अम्बिका खण्ड · अध्याय 72
स्कन्दजन्म-प्रवृत्ति
श्लोक 1 (skanda.8.72.1)
व्यास उवाच । भगवन् सर्वयोगज्ञ श्रुतमाख्यानमुत्तमम् । परतः श्रोतुमिच्छामि यद् वृत्तं मुनिसत्तम
vyāsa uvāca | bhagavan sarvayogajña śrutamākhyānamuttamam | parataḥ śrotumicchāmi yad vṛttaṁ munisattama
व्यास ने कहा - हे भगवन्, सर्वयोगज्ञ, मैंने यह उत्तम आख्यान सुना; हे मुनिश्रेष्ठ, आगे जो हुआ, वह सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.8.72.2)
अपनीय तदा विष्णोः सिंहरूपं वृषध्वजः । किमन्यदकरोद्धीमानेतदिच्छामि वेदितुम्
apanīya tadā viṣṇoḥ siṁharūpaṁ vṛṣadhvajaḥ | kimanyadakaroddhīmānetadicchāmi veditum
उस वृषभध्वज ने विष्णु के सिंहरूप को हटाकर, उस बुद्धिमान् ने और क्या किया? यह मैं जानना चाहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.8.72.3)
सनत्कुमार उवाच । स्वयोनिं विष्णुमानीय देवदेवो भवस्तदा । मन्दरे सहितो देव्या विचचार महाद्युतिः
sanatkumāra uvāca | svayoniṁ viṣṇumānīya devadevo bhavastadā | mandare sahito devyā vicacāra mahādyutiḥ
सनत्कुमार ने कहा - विष्णु को अपने स्वरूप में लाकर, देवदेव भव, महातेजस्वी, तब देवी सहित मंदर पर्वत पर विचरण करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.8.72.4)
रम्यान् स काननोद्देशान् गिरेः प्रस्रवणानि च । अलञ्चकार देवेशः परिसर्पन् समन्ततः
ramyān sa kānanoddeśān gireḥ prasravaṇāni ca | alañcakāra deveśaḥ parisarpan samantataḥ
चारों ओर विचरण करते हुए, देवेश ने पर्वत के रमणीय वन-प्रदेशों और झरनों को सुशोभित किया।
श्लोक 5 (skanda.8.72.5)
वनप्रेक्षारतं देवं ज्ञात्वा शङ्करमव्ययम् । शरत्तत्र वसन्तश्च द्वावृतू समुपस्थितौ
vanaprekṣārataṁ devaṁ jñātvā śaṅkaramavyayam | śarattatra vasantaśca dvāvṛtū samupasthitau
अव्यय देव शंकर को वन-दर्शन में रत जानकर, वहाँ शरद् और वसंत - दोनों ऋतुएँ उपस्थित हुईं।
श्लोक 6 (skanda.8.72.6)
ततो महीरुहाः सर्वे सरांसि च समन्ततः । नानाविधानि पुष्पाणि मुमुचुस्सहसा समम्
tato mahīruhāḥ sarve sarāṁsi ca samantataḥ | nānāvidhāni puṣpāṇi mumucussahasā samam
तब सभी वृक्षों और चारों ओर के सरोवरों ने सहसा एक साथ विविध प्रकार के पुष्प खिला दिए।
श्लोक 7 (skanda.8.72.7)
कमलोत्पलसंछन्नाः षट्पदव्रातसेविताः । हंससारससंवासा वाप्यस्तत्र मनोहराः
kamalotpalasaṁchannāḥ ṣaṭpadavrātasevitāḥ | haṁsasārasasaṁvāsā vāpyastatra manoharāḥ
वहाँ कमल-उत्पल से आच्छादित, भ्रमर-समूहों से सेवित, हंस-सारस के निवास वाली मनोहर बावड़ियाँ थीं।
श्लोक 8 (skanda.8.72.8)
गन्धाढ्या जातयः क्षिप्रं बभूवुः सह चम्पकैः । अशोका गन्धपुष्पाश्च तथा चैवातिमुक्तकाः
gandhāḍhyā jātayaḥ kṣipraṁ babhūvuḥ saha campakaiḥ | aśokā gandhapuṣpāśca tathā caivātimuktakāḥ
सुगंधित जाती के फूल शीघ्र खिल उठे, चंपा के साथ, अशोक के गंधयुक्त पुष्प, तथा अतिमुक्तक लताएँ भी।
श्लोक 9 (skanda.8.72.9)
उपतस्थुः समं देवं सर्वगन्धसुखानिलाः । सर्वर्तुकुसुमाकीर्णं दृष्टवा तद्वनमुत्तमम्
upatasthuḥ samaṁ devaṁ sarvagandhasukhānilāḥ | sarvartukusumākīrṇaṁ dṛṣṭavā tadvanamuttamam
समस्त सुगंधों से युक्त सुखद वायु देवता की सेवा में उपस्थित हुई; और ऋतुओं के पुष्पों से भरे उस उत्तम वन को देखकर,
श्लोक 10 (skanda.8.72.10)
पुष्पाण्यादाय देवेशः स्वयमेव जगत्पतिः । अलञ्चकार हृष्टात्मा देवीं हिमगिरेः सुताम्
puṣpāṇyādāya deveśaḥ svayameva jagatpatiḥ | alañcakāra hṛṣṭātmā devīṁ himagireḥ sutām
देवेश जगत्पति ने स्वयं ही पुष्प लेकर, प्रसन्नचित्त होकर, हिमगिरि-पुत्री देवी को सुशोभित किया,
श्लोक 11 (skanda.8.72.11)
नन्दीश्वरञ्च पार्श्वस्थमात्मानञ्च सुरेश्वरः । ततः प्रणम्य देवेशं पार्वती प्रणयादिदम्
nandīśvarañca pārśvasthamātmānañca sureśvaraḥ | tataḥ praṇamya deveśaṁ pārvatī praṇayādidam
और अपने पास खड़े नंदीश्वर को तथा स्वयं को भी। तब देवेश को प्रणाम करके पार्वती ने प्रेमपूर्वक यह वचन कहा -
श्लोक 12 (skanda.8.72.12)
वचः प्रोवाच जननी कृत्स्नस्य जगतोव्यया । यथा मे देहजः पुत्रो भविता गोवृषध्वज
vacaḥ provāca jananī kṛtsnasya jagatovyayā | yathā me dehajaḥ putro bhavitā govṛṣadhvaja
-वह संपूर्ण जगत् की अव्यय जननी बोलीं - 'हे गोवृषध्वज, मुझे मेरे अपने शरीर से उत्पन्न पुत्र प्राप्त हो,'
श्लोक 13 (skanda.8.72.13)
त्वद्वीर्यस्त्वत्प्रभावश्च सर्वदेवनमस्कृतः । तथा कुरु महादेव यदि ते प्रियता मयि
tvadvīryastvatprabhāvaśca sarvadevanamaskṛtaḥ | tathā kuru mahādeva yadi te priyatā mayi
'-आपके ही पराक्रम और प्रभाव से युक्त, समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत; हे महादेव, यदि आपको मुझसे प्रेम है तो ऐसा करो।'
श्लोक 14 (skanda.8.72.14)
एवमुक्तस्तदा देव्या देवदेवस्त्रिलोचनः । प्रोवाचेदं महातेजा देव्याः प्रियचिकीर्षया
evamuktastadā devyā devadevastrilocanaḥ | provācedaṁ mahātejā devyāḥ priyacikīrṣayā
देवी द्वारा ऐसा कहे जाने पर, त्रिनेत्र देवदेव, महातेजस्वी, देवी को प्रसन्न करने की इच्छा से यह बोले -
श्लोक 15 (skanda.8.72.15)
एवं भवतु देवेशे विज्ञप्तिं सफलामिमाम् । करिष्यामि तवेशानि पुत्रस्ते स भवेद्यथा
evaṁ bhavatu deveśe vijñaptiṁ saphalāmimām | kariṣyāmi taveśāni putraste sa bhavedyathā
'ऐसा ही हो, हे देवेश्वरी; मैं तुम्हारी यह विज्ञप्ति सफल करूँगा। हे ईशानी, मैं ऐसा करूँगा कि तुम्हें पुत्र प्राप्त हो -'
श्लोक 16 (skanda.8.72.16)
श्रेष्ठः सर्वसुरेशानां महायोगबलान्वितः । कृत्स्नं जगदिदं यस्य वशे स्थास्यति भामिनि
śreṣṭhaḥ sarvasureśānāṁ mahāyogabalānvitaḥ | kṛtsnaṁ jagadidaṁ yasya vaśe sthāsyati bhāmini
'-समस्त देवेशों में श्रेष्ठ, महायोग-बल से युक्त; हे भामिनी, यह संपूर्ण जगत् जिसके वश में रहेगा।'
श्लोक 17 (skanda.8.72.17)
गच्छन्त्या तत् तपः कर्त्तुं वरः पूर्वमपि त्वया । प्रार्थितो ह्येष पुत्रार्थं तेनावश्यं ददामि ते
gacchantyā tat tapaḥ karttuṁ varaḥ pūrvamapi tvayā | prārthito hyeṣa putrārthaṁ tenāvaśyaṁ dadāmi te
'तपस्या करने जाते समय पहले भी तुमने पुत्र के लिए यही वर माँगा था; इसलिए मैं अवश्य तुम्हें यह देता हूँ।'
श्लोक 18 (skanda.8.72.18)
एवमुक्त्वा तु तौ देवौ गिरिजाभुवनेश्वरौ । नन्दीशेन तदा सार्धं विचरन्तौ जगद्गुरू
evamuktvā tu tau devau girijābhuvaneśvarau | nandīśena tadā sārdhaṁ vicarantau jagadgurū
ऐसा कहकर वे दोनों देव, गिरिजा और भुवनेश्वर, जगद्गुरु, नंदीश के साथ विचरण करते हुए,
श्लोक 19 (skanda.8.72.19)
सर्वोद्यानानि पश्यन्तौ विन्ध्यमाजग्मतुर्गिरिम् । अथागम्य तु विन्ध्यस्य सौवर्णं शिखरोत्तमम्
sarvodyānāni paśyantau vindhyamājagmaturgirim | athāgamya tu vindhyasya sauvarṇaṁ śikharottamam
-समस्त उद्यानों को देखते हुए विंध्य पर्वत पर आए। फिर विंध्य के उत्तम स्वर्णिम शिखर पर पहुँचकर,
श्लोक 20 (skanda.8.72.20)
दरीकन्दरसंकीर्णं नानानिर्झरसंयुतम् । सतडिन्मेघसंघात घनीकृतशिलोच्चयम्
darīkandarasaṁkīrṇaṁ nānānirjharasaṁyutam | sataḍinmeghasaṁghāta ghanīkṛtaśiloccayam
