर कर दिया है।'
श्लोक 7 (skanda.8.67.7)
ऋषयः पावनं देवि हविर्जुह्वति साम्प्रतम् । छन्दांस्यधीयते चोच्चैराचरन्ति व्रतानि च
ṛṣayaḥ pāvanaṁ devi havirjuhvati sāmpratam | chandāṁsyadhīyate coccairācaranti vratāni ca
'हे देवी, ऋषिगण अब फिर से पवित्र हवि की आहुति देते हैं; वे ऊँचे स्वर में छंदों का पाठ करते हैं और व्रतों का पालन करते हैं।'
श्लोक 8 (skanda.8.67.8)
यज्ञोयमधुना विप्रैरिज्यते बहुदक्षिणः । उटजेषु च विश्वस्ता मुनयः शेरते सुखम्
yajñoyamadhunā viprairijyate bahudakṣiṇaḥ | uṭajeṣu ca viśvastā munayaḥ śerate sukham
'अब पुनः ब्राह्मणों द्वारा बहुदक्षिणा वाला यज्ञ किया जाता है; और मुनि लोग निश्चिंत होकर अपनी कुटियों में सुखपूर्वक सोते हैं।'
श्लोक 9 (skanda.8.67.9)
आसते निर्भया देवि सन्तः सन्मार्गमाश्रिताः । आविर्भूतः पुनर्लोके विच्छिन्नः सत्क्रियापथः
āsate nirbhayā devi santaḥ sanmārgamāśritāḥ | āvirbhūtaḥ punarloke vicchinnaḥ satkriyāpathaḥ
'सत्पुरुष सन्मार्ग का आश्रय लेकर निर्भय होकर बैठते हैं, हे देवी; लोक में टूटा हुआ सत्कर्म-मार्ग फिर से प्रकट हो गया है।'
श्लोक 10 (skanda.8.67.10)
लोकपालाः शिरांस्युच्चैस्त्वत्प्रसादाच्च बिभ्रति । पृक्तः पुष्परजोभिश्च सुखो वाति समीरणः
lokapālāḥ śirāṁsyuccaistvatprasādācca bibhrati | pṛktaḥ puṣparajobhiśca sukho vāti samīraṇaḥ
'आपकी कृपा से लोकपाल फिर से अपने सिर ऊँचे धारण करते हैं; और पुष्प-पराग से युक्त वायु सुखद रूप से बहती है।'
श्लोक 11 (skanda.8.67.11)
जलानि देवि सरितः स्वच्छानि शिशिराणि च । त्वत्प्रसादान्महायोगे वहन्ति विगतक्लमाः
jalāni devi saritaḥ svacchāni śiśirāṇi ca | tvatprasādānmahāyoge vahanti vigataklamāḥ
'हे महायोगिनी देवी, आपकी कृपा से नदियों का जल फिर से स्वच्छ और शीतल, थकान से रहित होकर बहता है।'
श्लोक 12 (skanda.8.67.12)
इदानीञ्च पुनर्जाता गिरयो गिरिजात्मजे । विज्वराः शिशिरस्वादुनिर्ज्झरोदकवाहिनः
idānīñca punarjātā girayo girijātmaje | vijvarāḥ śiśirasvādunirjjharodakavāhinaḥ
'और अब, हे गिरिजा, पर्वत भी मानो फिर से जन्मे हैं, ज्वर-रहित होकर, शीतल-मधुर निर्झर-जल बहाते हुए।'
श्लोक 13 (skanda.8.67.13)
फणान् स्वस्तिकचक्राङ्कानुच्चैर्दधति भोगिनः । उदन्वन्तश्च विश्वासादिदानीं सुखमासते
phaṇān svastikacakrāṅkānuccairdadhati bhoginaḥ | udanvantaśca viśvāsādidānīṁ sukhamāsate
'सर्पगण अब स्वस्तिक-चक्र के चिह्न वाले अपने फन ऊँचे उठाते हैं; और समुद्र भी विश्वासपूर्वक अब सुखपूर्वक स्थित हैं।'
श्लोक 14 (skanda.8.67.14)
भ्रमन्त्यप्सरसो देवि त्वत्प्रसादाच्च सांप्रतम् । सच्चेतोविमले व्योम्नि विलासालसलोचनाः
bhramantyapsaraso devi tvatprasādācca sāṁpratam | saccetovimale vyomni vilāsālasalocanāḥ
'हे देवी, आपकी कृपा से अब अप्सराएँ, विलास से आलस्ययुक्त नेत्रों वाली, सज्जन के चित्त के समान निर्मल आकाश में विचरण करती हैं।'
श्लोक 15 (skanda.8.67.15)
