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अम्बिका खण्ड · अध्याय 77

हिरण्याक्षनिर्याणम्

अध्याय 76अध्याय-सूचीअध्याय 78

श्लोक 1 (skanda.8.77.1)

सनत्कुमार उवाच । स गत्वा तां सभां व्यास अपश्यद् दैत्यदानवान् । प्रावृट्कालेम्बुदान्मत्तान् यथेन्द्रः समुपस्थितान् ।

sanatkumāra uvāca | sa gatvā tāṁ sabhāṁ vyāsa apaśyad daityadānavān | prāvṛṭkālembudānmattān yathendraḥ samupasthitān |

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! वहाँ जाकर उसने उस सभा में एकत्रित दैत्यों और दानवों को देखा, जैसे इन्द्र वर्षाकाल के मतवाले मेघों को एकत्र देखता है।

श्लोक 2 (skanda.8.77.2)

तस्य प्रविष्टस्य तदा सर्व एव सुरद्विषः । जयेति चक्रुरुत्थाय वेदा इव पितामहम् ।

tasya praviṣṭasya tadā sarva eva suradviṣaḥ | jayeti cakrurutthāya vedā iva pitāmaham |

जब वह प्रविष्ट हुआ, तब देवताओं के सभी शत्रु खड़े होकर 'जय हो' पुकार उठे, जैसे वेद ब्रह्मा के समक्ष जयघोष करते हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.77.3)

मोत्तिष्ठतेति तान्सर्वानवोचदसुराधिपः । मायापंचकमासाद्य भोगी वायुधरानिव ।

mottiṣṭhateti tānsarvānavocadasurādhipaḥ | māyāpaṁcakamāsādya bhogī vāyudharāniva |

असुराधिपति ने उन सबसे कहा - 'मत उठो', और अपनी पंचविध माया धारण करके, वह मानो मेघों के बीच फणधारी सर्प के समान प्रतीत हुआ।

श्लोक 4 (skanda.8.77.4)

स तेषामग्रगो भाति हिरण्याक्षो महासुरः । मध्ये कलभवृन्दानां यथा मत्तो महागजः ।

sa teṣāmagrago bhāti hiraṇyākṣo mahāsuraḥ | madhye kalabhavṛndānāṁ yathā matto mahāgajaḥ |

वह महासुर हिरण्याक्ष उनके आगे इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, जैसे बच्चे हाथियों के झुण्ड के बीच कोई मतवाला महागज।

श्लोक 5 (skanda.8.77.5)

ततो जाम्बूनदे दिव्ये उपविष्टो वरासने ।

tato jāmbūnade divye upaviṣṭo varāsane |

फिर वह शुद्ध सुवर्ण के दिव्य उत्तम आसन पर बैठा... (इस श्लोक का शेष उत्तरार्ध मूल पाण्डुलिपि में सुरक्षित नहीं है)।

श्लोक 6 (skanda.8.77.6)

भाति सिंहासनासीनः स राजा सुरविद्विषाम् । मेरुशृंगमिवासाद्य सबलाको महाम्बुदः ।

bhāti siṁhāsanāsīnaḥ sa rājā suravidviṣām | meruśṛṁgamivāsādya sabalāko mahāmbudaḥ |

सिंहासन पर बैठा हुआ देवशत्रुओं का वह राजा ऐसे सुशोभित हो रहा था, जैसे मेरु के शिखर पर पहुँचा हुआ बगुलों की पंक्ति सहित कोई विशाल मेघ।

श्लोक 7 (skanda.8.77.7)

बभूवुरुपविष्टाश्च तूष्णीमेवासुरास्तदा । सिसृक्षवो जलं काले नीलाम्भोदा इवोन्नताः ।

babhūvurupaviṣṭāśca tūṣṇīmevāsurāstadā | sisṛkṣavo jalaṁ kāle nīlāmbhodā ivonnatāḥ |

तब वे असुर मौन होकर बैठ गये, जैसे वर्षाकाल में जल बरसाने को उद्यत ऊँचे नीले मेघ।

श्लोक 8 (skanda.8.77.8)

सनत्कुमार उवाच । स तेषांमिङ्गितं ज्ञात्वा कालं च सुरतापनः । हिरण्याक्षः स्वयं राजा तानुवाच सुरद्विषः ।

sanatkumāra uvāca | sa teṣāṁmiṅgitaṁ jñātvā kālaṁ ca suratāpanaḥ | hiraṇyākṣaḥ svayaṁ rājā tānuvāca suradviṣaḥ |

सनत्कुमार ने कहा - देवताओं को संतप्त करने वाला वह राजा हिरण्याक्ष, उनके भावों तथा उपयुक्त समय को जानकर, स्वयं उन देवशत्रुओं से बोला।

श्लोक 9 (skanda.8.77.9)

यूयं सर्वे महामाया शृणुध्वं संयताः समम् । कालप्राप्तञ्च पथ्यञ्च शिष्या इव गुरोर्वचः ।

yūyaṁ sarve mahāmāyā śṛṇudhvaṁ saṁyatāḥ samam | kālaprāptañca pathyañca śiṣyā iva gurorvacaḥ |

'आप सब महामायावी लोग एकाग्रचित्त होकर सुनें, जैसे शिष्य गुरु के समयोचित तथा हितकर वचन को सुनते हैं।'

श्लोक 10 (skanda.8.77.10)

