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अम्बिका खण्ड · अध्याय 68

महिषासुर-वध

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (skanda.8.68.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ ता देवता देवी कौशिकी देहसंभवाः । न्यवेशयन्महाभागा देशेषु नगरेषु च

sanatkumāra uvāca | atha tā devatā devī kauśikī dehasaṁbhavāḥ | nyaveśayanmahābhāgā deśeṣu nagareṣu ca

सनत्कुमार ने कहा - तब उस महाभागा देवी कौशिकी ने अपने शरीर से उत्पन्न उन देवियों को विभिन्न देशों और नगरों में स्थापित किया।

श्लोक 2 (skanda.8.68.2)

बहुपुत्रां प्रलम्बो च लङ्कायां सन्न्यवेशयत् । लम्बौष्ठीं वृषदंशां च किन्नरीं चैव सिंहले

bahuputrāṁ pralambo ca laṅkāyāṁ sannyaveśayat | lambauṣṭhīṁ vṛṣadaṁśāṁ ca kinnarīṁ caiva siṁhale

उसने बहुपुत्रा और प्रलंबा को लंका में स्थापित किया; लंबोष्ठी, वृषदंशा और किन्नरी को सिंहल में,

श्लोक 3 (skanda.8.68.3)

गोकर्णे रेवतीं देवीं पाण्ड्येषु मुखमण्डिकाम् । आभीरेष्वशिवां चैव शान्तिं च वरणातटे

gokarṇe revatīṁ devīṁ pāṇḍyeṣu mukhamaṇḍikām | ābhīreṣvaśivāṁ caiva śāntiṁ ca varaṇātaṭe

गोकर्ण में देवी रेवती को, पांड्य देश में मुखमंडिका को, आभीरों में अशिवा को, और वरणा नदी के तट पर शांति को,

श्लोक 4 (skanda.8.68.4)

वत्सगुल्मे प्रभां देवीं लक्ष्मीं कोलगिरावपि । उपकां पारसीकेषु वायसीं यवनेषु च

vatsagulme prabhāṁ devīṁ lakṣmīṁ kolagirāvapi | upakāṁ pārasīkeṣu vāyasīṁ yavaneṣu ca

वत्सगुल्म में देवी प्रभा को, कोलगिरि में लक्ष्मी को, पारसीकों में उपका को, और यवनों में वायसी को,

श्लोक 5 (skanda.8.68.5)

प्रचण्डां च तुषारेषु कोशलेषु च लम्बिकाम् । जयां च विजयां चैव स्वपुरे संन्यवेशयत्

pracaṇḍāṁ ca tuṣāreṣu kośaleṣu ca lambikām | jayāṁ ca vijayāṁ caiva svapure saṁnyaveśayat

तुषारों में प्रचंडा को, कोशल में लंबिका को; और जया तथा विजया को अपने ही नगर में स्थापित किया।

श्लोक 6 (skanda.8.68.6)

प्रभावतीं कलिङ्गेषु जयन्तीं नागसाह्वये । काश्मीरेषु च सा षष्ठीं सरमां मलयेषु च

prabhāvatīṁ kaliṅgeṣu jayantīṁ nāgasāhvaye | kāśmīreṣu ca sā ṣaṣṭhīṁ saramāṁ malayeṣu ca

कलिंगों में प्रभावती को, नागसाह्वय (हस्तिनापुर) में जयंती को; काश्मीरों में षष्ठी को, और मलयों में सरमा को,

श्लोक 7 (skanda.8.68.7)

पूतनां च सुपीरेषु मृत्युं पृष्टपुरे तथा । कोटीवर्षे बाहुमांसां पौण्ड्रेषु कटपूतनाम्

pūtanāṁ ca supīreṣu mṛtyuṁ pṛṣṭapure tathā | koṭīvarṣe bāhumāṁsāṁ pauṇḍreṣu kaṭapūtanām

सुपीरों में पूतना को, तथा पृष्ठपुर में मृत्यु को; कोटीवर्ष में बाहुमांसा को, और पौंड्रों में कटपूतना को,

श्लोक 8 (skanda.8.68.8)

अस्पृष्टां मध्यदेशे तु किन्नरीं बर्बरेषु च । वाराणस्यां निरायास्यां चित्रघण्टां च कौशिकीम्

aspṛṣṭāṁ madhyadeśe tu kinnarīṁ barbareṣu ca | vārāṇasyāṁ nirāyāsyāṁ citraghaṇṭāṁ ca kauśikīm

मध्यदेश में अस्पृष्टा को, और बर्बरों में किन्नरी को; वाराणसी और निरायसा में चित्रघंटा और कौशिकी को,

श्लोक 9 (skanda.8.68.9)

महाकालीं महाकाले वानरीं शबरेषु च । शेषाश्च देवताः सर्वा ग्रामेषु नगरेषु च

mahākālīṁ mahākāle vānarīṁ śabareṣu ca | śeṣāśca devatāḥ sarvā grāmeṣu nagareṣu ca

