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अम्बिका खण्ड · अध्याय 69

गौरीशिखर-वरप्रदान

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

श्लोक 1 (skanda.8.69.1)

व्यास उवाच । भगवन् सर्वलोकज्ञ पितामहसमद्युते । तपः कृत्वा तदा देवी पुष्कलं हिमवत्सुता

vyāsa uvāca | bhagavan sarvalokajña pitāmahasamadyute | tapaḥ kṛtvā tadā devī puṣkalaṁ himavatsutā

व्यास ने कहा - हे भगवन्, सर्वलोकज्ञ, पितामह के समान तेजस्वी, हिमवत्-पुत्री देवी ने तब प्रचुर तपस्या करके

श्लोक 2 (skanda.8.69.2)

वरं यथेप्सितं लब्ध्वा ब्रह्मणो गौरवर्णताम् । किमन्यदकरोद्विप्र तपसोन्ते महामुने

varaṁ yathepsitaṁ labdhvā brahmaṇo gauravarṇatām | kimanyadakarodvipra tapasonte mahāmune

ब्रह्मा से इच्छित गौरवर्ण का वर पाकर, हे विप्र, हे महामुने, तपस्या के अंत में उसने और क्या किया?

श्लोक 3 (skanda.8.69.3)

सोमनन्दी च शार्दूलः किमवाप वरं शुभम् । एतन्मे पृच्छतो ब्रूहि भक्ताय प्रणताय च

somanandī ca śārdūlaḥ kimavāpa varaṁ śubham | etanme pṛcchato brūhi bhaktāya praṇatāya ca

और सोमनंदी नामक सिंह ने कौन-सा शुभ वर पाया? यह मुझे बताइए, जो पूछ रहा हूँ, आपका भक्त और नत शिष्य हूँ।

श्लोक 4 (skanda.8.69.4)

सनत्कुमार उवाच । नमस्कृत्य महादेवं परमं ब्रह्म शाश्वतम् । यं पठन्ति सदा सांख्याः पुरुषं पंचविंशकम्

sanatkumāra uvāca | namaskṛtya mahādevaṁ paramaṁ brahma śāśvatam | yaṁ paṭhanti sadā sāṁkhyāḥ puruṣaṁ paṁcaviṁśakam

सनत्कुमार ने कहा - महादेव को, उस परम शाश्वत ब्रह्म को, जिसे सांख्यगण सदा पच्चीसवाँ तत्त्व पुरुष कहते हैं, नमस्कार करके,

श्लोक 5 (skanda.8.69.5)

योगिनश्चैव षड्विंशं ब्रह्माद्याश्च दिवौकसः । प्रणम्य परया भक्त्या शिरसा तं त्रिलोचनम्

yoginaścaiva ṣaḍviṁśaṁ brahmādyāśca divaukasaḥ | praṇamya parayā bhaktyā śirasā taṁ trilocanam

-और जिसे योगीजन छब्बीसवाँ तत्त्व कहते हैं, तथा जिसे ब्रह्मादि स्वर्गवासी भी पूजते हैं - उस त्रिनेत्र को परम भक्ति से सिर झुकाकर प्रणाम करके,

श्लोक 6 (skanda.8.69.6)

गौर्या समागमो व्यास शङ्करस्य यथाभवत् । तत् प्रवक्ष्यामि ते सर्वं शृणु योगविदां वर

gauryā samāgamo vyāsa śaṅkarasya yathābhavat | tat pravakṣyāmi te sarvaṁ śṛṇu yogavidāṁ vara

-हे व्यास, हे योगविदों में श्रेष्ठ, मैं तुम्हें बताऊँगा कि किस प्रकार गौरी का शंकर से मिलन हुआ; सुनो।

श्लोक 7 (skanda.8.69.7)

तस्मिन् हिमवतः शृङ्गे तपः कृत्वा सुदुष्करम् । गौराङ्गी सा तदा भूत्वा शुद्धहेमसमप्रभा

tasmin himavataḥ śṛṅge tapaḥ kṛtvā suduṣkaram | gaurāṅgī sā tadā bhūtvā śuddhahemasamaprabhā

उस हिमालय के शिखर पर अत्यंत दुष्कर तपस्या करके, वह तब गौरांगी हो गई, शुद्ध स्वर्ण के समान कांतिमान।

श्लोक 8 (skanda.8.69.8)

दर्शने शङ्करस्याथ शर्वाणी मतिमादधे । मन्दरं गिरिमागम्य सहिता सोमनन्दिना

darśane śaṅkarasyātha śarvāṇī matimādadhe | mandaraṁ girimāgamya sahitā somanandinā

तब शर्वाणी ने शंकर के दर्शन का मन बनाया, और सोमनंदी सहित मंदर पर्वत पर पहुँचीं,

श्लोक 9 (skanda.8.69.9)

अपश्यद्भवने भर्तुर्द्वारमूले समास्थितम् । नन्दिनं गणपं देवी दीप्तपट्टिशधारिणम्

apaśyadbhavane bharturdvāramūle samāsthitam | nandinaṁ gaṇapaṁ devī dīptapaṭṭiśadhāriṇam

और अपने पति के भवन के द्वार-मूल पर स्थित, चमकते हुए पट्टिश धारण किए, गणपति नंदी को देवी ने देखा।

श्लोक 10 (skanda.8.69.10)

ततो नन्दीश्वरं दृष्ट्वा भक्तं प्रेम्णा गिरीन्द्रजा । एहि वत्स चिराद् दृष्टस्त्वमित्युक्तवती तदा

tato nandīśvaraṁ dṛṣṭvā bhaktaṁ premṇā girīndrajā | ehi vatsa cirād dṛṣṭastvamityuktavatī tadā

तब भक्त नंदीश्वर को देखकर, गिरिराज-पुत्री ने स्नेहपूर्वक कहा - 'आओ वत्स, बहुत दिनों बाद तुम्हारे दर्शन हुए!'

