अम्बिका खण्ड · अध्याय 76
हिरण्याक्षस्य सभाप्रवेशः
श्लोक 1 (skanda.8.76.1)
सनत्कुमार उवाच । अथ तस्यां सह स्त्रीभिः कौमुद्यां दैत्यदानवाः । रेमिरे रक्तमनसो देवाः स्वर्गगता इव ।
sanatkumāra uvāca | atha tasyāṁ saha strībhiḥ kaumudyāṁ daityadānavāḥ | remire raktamanaso devāḥ svargagatā iva |
सनत्कुमार ने कहा - उस कौमुदी उत्सव में दैत्य और दानव स्त्रियों के साथ, राग में डूबे मन से, ऐसे रमण करने लगे मानो स्वर्गगत देवता हों।
श्लोक 2 (skanda.8.76.2)
तत्र काचिच्छुभापाङ्गी पद्मं दिव्यं मुखोपरि । मुखारविन्दत्राणार्थं ददौ सोमभयादिव ।
tatra kācicchubhāpāṅgī padmaṁ divyaṁ mukhopari | mukhāravindatrāṇārthaṁ dadau somabhayādiva |
वहाँ किसी सुनयना स्त्री ने मानो चन्द्रमा के भय से अपने मुखकमल की रक्षा के लिए मुख के ऊपर एक दिव्य कमल रख लिया।
श्लोक 3 (skanda.8.76.3)
अपरा चरणेनैत्य प्रियं मत्ताभ्यताडयत् । शीतांशुरिव पादेन विकचं शरदम्बुजम् ।
aparā caraṇenaitya priyaṁ mattābhyatāḍayat | śītāṁśuriva pādena vikacaṁ śaradambujam |
कोई दूसरी मतवाली स्त्री पास आकर अपने प्रिय को पैर से इस तरह ताड़ित करने लगी, जैसे शीतल किरणों वाला चन्द्रमा अपनी किरण रूपी पैर से खिले हुए शरत्कालीन कमल को स्पर्श करता है।
श्लोक 4 (skanda.8.76.4)
अपरा राजमार्गाणामनभिज्ञाः कुलस्त्रियः । स्फाटिकोपचितां भूमिं दृष्टवा मुञ्चन्ति पादुकाम् ।
aparā rājamārgāṇāmanabhijñāḥ kulastriyaḥ | sphāṭikopacitāṁ bhūmiṁ dṛṣṭavā muñcanti pādukām |
राजमार्गों से अनभिज्ञ कुछ कुलीन स्त्रियाँ स्फटिक से जड़ी हुई भूमि को देखकर (जल समझकर) अपनी पादुकाएँ उतार देती थीं।
श्लोक 5 (skanda.8.76.5)
उत्कृष्य वसनं चान्या विप्रेन्द्र जलशङ्कया । राजमार्गेषु गच्छन्ति दृष्ट्वा मणिचितां भुवम् ।
utkṛṣya vasanaṁ cānyā viprendra jalaśaṅkayā | rājamārgeṣu gacchanti dṛṣṭvā maṇicitāṁ bhuvam |
हे विप्रेन्द्र! अन्य स्त्रियाँ मणियों से जड़ी हुई भूमि को देखकर जल की आशंका से अपने वस्त्र ऊपर उठाकर राजमार्गों पर चलती थीं।
श्लोक 6 (skanda.8.76.6)
काचित् प्रियेण सन्त्यक्ता रक्तेनान्येन निर्गता । गृहाच्चन्द्रांशुभिः स्पृष्टा पपात मदनालसा ।
kācit priyeṇa santyaktā raktenānyena nirgatā | gṛhāccandrāṁśubhiḥ spṛṣṭā papāta madanālasā |
कोई स्त्री अपने प्रिय द्वारा त्याग दी जाकर किसी अन्य अनुरक्त पुरुष के साथ घर से निकली; चन्द्रमा की किरणों से स्पर्श होते ही वह काम से आलस्ययुक्त होकर गिर पड़ी।
