अम्बिका खण्ड · अध्याय 75
कौमुदी-महोत्सव
श्लोक 1 (skanda.8.75.1)
सनत्कुमार उवाच । सोष्टाभिर्दानवैस्सार्धं गत्वा तत्पुरमन्तिके । निवेदयामास पितुः कृतार्थोन्धक आगतः
sanatkumāra uvāca | soṣṭābhirdānavaissārdhaṁ gatvā tatpuramantike | nivedayāmāsa pituḥ kṛtārthondhaka āgataḥ
सनत्कुमार ने कहा - आठ दानवों सहित उस नगर के निकट जाकर, कृतार्थ अंधक ने पिता को अपने आगमन की सूचना दी।
श्लोक 2 (skanda.8.75.2)
प्रियाख्यातुस्ततो व्यास हिरण्याक्षोसुरेश्वरः । ददौ रत्नान्यनेकानि तथा कामानभीप्सितान्
priyākhyātustato vyāsa hiraṇyākṣosureśvaraḥ | dadau ratnānyanekāni tathā kāmānabhīpsitān
हे व्यास, तब असुरेश्वर हिरण्याक्ष ने उस प्रिय समाचार लाने वाले को अनेक रत्न तथा इच्छित वस्तुएँ दीं।
श्लोक 3 (skanda.8.75.3)
स्वयं राजा तदा सर्वैः सुहृद्भिः सहवाहनैः । सह स्त्रीभिर्ययौ तूर्णं सोमस्तारागणैरिव
svayaṁ rājā tadā sarvaiḥ suhṛdbhiḥ sahavāhanaiḥ | saha strībhiryayau tūrṇaṁ somastārāgaṇairiva
राजा स्वयं तब समस्त मित्रों और उनके वाहनों सहित, स्त्रियों सहित, तुरंत चल पड़ा, जैसे चंद्रमा तारागणों के साथ चलता है।
श्लोक 4 (skanda.8.75.4)
स गत्वा नातिदूरेथ वने साशोकचम्पके । आससाद सुतं श्रीमान् सोमो बुधमिवापरम्
sa gatvā nātidūretha vane sāśokacampake | āsasāda sutaṁ śrīmān somo budhamivāparam
अधिक दूर न जाकर, अशोक-चंपक से युक्त उस वन में, वह श्रीमान् अपने पुत्र से इस प्रकार मिला जैसे चंद्रमा किसी दूसरे बुध से मिलता है।
श्लोक 5 (skanda.8.75.5)
कृतार्थं स सुतं दृष्ट्वा तुष्टोभूद्दानवेश्वरः । स्नेहात्स तं परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाघ्राय चासकृत्
kṛtārthaṁ sa sutaṁ dṛṣṭvā tuṣṭobhūddānaveśvaraḥ | snehātsa taṁ pariṣvajya mūrdhnyupāghrāya cāsakṛt
अपने पुत्र को कृतार्थ देखकर, वह दानवेश्वर अत्यंत प्रसन्न हो उठा; स्नेह से उसे गले लगाकर, बार-बार उसका मस्तक चूमा।
श्लोक 6 (skanda.8.75.6)
कथं केन च कालेन के च लब्धा वरास्त्वया । पृष्टः स कथयामास यथावृत्तमशेषतः
kathaṁ kena ca kālena ke ca labdhā varāstvayā | pṛṣṭaḥ sa kathayāmāsa yathāvṛttamaśeṣataḥ
'कैसे, कितने समय में, और तुमने क्या-क्या वर प्राप्त किए?' ऐसा पूछे जाने पर, उसने संपूर्ण वृत्तांत ज्यों का त्यों बताया।
श्लोक 7 (skanda.8.75.7)
तस्य तद्वरदानञ्च तथा माहात्म्यमेव च । श्रुत्वा तेसुरशार्दूलाः प्रणेदुः सागरा इव
tasya tadvaradānañca tathā māhātmyameva ca | śrutvā tesuraśārdūlāḥ praṇeduḥ sāgarā iva
