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अम्बिका खण्ड · अध्याय 79

देवासुरसंग्रामः

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

श्लोक 1 (skanda.8.79.1)

सनत्कुमार उवाच । व्यूढे सुराणां सैन्येथ स्थिते युद्धाय दंशिते । दानवानां बलं घोरं समदृश्यत भीषणम् ।

sanatkumāra uvāca | vyūḍhe surāṇāṁ sainyetha sthite yuddhāya daṁśite | dānavānāṁ balaṁ ghoraṁ samadṛśyata bhīṣaṇam |

सनत्कुमार ने कहा - जब देवताओं की सेना व्यूह बनाकर, कवच धारण कर युद्ध के लिए खड़ी हुई, तब दानवों की भयंकर, घोर सेना दिखाई दी।

श्लोक 2 (skanda.8.79.2)

तद् दानवबलं दृष्ट्वा देवाः सर्वे सवासवाः । सिंहनादानकुर्वँस्ते वादित्ररवमिश्रितान् ।

tad dānavabalaṁ dṛṣṭvā devāḥ sarve savāsavāḥ | siṁhanādānakurva~ste vāditraravamiśritān |

उस दानव-सेना को देखकर, इन्द्र सहित सभी देवताओं ने वाद्यों की ध्वनि से मिश्रित सिंहनाद किया।

श्लोक 3 (skanda.8.79.3)

स नादः सुमहान् व्यास सागरस्येव मथ्यतः । आपूरयज्जगत् सर्वं युगान्ताम्बुदनिस्वनः ।

sa nādaḥ sumahān vyāsa sāgarasyeva mathyataḥ | āpūrayajjagat sarvaṁ yugāntāmbudanisvanaḥ |

हे व्यास! वह महान घोष, मथे जाते समुद्र के समान, प्रलयकालीन मेघों की गर्जना के समान, सारे संसार को भर गया।

श्लोक 4 (skanda.8.79.4)

ततो दानवशार्दूलाः सर्वे दृष्ट्वा सुरोत्तमान् । व्यूह्य सैन्यं स्थितान् सम्यग् वीक्षाञ्चक्रुः परस्परम् ।

tato dānavaśārdūlāḥ sarve dṛṣṭvā surottamān | vyūhya sainyaṁ sthitān samyag vīkṣāñcakruḥ parasparam |

तब सभी बाघ के समान दानव, व्यूह बनाकर खड़े हुए श्रेष्ठ देवताओं को देखकर, आपस में एक दूसरे को ध्यान से देखने लगे।

श्लोक 5 (skanda.8.79.5)

तान् वीक्षमाणान् सन्दृश्य स्थितो दानवयूथपान् । उवाच भार्गवं व्यास हिरण्यनयनः स्वयम् ।

tān vīkṣamāṇān sandṛśya sthito dānavayūthapān | uvāca bhārgavaṁ vyāsa hiraṇyanayanaḥ svayam |

हे व्यास! उन दानव-सेनापतियों को इस प्रकार देखते हुए खड़ा देखकर, स्वयं हिरण्याक्ष ने भार्गव (शुक्राचार्य) से कहा -

श्लोक 6 (skanda.8.79.6)

एते व्यूहमिमं कृत्वा देवास्तिष्ठन्त्यभीतवत् । मन्यन्ते दानवान् युद्धे वयं जेष्याम सर्वशः ।

ete vyūhamimaṁ kṛtvā devāstiṣṭhantyabhītavat | manyante dānavān yuddhe vayaṁ jeṣyāma sarvaśaḥ |

'ये देवगण यह व्यूह बनाकर निर्भय की भाँति खड़े हैं; ये सोच रहे हैं कि हम युद्ध में दानवों को सर्वथा जीत लेंगे।'

श्लोक 7 (skanda.8.79.7)

स भवान्युक्तमस्यैव देवव्यूहस्य भेदकम् । कुरु मायाप्रतिव्यूहमस्माकमपि मा चिरम् ।

sa bhavānyuktamasyaiva devavyūhasya bhedakam | kuru māyāprativyūhamasmākamapi mā ciram |

'अतः आप उचित रूप से इस देवव्यूह को भेदने वाला माया-प्रतिव्यूह हमारे लिए भी शीघ्र रचिये, विलम्ब न कीजिये।'

श्लोक 8 (skanda.8.79.8)

सनत्कुमार उवाच । एवमस्त्विति स प्रोच्य ह्यर्धचन्द्रञ्चकार सः । खगस्य तस्य यच्छेत्तुं शिरः कायादियेष च ।

sanatkumāra uvāca | evamastviti sa procya hyardhacandrañcakāra saḥ | khagasya tasya yacchettuṁ śiraḥ kāyādiyeṣa ca |

