अम्बिका खण्ड · अध्याय 70
श्रीपर्वत-वरप्रदान
श्लोक 1 (skanda.8.70.1)
व्यास उवाच । स गत्वा मन्दरं भूयो गिरिपुत्र्या सह प्रभुः । यच्चकार महादेवस्तन्मे ब्रूहि महामुने
vyāsa uvāca | sa gatvā mandaraṁ bhūyo giriputryā saha prabhuḥ | yaccakāra mahādevastanme brūhi mahāmune
व्यास ने कहा - पर्वत-पुत्री के साथ पुनः मंदर पर्वत पर जाकर, हे महामुने, महादेव प्रभु ने वहाँ जो किया, वह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.8.70.2)
सनत्कुमार उवाच । मन्दरं गिरिमागत्य पार्वत्या सहितो हरः । रेमे हिरण्मये दिव्ये सर्वरत्नविभूषिते
sanatkumāra uvāca | mandaraṁ girimāgatya pārvatyā sahito haraḥ | reme hiraṇmaye divye sarvaratnavibhūṣite
सनत्कुमार ने कहा - मंदर पर्वत पर आकर, हर, पार्वती सहित, उस स्वर्णिम, दिव्य, सर्वरत्न-विभूषित नगर में विहार करने लगे,
श्लोक 3 (skanda.8.70.3)
चारुसोपानसंकीर्णे चित्रपट्टशिलातले । तस्मिन् पुरवरे श्रेष्ठे मनसा निर्मिते तदा
cārusopānasaṁkīrṇe citrapaṭṭaśilātale | tasmin puravare śreṣṭhe manasā nirmite tadā
-सुंदर सीढ़ियों से भरे, विचित्र शिलाखंडों वाले फर्श से युक्त उस श्रेष्ठतम नगर में, जो उनके मन-मात्र से निर्मित हुआ था,
श्लोक 4 (skanda.8.70.4)
गणेश्वरैर्महायोगैर्नन्दीश्वरपुरोगमैः । सिद्धैर्मुनिवरैश्चैव सेव्यमानो जगत्पतिः
gaṇeśvarairmahāyogairnandīśvarapurogamaiḥ | siddhairmunivaraiścaiva sevyamāno jagatpatiḥ
गणेश्वरों, महायोगियों, नंदीश्वर के नेतृत्व में, सिद्धों और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा सेवित होते हुए, वे जगत्पति,
श्लोक 5 (skanda.8.70.5)
उवास सहितो देव्या वन्द्यमानस्तथैव च । तस्यैवं दीव्यतो व्यास देवदेवस्य धीमतः
uvāsa sahito devyā vandyamānastathaiva ca | tasyaivaṁ dīvyato vyāsa devadevasya dhīmataḥ
देवी सहित वहाँ निवास करने लगे, इसी प्रकार वंदित होते हुए। हे व्यास, उस बुद्धिमान् देवदेव के इस प्रकार क्रीड़ा करते समय,
श्लोक 6 (skanda.8.70.6)
सहस्राक्षः शशाङ्कश्च वायुश्चैव तदा गताः । समागम्य पुरद्वारं दृष्ट्वा ते नन्दिनं स्थितम्
sahasrākṣaḥ śaśāṅkaśca vāyuścaiva tadā gatāḥ | samāgamya puradvāraṁ dṛṣṭvā te nandinaṁ sthitam
इंद्र, चंद्रमा और वायु तब वहाँ गए; नगर-द्वार पर पहुँचकर उन्होंने नंदी को खड़ा देखा,
श्लोक 7 (skanda.8.70.7)
ऊचुः प्राञ्जलयो भूत्वा शङ्करं सं दिदृक्षवः । यथा पश्याम देवेशं नन्दिन् तत्कर्तुमर्हसि
ūcuḥ prāñjalayo bhūtvā śaṅkaraṁ saṁ didṛkṣavaḥ | yathā paśyāma deveśaṁ nandin tatkartumarhasi
और अंजलि जोड़कर, शंकर को देखने की इच्छा से बोले - 'हे नंदी, ऐसा करो कि हम देवेश का दर्शन कर सकें।'
श्लोक 8 (skanda.8.70.8)
अथ नन्दी समागत्य द्वारमूले समास्थितः । शम्भोर्निवेदयामास त्रीन्देवान् तु समागतान्