सिद्धाङ्गनाश्च सेवन्ते विश्वस्ता देवि सांप्रतम् । शिखरेषु महीध्राणामुत्फुल्लान् चन्दनद्रुमान्
siddhāṅganāśca sevante viśvastā devi sāṁpratam | śikhareṣu mahīdhrāṇāmutphullān candanadrumān
'और सिद्ध-अंगनाएँ भी, निश्चिंत होकर, हे देवी, अब महापर्वतों की चोटियों पर खिले हुए चंदन-वृक्षों का सेवन करती हैं।'
श्लोक 16 (skanda.8.67.16)
स्वभावान्मधुपानाच्च रक्तोत्पलविलोचनाः । विचरन्त्यधुना यक्षा गन्धमादनसानुषु
svabhāvānmadhupānācca raktotpalavilocanāḥ | vicarantyadhunā yakṣā gandhamādanasānuṣu
'यक्षगण, स्वभाव से मधुपान के कारण लाल कमल जैसे नेत्रों वाले, अब गंधमादन पर्वत की चोटियों पर विचरण करते हैं।'
श्लोक 17 (skanda.8.67.17)
सुखं बिभर्त्ति वसुधामिदानीं विगतक्लमः । शेषः फणैः स्व रत्नांशुवितानपरिवेषिभिः
sukhaṁ bibhartti vasudhāmidānīṁ vigataklamaḥ | śeṣaḥ phaṇaiḥ sva ratnāṁśuvitānapariveṣibhiḥ
'और शेषनाग भी अब थकान से मुक्त होकर, अपने रत्नों की किरण-वितान से घिरे हुए फणों पर पृथ्वी को सुखपूर्वक धारण करते हैं।'
श्लोक 18 (skanda.8.67.18)
माता त्वमसि लोकानां भीतानामभयप्रदा । वृणु देवि वरानिष्टानभिषिच्यस्व चाच्युते
mātā tvamasi lokānāṁ bhītānāmabhayapradā | vṛṇu devi varāniṣṭānabhiṣicyasva cācyute
'तुम लोकों की माता हो, भयभीतों को अभय देने वाली हो। हे देवी, इच्छित वर माँगो और, हे अच्युते, अभिषेक ग्रहण करो।'
श्लोक 19 (skanda.8.67.19)
एवमुक्ता सुरैर्देवी प्राह किञ्चित् स्मयन्निव । इच्छामि पितरं द्रष्टुमसमग्रेन्दुमौलिनम्
evamuktā surairdevī prāha kiñcit smayanniva | icchāmi pitaraṁ draṣṭumasamagrendumaulinam
देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर देवी ने कुछ मुस्कुराते हुए कहा - 'मैं अपने उन पिता का दर्शन करना चाहती हूँ जो मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करते हैं,'
श्लोक 20 (skanda.8.67.20)
सुप्रसन्नं प्रसन्नाञ्च जननीं शैलनन्दनाम् । पितृभ्यां चाध्वनुज्ञाता मभिषेक्ष्यथ मां ततः
suprasannaṁ prasannāñca jananīṁ śailanandanām | pitṛbhyāṁ cādhvanujñātā mabhiṣekṣyatha māṁ tataḥ
'-प्रसन्न होकर, और अपनी प्रसन्न माता, गिरिनंदिनी को भी; अपने दोनों माता-पिता से अनुमति पाने पर ही तब तुम मेरा अभिषेक करना।'
श्लोक 21 (skanda.8.67.21)
एवमुक्ताः सुरा दध्युरव्यग्रमनसस्तदा । सपत्नीकं महादेवममितद्युतिपौरुषम्
evamuktāḥ surā dadhyuravyagramanasastadā | sapatnīkaṁ mahādevamamitadyutipauruṣam
ऐसा कहे जाने पर देवगण, अविचल मन से, तब अपनी पत्नी सहित अपार तेज और पौरुष वाले महादेव का ध्यान करने लगे।
श्लोक 22 (skanda.8.67.22)
अथ ते ददृशुर्देवा देवदेवमुमापतिम् । तेजसामिव सर्वेषां संघातं पुरतः स्थितम्
atha te dadṛśurdevā devadevamumāpatim | tejasāmiva sarveṣāṁ saṁghātaṁ purataḥ sthitam
तब उन देवताओं ने देवदेव उमापति को अपने सामने खड़ा देखा, मानो समस्त तेजों का समूह हो।
श्लोक 23 (skanda.8.67.23)
