अम्बिका खण्ड · अध्याय 73
अंधक का तपः-प्रयाण
श्लोक 1 (skanda.8.73.1)
व्यास उवाच । अन्धकः कस्य पुत्रोसौ किं वीर्यः किं पराक्रमः । कथञ्च निहतः संख्ये सर्वमेतद्वदस्व मे
vyāsa uvāca | andhakaḥ kasya putrosau kiṁ vīryaḥ kiṁ parākramaḥ | kathañca nihataḥ saṁkhye sarvametadvadasva me
व्यास ने कहा - वह अंधक किसका पुत्र था? उसका पराक्रम और बल कैसा था? और वह युद्ध में कैसे मारा गया? यह सब मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.8.73.2)
सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाबुद्धे सर्वमेतद्यथाभवत् । अन्धकस्य पुरावृत्तं सर्वं वक्ष्यामि ते द्विज
sanatkumāra uvāca | śṛṇu vyāsa mahābuddhe sarvametadyathābhavat | andhakasya purāvṛttaṁ sarvaṁ vakṣyāmi te dvija
सनत्कुमार ने कहा - हे महाबुद्धिमान् व्यास, सुनो, यह सब जैसा हुआ; हे द्विज, अंधक का संपूर्ण प्राचीन वृत्तांत मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.8.73.3)
कश्यपस्य सुतौ दित्यां दैत्यौ तौ संबभूवतुः । हिरण्यकशिपुर्ज्येष्ठो हिरण्याक्षस्ततोनुजः
kaśyapasya sutau dityāṁ daityau tau saṁbabhūvatuḥ | hiraṇyakaśipurjyeṣṭho hiraṇyākṣastatonujaḥ
कश्यप के दो दैत्य पुत्र दिति से उत्पन्न हुए; हिरण्यकशिपु बड़ा और हिरण्याक्ष उससे छोटा था।
श्लोक 4 (skanda.8.73.4)
ज्येष्ठस्तत्राभवद्राजा हिरण्यकशिपुस्तदा । तस्मिन्विनिहते वीरे नरसिंहेन धीमता
jyeṣṭhastatrābhavadrājā hiraṇyakaśipustadā | tasminvinihate vīre narasiṁhena dhīmatā
वहाँ बड़ा हिरण्यकशिपु राजा बना; जब वह वीर बुद्धिमान् नरसिंह द्वारा मारा गया,
श्लोक 5 (skanda.8.73.5)
हिरण्याक्षोभवद्राजा सर्वदैत्यनमस्कृतः । अपुत्रः स तपस्तेपे पुत्रहेतोरिति श्रुतिः
hiraṇyākṣobhavadrājā sarvadaityanamaskṛtaḥ | aputraḥ sa tapastepe putrahetoriti śrutiḥ
हिरण्याक्ष राजा बना, समस्त दैत्यों द्वारा नमस्कृत। पुत्ररहित होने के कारण उसने पुत्र-प्राप्ति के लिए तपस्या की - ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 6 (skanda.8.73.6)
स शंकुकर्णं संप्राप्य सिन्धुसागरसङ्गमे । तपस्तेपे दितेः पुत्रो देवं द्रष्टुं पिनाकिनम्
sa śaṁkukarṇaṁ saṁprāpya sindhusāgarasaṅgame | tapastepe diteḥ putro devaṁ draṣṭuṁ pinākinam
वह दिति-पुत्र शंकुकर्ण पहुँचकर, सिंधु और सागर के संगम पर, पिनाकी देव के दर्शन हेतु तपस्या करने लगा।
श्लोक 7 (skanda.8.73.7)
व्यास उवाच । कथं तदभवद्दिव्यं पवित्रं लोकविश्रुतम् । शंकुकर्णं महेशस्य क्षेत्रं सर्वार्थसाधकम् । यत्फलं पुण्यसंपच्च तन्मे व्याख्यातुमर्हसि
vyāsa uvāca | kathaṁ tadabhavaddivyaṁ pavitraṁ lokaviśrutam | śaṁkukarṇaṁ maheśasya kṣetraṁ sarvārthasādhakam | yatphalaṁ puṇyasaṁpacca tanme vyākhyātumarhasi
व्यास ने कहा - वह दिव्य, पवित्र, लोकविश्रुत शंकुकर्ण, महेश का सर्वार्थसाधक क्षेत्र, कैसे बना? उसका फल और पुण्य-संपदा मुझे बताइए।
श्लोक 8 (skanda.8.73.8)
सनत्कुमार उवाच । पुरा हि भगवान्देवः कपर्दी नीललोहितः । सिन्धुसागरमागम्य लोकानुग्रहहेतवे
sanatkumāra uvāca | purā hi bhagavāndevaḥ kapardī nīlalohitaḥ | sindhusāgaramāgamya lokānugrahahetave
सनत्कुमार ने कहा - प्राचीन काल में भगवान् देव कपर्दी, नील-रक्तवर्ण, लोकों के अनुग्रह के हेतु सिंधु-सागर-संगम पर आकर,
श्लोक 9 (skanda.8.73.9)
तपःकर्तुं समारेभे यदचिन्त्यं सुरासुरैः । दशस्वपि ततो दिक्षु रक्षणार्थं जगत्पतिः
tapaḥkartuṁ samārebhe yadacintyaṁ surāsuraiḥ | daśasvapi tato dikṣu rakṣaṇārthaṁ jagatpatiḥ
-और देव-असुरों के लिए भी अचिंत्य तपस्या आरंभ की। तब दसों दिशाओं में रक्षा के लिए जगत्पति ने,
श्लोक 10 (skanda.8.73.10)
स्थापयामास गणपान् निकुम्भादीन्सहस्रशः । शकुकर्णं महादंष्ट्रं स्थूलाक्षं स्थूलनासिकम्
sthāpayāmāsa gaṇapān nikumbhādīnsahasraśaḥ | śakukarṇaṁ mahādaṁṣṭraṁ sthūlākṣaṁ sthūlanāsikam
-निकुंभ आदि सहस्रों गणों को स्थापित किया - शंकुकर्ण, विशाल दाढ़ों वाला, स्थूल नेत्रों वाला, स्थूल नासिका वाला,
श्लोक 11 (skanda.8.73.11)
ह्रस्वपादकरं चैव दारितास्यं विभीषणम् । शार्दूलचर्मसंछन्नं द्वीपिचर्मोत्तरच्छदम्
hrasvapādakaraṁ caiva dāritāsyaṁ vibhīṣaṇam | śārdūlacarmasaṁchannaṁ dvīpicarmottaracchadam
-छोटे पैर और हाथ वाला, चौड़े मुख वाला, भयंकर, व्याघ्रचर्म से ढका, चीतल-चर्म का ऊपरी आवरण लिए हुए,
श्लोक 12 (skanda.8.73.12)
शंकुकर्णमिति ख्यातं गणेशं सुमहाबलम् । समाहूय समीपन्तु भगवानिदमब्रवीत्
śaṁkukarṇamiti khyātaṁ gaṇeśaṁ sumahābalam | samāhūya samīpantu bhagavānidamabravīt
-शंकुकर्ण नाम से प्रसिद्ध, अत्यंत महाबली गणेश को - अपने पास बुलाकर भगवान् ने यह कहा -
श्लोक 13 (skanda.8.73.13)
स्वैस्त्वं गणेश्वरैस्सार्धं न विशेयुर्यथा सुराः । तथा पाहि वनं वत्स यावदेतद् व्रतं मम
svaistvaṁ gaṇeśvaraissārdhaṁ na viśeyuryathā surāḥ | tathā pāhi vanaṁ vatsa yāvadetad vrataṁ mama
'हे वत्स, अपने गणेश्वरों सहित इस वन की इस प्रकार रक्षा करो कि देवगण प्रवेश न कर सकें, जब तक मेरा यह व्रत चले।'