मम भ्राता प्रियो ह्यासीज्ज्येष्ठः पूज्यो यथा पिता । हिरण्यकशिपू राजा महात्मा सत्यसंगरः ।

mama bhrātā priyo hyāsījjyeṣṭhaḥ pūjyo yathā pitā | hiraṇyakaśipū rājā mahātmā satyasaṁgaraḥ |

'मेरा प्रिय ज्येष्ठ भ्राता, जो पिता के समान पूज्य था, वह महात्मा और सत्यप्रतिज्ञ राजा हिरण्यकशिपु था।'

श्लोक 11 (skanda.8.77.11)

धार्मिकश्च वदान्यश्च यज्वा दाता तपोन्वितः । आहिताग्निश्चतुर्वेदः सर्वभूतसुखावहः ।

dhārmikaśca vadānyaśca yajvā dātā taponvitaḥ | āhitāgniścaturvedaḥ sarvabhūtasukhāvahaḥ |

'वह धर्मात्मा, उदार, यज्ञकर्ता, दानी, तपस्वी, अग्निहोत्री, चारों वेदों का ज्ञाता तथा समस्त प्राणियों को सुख देने वाला था।'

श्लोक 12 (skanda.8.77.12)

राज्यार्थे स हतो देवैर्विकृत्या मूढमानसैः । तस्य दुःखेन तप्यामि शुष्यामि च महासुराः ।

rājyārthe sa hato devairvikṛtyā mūḍhamānasaiḥ | tasya duḥkhena tapyāmi śuṣyāmi ca mahāsurāḥ |

'राज्य के लिए मूढ़बुद्धि देवताओं ने उसे कपट से मार डाला। हे महासुरो! उसके शोक से मैं संतप्त हो रहा हूँ और सूखता जा रहा हूँ।'

श्लोक 13 (skanda.8.77.13)

सलिलादुद्धृतं ग्रीष्मे पद्मं कुसुमितं यथा । तेषां कर्तुमहं दण्डं शक्तोस्म्यसुरविद्विषाम् ।

salilāduddhṛtaṁ grīṣme padmaṁ kusumitaṁ yathā | teṣāṁ kartumahaṁ daṇḍaṁ śaktosmyasuravidviṣām |

'जैसे ग्रीष्म में जल से निकाला गया खिला हुआ कमल कुम्हला जाता है, वैसी ही मेरी दशा है; तथापि मैं असुरों के उन शत्रुओं को दण्ड देने में समर्थ हूँ।'

श्लोक 14 (skanda.8.77.14)

भवतां तत्र बालानां रक्षार्थं नोद्यतो ह्यहम् । सोहं दण्डं स्वयं कर्तुमेकाक्यसुरविद्विषाम् । गमिष्यामि न सन्देहो मा भीर्भवतु वोसुराः ।

bhavatāṁ tatra bālānāṁ rakṣārthaṁ nodyato hyaham | sohaṁ daṇḍaṁ svayaṁ kartumekākyasuravidviṣām | gamiṣyāmi na sandeho mā bhīrbhavatu vosurāḥ |

'मैं आप बालकों की रक्षा के लिए उद्यत नहीं हुआ हूँ। मैं स्वयं अकेला ही उन असुरशत्रुओं को दण्ड देने जाऊँगा, इसमें कोई संदेह नहीं। हे असुरो! तुम्हें कोई भय न हो।'

श्लोक 15 (skanda.8.77.15)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचन श्रुत्वा दानवास्ते मुदान्विताः । परस्परमुदैक्षन्त व्रीडया परयान्विताः ।

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacana śrutvā dānavāste mudānvitāḥ | parasparamudaikṣanta vrīḍayā parayānvitāḥ |

सनत्कुमार ने कहा - उसके ये वचन सुनकर वे दानव, हर्ष के साथ भी अत्यन्त लज्जायुक्त होकर, आपस में एक दूसरे को देखने लगे।

श्लोक 16 (skanda.8.77.16)

विप्रचित्तिस्तदनुजो भ्रातरं तं महाबलः । उवाच प्रणतः सम्यगर्थवन्मधुरं वचः ।

vipracittistadanujo bhrātaraṁ taṁ mahābalaḥ | uvāca praṇataḥ samyagarthavanmadhuraṁ vacaḥ |

महाबली विप्रचित्ति, जो उसका छोटा भाई था, उस भ्राता से झुककर सार्थक और मधुर वचन बोला।

श्लोक 17 (skanda.8.77.17)

न सन्देहो महासत्व त्वयैकेनासुरद्विषः ।

na sandeho mahāsatva tvayaikenāsuradviṣaḥ |

'हे महाबल! इसमें कोई सन्देह नहीं कि आप अकेले ही देवशत्रुओं को...' (इस श्लोक का शेष उत्तरार्ध मूल पाण्डुलिपि में सुरक्षित नहीं है)।

श्लोक 18 (skanda.8.77.18)

यदि युद्धे न तिष्ठन्ति मायां काञ्चिद्विनाश्रिताः । अबलास्ते न सन्देहो निकृत्या बलिनस्तु ते ।

yadi yuddhe na tiṣṭhanti māyāṁ kāñcidvināśritāḥ | abalāste na sandeho nikṛtyā balinastu te |

'यदि वे बिना किसी माया का सहारा लिये युद्ध में टिक नहीं सकते, तो निःसंदेह वे निर्बल हैं; वे तो केवल छल के बल पर बलवान बनते हैं।'

