अम्बिका खण्ड · अध्याय 71
हिरण्यकशिपु-वध और शरभावतार द्वारा नरसिंह-मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.8.71.1)
सनत्कुमार उवाच । शासतस्तस्य दैत्यस्य हिरण्यकशिपोस्तदा । अगात् कालो महान् व्यास त्रैलोक्यं सचराचरम्
sanatkumāra uvāca | śāsatastasya daityasya hiraṇyakaśipostadā | agāt kālo mahān vyāsa trailokyaṁ sacarācaram
सनत्कुमार ने कहा - उस दैत्य हिरण्यकशिपु के शासन करते हुए, हे व्यास, त्रैलोक्य पर, चराचर सहित, दीर्घ काल बीत गया।
श्लोक 2 (skanda.8.71.2)
दर्पेण महताविष्टः श्रीमदोद्वृत्तचेतनः । अवमेने सुरान्सर्वान् न च धर्ममवैक्षत
darpeṇa mahatāviṣṭaḥ śrīmadodvṛttacetanaḥ | avamene surānsarvān na ca dharmamavaikṣata
अत्यंत गर्व से आविष्ट, ऐश्वर्य के मद से भ्रष्ट-चित्त होकर, उसने समस्त देवताओं का अपमान किया और धर्म की परवाह नहीं की।
श्लोक 3 (skanda.8.71.3)
स देवान् सहितान् सर्वाञ्छक्राद्यान् क्रोधमूर्च्छितः । चालितानपि राज्ये स्वे कृच्छ्रमापादयद् भृशम्
sa devān sahitān sarvāñchakrādyān krodhamūrcchitaḥ | cālitānapi rājye sve kṛcchramāpādayad bhṛśam
क्रोध से मूर्च्छित होकर, उसने इंद्र आदि समस्त देवताओं को उनके अपने राज्य से भी हटाकर, उन्हें अत्यंत कष्ट में डाल दिया।
श्लोक 4 (skanda.8.71.4)
सन्ताप्यमानास्ते सर्वे ब्रह्माणं शरणं ययुः । भगवन् भूतभव्येश पितामह महाद्युते
santāpyamānāste sarve brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ | bhagavan bhūtabhavyeśa pitāmaha mahādyute
अत्यंत संतप्त होकर वे सब ब्रह्मा की शरण में गए - 'हे भगवन्, भूत-भविष्य के स्वामी, हे पितामह, हे महातेजस्वी,'
श्लोक 5 (skanda.8.71.5)
हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्त्वत्तो लब्धवरोनघ । त्रैलोक्यं कृत्स्नमाक्रम्य राज्यं नो हृतवान्दिवः
hiraṇyakaśipurdaityastvatto labdhavaronagha | trailokyaṁ kṛtsnamākramya rājyaṁ no hṛtavāndivaḥ
'-हे निष्पाप, दैत्य हिरण्यकशिपु ने आपसे वर पाकर संपूर्ण त्रैलोक्य पर आक्रमण करके हमारा स्वर्ग-राज्य छीन लिया है।'
श्लोक 6 (skanda.8.71.6)
अनिशं चावमानन्नः प्रयुंक्ते वैरयातनम् । तेन विद्रावितास्सर्वे शरणं वयमागताः
aniśaṁ cāvamānannaḥ prayuṁkte vairayātanam | tena vidrāvitāssarve śaraṇaṁ vayamāgatāḥ
'वह हमारा निरंतर अपमान करता है और वैर की यातना देता है; उसके द्वारा खदेड़े गए हम सब शरण में आए हैं।'
श्लोक 7 (skanda.8.71.7)
प्रसादं कुरु देवेश स न स्यान्नो यथा रिपुः । त्यक्तधर्मा जगच्छत्रुर्हिरण्यकशिपुर्बली
prasādaṁ kuru deveśa sa na syānno yathā ripuḥ | tyaktadharmā jagacchatrurhiraṇyakaśipurbalī
'हे देवेश, कृपा करो कि वह धर्मत्यागी, जगत्-शत्रु, बलवान् हिरण्यकशिपु हमारा शत्रु न रहे।'
श्लोक 8 (skanda.8.71.8)
एवं प्रोक्तस्तदा देवैर्देवः कमलवाहनः । प्रोवाचेदं महाप्रज्ञ देवानां प्रियकृद्वचः
evaṁ proktastadā devairdevaḥ kamalavāhanaḥ | provācedaṁ mahāprajña devānāṁ priyakṛdvacaḥ
देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर, कमल पर विराजने वाले महाप्राज्ञ देव ने देवताओं को प्रिय लगने वाला यह वचन कहा -
श्लोक 9 (skanda.8.71.9)
क्षीणं तद् दैत्यराजस्य तपस्तस्य दुरात्मनः । कृच्छ्रं गमितवान् यो वो राज्यञ्च हृतवान् रिपुः