श्लोक 14 (skanda.8.73.14)
एवं स कृत्वा रक्षां तु महादेवो वृषध्वजः । तपस्तेपे महत्तत्र घोरं परमदुश्चरम्
evaṁ sa kṛtvā rakṣāṁ tu mahādevo vṛṣadhvajaḥ | tapastepe mahattatra ghoraṁ paramaduścaram
इस प्रकार रक्षा-व्यवस्था करके, महादेव वृषभध्वज ने वहाँ महान्, घोर, अत्यंत दुष्कर तपस्या की।
श्लोक 15 (skanda.8.73.15)
अथाजग्मुस्सुरास्तत्र सर्वे शक्रपुरोगमाः । निरुद्धाः शकुकर्णेन न चेलुः पदमग्रतः
athājagmussurāstatra sarve śakrapurogamāḥ | niruddhāḥ śakukarṇena na celuḥ padamagrataḥ
तब इंद्र के नेतृत्व में समस्त देवगण वहाँ आए; परंतु शंकुकर्ण द्वारा रोके जाने पर वे एक पग भी आगे न बढ़ सके।
श्लोक 16 (skanda.8.73.16)
देवा ऊचुः । भो गणेशा वयं देवं शर्वमुग्रं कपर्दिनम् । द्रष्टुं कार्येण संप्राप्तास्तन्नो दर्शयतानघाः । आकुलास्तमपश्यन्तो नश्याम प्रमथेश्वराः
devā ūcuḥ | bho gaṇeśā vayaṁ devaṁ śarvamugraṁ kapardinam | draṣṭuṁ kāryeṇa saṁprāptāstanno darśayatānaghāḥ | ākulāstamapaśyanto naśyāma pramatheśvarāḥ
देवताओं ने कहा - 'हे गणेश, हम उग्र कपर्दी शर्व देव को कार्यवश देखने आए हैं; हे निष्पाप, हमें उनका दर्शन कराओ। हे प्रमथेश्वर, उन्हें न देख पाने से व्याकुल होकर हम नष्ट हो जाएँगे।'
श्लोक 17 (skanda.8.73.17)
शंकुकर्ण उवाच । न युष्माभिः सुराः शक्यो देवो द्रष्टुं कथञ्चन । तपः कुरुत भद्र वस्ततो द्रक्ष्यथ शङ्करम्
śaṁkukarṇa uvāca | na yuṣmābhiḥ surāḥ śakyo devo draṣṭuṁ kathañcana | tapaḥ kuruta bhadra vastato drakṣyatha śaṅkaram
शंकुकर्ण ने कहा - 'हे देवो, वह देव तुम्हारे द्वारा किसी भी प्रकार नहीं देखा जा सकता; तुम भी तपस्या करो, तब शंकर को देख सकोगे।'
श्लोक 18 (skanda.8.73.18)
देवा ऊचुः । मा लोकानां विनाशः स्याद् गणेश्वर महाद्युते । इति प्रयच्छ नो द्वारं प्रसादं कुरु नः प्रभो
devā ūcuḥ | mā lokānāṁ vināśaḥ syād gaṇeśvara mahādyute | iti prayaccha no dvāraṁ prasādaṁ kuru naḥ prabho
देवताओं ने कहा - 'हे महातेजस्वी गणेश्वर, लोकों का विनाश न हो; हमें द्वार दो, हे प्रभु, हम पर कृपा करो।'
श्लोक 19 (skanda.8.73.19)
शंकुकर्ण उवाच । लोका नश्यन्तु यूयं वा न प्रवेशः प्रदीयते । विनष्टान् पुनरेवेशः स्रक्ष्यते भुवनेश्वरः
śaṁkukarṇa uvāca | lokā naśyantu yūyaṁ vā na praveśaḥ pradīyate | vinaṣṭān punareveśaḥ srakṣyate bhuvaneśvaraḥ
शंकुकर्ण ने कहा - 'लोक नष्ट हों या तुम स्वयं - प्रवेश नहीं दिया जाएगा। भुवनेश्वर ईश्वर नष्ट हुए को पुनः रच लेंगे।'
श्लोक 20 (skanda.8.73.20)
स्रष्टा स एव भूतानां स विनाशयिता तथा । तं विना कः सुराः शक्तो लोकान्नाशयितुं विभुम्
sraṣṭā sa eva bhūtānāṁ sa vināśayitā tathā | taṁ vinā kaḥ surāḥ śakto lokānnāśayituṁ vibhum
'वे ही प्राणियों के स्रष्टा हैं, और वे ही विनाशकर्ता भी हैं। हे देवो, उस विभु के अतिरिक्त लोकों को नष्ट करने में कौन समर्थ है?'
श्लोक 21 (skanda.8.73.21)
यच्छाम न वयं द्वारमाज्ञा नः पारमेश्वरी । त एवमुक्ताः संचिन्त्य जग्मुर्ब्रह्मसदः सुराः
yacchāma na vayaṁ dvāramājñā naḥ pārameśvarī | ta evamuktāḥ saṁcintya jagmurbrahmasadaḥ surāḥ
'हम द्वार नहीं देंगे; हम पर परमेश्वर की आज्ञा है।' ऐसा कहे जाने पर देवगण विचार करके ब्रह्मा की सभा में गए।
श्लोक 22 (skanda.8.73.22)
ततो निवेदयामासुर्ब्रह्मणस्ते सुरोत्तमाः । अथ ब्रह्मा सुरानाह मया सह पुनः सुराः
tato nivedayāmāsurbrahmaṇaste surottamāḥ | atha brahmā surānāha mayā saha punaḥ surāḥ
तब उन श्रेष्ठ देवताओं ने ब्रह्मा को यह बताया। तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा - 'हे देवो, मेरे साथ पुनः,'
श्लोक 23 (skanda.8.73.23)
गच्छध्वं गणपान् यावत् प्रत्यापत्तिं नयामि वः । ततस्ते ब्रह्मणा सार्धं विष्णुना च दिवौकसः
gacchadhvaṁ gaṇapān yāvat pratyāpattiṁ nayāmi vaḥ | tataste brahmaṇā sārdhaṁ viṣṇunā ca divaukasaḥ
'-गणपतियों के पास चलो; मैं तुम्हें संतुष्टि दिलाऊँगा।' तब वे स्वर्गवासी, ब्रह्मा और विष्णु सहित,
श्लोक 24 (skanda.8.73.24)
तमेव पुनराजग्मुस्तिष्ठते यत्र शङ्करः । अथ तान्पुनरेवासौ रुरोध गणपेश्वरः
tameva punarājagmustiṣṭhate yatra śaṅkaraḥ | atha tānpunarevāsau rurodha gaṇapeśvaraḥ
पुनः उसी स्थान पर आए जहाँ शंकर विराजमान थे। परंतु उस गणपेश्वर ने उन्हें पुनः रोक दिया,
श्लोक 25 (skanda.8.73.25)
शंकुकर्णो गणाध्यक्षस्तेजसा प्रज्वलन्निव । अथ ब्रह्मा तमाहेदं सान्त्वमर्थयुतं वचः
śaṁkukarṇo gaṇādhyakṣastejasā prajvalanniva | atha brahmā tamāhedaṁ sāntvamarthayutaṁ vacaḥ
-गणाध्यक्ष शंकुकर्ण, तेज से मानो प्रज्वलित होते हुए। तब ब्रह्मा ने उससे यह शांतिपूर्ण, अर्थपूर्ण वचन कहा -
श्लोक 26 (skanda.8.73.26)
गणेश्वर न देवानां दौष्ट्यं किञ्चिद्धि विद्यते । तव प्रसादात्पश्यन्तु देवा देवं वृषध्वजम्
gaṇeśvara na devānāṁ dauṣṭyaṁ kiñciddhi vidyate | tava prasādātpaśyantu devā devaṁ vṛṣadhvajam