श्लोक 11 (skanda.8.69.11)

नन्दी संप्रेक्ष्य तां चापि गौराङ्गीं हेमसप्रभाम् । हर्षेण महता युक्तः पादयोरपतद् भृशम्

nandī saṁprekṣya tāṁ cāpi gaurāṅgīṁ hemasaprabhām | harṣeṇa mahatā yuktaḥ pādayorapatad bhṛśam

नंदी भी उन्हें गौरांगी, स्वर्ण-कांति वाली देखकर, अत्यंत हर्ष से भरकर तुरंत उनके चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 12 (skanda.8.69.12)

प्रणम्य स तदा धीमानस्तुवत् पर्वतात्मजाम् । नमः सिद्ध्यै महादेव्यै रतये गतये नमः

praṇamya sa tadā dhīmānastuvat parvatātmajām | namaḥ siddhyai mahādevyai rataye gataye namaḥ

प्रणाम करके, उस बुद्धिमान् ने पर्वत-पुत्री की स्तुति की - 'सिद्धि को नमस्कार, महादेवी को, रति को, गति को नमस्कार,'

श्लोक 13 (skanda.8.69.13)

त्वं क्रिया कारणं त्वं च प्रकृतिर्मुक्तिरेव च । कान्तिर्द्युतिस्तथा तुष्टिश्शान्तिः स्वस्त्ययनं परम्

tvaṁ kriyā kāraṇaṁ tvaṁ ca prakṛtirmuktireva ca | kāntirdyutistathā tuṣṭiśśāntiḥ svastyayanaṁ param

'-तुम क्रिया हो, तुम कारण हो, तुम प्रकृति हो और तुम मुक्ति भी हो; तुम कांति, द्युति, संतोष, शांति और परम कल्याण हो,'

श्लोक 14 (skanda.8.69.14)

दक्षिणा नियतिर्मृत्युः सन्ध्या विद्युदहः क्षपा । पृथिवी कौशिकी श्रीश्च शर्वाणी शर्ववल्लभा

dakṣiṇā niyatirmṛtyuḥ sandhyā vidyudahaḥ kṣapā | pṛthivī kauśikī śrīśca śarvāṇī śarvavallabhā

'-तुम दक्षिणा, नियति, मृत्यु, संध्या, विद्युत्, दिन, रात्रि, पृथ्वी, कौशिकी, श्री, शर्वाणी, शर्व की प्रिया हो,'

श्लोक 15 (skanda.8.69.15)

गणमाता दितिश्चैव पवित्रा विन्ध्यवासिनी । कृष्णा कात्यायनी गौरी भूतमाता तथेश्वरी

gaṇamātā ditiścaiva pavitrā vindhyavāsinī | kṛṣṇā kātyāyanī gaurī bhūtamātā tatheśvarī

'-तुम गणों की माता, दिति, पवित्र विंध्यवासिनी, कृष्णा, कात्यायनी, गौरी, भूतमाता और ईश्वरी हो।'

श्लोक 16 (skanda.8.69.16)

भव देवि प्रसन्ना मे भक्तस्य प्रणतस्य च । अथ देवी तदा दृष्ट्वा नन्दिनं पादयोर्नतम्

bhava devi prasannā me bhaktasya praṇatasya ca | atha devī tadā dṛṣṭvā nandinaṁ pādayornatam

'हे देवी, मुझ चरणों में झुके भक्त पर प्रसन्न हों।' तब देवी ने अपने चरणों में झुके नंदी को देखकर,

श्लोक 17 (skanda.8.69.17)

प्रोवाच वरदास्मीति स च वव्रे वरं शुभम् । प्रसन्नां नित्यमेव त्वामिच्छामि वरमुत्तमम्

provāca varadāsmīti sa ca vavre varaṁ śubham | prasannāṁ nityameva tvāmicchāmi varamuttamam

कहा - 'मैं वरदाता हूँ'; और उन्होंने यह शुभ वर माँगा - 'मैं यही उत्तम वर चाहता हूँ कि तुम सदा मुझ पर प्रसन्न रहो।'

श्लोक 18 (skanda.8.69.18)

एवमस्त्विति सा प्रोच्य प्रविवेशायतेक्षणा । अग्रतोस्या ययौ नन्दी सोमनन्दी च पृष्ठतः

evamastviti sā procya praviveśāyatekṣaṇā | agratosyā yayau nandī somanandī ca pṛṣṭhataḥ

'ऐसा ही हो' कहकर वह विशाल-नेत्रा देवी अंदर प्रविष्ट हुईं; नंदी उनके आगे-आगे चले, और सोमनंदी पीछे-पीछे।

श्लोक 19 (skanda.8.69.19)

चन्द्रलेखोभयोर्मध्ये ग्रहयोरिव सा बभौ । दूरादेव समालोक्य देवदेवो मुदान्वितः

candralekhobhayormadhye grahayoriva sā babhau | dūrādeva samālokya devadevo mudānvitaḥ

वे दोनों ग्रहों के बीच चंद्ररेखा के समान वे शोभित हुईं; और देवदेव ने दूर से ही उन्हें देखकर, आनंदित होकर,

श्लोक 20 (skanda.8.69.20)

आजगाम महातेजाः संभ्रमोत्फुल्ललोचनः । पपात पादयोर्देवी देवदेवस्य धीमतः

ājagāma mahātejāḥ saṁbhramotphullalocanaḥ | papāta pādayordevī devadevasya dhīmataḥ

-वह महातेजस्वी उत्सुकता से फैली आँखों के साथ आगे आए। देवी उस बुद्धिमान् देवदेव के चरणों में गिर पड़ीं।

श्लोक 21 (skanda.8.69.21)

अथ देवस्तदायातां देवीं गिरिवरात्मजाम् । समुवाच सुरश्रेष्ठः समालोक्य मुहुर्मुहुः

atha devastadāyātāṁ devīṁ girivarātmajām | samuvāca suraśreṣṭhaḥ samālokya muhurmuhuḥ

तब देवश्रेष्ठ भगवान् ने बार-बार देखते हुए, अपने पास आई हुई पर्वतश्रेष्ठ-पुत्री देवी से कहा -

श्लोक 22 (skanda.8.69.22)

दिष्ट्यासि प्रीतवदना दिष्ट्या च सफलं तपः । दिष्ट्या चेदं वरं वर्णं गौरं कनकसप्रभम्

diṣṭyāsi prītavadanā diṣṭyā ca saphalaṁ tapaḥ | diṣṭyā cedaṁ varaṁ varṇaṁ gauraṁ kanakasaprabham