श्लोक 7 (skanda.8.76.7)
पतितैव च सा सोममुवाचेदं कुलाङ्गना । भूयो मां त्वं करैस्तीक्ष्णैर्दहसे नलिनीमिव ।
patitaiva ca sā somamuvācedaṁ kulāṅganā | bhūyo māṁ tvaṁ karaistīkṣṇairdahase nalinīmiva |
गिरते ही उस कुलवधू ने चन्द्रमा से यह कहा - तुम अपनी तीक्ष्ण किरणों से मुझे बार-बार ऐसे जलाते हो, जैसे कमलिनी को जलाया जाता है।
श्लोक 8 (skanda.8.76.8)
सूर्येण किल दग्धानि जीवयस्यौषधानि ह । मदनेन कथं दग्धां न जीवयसि मां दृढम् ।
sūryeṇa kila dagdhāni jīvayasyauṣadhāni ha | madanena kathaṁ dagdhāṁ na jīvayasi māṁ dṛḍham |
सूर्य से जली हुई औषधियों को तो तुम जीवित कर देते हो, फिर काम से इतनी बुरी तरह जली हुई मुझे तुम जीवित क्यों नहीं करते?
श्लोक 9 (skanda.8.76.9)
काश्चिद् रमण्यो दोलासु दोलयन्त्यो परस्त्रियः । जलचन्द्र इवाभान्ति वीचिचञ्चलमूर्त्तयः ।
kāścid ramaṇyo dolāsu dolayantyo parastriyaḥ | jalacandra ivābhānti vīcicañcalamūrttayaḥ |
झूलों पर झूलती हुई कुछ सुन्दर स्त्रियाँ, लहरों के समान चंचल शरीर वाली होकर, जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान शोभित हो रही थीं।
श्लोक 10 (skanda.8.76.10)
केचिद् गायन्ति सहिताः स्त्रीभिर्दैत्या महाबलाः । गन्धर्वा नन्दनवने अप्सरोभिर्यथा सह ।
kecid gāyanti sahitāḥ strībhirdaityā mahābalāḥ | gandharvā nandanavane apsarobhiryathā saha |
कुछ महाबली दैत्य स्त्रियों के साथ मिलकर गाते थे, जैसे नन्दनवन में गन्धर्व अप्सराओं के साथ गाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.8.76.11)
राजमार्गः क्वचिद् भाति स्त्रीभिर्बह्वीभिरावृतः । यथा नभसि चित्रोसौ दिव्यो देवपथः शुभः ।
rājamārgaḥ kvacid bhāti strībhirbahvībhirāvṛtaḥ | yathā nabhasi citrosau divyo devapathaḥ śubhaḥ |
कहीं बहुत-सी स्त्रियों से घिरा हुआ राजमार्ग ऐसे शोभित होता था, जैसे आकाश में वह विचित्र, मंगलमय दिव्य देवपथ (आकाशगंगा) शोभित होता है।
श्लोक 12 (skanda.8.76.12)
क्वचिन्नूपुरकाञ्चीना कोकिलानाञ्च निस्वनः । बभौ श्रोत्रसुखः श्रोतुः कलामदनदीपनः ।
kvacinnūpurakāñcīnā kokilānāñca nisvanaḥ | babhau śrotrasukhaḥ śrotuḥ kalāmadanadīpanaḥ |
कहीं पायल और करधनी की झंकार कोकिलों की मधुर ध्वनि से मिलकर, सुनने वाले के कान को सुखद तथा उसकी काम-अग्नि को प्रज्वलित करने वाली मीठी ध्वनि से गूँजती थी।
श्लोक 13 (skanda.8.76.13)