श्लोक 19 (skanda.8.77.19)

प्रसादयित्वा शिरसा यद् ब्रवीमि निबोध तत् । बालैरपि हिरण्याक्ष सूपपत्त्या प्रसाधितम् ।

prasādayitvā śirasā yad bravīmi nibodha tat | bālairapi hiraṇyākṣa sūpapattyā prasādhitam |

'मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करते हुए जो मैं कहता हूँ, उसे सुनिये - हे हिरण्याक्ष! उचित उपाय से बालकों द्वारा भी कार्य सिद्ध किया जा सकता है।'

श्लोक 20 (skanda.8.77.20)

तद् ग्राह्यमिति शास्त्रविद्भिः समीरितम् । हिरण्यकशिपू राजा भ्राता नो ज्येष्ठ उत्तमः ।

tad grāhyamiti śāstravidbhiḥ samīritam | hiraṇyakaśipū rājā bhrātā no jyeṣṭha uttamaḥ |

'यह ग्रहण करने योग्य है' - ऐसा शास्त्रवेत्ताओं ने कहा है (इस पद में एक शब्द मूल पाण्डुलिपि में अस्पष्ट है)। राजा हिरण्यकशिपु हमारे उत्तम ज्येष्ठ भ्राता थे।'

श्लोक 21 (skanda.8.77.21)

सोपि शक्तोहमित्येव एकाकी दैवतैर्हतः । महाबलोपि च हरिरशक्तैर्हन्यते बलात् ।

sopi śaktohamityeva ekākī daivatairhataḥ | mahābalopi ca hariraśaktairhanyate balāt |

'वह भी यह सोचकर कि मैं अकेला ही समर्थ हूँ, अकेला रहकर देवताओं द्वारा मारा गया। महाबली हरि भी बलपूर्वक निर्बलों के हाथों मारे जाते हैं।'

श्लोक 22 (skanda.8.77.22)

आक्रन्दन्तं विना राजन्नतो विज्ञापयामि ते । भवतस्तु वयं बाला न तेषामसुरेश्वर ।

ākrandantaṁ vinā rājannato vijñāpayāmi te | bhavatastu vayaṁ bālā na teṣāmasureśvara |

'हे राजन्! इसलिए बिना पुकारे ही मैं आपसे निवेदन करता हूँ - हे असुरेश्वर! हम आपकी अपेक्षा बालक हैं, किन्तु उन देवताओं की अपेक्षा नहीं।'

श्लोक 23 (skanda.8.77.23)

शक्ता वयं सुयुद्धेन तान्हन्तुं कुलपांसनान् । तपोयोगबलोपेता मायाभिश्च समन्विताः ।

śaktā vayaṁ suyuddhena tānhantuṁ kulapāṁsanān | tapoyogabalopetā māyābhiśca samanvitāḥ |

'हम तप और योग के बल से युक्त तथा माया-शक्तियों से सम्पन्न होकर, सुयुद्ध द्वारा उन कुलकलंकियों को मारने में समर्थ हैं।'

श्लोक 24 (skanda.8.77.24)

अनुस्मरन्तो वैरञ्च वयं हंस्याम दैवतान् । यथा तव न निद्रास्ति हिरण्यकशिपोर्वधात् ।

anusmaranto vairañca vayaṁ haṁsyāma daivatān | yathā tava na nidrāsti hiraṇyakaśiporvadhāt |

'हमारे वैर का स्मरण करते हुए हम देवताओं का वध करेंगे, जैसे हिरण्यकशिपु के वध के कारण आपको नींद नहीं आती।'

श्लोक 25 (skanda.8.77.25)

तथास्माकं महाराज मा नो बालान्यथा चर । यत्र नो योक्ष्यसे राजन् समे वा विषमेपि वा ।

tathāsmākaṁ mahārāja mā no bālānyathā cara | yatra no yokṣyase rājan same vā viṣamepi vā |

'हे महाराज! उसी प्रकार हमारे साथ भी बालकों जैसा व्यवहार न कीजिये। हे राजन्! आप हमें जहाँ भी लगायेंगे, चाहे समतल भूमि में या विषम स्थान में,'

श्लोक 26 (skanda.8.77.26)

तरिष्यामो वयं तद् वै बालमत्स्या इवार्णवम् । प्रह्रादोयं सहभ्राता ससुतः ससुहृज्जनः ।

tariṣyāmo vayaṁ tad vai bālamatsyā ivārṇavam | prahrādoyaṁ sahabhrātā sasutaḥ sasuhṛjjanaḥ |

'हम उसे वैसे ही पार कर लेंगे, जैसे छोटी मछलियाँ समुद्र को पार करती हैं। यह प्रह्राद अपने भाइयों, पुत्रों और मित्रों सहित यहाँ है;'

श्लोक 27 (skanda.8.77.27)

एक एवाह्वयेत्सर्वान्यथा सिंहो महाद्विपान् । बलिरेष च दैत्येन्द्र एक एव सवासवान् ।

eka evāhvayetsarvānyathā siṁho mahādvipān | balireṣa ca daityendra eka eva savāsavān |

'वह अकेला ही सबको ऐसे ललकार सकता है, जैसे सिंह बड़े हाथियों को। हे दैत्येन्द्र! यह बलि भी अकेला ही इन्द्र सहित समस्त देवताओं को,'

श्लोक 28 (skanda.8.77.28)