kṣīṇaṁ tad daityarājasya tapastasya durātmanaḥ | kṛcchraṁ gamitavān yo vo rājyañca hṛtavān ripuḥ
'उस दुरात्मा दैत्यराज का तप, जिसने तुम्हें कष्ट में डाला और शत्रु बनकर तुम्हारा राज्य छीन लिया, अब क्षीण हो चुका है।'
श्लोक 10 (skanda.8.71.10)
तेनाहं प्रार्थितः पूर्वं सर्वावध्यत्वमुत्तमम् । अन्तरं भाषितश्चासौ मया संज्ञाविमोहितः
tenāhaṁ prārthitaḥ pūrvaṁ sarvāvadhyatvamuttamam | antaraṁ bhāṣitaścāsau mayā saṁjñāvimohitaḥ
'उसने पहले मुझसे सबसे अवध्यत्व का उत्तम वर माँगा; और मेरे द्वारा उसे, संज्ञा-विमोहित होकर, एक अपवाद भी बताया गया था।'
श्लोक 11 (skanda.8.71.11)
यदैवान्तरमाहाथ दैत्यराजो विचेतनः । तदैव मनसा तोषमहमागां महाबलाः
yadaivāntaramāhātha daityarājo vicetanaḥ | tadaiva manasā toṣamahamāgāṁ mahābalāḥ
'हे महाबलियो, ज्योंही उस अविवेकी दैत्यराज ने वह अपवाद बताया, त्योंही मुझे मन में संतोष हुआ।'
श्लोक 12 (skanda.8.71.12)
ते यूयमद्य गच्छध्वं विष्णोर्भवनमुत्तमम् । तं ब्रूत सहितास्सर्वे तस्य नाशार्थमच्युतम्
te yūyamadya gacchadhvaṁ viṣṇorbhavanamuttamam | taṁ brūta sahitāssarve tasya nāśārthamacyutam
'सो अब तुम सब मिलकर विष्णु के उत्तम भवन में जाओ, और उस अच्युत से उसके विनाश के लिए यह कहो,'
श्लोक 13 (skanda.8.71.13)
नरसिंहवपुः कृत्वा सकृदाहत्य हंस्यति । हिरण्यकशिपुं दैत्यं ततो निर्वृतिमेष्यथ
narasiṁhavapuḥ kṛtvā sakṛdāhatya haṁsyati | hiraṇyakaśipuṁ daityaṁ tato nirvṛtimeṣyatha
'-कि नरसिंह-रूप धारण करके, एक ही प्रहार से, वे दैत्य हिरण्यकशिपु को मार डालेंगे; तब तुम्हें शांति प्राप्त होगी।'
श्लोक 14 (skanda.8.71.14)
एवमस्त्विति ते सर्वे प्रणिपत्य पितामहम् । आजग्मुः सहिता देवा विष्णोर्भवनमादृताः
evamastviti te sarve praṇipatya pitāmaham | ājagmuḥ sahitā devā viṣṇorbhavanamādṛtāḥ
'ऐसा ही हो' कहकर, पितामह को प्रणाम करके, वे सभी देवता मिलकर आदरपूर्वक विष्णु के भवन में गए।
श्लोक 15 (skanda.8.71.15)
अथ दृष्ट्वा महातेजा विष्णुर्देवानुपस्थितान् । उवाच श्लक्ष्णया वाचा वचश्चोक्तिमनोहरम्
atha dṛṣṭvā mahātejā viṣṇurdevānupasthitān | uvāca ślakṣṇayā vācā vacaścoktimanoharam
तब महातेजस्वी विष्णु ने अपने सामने खड़े देवताओं को देखकर, कोमल वाणी में मनोहर शब्दों में कहा -
श्लोक 16 (skanda.8.71.16)
स्वागतं भवतामस्तु किमर्थं यूयमागताः । पूज्या भवन्तस्सर्वे मे सुहृदोतिगरीयसः
svāgataṁ bhavatāmastu kimarthaṁ yūyamāgatāḥ | pūjyā bhavantassarve me suhṛdotigarīyasaḥ
'तुम सबका स्वागत हो; किस प्रयोजन से आए हो? तुम सब मेरे लिए पूज्य हो, अत्यंत आदरणीय मित्र हो।'
श्लोक 17 (skanda.8.71.17)
यद्वो मनोगतं किञ्चिन्मया कार्यं दिवौकसः । क्षिप्रं तद् ब्रूत संक्षिप्तं कर्ताहमविचारितम्
yadvo manogataṁ kiñcinmayā kāryaṁ divaukasaḥ | kṣipraṁ tad brūta saṁkṣiptaṁ kartāhamavicāritam
'हे स्वर्गवासियो, तुम्हारे मन में जो कुछ है, मेरे लिए जो भी कार्य है - वह मुझे संक्षेप में शीघ्र बताओ; मैं बिना विचार किए वह करूँगा।'
श्लोक 18 (skanda.8.71.18)
विष्णुनैवं तदा प्रोक्ता देवाः शक्रपुरोगमाः । ऊचुः प्रहृष्टवदनाः संस्तुवन्तो जनार्दनम्
viṣṇunaivaṁ tadā proktā devāḥ śakrapurogamāḥ | ūcuḥ prahṛṣṭavadanāḥ saṁstuvanto janārdanam