atha nandī samāgatya dvāramūle samāsthitaḥ | śambhornivedayāmāsa trīndevān tu samāgatān
तब नंदी ने द्वार पर आकर, शंभु को सूचित किया कि तीन देवता आए हैं।
श्लोक 9 (skanda.8.70.9)
विशन्त्विति समाज्ञप्ते देवदेवेन नन्दिनि । विविशुस्ते त्रयो देवाः शङ्करस्यान्तिकं तदा
viśantviti samājñapte devadevena nandini | viviśuste trayo devāḥ śaṅkarasyāntikaṁ tadā
देवदेव द्वारा नंदी को 'उन्हें प्रवेश करने दो' यह आज्ञा दिए जाने पर, वे तीनों देवता शंकर के समीप प्रविष्ट हुए,
श्लोक 10 (skanda.8.70.10)
प्रणम्य सहितास्तस्थुः पश्यन्तो वरदं विभुम् । अथ तान्प्राह लोकेशः शिरोभिः प्रणतान् स्थितान्
praṇamya sahitāstasthuḥ paśyanto varadaṁ vibhum | atha tānprāha lokeśaḥ śirobhiḥ praṇatān sthitān
और प्रणाम करके, वरदाता विभु को निहारते हुए, एकत्र खड़े हो गए। तब लोकेश ने, सिर झुकाए खड़े उन्हें, कहा -
श्लोक 11 (skanda.8.70.11)
का वः कर्तव्यता देवाः किमर्थं यूयमागताः । ब्रूत दास्यामि तत्सर्वं यद्यन्मृगयथामराः
kā vaḥ kartavyatā devāḥ kimarthaṁ yūyamāgatāḥ | brūta dāsyāmi tatsarvaṁ yadyanmṛgayathāmarāḥ
'हे देवो, तुम्हारा क्या प्रयोजन है? किसलिए तुम आए हो? कहो; हे अमरो, जो कुछ तुम चाहते हो, वह सब मैं दूँगा।'
श्लोक 12 (skanda.8.70.12)
अथ देवः सहस्राक्षो वचः प्रोवाच शङ्करम् । हिरण्यकशिपुं हन्तुमसुरेन्द्रं महाबलम्
atha devaḥ sahasrākṣo vacaḥ provāca śaṅkaram | hiraṇyakaśipuṁ hantumasurendraṁ mahābalam
तब सहस्रनेत्र इंद्र ने शंकर से यह वचन कहा - 'महाबली असुरेंद्र हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए,'
श्लोक 13 (skanda.8.70.13)
यच्चकार वपुर्विष्णुर्नारसिंहं भयानकम् । तं हत्वापि स दैत्येन्द्रं विष्णुः परबलार्दनः
yaccakāra vapurviṣṇurnārasiṁhaṁ bhayānakam | taṁ hatvāpi sa daityendraṁ viṣṇuḥ parabalārdanaḥ
'-विष्णु ने भयानक नरसिंह-रूप धारण किया था, और उस दैत्येंद्र को मारकर भी, परबल-मर्दन विष्णु ने,'
श्लोक 14 (skanda.8.70.14)
तद्रूपं नैव सन्त्यज्य स्वं वेषमकरोद् विभो । तेन रूपेण देवेश क्रूरेणापि हितेप्सुना
tadrūpaṁ naiva santyajya svaṁ veṣamakarod vibho | tena rūpeṇa deveśa krūreṇāpi hitepsunā
'-हे विभु, उस रूप को त्यागकर अपना स्वरूप नहीं धारण किया है। और, हे देवेश, हितैषी होते हुए भी उस क्रूर रूप के कारण,'
श्लोक 15 (skanda.8.70.15)
न वयं निर्वृता भूत्वा त्रासात्तिष्ठाम शंकर । स यथा सिंहरूपं तत्परित्यजति माधवः
na vayaṁ nirvṛtā bhūtvā trāsāttiṣṭhāma śaṁkara | sa yathā siṁharūpaṁ tatparityajati mādhavaḥ
'-हम शांतचित्त होकर नहीं रह पाते, हे शंकर, बल्कि भय में खड़े रहते हैं। हे सुरोत्तम, ऐसी कृपा करो,'
श्लोक 16 (skanda.8.70.16)
प्रसादं नस्तथा कर्तुमर्हसि त्वं सुरोत्तम । अथ प्रोवाच तं शक्रं देवदेवः पिनाकधृक्