उसके उस वरदान और उस महिमा को सुनकर, वे असुर-शार्दूल सागरों के समान गरज उठे।
श्लोक 8 (skanda.8.75.8)
सनत्कुमार उवाच । ततस्तं रथमारोप्य हिरण्याक्षोन्धकं सुतम् । सुहृद्भिस्तैः सहैवाशु प्रविवेश स्वकं पुरम्
sanatkumāra uvāca | tatastaṁ rathamāropya hiraṇyākṣondhakaṁ sutam | suhṛdbhistaiḥ sahaivāśu praviveśa svakaṁ puram
सनत्कुमार ने कहा - तब अपने पुत्र अंधक को रथ पर बैठाकर, हिरण्याक्ष उन मित्रों सहित शीघ्र अपने नगर में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 9 (skanda.8.75.9)
स पुत्रसहितो भाति दैत्यः संपूर्णमानसः । चरन् राशिमिवादित्यो यथा सह शनैश्चरः
sa putrasahito bhāti daityaḥ saṁpūrṇamānasaḥ | caran rāśimivādityo yathā saha śanaiścaraḥ
वह दैत्य, हृदय से पूर्ण संतुष्ट होकर, पुत्र सहित इस प्रकार शोभित हुआ जैसे शनि सहित सूर्य किसी राशि में विचरण करता हुआ शोभित होता है।
श्लोक 10 (skanda.8.75.10)
सनत्कुमार उवाच । ततः प्रविश्य दैत्येन्द्रः सुहृद्वर्गमुवाच सः । अध्वर्युरिव सान्नाय्ये यथान्यानृत्विजः स्थितान्
sanatkumāra uvāca | tataḥ praviśya daityendraḥ suhṛdvargamuvāca saḥ | adhvaryuriva sānnāyye yathānyānṛtvijaḥ sthitān
सनत्कुमार ने कहा - तब प्रविष्ट होकर दैत्येंद्र ने अपने मित्र-वर्ग से कहा, जैसे अध्वर्यु सान्नाय्य कर्म में अन्य ऋत्विजों से खड़े होकर कहता है।
श्लोक 11 (skanda.8.75.11)
हिरण्याक्ष उवाच । शृणुध्वं यदिदानीं मे कृत्यं हृदि चिरस्थितम् । कर्तव्यं सह सर्वैस्तु युष्माभिर्भीमविक्रमैः
hiraṇyākṣa uvāca | śṛṇudhvaṁ yadidānīṁ me kṛtyaṁ hṛdi cirasthitam | kartavyaṁ saha sarvaistu yuṣmābhirbhīmavikramaiḥ
हिरण्याक्ष ने कहा - 'सुनो, अब मेरे हृदय में जो कार्य दीर्घकाल से स्थित है, वह तुम सबके साथ मिलकर पूर्ण किया जाना है, हे भीम-पराक्रमियो,'
श्लोक 12 (skanda.8.75.12)
मया मनीषितं पूर्व कृतकृत्य इहागते । अन्धके नगरेस्मिन्वै कर्ताहं कौमुदीमिति
mayā manīṣitaṁ pūrva kṛtakṛtya ihāgate | andhake nagaresminvai kartāhaṁ kaumudīmiti
'-जो मैंने पहले सोचा था: अब कि अंधक कृतकार्य होकर यहाँ आ गया है, मैं इस नगर में कौमुदी उत्सव मनाऊँगा।'
श्लोक 13 (skanda.8.75.13)
मखघ्नस्य च देवस्य देवरात्रिं महाप्रभाम् । करिष्यामीति तत्सर्वं क्रियतामविशंकया
makhaghnasya ca devasya devarātriṁ mahāprabhām | kariṣyāmīti tatsarvaṁ kriyatāmaviśaṁkayā
'और यज्ञघातक देव (शिव) की महाप्रभा वाली देवरात्रि भी मनाऊँगा; यह सब बिना संकोच के किया जाए।'
श्लोक 14 (skanda.8.75.14)