विष्णु द्वारा ऐसा कहे जाने पर, इंद्र के नेतृत्व में देवगण, प्रसन्नमुख होकर, जनार्दन की स्तुति करते हुए बोले -
श्लोक 19 (skanda.8.71.19)
हिरण्यकशिपोर्देव दैत्यराजो महाबलात् । भयं नः सुमहज्जातं राज्यं चापहृतं दिवः
hiraṇyakaśipordeva daityarājo mahābalāt | bhayaṁ naḥ sumahajjātaṁ rājyaṁ cāpahṛtaṁ divaḥ
'हे देव, महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपु से हमें अत्यंत भय उत्पन्न हुआ है, और हमारा स्वर्ग-राज्य छीन लिया गया है।'
श्लोक 20 (skanda.8.71.20)
अवमानः प्रयुक्तश्च तेनास्मभ्यं सुरोत्तम । भुनक्ति स जगत् कृत्स्नं ब्रह्मद्विट् कश्यपात्मजः
avamānaḥ prayuktaśca tenāsmabhyaṁ surottama | bhunakti sa jagat kṛtsnaṁ brahmadviṭ kaśyapātmajaḥ
'और, हे सुरोत्तम, उसने हमारा अपमान किया है; वह ब्रह्मद्वेषी, कश्यप-पुत्र, संपूर्ण जगत् को भोग रहा है।'
श्लोक 21 (skanda.8.71.21)
स यथा वध्यते दैत्यस्त्वया सर्वारिसूदन । तथा कुरु हृषीकेश वरोयं नः प्रदीयताम्
sa yathā vadhyate daityastvayā sarvārisūdana | tathā kuru hṛṣīkeśa varoyaṁ naḥ pradīyatām
'हे सर्वारि-सूदन, हे हृषीकेश, ऐसा करो कि वह दैत्य आपके द्वारा मारा जाए; यही वर हमें प्रदान करो।'
श्लोक 22 (skanda.8.71.22)
ततो विष्णुश्चिरं ध्यात्वा वधोपायं प्रचिन्त्य च । प्राह देवान् सुरश्रेष्ठो वचसाप्याययन्निव
tato viṣṇuściraṁ dhyātvā vadhopāyaṁ pracintya ca | prāha devān suraśreṣṭho vacasāpyāyayanniva
तब विष्णु ने बहुत देर तक ध्यान करके, वध का उपाय सोचकर, उस देवश्रेष्ठ ने मानो वचनों से आश्वस्त करते हुए देवताओं से कहा -
श्लोक 23 (skanda.8.71.23)
एवमस्तु सुरश्रेष्ठाः सर्वं कर्तास्मि वो वचः । महाबलस्य दैत्येन्द्रो यतो युष्मान्वदाम्यहम्
evamastu suraśreṣṭhāḥ sarvaṁ kartāsmi vo vacaḥ | mahābalasya daityendro yato yuṣmānvadāmyaham
'हे देवश्रेष्ठो, ऐसा ही हो; मैं तुम्हारा सारा वचन पूर्ण करूँगा। अब उस महाबली दैत्येंद्र के विषय में मैं जो कहता हूँ, वह सुनो।'
श्लोक 24 (skanda.8.71.24)
आविशन्तु भवन्तोपि शरीरं मम सुव्रताः । सर्वदेवमयो भूत्वा दृप्तं हंस्यामि वो रिपुम्
āviśantu bhavantopi śarīraṁ mama suvratāḥ | sarvadevamayo bhūtvā dṛptaṁ haṁsyāmi vo ripum
'हे सुव्रतो, तुम सब भी मेरे शरीर में प्रवेश करो; समस्त देवमय होकर मैं तुम्हारे उस अभिमानी शत्रु को मारूँगा।'
श्लोक 25 (skanda.8.71.25)
ततो देवास्तदा सर्वे विविशुर्वैष्णवीं तनुम् । स चापि बलवान् भूत्वा रूपं कृत्वा भयानकम्
tato devāstadā sarve viviśurvaiṣṇavīṁ tanum | sa cāpi balavān bhūtvā rūpaṁ kṛtvā bhayānakam
तब सभी देवता विष्णु के शरीर में प्रविष्ट हो गए; और वे भी बलवान् होकर, भयानक रूप धारण करके,
श्लोक 26 (skanda.8.71.26)
नारसिंहं महातेजा नखदंष्ट्राविभूषणम् । जगाम विलसन् विष्णुर्हिरष्यकशिपोः पुरम्
nārasiṁhaṁ mahātejā nakhadaṁṣṭrāvibhūṣaṇam | jagāma vilasan viṣṇurhiraṣyakaśipoḥ puram
-वह महातेजस्वी विष्णु, नरसिंह रूप में, नख-दंष्ट्रों से विभूषित, चमकते हुए हिरण्यकशिपु के नगर की ओर गए।
श्लोक 27 (skanda.8.71.27)
उद्यानं स बहिस्तस्य सर्वर्तुकुसुमैर्वृतम् । नृसिंहो दैत्यसिंहस्य दृष्ट्वा तस्थौ सुविस्मितः
udyānaṁ sa bahistasya sarvartukusumairvṛtam | nṛsiṁho daityasiṁhasya dṛṣṭvā tasthau suvismitaḥ