'हे गणेश्वर, देवताओं में कुछ भी दुष्टता नहीं है; तुम्हारी कृपा से देवगण देव वृषभध्वज का दर्शन करें।'
श्लोक 27 (skanda.8.73.27)
शिरसा प्रणातास्तुभ्यं देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः । अहं च विष्णुना सार्धं प्रयाचेम गणेश्वर
śirasā praṇātāstubhyaṁ devāścendrapurogamāḥ | ahaṁ ca viṣṇunā sārdhaṁ prayācema gaṇeśvara
'इंद्र के नेतृत्व में देवगण तुम्हें सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं; और हे गणेश्वर, मैं भी विष्णु के साथ तुमसे यह याचना करता हूँ।'
श्लोक 28 (skanda.8.73.28)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः स गणेश्वरः । क्रुद्धः पट्टिशमुद्यम्य वचः प्रोवाच निष्ठुरम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā brahmaṇaḥ sa gaṇeśvaraḥ | kruddhaḥ paṭṭiśamudyamya vacaḥ provāca niṣṭhuram
ब्रह्मा का यह वचन सुनकर, वह गणेश्वर क्रुद्ध होकर, पट्टिश उठाकर, यह कठोर वचन बोला -
श्लोक 29 (skanda.8.73.29)
न मे गुरुतरो देवाः प्रणामो भवतां न्वयम् । आज्ञा गरीयसी शम्भोर्न प्रवेशोस्ति कश्चन
na me gurutaro devāḥ praṇāmo bhavatāṁ nvayam | ājñā garīyasī śambhorna praveśosti kaścana
'हे देवो, तुम्हारा यह प्रणाम मेरे लिए अधिक भारी नहीं है; शंभु की आज्ञा अधिक गुरुतर है - कोई प्रवेश नहीं होगा।'
श्लोक 30 (skanda.8.73.30)
प्रतिषिद्धान् कथं ब्रह्मन्नियुक्ता रक्षणाय च । ईशाज्ञां समतिक्रम्य प्रयच्छाम प्रवेशनम्
pratiṣiddhān kathaṁ brahmanniyuktā rakṣaṇāya ca | īśājñāṁ samatikramya prayacchāma praveśanam
'हे ब्रह्मन्, निषिद्ध किए गए और रक्षा के लिए नियुक्त हुए हम, ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करके प्रवेश कैसे दें?'
श्लोक 31 (skanda.8.73.31)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा गणेशस्य महात्मनः । एकान्तं प्रययौ ब्रह्मा लज्जया परयान्वितः
tasya tadvacanaṁ śrutvā gaṇeśasya mahātmanaḥ | ekāntaṁ prayayau brahmā lajjayā parayānvitaḥ
उस महात्मा गणेश का यह वचन सुनकर, ब्रह्मा अत्यंत लज्जा से युक्त होकर एकांत में चले गए।
श्लोक 32 (skanda.8.73.32)
देवाः सर्वे ततो दृष्ट्वा व्रीडायुक्तं पितामहम् । क्रुद्धा मन्युपरीताङ्गा वाक्यमूचुर्गणेश्वरम्
devāḥ sarve tato dṛṣṭvā vrīḍāyuktaṁ pitāmaham | kruddhā manyuparītāṅgā vākyamūcurgaṇeśvaram
तब सभी देवगण पितामह को लज्जित देखकर, क्रुद्ध होकर, क्रोध से आविष्ट होकर, गणेश्वर से यह वचन बोले -
श्लोक 33 (skanda.8.73.33)
गणाधिप न ते लज्जा गुरुमाक्रोशसे कथम् । नैवं त्वां विब्रुवन्तं हि शंस्यते वृषभध्वजः
gaṇādhipa na te lajjā gurumākrośase katham | naivaṁ tvāṁ vibruvantaṁ hi śaṁsyate vṛṣabhadhvajaḥ
'हे गणाधिप, तुम्हें लाज नहीं आती कि गुरु को अपमानित करते हो? वृषभध्वज तुम्हें इस प्रकार बोलते हुए कभी सराहेंगे नहीं।'
श्लोक 34 (skanda.8.73.34)
अवमानं पुनर्मैवं त्वमस्माकं कृथा गण । माद्य ते वयमुद्युक्ता नाशयिष्याम जीवितम्
avamānaṁ punarmaivaṁ tvamasmākaṁ kṛthā gaṇa | mādya te vayamudyuktā nāśayiṣyāma jīvitam
'हे गण, हमारा फिर से इस प्रकार अपमान मत करो; ऐसा मत सोचो, आज हम तुम्हारा जीवन ही नष्ट कर देंगे।'
श्लोक 35 (skanda.8.73.35)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा शंकुकर्णो रुषान्वितः । वचः प्रोवाच संक्रुद्धस्तिर्यग् वीक्ष्य दिवौकसः
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā śaṁkukarṇo ruṣānvitaḥ | vacaḥ provāca saṁkruddhastiryag vīkṣya divaukasaḥ
उनका यह वचन सुनकर, क्रोध से भरे शंकुकर्ण ने, अत्यंत क्रुद्ध होकर, स्वर्गवासियों को तिरछी दृष्टि से देखते हुए, यह वचन कहा -
श्लोक 36 (skanda.8.73.36)
गुरवः किं भवन्तो मे येन शङ्केमराधिपाः । प्रसाद्य शङ्करं यूयं गता देवत्वमुत्तमम्
guravaḥ kiṁ bhavanto me yena śaṅkemarādhipāḥ | prasādya śaṅkaraṁ yūyaṁ gatā devatvamuttamam
'हे अमराधिपो, क्या तुम मेरे गुरु हो कि मैं तुमसे डरूँ? तुमने शंकर को प्रसन्न करके ही यह उत्तम देवत्व पाया है।'
श्लोक 37 (skanda.8.73.37)
गणभूताः सुरेशस्य यूयमप्यमरोत्तमाः । वयमप्यतियोगीशा गणपास्तस्य शूलिनः
gaṇabhūtāḥ sureśasya yūyamapyamarottamāḥ | vayamapyatiyogīśā gaṇapāstasya śūlinaḥ
'हे श्रेष्ठ अमरो, तुम भी सुरेश के गण ही हो; हम भी उन शूलधारी के अत्यंत योगीश्वर गण हैं।'
श्लोक 38 (skanda.8.73.38)
समाना यूयमस्माकं हीना वा त्रिदिवौकसः । यस्माद्वयं सुरेशानं पश्यामोनुचराम च
samānā yūyamasmākaṁ hīnā vā tridivaukasaḥ | yasmādvayaṁ sureśānaṁ paśyāmonucarāma ca
'हे त्रिदिवौकसो, तुम हमारे समान हो, या हीन भी - क्योंकि हम सुरेश को देखते हैं और उनकी सेवा करते हैं,'
श्लोक 39 (skanda.8.73.39)
सर्वैरेव सुरैस्तस्माद्वयं पूज्याः सदाधिकाः । पश्यामो निर्भया यूयं प्रवेशं कुरुतामराः
sarvaireva suraistasmādvayaṁ pūjyāḥ sadādhikāḥ | paśyāmo nirbhayā yūyaṁ praveśaṁ kurutāmarāḥ
'-इसलिए हम समस्त देवताओं द्वारा सदा अधिक पूज्य हैं। हम निर्भय होकर उनका दर्शन करते हैं - हे अमरो, चाहो तो प्रवेश करके देखो!'