prasādaṁ nastathā kartumarhasi tvaṁ surottama | atha provāca taṁ śakraṁ devadevaḥ pinākadhṛk
'-कि जिससे माधव वह सिंहरूप त्याग दें।' तब पिनाकधारी देवदेव ने शक्र से कहा -
श्लोक 17 (skanda.8.70.17)
सिंहरूपं यथा शक्र विष्णुस्त्यक्ष्यति भीषणम् । करिष्यामि तथा शक्र व्येतु ते मानसो ज्वरः
siṁharūpaṁ yathā śakra viṣṇustyakṣyati bhīṣaṇam | kariṣyāmi tathā śakra vyetu te mānaso jvaraḥ
'हे शक्र, मैं ऐसा करूँगा कि विष्णु उस भयंकर सिंहरूप को त्याग देंगे; तुम्हारा मानसिक संताप दूर हो जाए।'
श्लोक 18 (skanda.8.70.18)
अथ वायुस्तदा देवं व्यज्ञापयत शंकरम् । अशरीरो यथा न स्यां तथा मे कर्तुमर्हसि
atha vāyustadā devaṁ vyajñāpayata śaṁkaram | aśarīro yathā na syāṁ tathā me kartumarhasi
तब वायु ने भगवान् शंकर से निवेदन किया - 'ऐसी कृपा करो कि मैं अशरीर न रहूँ।'
श्लोक 19 (skanda.8.70.19)
श्रुत्वा पवनविज्ञप्तिं देवस्तस्मै त्रिलोचनः । शरीरं सुमहत् प्रादाद्येनासौ मूर्तिमानभूत्
śrutvā pavanavijñaptiṁ devastasmai trilocanaḥ | śarīraṁ sumahat prādādyenāsau mūrtimānabhūt
वायु की प्रार्थना सुनकर, त्रिनेत्र देव ने उसे एक विशाल शरीर प्रदान किया, जिससे वह मूर्तिमान् हो गया।
श्लोक 20 (skanda.8.70.20)
विज्ञापितं शशाङ्केन ततो व्यास महात्मना । दक्षेणाहं पुरा शप्तो यक्ष्मदेहो भविष्यसि
vijñāpitaṁ śaśāṅkena tato vyāsa mahātmanā | dakṣeṇāhaṁ purā śapto yakṣmadeho bhaviṣyasi
फिर, हे व्यास, महात्मा चंद्रमा ने निवेदन किया - 'मुझे पहले दक्ष ने शाप दिया था - "तुम्हारा शरीर यक्ष्मा-ग्रस्त हो जाएगा।"'
श्लोक 21 (skanda.8.70.21)
स यथा यक्ष्महीनः स्यां प्रसादं मे तथा कुरु । विज्ञप्तिं शशिनः श्रुत्वा देवस्तस्मै वचः प्रभुः
sa yathā yakṣmahīnaḥ syāṁ prasādaṁ me tathā kuru | vijñaptiṁ śaśinaḥ śrutvā devastasmai vacaḥ prabhuḥ
'ऐसी कृपा करो कि मैं यक्ष्मा से मुक्त हो जाऊँ।' चंद्रमा की प्रार्थना सुनकर, प्रभु देव ने उससे यह वचन कहा -
श्लोक 22 (skanda.8.70.22)
इदं प्राह महातेजाः शशिने प्रणताय तु । तपः कृत्वा प्रभासे त्वं यक्ष्यहीनो भविष्यसि
idaṁ prāha mahātejāḥ śaśine praṇatāya tu | tapaḥ kṛtvā prabhāse tvaṁ yakṣyahīno bhaviṣyasi
उस महातेजस्वी ने नतमस्तक चंद्रमा से यह कहा - 'प्रभास तीर्थ में तपस्या करके तुम यक्ष्मा से मुक्त हो जाओगे।'
श्लोक 23 (skanda.8.70.23)
इति लब्ध्वा वरं सर्वे त्रयोपि सुरसत्तमाः । वायुसोमसहस्राक्षाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे
iti labdhvā varaṁ sarve trayopi surasattamāḥ | vāyusomasahasrākṣāḥ svāni veśmāni bhejire
इस प्रकार वर पाकर वे तीनों श्रेष्ठ देवता - वायु, सोम और इंद्र - अपने-अपने धामों को लौट गए।
श्लोक 24 (skanda.8.70.24)