नरसिंह ने उस दैत्य-सिंह के नगर के बाहर, सभी ऋतुओं के फूलों से भरे उद्यान को देखकर, अत्यंत विस्मित होकर वहीं ठहर गए।
श्लोक 28 (skanda.8.71.28)
चम्पकाशोकजातीभिः कदम्बैर्बकुलैरपि । तथा सुरभिपुष्पैश्च समन्तादुपशोभितम्
campakāśokajātībhiḥ kadambairbakulairapi | tathā surabhipuṣpaiśca samantādupaśobhitam
वह चंपा, अशोक, जाती, कदंब, बकुल तथा अन्य सुगंधित पुष्पों से चारों ओर सुशोभित था,
श्लोक 29 (skanda.8.71.29)
सरोभिः पद्मसंछन्नैर्हंसचक्राह्वशोभितैः । वृक्षैः कामफलैश्चैव वैभ्राजसदृशं वनम्
sarobhiḥ padmasaṁchannairhaṁsacakrāhvaśobhitaiḥ | vṛkṣaiḥ kāmaphalaiścaiva vaibhrājasadṛśaṁ vanam
-कमलों से आच्छादित, हंस-चक्रवाकों से सुशोभित सरोवरों वाला, तथा मनचाहे फल देने वाले वृक्षों से युक्त वैभ्राज के समान वन।
श्लोक 30 (skanda.8.71.30)
तद्बभञ्ज नृसिंहस्तु खेलगामी मदोत्कटः । सरांसि क्षोभयामास करीव स मदोल्बणः
tadbabhañja nṛsiṁhastu khelagāmī madotkaṭaḥ | sarāṁsi kṣobhayāmāsa karīva sa madolbaṇaḥ
क्रीड़ा करते हुए, अत्यंत उत्तेजित, नरसिंह ने उस उद्यान को उजाड़ डाला; मद से उन्मत्त हाथी की तरह उसने सरोवरों को क्षुब्ध कर दिया।
श्लोक 31 (skanda.8.71.31)
स रेजे वनमध्यस्थः परिसर्पन्नितस्ततः । मेरोरचलराजस्य स्थितं शृङ्गमिवोच्छ्रितम्
sa reje vanamadhyasthaḥ parisarpannitastataḥ | meroracalarājasya sthitaṁ śṛṅgamivocchritam
वन के मध्य खड़े, इधर-उधर विचरण करते हुए, वे मेरु पर्वत के, अचलराज के, स्थिर उठे हुए शिखर के समान शोभित हुए।
श्लोक 32 (skanda.8.71.32)
अथाभ्येत्य नृसिंहं तं वनपाला रुषान्विताः । बलिनो वारयामासुस्ताँश्चैवाभ्यहनद् बली
athābhyetya nṛsiṁhaṁ taṁ vanapālā ruṣānvitāḥ | balino vārayāmāsustā~ścaivābhyahanad balī
तब क्रोधित बलवान् वनपाल उस नरसिंह के पास आकर उन्हें रोकने लगे; और उस बलवान् ने उन्हें मार डाला।
श्लोक 33 (skanda.8.71.33)
हतशेषास्ततस्तत्र प्रविलीनास्तु येसुराः । ते गत्वा कथयामासुर्हिरण्यकशिपोस्तदा
hataśeṣāstatastatra pravilīnāstu yesurāḥ | te gatvā kathayāmāsurhiraṇyakaśipostadā
तब वहाँ बचे हुए जो असुर भाग गए, वे जाकर हिरण्यकशिपु से यह सब कह सुनाया।
श्लोक 34 (skanda.8.71.34)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा दैत्यराजो महाबलः । प्रह्लादञ्चानुह्रादञ्च नमुचिं बाष्कलिं बलिम्
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā daityarājo mahābalaḥ | prahlādañcānuhrādañca namuciṁ bāṣkaliṁ balim
उनकी यह बात सुनकर, महाबली दैत्यराज ने प्रह्लाद, अनुह्लाद, नमुचि, बाष्कलि, बलि,
श्लोक 35 (skanda.8.71.35)
विप्रचित्तिप्रधानाँश्च सर्वानाहूय दानवान् । प्रोवाच त्वरितं गत्वा बद्ध्वा सिंहं ममान्तिकम्
vipracittipradhānā~śca sarvānāhūya dānavān | provāca tvaritaṁ gatvā baddhvā siṁhaṁ mamāntikam
-और विप्रचित्ति आदि समस्त प्रधान दानवों को बुलाकर कहा - 'शीघ्र जाओ, उस सिंह को बाँधकर मेरे पास लाओ।'
श्लोक 36 (skanda.8.71.36)
समानयत दैत्येन्द्रा न हन्तव्यः कथञ्चन । क्रीडनं सिंहपोतोसौ देव्या मम भविष्यति
samānayata daityendrā na hantavyaḥ kathañcana | krīḍanaṁ siṁhapotosau devyā mama bhaviṣyati
'हे दैत्येंद्रो, उसे लेकर आओ; उसे किसी भी प्रकार मत मारना। वह सिंह-शावक मेरी रानी का खिलौना बनेगा।'
श्लोक 37 (skanda.8.71.37)