सनत्कुमार ने कहा - 'ऐसा ही हो' कहकर उन्होंने अर्धचन्द्राकार व्यूह की रचना की, जिससे उस पक्षी-व्यूह के सिर को शरीर आदि अंगों से काटा जा सके।

श्लोक 9 (skanda.8.79.9)

चकार तस्य शृंगे तु प्रह्लादान्धकदानवौ । धारान्निवातकवचान्पौलोमान्कालकासुतान् ।

cakāra tasya śṛṁge tu prahlādāndhakadānavau | dhārānnivātakavacānpaulomānkālakāsutān |

उसके दोनों सींगों पर उन्होंने प्रह्लाद और दानव अन्धक को, धार को, निवातकवचों को, पौलोमों को तथा कालका के पुत्रों को रखा।

श्लोक 10 (skanda.8.79.10)

विरोचनं बलिं चैव विप्रचित्तिं सहानुजैः । प्रह्लादभ्रातरं चैव ससुहृद्वर्गबान्धवान् ।

virocanaṁ baliṁ caiva vipracittiṁ sahānujaiḥ | prahlādabhrātaraṁ caiva sasuhṛdvargabāndhavān |

विरोचन तथा बलि को, अपने छोटे भाइयों सहित विप्रचित्ति को, तथा प्रह्लाद के भाई को अपने मित्रों और बन्धुओं सहित,

श्लोक 11 (skanda.8.79.11)

पृष्ठं चक्रे महायोगी मध्यं राजानमेव च । उवाच चैनं विश्रब्धो भार्गवः शत्रुतापनः ।

pṛṣṭhaṁ cakre mahāyogī madhyaṁ rājānameva ca | uvāca cainaṁ viśrabdho bhārgavaḥ śatrutāpanaḥ |

उस महायोगी शुक्राचार्य ने पृष्ठभाग में रखा, और मध्य में स्वयं राजा को रखा। फिर शत्रुओं को संतप्त करने वाले भार्गव ने विश्वासपूर्वक उससे कहा -

श्लोक 12 (skanda.8.79.12)

हिरण्याक्षमिदं युक्तं काले पथ्यञ्च सर्वशः । दैवतभव्यूहभेत्तायं महाव्यूहो हि वः कृतः ।

hiraṇyākṣamidaṁ yuktaṁ kāle pathyañca sarvaśaḥ | daivatabhavyūhabhettāyaṁ mahāvyūho hi vaḥ kṛtaḥ |

'हे हिरण्याक्ष! यह समयोचित एवं सर्वथा हितकर है। देवताओं के व्यूह को भेदने वाला यह महाव्यूह तुम्हारे लिए रचा गया है।'

श्लोक 13 (skanda.8.79.13)

युक्तं कुरुत भद्रं वो मया नु परिपालिताः । परस्परं च रक्षन्तः सर्वे चित्रास्त्रयोधिनः । महामायाः सुराः सर्वे यथा नैवाभिमन्यत ।

yuktaṁ kuruta bhadraṁ vo mayā nu paripālitāḥ | parasparaṁ ca rakṣantaḥ sarve citrāstrayodhinaḥ | mahāmāyāḥ surāḥ sarve yathā naivābhimanyata |

'उचित कर्म करो, तुम्हारा कल्याण हो; मेरे द्वारा रक्षित होकर, विचित्र अस्त्रों से युद्ध करने वाले तुम सब आपस में एक-दूसरे की रक्षा करते हुए ऐसा करो कि महामायावी देवगण अपने को विजयी न मान सकें।'

श्लोक 14 (skanda.8.79.14)

सनत्कुमार उवाच । ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । आडम्बरा डिण्डिमाश्च पटहाश्च महास्वनाः ।

sanatkumāra uvāca | tataḥ śaṁkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ | āḍambarā ḍiṇḍimāśca paṭahāśca mahāsvanāḥ |

सनत्कुमार ने कहा - तब शंख, नगाड़े, पणव, आनक, गोमुख वाद्य, आडम्बर, डिण्डिम तथा महाध्वनि वाले पटह वाद्य,

श्लोक 15 (skanda.8.79.15)

नानाविधानि चान्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशः । देवानां दानवानाञ्च मदसत्वप्रदानि वै ।

nānāvidhāni cānyāni prāvādyanta sahasraśaḥ | devānāṁ dānavānāñca madasatvapradāni vai |