व्यास उवाच । भगवन्स कथं तेन नरसिंहेन सूदितः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यः किंप्रभावश्च सोभवत् । किं वीर्यं किं तपश्चास्य शंसैतत् पृच्छतो मम
vyāsa uvāca | bhagavansa kathaṁ tena narasiṁhena sūditaḥ | hiraṇyakaśipurdaityaḥ kiṁprabhāvaśca sobhavat | kiṁ vīryaṁ kiṁ tapaścāsya śaṁsaitat pṛcchato mama
व्यास ने कहा - हे भगवन्, वह दैत्य हिरण्यकशिपु नरसिंह द्वारा किस प्रकार मारा गया? उसका प्रभाव, पराक्रम और तपस्या कैसी थी? यह मुझे बताइए, जो पूछ रहा हूँ।
श्लोक 25 (skanda.8.70.25)
सनत्कुमार उवाच । दितिर्नामाभवत् पत्नी कश्यपस्य प्रजापतेः । दक्षस्य दुहिता व्यास सा जज्ञे तनयद्वयम्
sanatkumāra uvāca | ditirnāmābhavat patnī kaśyapasya prajāpateḥ | dakṣasya duhitā vyāsa sā jajñe tanayadvayam
सनत्कुमार ने कहा - प्रजापति कश्यप की एक पत्नी थीं जिनका नाम दिति था, जो दक्ष की पुत्री थीं; हे व्यास, उन्होंने दो पुत्रों को जन्म दिया,
श्लोक 26 (skanda.8.70.26)
हिरण्यकशिपुं ज्येष्ठं हिरण्याक्षं कनीयसम् । अभिषिक्तः स दैत्यानां राजाभूद् ब्रह्मणा पुरा
hiraṇyakaśipuṁ jyeṣṭhaṁ hiraṇyākṣaṁ kanīyasam | abhiṣiktaḥ sa daityānāṁ rājābhūd brahmaṇā purā
बड़े हिरण्यकशिपु और छोटे हिरण्याक्ष। वह हिरण्यकशिपु प्राचीन काल में ब्रह्मा द्वारा अभिषिक्त होकर दैत्यों का राजा बना।
श्लोक 27 (skanda.8.70.27)
दानवानामथेन्द्रत्वे विप्रचित्तिर्महाबलः । सहस्राक्षश्च देवानामेतदिन्द्रत्रयं बभौ
dānavānāmathendratve vipracittirmahābalaḥ | sahasrākṣaśca devānāmetadindratrayaṁ babhau
दानवों की इंद्रता में महाबली विप्रचित्ति थे, और देवताओं की इंद्रता में सहस्राक्ष इंद्र; इस प्रकार यह तीनों की इंद्रता शोभित हुई।
श्लोक 28 (skanda.8.70.28)
अथ तेषां तदा व्यास त्रैलोक्यं संप्रशासताम् । हिरण्यकशिपुर्दैत्यः शक्रराज्यजिहीर्षया
atha teṣāṁ tadā vyāsa trailokyaṁ saṁpraśāsatām | hiraṇyakaśipurdaityaḥ śakrarājyajihīrṣayā
तब, हे व्यास, जब वे इस प्रकार त्रैलोक्य का शासन कर रहे थे, दैत्य हिरण्यकशिपु ने इंद्र का राज्य छीनने की इच्छा से,
श्लोक 29 (skanda.8.70.29)
त्रैलोक्यमात्मसात् कर्तुं मतिं तपसि सन्दधे । स गत्वा दक्षिणामाशां श्रीपर्वतसमास्थितः
trailokyamātmasāt kartuṁ matiṁ tapasi sandadhe | sa gatvā dakṣiṇāmāśāṁ śrīparvatasamāsthitaḥ
-और त्रैलोक्य को अपने अधीन करने की इच्छा से तपस्या का संकल्प लिया। वह दक्षिण दिशा में जाकर श्रीपर्वत पर स्थित हो गया।
श्लोक 30 (skanda.8.70.30)
तपस्तीव्रं महत्तेपे दैत्यराजो महाबलः । स्वरक्तेन जुहावाग्नौ संमिश्राः समिधश्चरून्
tapastīvraṁ mahattepe daityarājo mahābalaḥ | svaraktena juhāvāgnau saṁmiśrāḥ samidhaścarūn
उस महाबली दैत्यराज ने तीव्र, महान् तपस्या की; उसने अपने ही रक्त से मिश्रित समिधाएँ और चरु अग्नि में हवन कीं,
