अम्बिका खण्ड · अध्याय 74
अंधक का वरलाभ
श्लोक 1 (skanda.8.74.1)
सनत्कुमार उवाच । अथ गत्वा स विप्रेन्द्र हिरण्याक्षसुतस्तदा । गङ्गाद्वारं शुभद्वारं तपोवनमनुत्तमम्
sanatkumāra uvāca | atha gatvā sa viprendra hiraṇyākṣasutastadā | gaṅgādvāraṁ śubhadvāraṁ tapovanamanuttamam
सनत्कुमार ने कहा - हे विप्रेंद्र, तब वह हिरण्याक्ष-पुत्र गंगाद्वार गया, वह शुभ द्वार, वह सर्वोत्तम तपोवन,
श्लोक 2 (skanda.8.74.2)
दिव्यं कनखलं नाम यत्र हैरण्वती नदी । वृक्षाः कनखला यत्र सर्व एव हि काञ्चनाः
divyaṁ kanakhalaṁ nāma yatra hairaṇvatī nadī | vṛkṣāḥ kanakhalā yatra sarva eva hi kāñcanāḥ
-दिव्य कनखल नामक स्थान, जहाँ हैरण्वती नदी बहती है, जहाँ कनखल के सभी वृक्ष स्वर्णमय हैं,
श्लोक 3 (skanda.8.74.3)
यत्र दक्षः पुरा यज्ञमयजद् दैवतैस्सह । महादेवेन यत्रास्य यज्ञो विनिहतः पुरा
yatra dakṣaḥ purā yajñamayajad daivataissaha | mahādevena yatrāsya yajño vinihataḥ purā
-जहाँ दक्ष ने प्राचीन काल में देवताओं सहित यज्ञ किया था, और जहाँ महादेव द्वारा उनका यज्ञ पहले नष्ट किया गया था।
श्लोक 4 (skanda.8.74.4)
तत्रासौ देवमभ्यर्च्य स्नातः प्रयतमानसः । नमस्कृत्वा दैवतेभ्य इदं वचनमब्रवीत्
tatrāsau devamabhyarcya snātaḥ prayatamānasaḥ | namaskṛtvā daivatebhya idaṁ vacanamabravīt
वहाँ, स्नान करके, संयत मन से देव की पूजा करके, और देवताओं को नमस्कार करके, उसने यह वचन कहा -
श्लोक 5 (skanda.8.74.5)
अन्धक उवाच । येस्मिन् तपोवने देवा भूतानि विविधानि च । सर्वांस्ताञ्छरणं यामि तपःसिद्धिं दिशन्तु मे
andhaka uvāca | yesmin tapovane devā bhūtāni vividhāni ca | sarvāṁstāñcharaṇaṁ yāmi tapaḥsiddhiṁ diśantu me
अंधक ने कहा - 'इस तपोवन में जो भी देवता और विविध प्राणी रहते हैं, उन सबकी मैं शरण लेता हूँ; वे मुझे तपःसिद्धि प्रदान करें।'
श्लोक 6 (skanda.8.74.6)
अद्यप्रभृति कर्त्तास्मि तप उग्रं सुदुश्चरम् । वरान् येनाप्नुयामिष्टान्मृत्युं वा प्राणनाशनम
adyaprabhṛti karttāsmi tapa ugraṁ suduścaram | varān yenāpnuyāmiṣṭānmṛtyuṁ vā prāṇanāśanama
'आज से मैं उग्र, अत्यंत दुष्कर तपस्या करूँगा, जिससे मैं अपने इच्छित वर प्राप्त करूँ, अन्यथा प्राणनाशक मृत्यु।'
श्लोक 7 (skanda.8.74.7)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्त्वा तु ततः पाराशर्य महाबलः । संवत्सरं वायुभक्षो बभूव क्लमवर्जितः
sanatkumāra uvāca | sa evamuktvā tu tataḥ pārāśarya mahābalaḥ | saṁvatsaraṁ vāyubhakṣo babhūva klamavarjitaḥ
सनत्कुमार ने कहा - हे पाराशर्य, ऐसा कहकर, वह महाबली एक वर्ष तक केवल वायु पर निर्वाह करते हुए, थकान से रहित रहा।