घुष्यतां नगरे ह्यस्मिंश्चत्वरेषु सभासु च । कौमुदीदिवसानष्टौ सप्त चैव ममाज्ञया
ghuṣyatāṁ nagare hyasmiṁścatvareṣu sabhāsu ca | kaumudīdivasānaṣṭau sapta caiva mamājñayā
'इस नगर में, चौराहों और सभाओं में मेरी आज्ञा से यह घोषित किया जाए कि कौमुदी के आठ - या सात - दिन होंगे,'
श्लोक 15 (skanda.8.75.15)
तावदेव च देवस्य सन्तु मे देवरात्रयः । सुहृदो ये च दैत्येन्द्रा दानवाश्च महाबलाः
tāvadeva ca devasya santu me devarātrayaḥ | suhṛdo ye ca daityendrā dānavāśca mahābalāḥ
'-और उतने ही देवरात्रि भी हों। और जो भी मित्र, दैत्येंद्र और महाबली दानव हैं,'
श्लोक 16 (skanda.8.75.16)
सर्वासु दिक्षु तेपीह समायान्तु रमन्तु च । अस्मत्पक्षे च ये विप्राः शुक्रप्रभृतयः शुभाः
sarvāsu dikṣu tepīha samāyāntu ramantu ca | asmatpakṣe ca ye viprāḥ śukraprabhṛtayaḥ śubhāḥ
'-सभी दिशाओं से वे भी यहाँ आएँ और उत्सव मनाएँ। और हमारे पक्ष के जो शुभ ब्राह्मण हैं, शुक्राचार्य आदि,'
श्लोक 17 (skanda.8.75.17)
नागा रक्षांसि यक्षाश्च गन्धर्वा मनुजास्तथा । तेपि सर्वे समायान्तु रमन्तु च मया सह
nāgā rakṣāṁsi yakṣāśca gandharvā manujāstathā | tepi sarve samāyāntu ramantu ca mayā saha
'-नाग, राक्षस, यक्ष, गंधर्व और मनुष्य भी - वे सभी आएँ और मेरे साथ उत्सव मनाएँ।'
श्लोक 18 (skanda.8.75.18)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता दैत्येन्द्रा हिरण्याक्षेण धीमता । तथा चक्रुस्तदा सर्वं यथोक्तममरद्विषा
sanatkumāra uvāca | ta evamuktā daityendrā hiraṇyākṣeṇa dhīmatā | tathā cakrustadā sarvaṁ yathoktamamaradviṣā
सनत्कुमार ने कहा - बुद्धिमान् हिरण्याक्ष द्वारा ऐसा कहे जाने पर, उन दैत्येंद्रों ने उस देव-शत्रु के कहे अनुसार सब कुछ किया।
श्लोक 19 (skanda.8.75.19)
दूतान् संप्रैषयन् क्षिप्रं दैत्यानां दानवैस्सह । तथान्येषां च पक्षाणामात्मनः शक्तिनन्दन
dūtān saṁpraiṣayan kṣipraṁ daityānāṁ dānavaissaha | tathānyeṣāṁ ca pakṣāṇāmātmanaḥ śaktinandana
हे शक्तिनंदन, उन्होंने शीघ्र दूतों को दैत्यों और दानवों के पास भेजा, तथा अपने पक्ष के अन्य सहयोगियों के पास भी,
श्लोक 20 (skanda.8.75.20)
निमन्त्रयति वो राजा हिरण्याक्षो महाबलः । सुहृद्वर्गैस्तु सहिता गच्छध्वं तं दिदृक्षवः
nimantrayati vo rājā hiraṇyākṣo mahābalaḥ | suhṛdvargaistu sahitā gacchadhvaṁ taṁ didṛkṣavaḥ
-[कहते हुए]: 'महाबली राजा हिरण्याक्ष तुम्हें आमंत्रित करते हैं; अपने मित्र-समूहों सहित उन्हें देखने की इच्छा से वहाँ जाओ।'
श्लोक 21 (skanda.8.75.21)