श्लोक 31 (skanda.8.70.31)
ऊर्ध्वबाहुनिरालम्बो दिवा सूर्यार्पितेक्षणः । एकपादोनिमेषश्च सोतिष्ठत् कृतनिश्चयः
ūrdhvabāhunirālambo divā sūryārpitekṣaṇaḥ | ekapādonimeṣaśca sotiṣṭhat kṛtaniścayaḥ
-और भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना किसी सहारे के, दिन में सूर्य पर नेत्र टिकाए, एक पैर पर, बिना पलक झपकाए, दृढ़ निश्चय से खड़ा रहा।
श्लोक 32 (skanda.8.70.32)
द्वे सहस्रे तदाब्दानां दिव्यानां स्थितवान्बली । महता तपसा तस्य त्रैलोक्यं संप्रचुक्षुभे
dve sahasre tadābdānāṁ divyānāṁ sthitavānbalī | mahatā tapasā tasya trailokyaṁ saṁpracukṣubhe
वह बलवान् दो सहस्र दिव्य वर्षों तक इसी प्रकार खड़ा रहा; उसकी महान् तपस्या से त्रैलोक्य क्षुब्ध हो उठा।
श्लोक 33 (skanda.8.70.33)
अथाभ्येत्य सुरश्रेष्ठो ब्रह्मा कमलवाहनः । इष्टं वृणु वरं राजन्निति प्रोवाच सादरम्
athābhyetya suraśreṣṭho brahmā kamalavāhanaḥ | iṣṭaṁ vṛṇu varaṁ rājanniti provāca sādaram
तब कमल पर विराजने वाले, देवश्रेष्ठ ब्रह्मा ने आकर आदरपूर्वक कहा - 'हे राजन्, अपना इच्छित वर माँगो।'
श्लोक 34 (skanda.8.70.34)
तं दृष्टत्वा दैत्यराजस्तु ब्रह्माणं वरदं प्रभुम् । वरं प्रार्थितवान् व्यास शृणु यादृशमीप्सितम
taṁ dṛṣṭatvā daityarājastu brahmāṇaṁ varadaṁ prabhum | varaṁ prārthitavān vyāsa śṛṇu yādṛśamīpsitama
उस वरदाता प्रभु ब्रह्मा को देखकर, दैत्यराज ने वर माँगा; हे व्यास, सुनो कि उसने क्या चाहा।
श्लोक 35 (skanda.8.70.35)
भगवन्यदि तुष्टोसि वर एषोस्तु मे विभो । अमरः स्यामवध्यश्च जराहीनो महाबलः
bhagavanyadi tuṣṭosi vara eṣostu me vibho | amaraḥ syāmavadhyaśca jarāhīno mahābalaḥ
'हे भगवन्, यदि आप प्रसन्न हैं, तो हे विभो, मेरा यह वर हो - मैं अमर, अवध्य, जरारहित, महाबली बनूँ,'
श्लोक 36 (skanda.8.70.36)
न शस्त्रेण नचास्त्रेण न रात्रौ न दिवा तथा । नैवार्द्रेण न शुष्केण न पुंसा न च योषिता
na śastreṇa nacāstreṇa na rātrau na divā tathā | naivārdreṇa na śuṣkeṇa na puṁsā na ca yoṣitā
'-न शस्त्र से, न अस्त्र से, न रात्रि में, न दिन में, न गीली वस्तु से, न सूखी वस्तु से, न पुरुष से, न स्त्री से मारा जाऊँ।'
श्लोक 37 (skanda.8.70.37)
अब्रवीत् सोन्तरं व्रह्मा स चैनं समभाषत । अतश्च योन्यथा मृत्युर्भविष्यति स मे प्रभो
abravīt sontaraṁ vrahmā sa cainaṁ samabhāṣata | ataśca yonyathā mṛtyurbhaviṣyati sa me prabho
ब्रह्मा ने इसमें एक अपवाद बताया; और उसने (हिरण्यकशिपु ने) उनसे कहा - 'हे प्रभु, और इसके अतिरिक्त जैसे भी हो, मेरी मृत्यु अन्यथा ही हो,'
श्लोक 38 (skanda.8.70.38)
एवमस्त्विति तं प्रोच्य ब्रह्मा सुरवरोत्तमः । जगामात्मपुरं क्षिप्रं शान्तः प्रीतः पितामहः
evamastviti taṁ procya brahmā suravarottamaḥ | jagāmātmapuraṁ kṣipraṁ śāntaḥ prītaḥ pitāmahaḥ