-गुफाओं-कंदराओं से भरे, अनेक निर्झरों से युक्त, बिजली सहित मेघ-समूहों से सघन शिला-राशि वाले,
श्लोक 21 (skanda.8.72.21)
नानावृक्षशिलोपेतं नानाकुसुमसंयुतम् । नानाखगरवामोदं हेमरत्नोज्ज्वलं शुभम्
nānāvṛkṣaśilopetaṁ nānākusumasaṁyutam | nānākhagaravāmodaṁ hemaratnojjvalaṁ śubham
-अनेक वृक्षों और शिलाओं से युक्त, अनेक पुष्पों से भरे, अनेक पक्षियों के कलरव से मनोहर, स्वर्ण-रत्नों से उज्ज्वल, शुभ शिखर पर,
श्लोक 22 (skanda.8.72.22)
मानसं तस्य मध्ये तु पुरं सृष्ट्वा महर्द्धिमत् । मणिहेममयं दिव्यं देवासुरविमोहनम्
mānasaṁ tasya madhye tu puraṁ sṛṣṭvā maharddhimat | maṇihemamayaṁ divyaṁ devāsuravimohanam
-उसके मध्य में, मानसिक संकल्प मात्र से, उन्होंने महाऐश्वर्यशाली, दिव्य, मणि-स्वर्णमय, देव-असुरों को भी मोहित करने वाला नगर रचा।
श्लोक 23 (skanda.8.72.23)
परमैश्वर्यसंयुक्तौ युतौ विविशतुः पुरम् । नन्दिनञ्च ततो देवी समाज्ञापयदव्यया
paramaiśvaryasaṁyuktau yutau viviśatuḥ puram | nandinañca tato devī samājñāpayadavyayā
परम ऐश्वर्य से युक्त वे दोनों उस नगर में प्रविष्ट हुए; और तब अव्यया देवी ने नंदी को आज्ञा दी -
श्लोक 24 (skanda.8.72.24)
वत्स नन्दिन् तथा द्वारे तिष्ठेस्त्वं गणपेश्वर । विशेन्नेह वथा कश्चित् सूक्ष्मो वायुरपि स्थितः
vatsa nandin tathā dvāre tiṣṭhestvaṁ gaṇapeśvara | viśenneha vathā kaścit sūkṣmo vāyurapi sthitaḥ
'हे वत्स नंदी, हे गणपेश्वर, तुम द्वार पर इस प्रकार खड़े रहो कि यहाँ कोई भी, सूक्ष्म वायु भी, प्रवेश न कर सके।'
श्लोक 25 (skanda.8.72.25)
कृत्वा शिरसि तामाज्ञां नन्दीशो गणपाधिपः । अभवद् द्वारमूलस्थः कृत्वा तेजोतिदुस्सहम्
kṛtvā śirasi tāmājñāṁ nandīśo gaṇapādhipaḥ | abhavad dvāramūlasthaḥ kṛtvā tejotidussaham
उस आज्ञा को शिरोधार्य करके, गणाधिप नंदीश ने अत्यंत असहनीय तेज धारण करके द्वार-मूल पर स्थान ग्रहण किया।
श्लोक 26 (skanda.8.72.26)
योगयुक्तौ तदा देवौ परां मूर्त्तिं समास्थितौ । कृत्स्नस्य जगतो योनी पार्वतीभुवनेश्वरौ
yogayuktau tadā devau parāṁ mūrttiṁ samāsthitau | kṛtsnasya jagato yonī pārvatībhuvaneśvarau
तब योगयुक्त वे दोनों देव अपने परम स्वरूप में स्थित हुए - पार्वती और भुवनेश्वर, संपूर्ण जगत् के उद्गम-स्रोत।
श्लोक 27 (skanda.8.72.27)
तस्थतुः सुचिरं कालं तनयार्थं महाद्युती । स न शक्यो मया वक्तुं ब्रह्मणा वा महामुने
tasthatuḥ suciraṁ kālaṁ tanayārthaṁ mahādyutī | sa na śakyo mayā vaktuṁ brahmaṇā vā mahāmune
वे दोनों महातेजस्वी पुत्र-प्राप्ति के लिए दीर्घ काल तक इसी प्रकार रहे - जिसका वर्णन, हे महामुने, मेरे द्वारा या स्वयं ब्रह्मा द्वारा भी नहीं किया जा सकता।
श्लोक 28 (skanda.8.72.28)
सुयोगो योभवद् देव्या देवदेवस्य शूलिनः । ब्रह्मणो मद्विधानाञ्च श्रेष्ठोसौ परमेश्वरः
suyogo yobhavad devyā devadevasya śūlinaḥ | brahmaṇo madvidhānāñca śreṣṭhosau parameśvaraḥ
देवी और शूलधारी देवदेव का जो यह श्रेष्ठ योग हुआ, वह परमेश्वर ब्रह्मा से और मुझ जैसों से भी श्रेष्ठ है।
श्लोक 29 (skanda.8.72.29)
अवश्यं त्वागमे वाच्यं यथावृत्तं यथाश्रुतम् । अतो वक्ष्यामि ते व्यास प्रियः शिष्यश्च मे भवान्
avaśyaṁ tvāgame vācyaṁ yathāvṛttaṁ yathāśrutam | ato vakṣyāmi te vyāsa priyaḥ śiṣyaśca me bhavān
फिर भी आगम में इसे अवश्य कहा जाना चाहिए, जैसा हुआ और जैसा सुना गया; अतः हे व्यास, मैं तुम्हें बताता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय शिष्य हो।
श्लोक 30 (skanda.8.72.30)
योगसन्धानमास्थाय तयोरेवं महामुने । अतीतं स्थितयोर्दिव्यं सहस्रं शरदामभूत्
yogasandhānamāsthāya tayorevaṁ mahāmune | atītaṁ sthitayordivyaṁ sahasraṁ śaradāmabhūt
हे महामुने, इस प्रकार योग-संधान में स्थित उन दोनों के, इसी अवस्था में रहते हुए, एक सहस्र दिव्य शरद् बीत गईं।
श्लोक 31 (skanda.8.72.31)
ततोभवन्निमित्तानि घोराणि त्रासनानि च । चचाल पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानना
tatobhavannimittāni ghorāṇi trāsanāni ca | cacāla pṛthivī kṛtsnā saśailavanakānanā
तब भयंकर, त्रासजनक शकुन उत्पन्न होने लगे; पर्वतों और वन-कुंजों सहित समस्त पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 32 (skanda.8.72.32)
नद्यः शोषं तदा जग्मुश्चुक्षुभे सरितां पतिः । तपनो निष्प्रभश्चासीद् ववावुष्णः समीरणः
nadyaḥ śoṣaṁ tadā jagmuścukṣubhe saritāṁ patiḥ | tapano niṣprabhaścāsīd vavāvuṣṇaḥ samīraṇaḥ
नदियाँ सूखने लगीं; सरितों के स्वामी (समुद्र) क्षुब्ध हो उठे; सूर्य निस्तेज हो गया; और उष्ण वायु बहने लगी।
श्लोक 33 (skanda.8.72.33)
पेतुरुल्का महाघोरा दिशश्चासन्सुदारुणाः । एवमुत्पातवित्रस्ता शुभहेतोर्वसुन्धरा
peturulkā mahāghorā diśaścāsansudāruṇāḥ | evamutpātavitrastā śubhahetorvasundharā
महाभयंकर उल्काएँ गिरने लगीं, और दिशाएँ अत्यंत भयावह हो गईं। इस प्रकार शुभ हेतु से उत्पन्न इन उत्पातों से त्रस्त हुई वसुधा,
श्लोक 34 (skanda.8.72.34)
जगाम शरणं विष्णुं गत्वा चार्त्तिं न्यवेदयत् । उत्पाता दारुणा देव बभूवुर्बहवो भृशम्
jagāma śaraṇaṁ viṣṇuṁ gatvā cārttiṁ nyavedayat | utpātā dāruṇā deva babhūvurbahavo bhṛśam
-विष्णु की शरण में गई, और जाकर अपना कष्ट सुनाया - 'हे देव, अत्यंत भयंकर उत्पात बहुत अधिक हो गए हैं,'
श्लोक 35 (skanda.8.72.35)
तेनातीव समुद्विग्ना त्वामद्य शरणं गता । अथ विष्णुः सुरान्सर्वानिदमश्रावयत् प्रभुः
tenātīva samudvignā tvāmadya śaraṇaṁ gatā | atha viṣṇuḥ surānsarvānidamaśrāvayat prabhuḥ
'-जिनसे मैं अत्यंत व्याकुल हूँ; आज मैं आपकी शरण में आई हूँ।' तब प्रभु विष्णु ने समस्त देवताओं को यह सुनाया -
श्लोक 36 (skanda.8.72.36)
ततो दिवौकसः सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः । एकत्र संगता भूत्वा चक्रुर्बहुविधाः कथाः
tato divaukasaḥ sarve bṛhaspatipurogamāḥ | ekatra saṁgatā bhūtvā cakrurbahuvidhāḥ kathāḥ
तब बृहस्पति के नेतृत्व में समस्त स्वर्गवासी एक स्थान पर एकत्र होकर विविध प्रकार की चर्चा करने लगे।
श्लोक 37 (skanda.8.72.37)
महाबुद्धिरथाहेदं वाक्यमङ्गिरसः सुतः । श्रीकण्ठो भगवानेष देवदेवस्त्रिलोचनः
mahābuddhirathāhedaṁ vākyamaṅgirasaḥ sutaḥ | śrīkaṇṭho bhagavāneṣa devadevastrilocanaḥ
तब अंगिरा-पुत्र (बृहस्पति) ने महाबुद्धिमत्तापूर्वक यह वचन कहा - 'यह भगवान् श्रीकंठ, त्रिनेत्र देवदेव,'
श्लोक 38 (skanda.8.72.38)
युक्तोभूद्धिमवत्पुत्र्या तनयार्थं महाद्युतिः । दिव्यं वर्षसहस्रन्तु योगेन परमेष्ठिनः
yuktobhūddhimavatputryā tanayārthaṁ mahādyutiḥ | divyaṁ varṣasahasrantu yogena parameṣṭhinaḥ
'-महातेजस्वी, हिमवत्-पुत्री से पुत्र-प्राप्ति के लिए, परमेष्ठी के योग से, एक सहस्र दिव्य वर्षों से युक्त हुए हैं।'
श्लोक 39 (skanda.8.72.39)
अगाद्युक्तस्य पार्वत्या बभूवुर्दारुणास्ततः । उत्पाता जगतस्त्रासाश्चिन्त्यते किमिहापरम्
agādyuktasya pārvatyā babhūvurdāruṇāstataḥ | utpātā jagatastrāsāścintyate kimihāparam
'पार्वती से युक्त हुए उनसे जगत् के लिए भयंकर उत्पात और त्रास उत्पन्न हुए हैं - यहाँ और क्या सोचा जाए?'