तथा अन्य नाना प्रकार के वाद्य हजारों की संख्या में बज उठे, जो देवताओं और दानवों दोनों को उन्माद और बल प्रदान करने वाले थे।

श्लोक 16 (skanda.8.79.16)

ततः प्रमथ्नतेत्युक्ता दानवा दानवेश्वरैः । ममर्दुर्देवतानीकं प्रहताः सर्वशस्तथा ।

tataḥ pramathnatetyuktā dānavā dānaveśvaraiḥ | mamardurdevatānīkaṁ prahatāḥ sarvaśastathā |

तब दानवेश्वरों द्वारा 'कुचल डालो' ऐसा कहे जाने पर दानवों ने चारों ओर से प्रहार करते हुए देवसेना को कुचलना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 17 (skanda.8.79.17)

देवास्तेपि च संयत्तास्तपोयोगबलान्विताः । दानवान् विविधैः शस्त्रैरभिजघ्नुः कृतागसः ।

devāstepi ca saṁyattāstapoyogabalānvitāḥ | dānavān vividhaiḥ śastrairabhijaghnuḥ kṛtāgasaḥ |

तप और योग के बल से युक्त, सावधान देवगण भी उन अपराधी दानवों पर नाना प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने लगे।

श्लोक 18 (skanda.8.79.18)

असीनां पात्यमानानां शिरसां हस्तिनामपि । आसीच्छब्दो महाघोरो वंशानामिव पाट्यताम् ।

asīnāṁ pātyamānānāṁ śirasāṁ hastināmapi | āsīcchabdo mahāghoro vaṁśānāmiva pāṭyatām |

गिरती हुई तलवारों, कटे हुए सिरों तथा हाथियों का अत्यन्त भयंकर शब्द ऐसे सुनाई पड़ने लगा, मानो बाँस चीरे जा रहे हों।

श्लोक 19 (skanda.8.79.19)

विकृष्यतां च धनुषां बाणानां च विमुच्यताम् । आसीत्तत्र महाञ्छब्दो गिरीणामिव भिद्यताम् ।

vikṛṣyatāṁ ca dhanuṣāṁ bāṇānāṁ ca vimucyatām | āsīttatra mahāñchabdo girīṇāmiva bhidyatām |

खींचे जाते हुए धनुषों तथा छोड़े जाते हुए बाणों का वहाँ ऐसा महाशब्द होने लगा, मानो पर्वत फट रहे हों।

श्लोक 20 (skanda.8.79.20)

गच्छद्भिर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिस्तोमरैस्तथा । आकाशमभवत् सर्वं खद्योतैरिव संवृतम् ।

gacchadbhirbhindipālaiśca śaktibhistomaraistathā | ākāśamabhavat sarvaṁ khadyotairiva saṁvṛtam |

उड़ते हुए भिन्दिपाल, शक्ति तथा तोमर अस्त्रों से समूचा आकाश ऐसे ढक गया, मानो जुगनुओं से भरा हो।

श्लोक 21 (skanda.8.79.21)

शिरोभिश्चरणैश्चैव बाहुभिश्च निपातितैः । क्षणेन युद्धभूमिः सा विषमा समपद्यत ।

śirobhiścaraṇaiścaiva bāhubhiśca nipātitaiḥ | kṣaṇena yuddhabhūmiḥ sā viṣamā samapadyata |

कटे हुए सिरों, पैरों तथा भुजाओं के गिरने से वह युद्धभूमि क्षणभर में ऊबड़-खाबड़ हो गई।

श्लोक 22 (skanda.8.79.22)

दन्तिभिः पर्वताकारैर्हयवर्यैरथोत्तमैः । कबन्धैश्चाभिनृत्यद्भिर्दुर्निरीक्ष्यमभूद्रणे ।

dantibhiḥ parvatākārairhayavaryairathottamaiḥ | kabandhaiścābhinṛtyadbhirdurnirīkṣyamabhūdraṇe |

पर्वताकार हाथियों, उत्तम घोड़ों तथा नाचते हुए धड़ों (कबन्धों) से वह रणभूमि देखने में अत्यन्त भयंकर हो गई।

श्लोक 23 (skanda.8.79.23)

आतपत्रैश्च हारैश्च कवचैस्तलत्रैरपि । निष्कसूत्रैः सुमुकुटैः केयूरैः कुण्डलैरपि ।

ātapatraiśca hāraiśca kavacaistalatrairapi | niṣkasūtraiḥ sumukuṭaiḥ keyūraiḥ kuṇḍalairapi |

छत्रों, हारों, कवचों तथा हस्तत्राणों से, निष्क-सूत्रों, सुन्दर मुकुटों, केयूरों तथा कुण्डलों से भी,