उससे 'ऐसा ही हो' कहकर, देवश्रेष्ठों में उत्तम ब्रह्मा, शांत और प्रसन्न पितामह, शीघ्र अपने नगर को चले गए।
श्लोक 39 (skanda.8.70.39)
सोपि सर्वासुरश्रेष्ठो हिरण्यकशिपुस्तदा । जित्वा शक्रं स्वयं राज्यं चकार दितिनन्दनः
sopi sarvāsuraśreṣṭho hiraṇyakaśipustadā | jitvā śakraṁ svayaṁ rājyaṁ cakāra ditinandanaḥ
तब वह हिरण्यकशिपु भी, समस्त असुरों में श्रेष्ठ, दिति-पुत्र, इंद्र को जीतकर स्वयं राजा बन गया,
श्लोक 40 (skanda.8.70.40)
त्रैलोक्यमात्मसात् कृत्वा जित्वा सर्वान्दिवौकसः । आत्मनैवाभवच्छक्रः स्वयं वायुः स्वयं यमः । धनेशो वरुणो वह्निस्सर्व एवाभवत् स्वयम्
trailokyamātmasāt kṛtvā jitvā sarvāndivaukasaḥ | ātmanaivābhavacchakraḥ svayaṁ vāyuḥ svayaṁ yamaḥ | dhaneśo varuṇo vahnissarva evābhavat svayam
और त्रैलोक्य को अपने अधीन करके, समस्त स्वर्गवासियों को जीतकर, वह स्वयं इंद्र बन गया, स्वयं वायु, स्वयं यम, स्वयं कुबेर, वरुण, अग्नि - वह स्वयं ही सब कुछ बन गया।
श्लोक 41 (skanda.8.70.41)
प्रणमध्वं यजध्वं मां ब्रह्माहं सपुरन्दरः । इति प्राह ऋषीन्सर्वान्सिद्धान्विप्रांश्च सोसुरः
praṇamadhvaṁ yajadhvaṁ māṁ brahmāhaṁ sapurandaraḥ | iti prāha ṛṣīnsarvānsiddhānviprāṁśca sosuraḥ
उस असुर ने समस्त ऋषियों, सिद्धों और ब्राह्मणों से कहा - 'मुझे नमस्कार करो, मेरी पूजा करो; मैं ब्रह्मा हूँ, मैं ही इंद्र भी हूँ।'
श्लोक 42 (skanda.8.70.42)
व्यास उवाच । श्रीपर्वत इति प्रोक्तो यस्त्वया मुनिसत्तम । कथं श्रीपर्वतोसौ वै किं पुण्यं तत्र किं फलम्
vyāsa uvāca | śrīparvata iti prokto yastvayā munisattama | kathaṁ śrīparvatosau vai kiṁ puṇyaṁ tatra kiṁ phalam
व्यास ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ, जिसे आपने श्रीपर्वत कहा है, वह कैसे श्रीपर्वत हुआ, वहाँ क्या पुण्य है और क्या फल है?
श्लोक 43 (skanda.8.70.43)
सनत्कुमार उवाच । हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां पृच्छसि सुव्रत । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो यत्र तेपे महत्तपः
sanatkumāra uvāca | hanta te kathayiṣyāmi yanmāṁ pṛcchasi suvrata | hiraṇyakaśipurdaityo yatra tepe mahattapaḥ
सनत्कुमार ने कहा - अच्छा, हे सुव्रत, तुम जो पूछते हो वह मैं बताता हूँ। जहाँ दैत्य हिरण्यकशिपु ने महान् तपस्या की,
श्लोक 44 (skanda.8.70.44)
गिरौ तस्मिन्महापुण्ये देवदेवो बृषध्वजः । उमया सहितो देव्या रेमे नित्यं महाद्युतिः
girau tasminmahāpuṇye devadevo bṛṣadhvajaḥ | umayā sahito devyā reme nityaṁ mahādyutiḥ
-उसी महापुण्य पर्वत पर, वृषभध्वज देवदेव, महातेजस्वी, देवी उमा सहित नित्य विहार करते थे।
श्लोक 45 (skanda.8.70.45)
तिष्ठतस्तत्र देवस्य देवी गिरिवरात्मजा । तपःसिद्धान् महायोगान् ज्वलनादित्यवर्च्चसः