इति श्रुत्वासुरास्सर्वे विप्रचित्तिपुरोगमाः । उद्यानं सहिता गत्वा नृसिंहं ददृशुः स्थितम्
iti śrutvāsurāssarve vipracittipurogamāḥ | udyānaṁ sahitā gatvā nṛsiṁhaṁ dadṛśuḥ sthitam
यह सुनकर विप्रचित्ति के नेतृत्व में सभी असुर मिलकर उद्यान में गए और नरसिंह को वहाँ खड़ा देखा।
श्लोक 38 (skanda.8.71.38)
दूरस्थाश्चिक्षिपुः पाशाँस्ताँन्स चिच्छेद माधवः । अथ विद्रावयामास दानवान् केशरी भृशम्
dūrasthāścikṣipuḥ pāśā~stā~nsa ciccheda mādhavaḥ | atha vidrāvayāmāsa dānavān keśarī bhṛśam
दूर खड़े होकर उन्होंने उस पर फंदे फेंके; माधव ने उन सबको काट डाला; तब उस सिंह ने दानवों को अत्यंत भयभीत करके खदेड़ दिया।
श्लोक 39 (skanda.8.71.39)
ततो हतसहायास्ते दैत्या विमनसो ययुः । पार्श्वं दानवराजस्य सर्वञ्चाकथयँस्तदा
tato hatasahāyāste daityā vimanaso yayuḥ | pārśvaṁ dānavarājasya sarvañcākathaya~stadā
तब अपने साथी मारे जाने पर वे दैत्य निराश होकर दानवराज के पास गए और उन्हें सब कुछ बताया।
श्लोक 40 (skanda.8.71.40)
अथ क्रुद्धः स्वयं राजा हिरण्यकशिपुर्बली । रथमास्थाय सन्नद्धा नृसिंहं प्राद्रवद्रुषा
atha kruddhaḥ svayaṁ rājā hiraṇyakaśipurbalī | rathamāsthāya sannaddhā nṛsiṁhaṁ prādravadruṣā
तब क्रुद्ध होकर स्वयं राजा बलवान् हिरण्यकशिपु, रथ पर सवार होकर, शस्त्र-सज्जित, क्रोधपूर्वक नरसिंह पर टूट पड़ा।
श्लोक 41 (skanda.8.71.41)
स रथः सिंहराजेन सायुधः पर्वतोपमः । संभ्राम्य पातितस्तूर्णं चूर्णमागान्महीतले
sa rathaḥ siṁharājena sāyudhaḥ parvatopamaḥ | saṁbhrāmya pātitastūrṇaṁ cūrṇamāgānmahītale
उस पर्वत के समान, अस्त्रों सहित रथ को सिंहराज ने घुमाकर तुरंत पटक दिया, और वह भूमि पर चूर-चूर हो गया।
श्लोक 42 (skanda.8.71.42)
ततो भग्नरथो दैत्यः क्रोधात्संरक्तलोचनः । वृक्षमुत्पाट्य वेगेन नृसिंहाय व्यसर्जयत्
tato bhagnaratho daityaḥ krodhātsaṁraktalocanaḥ | vṛkṣamutpāṭya vegena nṛsiṁhāya vyasarjayat
तब रथ टूट जाने पर वह दैत्य, क्रोध से लाल नेत्रों वाला, एक वृक्ष उखाड़कर वेगपूर्वक नरसिंह पर फेंका।
श्लोक 43 (skanda.8.71.43)
अथासौ पतितो गात्रे सिंहराजस्य पादपः । गृहीत्वा स तदा सिंहो हिरण्यशिपुं सकृत् । तलेनाहत्य तं प्राणैर्व्ययोजयत सत्वरम्
athāsau patito gātre siṁharājasya pādapaḥ | gṛhītvā sa tadā siṁho hiraṇyaśipuṁ sakṛt | talenāhatya taṁ prāṇairvyayojayata satvaram
वह वृक्ष सिंहराज के शरीर पर गिर पड़ा; तब उस सिंह ने हिरण्यकशिपु को पकड़कर, एक ही थप्पड़ से मारकर, शीघ्र प्राणों से वियुक्त कर दिया।
श्लोक 44 (skanda.8.71.44)
सिंहनादं महत् कृत्वा नखैर्वज्रमयैर्विभुः । उरो बिभेद दैत्यस्य महाशैलोपमं हरिः
siṁhanādaṁ mahat kṛtvā nakhairvajramayairvibhuḥ | uro bibheda daityasya mahāśailopamaṁ hariḥ
महान् सिंहनाद करके, विभु ने अपने वज्रमय नखों से, विशाल पर्वत के समान उस दैत्य की छाती चीर डाली।
श्लोक 45 (skanda.8.71.45)
हते तस्मिन्महादैत्ये विष्णुना शक्तिनन्दन । दानवा न हताः ये तु विविशुस्ते रसातलम्
hate tasminmahādaitye viṣṇunā śaktinandana | dānavā na hatāḥ ye tu viviśuste rasātalam
हे शक्ति-पुत्र, विष्णु द्वारा उस महादैत्य के मारे जाने पर, जो दानव नहीं मारे गए थे, वे रसातल में चले गए।
श्लोक 46 (skanda.8.71.46)