जटानां प्रान्तबभ्रूणां शिरसा भारमुन्नतम् । बिभ्राणं ज्वलितं वह्निं दीप्तानामर्चिषामिव
jaṭānāṁ prāntababhrūṇāṁ śirasā bhāramunnatam | bibhrāṇaṁ jvalitaṁ vahniṁ dīptānāmarciṣāmiva
वे अपने सिर पर, भूरी, ऊँची और भारी जटाओं की राशि धारण किए हुए थे, मानो प्रज्वलित अग्नि की दीप्त लपटें हों।
श्लोक 24 (skanda.8.67.24)
कर्पूरभङ्गगौरेण स्नातं पुण्येन भस्मना । प्रान्तहेमलताजालं रौप्यं गिरिमिवोच्छ्रितम्
karpūrabhaṅgagaureṇa snātaṁ puṇyena bhasmanā | prāntahemalatājālaṁ raupyaṁ girimivocchritam
कपूर के टुकड़े के समान श्वेत, पवित्र भस्म से स्नात, वे मानो स्वर्ण-लताजाल से घिरे हुए, ऊँचे उठे हुए रजत-पर्वत के समान प्रतीत हो रहे थे।
श्लोक 25 (skanda.8.67.25)
तेजसा स्वेन तेजांसि तिरयन्तं दिवौकसाम् । मध्यन्दिने प्रदीपानामर्चींषीव दिवाकरम्
tejasā svena tejāṁsi tirayantaṁ divaukasām | madhyandine pradīpānāmarcīṁṣīva divākaram
अपने तेज से वे स्वर्गवासियों के समस्त तेजों को उसी प्रकार फीका कर रहे थे जैसे मध्याह्न में सूर्य दीपकों की लपटों को फीका कर देता है।
श्लोक 26 (skanda.8.67.26)
सुधाम्बुस्यन्दिनीं तन्वीमेकतः परिवेषिणीम् । दधानं मौलिना किञ्चित्कुटिलामैन्दवीं कलाम्
sudhāmbusyandinīṁ tanvīmekataḥ pariveṣiṇīm | dadhānaṁ maulinā kiñcitkuṭilāmaindavīṁ kalām
वे मस्तक के एक ओर अपने मुकुट में, अमृत-जल टपकाती, पतली, थोड़ी टेढ़ी, अपनी ही प्रभा-वलय वाली चंद्र-कला धारण किए हुए थे।
श्लोक 27 (skanda.8.67.27)
विजिह्मामुज्ज्वलां गुर्वीं धूसरां भस्मरेणुना । सैंहीं वसानमालम्बा मीषद्भङ्गवतीं त्वचम्
vijihmāmujjvalāṁ gurvīṁ dhūsarāṁ bhasmareṇunā | saiṁhīṁ vasānamālambā mīṣadbhaṅgavatīṁ tvacam
वे लटकती हुई, टेढ़ी, उज्ज्वल, भारी, भस्म-रज से धूसरित, कुछ मुड़ी हुई सिंह-चर्म धारण किए हुए थे।
श्लोक 28 (skanda.8.67.28)
छुरितोपान्तकायेन फणरत्नमरीचिभिः । महता भोगपतिना वक्षःस्थलविसर्पिणा
churitopāntakāyena phaṇaratnamarīcibhiḥ | mahatā bhogapatinā vakṣaḥsthalavisarpiṇā
उनके शरीर के किनारे, उनकी छाती पर फैले हुए एक विशाल नागराज के फणों के रत्न-प्रभा से चमक रहे थे।
श्लोक 29 (skanda.8.67.29)
भवानीं चास्य पार्श्वस्थां दीप्यमानां स्वतेजसा । वसानामंशुकं रक्तं कल्पपादपसंभवम्
bhavānīṁ cāsya pārśvasthāṁ dīpyamānāṁ svatejasā | vasānāmaṁśukaṁ raktaṁ kalpapādapasaṁbhavam
और उनके पास भवानी विराजमान थीं, अपने ही तेज से देदीप्यमान, कल्पवृक्ष से उत्पन्न लाल वस्त्र धारण किए हुए,
श्लोक 30 (skanda.8.67.30)
मन्दारमालामुत्फुल्लां मत्तालिकुलसेविताम् । दधानामुत्तमाङ्गेन स्वरेणूत्करपिञ्जराम्
mandāramālāmutphullāṁ mattālikulasevitām | dadhānāmuttamāṅgena svareṇūtkarapiñjarām
अपने सिर पर खिली हुई मंदार-माला धारण किए हुए, जो मतवाले भौंरों से सेवित और अपने ही पराग-कणों से पीली हो रही थी,
श्लोक 31 (skanda.8.67.31)
स्वःशिल्पिघटितैश्चित्रै रत्नांशुपरिवेषिभिः । शातकुंभमयैः श्लाघ्यैर्भूषितां भूषणोत्तमैः