क्वचिद्रमणरक्तानां स्त्रीणां व्यास प्रियैः सह । हृदयव्याकुलकरः श्रूयते मधुरः स्वरः ।
kvacidramaṇaraktānāṁ strīṇāṁ vyāsa priyaiḥ saha | hṛdayavyākulakaraḥ śrūyate madhuraḥ svaraḥ |
हे व्यास! कहीं अपने प्रियतम में अनुरक्त स्त्रियों के अपने प्रियों के साथ मधुर स्वर सुनाई पड़ते थे, जो हृदय को व्याकुल कर देते थे।
श्लोक 14 (skanda.8.76.14)
एवं समभवद् व्यास बहुचित्रः स उत्सवः । दानवानां तदा प्रीतिसौख्यविश्रम्भवर्द्धनः ।
evaṁ samabhavad vyāsa bahucitraḥ sa utsavaḥ | dānavānāṁ tadā prītisaukhyaviśrambhavarddhanaḥ |
हे व्यास! इस प्रकार वह उत्सव अनेक विचित्रताओं से युक्त होकर सम्पन्न हुआ, जो उस समय दानवों के प्रेम, सुख और परस्पर विश्वास को बढ़ाने वाला था।
श्लोक 15 (skanda.8.76.15)
तस्मिन्नुपरये भूयः पूर्ववत्संप्रतिष्ठिते । प्रकृतिस्ते जने व्यास दानवास्ते समागताः ।
tasminnuparaye bhūyaḥ pūrvavatsaṁpratiṣṭhite | prakṛtiste jane vyāsa dānavāste samāgatāḥ |
हे व्यास! जब वह उत्सव पूर्ववत् फिर से सम्पन्न हो चुका, तब वे प्रजाजन तथा दानव मन्त्रीगण एकत्र हुए।
श्लोक 16 (skanda.8.76.16)
विविशुर्भीमसंह्रादाः सभां दिव्यां मनोरमाम् । जाम्बूनदमयस्तम्भां वज्रवैदूर्यवेदिकाम् ।
viviśurbhīmasaṁhrādāḥ sabhāṁ divyāṁ manoramām | jāmbūnadamayastambhāṁ vajravaidūryavedikām |
भयंकर गर्जना करते हुए वे उस दिव्य, मनोहर सभा में प्रविष्ट हुए, जिसके स्तम्भ शुद्ध सुवर्ण के तथा वेदिका वज्र और वैदूर्यमणि की बनी थी।
श्लोक 17 (skanda.8.76.17)
मुक्तादामावलम्बाढ्यां स्रग्दामोत्तमभूषिताम् । वज्रवैदूर्यनीलेन्द्रमहानीलाम्रपल्लवैः ।
muktādāmāvalambāḍhyāṁ sragdāmottamabhūṣitām | vajravaidūryanīlendramahānīlāmrapallavaiḥ |
वह सभा लटकती हुई मोतियों की मालाओं से समृद्ध थी, उत्तम पुष्पमालाओं से सुशोभित थी, तथा वज्र, वैदूर्य, नील, इन्द्रनील, महानील और आम्रपल्लव के रंग के रत्नों से जड़ी थी।
श्लोक 18 (skanda.8.76.18)
लोहितैः स्फाटिकैश्चैव तथा मरकतैरपि । दिव्यजालोपसन्नद्धां किङ्किणीचित्रशोभिताम् ।
lohitaiḥ sphāṭikaiścaiva tathā marakatairapi | divyajālopasannaddhāṁ kiṅkiṇīcitraśobhitām |
वह माणिक्य, स्फटिक तथा मरकत मणियों से भी जड़ी थी, दिव्य जालों से आच्छादित तथा घुँघरुओं के विचित्र शोभा से सुशोभित थी।
श्लोक 19 (skanda.8.76.19)
बहुपुष्पफलैश्चैव सर्वकामप्रदैर्द्रुमैः । उपेतां दीर्घिकाभिश्च बहुशय्यासनां शुभाम् ।