श्लोक 40 (skanda.8.72.40)
गच्छाम सहिताः सर्वे स्तोतुं भक्त्या वृषध्वजम् । यथा च देहजः पुत्रो भवेद् देव्याः सुरेश्वराः
gacchāma sahitāḥ sarve stotuṁ bhaktyā vṛṣadhvajam | yathā ca dehajaḥ putro bhaved devyāḥ sureśvarāḥ
'हम सब मिलकर वृषभध्वज की भक्तिपूर्वक स्तुति करने चलें; और, हे सुरेश्वरो, हम ऐसा करें कि देवी को अपना पुत्र प्राप्त हो,'
श्लोक 41 (skanda.8.72.41)
विज्ञापयाम देवेशं तथा शीघ्रमिहामराः । ततो वैवस्वतः प्राह वचः क्रोधाभिनिःसृतम्
vijñāpayāma deveśaṁ tathā śīghramihāmarāḥ | tato vaivasvataḥ prāha vacaḥ krodhābhiniḥsṛtam
'-हे अमरो, इस प्रकार शीघ्र देवेश से विनती करें।' तब वैवस्वत (सूर्यपुत्र) ने क्रोध से उत्पन्न वचन कहा -
श्लोक 42 (skanda.8.72.42)
किमर्थं भृशमुद्विग्ना भवन्तस्सर्व एव हि । यद्यसौ देवदेवस्य तनयोस्मासु भक्तिमान्
kimarthaṁ bhṛśamudvignā bhavantassarva eva hi | yadyasau devadevasya tanayosmāsu bhaktimān
'तुम सब इतने अधिक व्याकुल क्यों हो? यदि यह देवदेव का पुत्र हम पर भक्ति रखने वाला हुआ,'
श्लोक 43 (skanda.8.72.43)
उत्पत्स्यति न च द्रोग्धा ततः क्षंस्याम तं सुराः । अथ चेत्कर्कशोस्मासु द्रोग्धा वा स भविष्यति
utpatsyati na ca drogdhā tataḥ kṣaṁsyāma taṁ surāḥ | atha cetkarkaśosmāsu drogdhā vā sa bhaviṣyati
'-और उत्पन्न होकर हमारा द्रोही नहीं हुआ, तो, हे देवो, हम उसे सहन कर लेंगे; परंतु यदि वह हमारे प्रति कठोर या द्रोही हुआ,'
श्लोक 44 (skanda.8.72.44)
तत एनमहं बद्ध्वा कालपाशेन बालकम् । न चेत्पुरन्दरो वज्रं तस्य क्षेप्स्यति मूर्धनि । द्विधा येन कृतो मूढः प्राणांस्त्यक्ष्यति दुस्त्यजान्
tata enamahaṁ baddhvā kālapāśena bālakam | na cetpurandaro vajraṁ tasya kṣepsyati mūrdhani | dvidhā yena kṛto mūḍhaḥ prāṇāṁstyakṣyati dustyajān
'-तो मैं स्वयं उस बालक को कालपाश से बाँध दूँगा; और यदि इंद्र उसके सिर पर वज्र नहीं फेंकेंगे, जिससे दो टुकड़े हुआ वह मूर्ख अपने कठिन त्यागे जाने वाले प्राणों को त्याग दे -'
श्लोक 45 (skanda.8.72.45)
ब्रुवतस्तस्य बह्वेवं क्रोधसंरक्तलोचनः । विष्णुः प्रोवाच धर्मात्मा वचांसि परमार्थवित्
bruvatastasya bahvevaṁ krodhasaṁraktalocanaḥ | viṣṇuḥ provāca dharmātmā vacāṁsi paramārthavit
-इस प्रकार उसके बहुत कुछ कहते समय, धर्मात्मा, परमार्थ के ज्ञाता विष्णु ने, क्रोध से लाल नेत्रों वाले होकर, ये वचन कहे -
श्लोक 46 (skanda.8.72.46)
अहो त्वया सुविश्रब्धं प्रोच्यते भास्करात्मज । परमार्थमविज्ञाय क्रोधस्य वशवर्तिना
aho tvayā suviśrabdhaṁ procyate bhāskarātmaja | paramārthamavijñāya krodhasya vaśavartinā
'अहो, हे भास्करात्मज, तुम कितने निःशंक होकर बोल रहे हो, परमार्थ को न जानते हुए, क्रोध के वशीभूत होकर!'
श्लोक 47 (skanda.8.72.47)
तनयः किल यः शम्भोर्गिरिजायां भविष्यति । स मूढ इव यः कश्चिद् भविता वशगस्तव
tanayaḥ kila yaḥ śambhorgirijāyāṁ bhaviṣyati | sa mūḍha iva yaḥ kaścid bhavitā vaśagastava
'जो पुत्र शंभु का गिरिजा से उत्पन्न होगा, क्या वह कोई मूर्ख होगा जो तुम्हारे वश में हो जाए?'
श्लोक 48 (skanda.8.72.48)
किमसौ मानवोन्यो वा जन्म मृत्युसमन्वितः । उत्पत्स्यति रवेः पुत्र येन स्याद्वशगस्तव
kimasau mānavonyo vā janma mṛtyusamanvitaḥ | utpatsyati raveḥ putra yena syādvaśagastava
'हे रविपुत्र, क्या वह कोई मानव या जन्म-मृत्युयुक्त अन्य प्राणी उत्पन्न होगा, जो तुम्हारे वश में हो?'
श्लोक 49 (skanda.8.72.49)
कालेनापरिपूर्णेन मानवस्यापि भानुज । न त्वं नाशयिता नाम किमु पुत्रस्य शूलिनः
kālenāparipūrṇena mānavasyāpi bhānuja | na tvaṁ nāśayitā nāma kimu putrasya śūlinaḥ
'हे भानुज, अपरिपूर्ण काल वाले मानव को भी तुम नाश नहीं कर सकते - फिर शूलधारी के पुत्र की तो बात ही क्या!'
श्लोक 50 (skanda.8.72.50)
तेजो भगवतः शम्भोर्यद् भविष्यत्यनुत्तमम् । स कथं वध्यतां यायात् तव शक्रस्य वो विभो
tejo bhagavataḥ śambhoryad bhaviṣyatyanuttamam | sa kathaṁ vadhyatāṁ yāyāt tava śakrasya vo vibho
'भगवान् शंभु का जो वह सर्वोत्तम तेज उत्पन्न होगा, वह भला तुम्हारे, या इंद्र के, या किसी भी विभु के द्वारा वध्य कैसे हो सकता है?'
श्लोक 51 (skanda.8.72.51)
ब्रवीमि वो हितं देवाः क्रियते यदि मद्वचः । प्रयाम सहितास्सर्वे तं प्रसादयितुं हरम्
bravīmi vo hitaṁ devāḥ kriyate yadi madvacaḥ | prayāma sahitāssarve taṁ prasādayituṁ haram
'हे देवो, मैं तुम्हारे हित की बात कहता हूँ, यदि मेरा वचन माना जाए: हम सब मिलकर हर को प्रसन्न करने चलें।'
श्लोक 52 (skanda.8.72.52)
यो नः स्वयंवरे दत्तो वरस्तिष्ठति शङ्करे । तमेव वरयिष्यामो वरमग्र्यं पिनाकिनम्
yo naḥ svayaṁvare datto varastiṣṭhati śaṅkare | tameva varayiṣyāmo varamagryaṁ pinākinam
'जो वर हमें स्वयंवर में दिया गया था, जो शंकर के पास सुरक्षित है, वही श्रेष्ठ वर हम पिनाकी से माँगेंगे,'
श्लोक 53 (skanda.8.72.53)
यथा न देहजो देव्यास्तनयः संभविष्यति । नास्माकमहितं शम्भुः पुत्रमुत्पादयिष्यति
yathā na dehajo devyāstanayaḥ saṁbhaviṣyati | nāsmākamahitaṁ śambhuḥ putramutpādayiṣyati
'-अर्थात्, देवी के शरीर से पुत्र उत्पन्न न हो; शंभु हमारे लिए अहितकर पुत्र उत्पन्न न करें।'
श्लोक 54 (skanda.8.72.54)
वयमेव सुतास्सर्वे शङ्करस्याग्रजा विभोः । न शक्यस्तपसा द्रष्टुं न ज्ञानेन सुरेश्वराः
vayameva sutāssarve śaṅkarasyāgrajā vibhoḥ | na śakyastapasā draṣṭuṁ na jñānena sureśvarāḥ
'हम सब ही मानो प्रभु शंकर के ज्येष्ठ पुत्र हैं। हे सुरेश्वरो, वे न तप से देखे जा सकते हैं, न ज्ञान से।'
श्लोक 55 (skanda.8.72.55)
भक्त्या परमया द्रष्टुं शक्यः स्यात्स वृषध्वजः । आगच्छध्वं गमिष्यामो यत्र तिष्ठति शङ्करः
bhaktyā paramayā draṣṭuṁ śakyaḥ syātsa vṛṣadhvajaḥ | āgacchadhvaṁ gamiṣyāmo yatra tiṣṭhati śaṅkaraḥ
'वह वृषभध्वज केवल परम भक्ति से ही देखे जा सकते हैं। आओ, चलें जहाँ शंकर स्थित हैं।'
श्लोक 56 (skanda.8.72.56)
परां भक्तिं समास्थाय यथा पश्येय शङ्करम् । हुतभुक् चैव नो देवस्तत्सकाशं प्रवेक्ष्यति
parāṁ bhaktiṁ samāsthāya yathā paśyeya śaṅkaram | hutabhuk caiva no devastatsakāśaṁ pravekṣyati
'ऐसा हो कि हम परम भक्ति धारण करके शंकर का दर्शन कर सकें। और अग्निदेव हमारे बीच से उनके समीप प्रवेश करेंगे।'
श्लोक 57 (skanda.8.72.57)
सर्वेषामेव विज्ञप्त्या सुराणां सुरसत्तमाः । इति श्रुत्वा वचस्तस्य विष्णोरमिततेजसः
sarveṣāmeva vijñaptyā surāṇāṁ surasattamāḥ | iti śrutvā vacastasya viṣṇoramitatejasaḥ
'-समस्त देवताओं की विनती से, हे देवश्रेष्ठो।' अपरिमित तेजस्वी विष्णु का यह वचन सुनकर,
श्लोक 58 (skanda.8.72.58)
बृहस्पतिपुरोगास्ते हृष्टात्मानो दिवौकसः । साधुसाध्विति सन्तुष्टा वचांस्यूचुः सुरोत्तमाः
bṛhaspatipurogāste hṛṣṭātmāno divaukasaḥ | sādhusādhviti santuṣṭā vacāṁsyūcuḥ surottamāḥ
बृहस्पति के नेतृत्व में वे स्वर्गवासी, प्रसन्नचित्त होकर, संतुष्ट होकर, वे श्रेष्ठ देवगण 'साधु, साधु' कहते हुए बोले -
श्लोक 59 (skanda.8.72.59)
ततो विष्णुसहायांस्ते गत्वा तच्छृंगमुत्तमम् । ऊचुर्हुताशनं देवं वचः स्तुतिपुरस्सरम्
tato viṣṇusahāyāṁste gatvā tacchṛṁgamuttamam | ūcurhutāśanaṁ devaṁ vacaḥ stutipurassaram
तब वे विष्णु सहित उस उत्तम शिखर पर जाकर, स्तुतिपूर्वक अग्निदेव से यह वचन कहने लगे -
श्लोक 60 (skanda.8.72.60)