सुरान् सयम वित्तेशाञ्छक्तः सर्वान्प्रबाधितुम् । अयं बाणश्च तत्पुत्रो राजा बाहुसहस्रधृक् ।

surān sayama vitteśāñchaktaḥ sarvānprabādhitum | ayaṁ bāṇaśca tatputro rājā bāhusahasradhṛk |

'यम और कुबेर सहित सभी देवताओं को उत्पीड़ित करने में समर्थ है। यह उसका पुत्र बाण भी है, सहस्रभुजाधारी राजा,'

श्लोक 29 (skanda.8.77.29)

एक एव सुरान्सर्वान् विनाशयितुमुद्यतः । इमो सुन्दनिसुन्दौ च भ्रातरौ बाहुशालिनौ ।

eka eva surānsarvān vināśayitumudyataḥ | imo sundanisundau ca bhrātarau bāhuśālinau |

'जो अकेला ही सभी देवताओं का विनाश करने को तत्पर है। ये सुन्द और निसुन्द भी हैं, बाहुबली दोनों भाई,'

श्लोक 30 (skanda.8.77.30)

उभावेकाकिनौ युद्धे देवान् हन्तुं समुद्यतौ । अयं मयश्च विक्रान्तः सारकस्तार एव च ।

ubhāvekākinau yuddhe devān hantuṁ samudyatau | ayaṁ mayaśca vikrāntaḥ sārakastāra eva ca |

'जो दोनों अकेले ही युद्ध में देवताओं का वध करने को उद्यत हैं। यह पराक्रमी मय भी है, तथा सारक और तार भी,'

श्लोक 31 (skanda.8.77.31)

अन्ये च दानवाः शूराः शक्ता देवान् प्रबाधितुम् । एतेप्यतिबलाः सर्वे बलवन्तो वयं सदा ।

anye ca dānavāḥ śūrāḥ śaktā devān prabādhitum | etepyatibalāḥ sarve balavanto vayaṁ sadā |

'तथा अन्य वीर दानव भी हैं, जो देवताओं को पीड़ित करने में समर्थ हैं। ये सभी अत्यन्त बलवान हैं, और हम भी सदा बलवान हैं।'

श्लोक 32 (skanda.8.77.32)

वधिष्यामः सुरान् सर्वान् व्याधा इव मृगान् वने । शूरोयमन्धकः श्रीमान् ब्रह्मदत्तवरस्तदा ।

vadhiṣyāmaḥ surān sarvān vyādhā iva mṛgān vane | śūroyamandhakaḥ śrīmān brahmadattavarastadā |

'हम सभी देवताओं का वध वैसे ही करेंगे, जैसे शिकारी वन में मृगों का करते हैं। यह वीर एवं श्रीमान अन्धक भी है, जिसे ब्रह्मा से वर प्राप्त हुआ था,'

श्लोक 33 (skanda.8.77.33)

प्रसह्य सर्वाँस्तान् युद्धे नेष्यते वै यमालयम् । एवमेनं समाश्रित्य पालितानेन चैव हि ।

prasahya sarvā~stān yuddhe neṣyate vai yamālayam | evamenaṁ samāśritya pālitānena caiva hi |

'जो बलपूर्वक युद्ध में उन सबको यमलोक भेज देगा। इस प्रकार इसका आश्रय लेकर और इसके द्वारा पालित होकर,'

श्लोक 34 (skanda.8.77.34)

करिष्यामो महद्युद्धं देवतानां भयंकरम् । पूर्वं देवा वयं सर्वे पश्चात्ते देवताभवन् ।

kariṣyāmo mahadyuddhaṁ devatānāṁ bhayaṁkaram | pūrvaṁ devā vayaṁ sarve paścātte devatābhavan |

'हम देवताओं के लिए भयंकर महायुद्ध करेंगे। पहले हम सब ही देवता थे, बाद में वे देवता बने।'

श्लोक 35 (skanda.8.77.35)

कथं बिभीम तेषां वै सिंहानां शरभा इव । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा अन्धकस्सोसुरेश्वरः ।

kathaṁ bibhīma teṣāṁ vai siṁhānāṁ śarabhā iva | tasya tadvacanaṁ śrutvā andhakassosureśvaraḥ |

'तो फिर हम उनसे क्यों डरें, हम तो उनके लिए वैसे ही हैं जैसे शरभ सिंहों के लिए।' उसके ये वचन सुनकर वह असुरेश्वर अन्धक

श्लोक 36 (skanda.8.77.36)

उवाच वचनं तत्र हर्षयन् दानवेश्वरान् । महाबला वयं राजन् बलहीनाः सुरास्तु ते ।

uvāca vacanaṁ tatra harṣayan dānaveśvarān | mahābalā vayaṁ rājan balahīnāḥ surāstu te |

वहाँ दानवेश्वरों को प्रसन्न करते हुए बोला - 'हे राजन्! हम महाबली हैं, किन्तु वे देवता बलहीन हैं।'

श्लोक 37 (skanda.8.77.37)

पश्य त्वं दैवतान्सर्वान् हतान् यमपुरोगमान् । अद्य तं राजहन्तारं दुरात्मानं कुलाधमम् ।

paśya tvaṁ daivatānsarvān hatān yamapurogamān | adya taṁ rājahantāraṁ durātmānaṁ kulādhamam |

'आप देखें - सभी देवता यम को आगे करके मारे जा चुके हैं। आज उस दुष्टात्मा, कुलाधम, राजा के हन्ता को...'