'सौभाग्य से तुम्हारा मुख प्रसन्न है; सौभाग्य से तुम्हारी तपस्या सफल हुई; सौभाग्य से तुम्हें यह उत्तम गौरवर्ण, स्वर्ण-कांति प्राप्त हुई है।'

श्लोक 23 (skanda.8.69.23)

प्रियन्नः सर्वथा देवि परमं यत्त्वमागता । प्रतिज्ञां पूरयित्वेह शार्दूलोयं कुतश्च ते

priyannaḥ sarvathā devi paramaṁ yattvamāgatā | pratijñāṁ pūrayitveha śārdūloyaṁ kutaśca te

'हे देवी, यह हमें सब प्रकार से अत्यंत प्रिय है कि तुमने यहाँ अपना संकल्प पूर्ण करके वापसी की। और यह तुम्हारा सिंह कहाँ से आया?'

श्लोक 24 (skanda.8.69.24)

एवमुक्ता तदा देवी भर्त्रा प्रणयपेशलम् । कथयामास देवाय सर्वञ्चरितमात्मनः

evamuktā tadā devī bhartrā praṇayapeśalam | kathayāmāsa devāya sarvañcaritamātmanaḥ

पति द्वारा प्रेमपूर्वक ऐसा कहे जाने पर, देवी ने तब भगवान् को अपना संपूर्ण वृत्तांत सुनाया।

श्लोक 25 (skanda.8.69.25)

देव्युवाच । प्रागहं यत्त्वया देव कृष्णवर्णेति भाषिता । तदा मन्युपरीताङ्गी गौरवर्णसमीप्सया

devyuvāca | prāgahaṁ yattvayā deva kṛṣṇavarṇeti bhāṣitā | tadā manyuparītāṅgī gauravarṇasamīpsayā

देवी ने कहा - हे देव, जब पहले आपने मुझे 'श्यामवर्णा' कहा था, तब शोक से व्याप्त शरीर वाली, गौरवर्ण पाने की इच्छा से,

श्लोक 26 (skanda.8.69.26)

हिमवच्छिखरं गत्वा तपोहं महदास्थिता । चिन्तयन्ती सदैव त्वामेकपादेन संस्थिता

himavacchikharaṁ gatvā tapohaṁ mahadāsthitā | cintayantī sadaiva tvāmekapādena saṁsthitā

-मैं हिमालय के शिखर पर जाकर महान् तपस्या में स्थित हुई, सदा आपका ही चिंतन करते हुए, एक पैर पर खड़ी रहकर।

श्लोक 27 (skanda.8.69.27)

यस्मिन्निव दिने तत्र तपोहं समुपाश्रिता । तस्मिन्नेवैष शार्दूलः सोमनन्दी ममाग्रतः

yasminniva dine tatra tapohaṁ samupāśritā | tasminnevaiṣa śārdūlaḥ somanandī mamāgrataḥ

जिस दिन मैंने वहाँ वह तपस्या आरंभ की, उसी दिन यह सिंह, सोमनंदी, मेरे सामने,

श्लोक 28 (skanda.8.69.28)

व्यतिष्ठत महादेव भक्त्या परमया युतः । दिव्यं वर्षसहस्रं तत्तपोयुक्ताहमास्थिता

vyatiṣṭhata mahādeva bhaktyā paramayā yutaḥ | divyaṁ varṣasahasraṁ tattapoyuktāhamāsthitā

-हे महादेव, परम भक्तिपूर्वक खड़ा हो गया। मैं एक सहस्र दिव्य वर्षों तक उस तपस्या में लीन रही,

श्लोक 29 (skanda.8.69.29)

तावन्तं कालमेषोपि ममातिष्ठत् समीपतः । स्तब्धलाङ्गूलनेत्रास्यो निराहारो विलोकयन्

tāvantaṁ kālameṣopi mamātiṣṭhat samīpataḥ | stabdhalāṅgūlanetrāsyo nirāhāro vilokayan

और उतने ही समय तक यह भी मेरे पास खड़ा रहा, स्तब्ध पूँछ, नेत्र और मुख वाला, बिना भोजन के, मेरी ओर देखता हुआ।

श्लोक 30 (skanda.8.69.30)

आगतस्तपसश्चान्ते ब्रह्मा मम वरप्रदः । तमहं पूर्वमस्यार्थे वरं संप्रार्थय विभो

āgatastapasaścānte brahmā mama varapradaḥ | tamahaṁ pūrvamasyārthe varaṁ saṁprārthaya vibho

तपस्या के अंत में मेरे वरदाता ब्रह्मा आए; और हे विभो, मैंने पहले इसके लिए ही उनसे वर की प्रार्थना की।

श्लोक 31 (skanda.8.69.31)

तेनायममरो देव जराशोकविवर्जितः । ममैवानुचरः पार्श्वे कृतो योगी च शङ्कर । वर्णं चेदमदरव तवादेशात ९ पितामहः

tenāyamamaro deva jarāśokavivarjitaḥ | mamaivānucaraḥ pārśve kṛto yogī ca śaṅkara | varṇaṁ cedamadarava tavādeśāta 9 pitāmahaḥ

उनके द्वारा, हे देव, यह अमर, जरा-शोक से रहित, मेरा ही अनुचर बनाया गया, मेरे पास स्थित योगी; और, हे शंकर, तुम्हारे ही आदेश से पितामह ने मुझे यह वर्ण प्रदान किया।

श्लोक 32 (skanda.8.69.32)

देवदेव उवाच । परितुष्टोस्मि ते देवि वरं वृणु यथेप्सितम् । मृगेन्द्रोयं गणश्रेष्ठः सोमनन्दी महाबलः

devadeva uvāca | parituṣṭosmi te devi varaṁ vṛṇu yathepsitam | mṛgendroyaṁ gaṇaśreṣṭhaḥ somanandī mahābalaḥ

देवदेव ने कहा - हे देवी, मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूँ; जो इच्छा हो, वर माँगो। यह मृगराज, गणों में श्रेष्ठ, महाबली सोमनंदी,

श्लोक 33 (skanda.8.69.33)