त्वमग्ने सर्वदेवानां हितकृत्सर्वतोव्ययः । प्रविश्य त्राहि नः सर्वाञ्छङ्कराय निवेदय
tvamagne sarvadevānāṁ hitakṛtsarvatovyayaḥ | praviśya trāhi naḥ sarvāñchaṅkarāya nivedaya
'हे अग्नि, तुम समस्त देवताओं के हितकारी, सब प्रकार से अव्यय हो; भीतर प्रवेश करके हम सबकी रक्षा करो और शंकर को हमारी बात बताओ।'
श्लोक 61 (skanda.8.72.61)
तथा कुर्यास्सुरश्रेष्ठ येन निर्गम्य शङ्करः । अस्मान्निरीक्षते देवः प्रह्वान् भक्तिमतः स्थितान्
tathā kuryāssuraśreṣṭha yena nirgamya śaṅkaraḥ | asmānnirīkṣate devaḥ prahvān bhaktimataḥ sthitān
'हे देवश्रेष्ठ, ऐसा करो कि शंकर बाहर आकर, विनम्र और भक्तिपूर्वक खड़े हम सबका अवलोकन करें।'
श्लोक 62 (skanda.8.72.62)
इत्युक्तस्स सुरैस्सर्वैः प्रत्युवाच हुताशनः । अकर्तव्यं हि मे देवा न युष्मान्प्रति विद्यते
ityuktassa suraissarvaiḥ pratyuvāca hutāśanaḥ | akartavyaṁ hi me devā na yuṣmānprati vidyate
समस्त देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर अग्नि ने उत्तर दिया - 'हे देवो, तुम्हारे लिए मेरे लिए कुछ भी अकरणीय नहीं है।'
श्लोक 63 (skanda.8.72.63)
पार्वत्या सह संयुक्तं देवदेवेश्वरं परम् । न मे शक्तिर्हरं द्रष्टुं भवन्तश्चाकुला भृशम्
pārvatyā saha saṁyuktaṁ devadeveśvaraṁ param | na me śaktirharaṁ draṣṭuṁ bhavantaścākulā bhṛśam
'फिर भी पार्वती के साथ संयुक्त उस परम देवेश्वर हर को देखने की मुझमें शक्ति नहीं है - और तुम सब भी अत्यंत व्याकुल हो।'
श्लोक 64 (skanda.8.72.64)
युष्मद्वाक्यमलड्घ्यञ्च कृच्छ्रमेतदतीव मे । प्रवेक्ष्ये दूतवद्देवाः करिष्ये साहसं महत् । इत्युक्त्वा स जगामाशु भवनं तत्कपर्दिनः
yuṣmadvākyamalaḍghyañca kṛcchrametadatīva me | pravekṣye dūtavaddevāḥ kariṣye sāhasaṁ mahat | ityuktvā sa jagāmāśu bhavanaṁ tatkapardinaḥ
'फिर भी तुम्हारा वचन टाला नहीं जा सकता, यद्यपि यह मेरे लिए अत्यंत कठिन है। हे देवो, मैं दूत के समान प्रवेश करूँगा, यह बड़ा साहस करूँगा।' ऐसा कहकर वह शीघ्र कपर्दी (शिव) के भवन में गया।
श्लोक 65 (skanda.8.72.65)
तत्रापश्यत् स्थितं द्वारे नन्दिनं परमौजसम् । द्वारमाक्रम्य तिष्ठन्तं दीप्तपट्टिशधारिणम्
tatrāpaśyat sthitaṁ dvāre nandinaṁ paramaujasam | dvāramākramya tiṣṭhantaṁ dīptapaṭṭiśadhāriṇam
वहाँ उसने द्वार पर खड़े परम तेजस्वी नंदी को देखा, जो द्वार को घेरे हुए, चमकते पट्टिश को धारण किए खड़े थे।
श्लोक 66 (skanda.8.72.66)
तं दृष्ट्वा स तदा वह्निः समालोक्य समन्ततः । नास्ति कश्चिदिहोपायः सूक्ष्मजन्तोरपि स्थिते
taṁ dṛṣṭvā sa tadā vahniḥ samālokya samantataḥ | nāsti kaścidihopāyaḥ sūkṣmajantorapi sthite
उसे देखकर अग्नि ने तब चारों ओर देखते हुए सोचा - 'यहाँ कोई उपाय नहीं है, यहाँ तो सूक्ष्म जंतु के लिए भी नहीं, जब यह खड़ा है,'
श्लोक 67 (skanda.8.72.67)
प्रवेष्टुमिति सञ्चिन्त्य तमेव शरणं ययौ । नन्दिनं हुतभुग् देवस्तुष्टाव च कृताञ्जलिः
praveṣṭumiti sañcintya tameva śaraṇaṁ yayau | nandinaṁ hutabhug devastuṣṭāva ca kṛtāñjaliḥ
-प्रवेश करने का।' ऐसा विचार करके वह उसी की शरण में गया; और अग्निदेव ने अंजलि जोड़कर नंदी की स्तुति की -
श्लोक 68 (skanda.8.72.68)
नमो गणाधिपतये नमश्चण्डाय शूलिने । नमस्सेनाधिपतये नमः शर्वात्मने सदा
namo gaṇādhipataye namaścaṇḍāya śūline | namassenādhipataye namaḥ śarvātmane sadā
'गणाधिपति को नमस्कार, शूलधारी चंड को नमस्कार; सेनापति को नमस्कार, सदा शर्व-स्वरूप को नमस्कार,'
श्लोक 69 (skanda.8.72.69)
हालाहलाय रुद्राय नीलरुद्राय वै नमः । नमस्ते स्वप्नरुद्राय भस्मरुद्राय ते नमः । नमः श्मशानरुद्राय कोटीरुद्राय ते नमः
hālāhalāya rudrāya nīlarudrāya vai namaḥ | namaste svapnarudrāya bhasmarudrāya te namaḥ | namaḥ śmaśānarudrāya koṭīrudrāya te namaḥ
'-हालाहल रुद्र को, नीलरुद्र को नमस्कार; स्वप्नरुद्र को, भस्मरुद्र को नमस्कार; श्मशानरुद्र को, कोटिरुद्र को नमस्कार,'
श्लोक 70 (skanda.8.72.70)
नमः पिङ्गलरुद्राय रुद्राधिपतये नमः । नमः प्रमथरुद्राय भूतरुद्राय ते नमः
namaḥ piṅgalarudrāya rudrādhipataye namaḥ | namaḥ pramatharudrāya bhūtarudrāya te namaḥ
'-पिंगलरुद्र को, रुद्राधिपति को नमस्कार; प्रमथरुद्र को, भूतरुद्र को नमस्कार,'
श्लोक 71 (skanda.8.72.71)
विरूपाक्षाय रुद्राय श्वेतरुद्राय ते नमः । नमस्ते सततं देव नमस्ते सततं शिव
virūpākṣāya rudrāya śvetarudrāya te namaḥ | namaste satataṁ deva namaste satataṁ śiva
'-विरूपाक्ष रुद्र को, श्वेतरुद्र को नमस्कार; हे देव, तुम्हें सदा नमस्कार, हे शिव, तुम्हें सदा नमस्कार,'
श्लोक 72 (skanda.8.72.72)
नमस्ते सततं सौम्य नमस्ते भक्तवत्सल । मम भक्तस्य देव त्वं देवानां हितमिच्छतः
namaste satataṁ saumya namaste bhaktavatsala | mama bhaktasya deva tvaṁ devānāṁ hitamicchataḥ
'-हे सौम्य, तुम्हें सदा नमस्कार, हे भक्तवत्सल, तुम्हें नमस्कार। हे देव, देवताओं का हित चाहने वाले मुझ भक्त पर,'
श्लोक 73 (skanda.8.72.73)
वरदो भव नन्दीश मा नः क्रोधं कृथाः प्रभो । ततो नन्दीश्वरः प्राह स्तुवन्तमनलं स्थितम्
varado bhava nandīśa mā naḥ krodhaṁ kṛthāḥ prabho | tato nandīśvaraḥ prāha stuvantamanalaṁ sthitam
'-वरदाता बनो, हे नंदीश; हे प्रभु, हम पर क्रोध मत करो।' तब नंदीश्वर ने स्तुति करते हुए वहाँ खड़े अग्नि से कहा -
श्लोक 74 (skanda.8.72.74)
प्रीतस्तवानया वह्ने भक्त्याहं सुरसत्तम । ब्रूहि किन्ते प्रियेन्देव करवाणि हुताशन
prītastavānayā vahne bhaktyāhaṁ surasattama | brūhi kinte priyendeva karavāṇi hutāśana
'हे अग्नि, हे देवश्रेष्ठ, मैं तुम्हारी इस भक्ति से प्रसन्न हूँ; हे हुताशन, बताओ तुम्हें क्या प्रिय है, मैं वह करूँगा।'
श्लोक 75 (skanda.8.72.75)
अथ प्रोवाच वह्निस्तं वरदं नन्दिनं स्थितम् । यदि तुष्टोसि मे देव देयो यदि वरश्च मे
atha provāca vahnistaṁ varadaṁ nandinaṁ sthitam | yadi tuṣṭosi me deva deyo yadi varaśca me
तब अग्नि ने वहाँ खड़े वरदाता नंदी से कहा - 'हे देव, यदि तुम मुझसे प्रसन्न हो, और यदि मुझे वर देना है,'
श्लोक 76 (skanda.8.72.76)
देवकार्येण देवेश प्रवेष्टुं दीयतां मम । भवनं देवदेवस्य वर एषोस्तु मे विभो
devakāryeṇa deveśa praveṣṭuṁ dīyatāṁ mama | bhavanaṁ devadevasya vara eṣostu me vibho
'-तो, हे देवेश, देवकार्य के लिए मुझे देवदेव के भवन में प्रवेश की अनुमति दो; हे विभो, यही मेरा वर हो।'
श्लोक 77 (skanda.8.72.77)
तं नन्दी प्रत्युवाचेदं कृच्छ्रं देयो वरो ह्ययम् । न तं शक्ष्यसि देवेशं द्रष्टुं त्वं योगमास्थितम्
taṁ nandī pratyuvācedaṁ kṛcchraṁ deyo varo hyayam | na taṁ śakṣyasi deveśaṁ draṣṭuṁ tvaṁ yogamāsthitam
नंदी ने उससे कहा - 'यह वर जो देना है, कठिन है; तुम उस देवेश को, जो योग में स्थित हैं, देख नहीं सकोगे,'
श्लोक 78 (skanda.8.72.78)
सह देव्या महेशानं स्रष्टारं जगतोव्ययम् । तथाप्येष मया तुभ्यं देय एव वरोनल
saha devyā maheśānaṁ sraṣṭāraṁ jagatovyayam | tathāpyeṣa mayā tubhyaṁ deya eva varonala
'-देवी सहित महेश को, जो अव्यय जगत्-स्रष्टा हैं। फिर भी, हे अनल, यह वर मुझे तुम्हें देना ही है।'
श्लोक 79 (skanda.8.72.79)
गच्छ सूक्ष्मतरो भूत्वा दुरालक्ष्यो हुताशन । प्रविश्य निष्क्रम क्षिप्रमविज्ञातागमक्रियः
gaccha sūkṣmataro bhūtvā durālakṣyo hutāśana | praviśya niṣkrama kṣipramavijñātāgamakriyaḥ