घण्टिकश्चाहतैर्वस्त्रैर्वेष्टितः सुविभूषितः । आरूढः पाण्डरं मत्तं गजं समवघोषयत्
ghaṇṭikaścāhatairvastrairveṣṭitaḥ suvibhūṣitaḥ | ārūḍhaḥ pāṇḍaraṁ mattaṁ gajaṁ samavaghoṣayat
स्वच्छ नवीन वस्त्रों में लिपटा, सुसज्जित, श्वेत मदमस्त हाथी पर सवार एक घंटी-बजाने वाला उद्घोषक ने घोषणा की -
श्लोक 22 (skanda.8.75.22)
राजा जयति दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षः प्रतापवान् । हता दैत्यद्विषः सर्वे दानवानाञ्च शत्रवः
rājā jayati daityendro hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | hatā daityadviṣaḥ sarve dānavānāñca śatravaḥ
'दैत्येंद्र, प्रतापी राजा हिरण्याक्ष की जय हो! दैत्यों के समस्त शत्रु और दानवों के विरोधी मारे जा चुके हैं!'
श्लोक 23 (skanda.8.75.23)
जयाय दितिपुत्राणामादित्यानां भयाय च । प्रातःप्रभृति राजा व आज्ञापयति कौमुदीम्
jayāya ditiputrāṇāmādityānāṁ bhayāya ca | prātaḥprabhṛti rājā va ājñāpayati kaumudīm
'दिति-पुत्रों की विजय और आदित्यों के भय के लिए, कल प्रातःकाल से राजा तुम्हें कौमुदी मनाने की आज्ञा देते हैं,'
श्लोक 24 (skanda.8.75.24)
देवरात्रिं च देवस्य रुद्रस्य सुरनाशनीम् । सुसंमृष्टोपलिप्ताभी रथ्याभिः क्रियतां पुरम्
devarātriṁ ca devasya rudrasya suranāśanīm | susaṁmṛṣṭopaliptābhī rathyābhiḥ kriyatāṁ puram
'-और देव रुद्र की देवरात्रि, जो देवताओं की संहारिणी है। नगर की गलियों को सुव्यवस्थित रूप से बुहारा और लीपा जाए।'
श्लोक 25 (skanda.8.75.25)
वासोभिरहतैः सर्वे भवन्तु पुरवासिनः । स्रग्विणः सशिरःस्नाता दत्तभुक्ता यथाक्रमम्
vāsobhirahataiḥ sarve bhavantu puravāsinaḥ | sragviṇaḥ saśiraḥsnātā dattabhuktā yathākramam
'नगरवासी सब नवीन वस्त्र पहनें, माला धारण करें, सिर सहित स्नान करें, तथा यथाक्रम दान देकर भोजन करें।'
श्लोक 26 (skanda.8.75.26)
गायन्तु गायनाश्चैव नृत्यन्तु नटनर्तकाः । उच्छ्रियन्तां पताकाश्च गृहवीथ्यापणेषु च
gāyantu gāyanāścaiva nṛtyantu naṭanartakāḥ | ucchriyantāṁ patākāśca gṛhavīthyāpaṇeṣu ca
'गायक गाएँ, और अभिनेता-नर्तक नृत्य करें; घरों, गलियों और दुकानों पर ध्वज-पताकाएँ फहराई जाएँ।'
श्लोक 27 (skanda.8.75.27)
गृहाणि चोपलिप्तानि नित्यमेव भवन्तु च । पुष्पप्रकरजुष्टानि धूपैर्नानाविधैरपि
gṛhāṇi copaliptāni nityameva bhavantu ca | puṣpaprakarajuṣṭāni dhūpairnānāvidhairapi
'और घर प्रतिदिन नए सिरे से लीपे जाएँ, फूलों के ढेरों तथा विविध प्रकार के धूप से सुसज्जित हों।'
श्लोक 28 (skanda.8.75.28)