यादृशो मम नन्दीशस्तादृशस्ते भविष्यति । यदन्यद् ब्रूहि तत्सर्वं करिष्यामि तव प्रिये

yādṛśo mama nandīśastādṛśaste bhaviṣyati | yadanyad brūhi tatsarvaṁ kariṣyāmi tava priye

-तुम्हारे लिए वैसा ही होगा जैसा मेरे लिए नंदीश्वर है। हे प्रिये, जो और कुछ चाहती हो, कहो; मैं वह सब करूँगा।

श्लोक 34 (skanda.8.69.34)

देव्युवाच । यस्मिन्देशे महादेव तपश्चरितमुत्तमम् । तं भूयोपि त्वया सार्द्धं द्रष्टुमिच्छामि शङ्कर

devyuvāca | yasmindeśe mahādeva tapaścaritamuttamam | taṁ bhūyopi tvayā sārddhaṁ draṣṭumicchāmi śaṅkara

देवी ने कहा - हे महादेव, जिस स्थान पर मैंने उत्तम तपस्या की, हे शंकर, उसे मैं तुम्हारे साथ फिर से देखना चाहती हूँ।

श्लोक 35 (skanda.8.69.35)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तस्य पार्वत्या प्रोवाच परमेश्वरः । रोचते चारुसर्वाङ्गि गन्तुं तत्र ममाव्यये

sanatkumāra uvāca | evamuktasya pārvatyā provāca parameśvaraḥ | rocate cārusarvāṅgi gantuṁ tatra mamāvyaye

सनत्कुमार ने कहा - पार्वती द्वारा ऐसा कहे जाने पर परमेश्वर ने कहा - 'हे सर्वांगसुंदरी, हे अच्युते, मुझे भी वहाँ जाना अच्छा लगता है।'

श्लोक 36 (skanda.8.69.36)

रम्यं तद्धिमवच्छृङ्ग तप्तं यत्र तपस्त्वया । नन्दिनं स तदाहूय गणपाँश्च सहस्रशः

ramyaṁ taddhimavacchṛṅga taptaṁ yatra tapastvayā | nandinaṁ sa tadāhūya gaṇapā~śca sahasraśaḥ

'हिमालय का वह रमणीय शिखर, जहाँ तुमने तपस्या की थी।' तब नंदी और सहस्रों गणों को बुलाकर,

श्लोक 37 (skanda.8.69.37)

जगाम सहितो देव्या हिमवन्तं महागिरिम् । देवैर्विद्याधरैस्सिद्धैर्गन्धर्वैर्मुनिसत्तमैः

jagāma sahito devyā himavantaṁ mahāgirim | devairvidyādharaissiddhairgandharvairmunisattamaiḥ

वे देवी के साथ महापर्वत हिमवान् को गए, देवताओं, विद्याधरों, सिद्धों, गंधर्वों और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा,

श्लोक 38 (skanda.8.69.38)

वन्द्यमानोसकृद्देवः स्तूयमानश्च सर्वशः । नन्दिनः पृष्ठमारूढः प्रक्रीडितगणेश्वरः

vandyamānosakṛddevaḥ stūyamānaśca sarvaśaḥ | nandinaḥ pṛṣṭhamārūḍhaḥ prakrīḍitagaṇeśvaraḥ

-बार-बार वंदित और सब ओर से स्तुति किए जाते हुए, नंदी की पीठ पर सवार, गणेश्वर के साथ क्रीड़ा करते हुए वे भगवान् चले।

श्लोक 39 (skanda.8.69.39)

हिमवद्गिरिमागम्य तं प्रदेशमुपागमत । स तं शिखरमासाद्य रम्य धातुविभूषितम्

himavadgirimāgamya taṁ pradeśamupāgamata | sa taṁ śikharamāsādya ramya dhātuvibhūṣitam

हिमालय पर्वत पर आकर वे उस स्थान पर पहुँचे; और उस, रमणीय, धातुओं से सुशोभित शिखर पर पहुँचकर,

श्लोक 40 (skanda.8.69.40)

तुतोष परमप्रीतो रेमे च सगणेश्वरः । आगतं तमथो दृष्ट्वा मूर्तिमानचलस्तदा । उपतस्थे महादेवं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः

tutoṣa paramaprīto reme ca sagaṇeśvaraḥ | āgataṁ tamatho dṛṣṭvā mūrtimānacalastadā | upatasthe mahādevaṁ praṇipatya kṛtāñjaliḥ

वे अत्यंत प्रसन्न होकर संतुष्ट हुए और गणेश्वर सहित वहाँ विहार करने लगे। तब उनके आगमन को देखकर स्वयं पर्वत ने मूर्तिमान रूप धारण करके, अंजलि जोड़े हुए, महादेव के समीप जाकर प्रणाम किया।

श्लोक 41 (skanda.8.69.41)

कृत्वा तदर्घकुण्डन्तु तस्मिञ्छिखरसत्तमे । वरदानेन शैलेन्द्रमन्वगृहणात् पिनाकधृक्

kṛtvā tadarghakuṇḍantu tasmiñchikharasattame | varadānena śailendramanvagṛhaṇāt pinākadhṛk

उस श्रेष्ठ शिखर पर अर्घ्य-कुंड बनाकर, पिनाकधारी शिव ने शैलेंद्र को वर देकर अनुगृहीत किया -

श्लोक 42 (skanda.8.69.42)

अमरो जरया त्यक्तः सर्वदुःखविवर्जितः । अभेद्यश्चैव वज्रेण मत्प्रसादाद् भविष्यसि

amaro jarayā tyaktaḥ sarvaduḥkhavivarjitaḥ | abhedyaścaiva vajreṇa matprasādād bhaviṣyasi

'मेरी कृपा से तुम अमर, जरारहित, समस्त दुःखों से मुक्त, तथा वज्र से भी अभेद्य हो जाओगे।'

श्लोक 43 (skanda.8.69.43)

पुण्यस्त्वमचलश्रेष्ठ भविता पापमोचनः । गौरीशिखर इत्येव लोके ख्यातिं गमिष्यसि

puṇyastvamacalaśreṣṭha bhavitā pāpamocanaḥ | gaurīśikhara ityeva loke khyātiṁ gamiṣyasi