tiṣṭhatastatra devasya devī girivarātmajā | tapaḥsiddhān mahāyogān jvalanādityavarccasaḥ
वहाँ स्थित उस देव के साथ, गिरिवर-पुत्री देवी ने, तप से सिद्ध, अग्नि-सूर्य के समान तेजस्वी महायोगियों को,
श्लोक 46 (skanda.8.70.46)
कृत्वा प्रदक्षिणां शम्भोस्सप्रणामं महामुने । गच्छतस्तान्मुहुर्दृष्ट्वा पप्रच्छ भुवनेश्वरम्
kṛtvā pradakṣiṇāṁ śambhossapraṇāmaṁ mahāmune | gacchatastānmuhurdṛṣṭvā papraccha bhuvaneśvaram
-हे महामुने, शंभु की परिक्रमा करके, प्रणाम करके, और फिर जाते हुए, बार-बार देखकर, भुवनेश्वर से पूछा -
श्लोक 47 (skanda.8.70.47)
क एते देव संसिद्धा योगीशास्त्वां प्रणेमिरे । ततो देवः प्रहस्यैनामुवाच परमेश्वरः
ka ete deva saṁsiddhā yogīśāstvāṁ praṇemire | tato devaḥ prahasyaināmuvāca parameśvaraḥ
'हे देव, ये सिद्ध योगीश्वर कौन हैं जिन्होंने आपको प्रणाम किया?' तब परमेश्वर ने मुस्कुराते हुए उससे कहा -
श्लोक 48 (skanda.8.70.48)
योगसिद्धा महात्मानो योगे पाशुपते स्थिताः । य इहाराध्य मां देवि जहुः प्राणान्नरोत्तमाः
yogasiddhā mahātmāno yoge pāśupate sthitāḥ | ya ihārādhya māṁ devi jahuḥ prāṇānnarottamāḥ
'ये महात्मा, योग में सिद्ध, पाशुपत योग में स्थित - हे देवी, ये श्रेष्ठ पुरुष, जिन्होंने यहाँ मेरी आराधना करके प्राण त्याग दिए,'
श्लोक 49 (skanda.8.70.49)
त एते सिद्धदेहार्थाः स्वछन्दगतिचारिणः । मोक्षसिद्धेः परां निष्ठां गन्तारः परमं पदम्
ta ete siddhadehārthāḥ svachandagaticāriṇaḥ | mokṣasiddheḥ parāṁ niṣṭhāṁ gantāraḥ paramaṁ padam
'-ये वे हैं जिनके शरीर सिद्धि को प्राप्त हैं, जो स्वच्छंद गति से विचरण करते हैं; वे मोक्ष-सिद्धि की परम निष्ठा, परम पद को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 50 (skanda.8.70.50)
अथ सञ्चिन्त्य सुचिरं विस्मयायतलोचना । देवं प्रोवाच शर्वाणी वचः परमपूजितम्
atha sañcintya suciraṁ vismayāyatalocanā | devaṁ provāca śarvāṇī vacaḥ paramapūjitam
तब बहुत देर तक विचार करके, विस्मय से फैले नेत्रों वाली शर्वाणी ने देव से यह परम पूज्य वचन कहा -
श्लोक 51 (skanda.8.70.51)
यथाहमपि देवेश प्राप्नुयां सिद्धिमीदृशीम् । करिष्यामि तथा यत्नमेषा चास्मि गता विभो
yathāhamapi deveśa prāpnuyāṁ siddhimīdṛśīm | kariṣyāmi tathā yatnameṣā cāsmi gatā vibho
'हे देवेश, जिससे मैं भी ऐसी सिद्धि प्राप्त करूँ - मैं वैसा ही प्रयत्न करूँगी; हे विभु, मैं इसके लिए दृढ़-निश्चय हूँ।'
श्लोक 52 (skanda.8.70.52)
ततः कृत्वा श्रियो रूपं देवी परमशोभना । महत्तत्र तपस्तेपे सहस्रं परिवत्सरान्
tataḥ kṛtvā śriyo rūpaṁ devī paramaśobhanā | mahattatra tapastepe sahasraṁ parivatsarān
तब उस परम सुंदर देवी ने श्री का रूप धारण करके, वहाँ एक सहस्र वर्षों तक महान् तपस्या की।