श्लोक 40 (skanda.8.73.40)
यावदद्य गणेशानां बलं द्रक्ष्यथ दारुणम् । यद्वो बलं च योगश्च यत्तपो यश्च वः श्रमः
yāvadadya gaṇeśānāṁ balaṁ drakṣyatha dāruṇam | yadvo balaṁ ca yogaśca yattapo yaśca vaḥ śramaḥ
'आज तुम गणेशों का भयंकर बल देखोगे। तुम्हारे पास जो भी बल, योग, तप और श्रम है,'
श्लोक 41 (skanda.8.73.41)
तत्सर्वं दर्शयध्वं वै ततो द्रक्ष्यथ मे बलम् । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे देवाः सुगर्विताः
tatsarvaṁ darśayadhvaṁ vai tato drakṣyatha me balam | tasya tadvacanaṁ śrutvā sarve devāḥ sugarvitāḥ
'-वह सब दिखाओ; तब तुम मेरा बल देखोगे।' उसका यह वचन सुनकर, अत्यंत गर्वित सभी देवगण,
श्लोक 42 (skanda.8.73.42)
प्रगृहीतायुधाः क्षिप्रं शंकुकर्णं विदुद्रुवुः । तेषामापततां व्यास सुराणां शूरमानिनाम्
pragṛhītāyudhāḥ kṣipraṁ śaṁkukarṇaṁ vidudruvuḥ | teṣāmāpatatāṁ vyāsa surāṇāṁ śūramāninām
-शीघ्र आयुध उठाकर शंकुकर्ण पर टूट पड़े। हे व्यास, अपने पराक्रम पर गर्व करते हुए उन आक्रमणकारी देवताओं का,
श्लोक 43 (skanda.8.73.43)
बलं जग्राह योगेन शंकुकर्णो महाबलः । निगृहीतबलास्ते तु सर्व एव सुरोत्तमाः
balaṁ jagrāha yogena śaṁkukarṇo mahābalaḥ | nigṛhītabalāste tu sarva eva surottamāḥ
-महाबली शंकुकर्ण ने योग द्वारा बल हर लिया; और उन समस्त श्रेष्ठ देवताओं का बल इस प्रकार हरण हो जाने पर,
श्लोक 44 (skanda.8.73.44)
नाशक्नुवन् पदं दातुं तस्थुः स्तम्भा इवाचलाः । निगृहीतेषु देवेषु विष्णुः प्रहरतां वरः
nāśaknuvan padaṁ dātuṁ tasthuḥ stambhā ivācalāḥ | nigṛhīteṣu deveṣu viṣṇuḥ praharatāṁ varaḥ
-वे एक कदम भी नहीं बढ़ा सके, स्तंभों की तरह अचल खड़े रह गए। देवताओं के इस प्रकार वशीभूत होने पर, प्रहारकों में श्रेष्ठ विष्णु ने,
श्लोक 45 (skanda.8.73.45)
अभिदुद्राव वेगेन शंकुकर्णं गणेश्वरम् । स योगेन तदा विष्णोर्देहमस्तम्भयद्बली
abhidudrāva vegena śaṁkukarṇaṁ gaṇeśvaram | sa yogena tadā viṣṇordehamastambhayadbalī
-वेगपूर्वक गणेश्वर शंकुकर्ण पर आक्रमण किया। उस बलवान् ने योग द्वारा तब विष्णु के शरीर को ही स्तंभित कर दिया।
श्लोक 46 (skanda.8.73.46)
स योगं पुनरास्थाय विष्णुरैश्वर्यसंयुतः । युयुधे शंकुकर्णेन स चैनं प्रत्ययुध्यत
sa yogaṁ punarāsthāya viṣṇuraiśvaryasaṁyutaḥ | yuyudhe śaṁkukarṇena sa cainaṁ pratyayudhyata
अपने ऐश्वर्य से युक्त विष्णु ने पुनः योग का आश्रय लेकर शंकुकर्ण से युद्ध किया; और उसने भी उनसे प्रत्युत्तर में युद्ध किया।
श्लोक 47 (skanda.8.73.47)
तयोस्तु योगेश्वरयो र्युक्तयोर्मुनिसत्तम । बभूव सुमहद् युद्धं योगेनैव परस्परम्
tayostu yogeśvarayo ryuktayormunisattama | babhūva sumahad yuddhaṁ yogenaiva parasparam
हे मुनिश्रेष्ठ, योग में संलग्न उन दोनों योगेश्वरों के बीच, केवल योग द्वारा ही परस्पर एक महान् युद्ध हुआ।
श्लोक 48 (skanda.8.73.48)
विनिगृह्य स तं विष्णुं गणेशः शर्ववल्लभः । पितरं मम योगेन युयोध परमाद्भुतः
vinigṛhya sa taṁ viṣṇuṁ gaṇeśaḥ śarvavallabhaḥ | pitaraṁ mama yogena yuyodha paramādbhutaḥ
विष्णु को वशीभूत करके, शर्व-प्रिय, अत्यंत अद्भुत उस गणेश ने योग द्वारा मेरे पिता (ब्रह्मा) से युद्ध किया।
श्लोक 49 (skanda.8.73.49)
स सूक्ष्मं योगमास्थाय ब्रह्मा भूतान्यथाविशत् । यद्यद्विशत्यसौ भूतं ब्रह्मा लोकपितामहः
sa sūkṣmaṁ yogamāsthāya brahmā bhūtānyathāviśat | yadyadviśatyasau bhūtaṁ brahmā lokapitāmahaḥ
सूक्ष्म योग का आश्रय लेकर ब्रह्मा तब भूतों में प्रविष्ट होने लगे; परंतु लोक-पितामह ब्रह्मा जिस-जिस भूत में प्रविष्ट होते,
श्लोक 50 (skanda.8.73.50)
तत्र तत्र स्थितं ह्यग्रे शकुकर्णमवैक्षत । स भूतानि समुत्सृज्य तन्मात्राण्याविशत् प्रभुः
tatra tatra sthitaṁ hyagre śakukarṇamavaikṣata | sa bhūtāni samutsṛjya tanmātrāṇyāviśat prabhuḥ
-वहाँ-वहाँ उन्होंने सामने शंकुकर्ण को ही खड़ा पाया। तब प्रभु ने भूतों को छोड़कर तन्मात्राओं में प्रवेश किया।
श्लोक 51 (skanda.8.73.51)
इन्द्रियाण्यथ तत्त्वानि भावाँश्चैव पितामहः । तत्र तत्र स योगात्मा योगं परममास्थितम्
indriyāṇyatha tattvāni bhāvā~ścaiva pitāmahaḥ | tatra tatra sa yogātmā yogaṁ paramamāsthitam
फिर पितामह ने इंद्रियों, तत्त्वों और भावों में प्रवेश किया; परंतु वहाँ भी, वह योगात्मा,
श्लोक 52 (skanda.8.73.52)
अपश्यत् स्थूलशिरसं शकुकर्णं महाबलम् । अथास्मिन्नन्तरे व्यास देवदेवस्य शूलिनः
apaśyat sthūlaśirasaṁ śakukarṇaṁ mahābalam | athāsminnantare vyāsa devadevasya śūlinaḥ
-जो स्वयं परम योग में स्थित था, हर स्थान पर स्थूलमस्तक, महाबली शंकुकर्ण को ही देखा। तब, हे व्यास, इसी बीच, शूलधारी देवदेव के,
श्लोक 53 (skanda.8.73.53)
दिव्यं वर्षसहस्रं तु प्रययौ द्वादशात्मकम् । समाप्तं चाभवद् व्यास व्रतं तस्य महात्मनः
divyaṁ varṣasahasraṁ tu prayayau dvādaśātmakam | samāptaṁ cābhavad vyāsa vrataṁ tasya mahātmanaḥ
-बारह भागों वाला एक सहस्र दिव्य वर्ष बीत गया; और, हे व्यास, उस महात्मा का व्रत पूर्ण हो गया।
श्लोक 54 (skanda.8.73.54)
स समाप्ते व्रते तस्मिन् युगान्ताग्निसमद्युतिः । अवैक्षत दिशः सर्वा जीवयन्निव शङ्करः
sa samāpte vrate tasmin yugāntāgnisamadyutiḥ | avaikṣata diśaḥ sarvā jīvayanniva śaṅkaraḥ
उस व्रत के पूर्ण होने पर, युगांत की अग्नि के समान तेजस्वी शंकर ने मानो जीवनदान देते हुए समस्त दिशाओं का अवलोकन किया।