svaḥśilpighaṭitaiścitrai ratnāṁśupariveṣibhiḥ | śātakuṁbhamayaiḥ ślāghyairbhūṣitāṁ bhūṣaṇottamaiḥ
देवशिल्पी द्वारा गढ़े हुए, विचित्र, रत्न-किरणों से घिरे, शुद्ध स्वर्ण से बने, प्रशंसनीय, श्रेष्ठ आभूषणों से सुसज्जित,
श्लोक 32 (skanda.8.67.32)
बिभ्रतीं रुचिरां शुद्धां शरच्चन्द्रांशुनिर्मलाम् । शिरोधरेणामहतीमेकावलिमनुत्तमाम्
bibhratīṁ rucirāṁ śuddhāṁ śaraccandrāṁśunirmalām | śirodhareṇāmahatīmekāvalimanuttamām
और अपने गले में शरद्-चंद्र की किरणों के समान निर्मल, सुंदर, शुद्ध, एक लड़ी वाला अनुपम, अखंडित हार धारण किए हुए थीं।
श्लोक 33 (skanda.8.67.33)
अथोत्थाय सुरास्सर्वे कौशिकीं चानतानना । तयोश्चरणपद्मेषु निपेतुस्तुष्टमानसाः
athotthāya surāssarve kauśikīṁ cānatānanā | tayoścaraṇapadmeṣu nipetustuṣṭamānasāḥ
तब सभी देवगण उठ खड़े हुए, और कौशिकी भी, नतमुख होकर, प्रसन्नचित्त होकर, उन दोनों के चरण-कमलों में गिर पड़ी।
श्लोक 34 (skanda.8.67.34)
अथोद्वीक्ष्य महादेवः कौशिकीमिदमब्रवीत् । अजेया सर्वभूतानां महायोगा महाद्युतिः
athodvīkṣya mahādevaḥ kauśikīmidamabravīt | ajeyā sarvabhūtānāṁ mahāyogā mahādyutiḥ
तब कौशिकी की ओर देखकर महादेव ने यह कहा - 'समस्त प्राणियों के लिए अजेय, महायोगिनी, महातेजस्वी -'
श्लोक 35 (skanda.8.67.35)
विचरिष्यसि लोकाँस्त्वं सर्वत्राप्रतिघातिनी । इमाश्च देवताः सर्वास्त्वत्प्रसादादनिन्दिते
vicariṣyasi lokā~stvaṁ sarvatrāpratighātinī | imāśca devatāḥ sarvāstvatprasādādanindite
'-तुम सर्वत्र अप्रतिहत होकर लोकों में विचरण करोगी; और, हे अनिंदिते, ये सभी देवगण तुम्हारी कृपा से,'
श्लोक 36 (skanda.8.67.36)
भक्त्या बल्युपहारैश्च पूजयिष्यन्ति मानवाः । वरदा चापि भक्तानां भविष्यसि सदानघे
bhaktyā balyupahāraiśca pūjayiṣyanti mānavāḥ | varadā cāpi bhaktānāṁ bhaviṣyasi sadānaghe
'-मनुष्य भक्तिपूर्वक बलि और उपहारों से तुम्हारी पूजा करेंगे; और, हे निष्पाप, तुम सदा अपने भक्तों को वर देने वाली बनोगी।'
श्लोक 37 (skanda.8.67.37)
अभिषिच्यस्व च क्षिप्रं सुरैरसुरसूदनि । कृत्स्नं रक्ष च भूर्लोकं पूज्यमाना सदाव्यये
abhiṣicyasva ca kṣipraṁ surairasurasūdani | kṛtsnaṁ rakṣa ca bhūrlokaṁ pūjyamānā sadāvyaye
'और हे असुरसूदनि, अब देवताओं द्वारा शीघ्र अभिषेक ग्रहण करो, और, हे अच्युते, सदा पूजनीय होकर संपूर्ण भूलोक की रक्षा करो।'
श्लोक 38 (skanda.8.67.38)
शर्वाणी च परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय कौशिकीम् । प्राह प्रीता महाभागा मत्प्रभावाद् भविष्यसि
śarvāṇī ca pariṣvajya mūrdhni cāghrāya kauśikīm | prāha prītā mahābhāgā matprabhāvād bhaviṣyasi
और शर्वाणी (पार्वती) ने कौशिकी को गले लगाकर और उसके मस्तक को चूमकर, अत्यंत प्रसन्न होकर कहा - 'मेरे ही प्रभाव से तुम बनोगी -'
श्लोक 39 (skanda.8.67.39)
अर्चयन्ति यथा मां च सुरा यक्षा महोरगाः । गन्धर्वा मुनयः सिद्धास्तथा त्वामप्यनिन्दिते