श्लोक 38 (skanda.8.77.38)

अद्य माता दितिस्तेषां दुःख ।

adya mātā ditisteṣāṁ duḥkha |

'आज उनकी माता दिति के दुःख को...' (इस श्लोक की शेष पंक्तियाँ मूल पाण्डुलिपि में सर्वथा नष्ट हो चुकी हैं) '...देखो, आदित्यों में सबसे छोटे का वध मैंने अकेले ही किया है।'

श्लोक 39 (skanda.8.77.39)

तिष्ठध्वं दानवाः सर्वे पर्याप्तोहं दुरात्मनाम् । अस्माकं राजहन्तॄणां मृत्युरस्मि समागतः ।

tiṣṭhadhvaṁ dānavāḥ sarve paryāptohaṁ durātmanām | asmākaṁ rājahantṝṇāṁ mṛtyurasmi samāgataḥ |

'हे सभी दानवो! स्थिर रहो, मैं अकेला ही उन दुरात्माओं के लिए पर्याप्त हूँ। हमारे राजा के हन्ताओं के लिए मैं साक्षात् मृत्यु बनकर आया हूँ।'

श्लोक 40 (skanda.8.77.40)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हिरण्याक्षः प्रतापवान् । उवाच दानवान् व्यास जयेप्सुः सुरविद्विषाम् ।

sanatkumāra uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | uvāca dānavān vyāsa jayepsuḥ suravidviṣām |

सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! उसके ये वचन सुनकर, देवशत्रुओं पर विजय चाहने वाला प्रतापी हिरण्याक्ष दानवों से बोला।

श्लोक 41 (skanda.8.77.41)

अद्य पुष्यं च नक्षत्रमस्माकं बलकारणम् । अद्यैव दंशिताः सर्वे द्रुतं निर्यात दानवाः ।

adya puṣyaṁ ca nakṣatramasmākaṁ balakāraṇam | adyaiva daṁśitāḥ sarve drutaṁ niryāta dānavāḥ |

'आज पुष्य नक्षत्र हमारे बल का कारण है। आज ही सब कवचधारण करके शीघ्र प्रस्थान करो, हे दानवो!'

श्लोक 42 (skanda.8.77.42)

अथ ते दानवाः शीघ्रं वाहनानि मुदा युताः । प्रावारयन्त संग्रामे योग्यानि रिपुबाधने ।

atha te dānavāḥ śīghraṁ vāhanāni mudā yutāḥ | prāvārayanta saṁgrāme yogyāni ripubādhane |

तब वे दानव हर्षपूर्वक शीघ्रता से युद्ध और शत्रु-पीड़न के योग्य अपने वाहनों को सजाने लगे।

श्लोक 43 (skanda.8.77.43)

शीघ्रं कुरुध्वं सज्जानि गच्छामो दैवतान्प्रति । तेषां सुतुमुलः शब्दो बाहनानां बभूव ह ।

śīghraṁ kurudhvaṁ sajjāni gacchāmo daivatānprati | teṣāṁ sutumulaḥ śabdo bāhanānāṁ babhūva ha |

'शीघ्र सब कुछ तैयार करो, हम देवताओं के विरुद्ध चलते हैं।' उनके वाहनों का अत्यन्त कोलाहलपूर्ण शब्द होने लगा,

श्लोक 44 (skanda.8.77.44)

मन्दवातप्रेरितस्य क्षीरोदस्य स्वनो यथा । ममाश्वस्तव सिंहोयं ममायं गजयूथपः ।

mandavātapreritasya kṣīrodasya svano yathā | mamāśvastava siṁhoyaṁ mamāyaṁ gajayūthapaḥ |

जैसे मन्द वायु से प्रेरित क्षीरसागर की ध्वनि होती है। 'यह मेरा घोड़ा है', 'यह सिंह तुम्हारा है', 'यह मेरा गजयूथपति है',

श्लोक 45 (skanda.8.77.45)

रथोयं कस्य संपन्नो युद्धोपकरणैर्भृशम् । एहि निर्याहि वेगेन मुहूर्तं प्रतिपालय ।

rathoyaṁ kasya saṁpanno yuddhopakaraṇairbhṛśam | ehi niryāhi vegena muhūrtaṁ pratipālaya |

'युद्ध के साधनों से भलीभाँति सुसज्जित यह रथ किसका है?' 'आओ, वेगपूर्वक प्रस्थान करो!' 'एक क्षण ठहरो!'

श्लोक 46 (skanda.8.77.46)

निर्यान्तु सर्वे दैत्येन्द्रा यास्यामः पृष्ठतो वयम् । आरोह स्वं रथं वीर किं रथेन ममाद्य वै । पदातिरेव संग्रामे हंस्याम्यद्य सुरद्विषः ।

niryāntu sarve daityendrā yāsyāmaḥ pṛṣṭhato vayam | āroha svaṁ rathaṁ vīra kiṁ rathena mamādya vai | padātireva saṁgrāme haṁsyāmyadya suradviṣaḥ |

'सभी दैत्येन्द्र आगे बढ़ें, हम पीछे-पीछे चलेंगे।' 'हे वीर! अपने रथ पर चढ़ो!' 'आज मुझे रथ से क्या प्रयोजन? आज मैं पैदल ही युद्ध में देवशत्रुओं का वध करूँगा!'