'हे श्रेष्ठ पर्वत, तुम पवित्र, पापमोचक बनोगे, और लोक में गौरीशिखर नाम से प्रसिद्ध होगे।'

श्लोक 44 (skanda.8.69.44)

दूरादेव नगश्रेष्ठ दृष्ट्वा त्वामुच्छ्रितं जनाः । सवपापैर्विमोक्ष्यन्ते यास्यन्ति च परां गतिम्

dūrādeva nagaśreṣṭha dṛṣṭvā tvāmucchritaṁ janāḥ | savapāpairvimokṣyante yāsyanti ca parāṁ gatim

'हे श्रेष्ठ पर्वत, जो लोग तुम्हें ऊँचे उठे हुए दूर से भी देखेंगे, वे समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होंगे।'

श्लोक 45 (skanda.8.69.45)

त्रिरात्रमुषितो यस्त्वामभिरुह्य शुचिव्रतः । दृष्ट्वा गौरीमथाभ्यर्च्य ब्राह्मणं तर्पयिष्यति

trirātramuṣito yastvāmabhiruhya śucivrataḥ | dṛṣṭvā gaurīmathābhyarcya brāhmaṇaṁ tarpayiṣyati

'जो कोई शुद्ध व्रत का पालन करते हुए तुम पर चढ़कर तीन रात्रि निवास करेगा, और गौरी का दर्शन-पूजन करके ब्राह्मण को तृप्त करेगा,'

श्लोक 46 (skanda.8.69.46)

नारी वाथ नरो वापि लोकं गौर्याः स यास्यति । यश्चेह त्यक्ष्यते प्राणान्नियमेन समाहितः

nārī vātha naro vāpi lokaṁ gauryāḥ sa yāsyati | yaśceha tyakṣyate prāṇānniyamena samāhitaḥ

'-चाहे स्त्री हो या पुरुष, वह गौरी के लोक को प्राप्त होगा। और जो कोई यहाँ नियमपूर्वक, संयत होकर प्राण त्यागेगा,'

श्लोक 47 (skanda.8.69.47)

स गाणपत्यं संप्राप्य मया सार्धं चरिष्यति । गौर्याश्चात्रैव सान्निध्यं सर्वदा ते भविष्यति

sa gāṇapatyaṁ saṁprāpya mayā sārdhaṁ cariṣyati | gauryāścātraiva sānnidhyaṁ sarvadā te bhaviṣyati

'-वह गणपद प्राप्त करके मेरे साथ विचरण करेगा। और गौरी की सन्निधि सदा यहीं तुम्हारे पास रहेगी।'

श्लोक 48 (skanda.8.69.48)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वा तं नगश्रेष्ठं देवदेवस्त्रिलोचनः । पार्वत्या सहितस्तत्र परिचक्राम सर्वतः

sanatkumāra uvāca | ityuktvā taṁ nagaśreṣṭhaṁ devadevastrilocanaḥ | pārvatyā sahitastatra paricakrāma sarvataḥ

सनत्कुमार ने कहा - उस श्रेष्ठ पर्वत से ऐसा कहकर, त्रिनेत्र देवदेव पार्वती सहित वहाँ चारों ओर विचरण करने लगे।

श्लोक 49 (skanda.8.69.49)

अथापश्यच्छिलां व्यास सौवर्णां मणिभूषिताम् । कथयामास तां देव्यै शिलां पश्येति स प्रभुः

athāpaśyacchilāṁ vyāsa sauvarṇāṁ maṇibhūṣitām | kathayāmāsa tāṁ devyai śilāṁ paśyeti sa prabhuḥ

तब, हे व्यास, उन्होंने एक स्वर्णिम, मणि-भूषित शिला देखी; प्रभु ने देवी को दिखाते हुए कहा - 'इस शिला को देखो।'

श्लोक 50 (skanda.8.69.50)

तमाह देवी देवेशमिह तप्तं मया तपः । प्रियमेवं मम स्थानं सोमनन्दिन एव च

tamāha devī deveśamiha taptaṁ mayā tapaḥ | priyamevaṁ mama sthānaṁ somanandina eva ca

देवी ने देवेश से कहा - 'यहीं मैंने तपस्या की थी; यह स्थान मुझे और सोमनंदी को भी प्रिय है।'

श्लोक 51 (skanda.8.69.51)

अथ तामनुजग्राह शिलां प्रीत्या भवस्तदा । शुचिरस्यां निराहारं त्रिरात्रं यः करिष्यति

atha tāmanujagrāha śilāṁ prītyā bhavastadā | śucirasyāṁ nirāhāraṁ trirātraṁ yaḥ kariṣyati

तब भव ने प्रेमपूर्वक उस शिला को अनुगृहीत किया - 'जो कोई पवित्र होकर इस पर तीन रात्रि निराहार रहेगा,'

श्लोक 52 (skanda.8.69.52)

भवेत्तप्तं तपस्तेन लोकञ्च तव यास्यति । एकपादेन यो मर्त्यस्तिष्ठेदेकमहः शुचिः

bhavettaptaṁ tapastena lokañca tava yāsyati | ekapādena yo martyastiṣṭhedekamahaḥ śuciḥ

'-उसके द्वारा तपस्या पूर्ण हुई मानी जाएगी, और वह तुम्हारे लोक को प्राप्त होगा। जो मर्त्य, पवित्र होकर, एक दिन एक पैर पर खड़ा रहेगा,'

श्लोक 53 (skanda.8.69.53)

तपनाभिमुखो भूत्वा त्वद्भक्तस्त्वत्परायणः । सोपि यास्यति ते लोकं गणपश्च भविष्यति

tapanābhimukho bhūtvā tvadbhaktastvatparāyaṇaḥ | sopi yāsyati te lokaṁ gaṇapaśca bhaviṣyati

'-सूर्य की ओर मुख किए हुए, तुम्हारा भक्त, तुम्हीं में परायण - वह भी तुम्हारे लोक को प्राप्त होगा और गणपति बनेगा।'

श्लोक 54 (skanda.8.69.54)