bahupuṣpaphalaiścaiva sarvakāmapradairdrumaiḥ | upetāṁ dīrghikābhiśca bahuśayyāsanāṁ śubhām |
वह सभा बहुत से पुष्पों और फलों से लदे, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले वृक्षों से युक्त थी, बावड़ियों से सम्पन्न तथा अनेक शय्याओं और आसनों से मंगलमय थी।
श्लोक 20 (skanda.8.76.20)
अक्लमा बहुनिष्यन्दां सर्वदुःखविवर्जिताम् । सर्वकामसमृद्धां च बहुस्त्रीपुरुषाकुलाम् ।
aklamā bahuniṣyandāṁ sarvaduḥkhavivarjitām | sarvakāmasamṛddhāṁ ca bahustrīpuruṣākulām |
वह सभा थकान न देने वाली, अनेक जलधाराओं से युक्त, सब दुःखों से रहित, समस्त कामनाओं की समृद्धि से पूर्ण तथा अनेक स्त्री-पुरुषों से भरी हुई थी।
श्लोक 21 (skanda.8.76.21)
विविशुस्तां सभां दिव्यां दैत्या दर्पसमावृताः । प्रह्रादश्चानुह्रादश्च सिनिर्वाष्कल एव च ।
viviśustāṁ sabhāṁ divyāṁ daityā darpasamāvṛtāḥ | prahrādaścānuhrādaśca sinirvāṣkala eva ca |
गर्व से भरे हुए दैत्य उस दिव्य सभा में प्रविष्ट हुए - प्रह्राद, अनुह्राद, सिनि तथा वाष्कल भी।
श्लोक 22 (skanda.8.76.22)
विरोचनो बलिश्चैव बलिपुत्राश्च विश्रुताः । सहस्राणि दश द्वे च येषां श्रेष्ठो महाबलः ।
virocano baliścaiva baliputrāśca viśrutāḥ | sahasrāṇi daśa dve ca yeṣāṁ śreṣṭho mahābalaḥ |
विरोचन, बलि तथा बलि के प्रसिद्ध पुत्र, जो बारह हजार की संख्या में थे, जिनमें सबसे श्रेष्ठ महाबली था।
श्लोक 23 (skanda.8.76.23)
बाणो नाम महामायो राजा बाहुसहस्रधृक् । बाणस्य पुत्रा ये चान्ये सहस्राणि दशैव ते ।
bāṇo nāma mahāmāyo rājā bāhusahasradhṛk | bāṇasya putrā ye cānye sahasrāṇi daśaiva te |
बाण नामक राजा, जो महामायावी और सहस्र भुजाओं वाला था, तथा बाण के अन्य दस हजार पुत्र भी वहाँ थे।
श्लोक 24 (skanda.8.76.24)
मुरो धमुषुमण्डश्च विप्रचित्तिश्च दानवः । कालो हयशिराश्चैव सम्बरः कालसम्बरः ।
muro dhamuṣumaṇḍaśca vipracittiśca dānavaḥ | kālo hayaśirāścaiva sambaraḥ kālasambaraḥ |
मुर, धमुषुमण्ड, दानव विप्रचित्ति, काल, हयशिरा, सम्बर तथा कालसम्बर,
श्लोक 25 (skanda.8.76.25)
विश्रुतश्चेन्द्रदमनः कालनेमी च दानवः । तथा सुन्दनिसुन्दौ च विपाकः पाक एव च ।
viśrutaścendradamanaḥ kālanemī ca dānavaḥ | tathā sundanisundau ca vipākaḥ pāka eva ca |
प्रसिद्ध इन्द्रदमन तथा दानव कालनेमि, सुन्द और निसुन्द, विपाक और पाक भी,
श्लोक 26 (skanda.8.76.26)
राहुश्च शतकेतुश्च ध्वजस्तारः सतारकः । महिषो दुन्दुभिश्चैव कालकश्च महाबलः ।