श्लोक 47 (skanda.8.77.47)

एवं तेषाममूच्छब्दः सुमनोज्ञः सुरद्विषाम् । वंशवीणास्वनोन्मिश्रः प्रलाप इव योषिताम् ।

evaṁ teṣāmamūcchabdaḥ sumanojñaḥ suradviṣām | vaṁśavīṇāsvanonmiśraḥ pralāpa iva yoṣitām |

इस प्रकार देवशत्रुओं का यह मधुर कोलाहल बाँसुरी और वीणा की ध्वनि से मिश्रित होकर, स्त्रियों के मीठे प्रलाप के समान लग रहा था।

श्लोक 48 (skanda.8.77.48)

अथ शुक्रस्तदाभेत्य भृगोः पुत्रो महातपाः । हिरण्याक्षमुवाचेदं हर्षयन्दानवेश्वरम् ।

atha śukrastadābhetya bhṛgoḥ putro mahātapāḥ | hiraṇyākṣamuvācedaṁ harṣayandānaveśvaram |

तब भृगु के पुत्र, महातपस्वी शुक्राचार्य वहाँ आये और दानवेश्वर हिरण्याक्ष को प्रसन्न करते हुए यह बोले -

श्लोक 49 (skanda.8.77.49)

मया शान्तिः कृता तेद्य रक्षा च सह दानवैः । जहि सर्वान्सुरान् युद्धे न तवास्ति पराजयः ।

mayā śāntiḥ kṛtā tedya rakṣā ca saha dānavaiḥ | jahi sarvānsurān yuddhe na tavāsti parājayaḥ |

'मैंने आज दानवों सहित तुम्हारे लिए शान्ति-कर्म और रक्षा-कर्म कर दिया है। युद्ध में समस्त देवताओं का वध करो, तुम्हारी पराजय नहीं होगी।'

श्लोक 50 (skanda.8.77.50)

अहं त्वा स्वेन तपसा सहभृत्यं सबान्धवम् । धारयिष्यामि युध्यन्तं लोकान्यज्ञ इवापरः ।

ahaṁ tvā svena tapasā sahabhṛtyaṁ sabāndhavam | dhārayiṣyāmi yudhyantaṁ lokānyajña ivāparaḥ |

'मैं अपने तप के बल से, युद्ध करते हुए, अपने सेवकों और बन्धुओं सहित तुम्हें धारण करूँगा, जैसे यज्ञ लोकों को धारण करता है।'

श्लोक 51 (skanda.8.77.51)

सनत्कुमार उवाच । ततः प्रदक्षिणं कृत्वा शुक्रं मूर्ध्ना प्रणम्य च । भार्गवं पुरतः कृत्वा निर्जगाम स मन्दिरात् ।

sanatkumāra uvāca | tataḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā śukraṁ mūrdhnā praṇamya ca | bhārgavaṁ purataḥ kṛtvā nirjagāma sa mandirāt |

सनत्कुमार ने कहा - तब शुक्राचार्य की प्रदक्षिणा करके और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करके, तथा उस भार्गव को आगे करके, वह अपने भवन से निकल पड़ा।

श्लोक 52 (skanda.8.77.52)

ततो भेर्यश्च शंखाश्च पणवानकगोमुखाः । साडस्तमा दिण्डिमाश्च भाण्डाश्च पटहैः सह ।

tato bheryaśca śaṁkhāśca paṇavānakagomukhāḥ | sāḍastamā diṇḍimāśca bhāṇḍāśca paṭahaiḥ saha |

तब नगाड़े, शंख, पणव, आनक तथा गोमुख वाद्य, साडस्तम, डिण्डिम, भाण्ड और पटह वाद्यों सहित,

श्लोक 53 (skanda.8.77.53)

झंर्झर्यो दर्दुराश्चैव सुनवा मर्दलास्तथा । कटंकटाः पेपुकाश्च तथा चैवैकपुष्कलाः ।

jhaṁrjharyo dardurāścaiva sunavā mardalāstathā | kaṭaṁkaṭāḥ pepukāśca tathā caivaikapuṣkalāḥ |

झर्झरी, दर्दुर, सुनव तथा मर्दल वाद्य, कटंकट और पेपुक वाद्य, तथा एकपुष्कल वाद्य भी,

श्लोक 54 (skanda.8.77.54)

पञ्चाक्षाः सरिधीकाश्च मुकुन्दा मुरजास्तथा । लभका जलमत्ताश्च अवाद्यन्त सहस्रशः ।

pañcākṣāḥ saridhīkāśca mukundā murajāstathā | labhakā jalamattāśca avādyanta sahasraśaḥ |

पंचाक्ष, सरिधीक, मुकुन्द तथा मुरज वाद्य, लभक तथा जलमत्त वाद्य - ये सब हजारों की संख्या में बज उठे।

श्लोक 55 (skanda.8.77.55)

गायनैश्चैव गायद्भिः स्तुवद्भिः सूतमागधैः । दिव्याभिः कुलवृद्धाभिः स्त्रीभिश्च कृतमङ्गला ।

gāyanaiścaiva gāyadbhiḥ stuvadbhiḥ sūtamāgadhaiḥ | divyābhiḥ kulavṛddhābhiḥ strībhiśca kṛtamaṅgalā |

गायकों के गायन तथा सूत-मागधों की स्तुतियों के साथ, कुल की वृद्धा दिव्य स्त्रियों द्वारा मंगल-कृत्य किये गये।