arcayanti yathā māṁ ca surā yakṣā mahoragāḥ | gandharvā munayaḥ siddhāstathā tvāmapyanindite
'-जैसे देवगण, यक्ष, महानाग, गंधर्व, मुनि और सिद्धगण मेरी पूजा करते हैं, वैसे ही, हे अनिंदिते, वे तुम्हारी भी पूजा करेंगे।'
श्लोक 40 (skanda.8.67.40)
अर्चयिष्यन्ति सर्वत्र भक्ताः स्तोस्यन्ति चाव्यये । एवं तस्यै वरं दत्त्वा गिरिजावृषभध्वजौ
arcayiṣyanti sarvatra bhaktāḥ stosyanti cāvyaye | evaṁ tasyai varaṁ dattvā girijāvṛṣabhadhvajau
'-तुम्हारे भक्त सर्वत्र तुम्हारी पूजा करेंगे और तुम्हारी स्तुति गाएँगे, हे अच्युते।' इस प्रकार उसे वर देकर गिरिजा और वृषभध्वज (शिव),
श्लोक 41 (skanda.8.67.41)
नमस्कृतौ तदा देवैरन्तर्दधतुरव्ययौ । अथेन्द्रो विश्वकर्माणमादिदेश तदा प्रभुः
namaskṛtau tadā devairantardadhaturavyayau | athendro viśvakarmāṇamādideśa tadā prabhuḥ
-वे दोनों अच्युत, देवताओं द्वारा नमस्कृत होकर, तब अंतर्धान हो गए। तब प्रभु इंद्र ने विश्वकर्मा को आज्ञा दी -
श्लोक 42 (skanda.8.67.42)
सुधर्मेव सभा दिव्या क्रियतामिह साम्प्रतम् । ऋतूँश्च सर्वाँ स्तत्रेत्थमादिदेश शतक्रतुः
sudharmeva sabhā divyā kriyatāmiha sāmpratam | ṛtū~śca sarvā~ statretthamādideśa śatakratuḥ
'यहाँ सुधर्मा के समान एक दिव्य सभा तुरंत बनाई जाए।' और इंद्र ने वहाँ सभी ऋतुओं को भी इस प्रकार आज्ञा दी -
श्लोक 43 (skanda.8.67.43)
नानापुष्पोत्करैः क्षिप्रं भूमिः सम्यग् विभूष्यताम् । क्षुपगुल्मलतावृक्ष पुष्परेणुसुगन्धयः
nānāpuṣpotkaraiḥ kṣipraṁ bhūmiḥ samyag vibhūṣyatām | kṣupagulmalatāvṛkṣa puṣpareṇusugandhayaḥ
'भूमि को शीघ्र विविध पुष्प-राशियों से भलीभाँति सुसज्जित किया जाए; झाड़ी, गुल्म, लता और वृक्षों के पुष्प-पराग से सुगंधित,'
श्लोक 44 (skanda.8.67.44)
आक्षिपन्तो मनांस्यत्र सुखा वान्तु समीरणाः । सिञ्चन्तु वारिभिः पुण्यैर्विन्ध्यप्रस्थं पयोमुचः
ākṣipanto manāṁsyatra sukhā vāntu samīraṇāḥ | siñcantu vāribhiḥ puṇyairvindhyaprasthaṁ payomucaḥ
'-यहाँ मन को हरने वाले सुखद वायु चलें; मेघगण विंध्य के पठार को पवित्र जल से सींचें।'
श्लोक 45 (skanda.8.67.45)
तारं नदन्तु शिखिनः प्रहृष्टाः सर्वतोदिशम् । नृत्यन्तु परितश्चित्रान्दर्शयन्तः पृथग्विधान्
tāraṁ nadantu śikhinaḥ prahṛṣṭāḥ sarvatodiśam | nṛtyantu paritaścitrāndarśayantaḥ pṛthagvidhān
'मयूर सब दिशाओं में हर्षित होकर ऊँचे स्वर में बोलें; वे चारों ओर विविध विचित्र नृत्य दिखाते हुए नाचें,'
श्लोक 46 (skanda.8.67.46)
रसान्भावान्विलासाँश्च सर्वेप्यप्सरसां गणाः । प्रतिसार्या सुवीणाश्च गन्धर्वा मधुरस्वरम्
rasānbhāvānvilāsā~śca sarvepyapsarasāṁ gaṇāḥ | pratisāryā suvīṇāśca gandharvā madhurasvaram
'-अप्सराओं के समस्त गण रस, भाव और विलास प्रकट करें; और वीणा-कुशल गंधर्वगण मधुर स्वर में,'
श्लोक 47 (skanda.8.67.47)
लयतालसमं गेयं गायन्तु च समन्ततः । आहन्यन्तां समन्ताच्च देवदुन्दुभयो भृशम्
layatālasamaṁ geyaṁ gāyantu ca samantataḥ | āhanyantāṁ samantācca devadundubhayo bhṛśam