श्लोक 55 (skanda.8.73.55)
सोपश्यन्निगृहीताँस्तान् सर्वानेव दिवौकसः । साम्नैव स तदा देवः शकुकर्णं न्यवारयत्
sopaśyannigṛhītā~stān sarvāneva divaukasaḥ | sāmnaiva sa tadā devaḥ śakukarṇaṁ nyavārayat
स्वर्गवासियों को इस प्रकार वशीभूत देखकर, उस देव ने तब सामपूर्वक ही शंकुकर्ण को रोका -
श्लोक 56 (skanda.8.73.56)
सम्यगाज्ञा कृता वत्स त्वया मे गणपेश्वर । मुञ्च देवानिमान्सर्वान् मावमंस्था गणेश्वर
samyagājñā kṛtā vatsa tvayā me gaṇapeśvara | muñca devānimānsarvān māvamaṁsthā gaṇeśvara
'हे वत्स, हे गणपेश्वर, तुमने मेरी आज्ञा भलीभाँति पूर्ण की; अब इन समस्त देवताओं को मुक्त करो - हे गणेश्वर, इनका अपमान मत करो।'
श्लोक 57 (skanda.8.73.57)
एवं देवेन संप्रोक्तः शंकुकर्णो गणाधिपः । विमुच्य देवताः सर्वास्तस्थो देवसमीपतः
evaṁ devena saṁproktaḥ śaṁkukarṇo gaṇādhipaḥ | vimucya devatāḥ sarvāstastho devasamīpataḥ
देव द्वारा ऐसा कहे जाने पर, गणाधिप शंकुकर्ण ने समस्त देवताओं को मुक्त करके, देव के समीप जा खड़ा हुआ।
श्लोक 58 (skanda.8.73.58)
सुरा अपि तदा सर्वे व्रीडया परया युताः । प्रणेमुर्देवदेवेशं भक्त्या परमया विभुम्
surā api tadā sarve vrīḍayā parayā yutāḥ | praṇemurdevadeveśaṁ bhaktyā paramayā vibhum
सभी देवगण भी, तब अत्यंत लज्जित होकर, परम भक्तिपूर्वक उस विभु देवेश्वर देवदेव को प्रणाम करने लगे।
श्लोक 59 (skanda.8.73.59)
तांस्तदा व्रीडितान्देवः प्रहस्य विदितात्मवान् । उवाच ब्रह्मणा सार्धं विष्णुमाभाष्य सुस्वरम्
tāṁstadā vrīḍitāndevaḥ prahasya viditātmavān | uvāca brahmaṇā sārdhaṁ viṣṇumābhāṣya susvaram
आत्मज्ञानी देव ने उन लज्जित देवताओं को देखकर मुस्कुराते हुए, ब्रह्मा तथा विष्णु से मधुर स्वर में कहा -
श्लोक 60 (skanda.8.73.60)
गणेश्वरोयं देवेशा मच्छासनपरस्सदा । यदनेन कृतं किञ्चिद् व्येतु तद्वः सुरोत्तमाः । कर्तव्यं यच्च तद् ब्रूत यदर्थं यूयमागताः
gaṇeśvaroyaṁ deveśā macchāsanaparassadā | yadanena kṛtaṁ kiñcid vyetu tadvaḥ surottamāḥ | kartavyaṁ yacca tad brūta yadarthaṁ yūyamāgatāḥ
'हे देवो, यह गणेश्वर सदा मेरी आज्ञा का पालन करने वाला है; हे श्रेष्ठ देवो, इसके द्वारा जो कुछ किया गया, वह तुम्हारे मन से निकल जाए। और बताओ जिसके लिए तुम आए हो, वह कार्य क्या है।'
श्लोक 61 (skanda.8.73.61)
ब्रह्मोवाच । शंकुकर्णो ह्ययं श्रीमान गणेशो येन नो बलम् । हतं योगेन देवेश वरोस्मै संप्रदीयताम् । अस्मभ्यं परतो दद्यास्सदा दर्शनमात्मनः
brahmovāca | śaṁkukarṇo hyayaṁ śrīmāna gaṇeśo yena no balam | hataṁ yogena deveśa varosmai saṁpradīyatām | asmabhyaṁ parato dadyāssadā darśanamātmanaḥ
ब्रह्मा ने कहा - 'यह श्रीमान् गणेश शंकुकर्ण, जिसने योग द्वारा हमारा बल हर लिया - हे देवेश, इसे वर दिया जाए। और इसके बाद हमें सदा अपना दर्शन देना।'
श्लोक 62 (skanda.8.73.62)
देवदेव उवाच । अस्यैवेदं भवेन्नाम्ना पवित्रं लोकविश्रुतम् । शंकुकर्णमिति ख्यातं तथा स्थूलेश्वरं शुभम्
devadeva uvāca | asyaivedaṁ bhavennāmnā pavitraṁ lokaviśrutam | śaṁkukarṇamiti khyātaṁ tathā sthūleśvaraṁ śubham
देवदेव ने कहा - 'यह स्थान इसी के नाम से पवित्र और लोकविश्रुत होगा, शंकुकर्ण नाम से प्रसिद्ध, तथा शुभ स्थूलेश्वर नाम से भी,'
श्लोक 63 (skanda.8.73.63)
समन्ताद्योजनमितं सर्वतीर्थसमन्वितम् । सर्वयज्ञफलैर्जुष्टं सर्वदानफलैर्युतम्
samantādyojanamitaṁ sarvatīrthasamanvitam | sarvayajñaphalairjuṣṭaṁ sarvadānaphalairyutam
'-सब ओर एक योजन तक विस्तृत, समस्त तीर्थों से युक्त, समस्त यज्ञों के फल से संपन्न, समस्त दानों के फल से युक्त।'
श्लोक 64 (skanda.8.73.64)
योत्रागत्य चरुं कृत्वा मां यत्नेनार्चयिष्यति । अहोरात्रोपवासेन मम लोकं स यास्यति
yotrāgatya caruṁ kṛtvā māṁ yatnenārcayiṣyati | ahorātropavāsena mama lokaṁ sa yāsyati
'जो कोई यहाँ आकर, चरु बनाकर, प्रयत्नपूर्वक मेरी पूजा करेगा, तथा एक दिन-रात उपवास करेगा, वह मेरे लोक को प्राप्त होगा।'
श्लोक 65 (skanda.8.73.65)
यत्किञ्चिन्नियमं कृत्वा योत्र संवत्सरं वसेत् । स योगं परमं प्राप्य शंकुकर्णसमो भवेत्
yatkiñcinniyamaṁ kṛtvā yotra saṁvatsaraṁ vaset | sa yogaṁ paramaṁ prāpya śaṁkukarṇasamo bhavet
'जो कोई कोई भी नियम धारण करके यहाँ एक वर्ष निवास करेगा, वह परम योग प्राप्त करके शंकुकर्ण के समान हो जाएगा।'
श्लोक 66 (skanda.8.73.66)
यश्च प्राणानिह क्षेत्रे त्यजेन्नियममास्थितः । स देहभेदमासाद्य महागणपतिर्भवेत्
yaśca prāṇāniha kṣetre tyajenniyamamāsthitaḥ | sa dehabhedamāsādya mahāgaṇapatirbhavet
'और जो कोई नियमपूर्वक इस क्षेत्र में प्राण त्यागेगा, वह देह त्यागते समय महागणपति बन जाएगा।'
श्लोक 67 (skanda.8.73.67)
पितॄणामक्षयं श्राद्धमिह दत्तं भविष्यति । इयं चैश्वर्यसंपन्नास्तपोयोगबलान्विताः
pitṝṇāmakṣayaṁ śrāddhamiha dattaṁ bhaviṣyati | iyaṁ caiśvaryasaṁpannāstapoyogabalānvitāḥ
'यहाँ पितरों को दिया गया श्राद्ध अक्षय होगा। और ये [निवासी], ऐश्वर्य-संपन्न, तप-योग के बल से युक्त,'
श्लोक 68 (skanda.8.73.68)
नित्यं द्रक्ष्यथ मां देवाः प्रयात विगतज्वराः । ततो देवो वरं दत्त्वा देवेभ्यः प्रभुरीश्वरः
nityaṁ drakṣyatha māṁ devāḥ prayāta vigatajvarāḥ | tato devo varaṁ dattvā devebhyaḥ prabhurīśvaraḥ
'-हे देवो, मुझे नित्य देखेंगे; अपने संताप से मुक्त होकर जाओ।' तब देव, वह प्रभु ईश्वर, देवताओं को यह वर देकर,