श्लोक 56 (skanda.8.77.56)

द्वार्य पश्यन् रथं क्लृप्तं यया देवमयं हरः । शतनल्वप्रमाणाङ्कं दिव्यं जाम्बूनदं दृढम् ।

dvārya paśyan rathaṁ klṛptaṁ yayā devamayaṁ haraḥ | śatanalvapramāṇāṅkaṁ divyaṁ jāmbūnadaṁ dṛḍham |

द्वार पर उसने अपना तैयार रथ देखा, जिसके द्वारा वह देवताओं को हरने वाला था - शत नल्व की माप वाला, दिव्य, दृढ़ तथा शुद्ध सुवर्ण से बना।

श्लोक 57 (skanda.8.77.57)

असंगतुरगैः श्वेतैस्त्रिसाहस्रैर्मनोजवैः । अमरैः कामगैर्दिव्यैः श्रमदुःखविवर्जितैः ।

asaṁgaturagaiḥ śvetaistrisāhasrairmanojavaiḥ | amaraiḥ kāmagairdivyaiḥ śramaduḥkhavivarjitaiḥ |

जो तीन हजार श्वेत, मन के समान वेगवान, अमर, इच्छानुसार गमन करने वाले तथा श्रम और दुःख से रहित दिव्य घोड़ों से जुता हुआ था,

श्लोक 58 (skanda.8.77.58)

यन्ता रथस्य तस्यसिल्मकरो नाम विश्रुतः । पुत्रो गरुत्मतो व्यास खगः कामगमःशुभः ।

yantā rathasya tasyasilmakaro nāma viśrutaḥ | putro garutmato vyāsa khagaḥ kāmagamaḥśubhaḥ |

हे व्यास! उस रथ का सारथी सिल्मकर नामक प्रसिद्ध पक्षी था, जो गरुड़ का पुत्र, इच्छानुसार गमन करने वाला तथा शुभ था।

श्लोक 59 (skanda.8.77.59)

तमसौ राजशब्देन आशीर्भिश्चाभिपूजितः । आरुरोह रथं राजा एकचक्रं यथा रविः ।

tamasau rājaśabdena āśīrbhiścābhipūjitaḥ | āruroha rathaṁ rājā ekacakraṁ yathā raviḥ |

राजोचित जयघोष और आशीर्वादों से सम्मानित होकर वह राजा उस रथ पर आरूढ़ हुआ, जैसे सूर्य अपने एकचक्र रथ पर आरूढ़ होता है।

श्लोक 60 (skanda.8.77.60)

कवची बद्धतूणीरः शरी खड्गी शरासनी । बद्धगोधांगुलित्रश्च कण्ठत्राणकृतस्तथा ।

kavacī baddhatūṇīraḥ śarī khaḍgī śarāsanī | baddhagodhāṁgulitraśca kaṇṭhatrāṇakṛtastathā |

वह कवच पहने, तरकश बाँधे, बाण, खड्ग तथा धनुष धारण किये, गोधाचर्म का अंगुलित्राण बाँधे तथा कण्ठत्राण धारण किये हुए था,

श्लोक 61 (skanda.8.77.61)

ध्वजेन महता चैव छत्रेण च विभूषितः । बह्वीभिर्वैजयन्तीभिः सबलाक इवाम्बुदः ।

dhvajena mahatā caiva chatreṇa ca vibhūṣitaḥ | bahvībhirvaijayantībhiḥ sabalāka ivāmbudaḥ |

विशाल ध्वज तथा छत्र से सुशोभित, अनेक विजय-पताकाओं सहित, वह बगुलों की पंक्ति सहित मेघ के समान प्रतीत हो रहा था।

श्लोक 62 (skanda.8.77.62)

तस्य छत्रं तदा भाति किरीटोपरि संस्थितम् । आविष्कृतपयोदाभस्तस्य पौर्णमास्यां यथा शशी ।

tasya chatraṁ tadā bhāti kirīṭopari saṁsthitam | āviṣkṛtapayodābhastasya paurṇamāsyāṁ yathā śaśī |

उसके मुकुट के ऊपर स्थित वह छत्र उस समय ऐसे शोभित हो रहा था, जैसे पूर्णिमा की रात्रि में मेघ से निकला हुआ चन्द्रमा।

श्लोक 63 (skanda.8.77.63)

खट्वाङ्गस्तस्य चाभाति ध्वजो दिवमिवाक्रमन् । त्रैलोक्यस्योपघातार्थं केतुर्दीप्त इवोदितः ।

khaṭvāṅgastasya cābhāti dhvajo divamivākraman | trailokyasyopaghātārthaṁ keturdīpta ivoditaḥ |

खट्वांगचिह्नित उसका ध्वज ऐसे शोभित हो रहा था मानो आकाश में आरोहण कर रहा हो, त्रिलोकी के विनाश के लिए उदित हुए किसी प्रज्वलित पुच्छल तारे के समान।

श्लोक 64 (skanda.8.77.64)

तादृगेव रथो ह्यासीत् सुतस्य सुमहात्मनः । अन्धकस्य तदा व्यास महाजलदनिस्वनः ।

tādṛgeva ratho hyāsīt sutasya sumahātmanaḥ | andhakasya tadā vyāsa mahājaladanisvanaḥ |