श्लोक 24 (skanda.8.79.24)

कण्ठत्राणैर्विचित्रैश्च दुकूलैर्मणिभिश्च ह । कुथाभिश्च विचित्राभिर्भुजैः साभरणैरपि ।

kaṇṭhatrāṇairvicitraiśca dukūlairmaṇibhiśca ha | kuthābhiśca vicitrābhirbhujaiḥ sābharaṇairapi |

विचित्र कण्ठत्राणों, रेशमी वस्त्रों तथा मणियों से, विचित्र काठी-वस्त्रों तथा आभूषण-सहित कटी हुई भुजाओं से भी,

श्लोक 25 (skanda.8.79.25)

मुशलैः शूलदण्डैश्च घण्टाभिश्चांकुशैरपि । विभाति भूतलं तत्र ज्योतिर्भिर्द्यौरिवावृतम् ।

muśalaiḥ śūladaṇḍaiśca ghaṇṭābhiścāṁkuśairapi | vibhāti bhūtalaṁ tatra jyotirbhirdyaurivāvṛtam |

मूसलों, शूल-दण्डों, घण्टियों तथा अंकुशों से वह भूतल ऐसा शोभित हो रहा था, मानो तारों से आवृत आकाश हो।

श्लोक 26 (skanda.8.79.26)

क्रुद्धः केशेषु संगृह्य विरथोपि महारथः । रथिनं रथमाप्लुत्य निजघान बलाद्बली ।

kruddhaḥ keśeṣu saṁgṛhya virathopi mahārathaḥ | rathinaṁ rathamāplutya nijaghāna balādbalī |

रथहीन हो जाने पर भी एक महारथी, क्रोधित होकर, दूसरे रथी के केश पकड़कर उसके रथ पर कूद पड़ा और बलपूर्वक उसे मार डाला।

श्लोक 27 (skanda.8.79.27)

तत्र चान्यो गजे चाशु अभिहत्य महाभुजः । रथं चिक्षेप च वृतैः कुशमुष्टिमिवाध्वरे ।

tatra cānyo gaje cāśu abhihatya mahābhujaḥ | rathaṁ cikṣepa ca vṛtaiḥ kuśamuṣṭimivādhvare |

वहाँ दूसरे विशालभुजा योद्धा ने हाथी पर तुरन्त प्रहार कर उस पर सवार को रथ से ऐसे फेंक दिया, जैसे यज्ञ में कुश की मुट्ठी फेंकी जाती है।

श्लोक 28 (skanda.8.79.28)

क्षिप्तो गजात् समुत्पत्य । शरैराशीविषाकारैरनयद्यमसादनम् ।

kṣipto gajāt samutpatya | śarairāśīviṣākārairanayadyamasādanam |

हाथी से गिराया गया वह [योद्धा] उछलकर... (इस पद्य की शेष पंक्ति का कुछ अंश मूल पाण्डुलिपि में अस्पष्ट है) ...विष-सर्प के समान भयंकर बाणों से उसे यमलोक भेज दिया गया।

श्लोक 29 (skanda.8.79.29)

हतमप्येष तुरगः सादिनं पतितं क्षितौ । उपास्ते पादतः सुप्तं गुरुं शिष्यो यथात्मवान् ।

hatamapyeṣa turagaḥ sādinaṁ patitaṁ kṣitau | upāste pādataḥ suptaṁ guruṁ śiṣyo yathātmavān |

अपने मारे गये सवार के भूमि पर गिर जाने पर भी वह घोड़ा उसके चरणों में ऐसे खड़ा रहा, जैसे संयमी शिष्य सोये हुए गुरु के पास बैठा रहता है।

श्लोक 30 (skanda.8.79.30)

ससूते निहते योधे रथमेते हयोत्तमाः । वहन्ति पुरुषाः क्षीवा ज्ञानवन्त इवागमान् ।

sasūte nihate yodhe rathamete hayottamāḥ | vahanti puruṣāḥ kṣīvā jñānavanta ivāgamān |

सारथी सहित योद्धा के मारे जाने पर भी वे उत्तम घोड़े रथ को खींचते रहे, जैसे मतवाले पुरुष भी शास्त्रों को ज्ञानपूर्वक ढोते रहते हैं।

श्लोक 31 (skanda.8.79.31)

अयमन्यः सुबद्धोपि दैत्येन सुरपुंगवः । बाहुभ्यां वेष्टयित्वा तं प्रययौ देवतान्तिकम् ।

ayamanyaḥ subaddhopi daityena surapuṁgavaḥ | bāhubhyāṁ veṣṭayitvā taṁ prayayau devatāntikam |