'हे हुताशन, अत्यंत सूक्ष्म, कठिनता से दिखाई देने वाले होकर जाओ; प्रवेश करके शीघ्र निकल आओ, तुम्हारे आगमन की क्रिया किसी को ज्ञात न हो।'
श्लोक 80 (skanda.8.72.80)
स नन्दिनाभ्यनुज्ञातो जातवेदा मुदा युतः । ज्योतिः सूक्ष्मतरो भूत्वा भास्करस्यांशुना सह
sa nandinābhyanujñāto jātavedā mudā yutaḥ | jyotiḥ sūkṣmataro bhūtvā bhāskarasyāṁśunā saha
नंदी से अनुमति पाकर, जातवेदा (अग्नि), प्रसन्न होकर, अत्यंत सूक्ष्म ज्योति बनकर, सूर्य की एक किरण के साथ,
श्लोक 81 (skanda.8.72.81)
प्रविश्य भवनं शम्भोर्मणिस्तम्भमथाविशत् । वाह्नेयमणिमध्यस्थं स्तम्भं तं भासयन् मुहुः
praviśya bhavanaṁ śambhormaṇistambhamathāviśat | vāhneyamaṇimadhyasthaṁ stambhaṁ taṁ bhāsayan muhuḥ
शंभु के भवन में प्रवेश करके एक मणि-स्तंभ में प्रविष्ट हो गया, और उस अग्नि-मणि के मध्य स्थित होकर, बार-बार उस स्तंभ को प्रकाशित करने लगा।
श्लोक 82 (skanda.8.72.82)
सोपश्यत्तत्र देवेशं देवीञ्च भुवनेश्वरीम् । तुष्टाव मनसा देवौ ततोसौ हव्यवाहनः
sopaśyattatra deveśaṁ devīñca bhuvaneśvarīm | tuṣṭāva manasā devau tatosau havyavāhanaḥ
वहाँ उसने देवेश और भुवनेश्वरी देवी को देखा; तब उस हव्यवाहन (अग्नि) ने मन ही मन उन दोनों देवों की स्तुति की।
श्लोक 83 (skanda.8.72.83)
तथा संस्तूयमानश्च प्रीतिं देव्याश्च दर्शयन् । वीक्ष्य स्तभ्भं हरो देवीं वाक्यमेतदभाषत
tathā saṁstūyamānaśca prītiṁ devyāśca darśayan | vīkṣya stabhbhaṁ haro devīṁ vākyametadabhāṣata
इस प्रकार स्तुति किए जाते हुए, और देवी के प्रति स्नेह दिखाते हुए, हर ने उस स्तंभ को देखकर देवी से यह वचन कहा -
श्लोक 84 (skanda.8.72.84)
एष स्तम्भमणिर्देवि भ्राजमान इव प्रिये । संस्तौति मां त्वया सार्धं ददान्यस्मै वरं शुभम्
eṣa stambhamaṇirdevi bhrājamāna iva priye | saṁstauti māṁ tvayā sārdhaṁ dadānyasmai varaṁ śubham
'हे देवी, हे प्रिये, यह स्तंभ-मणि मानो चमकते हुए तुम्हारे साथ मेरी स्तुति कर रहा है; मैं इसे शुभ वर दूँ।'
श्लोक 85 (skanda.8.72.85)
देव्युवाच । एवं कुरु महादेव भक्तस्यास्य सुरेश्वर । स्तुवतस्त्वा मया सार्धं प्रयच्छ वरमुत्तमम्
devyuvāca | evaṁ kuru mahādeva bhaktasyāsya sureśvara | stuvatastvā mayā sārdhaṁ prayaccha varamuttamam
देवी ने कहा - 'ऐसा ही करो, हे महादेव, हे सुरेश्वर; अपने इस भक्त को, जो मेरे साथ तुम्हारी स्तुति कर रहा है, उत्तम वर दो।'
श्लोक 86 (skanda.8.72.86)
देवदेव उवाच । प्रीतोहं मणिमध्यस्थ भक्त्या ते विनयेन च । ब्रूहि कार्यं यथेष्टं त्वं तत्सर्वं ते भविष्यति
devadeva uvāca | prītohaṁ maṇimadhyastha bhaktyā te vinayena ca | brūhi kāryaṁ yatheṣṭaṁ tvaṁ tatsarvaṁ te bhaviṣyati
देवदेव ने कहा - 'हे मणि में स्थित, मैं तुम्हारी भक्ति और विनय से प्रसन्न हूँ। अपना इच्छित कार्य कहो; वह सब तुम्हारा होगा।'
श्लोक 87 (skanda.8.72.87)
अग्निरुवाच । देवास्त्वां द्रष्टुमिच्छन्ति बहिःस्था भुवनेश्वर । भगवँस्ते यथा सर्वे पश्येयुस्त्वां तथा कुरु
agniruvāca | devāstvāṁ draṣṭumicchanti bahiḥsthā bhuvaneśvara | bhagava~ste yathā sarve paśyeyustvāṁ tathā kuru
अग्नि ने कहा - 'हे भुवनेश्वर, बाहर खड़े देवगण आपका दर्शन करना चाहते हैं। हे भगवन्, ऐसा करो कि वे सब आपको देख सकें।'
श्लोक 88 (skanda.8.72.88)
देवदेव उवाच । एवमस्तु सुरश्रेष्ठ निर्गत्य त्रिदिवौकसाम् । ददामि दर्शनं वह्ने भवतः प्रियकाम्यया
devadeva uvāca | evamastu suraśreṣṭha nirgatya tridivaukasām | dadāmi darśanaṁ vahne bhavataḥ priyakāmyayā
देवदेव ने कहा - 'ऐसा ही हो, हे देवश्रेष्ठ; बाहर जाकर, हे अग्नि, तुम्हें प्रसन्न करने की इच्छा से मैं त्रिदिवौकसों को दर्शन दूँगा।'
श्लोक 89 (skanda.8.72.89)
तथेति समनुज्ञातो वह्निस्तस्माद् विनिर्गतः । देवेभ्यः कार्यमावेद्य तस्थौ योगं समास्थितः
tatheti samanujñāto vahnistasmād vinirgataḥ | devebhyaḥ kāryamāvedya tasthau yogaṁ samāsthitaḥ
'ऐसा ही हो' कहकर अनुमति पाकर अग्नि वहाँ से निकल आया; और देवताओं को यह बात बताकर, योग में स्थित होकर वहीं ठहर गया।
श्लोक 90 (skanda.8.72.90)
अथ निष्क्रम्य भगवान् देवदेवः पिनाकधृक् । जगाम त्वरितं तत्र यत्र देवाः समासते
atha niṣkramya bhagavān devadevaḥ pinākadhṛk | jagāma tvaritaṁ tatra yatra devāḥ samāsate
तब बाहर आकर, भगवान् देवदेव, पिनाकधारी, शीघ्र वहाँ गए जहाँ देवगण एकत्र थे।
श्लोक 91 (skanda.8.72.91)
अथ दृष्टवा महादेवं देवास्सर्वे वृषध्वजम् । प्रणेमुर्मूर्धभिर्हष्टास्तुष्टुवुश्च मुदा युताः
atha dṛṣṭavā mahādevaṁ devāssarve vṛṣadhvajam | praṇemurmūrdhabhirhaṣṭāstuṣṭuvuśca mudā yutāḥ
तब महादेव वृषभध्वज को देखकर सभी देवगण, प्रसन्न होकर, सिर झुकाकर प्रणाम करने लगे, और आनंदित होकर स्तुति करने लगे -
श्लोक 92 (skanda.8.72.92)
नमस्सहस्रनेत्राय सहस्रचरणाय च । महतां पतये नित्यं देवानां पतये नमः
namassahasranetrāya sahasracaraṇāya ca | mahatāṁ pataye nityaṁ devānāṁ pataye namaḥ
'सहस्रनेत्र को, सहस्रचरण को नमस्कार; महानों के स्वामी को नित्य, देवताओं के स्वामी को नमस्कार,'
श्लोक 93 (skanda.8.72.93)
नमः श्मशानरतये व्याघ्रचर्मसुवाससे । ब्रह्मणश्च शिरोहर्त्रे विष्णोर्वै वरदाय च
namaḥ śmaśānarataye vyāghracarmasuvāsase | brahmaṇaśca śirohartre viṣṇorvai varadāya ca
'-श्मशान-प्रेमी को, व्याघ्रचर्म धारण करने वाले को नमस्कार; ब्रह्मा का शीश हरने वाले को, और विष्णु को वर देने वाले को,'
श्लोक 94 (skanda.8.72.94)
नमो दक्षमखघ्नाय नमस्ते त्र्यम्बकाय च । नमो भूताधिपतये प्रधानमथनाय च
namo dakṣamakhaghnāya namaste tryambakāya ca | namo bhūtādhipataye pradhānamathanāya ca
'-दक्ष-यज्ञ-नाशक को नमस्कार, हे त्र्यंबक, तुम्हें नमस्कार; भूतों के अधिपति को, प्रधान के मंथनकर्ता को नमस्कार,'
श्लोक 95 (skanda.8.72.95)
पिनाकपाणये नित्यं सर्वयोगात्मयोगिने । नमो नीलशिखण्डाय सपत्नीकाय वै नमः
pinākapāṇaye nityaṁ sarvayogātmayogine | namo nīlaśikhaṇḍāya sapatnīkāya vai namaḥ
'-नित्य पिनाकपाणि को, सर्वयोग-स्वरूप योगी को; नीलशिखंड को नमस्कार, पत्नी सहित को नमस्कार,'
श्लोक 96 (skanda.8.72.96)
नमः कामेष्वसक्ताय कामसक्ताय वै नमः । नमस्सर्वाय शर्वाय दण्डिने जटिने नमः । नमः सर्वात्मभूताय दिश नो यन्मनोगतम्
namaḥ kāmeṣvasaktāya kāmasaktāya vai namaḥ | namassarvāya śarvāya daṇḍine jaṭine namaḥ | namaḥ sarvātmabhūtāya diśa no yanmanogatam
'-कामनाओं में अनासक्त को नमस्कार, और प्रिया में आसक्त को भी नमस्कार; सर्व, शर्व, दंडधारी, जटाधारी को नमस्कार; समस्त प्राणियों के आत्मस्वरूप को नमस्कार - हमारे मन की बात पूर्ण करो।'
श्लोक 97 (skanda.8.72.97)
एवं संस्तूयमानोथ सर्वैरेव सुरोत्तमैः । प्रत्युवाच महादेवस्तान्सुरान्प्रणतान् स्थितान्
evaṁ saṁstūyamānotha sarvaireva surottamaiḥ | pratyuvāca mahādevastānsurānpraṇatān sthitān
इस प्रकार समस्त श्रेष्ठ देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर, महादेव ने उन झुके हुए देवताओं से कहा -
श्लोक 98 (skanda.8.72.98)
परितुष्टोस्मि भो देवा ब्रूत किं प्रददानि वः । पुनः प्रणम्य ते देवाः प्राहुर्वचनमुत्तमम्
parituṣṭosmi bho devā brūta kiṁ pradadāni vaḥ | punaḥ praṇamya te devāḥ prāhurvacanamuttamam
'हे देवो, मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ; कहो, मैं तुम्हें क्या दूँ?' पुनः प्रणाम करके वे देवगण यह उत्तम वचन बोले -