श्लोक 8 (skanda.8.74.8)
तथा त्रिषवण स्नायी जुह्वानोग्नीँस्तथैव च । देवार्चनरतश्चैव जपहोमपरस्तथा
tathā triṣavaṇa snāyī juhvānognī~stathaiva ca | devārcanarataścaiva japahomaparastathā
वह त्रिकाल स्नान करता था, अग्नियों में आहुति देता था, देव-पूजा में रत रहता था, तथा जप-होम में संलग्न रहता था।
श्लोक 9 (skanda.8.74.9)
वर्षे वर्षे तु संपूर्णे स्वाङ्गादुत्कृत्य कार्षिकम् । पिशितस्य तदा भागं जुहावाग्नौ महासुरः
varṣe varṣe tu saṁpūrṇe svāṅgādutkṛtya kārṣikam | piśitasya tadā bhāgaṁ juhāvāgnau mahāsuraḥ
और प्रत्येक वर्ष पूर्ण होने पर, वह महाअसुर अपने ही अंगों से एक कर्ष-भार मांस काटकर उसे अग्नि में हवन कर देता था।
श्लोक 10 (skanda.8.74.10)
एवं तस्यागमद्दिव्यं सहस्रं मुनिसत्तम । जुह्वतः स्वानि मांसानि वर्षाणां प्रत्यहं तदा
evaṁ tasyāgamaddivyaṁ sahasraṁ munisattama | juhvataḥ svāni māṁsāni varṣāṇāṁ pratyahaṁ tadā
हे मुनिश्रेष्ठ, इस प्रकार अपने ही मांस की आहुति देते हुए, उसके एक सहस्र दिव्य वर्ष बीत गए।
श्लोक 11 (skanda.8.74.11)
सोसुरः शंखहाराम्बुसुधाकुन्देन्दुपाण्डरः । बभूवास्थिसिराशेषः केवलं तपसि स्थितः
sosuraḥ śaṁkhahārāmbusudhākundendupāṇḍaraḥ | babhūvāsthisirāśeṣaḥ kevalaṁ tapasi sthitaḥ
वह असुर, शंख, हार, जल, अमृत, कुंद-पुष्प और चंद्रमा के समान पीला-सफेद पड़कर, केवल अस्थि-शिराओं का शेष रह गया, केवल तपस्या में स्थित।
श्लोक 12 (skanda.8.74.12)
स तेन तपसा युक्तो भास्करं निष्प्रभं तदा १ । सोमं च ग्रहताराभिस्सह चक्रे मितात्मवान्
sa tena tapasā yukto bhāskaraṁ niṣprabhaṁ tadā 1 | somaṁ ca grahatārābhissaha cakre mitātmavān
उस तपस्या से युक्त होकर, उस संयतात्मा ने सूर्य को निस्तेज कर दिया, और चंद्रमा को ग्रहों-तारों सहित भी।
श्लोक 13 (skanda.8.74.13)
स एव भास्करो यद्वत् प्रकाशयति तेजसा । अशोषयत् पल्वलानि नदीकूपसरांसि च
sa eva bhāskaro yadvat prakāśayati tejasā | aśoṣayat palvalāni nadīkūpasarāṁsi ca
जैसे सूर्य स्वयं अपने तेज से प्रकाशित करता है, वैसे ही उसने तालाबों, नदियों, कुओं और सरोवरों को सुखा दिया।
श्लोक 14 (skanda.8.74.14)
पवनं स्तम्भयामास सोन्धकस्तपसा तदा । व्योम्नि सिद्धा न गच्छन्ति विमानानि च पेतिरे
pavanaṁ stambhayāmāsa sondhakastapasā tadā | vyomni siddhā na gacchanti vimānāni ca petire
उस अंधक ने अपनी तपस्या से तब वायु को भी स्तंभित कर दिया; सिद्धगण आकाश में गति नहीं कर पाते थे, और उनके विमान गिर पड़ते थे।
श्लोक 15 (skanda.8.74.15)
तस्य तत्तपसो रूपं दृष्टवा विघ्नशतान्युत । अकरोत् सहसा शक्रो विक्रियां न च सोन्वगात्