rāhuśca śataketuśca dhvajastāraḥ satārakaḥ | mahiṣo dundubhiścaiva kālakaśca mahābalaḥ |
राहु, शतकेतु, ध्वज, तार और सतारक, महिष, दुन्दुभि तथा महाबली कालक,
श्लोक 27 (skanda.8.76.27)
अन्धकश्च तथाटिश्च बकः शरभ एव च । स्वर्भानुर्वृषपर्वा च मधुः कैटभ एव च ।
andhakaśca tathāṭiśca bakaḥ śarabha eva ca | svarbhānurvṛṣaparvā ca madhuḥ kaiṭabha eva ca |
अन्धक, अति, बक, शरभ, स्वर्भानु, वृषपर्वा, तथा मधु और कैटभ भी,
श्लोक 28 (skanda.8.76.28)
महाकायः शतानन्दः शतदुन्दुभिरेव च । कार्त्तस्वनश्च हस्ती च बलो नरक एव च ।
mahākāyaḥ śatānandaḥ śatadundubhireva ca | kārttasvanaśca hastī ca balo naraka eva ca |
महाकाय, शतानन्द, शतदुन्दुभि, कार्त्तस्वन, हस्ती, बल तथा नरक भी,
श्लोक 29 (skanda.8.76.29)
ध्वाङ्क्षो मूकेल्वलौ चापि वातापी सासृपुञ्जिकः । कण्डलश्चैव मीढश्च दुर्लोमा चैव विश्रुतः ।
dhvāṅkṣo mūkelvalau cāpi vātāpī sāsṛpuñjikaḥ | kaṇḍalaścaiva mīḍhaśca durlomā caiva viśrutaḥ |
ध्वांक्ष, मूक, इल्वल, वातापि, असृपुञ्जिक, कण्डल, मीढ तथा प्रसिद्ध दुर्लोमा भी,
श्लोक 30 (skanda.8.76.30)
धुन्धुश्च शतमायश्च शतावर्तोथ दुस्सहः । चन्द्रसूर्यौ नरश्चैव देवान्तकनरान्तकौ ।
dhundhuśca śatamāyaśca śatāvartotha dussahaḥ | candrasūryau naraścaiva devāntakanarāntakau |
धुन्धु, शतमाय, शतावर्त तथा दुस्सह, चन्द्र और सूर्य, नर तथा देवान्तक और नरान्तक,
श्लोक 31 (skanda.8.76.31)
ब्रह्महा यज्ञहा चैव इल्वलः पिल्वकस्तथा । मयश्च दानवश्रेष्ठो मयपुत्राश्च विश्रुताः ।
brahmahā yajñahā caiva ilvalaḥ pilvakastathā | mayaśca dānavaśreṣṭho mayaputrāśca viśrutāḥ |
ब्रह्मघाती, यज्ञघाती, इल्वल तथा पिल्वक, और दानवश्रेष्ठ मय तथा मय के प्रसिद्ध पुत्र भी वहाँ थे।
श्लोक 32 (skanda.8.76.32)
तेषामष्टौ सहस्राणि सर्वे च कृतनिश्चयाः । वृत्रश्च दानवश्रेष्ठो नमुचिर्भजहस्तथा ।
teṣāmaṣṭau sahasrāṇi sarve ca kṛtaniścayāḥ | vṛtraśca dānavaśreṣṭho namucirbhajahastathā |
उनकी संख्या आठ हजार थी, सभी दृढ़ निश्चय वाले थे, तथा दानवश्रेष्ठ वृत्र, नमुचि और भजह भी वहाँ थे।
श्लोक 33 (skanda.8.76.33)
शतोदरश्च व्यंसश्च ताथायश्च ह्रदोदरः । केशी तथा प्रलम्बश्च कबन्धो धेनुकश्च ह ।
śatodaraśca vyaṁsaśca tāthāyaśca hradodaraḥ | keśī tathā pralambaśca kabandho dhenukaśca ha |
शतोदर, व्यंस, ताथाय, ह्रदोदर, केशी, प्रलम्ब, कबन्ध तथा धेनुक,
श्लोक 34 (skanda.8.76.34)