दिवो राज्यं पुनः शक्रो लेभे निष्कण्टकं महत् । दिवौकसश्च सर्वे ते स्वानि राज्यानि भेजिरे
divo rājyaṁ punaḥ śakro lebhe niṣkaṇṭakaṁ mahat | divaukasaśca sarve te svāni rājyāni bhejire
इंद्र ने पुनः स्वर्ग के महान्, कंटकरहित राज्य को प्राप्त किया; और सभी स्वर्गवासी अपने-अपने राज्यों को लौट गए।
श्लोक 47 (skanda.8.71.47)
अथागत्य ततो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः । सुरैर्विज्ञापितो व्यास यत्ते कथितवानहम्
athāgatya tato devaḥ śūlapāṇirvṛṣadhvajaḥ | surairvijñāpito vyāsa yatte kathitavānaham
तब, हे व्यास, जैसा मैंने पहले बताया था, वे शूलपाणि, वृषभध्वज देव, देवताओं द्वारा प्रार्थित होकर वहाँ आए,
श्लोक 48 (skanda.8.71.48)
विष्णोस्त्याजयितुं रूपं सैंहमद्भुतकर्मणः । शरभस्स तदा भूत्वा हिमवच्छिखरोपमः
viṣṇostyājayituṁ rūpaṁ saiṁhamadbhutakarmaṇaḥ | śarabhassa tadā bhūtvā himavacchikharopamaḥ
-विष्णु के, अद्भुत कर्मी के, सिंहरूप को त्याग कराने के लिए। वे तब शरभ बन गए, हिमालय के शिखर के समान,
श्लोक 49 (skanda.8.71.49)
चतुर्भिः पृष्ठजैः पादैस्तीक्ष्णदंष्ट्रो महाबलः । नरसिंहसमीपं तु गत्वागर्जत् समाहितः
caturbhiḥ pṛṣṭhajaiḥ pādaistīkṣṇadaṁṣṭro mahābalaḥ | narasiṁhasamīpaṁ tu gatvāgarjat samāhitaḥ
-पीठ पर चार अतिरिक्त पैरों वाले, तीक्ष्ण दाढ़ों वाले, महाबली; और नरसिंह के पास जाकर, संयत होकर, गरजने लगे।
श्लोक 50 (skanda.8.71.50)
अथ सिंहस्तदा दृष्ट्वा शरभं समुपस्थितम् । क्रोधेन महताविष्टस्तलेनैनमताडयत्
atha siṁhastadā dṛṣṭvā śarabhaṁ samupasthitam | krodhena mahatāviṣṭastalenainamatāḍayat
तब उस सिंह ने अपने सामने खड़े शरभ को देखकर, अत्यंत क्रोध से आविष्ट होकर, उसे थप्पड़ से मारा।
श्लोक 51 (skanda.8.71.51)
स हतस्तेन सिंहेन शरभो नैव चुक्षुभे । ततः शरभमाहत्य वज्रदेहं महाबलम
sa hatastena siṁhena śarabho naiva cukṣubhe | tataḥ śarabhamāhatya vajradehaṁ mahābalama
उस सिंह द्वारा मारे जाने पर भी शरभ तनिक भी विचलित नहीं हुए। तब उस वज्रदेह महाबली शरभ पर प्रहार करने से,
श्लोक 52 (skanda.8.71.52)
आत्मनैवागमत् कृच्छ्रं स्पर्शात्तस्य महात्मनः । ततो विष्णुश्चिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा शङ्करमागतम्
ātmanaivāgamat kṛcchraṁ sparśāttasya mahātmanaḥ | tato viṣṇuściraṁ dhyātvā jñātvā śaṅkaramāgatam
उस महात्मा के स्पर्श से वह सिंह स्वयं ही कष्ट में पड़ गया। तब विष्णु ने बहुत देर तक विचार करके, यह जानकर कि यह शंकर आए हैं,
श्लोक 53 (skanda.8.71.53)
प्रणम्य शिरसा तं वै स्तोतुमेवं प्रचक्रमे । नमः शर्वाय रुद्राय सेनान्ये शर्मदाय च
praṇamya śirasā taṁ vai stotumevaṁ pracakrame | namaḥ śarvāya rudrāya senānye śarmadāya ca
उन्हें सिर से प्रणाम करके इस प्रकार स्तुति करने लगे - 'शर्व को नमस्कार, रुद्र को, सेनापति को और सुखदाता को नमस्कार,'
श्लोक 54 (skanda.8.71.54)
नमः परमदेवाय ब्रह्मणे परमाय च । कालाय यमरूपाय कालदण्डाय वै नमः
namaḥ paramadevāya brahmaṇe paramāya ca | kālāya yamarūpāya kāladaṇḍāya vai namaḥ
'-परमदेव को नमस्कार, परम ब्रह्म को; काल को, यमरूप को, कालदंड को नमस्कार,'
श्लोक 55 (skanda.8.71.55)
नमः लान्तकर्त्रे च कालेकालहराय च । नमः पिनाकहस्ताय रौद्रबाणधराय च