स्रग्दामवन्ति सर्वाणि वनमालाकुलानि च । ब्राह्मणाश्चैव भोज्यन्तां क्रियन्तां वाचानि च
sragdāmavanti sarvāṇi vanamālākulāni ca | brāhmaṇāścaiva bhojyantāṁ kriyantāṁ vācāni ca
'सब घर मालाओं और वनमाला-गुच्छों से सुसज्जित हों; ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए, और उनके आशीर्वचन कहे जाएँ।'
श्लोक 29 (skanda.8.75.29)
ब्रह्मघोषाश्च सर्वत्र पुण्याहोदीरणानि च । दीपरात्रौ च सर्वत्र राजमार्गे गृहेषु च
brahmaghoṣāśca sarvatra puṇyāhodīraṇāni ca | dīparātrau ca sarvatra rājamārge gṛheṣu ca
'सर्वत्र वेद-घोष हों, और "पुण्याह" की उद्घोषणाएँ हों; और दीप-रात्रि को सर्वत्र, राजमार्ग पर और घरों में,'
श्लोक 30 (skanda.8.75.30)
अनन्तराः क्रियन्तां वै प्रचुरस्नेहवर्त्तयः । तरुणाः सह योषिद्भिस्समन्तात्पर्यटन्तु च
anantarāḥ kriyantāṁ vai pracurasnehavarttayaḥ | taruṇāḥ saha yoṣidbhissamantātparyaṭantu ca
'-अटूट पंक्तियों में प्रचुर स्नेह (तेल) वाली बत्तियाँ जलाई जाएँ; और युवा जन स्त्रियों सहित चारों ओर विचरण करें,'
श्लोक 31 (skanda.8.75.31)
रममाणा हसन्तश्च गायन्तो नृत्तसेविनः । भाण्डवाद्यानि वाद्यन्तां नृत्यन्तां दैत्ययोषितः
ramamāṇā hasantaśca gāyanto nṛttasevinaḥ | bhāṇḍavādyāni vādyantāṁ nṛtyantāṁ daityayoṣitaḥ
'-आनंद मनाते, हँसते, गाते, नृत्य में रत हों; वाद्य-यंत्र बजाए जाएँ, और दैत्य-स्त्रियाँ नृत्य करें।'
श्लोक 32 (skanda.8.75.32)
महादेवस्य पूजां च गन्धपुष्पादिकीं शुभाम् । उपहाराँश्च विविधान् स्नपनानि महान्ति च
mahādevasya pūjāṁ ca gandhapuṣpādikīṁ śubhām | upahārā~śca vividhān snapanāni mahānti ca
'और ईश्वर को महादेव की शुभ पूजा - गंध, पुष्प आदि से, विविध उपहार, और महान् अभिषेक,'
श्लोक 33 (skanda.8.75.33)
वलयः पुष्कला श्चैव भक्ष्यभोज्यैरलंकृताः । दीपांश्च विविधाकारान् पानानि च रसाँस्तथा
valayaḥ puṣkalā ścaiva bhakṣyabhojyairalaṁkṛtāḥ | dīpāṁśca vividhākārān pānāni ca rasā~stathā
'-प्रचुर कंगन, खाद्य-भोज्य पदार्थों से सुसज्जित, विविध आकार के दीपक, पेय और रस भी,'
श्लोक 34 (skanda.8.75.34)
फलानि च विचित्राणि मांसपक्वमनूपकम् । सुवर्णमणिचित्राणि ईश्वराय प्रयच्छत
phalāni ca vicitrāṇi māṁsapakvamanūpakam | suvarṇamaṇicitrāṇi īśvarāya prayacchata
'-तथा विचित्र फल, आनूप (जलीय) मांस, और स्वर्ण-मणियों से विचित्र वस्तुएँ - ये सब ईश्वर को अर्पित करो।'
श्लोक 35 (skanda.8.75.35)
बद्ध्यन्तां पशवश्चात्र भोज्यन्तां द्विजसत्तमाः । यो न कुर्यादिदं सर्वं पुरवासी जनः क्वचित् । पातयेत्तस्य शारीरं राजा दण्डं महायशाः