श्लोक 99 (skanda.8.72.99)
यो नस्स्वयंवरे देव वरो दत्तस्त्वया विभो । तं प्रार्थयाम सहितास्तन्नो दातुं त्वमर्हसि
yo nassvayaṁvare deva varo dattastvayā vibho | taṁ prārthayāma sahitāstanno dātuṁ tvamarhasi
'हे देव, हे विभो, स्वयंवर में आपके द्वारा हमें जो वर दिया गया था, वही हम सब मिलकर माँगते हैं; वह हमें देना ही चाहिए।'
श्लोक 100 (skanda.8.72.100)
देव्या य एष पुत्रार्थं योगस्ते भुवनेश्वर । कृतोब्दानि बहूनि स्म तं संहर नमस्तव
devyā ya eṣa putrārthaṁ yogaste bhuvaneśvara | kṛtobdāni bahūni sma taṁ saṁhara namastava
'हे भुवनेश्वर, अनेक वर्षों से देवी के साथ पुत्र-प्राप्ति के लिए किया गया आपका यह योग - उसे समेट लीजिए; आपको नमस्कार है।'
श्लोक 101 (skanda.8.72.101)
अशुभानि निमित्तानि दृश्यन्ते सुमहाद्युते । पृथिवी दुःस्थिता देव वयञ्च भृशमाकुलाः
aśubhāni nimittāni dṛśyante sumahādyute | pṛthivī duḥsthitā deva vayañca bhṛśamākulāḥ
'हे महातेजस्वी, अशुभ शकुन दिखाई दे रहे हैं; हे देव, पृथ्वी व्याकुल है, और हम भी अत्यंत विचलित हैं।'
श्लोक 102 (skanda.8.72.102)
तेनैष न यथा देव्या देहे सञ्जायते सुतः । जायेत च यथा देव तथा नः कर्तुमर्हसि
tenaiṣa na yathā devyā dehe sañjāyate sutaḥ | jāyeta ca yathā deva tathā naḥ kartumarhasi
'इसलिए, हे देव, हमारे लिए ऐसा करो कि पुत्र देवी के अपने शरीर से उत्पन्न न हो, और फिर भी पुत्र उत्पन्न हो जाए।'
श्लोक 103 (skanda.8.72.103)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवोब्रवीद्वचः । महानेष वरः सर्वैः प्रार्थितः सुरपुङ्गवैः
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā devadevobravīdvacaḥ | mahāneṣa varaḥ sarvaiḥ prārthitaḥ surapuṅgavaiḥ
उनका यह वचन सुनकर देवदेव ने कहा - 'यह महान् वर है, जिसे समस्त श्रेष्ठ देवताओं ने माँगा है;'
श्लोक 104 (skanda.8.72.104)
तथापि च प्रयच्छामि युष्मत्प्रियचिकीर्षया । महान्तं किन्त्विदं कालं तेजस्सन्धारितं मया
tathāpi ca prayacchāmi yuṣmatpriyacikīrṣayā | mahāntaṁ kintvidaṁ kālaṁ tejassandhāritaṁ mayā
'-फिर भी तुम्हें प्रसन्न करने की इच्छा से मैं यह देता हूँ। परंतु यह जो महान् तेज मेरे द्वारा इतने काल तक धारण किया गया है,'
श्लोक 105 (skanda.8.72.105)
अस्य प्रपश्यत स्थानममोघं ह्येतदुत्तमम् । अथैवमुक्ता देवेन ते देवा मुनिसत्तम
asya prapaśyata sthānamamoghaṁ hyetaduttamam | athaivamuktā devena te devā munisattama
'-इसके लिए अब एक उत्तम, अमोघ स्थान देखो।' हे मुनिश्रेष्ठ, देव द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे देवगण,
श्लोक 106 (skanda.8.72.106)
बभूवुस्सहितास्तूष्णीं सुरा ब्रह्मपुरोगमाः । तेषां मध्ये तदा वह्निः प्रोवाच भुवनेश्वरम्
babhūvussahitāstūṣṇīṁ surā brahmapurogamāḥ | teṣāṁ madhye tadā vahniḥ provāca bhuvaneśvaram
-ब्रह्मा के नेतृत्व में सब मिलकर मौन हो गए। तब उनके बीच अग्नि ने भुवनेश्वर से कहा -
श्लोक 107 (skanda.8.72.107)
जुहुध्येतत्परन्तेजो मयि देव त्रिलोकप । जुहावाग्नौ ततस्तेजस्तदा स्वीयं परं भवः
juhudhyetatparantejo mayi deva trilokapa | juhāvāgnau tatastejastadā svīyaṁ paraṁ bhavaḥ
'हे देव, हे त्रिलोक-पालक, यह परम तेज मुझमें हवन कर दो।' तब भव ने अपना वह परम तेज अग्नि में हवन कर दिया।
श्लोक 108 (skanda.8.72.108)
हुत्वा तस्मिन्ततः कृत्स्नं तुष्टोभूत्परमेश्वरः । वरं वृणु हुताश त्वमिति प्रोवाच शङ्करः
hutvā tasmintataḥ kṛtsnaṁ tuṣṭobhūtparameśvaraḥ | varaṁ vṛṇu hutāśa tvamiti provāca śaṅkaraḥ
उसमें संपूर्ण हवन करके परमेश्वर संतुष्ट हो गए, और शंकर ने कहा - 'हे अग्नि, वर माँगो।'
श्लोक 109 (skanda.8.72.109)
ततो वह्निः प्रणम्येशं वरानभ्यर्थयद् विभुम् । इच्छेयमेतं पुत्रन्ते मम नाम्ना प्रकीर्तितम्
tato vahniḥ praṇamyeśaṁ varānabhyarthayad vibhum | iccheyametaṁ putrante mama nāmnā prakīrtitam
तब अग्नि ने ईश्वर को प्रणाम करके उस विभु से वर माँगे - 'मैं चाहता हूँ कि आपका यह पुत्र मेरे ही नाम से प्रसिद्ध हो,'
श्लोक 110 (skanda.8.72.110)
शापस्याहमगम्यः स्यां पश्येयं त्वाञ्च नित्यशः । धारयेयं सुखेनैतदुत्सृजेयञ्च शङ्कर
śāpasyāhamagamyaḥ syāṁ paśyeyaṁ tvāñca nityaśaḥ | dhārayeyaṁ sukhenaitadutsṛjeyañca śaṅkara
'-मैं शाप के लिए अगम्य हो जाऊँ, और सदा आपका दर्शन करूँ; हे शंकर, मैं इसे सुखपूर्वक धारण करूँ और मुक्त करूँ,'
श्लोक 111 (skanda.8.72.111)
सर्वभक्षोप्यलेपः स्यां पापन्न च भवेन्मम । मयि देवाश्च यज्ञाश्च प्रतिष्ठां यान्तु शूलधृक्
sarvabhakṣopyalepaḥ syāṁ pāpanna ca bhavenmama | mayi devāśca yajñāśca pratiṣṭhāṁ yāntu śūladhṛk
'-सब कुछ खाकर भी मैं निर्लिप्त रहूँ, और मुझे पाप न लगे; हे शूलधृक्, देवता और यज्ञ मुझमें ही प्रतिष्ठा पाएँ,'
श्लोक 112 (skanda.8.72.112)
अहं भूतेश्वरश्च स्यामहं पशुपतिश्च ह । अहं तव तनुः स्याञ्च त्वन्मूर्त्तिस्त्वदुपाश्रयः
ahaṁ bhūteśvaraśca syāmahaṁ paśupatiśca ha | ahaṁ tava tanuḥ syāñca tvanmūrttistvadupāśrayaḥ
'-मैं भूतेश्वर बनूँ, मैं पशुपति भी बनूँ; मैं आपका ही शरीर, आपकी ही मूर्ति, आपका ही आश्रय बनूँ।'
श्लोक 113 (skanda.8.72.113)
वरमिच्छामि देवेश दीयमानमिमं त्वया । एवमस्त्विति तत्सर्वं वह्नये प्रददौ विभुः
varamicchāmi deveśa dīyamānamimaṁ tvayā | evamastviti tatsarvaṁ vahnaye pradadau vibhuḥ
'हे देवेश, यही वर मैं चाहता हूँ, जो आपके द्वारा दिया जाए।' 'ऐसा ही हो' कहकर उस विभु ने अग्नि को यह सब प्रदान किया।
श्लोक 114 (skanda.8.72.114)
विसृज्य च ततो देवान् देवदेवो वृषध्वजः । पुनर्विवेश भवनं देवी चैनमभाषत
visṛjya ca tato devān devadevo vṛṣadhvajaḥ | punarviveśa bhavanaṁ devī cainamabhāṣata
तब देवताओं को विदा करके, देवदेव वृषभध्वज पुनः अपने भवन में प्रविष्ट हुए; और देवी ने उनसे कहा -
श्लोक 115 (skanda.8.72.115)
क्व गत्वा त्वमिहायातः क्षिप्रं त्रिभुवनेश्वर । किन्तद् गुरुतरं कार्यं येन निर्गतवानसि
kva gatvā tvamihāyātaḥ kṣipraṁ tribhuvaneśvara | kintad gurutaraṁ kāryaṁ yena nirgatavānasi
'तुम कहाँ जाकर इतनी शीघ्र लौट आए, हे त्रिभुवनेश्वर? वह कौन-सा गुरुतर कार्य था जिसके लिए तुम बाहर गए थे?'
श्लोक 116 (skanda.8.72.116)
ततः प्रोवाच देवेशः पार्वतीं रुषिताननाम् । गतोस्मि त्वरितो देवि देवैर्विज्ञापितः प्रिये
tataḥ provāca deveśaḥ pārvatīṁ ruṣitānanām | gatosmi tvarito devi devairvijñāpitaḥ priye
तब देवेश ने रुष्ट मुख वाली पार्वती से कहा - 'हे देवी, हे प्रिये, देवताओं द्वारा प्रार्थित होकर मैं शीघ्र गया था,'
श्लोक 117 (skanda.8.72.117)
बहिःस्थैः पद्मपत्राक्षि भक्तिमद्भिस्सुदुःखितैः । अथोवाच ततो देवी देवं सर्वजगत्पतिम्
bahiḥsthaiḥ padmapatrākṣi bhaktimadbhissuduḥkhitaiḥ | athovāca tato devī devaṁ sarvajagatpatim
'-हे कमलनयनी, बाहर खड़े, भक्तिमान् और अत्यंत दुःखी उन देवताओं द्वारा।' तब देवी ने सर्वजगत्पति देव से कहा -
श्लोक 118 (skanda.8.72.118)
कथं त्वमागतान्देव बहिःस्थान् त्रिदिवौकसः । ज्ञातवानसि सन्त्रस्तान् केनाख्यातञ्च ते विभो
kathaṁ tvamāgatāndeva bahiḥsthān tridivaukasaḥ | jñātavānasi santrastān kenākhyātañca te vibho
'हे देव, तुम्हें कैसे पता चला कि बाहर आए हुए त्रिदिवौकस भयभीत खड़े हैं? और, हे विभो, तुम्हें किसने बताया?'