श्लोक 69 (skanda.8.73.69)
प्रकामं दर्शनं नित्यं तत्रैवान्तरधीयत । गते तस्मिन्महादेवे ब्रह्मा सुरवरैर्वृतः
prakāmaṁ darśanaṁ nityaṁ tatraivāntaradhīyata | gate tasminmahādeve brahmā suravarairvṛtaḥ
-उन्हें इच्छानुसार नित्य दर्शन प्रदान करते हुए, वहीं अंतर्धान हो गए। उस महादेव के चले जाने पर, श्रेष्ठ देवताओं से घिरे ब्रह्मा ने,
श्लोक 70 (skanda.8.73.70)
तत्र लिङ्गं प्रतिष्ठाप्य चक्रे तीर्थान्यनेकशः । दशाश्वमेधिकं तीर्थं पुण्यं पञ्चाश्वमेधिकम्
tatra liṅgaṁ pratiṣṭhāpya cakre tīrthānyanekaśaḥ | daśāśvamedhikaṁ tīrthaṁ puṇyaṁ pañcāśvamedhikam
-वहाँ लिंग की स्थापना करके अनेक तीर्थ बनाए: दशाश्वमेधिक तीर्थ, पवित्र पंचाश्वमेधिक,
श्लोक 71 (skanda.8.73.71)
सुराणां चैव तीर्थानि कृत्वा स्वभवनं ययौ । एतत्ते कथितं व्यास सिन्धुसागरसङ्गमे
surāṇāṁ caiva tīrthāni kṛtvā svabhavanaṁ yayau | etatte kathitaṁ vyāsa sindhusāgarasaṅgame
-और देवताओं के तीर्थ बनाकर अपने भवन को चले गए। हे व्यास, यह मैंने तुम्हें सिंधु-सागर-संगम के विषय में बताया,
श्लोक 72 (skanda.8.73.72)
परं भगवतः स्थानं पवित्रं लोकविश्रुतम् । सिद्धचारणसंकीर्णमप्सरोगणसेवितम्
paraṁ bhagavataḥ sthānaṁ pavitraṁ lokaviśrutam | siddhacāraṇasaṁkīrṇamapsarogaṇasevitam
-भगवान् का वह परम स्थान, पवित्र, लोकविश्रुत, सिद्धों-चारणों से भरा, अप्सरा-गणों से सेवित,
श्लोक 73 (skanda.8.73.73)
बहुपुष्पफलोपेतं सदा विहगनादितम् । तस्मिन् गत्वा वने व्यास हिरण्याक्षः प्रतापवान्
bahupuṣpaphalopetaṁ sadā vihaganāditam | tasmin gatvā vane vyāsa hiraṇyākṣaḥ pratāpavān
-अनेक फूलों-फलों से युक्त, सदा पक्षियों के कलरव से गूँजता हुआ। हे व्यास, उस वन में जाकर, प्रतापी हिरण्याक्ष ने,
श्लोक 74 (skanda.8.73.74)
पुत्रहेतोस्तपस्तेपे ध्यायमानस्त्रिलोचनम् । अथ देवस्तदा गत्वा सगणो वृषभध्वजः
putrahetostapastepe dhyāyamānastrilocanam | atha devastadā gatvā sagaṇo vṛṣabhadhvajaḥ
-पुत्र-प्राप्ति के लिए त्रिनेत्र का ध्यान करते हुए तपस्या की। तब देव वृषभध्वज, अपने गणों सहित वहाँ जाकर,
श्लोक 75 (skanda.8.73.75)
रम्यं हिमगिरेः शृंगं मैनाकमिति विश्रुतम् । तस्थौ परमयोगीशः परं ब्रह्म सनातनम्
ramyaṁ himagireḥ śṛṁgaṁ mainākamiti viśrutam | tasthau paramayogīśaḥ paraṁ brahma sanātanam
-हिमगिरि के मैनाक नामक रमणीय शिखर पर, वहाँ ठहर गए - परम योगीश्वर, सनातन परब्रह्म।
श्लोक 76 (skanda.8.73.76)
तस्यागत्य तदा देवी संस्थिता पृष्ठतः शनैः । कराभ्यां पद्मतुल्याभ्यां नेत्रे शम्भोर्न्यमीलयत्
tasyāgatya tadā devī saṁsthitā pṛṣṭhataḥ śanaiḥ | karābhyāṁ padmatulyābhyāṁ netre śambhornyamīlayat
तब देवी वहाँ आकर, धीरे से उनके पीछे खड़ी होकर, अपने दोनों कमल-सम हाथों से शंभु के नेत्र बंद कर दिए।
श्लोक 77 (skanda.8.73.77)
जानीते नेति संचिन्त्य क्रीडार्थं हिमवत्सुता । अथ तस्मिन् क्षणे व्यास जगदन्धमजायत
jānīte neti saṁcintya krīḍārthaṁ himavatsutā | atha tasmin kṣaṇe vyāsa jagadandhamajāyata
हिमवत्-पुत्री ने 'वे नहीं जानेंगे' यह सोचकर क्रीड़ावश ऐसा किया; तब, हे व्यास, उसी क्षण संसार अंधा हो गया,
श्लोक 78 (skanda.8.73.78)
अप्रदृश्यं हि तमसा तथाभूतं पुरा यथा । अथ देवस्तदा बुद्ध्वा तृतीयं नेत्रमव्ययम्
apradṛśyaṁ hi tamasā tathābhūtaṁ purā yathā | atha devastadā buddhvā tṛtīyaṁ netramavyayam
-अंधकार से अदृश्य, जैसा पहले हुआ करता था। तब देव ने यह जानकर, अपना अव्यय तीसरा नेत्र,
श्लोक 79 (skanda.8.73.79)
ललाटेसृजदूर्ध्वस्थं युगान्ताग्निसमप्रभम् । तेजसा तस्य नेत्रस्य स गिरिर्भस्मसादभूत्
lalāṭesṛjadūrdhvasthaṁ yugāntāgnisamaprabham | tejasā tasya netrasya sa girirbhasmasādabhūt
-ललाट पर ऊर्ध्वस्थित, युगांत की अग्नि के समान तेजस्वी रचा। उस नेत्र के तेज से वह पर्वत भस्म हो गया।
श्लोक 80 (skanda.8.73.80)
पार्वती पितरं दृष्ट्वा तथा दग्धं पिनाकिना । अपनीय करौ तस्थौ विषण्णा पतिपार्श्वतः
pārvatī pitaraṁ dṛṣṭvā tathā dagdhaṁ pinākinā | apanīya karau tasthau viṣaṇṇā patipārśvataḥ
पार्वती ने अपने पिता को इस प्रकार पिनाकी द्वारा भस्म हुआ देखकर, अपने हाथ हटा लिए और विषण्ण होकर अपने पति के पास खड़ी हो गईं।
श्लोक 81 (skanda.8.73.81)
अथ देवस्तदा दृष्ट्वा विषण्णवदनामुमाम् । सौम्येन चक्षुषापश्यच्छैलं तं पुनरेव तु
atha devastadā dṛṣṭvā viṣaṇṇavadanāmumām | saumyena cakṣuṣāpaśyacchailaṁ taṁ punareva tu
तब देव ने उमा के विषण्ण मुख को देखकर, अपने सौम्य नेत्र से उस पर्वत को पुनः देखा।
श्लोक 82 (skanda.8.73.82)
स तथा दृष्टमात्रस्तु पुनः पौराणिकोभवत् । प्रकृतिस्थं पुनर्दृष्ट्वा देवी पितरमव्ययम् । प्रणम्योवाच भर्तारं हृषितास्या गिरीन्द्रजा
sa tathā dṛṣṭamātrastu punaḥ paurāṇikobhavat | prakṛtisthaṁ punardṛṣṭvā devī pitaramavyayam | praṇamyovāca bhartāraṁ hṛṣitāsyā girīndrajā
देखते ही वह फिर से पूर्ववत् हो गया। अपने अव्यय पिता को पुनः पूर्व अवस्था में देखकर, प्रसन्न मुख वाली गिरिराज-पुत्री ने पति को प्रणाम करके कहा -
श्लोक 83 (skanda.8.73.83)
शैल एष त्वया देव किमर्थं भस्मसात् कृतः । किमर्थं प्रकृतिस्थश्च पुनरेव कृतः प्रभो
śaila eṣa tvayā deva kimarthaṁ bhasmasāt kṛtaḥ | kimarthaṁ prakṛtisthaśca punareva kṛtaḥ prabho
'हे देव, इस पर्वत को आपने भस्म क्यों किया? और, हे प्रभु, इसे पुनः पूर्ववत् क्यों कर दिया?'