baddhyantāṁ paśavaścātra bhojyantāṁ dvijasattamāḥ | yo na kuryādidaṁ sarvaṁ puravāsī janaḥ kvacit | pātayettasya śārīraṁ rājā daṇḍaṁ mahāyaśāḥ
'यहाँ पशु बाँधे जाएँ, और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए। जो कोई नगरवासी यह सब कहीं भी नहीं करेगा, महायशस्वी राजा उसे शारीरिक दंड देंगे।'
श्लोक 36 (skanda.8.75.36)
सनत्कुमार उवाच । एवं स घोषयित्वा तु घाण्टिको हस्तिपृष्ठतः । जगाम स्वगृहं भूयः कौमुदी चाभ्यवर्तत
sanatkumāra uvāca | evaṁ sa ghoṣayitvā tu ghāṇṭiko hastipṛṣṭhataḥ | jagāma svagṛhaṁ bhūyaḥ kaumudī cābhyavartata
सनत्कुमार ने कहा - हाथी की पीठ से इस प्रकार घोषणा करके वह घंटी-वाला अपने घर लौट गया; और कौमुदी उत्सव आरंभ हो गया।
श्लोक 37 (skanda.8.75.37)
यथोक्तं तत्तदा सर्वमकुर्वत पुरे जनाः । राजापि संयतः स्नातः शुचिः प्रयतमानसः
yathoktaṁ tattadā sarvamakurvata pure janāḥ | rājāpi saṁyataḥ snātaḥ śuciḥ prayatamānasaḥ
नगर के लोग तब सब कुछ आज्ञानुसार करने लगे; और राजा भी संयमित, स्नात, पवित्र, संयतचित्त होकर,
श्लोक 38 (skanda.8.75.38)
दिवसे दिवसे व्यास स्नपयामास यत्नवान् । पञ्चगव्येन शुद्धेन तैलेन च सुगन्धिना
divase divase vyāsa snapayāmāsa yatnavān | pañcagavyena śuddhena tailena ca sugandhinā
-हे व्यास, प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक शुद्ध पंचगव्य और सुगंधित तेल से अभिषेक कराता रहा,
श्लोक 39 (skanda.8.75.39)
क्षीरेण सर्पिषा दध्ना रसैश्च बहुभिः शुभैः । पुष्पैः फलैश्च बीजैश्च रत्नैश्चाद्भिः समन्वितैः
kṣīreṇa sarpiṣā dadhnā rasaiśca bahubhiḥ śubhaiḥ | puṣpaiḥ phalaiśca bījaiśca ratnaiścādbhiḥ samanvitaiḥ
-दूध, घी, दही और अनेक शुभ रसों से, फूलों, फलों, बीजों, रत्नों और जल से युक्त,
श्लोक 40 (skanda.8.75.40)
भस्मना गन्धयुक्तेन उदकेन सुगन्धिना । एकैकस्य स्वयं राजा घटानां दशभिः शतैः
bhasmanā gandhayuktena udakena sugandhinā | ekaikasya svayaṁ rājā ghaṭānāṁ daśabhiḥ śataiḥ
-सुगंधित भस्म से, और सुगंधित जल से; राजा स्वयं, प्रत्येक अभिषेक के लिए दस सौ कलशों से,
श्लोक 41 (skanda.8.75.41)
दिवसे दिवसे व्यास त्र्यम्बकं सोभ्यसेचयत् । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैश्च जप्यैर्बलिभिरेव च
divase divase vyāsa tryambakaṁ sobhyasecayat | gandhaiḥ puṣpaiśca dhūpaiśca japyairbalibhireva ca
-हे व्यास, प्रतिदिन त्र्यंबक का अभिषेक करता था; और गंध, पुष्प, धूप, जप और बलियों से,
श्लोक 42 (skanda.8.75.42)