namaḥ lāntakartre ca kālekālaharāya ca | namaḥ pinākahastāya raudrabāṇadharāya ca
'-लय करने वाले को, काल के भी काल-हर्ता को नमस्कार; पिनाकधारी को, रौद्र बाण धारण करने वाले को नमस्कार,'
श्लोक 56 (skanda.8.71.56)
चण्डाय वामदेवाय सर्वयोगेश्वराय च । नमो विद्याधिपतये ब्रह्मणः पतये नमः
caṇḍāya vāmadevāya sarvayogeśvarāya ca | namo vidyādhipataye brahmaṇaḥ pataye namaḥ
'-चंड को, वामदेव को, सर्वयोगेश्वर को; विद्याधिपति को नमस्कार, ब्रह्मा के स्वामी को नमस्कार,'
श्लोक 57 (skanda.8.71.57)
नमोसुरवरघ्नाय कालचक्राय ते नमः । संवर्त्तकाग्निचक्राय प्रलयान्तकराय च
namosuravaraghnāya kālacakrāya te namaḥ | saṁvarttakāgnicakrāya pralayāntakarāya ca
'-श्रेष्ठ असुरों के संहारक को नमस्कार, तुम्हें, कालचक्र को नमस्कार; संवर्तक-अग्नि-चक्र को, प्रलयकाल के अंतकर्ता को,'
श्लोक 58 (skanda.8.71.58)
नरनारायणेशाय नरनारायणात्मने । ममैव वरदात्रे च सर्वकामप्रदाय च
naranārāyaṇeśāya naranārāyaṇātmane | mamaiva varadātre ca sarvakāmapradāya ca
'-नर-नारायण के ईश्वर को, नर-नारायण के आत्मस्वरूप को; मुझे वर देने वाले को और सर्वकामप्रद को,'
श्लोक 59 (skanda.8.71.59)
शरभाय सुरूपाय व्याघ्रचर्मसुवाससे । नन्दीश्वरगणेशाय गणानां पतये नमः
śarabhāya surūpāya vyāghracarmasuvāsase | nandīśvaragaṇeśāya gaṇānāṁ pataye namaḥ
'-शरभ को, सुंदर रूप वाले को, व्याघ्रचर्म धारण करने वाले को; नंदीश्वर-गणेश को, गणों के स्वामी को नमस्कार,'
श्लोक 60 (skanda.8.71.60)
इन्द्रियाणामथेशाय मनसस्पतये नमः । नमः प्रधानपतये सुराणां पतये नमः
indriyāṇāmatheśāya manasaspataye namaḥ | namaḥ pradhānapataye surāṇāṁ pataye namaḥ
'-इंद्रियों के स्वामी को, मन के स्वामी को नमस्कार; प्रधान के स्वामी को, देवताओं के स्वामी को नमस्कार,'
श्लोक 61 (skanda.8.71.61)
नमोस्तु भावपतये तत्त्वानां पतये नमः । चराचराणां पतये भूतानां पतये नमः
namostu bhāvapataye tattvānāṁ pataye namaḥ | carācarāṇāṁ pataye bhūtānāṁ pataye namaḥ
'-भाव के स्वामी को, तत्त्वों के स्वामी को नमस्कार; चराचर के स्वामी को, भूतों के स्वामी को नमस्कार,'
श्लोक 62 (skanda.8.71.62)
त्रैलोक्यपतये चैव लोकानां पतये नमः । योगदाय नमो मह्यं तथैवैश्वर्यदाय च
trailokyapataye caiva lokānāṁ pataye namaḥ | yogadāya namo mahyaṁ tathaivaiśvaryadāya ca
'-त्रैलोक्य के स्वामी को, लोकों के स्वामी को नमस्कार; मुझे योग देने वाले को, तथा ऐश्वर्य देने वाले को नमस्कार,'
श्लोक 63 (skanda.8.71.63)
अवध्यत्वप्रदात्रे च तथैवाजप्यदाय च । भगवंस्त्वत्प्रतिष्ठोस्मि त्वन्निष्ठस्त्वत्परायणः । शरणं त्वां प्रपन्नोहं प्रसीद मम सर्वदा
avadhyatvapradātre ca tathaivājapyadāya ca | bhagavaṁstvatpratiṣṭhosmi tvanniṣṭhastvatparāyaṇaḥ | śaraṇaṁ tvāṁ prapannohaṁ prasīda mama sarvadā
'-अवध्यत्व देने वाले को, तथा अजप्य के दाता को नमस्कार। हे भगवन्, मैं आपमें प्रतिष्ठित हूँ, आपमें निष्ठ हूँ, आपमें परायण हूँ; मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।'
श्लोक 64 (skanda.8.71.64)
य इमं शृणुयान्नित्यं शुचिः प्रयतमानसः । स रुद्रलोकमासाद्य देवस्य गणपो भवेत्
ya imaṁ śṛṇuyānnityaṁ śuciḥ prayatamānasaḥ | sa rudralokamāsādya devasya gaṇapo bhavet