श्लोक 53 (skanda.8.70.53)
देवश्चास्या वरं प्रादात्तैः समानं महाद्युतिः । कृत्स्नस्याध्यात्मतन्त्रस्य मया प्रोक्तस्य भामिनि
devaścāsyā varaṁ prādāttaiḥ samānaṁ mahādyutiḥ | kṛtsnasyādhyātmatantrasya mayā proktasya bhāmini
और उस महातेजस्वी देव ने उसे उनके समान वर दिया - 'हे भामिनी, मेरे द्वारा कहे गए संपूर्ण अध्यात्म-तंत्र के,'
श्लोक 54 (skanda.8.70.54)
महायोगेश्वरी सिद्धा परार्थज्ञा भविष्यसि । अयञ्च पर्वतः श्रीमान्नाम्ना तव भविष्यति
mahāyogeśvarī siddhā parārthajñā bhaviṣyasi | ayañca parvataḥ śrīmānnāmnā tava bhaviṣyati
'-तुम महायोगेश्वरी, सिद्धा, परम-अर्थ-ज्ञाता बनोगी। और यह श्रीमान् पर्वत तुम्हारे नाम से -'
श्लोक 55 (skanda.8.70.55)
श्रीपर्वत इति ख्यातश्चित्ररूपविभूषितः । समन्ताद्योजनशतं महापुण्यो भविष्यति
śrīparvata iti khyātaścitrarūpavibhūṣitaḥ | samantādyojanaśataṁ mahāpuṇyo bhaviṣyati
'-श्रीपर्वत नाम से प्रसिद्ध होगा; विचित्र रूपों से सुशोभित, सब ओर सौ योजन तक फैला हुआ, यह महापुण्य स्थान होगा।'
श्लोक 56 (skanda.8.70.56)
इहागम्य च यो देवि त्वां मां च गिरिनन्दने । शुचिः स्नात्वार्चयेन्मर्त्त्यः स लोकं मम यास्यति
ihāgamya ca yo devi tvāṁ māṁ ca girinandane | śuciḥ snātvārcayenmarttyaḥ sa lokaṁ mama yāsyati
'और, हे गिरिनंदिनी देवी, जो मर्त्य यहाँ आकर, पवित्र होकर स्नान करके, तुम्हारी और मेरी पूजा करेगा, वह मेरे लोक को प्राप्त होगा।'
श्लोक 57 (skanda.8.70.57)
यस्त्विह त्यक्ष्यते प्राणाञ्छ्रीगिरावचलोत्तमे । त्रिनेत्रः कामगो भूत्वा गाणपत्यमवाप्नुयात्
yastviha tyakṣyate prāṇāñchrīgirāvacalottame | trinetraḥ kāmago bhūtvā gāṇapatyamavāpnuyāt
'और जो कोई यहाँ श्रीगिरि पर्वत पर, इस श्रेष्ठ अचल पर, प्राण त्यागेगा, वह त्रिनेत्र और स्वेच्छागामी होकर गणपद को प्राप्त होगा।'
श्लोक 58 (skanda.8.70.58)
इहागत्य च ये शैलं करिष्यन्ति प्रदक्षिणम् । शर्वायतनसंयुक्तं भविष्यन्ति च ते गणाः
ihāgatya ca ye śailaṁ kariṣyanti pradakṣiṇam | śarvāyatanasaṁyuktaṁ bhaviṣyanti ca te gaṇāḥ
'और जो कोई यहाँ आकर इस शैल की परिक्रमा करेगा, शर्व के धाम से युक्त होकर, वे गण बन जाएँगे।'
श्लोक 59 (skanda.8.70.59)
अतिशयरमणीये सिद्धसंघैरुपेते । सुरभिकुसुमचित्रे श्रीगिरौ ये पुमांसः । व्यपगतमलदोषा मां प्रपश्यन्ति शुद्धा । वियति विहगयुक्तैस्ते विमानैः प्रयान्ति
atiśayaramaṇīye siddhasaṁghairupete | surabhikusumacitre śrīgirau ye pumāṁsaḥ | vyapagatamaladoṣā māṁ prapaśyanti śuddhā | viyati vihagayuktaiste vimānaiḥ prayānti
'श्रीगिरि पर, जो अत्यंत रमणीय, सिद्ध-समूहों से युक्त, सुगंधित पुष्पों से विचित्र है, जो पुरुष मल-दोष से मुक्त, शुद्ध होकर मेरा दर्शन करते हैं, वे पक्षी-युक्त विमानों पर आकाश में विचरण करते हैं।'