श्लोक 119 (skanda.8.72.119)
देवदेव उवाच । प्रविश्य हुतभुग् देवि मणिस्तम्भं समास्थितः । न्यवेदयत्स्तुवन्मह्यं सर्वान्देवान् बहिःस्थितान्
devadeva uvāca | praviśya hutabhug devi maṇistambhaṁ samāsthitaḥ | nyavedayatstuvanmahyaṁ sarvāndevān bahiḥsthitān
देवदेव ने कहा - 'हे देवी, अग्नि ने प्रवेश करके मणि-स्तंभ में अपना स्थान बनाया; मेरी स्तुति करते हुए उसने बाहर खड़े समस्त देवताओं की सूचना दी।'
श्लोक 120 (skanda.8.72.120)
तवैवानुज्ञया देवि तस्मै दत्तो वरो मया । ततो भगवती क्रुद्धा नन्दिनं प्राह पार्वती
tavaivānujñayā devi tasmai datto varo mayā | tato bhagavatī kruddhā nandinaṁ prāha pārvatī
'हे देवी, तुम्हारी ही अनुमति से मैंने उसे वर दिया।' तब भगवती पार्वती क्रुद्ध होकर नंदी से बोलीं -
श्लोक 121 (skanda.8.72.121)
कथं प्रविष्टस्ते वह्निर्द्वारस्थस्येह दुर्मते । ततस्सास्य भृशं क्रुद्धा श्रवण न्यस्तमुत्पलम्
kathaṁ praviṣṭaste vahnirdvārasthasyeha durmate | tatassāsya bhṛśaṁ kruddhā śravaṇa nyastamutpalam
'हे दुर्बुद्धि, तुम द्वार पर खड़े थे, फिर अग्नि कैसे प्रविष्ट हुआ?' तब उस पर अत्यंत क्रुद्ध होकर, उन्होंने अपने कान में लगा हुआ कमल,
श्लोक 122 (skanda.8.72.122)
गृहीत्वा वज्रसंकाशं नन्दीशाय व्यसर्जयत् । द्वादशादित्यसंकाशं प्रज्वलत्तत्तदोत्पलम्
gṛhītvā vajrasaṁkāśaṁ nandīśāya vyasarjayat | dvādaśādityasaṁkāśaṁ prajvalattattadotpalam
-वज्र के समान, हाथ में लेकर नंदीश पर फेंक दिया; बारह सूर्यों के समान प्रज्वलित होता हुआ वह कमल,
श्लोक 123 (skanda.8.72.123)
वधार्थं नन्दिनो घोरं प्रससार स्फुटन्निव । हतो नन्दीश्वर इति प्रोच्योत्थाय च शङ्करः
vadhārthaṁ nandino ghoraṁ prasasāra sphuṭanniva | hato nandīśvara iti procyotthāya ca śaṅkaraḥ
-भयंकर होकर, मानो फटता हुआ, नंदी का वध करने के लिए दौड़ा। 'नंदीश्वर मारा गया' यह कहकर शंकर उठ खड़े हुए,
श्लोक 124 (skanda.8.72.124)
भद्रं भवोत्पलक्षिप्रमित्युक्त्वा गृह्णदुत्पलम् । अथोमापि ततो देवी प्रत्यापत्तिञ्जगाम ह
bhadraṁ bhavotpalakṣipramityuktvā gṛhṇadutpalam | athomāpi tato devī pratyāpattiñjagāma ha
और 'हे कमल, तुम शीघ्र भद्र हो जाओ' कहकर उस कमल को पकड़ लिया। तब देवी उमा भी होश में आईं,
श्लोक 125 (skanda.8.72.125)
अहो बत महत्कष्टं कृतं क्रोधवशान्मया । कथञ्चिन्न हतो नन्दी महागणपनायकः
aho bata mahatkaṣṭaṁ kṛtaṁ krodhavaśānmayā | kathañcinna hato nandī mahāgaṇapanāyakaḥ
-और सोचने लगीं - 'हाय, क्रोधवश मैंने कितना बड़ा अपराध कर दिया! सौभाग्य से महागण-नायक नंदी नहीं मारे गए।'
श्लोक 126 (skanda.8.72.126)
तद् गृहीत्वा ततो हस्ताद् देवस्य श्रवणोत्पलम् । चिक्षेप त्वरितं देवी भद्रं भवतु ते सरः
tad gṛhītvā tato hastād devasya śravaṇotpalam | cikṣepa tvaritaṁ devī bhadraṁ bhavatu te saraḥ
तब देव के हाथ से उस कर्ण-कमल को लेकर, देवी ने उसे शीघ्र फेंक दिया - 'यह एक शुभ सरोवर बन जाए।'
श्लोक 127 (skanda.8.72.127)
एवमुक्त्वा ततः क्षिप्तं देव्या तच्छ्रवणोत्पलम् । विन्ध्यपृष्ठे सरस्तत्र बहुपद्मोत्पलं बभौ
evamuktvā tataḥ kṣiptaṁ devyā tacchravaṇotpalam | vindhyapṛṣṭhe sarastatra bahupadmotpalaṁ babhau
ऐसा कहकर देवी द्वारा फेंका गया वह कर्ण-कमल, विंध्य की पीठ पर, अनेक कमल-उत्पलों वाला सरोवर बनकर शोभित हुआ।
श्लोक 128 (skanda.8.72.128)
हंससारससंकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् । नाम्ना भद्रोत्पलमिति हेमशृङ्गसमीपतः
haṁsasārasasaṁkīrṇaṁ cakravākopaśobhitam | nāmnā bhadrotpalamiti hemaśṛṅgasamīpataḥ
हंस-सारसों से भरा, चक्रवाकों से सुशोभित वह सरोवर, स्वर्ण-शिखर के समीप, भद्रोत्पल नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 129 (skanda.8.72.129)
तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं सर्वपापैः प्रमुच्यते । तत्राक्षयं सदा दानं पितृतर्पणमेव च
tatra snātvā naraḥ kṣipraṁ sarvapāpaiḥ pramucyate | tatrākṣayaṁ sadā dānaṁ pitṛtarpaṇameva ca
वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य शीघ्र समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; वहाँ किया गया दान और पितृ-तर्पण सदा अक्षय होता है।
श्लोक 130 (skanda.8.72.130)
मृतश्चात्र नरो याति नन्दीश्वरसलोकताम् । ततो देवं पुनर्देवी वाक्यमाह गिरेः सुता
mṛtaścātra naro yāti nandīśvarasalokatām | tato devaṁ punardevī vākyamāha gireḥ sutā
वहाँ मरने वाला मनुष्य नंदीश्वर-लोक की समानता को प्राप्त होता है। तब पर्वत-पुत्री देवी ने पुनः देव से यह वचन कहा -
श्लोक 131 (skanda.8.72.131)
किमूचुस्त्वां सुरा देव कीदृशं चार्चयन् वरम् । कथयामास देवेशस्ततो देव्यै बृषध्वजः
kimūcustvāṁ surā deva kīdṛśaṁ cārcayan varam | kathayāmāsa deveśastato devyai bṛṣadhvajaḥ
'हे देव, देवताओं ने तुमसे क्या कहा, और कैसा वर माँगा?' तब वृषभध्वज देवेश ने देवी को बताया -
श्लोक 132 (skanda.8.72.132)
देवैर्विज्ञापितो देवि निर्गतोहं वरानने । देव्या य एष पुत्रार्थं योगस्ते भुवनेश्वर
devairvijñāpito devi nirgatohaṁ varānane | devyā ya eṣa putrārthaṁ yogaste bhuvaneśvara
'हे देवी, हे वरानने, मैं देवताओं द्वारा प्रार्थित होकर गया था: "हे भुवनेश्वर, देवी के साथ आपका यह पुत्र-प्राप्ति हेतु योग,"'
श्लोक 133 (skanda.8.72.133)
अशुभान्यत्र दृश्यन्ते दारुणानि सहस्रशः । सन्त्रस्ता पृथिवी कृत्स्ना वयञ्च भृशमाकुलाः
aśubhānyatra dṛśyante dāruṇāni sahasraśaḥ | santrastā pṛthivī kṛtsnā vayañca bhṛśamākulāḥ
'"-इससे हजारों भयंकर अशुभ लक्षण दिखाई दे रहे हैं; संपूर्ण पृथ्वी त्रस्त है, और हम भी अत्यंत व्याकुल हैं,"'
श्लोक 134 (skanda.8.72.134)
तेनैष न यथा देव्या गर्भे सञ्जायते सुतः । भवेच्च तनयः श्लाघ्यो वर एष प्रदीयताम्
tenaiṣa na yathā devyā garbhe sañjāyate sutaḥ | bhavecca tanayaḥ ślāghyo vara eṣa pradīyatām
'"-इसलिए यह वर दिया जाए कि देवी के गर्भ में पुत्र उत्पन्न न हो, और फिर भी एक प्रशंसनीय पुत्र हो।"'
श्लोक 135 (skanda.8.72.135)
ततोग्नौ तदद्भुतं तेजो मया पुत्रार्थमीश्वरि । सुतस्ते भविता श्रीमान् षट्शिरा द्वादशेक्षणः
tatognau tadadbhutaṁ tejo mayā putrārthamīśvari | sutaste bhavitā śrīmān ṣaṭśirā dvādaśekṣaṇaḥ
'सो, हे ईश्वरी, मैंने पुत्र के लिए वह अद्भुत तेज अग्नि में हवन कर दिया; तुम्हारा पुत्र श्रीमान्, छह मुख वाला, बारह नेत्रों वाला होगा,'
श्लोक 136 (skanda.8.72.136)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शशाप गिरिजामरान् । यस्मान्मम सुतो देहे नेप्सितं तैर्दुरात्मभिः । स्वासु पत्नीषु तस्मात्ते न प्राप्स्यन्ति सुराः सुतम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā śaśāpa girijāmarān | yasmānmama suto dehe nepsitaṁ tairdurātmabhiḥ | svāsu patnīṣu tasmātte na prāpsyanti surāḥ sutam
उसका यह वचन सुनकर गिरिजा ने देवताओं को शाप दिया - 'चूँकि उन दुरात्माओं ने मेरा पुत्र मेरे शरीर में होना नहीं चाहा, इसलिए वे देवगण अपनी-अपनी पत्नियों से पुत्र प्राप्त नहीं करेंगे।'
श्लोक 137 (skanda.8.72.137)
पृथिवी चापि संमूढा मच्छापोपहतेन्द्रिया । बहून्पतीन्समासाद्य न पुत्रं प्राप्स्यते क्वचित्
pṛthivī cāpi saṁmūḍhā macchāpopahatendriyā | bahūnpatīnsamāsādya na putraṁ prāpsyate kvacit