श्लोक 84 (skanda.8.73.84)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रोवाच परमेश्वरः । लोचने मे त्वया देवि यस्मिन्काले निमीलिते
tasyāstadvacanaṁ śrutvā provāca parameśvaraḥ | locane me tvayā devi yasminkāle nimīlite
उसका यह वचन सुनकर परमेश्वर ने कहा - 'हे देवी, जिस समय तुमने मेरे नेत्र बंद कर दिए,'
श्लोक 85 (skanda.8.73.85)
अन्धास्समभवँल्लोकास्तदा सर्वे तमोवृताः । प्रकाशार्थं ततो देवि नेत्रमेतन्मया कृतम्
andhāssamabhava~llokāstadā sarve tamovṛtāḥ | prakāśārthaṁ tato devi netrametanmayā kṛtam
'-उसी समय समस्त लोक अंधे होकर अंधकार से आवृत हो गए। इसलिए, हे देवी, मैंने प्रकाश के लिए यह नेत्र बनाया,'
श्लोक 86 (skanda.8.73.86)
ललाटे सुमहद्येन दग्धोयमचलोत्तमः । त्वाञ्च दीनां पितृवधादुपलक्ष्य ततः शुभे
lalāṭe sumahadyena dagdhoyamacalottamaḥ | tvāñca dīnāṁ pitṛvadhādupalakṣya tataḥ śubhe
'-ललाट पर वह महान् नेत्र, जिससे यह श्रेष्ठ पर्वत भस्म हुआ। और तब, हे शुभे, तुम्हें पिता के वध से दुःखी देखकर,'
श्लोक 87 (skanda.8.73.87)
प्रियार्थं तव सुश्रोणि प्रकृतिस्थः पुनः कृतः । अस्मिंश्च तमसा ग्रस्ते लोके तीव्रेण सर्वतः
priyārthaṁ tava suśroṇi prakṛtisthaḥ punaḥ kṛtaḥ | asmiṁśca tamasā graste loke tīvreṇa sarvataḥ
'-हे सुश्रोणि, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैंने इसे पुनः पूर्ववत् कर दिया। और इस लोक में, जो सब ओर से तीव्र अंधकार से ग्रस्त हुआ था,'
श्लोक 88 (skanda.8.73.88)
उत्पन्नोन्धः प्रभावेण मम देवि तथैव च । तप्यमानाय दास्यामि हिरण्याक्षाय तं सुतम्
utpannondhaḥ prabhāveṇa mama devi tathaiva ca | tapyamānāya dāsyāmi hiraṇyākṣāya taṁ sutam
'-मेरे ही प्रभाव से एक अंधा प्राणी भी उत्पन्न हुआ है, हे देवी; उस पुत्र को मैं तपस्यारत हिरण्याक्ष को दूँगा।'
श्लोक 89 (skanda.8.73.89)
एवमुक्त्वा स भगवान् प्रगृह्यान्धं गणैर्वृतः । सिन्धुसागरमागम्य हिरण्याक्षमुवाच ह
evamuktvā sa bhagavān pragṛhyāndhaṁ gaṇairvṛtaḥ | sindhusāgaramāgamya hiraṇyākṣamuvāca ha
ऐसा कहकर भगवान् ने उस अंधे को उठाकर, गणों सहित, सिंधु-सागर-संगम पर आकर हिरण्याक्ष से कहा -
श्लोक 90 (skanda.8.73.90)
पश्य मां त्वं दितेः पुत्र चक्षुर्दिव्यं ददामि ते । शर्वोहमागतो दैत्य वरं ब्रूहि यथेप्सितम्
paśya māṁ tvaṁ diteḥ putra cakṣurdivyaṁ dadāmi te | śarvohamāgato daitya varaṁ brūhi yathepsitam
'हे दिति-पुत्र, मुझे देखो; मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ। हे दैत्य, मैं शर्व आया हूँ; अपना इच्छित वर कहो।'
श्लोक 91 (skanda.8.73.91)
स प्रोत्थाय हिरण्याक्षः प्रणम्य शिरसा भवम् । वरं संप्रार्थयद् देवं पुत्रं दत्त्वेति सत्वरम्
sa protthāya hiraṇyākṣaḥ praṇamya śirasā bhavam | varaṁ saṁprārthayad devaṁ putraṁ dattveti satvaram
उठकर, हिरण्याक्ष ने भव को सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए, तुरंत देव से यह वर माँगा - 'मुझे पुत्र दीजिए।'
श्लोक 92 (skanda.8.73.92)
तमुवाच सुरश्रेष्ठः शिरसा पादयोर्नतम् । अयन्ते सुरशार्दूल पुत्रः पुत्रशताग्रजः
tamuvāca suraśreṣṭhaḥ śirasā pādayornatam | ayante suraśārdūla putraḥ putraśatāgrajaḥ
उस देवश्रेष्ठ ने, उनके चरणों में सिर झुकाए हुए उससे कहा - 'हे असुरश्रेष्ठ, यह तुम्हारा पुत्र होगा, सौ पुत्रों में अग्रज।'
श्लोक 93 (skanda.8.73.93)
मावज्ञामन्ध इत्यस्य कुर्यास्त्वमसुराधिप । भविता ते महानेष तपोवीर्थबलान्वितः
māvajñāmandha ityasya kuryāstvamasurādhipa | bhavitā te mahāneṣa tapovīrthabalānvitaḥ
'हे असुराधिप, इसे "अंधा" कहकर तिरस्कार मत करना; यह तुम्हारे लिए तप और पराक्रम-बल से युक्त महान् होगा।'
श्लोक 94 (skanda.8.73.94)
न कस्यचित्वयं वध्यो मत्तोन्यस्य भविष्यति । ततः स भगवान्देवस्तस्मै दत्त्वा सुतं शुभम्
na kasyacitvayaṁ vadhyo mattonyasya bhaviṣyati | tataḥ sa bhagavāndevastasmai dattvā sutaṁ śubham
'यह मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा वध्य नहीं होगा।' तब भगवान् देव ने उसे वह शुभ पुत्र देकर,
श्लोक 95 (skanda.8.73.95)
जगाम शिखरं रम्यं मैनाकं पुनरेव तु । आदायान्धं सुतं सोपि हिरण्याक्षो महासुरः
jagāma śikharaṁ ramyaṁ mainākaṁ punareva tu | ādāyāndhaṁ sutaṁ sopi hiraṇyākṣo mahāsuraḥ
पुनः रमणीय मैनाक शिखर को चले गए। और वह महाअसुर हिरण्याक्ष भी, अपने अंधे पुत्र को लेकर,
श्लोक 96 (skanda.8.73.96)
स्वमश्मकपुरं यात्वा भार्यामाह मनस्विनीम् । अयं तुभ्यं सुतो देवि दत्तो भगवता स्वयम्