'-लय-ताल में समुचित गीत गाएँ, सब ओर से; और देव-दुंदुभियाँ चारों ओर जोर से बजाई जाएँ,'
श्लोक 48 (skanda.8.67.48)
पाणिभिः कठिनैस्तूर्णं चित्ररूपा महास्वनाः । मन्दानिलसमुद्धूता लीनालिकुलपंक्तयः
pāṇibhiḥ kaṭhinaistūrṇaṁ citrarūpā mahāsvanāḥ | mandānilasamuddhūtā līnālikulapaṁktayaḥ
'-कठोर हाथों से शीघ्र, विविध रूप वाली, महास्वर वाली; मंद वायु से हिलते हुए, भौंरों की पंक्तियों से युक्त पुष्प,'
श्लोक 49 (skanda.8.67.49)
पतन्त्वस्मिन्प्रदेशे च दिव्याः कुसुमवृष्टयः । उच्छ्रियन्तां समन्ताच्च पताकाश्चित्रमूर्तयः
patantvasminpradeśe ca divyāḥ kusumavṛṣṭayaḥ | ucchriyantāṁ samantācca patākāścitramūrtayaḥ
'-इस स्थान पर दिव्य पुष्प-वर्षा के रूप में गिरें; और विचित्र आकार वाली पताकाएँ चारों ओर ऊँची फहराई जाएँ,'
श्लोक 50 (skanda.8.67.50)
ध्वजाश्च विविधाकारा हेमदण्डाः सुसंस्कृताः । अथाशु निर्ममे तत्र विश्वकर्मा महाद्युतिः
dhvajāśca vividhākārā hemadaṇḍāḥ susaṁskṛtāḥ | athāśu nirmame tatra viśvakarmā mahādyutiḥ
'-और स्वर्ण-दंडों वाले, सुसज्जित, विविध आकार के ध्वज लगाए जाएँ।' तब वहाँ महातेजस्वी विश्वकर्मा ने शीघ्र
श्लोक 51 (skanda.8.67.51)
नानारत्नोज्ज्वलस्तम्भां विचित्रमणिवेदिकाम् । वज्रस्फटिकनिर्यूहां जाम्बूनदमयीं शुभाम्
nānāratnojjvalastambhāṁ vicitramaṇivedikām | vajrasphaṭikaniryūhāṁ jāmbūnadamayīṁ śubhām
एक शुभ स्वर्णमय वेदिका बनाई, जिसके स्तंभ अनेक रत्नों से जगमगाते थे, जिसकी वेदी विचित्र मणियों से युक्त थी, और जिसका द्वार-मंडप हीरे-स्फटिक का था,
श्लोक 52 (skanda.8.67.52)
इन्द्रनीलोरुसोपानां मुक्तादामावलम्बिनीम । सध्वजां सपताकां च घण्टास्वन निनादिताम्
indranīlorusopānāṁ muktādāmāvalambinīma | sadhvajāṁ sapatākāṁ ca ghaṇṭāsvana nināditām
इंद्रनील मणि की विशाल सीढ़ियों वाली, मोतियों की झालरों से युक्त, ध्वज-पताकाओं सहित, घंटियों की ध्वनि से गूँजती हुई,
श्लोक 53 (skanda.8.67.53)
तपोनियमयज्ञानां साक्षात् सिद्धिमिवोद्गताम् । भिन्नकालानि पुष्पाणि ददृशुर्देवतास्तदा
taponiyamayajñānāṁ sākṣāt siddhimivodgatām | bhinnakālāni puṣpāṇi dadṛśurdevatāstadā
मानो तप, नियम और यज्ञ की साक्षात् सिद्धि हो। तब देवताओं ने विभिन्न ऋतुओं के पुष्पों को एक साथ खिला हुआ देखा -
श्लोक 54 (skanda.8.67.54)
समं सुपुण्यगन्धीनि विचित्राणि बहूनि च । पुष्पकिञ्जल्कगर्भाश्च सुखस्पर्शाः सुगन्धयः
samaṁ supuṇyagandhīni vicitrāṇi bahūni ca | puṣpakiñjalkagarbhāśca sukhasparśāḥ sugandhayaḥ
-सब एक साथ, अत्यंत सुगंधित, अनेक और विचित्र; तथा पुष्प-पराग से युक्त, सुखस्पर्श, सुगंधित वायु चारों ओर बहती हुई।
श्लोक 55 (skanda.8.67.55)
नादयन्तो मुहुर्घण्टा ववुस्तत्र समीरणाः । प्रजगुः सुरगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः
nādayanto muhurghaṇṭā vavustatra samīraṇāḥ | prajaguḥ suragandharvā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ
वहाँ वायु बार-बार घंटियों को बजाते हुए बहने लगी; देव-गंधर्व गाने लगे, और अप्सरा-गण नाचने लगे।
श्लोक 56 (skanda.8.67.56)
ऋषयस्तुष्टुवुर्गीभिः पुण्याभिः कौशिकीं तदा । सर्वरत्नौषधैर्गन्धैः पूर्णाः पुण्यैश्च वारिभिः
ṛṣayastuṣṭuvurgībhiḥ puṇyābhiḥ kauśikīṁ tadā | sarvaratnauṣadhairgandhaiḥ pūrṇāḥ puṇyaiśca vāribhiḥ
ऋषियों ने तब पवित्र स्तोत्रों से कौशिकी की स्तुति की। समस्त रत्नों, औषधियों, गंधों और पवित्र जल से भरे हुए -
श्लोक 57 (skanda.8.67.57)
आनीतास्तत्र कलशा हेमरत्नमयाः शुभाः । पद्मरागमयैः सिंहैश्चतुर्भिर्वज्रकेशरैः
ānītāstatra kalaśā hemaratnamayāḥ śubhāḥ | padmarāgamayaiḥ siṁhaiścaturbhirvajrakeśaraiḥ
-सुनहरे रत्नमय शुभ कलश वहाँ लाए गए। माणिक्य से बने, हीरे की अयालों वाले चार सिंहों से,
श्लोक 58 (skanda.8.67.58)
उच्छ्वसद्भिरिव श्रीमदुह्यमानं हिरण्मयम् । सर्वरत्नप्रभाजालखचितोपान्तमण्डलम्
ucchvasadbhiriva śrīmaduhyamānaṁ hiraṇmayam | sarvaratnaprabhājālakhacitopāntamaṇḍalam
-मानो साँस लेते हुए, श्रीमान्, उठाए हुए - एक स्वर्णिम सिंहासन, जिसकी परिधि समस्त रत्नों की प्रभा-जाल से जड़ी थी,
श्लोक 59 (skanda.8.67.59)
कल्पयामास देव्याश्च विश्वकर्मा वरासनम् । स्तुतिभिर्जयशब्दैश्च स्तूयमाना समन्ततः
kalpayāmāsa devyāśca viśvakarmā varāsanam | stutibhirjayaśabdaiśca stūyamānā samantataḥ
-विश्वकर्मा ने उस देवी के लिए उत्तम आसन के रूप में रचा। सब ओर से स्तुतियों और जय-जयकारों से स्तुति की जाती हुई,
श्लोक 60 (skanda.8.67.60)
ऋषिभिर्देवताभिश्च देवदेवसुता ततः । तस्मिन् सिंहासने दिव्ये निषसादाथ कौशिकी
ṛṣibhirdevatābhiśca devadevasutā tataḥ | tasmin siṁhāsane divye niṣasādātha kauśikī
ऋषियों और देवताओं द्वारा, देवदेव-पुत्री कौशिकी तब उस दिव्य सिंहासन पर विराजमान हुईं,
श्लोक 61 (skanda.8.67.61)
कृतस्वस्त्ययना विप्रैः सुहुते जातवेदसि । वसाना वाससी शुक्ले कल्पद्रुमसमुद्भवे
kṛtasvastyayanā vipraiḥ suhute jātavedasi | vasānā vāsasī śukle kalpadrumasamudbhave
ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन किया गया, अग्नि में भलीभाँति आहुति दी गई, कल्पवृक्ष से उत्पन्न दो श्वेत वस्त्र धारण किए हुए,
श्लोक 62 (skanda.8.67.62)
मुक्तादामावबद्धाङ्गी शुक्लस्रगनुलेपना । ततः सप्तर्षयो विष्णुर्धर्मो यज्ञः प्रजापतिः
muktādāmāvabaddhāṅgī śuklasraganulepanā | tataḥ saptarṣayo viṣṇurdharmo yajñaḥ prajāpatiḥ
मोतियों की लड़ियों से बंधे अंगों वाली, श्वेत माला और चंदन-लेपन से युक्त। तब सप्तर्षि, विष्णु, धर्म, यज्ञ, प्रजापति,
श्लोक 63 (skanda.8.67.63)
आदित्याः कश्यपो रुद्रा लोकपाला हुताशनाः । शैलेन्द्राः पृथिवी गङ्गा चन्द्रमा मरुतोश्विनौ
ādityāḥ kaśyapo rudrā lokapālā hutāśanāḥ | śailendrāḥ pṛthivī gaṅgā candramā marutośvinau
आदित्यगण, कश्यप, रुद्रगण, लोकपाल, अग्निदेव, महापर्वत, पृथ्वी, गंगा, चंद्रमा, मरुद्गण और दोनों अश्विनीकुमार,