हालो गार्ग्यशिराश्चैव कुशः शम्भुस्तथैव च । तथा गगनमूर्धा च सालुकः शाल्व एव च ।
hālo gārgyaśirāścaiva kuśaḥ śambhustathaiva ca | tathā gaganamūrdhā ca sālukaḥ śālva eva ca |
हाल, गार्ग्यशिरा, कुश तथा शम्भु, गगनमूर्धा, सालुक तथा शाल्व भी,
श्लोक 35 (skanda.8.76.35)
मेघनादश्च विख्यातो महानादस्तथैव च । खरोथ खररोमा च सूचीलोमा च दानवः ।
meghanādaśca vikhyāto mahānādastathaiva ca | kharotha khararomā ca sūcīlomā ca dānavaḥ |
प्रसिद्ध मेघनाद तथा महानाद भी, खर, खररोमा तथा दानव सूचीलोमा,
श्लोक 36 (skanda.8.76.36)
परिघोपरिघश्चैव दण्डः काश्यप एव च । दुन्दुभिश्च महाकायः सैंहिकेयश्च यो गणः ।
parighoparighaścaiva daṇḍaḥ kāśyapa eva ca | dundubhiśca mahākāyaḥ saiṁhikeyaśca yo gaṇaḥ |
परिघ, उपरिघ, दण्ड तथा काश्यप, महाकाय दुन्दुभि तथा सिंहिका के पुत्रों का समूह भी वहाँ था।
श्लोक 37 (skanda.8.76.37)
तथा हालाहलश्चैव अन्धकारक एव च । पौलोमाः षष्टिसाहस्राः कालकेयाश्च विश्रुताः । कालकञ्जाः सहस्राणि अष्टौ ते देवकण्टकाः ।
tathā hālāhalaścaiva andhakāraka eva ca | paulomāḥ ṣaṣṭisāhasrāḥ kālakeyāśca viśrutāḥ | kālakañjāḥ sahasrāṇi aṣṭau te devakaṇṭakāḥ |
हालाहल तथा अन्धकारक भी, साठ हजार पौलोम, प्रसिद्ध कालकेय, तथा आठ हजार कालकञ्ज - ये सब देवताओं के लिए कण्टकस्वरूप थे।
श्लोक 38 (skanda.8.76.38)
निवातकवचानाञ्च तिस्रः कोट्यो महाबलाः । ता एता गणिताः सर्वाः कोट्यः षष्टिः सुरद्विषाम् ।
nivātakavacānāñca tisraḥ koṭyo mahābalāḥ | tā etā gaṇitāḥ sarvāḥ koṭyaḥ ṣaṣṭiḥ suradviṣām |
महाबली निवातकवचों की संख्या तीन करोड़ थी; इस प्रकार गिने जाने पर देवताओं के इन शत्रुओं की कुल संख्या साठ करोड़ हुई।
श्लोक 39 (skanda.8.76.39)
तत्पक्षान् वर्जयित्वा तु मनुष्यान्पन्नगानपि । राक्षसाँश्च पिशाचाँश्च यक्षान् पक्षिण एव च । तेषामपि तदा व्यास कोट्यो विंशतिसंमिताः ।
tatpakṣān varjayitvā tu manuṣyānpannagānapi | rākṣasā~śca piśācā~śca yakṣān pakṣiṇa eva ca | teṣāmapi tadā vyāsa koṭyo viṁśatisaṁmitāḥ |
हे व्यास! उनके सहायक पक्षों को छोड़कर - मनुष्य, नाग, राक्षस, पिशाच, यक्ष तथा पक्षी भी - उनकी संख्या भी उस समय बीस करोड़ के बराबर थी।
श्लोक 40 (skanda.8.76.40)
ते तां सभां समाविश्य सर्वे दर्पात् सुरद्विषः । सविद्युदुल्का भान्ति स्म प्रावृड्जलधरा इव ।
te tāṁ sabhāṁ samāviśya sarve darpāt suradviṣaḥ | savidyudulkā bhānti sma prāvṛḍjaladharā iva |