महाकाल में महाकाली को, और शबरों में वानरी को; और शेष सभी देवियों को अन्य गाँवों और नगरों में,

श्लोक 10 (skanda.8.68.10)

कर्वटेषु महीध्रेषु कौशिकी संन्यवेशयत् । कस्यचित्त्वथ कालस्य स्वर्णाक्षे हि महातपाः

karvaṭeṣu mahīdhreṣu kauśikī saṁnyaveśayat | kasyacittvatha kālasya svarṇākṣe hi mahātapāḥ

तथा कर्वटों और पर्वतों में भी कौशिकी ने उन्हें स्थापित किया। तत्पश्चात् कुछ समय बाद, स्वर्णाक्ष नामक महातपस्या के स्थान में,

श्लोक 11 (skanda.8.68.11)

यत्र विष्णुर्वरं लेभे देवमाराध्य शङ्करम् । चक्रं सुदर्शनं नाम द्विषतामन्तकोपमम्

yatra viṣṇurvaraṁ lebhe devamārādhya śaṅkaram | cakraṁ sudarśanaṁ nāma dviṣatāmantakopamam

-जहाँ विष्णु ने पहले भगवान् शंकर की आराधना करके, शत्रुओं के लिए साक्षात् काल के समान सुदर्शन नामक चक्र का वर पाया था -

श्लोक 12 (skanda.8.68.12)

ऋषिरास्ते महाभागः शरद्वान्नाम गौतमः । तस्य यज्ञं जगामाथ देवी तेन निमन्त्रिता

ṛṣirāste mahābhāgaḥ śaradvānnāma gautamaḥ | tasya yajñaṁ jagāmātha devī tena nimantritā

-वहाँ शरद्वान् गौतम नामक महाभाग्यशाली ऋषि रहते थे; और उनके द्वारा आमंत्रित होकर देवी उनके यज्ञ में गईं।

श्लोक 13 (skanda.8.68.13)

तस्यास्तत्रागमं ज्ञात्वा सूनुः शुम्भस्य वीर्यवान् । आजगामाशु तं देशं महिषो नाम दानवः

tasyāstatrāgamaṁ jñātvā sūnuḥ śumbhasya vīryavān | ājagāmāśu taṁ deśaṁ mahiṣo nāma dānavaḥ

उसके वहाँ आगमन को जानकर, शुंभ का पराक्रमी पुत्र, महिष नामक दानव, शीघ्र उस स्थान पर आ पहुँचा।

श्लोक 14 (skanda.8.68.14)

सुसंहतः पृथूरस्को महाग्रीवः सुबालधिः । बद्धवैराशयः क्रू रो महासत्वोतिदुर्जयः । वज्रनिष्पेषपरुषं नर्दमानो महास्वनः

susaṁhataḥ pṛthūrasko mahāgrīvaḥ subāladhiḥ | baddhavairāśayaḥ krū ro mahāsatvotidurjayaḥ | vajraniṣpeṣaparuṣaṁ nardamāno mahāsvanaḥ

सुगठित शरीर वाला, चौड़ी छाती वाला, मोटी गर्दन वाला, सुंदर पूँछ वाला; वैर धारण किए हुए, क्रूर, महाबली, अत्यंत दुर्जय; वज्र के घर्षण के समान कर्कश महागर्जन करता हुआ,

श्लोक 15 (skanda.8.68.15)

अञ्जनाद्रिसमप्रख्यो युयुत्सुर्बलदर्पितः । देव्याः पन्थानमावार्य दानवेन्द्रसुतः स्थितः

añjanādrisamaprakhyo yuyutsurbaladarpitaḥ | devyāḥ panthānamāvārya dānavendrasutaḥ sthitaḥ

-अंजन-पर्वत के समान श्याम, युद्ध की इच्छा वाला, बल से गर्वित - वह दानवेंद्र-पुत्र देवी का मार्ग रोककर खड़ा हो गया।

श्लोक 16 (skanda.8.68.16)

विज्ञाय तस्यागमनं योगेशा विन्ध्यवासिनी । जगाम त्वरिता तत्र यत्रासौ दानवाधमः

vijñāya tasyāgamanaṁ yogeśā vindhyavāsinī | jagāma tvaritā tatra yatrāsau dānavādhamaḥ

उसके आगमन को जानकर, योगेश्वरी, विंध्यवासिनी देवी, शीघ्रता से वहाँ गईं जहाँ वह नीच दानव खड़ा था।

श्लोक 17 (skanda.8.68.17)

अथ दृष्ट्वा स तां देवीं क्रोधाद्रक्ततरेक्षणः । अभ्याजगाम वेगेन यत्नमास्थाय दानवः

atha dṛṣṭvā sa tāṁ devīṁ krodhādraktatarekṣaṇaḥ | abhyājagāma vegena yatnamāsthāya dānavaḥ