प्राणान् परित्यजेद्यश्च शिलायामिह दुस्त्यजान् । सोपि तप्ततपा भूत्वा ब्रह्मलोकं गमिष्यति

prāṇān parityajedyaśca śilāyāmiha dustyajān | sopi taptatapā bhūtvā brahmalokaṁ gamiṣyati

'और जो कोई इस शिला पर अपने कठिन त्यागे जाने वाले प्राणों को त्याग देगा, वह भी तपस्या-सिद्ध होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा।'

श्लोक 55 (skanda.8.69.55)

इमञ्च पर्वतोद्देशमास्पदं सोमनन्दिनः । योभिगच्छेदहोरात्रं सोपि नन्दिसमो भवेत्

imañca parvatoddeśamāspadaṁ somanandinaḥ | yobhigacchedahorātraṁ sopi nandisamo bhavet

'और जो कोई सोमनंदी के इस पर्वत-स्थान पर एक दिन-रात के लिए आएगा, वह भी नंदी के समान हो जाएगा।'

श्लोक 56 (skanda.8.69.56)

अथापृच्छत् पुनर्देवः पार्वतीं विचरन प्रभुः । कथमेतानि कुण्डानि बभूवुरिह शैलजै

athāpṛcchat punardevaḥ pārvatīṁ vicarana prabhuḥ | kathametāni kuṇḍāni babhūvuriha śailajai

फिर विचरण करते हुए भगवान् ने पार्वती से पुनः पूछा - 'हे शैलजा, ये कुंड यहाँ कैसे बने?'

श्लोक 57 (skanda.8.69.57)

एवं पृष्टा पुनर्देवी वाक्यमेतज्जगाद ह । यदाहमागता देव तपस्तप्तुमिह प्रभो

evaṁ pṛṣṭā punardevī vākyametajjagāda ha | yadāhamāgatā deva tapastaptumiha prabho

ऐसा पूछे जाने पर देवी ने यह वचन कहा - 'हे प्रभु, जब मैं यहाँ तपस्या करने आई थी,'

श्लोक 58 (skanda.8.69.58)

स्तनयोः प्रस्रुते धारे महत्यौ मे तदासकृत् । एते ताभ्यां कृते कुण्डे सिततोये महाप्लवे

stanayoḥ prasrute dhāre mahatyau me tadāsakṛt | ete tābhyāṁ kṛte kuṇḍe sitatoye mahāplave

'-तब मेरे दोनों स्तनों से निरंतर दो विशाल धाराएँ बहती थीं; उन्हीं से बने ये दो स्वच्छ जल वाले, विशाल कुंड हैं।'

श्लोक 59 (skanda.8.69.59)

तपस्तप्तुमलङ्करानहं त्यक्तवती यदा । तदा तेभ्यः स्रुता देव जलधारापतद् द्रुतम्

tapastaptumalaṅkarānahaṁ tyaktavatī yadā | tadā tebhyaḥ srutā deva jaladhārāpatad drutam

'जब मैंने तपस्या करने के लिए अपने आभूषण त्याग दिए, तब, हे देव, उनसे शीघ्र ही जलधारा बह निकली,'

श्लोक 60 (skanda.8.69.60)

तथा चेदमपां कुण्डं द्वितीयं मे कृतं शुभम् । ब्रह्मणश्च यदा लब्धं गौरवर्णत्वमुत्तमम्र

tathā cedamapāṁ kuṇḍaṁ dvitīyaṁ me kṛtaṁ śubham | brahmaṇaśca yadā labdhaṁ gauravarṇatvamuttamamra

'-और इस प्रकार मेरा यह दूसरा शुभ जल-कुंड बना। और जब मुझे ब्रह्मा से यह उत्तम गौरवर्ण प्राप्त हुआ,'

श्लोक 61 (skanda.8.69.61)

शरीरान्मे तदा देव कृष्णा कोशी विनिष्क्रमत् । तस्यां कोश्यां समुत्पन्नमेतत् कुण्डं तृतीयकम्

śarīrānme tadā deva kṛṣṇā kośī viniṣkramat | tasyāṁ kośyāṁ samutpannametat kuṇḍaṁ tṛtīyakam

'-तब, हे देव, मेरे शरीर से काली कोशी नदी निकल आई; उसी कोशी से यह तीसरा कुंड उत्पन्न हुआ है।'

श्लोक 62 (skanda.8.69.62)

अस्मिन् प्रदेशे देवेश त्वामभ्यर्च्य यथाविधि । हविर्भिर्मन्त्रयुक्ताभिरग्निकार्यं कृतं मया

asmin pradeśe deveśa tvāmabhyarcya yathāvidhi | havirbhirmantrayuktābhiragnikāryaṁ kṛtaṁ mayā

'हे देवेश, इसी स्थान पर आपकी विधिपूर्वक पूजा करके, मंत्रयुक्त आहुतियों से मैंने अग्निकार्य किया।'

श्लोक 63 (skanda.8.69.63)

इमानि पादपस्थानि वल्कलानि समासते । इदं कृष्णाजिनं शुभ्रं स्थापितं तत् पुरा मया

imāni pādapasthāni valkalāni samāsate | idaṁ kṛṣṇājinaṁ śubhraṁ sthāpitaṁ tat purā mayā

'ये वृक्षों पर टँगे वल्कल-वस्त्र, और यह शुभ्र कृष्णाजिन (काला मृगचर्म) - इन्हें मैंने पहले यहाँ रखा था।'

श्लोक 64 (skanda.8.69.64)

अथ श्रुत्वा महादेवः पार्वत्या वचनं प्रभुः । प्रत्युवाच तदा देवीं प्रीत्या परमया युतः

atha śrutvā mahādevaḥ pārvatyā vacanaṁ prabhuḥ | pratyuvāca tadā devīṁ prītyā paramayā yutaḥ

तब पार्वती के वचन सुनकर, महादेव प्रभु ने परम प्रेम से युक्त होकर देवी को उत्तर दिया -

श्लोक 65 (skanda.8.69.65)

स्तनतोयेन यत् पूर्णे तव कुण्डे शशिप्रभे । स्तनकुण्डेति तेनैते यास्येते ख्यातिमुत्तमाम्

stanatoyena yat pūrṇe tava kuṇḍe śaśiprabhe | stanakuṇḍeti tenaite yāsyete khyātimuttamām