देवताओं के वे सब शत्रु गर्व से उस सभा में प्रविष्ट होकर, बिजली और उल्काओं सहित वर्षाकालीन मेघों के समान शोभित हो रहे थे।
श्लोक 41 (skanda.8.76.41)
ते स्वनन्त इवाम्भोदा सधूमा इव पर्वताः । महिषा इव नर्दन्तः केतवोनागता इव ।
te svananta ivāmbhodā sadhūmā iva parvatāḥ | mahiṣā iva nardantaḥ ketavonāgatā iva |
वे गरजते हुए मेघों के समान, धुआँ उठाते हुए पर्वतों के समान, गर्जना करते भैंसों के समान, तथा उतरे हुए उत्पातसूचक पुच्छल तारों के समान प्रतीत होते थे।
श्लोक 42 (skanda.8.76.42)
उत्पाता इव निर्मुक्ताः सविषा इव पन्नगाः । गजा इव च संमत्ताः पवना इव वेगिताः ।
utpātā iva nirmuktāḥ saviṣā iva pannagāḥ | gajā iva ca saṁmattāḥ pavanā iva vegitāḥ |
वे मानो अकस्मात् प्रकट हुए उत्पातों के समान, विषैले सर्पों के समान, मतवाले हाथियों के समान तथा वायु के समान वेगवान थे।
श्लोक 43 (skanda.8.76.43)
सुराणां विप्रकारार्थं तस्थुरापूर्य तां सभाम् । अथ गत्वा सभापालो राजानमिदमब्रवीत् ।
surāṇāṁ viprakārārthaṁ tasthurāpūrya tāṁ sabhām | atha gatvā sabhāpālo rājānamidamabravīt |
देवताओं को कष्ट पहुँचाने के उद्देश्य से वे सब उस सभा को भरकर खड़े हो गये। तब सभा के रक्षक ने जाकर राजा से यह कहा -
श्लोक 44 (skanda.8.76.44)
सुखासीनं तदा व्यास सिंहासनगतं युवा । प्रणम्य शिरसा पूर्वं जानुभ्यामवनिं गतः ।
sukhāsīnaṁ tadā vyāsa siṁhāsanagataṁ yuvā | praṇamya śirasā pūrvaṁ jānubhyāmavaniṁ gataḥ |
हे व्यास! उस समय सिंहासन पर सुखपूर्वक बैठे हुए राजा को उस युवक ने पहले सिर झुकाकर प्रणाम किया, फिर घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया।
श्लोक 45 (skanda.8.76.45)
बद्धाञ्जलिपुटः सम्यग् वाचा श्लक्ष्णपदाक्षरम् । स्वामी जयतु सर्वेषामसुराणां जयावहः ।
baddhāñjalipuṭaḥ samyag vācā ślakṣṇapadākṣaram | svāmī jayatu sarveṣāmasurāṇāṁ jayāvahaḥ |
हाथ जोड़कर, मृदु एवं सुव्यवस्थित शब्दों में उसने कहा - समस्त असुरों को विजय दिलाने वाले स्वामी की जय हो।
श्लोक 46 (skanda.8.76.46)
प्रह्रादाद्याः सभां सर्वे विप्रचित्तिपुरोगमाः । प्राप्ता विदितमस्त्वेव यदन्यत् कर्तुमर्हसि ।
prahrādādyāḥ sabhāṁ sarve vipracittipurogamāḥ | prāptā viditamastveva yadanyat kartumarhasi |
विप्रचित्ति आदि के नेतृत्व में प्रह्राद आदि सभी सभा में आ चुके हैं, यह आपको ज्ञात हो। इसके अतिरिक्त जो कुछ करना उचित हो, वह कीजिये।