जो कोई पवित्र और संयत मन से इस स्तोत्र को नित्य सुनता है, वह रुद्रलोक को प्राप्त करके देव का गणपति बन जाता है।
श्लोक 65 (skanda.8.71.65)
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं पापप्रणाशनम् । श्रावणं श्रवणं चास्य तथानुस्मरणं सदा
dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ svargyaṁ pāpapraṇāśanam | śrāvaṇaṁ śravaṇaṁ cāsya tathānusmaraṇaṁ sadā
यह धन देने वाला, यशस्वी, आयुष्यकारी, स्वर्गदायक और पापनाशक है - इसका श्रवण-श्रावण तथा सदा अनुस्मरण भी ऐसा ही फल देता है।
श्लोक 66 (skanda.8.71.66)
सनत्कुमार उवाच । स एवं स्तूयमानस्तु विष्णुना भुवनेश्वरः । हृषीकेशमुवाचेदं वचः परमपूजितम्
sanatkumāra uvāca | sa evaṁ stūyamānastu viṣṇunā bhuvaneśvaraḥ | hṛṣīkeśamuvācedaṁ vacaḥ paramapūjitam
सनत्कुमार ने कहा - विष्णु द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, भुवनेश्वर ने हृषीकेश से यह परम पूज्य वचन कहा -
श्लोक 67 (skanda.8.71.67)
तुभ्यं विष्णो मया दत्तः पुण्यो ह्येष वरः शुभः । अयोनौ सज्जमानस्य स्वयोनौ प्रतिपादनम्
tubhyaṁ viṣṇo mayā dattaḥ puṇyo hyeṣa varaḥ śubhaḥ | ayonau sajjamānasya svayonau pratipādanam
'हे विष्णु, तुम्हें मेरे द्वारा यह पवित्र, शुभ वर दिया जाता है - अयोनि (अस्वाभाविक रूप) में लगे हुए के लिए अपने स्वयोनि में प्रत्यावर्तन।'
श्लोक 68 (skanda.8.71.68)
स त्वं विष्णुर्महातेजा मत्तो लब्धवरस्सदा । कृतं कार्यं त्वया सर्वं हिरण्यकशिपुर्हतः । एहि गच्छ शुभां योनिमात्मनः परमाद्भुताम्
sa tvaṁ viṣṇurmahātejā matto labdhavarassadā | kṛtaṁ kāryaṁ tvayā sarvaṁ hiraṇyakaśipurhataḥ | ehi gaccha śubhāṁ yonimātmanaḥ paramādbhutām
'सो तुम, हे महातेजस्वी विष्णु, सदा मुझसे वर पाते रहे हो - तुम्हारा संपूर्ण कार्य पूर्ण हो गया है, हिरण्यकशिपु मारा गया है। आओ, अपने शुभ, परम अद्भुत स्वरूप में लौट जाओ।'
श्लोक 69 (skanda.8.71.69)
ततस्तमाक्रमत् पादैः सिंहं शरभसत्तमः । अयोजयच्च देहेन पुनर्दिव्येन केशवम्
tatastamākramat pādaiḥ siṁhaṁ śarabhasattamaḥ | ayojayacca dehena punardivyena keśavam
तब उस श्रेष्ठ शरभ ने अपने पैरों से उस सिंह को दबाया, और केशव को पुनः उनके दिव्य शरीर से युक्त कर दिया।
श्लोक 70 (skanda.8.71.70)
विष्णवेथ वरं दत्त्वा दैत्यघ्नं स वृषध्वजः । प्रकृतिस्थो भवेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत
viṣṇavetha varaṁ dattvā daityaghnaṁ sa vṛṣadhvajaḥ | prakṛtistho bhavetyuktvā tatraivāntaradhīyata
इस प्रकार दैत्य-संहारक विष्णु को वर देकर, वृषभध्वज ने 'अपनी प्रकृति में स्थित हो जाओ' कहकर वहीं अंतर्धान हो गए।
श्लोक 71 (skanda.8.71.71)
दत्वा तस्मै वरमनुपमं विष्णवे लोकधाता । दैत्यघ्नत्वं सुरपुरवधूलोचनैः पीयमानः । नीलाम्भोदद्युतिनिभमुरः प्रोद्वहच्छूलपाणिर्धाम स्वीयं परममुनिभिर्वन्द्यमानो जगाम
datvā tasmai varamanupamaṁ viṣṇave lokadhātā | daityaghnatvaṁ surapuravadhūlocanaiḥ pīyamānaḥ | nīlāmbhodadyutinibhamuraḥ prodvahacchūlapāṇirdhāma svīyaṁ paramamunibhirvandyamāno jagāma
इस प्रकार लोकों के धाता विष्णु को दैत्य-संहार का वह अनुपम वर देकर, देवनगरी की वधुओं के नेत्रों से पान किए जाते हुए, नीले मेघ की कांति जैसे वक्षस्थल वाले शूलपाणि, परम मुनियों द्वारा वंदित होते हुए, अपने धाम को चले गए।