श्लोक 64 (skanda.8.67.64)
समुद्रा वसवो लक्ष्मीः सन्ध्या कीर्तिः सरस्वती । नागेन्द्रा विहगेशाश्च विविधाश्च सरिद्वराः
samudrā vasavo lakṣmīḥ sandhyā kīrtiḥ sarasvatī | nāgendrā vihageśāśca vividhāśca saridvarāḥ
समुद्र, वसुगण, लक्ष्मी, संध्या, कीर्ति, सरस्वती, नागेंद्र, पक्षिराज और विविध श्रेष्ठ नदियाँ,
श्लोक 65 (skanda.8.67.65)
आदाय कलशान् सर्बानभ्यषिञ्चन्त कौशिकीम् । पूर्णेन्दुबिम्बप्रतिमं रत्नदण्डं महाद्युतिम्
ādāya kalaśān sarbānabhyaṣiñcanta kauśikīm | pūrṇendubimbapratimaṁ ratnadaṇḍaṁ mahādyutim
उन सब कलशों को लेकर कौशिकी का अभिषेक करने लगे। तब स्वयं इंद्र ने पूर्णचंद्र के बिंब के समान, रत्न-दंड वाला, महातेजस्वी विशाल छत्र स्वयं धारण किया,
श्लोक 66 (skanda.8.67.66)
जग्राह विततं छत्रं स्वयमेव शतक्रतुः । चामरैर्हेमदण्डैश्च दीर्घैश्चन्द्रांशुनिर्मलैः
jagrāha vitataṁ chatraṁ svayameva śatakratuḥ | cāmarairhemadaṇḍaiśca dīrghaiścandrāṁśunirmalaiḥ
और लंबे स्वर्ण-दंड वाले, चंद्रकिरणों के समान निर्मल चँवरों से,
श्लोक 67 (skanda.8.67.67)
बीजयामासु रायस्तैर्लोकपालास्तदाव्ययाम् । उवाच च ततः श्रीमान् कौशिकीं पाकशासनः
bījayāmāsu rāyastairlokapālāstadāvyayām | uvāca ca tataḥ śrīmān kauśikīṁ pākaśāsanaḥ
लोकपालों ने उस अच्युता देवी को हवा की। तब श्रीमान् इंद्र ने कौशिकी से कहा -
श्लोक 68 (skanda.8.67.68)
पाहि कृत्स्नां भुवं देवि भगिनी त्वं ममाव्यये । भक्ताननुगृहाणेशे जहि चामरकण्टकान् । विचरस्व समस्तांश्च लोकान् सिद्धगणार्चिता
pāhi kṛtsnāṁ bhuvaṁ devi bhaginī tvaṁ mamāvyaye | bhaktānanugṛhāṇeśe jahi cāmarakaṇṭakān | vicarasva samastāṁśca lokān siddhagaṇārcitā
'हे देवी, संपूर्ण पृथ्वी की रक्षा करो; हे अच्युते, तुम मेरी बहन हो। हे ईश्वरी, भक्तों पर अनुग्रह करो और अमरों के कंटक-शत्रुओं का वध करो; सिद्धगणों द्वारा पूजित होकर समस्त लोकों में विचरण करो।'
श्लोक 69 (skanda.8.67.69)
इति वचनमथोक्त्वा कौशिकीं देवराज स्त्रिदशगणसमेतः शुभ्रलोलोरुहारः । उदपतदथ विन्ध्याद्विक्षिपन्व्योम्नि नीलान् । सलिलभरविनम्रानम्बुवाहान्समन्तात्
iti vacanamathoktvā kauśikīṁ devarāja stridaśagaṇasametaḥ śubhraloloruhāraḥ | udapatadatha vindhyādvikṣipanvyomni nīlān | salilabharavinamrānambuvāhānsamantāt
कौशिकी से यह वचन कहकर, देवराज इंद्र, त्रिदश-गणों सहित, अपनी विशाल शुभ्र लहराती माला के साथ, विंध्य से उठकर आकाश में उड़ चले, चारों ओर जल-भार से झुके हुए काले मेघों को बिखेरते हुए।
श्लोक 70 (skanda.8.67.70)
य इमं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा सत्समागमे । इह लोके सुखं प्राप्य स याति परमां गतिम्
ya imaṁ śṛṇuyānnityaṁ paṭhedvā satsamāgame | iha loke sukhaṁ prāpya sa yāti paramāṁ gatim
जो कोई इसे सत्संग में नित्य सुनता या पढ़ता है, वह इस लोक में सुख प्राप्त करके परम गति को प्राप्त होता है।