यह एक अन्य श्रेष्ठ देवता, दैत्य द्वारा भलीभाँति बाँध दिया गया, फिर भी उसे दोनों भुजाओं में लपेटकर वह दैत्य देवताओं की ओर बढ़ा।

श्लोक 32 (skanda.8.79.32)

अयमाधावतः पश्य गजस्य भुजमाच्छिनत् । स तेनैव गजेनोर्व्यां पपात विनिषूदितः ।

ayamādhāvataḥ paśya gajasya bhujamācchinat | sa tenaiva gajenorvyāṁ papāta viniṣūditaḥ |

देखो, यह दौड़ते हुए हाथी की सूँड़ को काट डालता है; परन्तु वह भी उसी हाथी द्वारा मारा जाकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 33 (skanda.8.79.33)

अयमन्येन संयुक्त अन्येनागत्य घातितः । स चाप्यन्येन देवेन सोप्यन्येन पुनर्हतः ।

ayamanyena saṁyukta anyenāgatya ghātitaḥ | sa cāpyanyena devena sopyanyena punarhataḥ |

यह एक दूसरे से भिड़ा हुआ था, तभी किसी और ने आकर उसे मार डाला; और वह भी किसी अन्य देवता द्वारा, और वह भी फिर किसी अन्य के द्वारा मारा गया।

श्लोक 34 (skanda.8.79.34)

एते पदातयश्चान्ये बहवः संहता भृशम् । रथिनं मोहयित्वा तु जघ्नुरेनमभीतवत् ।

ete padātayaścānye bahavaḥ saṁhatā bhṛśam | rathinaṁ mohayitvā tu jaghnurenamabhītavat |

ये तथा अनेक अन्य पैदल सैनिक, दृढ़तापूर्वक एकत्र होकर, एक रथी को मोहित कर निर्भय होकर उसे मार डालते थे।

श्लोक 35 (skanda.8.79.35)

एवमाकाशगाः सिद्धा ऋषयश्चारणास्तथा । श्लाघन्ति रमन्ते च स्मयन्ति च जपन्ति च ।

evamākāśagāḥ siddhā ṛṣayaścāraṇāstathā | ślāghanti ramante ca smayanti ca japanti ca |

इस प्रकार आकाशचारी सिद्ध, ऋषि तथा चारण उस युद्ध को देखकर सराहना करते, आनन्दित होते, मुस्कुराते तथा जप करते थे।

श्लोक 36 (skanda.8.79.36)

हरन्त्यप्सरसश्चैव योधाँस्तत्र रणे हतान् । पिशाचाश्चापि मोदन्ते नृत्यन्ति च निकुम्भिलाः ।

harantyapsarasaścaiva yodhā~statra raṇe hatān | piśācāścāpi modante nṛtyanti ca nikumbhilāḥ |

अप्सराएँ वहाँ युद्ध में मारे गये योद्धाओं को हर ले जाती थीं, तथा पिशाच आनन्दित होते और निकुम्भिला-गण नृत्य करते थे।

श्लोक 37 (skanda.8.79.37)

तत् प्रवादितगान्धर्वं छिन्नभिन्नविदारितम् । युद्धगान्धर्वमभवद् भीरूणां भयवर्द्धनम् ।

tat pravāditagāndharvaṁ chinnabhinnavidāritam | yuddhagāndharvamabhavad bhīrūṇāṁ bhayavarddhanam |

वह युद्ध, कटे-फटे और छिन्न-भिन्न अंगों से बजाया गया एक विचित्र वाद्य-संगीत जैसा प्रतीत होता था, जो भीरुजनों के भय को बढ़ाने वाला था।

श्लोक 38 (skanda.8.79.38)

अन्योन्यघातक्षतसर्वदेहाः सुरासुरा वैरमनुस्मरन्तः । जघ्नुस्तदा राक्षसतुल्यरूपाः स्वाराज्यहेतोर्जयमीप्समानाः ।

anyonyaghātakṣatasarvadehāḥ surāsurā vairamanusmarantaḥ | jaghnustadā rākṣasatulyarūpāḥ svārājyahetorjayamīpsamānāḥ |

परस्पर के प्रहारों से समूचा शरीर घायल किये हुए, अपने पुराने वैर का स्मरण करते हुए, तथा अपने-अपने राज्य के लिए विजय चाहते हुए, देवता और असुर उस समय राक्षसों के समान रूप धारण कर एक-दूसरे को मारने लगे।

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80