हे व्यास! उसके महात्मा पुत्र अन्धक का रथ भी वैसा ही था, जो उस समय महामेघ के समान गर्जना कर रहा था।

श्लोक 65 (skanda.8.77.65)

अथ याहीति तेनोक्तौ रथयन्ता सुरद्विषः । त्रिसाहस्रान् हयाग्र्याँस्तु रथे प्रस्यचूचुदत् ।

atha yāhīti tenoktau rathayantā suradviṣaḥ | trisāhasrān hayāgryā~stu rathe prasyacūcudat |

तब 'चलो' कहे जाने पर उस देवशत्रु के सारथी ने रथ में जुते हुए तीन हजार उत्तम घोड़ों को प्रेरित किया।

श्लोक 66 (skanda.8.77.66)

प्रचोदितास्तमूढुस्ते जवना वातरंहसः । हयाः कामगमाः सप्त रवेरिव महारथम् ।

pracoditāstamūḍhuste javanā vātaraṁhasaḥ | hayāḥ kāmagamāḥ sapta raveriva mahāratham |

प्रेरित होकर वे वेगवान, वायु के समान गतिवाले, इच्छानुसार गमन करने वाले घोड़े उसे ऐसे ढो ले गये, जैसे सात घोड़े सूर्य के महारथ को ढोते हैं।

श्लोक 67 (skanda.8.77.67)

तस्याग्रतस्तदा शुक्रो रथेनाम्बुदनादिना । उद्गच्छत इव व्योम्नि तस्याभूद् यथा बुधः ।

tasyāgratastadā śukro rathenāmbudanādinā | udgacchata iva vyomni tasyābhūd yathā budhaḥ |

मेघ के समान गर्जना करते रथ पर सवार शुक्राचार्य उसके आगे-आगे इस प्रकार चले मानो आकाश में उदित होते हुए बुध ग्रह हों।

श्लोक 68 (skanda.8.77.68)

दक्षिणे तस्य पार्श्वे च अभूदन्धकदानवः । दक्षिणायनमासाद्य यथा लोकस्य भास्करः ।

dakṣiṇe tasya pārśve ca abhūdandhakadānavaḥ | dakṣiṇāyanamāsādya yathā lokasya bhāskaraḥ |

उसके दाहिने पार्श्व में दानव अन्धक स्थित था, जैसे दक्षिणायन में स्थित सूर्य संसार के दाहिने भाग में रहता है।

श्लोक 69 (skanda.8.77.69)

द्वितीयं पार्श्वमाश्रित्य विप्रचित्तिरभूत् स्थितः । भारतस्येव वर्षस्य हिमवान् पर्वतोत्तमः ।

dvitīyaṁ pārśvamāśritya vipracittirabhūt sthitaḥ | bhāratasyeva varṣasya himavān parvatottamaḥ |

दूसरी ओर विप्रचित्ति स्थित था, जैसे भारतवर्ष के पास उत्तम पर्वत हिमालय स्थित है।

श्लोक 70 (skanda.8.77.70)

पृष्ठतश्चाग्रतश्चैव यथाप्रीति ययुस्तदा । अपरे दानवाः शूराः शशाङ्कस्य यथा ग्रहाः ।

pṛṣṭhataścāgrataścaiva yathāprīti yayustadā | apare dānavāḥ śūrāḥ śaśāṅkasya yathā grahāḥ |

अन्य वीर दानव अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार आगे-पीछे चलने लगे, जैसे चन्द्रमा के साथ ग्रह चलते हैं।

श्लोक 71 (skanda.8.77.71)

तत्सैन्यं प्रचलद् भाति व्रजतां मुनिसत्तम । सविद्युत्स्तनयित्नूनामभ्भोदानामिवात्यये ।

tatsainyaṁ pracalad bhāti vrajatāṁ munisattama | savidyutstanayitnūnāmabhbhodānāmivātyaye |

हे मुनिश्रेष्ठ! चलते हुए वे सेनाएँ ऐसे शोभित हो रही थीं, जैसे वर्षा ऋतु के अन्त में बिजली और गर्जना सहित मेघ शोभित होते हैं।

श्लोक 72 (skanda.8.77.72)

हयह्रेषितशब्दञ्च मत्तद्विरद बृंहितम् । वल्गितास्फोटितोत्क्रुष्टं सिंहनादोद्धतं ययौ ।

hayahreṣitaśabdañca mattadvirada bṛṁhitam | valgitāsphoṭitotkruṣṭaṁ siṁhanādoddhataṁ yayau |

घोड़ों की हिनहिनाहट, मतवाले हाथियों की चिंघाड़, कूद-फाँद, भुजाओं की थपथपाहट, ऊँची पुकार तथा सिंहनाद से उद्धत होकर वह सेना चली।

श्लोक 73 (skanda.8.77.73)

तद्धि तूर्यरवसिंहनादितैरश्वहेषितगजोग्रबृंहितैः । बाहुशब्दकुचितावनादितैर्याति दानवबलं भयावहम् ।

taddhi tūryaravasiṁhanāditairaśvaheṣitagajograbṛṁhitaiḥ | bāhuśabdakucitāvanāditairyāti dānavabalaṁ bhayāvaham |

वह भयंकर दानवसेना तुरही और सिंहनाद की ध्वनि, अश्वों के हिनहिनाने और हाथियों की भयंकर चिंघाड़, तथा भुजाओं की गर्जना से पृथ्वी को गुंजाती हुई आगे बढ़ी।

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