tasya tattapaso rūpaṁ dṛṣṭavā vighnaśatānyuta | akarot sahasā śakro vikriyāṁ na ca sonvagāt
उसकी उस तपस्या के रूप को देखकर, इंद्र ने सहसा सैकड़ों विघ्न उत्पन्न किए; परंतु वे उसे विचलित नहीं कर सके।
श्लोक 16 (skanda.8.74.16)
ततो ब्रह्मा तमभ्येत्य प्रोवाचान्धकदानवम् । महासुर तपो घोरं त्वया तप्तं महाबल । तुष्टोस्मि ते महाबाहो चक्षुष्मान्भव सुव्रत
tato brahmā tamabhyetya provācāndhakadānavam | mahāsura tapo ghoraṁ tvayā taptaṁ mahābala | tuṣṭosmi te mahābāho cakṣuṣmānbhava suvrata
तब ब्रह्मा ने पास आकर दानव अंधक से कहा - 'हे महाअसुर, हे महाबली, तुमने घोर तपस्या की है; हे महाबाहु, हे सुव्रत, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ - नेत्रवान् बनो।'
श्लोक 17 (skanda.8.74.17)
शरीरं प्रकृतिं यातु यथापूर्वञ्च तेसुर । ब्रूहि चान्यं वरं भूयो यस्ते मनसि संस्थितः
śarīraṁ prakṛtiṁ yātu yathāpūrvañca tesura | brūhi cānyaṁ varaṁ bhūyo yaste manasi saṁsthitaḥ
'हे असुर, तुम्हारा शरीर पूर्ववत् अपनी प्रकृति में लौट आए; और जो भी अन्य वर तुम्हारे मन में स्थित हो, वह बताओ।'
श्लोक 18 (skanda.8.74.18)
सनत्कुमार उवाच । स चक्षुष्माँस्तदा भूत्वा शरीरेणाक्षतेन च । उवाच प्रणतः साक्षाद् ब्रह्माणं लोकभावनम्
sanatkumāra uvāca | sa cakṣuṣmā~stadā bhūtvā śarīreṇākṣatena ca | uvāca praṇataḥ sākṣād brahmāṇaṁ lokabhāvanam
सनत्कुमार ने कहा - तब नेत्रवान् होकर, अक्षत शरीर के साथ, उसने प्रणाम करके साक्षात् लोक-भावन ब्रह्मा से कहा -
श्लोक 19 (skanda.8.74.19)
अन्धक उवाच । भगवन् यदि तुष्टोसि यदि मे चरितं तपः । अप्रतिद्वन्द्वतां संख्ये दैवतेभ्यः पितामह
andhaka uvāca | bhagavan yadi tuṣṭosi yadi me caritaṁ tapaḥ | apratidvandvatāṁ saṁkhye daivatebhyaḥ pitāmaha
अंधक ने कहा - 'हे भगवन्, यदि आप प्रसन्न हैं, और यदि मेरी तपस्या सफल हुई है, तो हे पितामह, मुझे युद्ध में देवताओं पर अप्रतिद्वंद्विता प्रदान करें,'
श्लोक 20 (skanda.8.74.20)
महाबलत्वं मायाश्च तथा चामरतामपि । एतदिच्छामि देवेश यदि त्वं वरदो मम
mahābalatvaṁ māyāśca tathā cāmaratāmapi | etadicchāmi deveśa yadi tvaṁ varado mama
'-महाबल, माया-शक्तियाँ, तथा अमरत्व भी; यही मैं चाहता हूँ, हे देवेश, यदि आप मुझे वर देने वाले हैं।'
श्लोक 21 (skanda.8.74.21)
सनत्कुमार उवाच । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रहस्य भगवान् विभुः । हिरण्याक्षसुतं प्राह पुनरेव वचः शुभम्
sanatkumāra uvāca | tasya tad vacanaṁ śrutvā prahasya bhagavān vibhuḥ | hiraṇyākṣasutaṁ prāha punareva vacaḥ śubham
सनत्कुमार ने कहा - उसका यह वचन सुनकर, विभु भगवान् ने मुस्कुराते हुए हिरण्याक्ष-पुत्र से पुनः यह शुभ वचन कहा -