svamaśmakapuraṁ yātvā bhāryāmāha manasvinīm | ayaṁ tubhyaṁ suto devi datto bhagavatā svayam
अपने अश्मक नगर को जाकर, अपनी उदार-चित्त पत्नी से कहा - 'हे देवी, यह पुत्र स्वयं भगवान् द्वारा तुम्हें दिया गया है,'
श्लोक 97 (skanda.8.73.97)
संवर्द्धयैनं योगेन मा प्रमादं कृथाः क्वचित् । तस्याः स्नेहेन तं दृष्टवा स्तनाभ्यां प्रस्नुतं पयः
saṁvarddhayainaṁ yogena mā pramādaṁ kṛthāḥ kvacit | tasyāḥ snehena taṁ dṛṣṭavā stanābhyāṁ prasnutaṁ payaḥ
'-इसे सावधानीपूर्वक पालो; कभी असावधानी मत करना।' उसे स्नेह से देखते ही उसके स्तनों से दूध बह निकला।
श्लोक 98 (skanda.8.73.98)
संवर्ध्यमानः कालेन सोन्धकः समवर्द्धत । यदा तु यौवनं प्राप्तस्तदैवं समचिन्तयत्
saṁvardhyamānaḥ kālena sondhakaḥ samavarddhata | yadā tu yauvanaṁ prāptastadaivaṁ samacintayat
इस प्रकार पाला जाता हुआ वह अंधक समय के साथ बड़ा होता गया; और जब वह यौवन को प्राप्त हुआ, तब उसने इस प्रकार सोचा -
श्लोक 99 (skanda.8.73.99)
धिग् जीवितं ममान्धस्य मृत्युरेव वरो मम । योहमन्धो न पश्यामि गृह संबन्धिबान्धवान्
dhig jīvitaṁ mamāndhasya mṛtyureva varo mama | yohamandho na paśyāmi gṛha saṁbandhibāndhavān
'मुझ अंधे के जीवन को धिक्कार है; मेरे लिए मृत्यु ही श्रेष्ठ है। मैं अंधा होकर अपना घर, संबंधी और बांधवों को नहीं देख पाता,'
श्लोक 100 (skanda.8.73.100)
धन्यास्ते पुरुषा लोके ये स्वयं यान्त्यविक्लवाः । दृष्ट्वा दृष्टवा मुखं बन्धूनाभाष्य हि यथासुखम्
dhanyāste puruṣā loke ye svayaṁ yāntyaviklavāḥ | dṛṣṭvā dṛṣṭavā mukhaṁ bandhūnābhāṣya hi yathāsukham
'-धन्य हैं वे पुरुष जो स्वयं बिना बाधा के चलते हैं, जो बार-बार बांधवों का मुख देखकर, सुखपूर्वक उनसे बात करते हैं।'
श्लोक 101 (skanda.8.73.101)
कार्यं भवेच्च लोष्टेन तृणेनाथ शवेन वा । न मयानुगृहीतेन धिङ्मामशुभकारिणम्
kāryaṁ bhavecca loṣṭena tṛṇenātha śavena vā | na mayānugṛhītena dhiṅmāmaśubhakāriṇam
'मिट्टी के ढेले, तिनके या शव से भी कोई काम हो सकता है - अनुगृहीत होकर भी मुझसे नहीं; धिक्कार है मुझ अशुभकारी को।'
श्लोक 102 (skanda.8.73.102)
सुतस्नेहादयं दैत्यः सदा मां रक्षते पिता । हन्तव्यं न विहन्त्येष कोषक्षयकरं हि माम्
sutasnehādayaṁ daityaḥ sadā māṁ rakṣate pitā | hantavyaṁ na vihantyeṣa koṣakṣayakaraṁ hi mām
'पुत्र-स्नेह के कारण यह दैत्य, मेरा पिता, सदा मेरी रक्षा करता है; वह वध्य मुझे, जो केवल कोष का क्षय करने वाला हूँ, नहीं मारता।'
श्लोक 103 (skanda.8.73.103)
नायं स्नेहेन संमूढो जानातीमां मम व्यथाम् । अहमेव करिष्यामि यत्कार्यं बुद्धिमत्तमैः
nāyaṁ snehena saṁmūḍho jānātīmāṁ mama vyathām | ahameva kariṣyāmi yatkāryaṁ buddhimattamaiḥ
'स्नेह से मोहित होकर वह मेरी इस व्यथा को नहीं जानता। मैं स्वयं वह कार्य करूँगा जो बुद्धिमत्तम पुरुष करते हैं -'
श्लोक 104 (skanda.8.73.104)
तपो महत्समास्थाय चक्षुष्मान् भविता ह्यहम् । स एवं परिनिश्चिन्त्य बहुधान्धः सुबुद्धिमान्
tapo mahatsamāsthāya cakṣuṣmān bhavitā hyaham | sa evaṁ pariniścintya bahudhāndhaḥ subuddhimān
'-महान् तपस्या करके मैं निश्चय ही नेत्रवान् बनूँगा।' इस प्रकार बहुधा भलीभाँति निश्चय करके, वह बुद्धिमान् अंधा,
श्लोक 105 (skanda.8.73.105)
आमन्त्र्य सहितं मात्रा पितरं तं प्रणम्य च । जगाम तपसे धीमान् संकल्प्य कृतनिश्चयः
āmantrya sahitaṁ mātrā pitaraṁ taṁ praṇamya ca | jagāma tapase dhīmān saṁkalpya kṛtaniścayaḥ
-माता सहित पिता से आज्ञा लेकर, उन्हें प्रणाम करके, वह बुद्धिमान्, दृढ़ निश्चय करके, तपस्या के लिए चल पड़ा।
श्लोक 106 (skanda.8.73.106)
पित्रा शोकपरिप्लुतेक्षणमुखेनायासखिन्नात्मना । मात्रा चासकृदश्रुपातमुखया संवीक्ष्यमाणश्चिरम् । तत्तीव्राधृतिखेददृष्टिविरह प्रक्ष्वेडितोन्धः श्वसन् । ध्यायन्देवमुमापतिं स तपसे यातो गृहादन्धकः
pitrā śokapariplutekṣaṇamukhenāyāsakhinnātmanā | mātrā cāsakṛdaśrupātamukhayā saṁvīkṣyamāṇaściram | tattīvrādhṛtikhedadṛṣṭiviraha prakṣveḍitondhaḥ śvasan | dhyāyandevamumāpatiṁ sa tapase yāto gṛhādandhakaḥ
शोक से आप्लावित नेत्रों और मुख वाले, कष्ट से खिन्न-चित्त पिता द्वारा, तथा बार-बार अश्रुपात करते मुख वाली माता द्वारा दीर्घकाल तक निहारा जाता हुआ - वह अंधक, उस तीव्र अधीरता, खेद और विरह-दृष्टि से पुकारा जाता हुआ, दीर्घ श्वास लेते हुए, उमापति देव का ध्यान करते हुए, तपस्या के लिए घर से निकल पड़ा।