श्लोक 47 (skanda.8.76.47)
सनत्कुमार उवाच । ततः सुरद्विषः श्रुत्वा सर्वान्प्राप्तान् सभां तदा । उत्तस्थौ सहसा राजा शक्रकेतुरिवोत्सवे ।
sanatkumāra uvāca | tataḥ suradviṣaḥ śrutvā sarvānprāptān sabhāṁ tadā | uttasthau sahasā rājā śakraketurivotsave |
सनत्कुमार ने कहा - तब यह सुनकर कि सब लोग सभा में आ चुके हैं, देवताओं का वह शत्रु राजा तत्काल उठ खड़ा हुआ, जैसे उत्सव में इन्द्र की ध्वजा खड़ी की जाती है।
श्लोक 48 (skanda.8.76.48)
स किरीटी महादंष्ट्रो मुंजकेशो महाहनुः । आकर्णाद्दारितास्यश्च महाच्छत्रशिरास्तथा ।
sa kirīṭī mahādaṁṣṭro muṁjakeśo mahāhanuḥ | ākarṇāddāritāsyaśca mahācchatraśirāstathā |
वह मुकुटधारी था, उसके बड़े-बड़े दाँत थे, उसके केश मूँज के समान थे, उसकी ठोड़ी विशाल थी, उसका मुख कानों तक फटा हुआ था, तथा उसका सिर विशाल छत्र के समान था।
श्लोक 49 (skanda.8.76.49)
आजानुबाहुर्वृत्ताक्षः पिङ्गाक्षश्चोर्ध्वरोमवान् । वज्रसंहननश्चैव महायोगी महाबल ।
ājānubāhurvṛttākṣaḥ piṅgākṣaścordhvaromavān | vajrasaṁhananaścaiva mahāyogī mahābala |
उसकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी थीं, नेत्र गोल तथा पिंगल वर्ण के थे, रोम खड़े हुए थे, शरीर वज्र के समान दृढ़ था, और वह महान योगी तथा महाबली था।
श्लोक 50 (skanda.8.76.50)
किरोटेनाति संभाति सवित्रेवोदयस्तथा । हारवर्याङ्कितोरस्कः सबलाक इवाम्बुदः । सपुत्रः प्रययौ व्यास हिमवानिव मूर्त्तिमान् ।
kiroṭenāti saṁbhāti savitrevodayastathā | hāravaryāṅkitoraskaḥ sabalāka ivāmbudaḥ | saputraḥ prayayau vyāsa himavāniva mūrttimān |
अपने मुकुट से वह उदयकालीन सूर्य के समान अत्यन्त शोभायमान हो रहा था; उत्तम हार से अंकित उसका वक्षस्थल बगुलों की पंक्ति सहित मेघ के समान था। हे व्यास! अपने पुत्रों सहित वह ऐसे चल पड़ा मानो साक्षात् हिमालय पर्वत मूर्तिमान होकर चल रहा हो।
श्लोक 51 (skanda.8.76.51)
स तां तदा दानवराजसत्तमो विचित्ररत्नांशुपरीतकुण्डलः । सभां विवेशासुरदैत्यपुंगवैः समावृतां द्यामुदितैर्ग्रहैरिव ।
sa tāṁ tadā dānavarājasattamo vicitraratnāṁśuparītakuṇḍalaḥ | sabhāṁ viveśāsuradaityapuṁgavaiḥ samāvṛtāṁ dyāmuditairgrahairiva |
वह श्रेष्ठ दानवराज, जिसके कुण्डल विचित्र रत्नों की किरणों से घिरे हुए थे, उस समय श्रेष्ठ असुरों और दैत्यों से घिरी हुई उस सभा में इस प्रकार प्रविष्ट हुआ, जैसे उदित हुए ग्रहों से भरा हुआ आकाश हो।