श्लोक 22 (skanda.8.74.22)
अमरत्वं न दैत्यस्य ददामि दितिनन्दन । सान्तरं तु भवेत्तत्ते स्वयमेवोत्तरं वद
amaratvaṁ na daityasya dadāmi ditinandana | sāntaraṁ tu bhavettatte svayamevottaraṁ vada
'हे दितिनंदन, मैं किसी दैत्य को अमरत्व नहीं देता; परंतु यह तुम्हें एक अपवाद सहित मिल सकता है - तुम स्वयं ही उत्तर (शर्त) बताओ।'
श्लोक 23 (skanda.8.74.23)
अन्धक उवाच । या स्त्री स्याल्लोकमाता वै प्रणमेयं न तां यदि । तदा स्यान्मम मृत्युस्तु मृत्युहीनोन्यथा ह्यहम्
andhaka uvāca | yā strī syāllokamātā vai praṇameyaṁ na tāṁ yadi | tadā syānmama mṛtyustu mṛtyuhīnonyathā hyaham
अंधक ने कहा - 'जो स्त्री लोक-माता हो, यदि मैं उसे वासनापूर्वक देखकर प्रणाम न करूँ, तो तभी मेरी मृत्यु हो; अन्यथा मैं मृत्युरहित रहूँ।'
श्लोक 24 (skanda.8.74.24)
ब्रह्मोवाच । एवमेतद् भवतु ते त्वया प्रोक्तं यदद्य वै । अन्धको भव नाम्ना त्वं लोके ख्यातिं च यास्यसि
brahmovāca | evametad bhavatu te tvayā proktaṁ yadadya vai | andhako bhava nāmnā tvaṁ loke khyātiṁ ca yāsyasi
ब्रह्मा ने कहा - 'ऐसा ही हो, जैसा तुमने आज कहा है। तुम अंधक नाम से ही रहोगे, और लोक में प्रसिद्धि पाओगे।'
श्लोक 25 (skanda.8.74.25)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्त्वा स भगवानन्धकं देवकण्टकम् । जगाम स्वं तदावासं विररामान्धकश्च सः
sanatkumāra uvāca | evamuktvā sa bhagavānandhakaṁ devakaṇṭakam | jagāma svaṁ tadāvāsaṁ virarāmāndhakaśca saḥ
सनत्कुमार ने कहा - देव-कंटक अंधक से ऐसा कहकर, भगवान् अपने धाम को चले गए; और अंधक ने भी तपस्या समाप्त कर दी।
श्लोक 26 (skanda.8.74.26)
स गङ्गाम्भोभिराप्लुत्य देवमिष्ट्वा यथाविधि । अग्निं हुत्वा ततो धीमाननुमान्य तपोवनम् । सहायैत्सह दैत्येन्द्रो जगाम पितुरन्तिकम्
sa gaṅgāmbhobhirāplutya devamiṣṭvā yathāvidhi | agniṁ hutvā tato dhīmānanumānya tapovanam | sahāyaitsaha daityendro jagāma piturantikam
गंगा-जल में स्नान करके, विधिपूर्वक देव की पूजा करके, अग्नि में आहुति देकर, वह बुद्धिमान् दैत्येंद्र तब तपोवन से अनुमति लेकर, अपने सहायकों सहित पिता के समीप गया।
श्लोक 27 (skanda.8.74.27)
स हृष्टचेतास्तपसा महाबलो विवृद्धकामः सुरशत्रुतोषणः । पितुस्सकाशं पुनरेव दीप्तिमानगच्छदुद्धूतबलाहकोपमः
sa hṛṣṭacetāstapasā mahābalo vivṛddhakāmaḥ suraśatrutoṣaṇaḥ | pitussakāśaṁ punareva dīptimānagacchaduddhūtabalāhakopamaḥ
अपनी तपस्या से प्रसन्नचित्त, इच्छाओं से पूर्ण, देव-शत्रुओं को संतुष्ट करने वाला वह महाबली, तेजस्वी होकर, वायु-प्रेरित मेघ के समान, पुनः पिता के समीप गया।