पूजयित्वा ततो राजा विप्रानन्यानभोजयत् । स कृत्वा पशुभिर्मेध्यै रत्नैर्मणिभिरेव च
pūjayitvā tato rājā viprānanyānabhojayat | sa kṛtvā paśubhirmedhyai ratnairmaṇibhireva ca
-पूजा करके, राजा फिर अन्य ब्राह्मणों को भोजन कराता था। यज्ञोपयुक्त पशुओं, रत्नों और मणियों से अर्चन करके,
श्लोक 43 (skanda.8.75.43)
बलिशय्यासनाद्यैश्च स्तूयमानो गृहान्ययौ । तथैवान्येपि दैत्येद्राः सोन्धकश्च महाबलः
baliśayyāsanādyaiśca stūyamāno gṛhānyayau | tathaivānyepi daityedrāḥ sondhakaśca mahābalaḥ
-और बलि, शय्या, आसन आदि से, स्तुति किए जाते हुए, वह घर लौटता था; और उसी प्रकार अन्य दैत्येंद्र, तथा महाबली अंधक भी,
श्लोक 44 (skanda.8.75.44)
चक्रुः सर्वे मुनिश्रेष्ठ यथा राजा तथैव ते । अन्धकं स गृहीत्वा तु हिरण्याक्षः प्रतापवान्
cakruḥ sarve muniśreṣṭha yathā rājā tathaiva te | andhakaṁ sa gṛhītvā tu hiraṇyākṣaḥ pratāpavān
-हे मुनिश्रेष्ठ, वे सब भी वैसा ही करते थे जैसा राजा करता था। तब प्रतापी हिरण्याक्ष अंधक को साथ लेकर,
श्लोक 45 (skanda.8.75.45)
पद्भ्यामपातयद् व्यास रुद्रस्येदमुदाहरन् । एष देवः सदा पुत्र तवास्तु सुमुखः प्रभुः
padbhyāmapātayad vyāsa rudrasyedamudāharan | eṣa devaḥ sadā putra tavāstu sumukhaḥ prabhuḥ
-हे व्यास, उसे रुद्र के चरणों में गिराते हुए यह कहा - 'हे पुत्र, यह देव प्रभु सदा तुम पर प्रसन्नमुख रहें,'
श्लोक 46 (skanda.8.75.46)
अस्मिन् भक्तिस्त्वया कार्या भाविता परमेश्वरे । एष वन्द्यश्च पूज्यश्च अतो नास्ति परो गुरुः । पूजयेथाः सदैवैनं भक्तितः परमेश्वरम्
asmin bhaktistvayā kāryā bhāvitā parameśvare | eṣa vandyaśca pūjyaśca ato nāsti paro guruḥ | pūjayethāḥ sadaivainaṁ bhaktitaḥ parameśvaram
'-तुम्हें इस परमेश्वर में सदा भक्ति रखनी चाहिए। यह वंदनीय और पूजनीय है; इससे बढ़कर कोई गुरु नहीं है। इस परमेश्वर की सदा भक्तिपूर्वक पूजा करते रहना।'
श्लोक 47 (skanda.8.75.47)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्त्वा प्रणिपत्य शंकरं महासुरः सोसुरदानवेश्वरः । जगाम धीमान् पुनरेव निर्वृतो निवेशनं देवपतिर्यथा स्वकम्
sanatkumāra uvāca | sa evamuktvā praṇipatya śaṁkaraṁ mahāsuraḥ sosuradānaveśvaraḥ | jagāma dhīmān punareva nirvṛto niveśanaṁ devapatiryathā svakam
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार कहकर और शंकर को प्रणाम करके, वह महाअसुर, असुर-दानवों का बुद्धिमान् स्वामी, संतुष्ट होकर पुनः अपने ही निवास को लौट गया, जैसे देवपति अपने निवास को लौटते हैं।