'और पृथ्वी भी, मोहित होकर, मेरे शाप से प्रभावित इंद्रियों वाली, अनेक पतियों को पाकर भी कहीं पुत्र प्राप्त नहीं करेगी।'
श्लोक 138 (skanda.8.72.138)
सनत्कुमार उवाच । विरराम ततो देवी शप्त्वा देवान्सवासवान् । कैटभा नाम नाम्ना च पुण्या नैकवरप्रदा
sanatkumāra uvāca | virarāma tato devī śaptvā devānsavāsavān | kaiṭabhā nāma nāmnā ca puṇyā naikavarapradā
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार इंद्र सहित देवताओं को शाप देकर देवी चुप हो गईं - वह पवित्र, कैटभा नाम से प्रसिद्ध, अनेक वर देने वाली देवी।
श्लोक 139 (skanda.8.72.139)
विन्ध्यस्य शिखरे हैमे तत्राभूद् गरिजा शुभा । पुण्यमायतनं तद्धि शिलाञ्च रमणाह्वयाम्
vindhyasya śikhare haime tatrābhūd garijā śubhā | puṇyamāyatanaṁ taddhi śilāñca ramaṇāhvayām
शुभ गिरिजा वहाँ विंध्य के स्वर्ण-शिखर पर स्थित रहीं; वह वस्तुतः पवित्र स्थान है, और वह शिला रमणा नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 140 (skanda.8.72.140)
योभिगच्छेन्नरो व्यास मृतस्स गणपो भवेत् । अथाजग्मुः सुरास्सर्वे सार्धं तत्र हविर्भुजा
yobhigacchennaro vyāsa mṛtassa gaṇapo bhavet | athājagmuḥ surāssarve sārdhaṁ tatra havirbhujā
हे व्यास, जो मनुष्य वहाँ जाता है, वह मरकर गणपति बनता है। तब समस्त देवगण अग्नि सहित वहाँ आए,
श्लोक 141 (skanda.8.72.141)
विवर्णाः कश्मलोपेताः सगर्भा लज्जयान्विताः । तान्द्वाःस्थानागतान्नन्दी शङ्कराय न्यवेदयत्
vivarṇāḥ kaśmalopetāḥ sagarbhā lajjayānvitāḥ | tāndvāḥsthānāgatānnandī śaṅkarāya nyavedayat
-रंगहीन, संकट से ग्रस्त, अब गर्भवती, लज्जा से युक्त। नंदी ने शंकर को सूचित किया कि वे द्वार पर आकर खड़े हैं।
श्लोक 142 (skanda.8.72.142)
प्रविश्य समनुज्ञाता देवमूचुर्दिवौकसः । तेजो न शक्नुमः सोढुमिदं त्रिभुवनेश्वर
praviśya samanujñātā devamūcurdivaukasaḥ | tejo na śaknumaḥ soḍhumidaṁ tribhuvaneśvara
अनुमति पाकर, प्रवेश करके, स्वर्गवासियों ने देव से कहा - 'हे त्रिभुवनेश्वर, हम इस तेज को सहन नहीं कर सकते।'
श्लोक 143 (skanda.8.72.143)
त्राहि नः सुरलोकेश यथा स्याम गतज्वराः । अन्धकश्चासुरोत्यर्थं तप्यते दुश्चरं तपः । भयञ्च नस्ततो देव दृश्यते सुमहद्विभो
trāhi naḥ suralokeśa yathā syāma gatajvarāḥ | andhakaścāsurotyarthaṁ tapyate duścaraṁ tapaḥ | bhayañca nastato deva dṛśyate sumahadvibho
'हमारी रक्षा करो, हे सुरलोकेश, जिससे हम इस ज्वर से मुक्त हों। और असुर अंधक अत्यंत दुष्कर तपस्या कर रहा है; हे विभो, उससे भी हमें बड़ा भय दिखाई दे रहा है।'
श्लोक 144 (skanda.8.72.144)
९ वाक्यमेतद् विररामे त्यादिपरवर्तिपद्यार्धानन्तरं पठितं क पुस्तके । देवदेव उवाच । मा भीर्भवतु वो देवा हनिष्याम्यहमन्धकम् । युष्मदर्थे पराक्रान्तं हिरण्याक्षसुतं वरम्
9 vākyametad virarāme tyādiparavartipadyārdhānantaraṁ paṭhitaṁ ka pustake | devadeva uvāca | mā bhīrbhavatu vo devā haniṣyāmyahamandhakam | yuṣmadarthe parākrāntaṁ hiraṇyākṣasutaṁ varam
देवदेव ने कहा - 'हे देवो, भयभीत मत हो; मैं स्वयं उस अंधक को मारूँगा, हिरण्याक्ष के उस वीर पुत्र को, जो तुम्हारे विरुद्ध बलवान् हो गया है।'
श्लोक 145 (skanda.8.72.145)
यूयञ्च मेरुमध्यस्थं वनं यात सुविस्तृतम् । नाम्ना शरवणं नाम पुण्यं द्वादशयोजनम्
yūyañca merumadhyasthaṁ vanaṁ yāta suvistṛtam | nāmnā śaravaṇaṁ nāma puṇyaṁ dvādaśayojanam
'और तुम मेरु के मध्य स्थित उस विस्तृत, पवित्र, बारह योजन के शरवण नामक वन में जाओ,'
श्लोक 146 (skanda.8.72.146)
युष्माकं तत्र संभिद्य कुक्षीन्दैवतपुङ्गवाः । मदीयं तत्परं तेजो निर्गमिष्यति दीप्तिमत्
yuṣmākaṁ tatra saṁbhidya kukṣīndaivatapuṅgavāḥ | madīyaṁ tatparaṁ tejo nirgamiṣyati dīptimat
'-वहाँ, हे देवश्रेष्ठो, तुम्हारे उदर विदीर्ण होकर, मेरा वह परम, तेजस्वी तेज बाहर निकलेगा।'
श्लोक 147 (skanda.8.72.147)
सुवर्णत्वं च यास्यन्ति कुक्षयो वः सुरोत्तमाः । ततस्ते तद्वचः श्रुत्वा प्रणम्य शिरसा भवम्
suvarṇatvaṁ ca yāsyanti kukṣayo vaḥ surottamāḥ | tataste tadvacaḥ śrutvā praṇamya śirasā bhavam
'और, हे देवश्रेष्ठो, तुम्हारे उदर स्वर्णमय हो जाएँगे।' तब उनका यह वचन सुनकर, भव को सिर से प्रणाम करके,
श्लोक 148 (skanda.8.72.148)
श्रीमन्तं मेरुमाजग्मुः शरधानं च तच्छुभम् । यत्र तेषां तदा भित्त्वा कुक्षीन्तेजो निरक्रमीत्
śrīmantaṁ merumājagmuḥ śaradhānaṁ ca tacchubham | yatra teṣāṁ tadā bhittvā kukṣīntejo nirakramīt
-वे उस श्रीमान् मेरु और उस शुभ शरधान (शरवण) में गए; वहाँ उनके उदर विदीर्ण होकर तेज बाहर निकल आया।
श्लोक 149 (skanda.8.72.149)
युगान्तानलसंकाशं दुर्निरीक्ष्यं सुरासुरैः । मेरुश्चैवाभवत् क्षिप्रं श्रीमानति मनोहरः
yugāntānalasaṁkāśaṁ durnirīkṣyaṁ surāsuraiḥ | meruścaivābhavat kṣipraṁ śrīmānati manoharaḥ
-युगांत की अग्नि के समान, देव-असुरों के लिए भी असह्य दर्शन वाला; और मेरु स्वयं शीघ्र श्रीमान्, अत्यंत मनोहर हो गया।
श्लोक 150 (skanda.8.72.150)
सर्वं हिरण्मयं चक्रे तेजो माहेश्वरं परम् । वाति गन्धवहो दिव्यस्सर्वर्तुकुसुमावहः
sarvaṁ hiraṇmayaṁ cakre tejo māheśvaraṁ param | vāti gandhavaho divyassarvartukusumāvahaḥ
उस परम माहेश्वर तेज ने सब कुछ स्वर्णमय कर दिया; दिव्य, सुगंधित वायु बहने लगी, जो सभी ऋतुओं के पुष्प लाती थी।
श्लोक 151 (skanda.8.72.151)
तेषाञ्च कुक्षिभेदास्ते सुवर्णत्वं परं ययुः । स्वर्गे दुन्दुभयो दिव्या नेदुः स्वयमनाहताः
teṣāñca kukṣibhedāste suvarṇatvaṁ paraṁ yayuḥ | svarge dundubhayo divyā neduḥ svayamanāhatāḥ
उनके वे विदीर्ण उदर परम स्वर्णत्व को प्राप्त हो गए; स्वर्ग में दिव्य दुंदुभियाँ स्वयं ही, बिना बजाए, बज उठीं।
श्लोक 152 (skanda.8.72.152)
पुष्पाणां वृष्टयः पेतुस्सुगन्धीनामनेकशः । नमस्कारैश्च भूतानामदृश्यानामभूत्स्वनः
puṣpāṇāṁ vṛṣṭayaḥ petussugandhīnāmanekaśaḥ | namaskāraiśca bhūtānāmadṛśyānāmabhūtsvanaḥ
सुगंधित पुष्पों की अनेक वर्षाएँ होने लगीं, और अदृश्य भूतगणों के नमस्कारों की ध्वनि सुनाई देने लगी।
श्लोक 153 (skanda.8.72.153)
एवमादीनि पश्यन्तः शृण्वन्तश्च सुरोत्तमाः । गत्वा पिनाकिने हृष्टास्सर्वमावेद्य सुव्रत । प्रेषिताः स्थाणुना जग्मुः स्वाँल्लोकान् हृषिताननाः
evamādīni paśyantaḥ śṛṇvantaśca surottamāḥ | gatvā pinākine hṛṣṭāssarvamāvedya suvrata | preṣitāḥ sthāṇunā jagmuḥ svā~llokān hṛṣitānanāḥ
हे सुव्रत, ऐसे चमत्कार देखते-सुनते हुए, वे श्रेष्ठ देवगण पिनाकी के पास जाकर, प्रसन्न होकर, सब कुछ निवेदन करके, स्थाणु द्वारा विदा किए जाकर, हर्षित मुख से अपने-अपने लोकों को चले गए।
श्लोक 154 (skanda.8.72.154)
श्रुत्वा देवैरभिहितमिदं प्रीतियुक्तैर्वचोग्र्यं । प्रीता देवी हृदयमहिता पुत्रजन्मप्रवृत्तिम् । ज्ञात्वा तस्थौ विबुधवरदा योगमाता विधात्री । तुष्टिञ्चागाद्धृदि सुरशिरःस्पृष्टपादारविन्दा
śrutvā devairabhihitamidaṁ prītiyuktairvacogryaṁ | prītā devī hṛdayamahitā putrajanmapravṛttim | jñātvā tasthau vibudhavaradā yogamātā vidhātrī | tuṣṭiñcāgāddhṛdi suraśiraḥspṛṣṭapādāravindā
देवताओं द्वारा प्रेमपूर्वक कहे गए इस उत्तम वचन को सुनकर, प्रसन्नचित्त, हृदय में सम्मानित देवी, अपने पुत्र के आसन्न जन्म को जानकर वहीं ठहर गईं - विद्वानों को वर देने वाली, योगमाता, विधात्री - और देवताओं के सिरों से स्पर्शित चरण-कमलों वाली उनके हृदय में संतोष आ गया।