तब उस देवी को देखकर, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाला वह दानव, प्रयत्नपूर्वक वेग से उसकी ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 18 (skanda.8.68.18)

उद्वालधिस्तीक्ष्णविषाणकोटिः सुपीनवक्षाः कठिनोर्ध्वकर्णः । अभ्यापतद् गुग्गुलताम्रनेत्रो जवेन देवीमसिताद्रिकल्पः

udvāladhistīkṣṇaviṣāṇakoṭiḥ supīnavakṣāḥ kaṭhinordhvakarṇaḥ | abhyāpatad guggulatāmranetro javena devīmasitādrikalpaḥ

पूँछ उठाए हुए, तीक्ष्ण सींगों के अग्रभाग वाला, पुष्ट वक्षस्थल वाला, कठोर खड़े कानों वाला, गुग्गुल के समान ताम्र नेत्रों वाला, काले पर्वत के समान वह वेगपूर्वक देवी पर टूट पड़ा।

श्लोक 19 (skanda.8.68.19)

तं कौशिकी वीक्ष्य तदापतन्तं दैत्येन्द्रपुत्रं महिषं सरोषम् । चुक्रोध ताम्रायतचारुनेत्रा स्थिता धरण्यामसुरेन्द्रहन्त्री

taṁ kauśikī vīkṣya tadāpatantaṁ daityendraputraṁ mahiṣaṁ saroṣam | cukrodha tāmrāyatacārunetrā sthitā dharaṇyāmasurendrahantrī

उस दैत्येंद्र-पुत्र महिष को क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देखकर, असुरेंद्रों की संहारिणी कौशिकी, अपने ताम्रवर्ण के दीर्घ सुंदर नेत्रों सहित, भूमि पर स्थित होकर क्रुद्ध हो उठीं।

श्लोक 20 (skanda.8.68.20)

अभ्येत्य तां दानवराजसूनुर्बलेन मत्तः परमेण देवीम् । अभ्याहनद्वक्षसि लोलहारे शृंगेण शक्रायुधकर्कशेन

abhyetya tāṁ dānavarājasūnurbalena mattaḥ parameṇa devīm | abhyāhanadvakṣasi lolahāre śṛṁgeṇa śakrāyudhakarkaśena

परम बल से उन्मत्त वह दानवराज-पुत्र देवी के पास पहुँचकर, इंद्र के वज्र के समान कठोर सींग से, उनके लहराते हार वाले वक्षस्थल पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 21 (skanda.8.68.21)

विषह्य तं तस्य तदा प्रहारं जग्राह शृङ्गे महिषं करेण । उद्भ्राम्य चोच्चैः परितः सरोषा न्यपातयद् भूमितले श्वसन्तम्

viṣahya taṁ tasya tadā prahāraṁ jagrāha śṛṅge mahiṣaṁ kareṇa | udbhrāmya coccaiḥ paritaḥ saroṣā nyapātayad bhūmitale śvasantam

उसके उस प्रहार को सहकर, उन्होंने महिष को हाथ से सींग पकड़ लिया; और क्रुद्ध होकर उसे ऊँचा घुमाकर, हाँफते हुए उस पशु को भूमि पर पटक दिया।

श्लोक 22 (skanda.8.68.22)

उद्गृह्य सा बालधिमिन्द्रशत्रोः कृत्वा च पादं शिरसि प्रसह्य । त्रिशूलमादाय बिभेद पृष्ठे व्ययोजयच्चासुभिराशु दैत्यम्

udgṛhya sā bāladhimindraśatroḥ kṛtvā ca pādaṁ śirasi prasahya | triśūlamādāya bibheda pṛṣṭhe vyayojayaccāsubhirāśu daityam

उस इंद्र-शत्रु की पूँछ पकड़कर, और बलपूर्वक उसके सिर पर पैर रखकर, उन्होंने त्रिशूल लेकर उसकी पीठ बींध दी, और शीघ्र ही उस दैत्य को प्राणों से वियुक्त कर दिया।

श्लोक 23 (skanda.8.68.23)

कुलिशकठिनशृङ्गं नीलजीमूतकल्पं । महिषमथ निहत्य प्रौढदर्पन्तदानीम् । विविधकुसुमवृष्ट्या सर्वतः कीर्यमाणा । धरणिधरमगच्छत् कौशिकी सन्निवासम्

kuliśakaṭhinaśṛṅgaṁ nīlajīmūtakalpaṁ | mahiṣamatha nihatya prauḍhadarpantadānīm | vividhakusumavṛṣṭyā sarvataḥ kīryamāṇā | dharaṇidharamagacchat kauśikī sannivāsam

वज्र के समान कठोर सींगों वाले, नीले मेघ के समान श्याम, अत्यंत गर्वित उस महिष को इस प्रकार मारकर, चारों ओर से विविध पुष्पों की वर्षा से आच्छादित होती हुई कौशिकी अपने पर्वत-निवास को लौट गईं।

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