'तुम्हारे स्तन-जल से भरे, चंद्रमा के समान कांतिमान वे दोनों कुंड इसी कारण स्तनकुंड नाम से उत्तम प्रसिद्धि पाएँगे।'

श्लोक 66 (skanda.8.69.66)

उपवासी नरो योत्र स्नात्वाभ्यर्च्य च देवताः । तर्पयित्वा पितॄन्सर्वान् ब्राह्मणान्भोजयिष्यति

upavāsī naro yotra snātvābhyarcya ca devatāḥ | tarpayitvā pitṝnsarvān brāhmaṇānbhojayiṣyati

'जो मनुष्य उपवास करके यहाँ स्नान करेगा, देवताओं की पूजा करेगा, समस्त पितरों को तर्पण देकर ब्राह्मणों को भोजन कराएगा -'

श्लोक 67 (skanda.8.69.67)

तद् भवेदक्षयं तस्य गणश्चैव भविष्यति । अलंकारात् स्रुता धारा येयं तव वरानने

tad bhavedakṣayaṁ tasya gaṇaścaiva bhaviṣyati | alaṁkārāt srutā dhārā yeyaṁ tava varānane

'-वह उसके लिए अक्षय हो जाएगा और वह गणपति बनेगा। और, हे वरानने, तुम्हारे आभूषणों से बही यह जो धारा है,'

श्लोक 68 (skanda.8.69.68)

एषालंकारधारेति नाम्ना ख्यातिं गमिष्यति । अस्यां स्नात्वा नरो यस्तु पितॄन्संतर्पयिष्यति

eṣālaṁkāradhāreti nāmnā khyātiṁ gamiṣyati | asyāṁ snātvā naro yastu pitṝnsaṁtarpayiṣyati

'-यह अलंकारधारा नाम से प्रसिद्ध होगी। जो मनुष्य इसमें स्नान करके पितरों को तर्पण देगा,'

श्लोक 69 (skanda.8.69.69)

अक्षयं तद् भवेच्छ्राद्धमश्वमेधञ्च विन्दति । नीलतोयमिदं यत्ते महत् कुण्डं शुभोदकम्

akṣayaṁ tad bhavecchrāddhamaśvamedhañca vindati | nīlatoyamidaṁ yatte mahat kuṇḍaṁ śubhodakam

'-उसका वह श्राद्ध अक्षय होगा, और उसे अश्वमेध का फल मिलेगा। और तुम्हारा यह नीले जल वाला, शुभ जल वाला विशाल कुंड,'

श्लोक 70 (skanda.8.69.70)

नीलकुण्डमिति ख्यातिमेतत् सर्वत्र यास्यति । योस्मिन्नियमवान् स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः

nīlakuṇḍamiti khyātimetat sarvatra yāsyati | yosminniyamavān snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ

'-यह सर्वत्र नीलकुंड नाम से प्रसिद्ध होगा। जो कोई नियमपूर्वक यहाँ स्नान करके पितरों और देवताओं को तर्पण देगा,'

श्लोक 71 (skanda.8.69.71)

तस्याक्षयं भवेत् सर्वं पापेभ्यस्स प्रमुच्यते । मृतश्च स नरो देवि यत्र तत्र यथा तथा

tasyākṣayaṁ bhavet sarvaṁ pāpebhyassa pramucyate | mṛtaśca sa naro devi yatra tatra yathā tathā

'-उसका वह सब अक्षय हो जाएगा और वह पापों से मुक्त हो जाएगा। और, हे देवी, जो मनुष्य कहीं भी, किसी भी प्रकार मरेगा,'

श्लोक 72 (skanda.8.69.72)

कौशिक्या विन्ध्यवासिन्या महागणपतिर्भवेत् । अग्निकार्यमिह स्नात्वा यः कुर्याद् ब्राह्मणः शुचिः

kauśikyā vindhyavāsinyā mahāgaṇapatirbhavet | agnikāryamiha snātvā yaḥ kuryād brāhmaṇaḥ śuciḥ

'-वह कौशिकी विंध्यवासिनी के प्रताप से महागणपति बनेगा। और जो पवित्र ब्राह्मण यहाँ स्नान करके अग्निकार्य करेगा,'

श्लोक 73 (skanda.8.69.73)

अग्निहोत्रं हुतं तेन भवेद् द्वादशवार्षिकम् । एवमुक्त्वा महादेवः प्रोत्थाय मुनिसत्तम

agnihotraṁ hutaṁ tena bhaved dvādaśavārṣikam | evamuktvā mahādevaḥ protthāya munisattama

'-उसकी अग्निहोत्र-आहुति बारह वर्षों के अग्निहोत्र के समान फलदायी होगी।' हे मुनिश्रेष्ठ, ऐसा कहकर महादेव उठ खड़े हुए,

श्लोक 74 (skanda.8.69.74)

गृहीत्वा पादपस्थानि वल्कलानि तदा प्रभुः । नदी भवेति संप्रोच्य चिक्षेप प्रहसन्निव

gṛhītvā pādapasthāni valkalāni tadā prabhuḥ | nadī bhaveti saṁprocya cikṣepa prahasanniva

और वृक्षों पर टँगे वल्कल-वस्त्रों को लेकर, प्रभु ने 'नदी बन जाओ' कहकर, मानो हँसते हुए, उन्हें फेंक दिया।

श्लोक 75 (skanda.8.69.75)

तान्यभूवंस्तदा व्यास नदी स्वच्छजला शुभा । तटजैर्विविधैर्वृक्षैर्हंसचक्राह्वशोभिता

tānyabhūvaṁstadā vyāsa nadī svacchajalā śubhā | taṭajairvividhairvṛkṣairhaṁsacakrāhvaśobhitā

हे व्यास, वे तब एक नदी बन गए, स्वच्छ जल वाली, शुभ, तट के विविध वृक्षों से तथा हंस-चक्रवाकों से सुशोभित।

श्लोक 76 (skanda.8.69.76)

तामुवाच सुरश्रेष्ठः पुण्यतोयां महानदीम् । चीरेभ्यो निस्सृता यस्मात् त्वमत्र सरितां वरा

tāmuvāca suraśreṣṭhaḥ puṇyatoyāṁ mahānadīm | cīrebhyo nissṛtā yasmāt tvamatra saritāṁ varā

देवश्रेष्ठ ने उस पवित्र जल वाली महानदी से कहा - 'चूँकि तुम यहाँ वल्कल-वस्त्रों से उत्पन्न हुई हो, इसलिए हे श्रेष्ठ सरिता,'

श्लोक 77 (skanda.8.69.77)

लोके पुण्यतमा तस्मान्निश्चीरेति भविष्यसि । त्वयि स्नात्वा नरः क्षिप्रं सर्वपापैर्विमुच्यते

loke puṇyatamā tasmānniścīreti bhaviṣyasi | tvayi snātvā naraḥ kṣipraṁ sarvapāpairvimucyate

'-लोक में सबसे पवित्र होगी, और निश्चीरी नाम से प्रसिद्ध होगी। तुझमें स्नान करके मनुष्य शीघ्र समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 78 (skanda.8.69.78)

पितॄन्सन्तर्पयेद्यस्तु श्राद्धं तस्याक्षयं भवेत् । कपिलाञ्चात्र यो दद्याद् ब्राह्मणाय समाहितः

pitṝnsantarpayedyastu śrāddhaṁ tasyākṣayaṁ bhavet | kapilāñcātra yo dadyād brāhmaṇāya samāhitaḥ

'जो कोई यहाँ पितरों को तर्पण देगा, उसका श्राद्ध अक्षय होगा; और जो कोई संयतचित्त होकर यहाँ ब्राह्मण को कपिला गाय दान करेगा,'

श्लोक 79 (skanda.8.69.79)

गोसहस्रफलं तस्य भविष्यति वरानने । अग्रमारुह्य यस्मात्त्वमत्र तप्तवती तपः

gosahasraphalaṁ tasya bhaviṣyati varānane | agramāruhya yasmāttvamatra taptavatī tapaḥ

'-उसे सहस्र गौओं का फल प्राप्त होगा, हे वरानने। और चूँकि तुमने इसके शिखर पर चढ़कर यहाँ तपस्या की,'

श्लोक 80 (skanda.8.69.80)

अग्रारण्यमिति ख्यातिमेतद्यास्यति सर्वतः । महाफलं महापुण्यं सर्वसिद्धिप्रदं शुभम्

agrāraṇyamiti khyātimetadyāsyati sarvataḥ | mahāphalaṁ mahāpuṇyaṁ sarvasiddhipradaṁ śubham

'-यह स्थान सर्वत्र अग्रारण्य नाम से प्रसिद्ध होगा, महाफलदायी, महापुण्य, सर्वसिद्धिप्रद और शुभ।'

श्लोक 81 (skanda.8.69.81)

पञ्चयोजनसंस्थानं गौरीशिखरमुत्तमम् । इहोपोष्य शुचिः स्नात्वा भक्त्या परमया युतः

pañcayojanasaṁsthānaṁ gaurīśikharamuttamam | ihopoṣya śuciḥ snātvā bhaktyā paramayā yutaḥ

'पाँच योजन विस्तार वाला यह उत्तम गौरीशिखर - जो कोई यहाँ उपवास करके, पवित्र होकर स्नान करके, परम भक्तिपूर्वक,'

श्लोक 82 (skanda.8.69.82)

देहभेदं समासाद्य विमानस्थो विराजते । कृष्णाजिनं महापुण्यं सर्वपापहरं तव

dehabhedaṁ samāsādya vimānastho virājate | kṛṣṇājinaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapāpaharaṁ tava

'-देह त्यागते समय विमान पर आरूढ़ होकर सुशोभित होगा। तुम्हारा यह महापुण्य, सर्वपापहारी कृष्णाजिन -'

श्लोक 83 (skanda.8.69.83)

इदं द्रक्ष्यति यो विप्रः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः । यत्फलं नैमिशारण्ये पुष्करेषु च यत्फलम्

idaṁ drakṣyati yo vipraḥ svargastasya na durlabhaḥ | yatphalaṁ naimiśāraṇye puṣkareṣu ca yatphalam

'-जो ब्राह्मण इसका दर्शन करेगा, उसके लिए स्वर्ग दुर्लभ नहीं रहेगा। नैमिषारण्य में जो फल मिलता है, और पुष्कर में जो फल मिलता है,'

श्लोक 84 (skanda.8.69.84)

तदेव लभते देवि दृष्टवा कृष्णाजिनं द्विजः । वत्स्यामि चैव सततं त्वया सार्धमिह प्रिये

tadeva labhate devi dṛṣṭavā kṛṣṇājinaṁ dvijaḥ | vatsyāmi caiva satataṁ tvayā sārdhamiha priye

'-हे देवी, वही फल इस कृष्णाजिन का दर्शन करके द्विज पाता है। और, हे प्रिये, मैं यहाँ सदा तुम्हारे साथ निवास करूँगा।'

श्लोक 85 (skanda.8.69.85)

आवामिह स्थितौ देवि योर्चयिष्यति मानवः । आवयोर्गणपो भूत्वा जगत् सर्वं चरिष्यति

āvāmiha sthitau devi yorcayiṣyati mānavaḥ | āvayorgaṇapo bhūtvā jagat sarvaṁ cariṣyati

'हे देवी, यहाँ स्थित हम दोनों की जो मनुष्य पूजा करेगा, वह हमारा गणपति बनकर संपूर्ण जगत् में विचरण करेगा।'

श्लोक 86 (skanda.8.69.86)

एवं नगेन्द्रं स तदानुगृह्य मुनीन्द्र सार्धं गिरिराजपुत्र्या । देवैस्ससिद्धैरनुगम्यमानः शर्वः पुनर्मन्दरमाजगाम

evaṁ nagendraṁ sa tadānugṛhya munīndra sārdhaṁ girirājaputryā | devaissasiddhairanugamyamānaḥ śarvaḥ punarmandaramājagāma

हे मुनीन्द्र, इस प्रकार पर्वतराज को अनुगृहीत करके, शर्व, गिरिराज-पुत्री सहित, देवताओं और सिद्धों द्वारा अनुगमन किए जाते हुए, पुनः मंदर पर्वत को लौट गए।

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