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अम्बिका खण्ड · अध्याय 80

युद्धम्

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (skanda.8.80.1)

सनत्कुमार उवाच । तस्मिन् महति युद्धे तु वर्तमाने महाभये । दानवान् वै तदा देवा समन्तात् पर्यवारयन् ।

sanatkumāra uvāca | tasmin mahati yuddhe tu vartamāne mahābhaye | dānavān vai tadā devā samantāt paryavārayan |

सनत्कुमार ने कहा - उस महाभयंकर महायुद्ध के चलते हुए, देवताओं ने उस समय दानवों को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 2 (skanda.8.80.2)

मृत्युः कालो यमश्चैव कृतान्तः कलहस्तथा । निकृतिर्व्याधयश्चैव वैरं क्रोधश्च वीर्यवान् ।

mṛtyuḥ kālo yamaścaiva kṛtāntaḥ kalahastathā | nikṛtirvyādhayaścaiva vairaṁ krodhaśca vīryavān |

मृत्यु, काल, यम, कृतान्त, कलह, छल, रोग, वैर तथा पराक्रमी क्रोध -

श्लोक 3 (skanda.8.80.3)

नरकाश्चैव ते सर्वे यमदूताश्च सर्वशः । प्रेताश्च पितरश्चैव चत्वारो ये गणास्त्विति ।

narakāścaiva te sarve yamadūtāśca sarvaśaḥ | pretāśca pitaraścaiva catvāro ye gaṇāstviti |

तथा समस्त नरक, यम के सभी दूत, प्रेतगण एवं पितरगण - ये चार समूह भी,

श्लोक 4 (skanda.8.80.4)

वामनश्चैव यो देवाः किंकराश्च महाबलाः । एते सर्वे तदाविश्य संजघ्नुर्दानवं बलम् ।

vāmanaścaiva yo devāḥ kiṁkarāśca mahābalāḥ | ete sarve tadāviśya saṁjaghnurdānavaṁ balam |

तथा जो वामन देवता और महाबली किंकरगण थे - ये सब उस समय प्रविष्ट होकर दानव-सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 5 (skanda.8.80.5)

यमदूतैर्विभिन्नांगा भग्नवक्षत्रिकोरसः । निष्टनन्ति क्षितौ दैत्या निरयेष्विव पापिनः ।

yamadūtairvibhinnāṁgā bhagnavakṣatrikorasaḥ | niṣṭananti kṣitau daityā nirayeṣviva pāpinaḥ |

यमदूतों द्वारा अंग-भंग किये गये, वक्षस्थल और पसलियाँ टूटी हुई दैत्य भूमि पर ऐसे कराह रहे थे, जैसे नरक में पापी।

श्लोक 6 (skanda.8.80.6)

असिचर्मविनिष्पिष्टा मृत्युपाशोवपाशिताः । कृतान्तवशगास्सर्वे संभज्यन्ति दितेः सुताः ।

asicarmaviniṣpiṣṭā mṛtyupāśovapāśitāḥ | kṛtāntavaśagāssarve saṁbhajyanti diteḥ sutāḥ |

तलवार और ढाल से कुचले गये, मृत्यु के पाश में बँधे हुए, कृतान्त के अधीन हो गये दिति के सभी पुत्र छिन्न-भिन्न हो रहे थे।

श्लोक 7 (skanda.8.80.7)

ते हन्यमाना दैत्येन्द्रा मृत्युना च यमेन च । त्रातारमलभन्तो वै तत्र तत्रैव बभ्रमुः ।

te hanyamānā daityendrā mṛtyunā ca yamena ca | trātāramalabhanto vai tatra tatraiva babhramuḥ |

मृत्यु और यम के द्वारा मारे जाते हुए वे दैत्येन्द्र, कोई रक्षक न पाकर, वहीं-वहीं इधर-उधर भटकते रहे।

श्लोक 8 (skanda.8.80.8)

तथा तांस्तत्र तत्रैव भ्रमन्तो जघ्नुरार्दिताः । ततो हाहाकृतः शब्दो दानवानां बलेभवत् ।

tathā tāṁstatra tatraiva bhramanto jaghnurārditāḥ | tato hāhākṛtaḥ śabdo dānavānāṁ balebhavat |

इस प्रकार इधर-उधर भटकते हुए उन पीड़ित दैत्यों को वे बार-बार मारते रहे; तब दानव-सेना में हाहाकार की ध्वनि उठ खड़ी हुई।

श्लोक 9 (skanda.8.80.9)

साधुसाध्विति देवानां यशं पूजयतामभूत् । अथ प्रह्रादतनयो विरोचन इति श्रुतः ।

sādhusādhviti devānāṁ yaśaṁ pūjayatāmabhūt | atha prahrādatanayo virocana iti śrutaḥ |

देवताओं के यश की प्रशंसा करने वालों में 'साधु-साधु' की ध्वनि उठी। तब प्रह्लाद का पुत्र, विरोचन नामक प्रसिद्ध दैत्य,

श्लोक 10 (skanda.8.80.10)

स गजेन ततोभ्येत्य देवानां बलमार्दयत् । सह तेन महामायो गजेन समधावत ।

sa gajena tatobhyetya devānāṁ balamārdayat | saha tena mahāmāyo gajena samadhāvata |

हाथी पर सवार होकर आया और देवताओं की सेना को रौंदने लगा; वह महामायावी उसी हाथी के साथ तेजी से दौड़ पड़ा।

श्लोक 11 (skanda.8.80.11)

यमं प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणमेघ इवापरः । स शरैर्बहुभिस्तीक्ष्णैरकुण्ठाग्रैरयोमयैः ।

yamaṁ pradakṣiṇaṁ kṛtvā droṇamegha ivāparaḥ | sa śarairbahubhistīkṣṇairakuṇṭhāgrairayomayaiḥ |

यम की प्रदक्षिणा करके, मानो दूसरा घनघोर मेघ हो, उसने अनेक तीक्ष्ण, अकुण्ठाग्र, लौह-निर्मित बाणों से,

श्लोक 12 (skanda.8.80.12)

वरुणञ्च धनेशञ्च वायुञ्चैवाभ्यवर्षत । स संछाद्य तदा भासं भास्करस्य शितैः शरैः । अवाकिरत्तदा देवान् संवर्त्तक इवाम्बुदः ।

varuṇañca dhaneśañca vāyuñcaivābhyavarṣata | sa saṁchādya tadā bhāsaṁ bhāskarasya śitaiḥ śaraiḥ | avākirattadā devān saṁvarttaka ivāmbudaḥ |

वरुण, कुबेर तथा वायु पर बाणों की वर्षा की; और अपने तीक्ष्ण बाणों से सूर्य की प्रभा को ढककर, वह प्रलयकालीन मेघ के समान देवताओं पर बाणों की वर्षा करने लगा।

श्लोक 13 (skanda.8.80.13)

ते शरार्चितसर्वाङ्गा वध्यमानाः पुनः पुनः । क्षणेन समपद्यन्त देवाः सर्वे विचेतसः ।

te śarārcitasarvāṅgā vadhyamānāḥ punaḥ punaḥ | kṣaṇena samapadyanta devāḥ sarve vicetasaḥ |

बाणों से समूचे अंग बिंधे हुए, बार-बार आहत होते हुए, सभी देवता क्षणभर में मूर्च्छित से हो गये।

श्लोक 14 (skanda.8.80.14)

यान्तमायान्तमप्राप्तं प्राप्तं दूरस्थमेव च । यं यतो वीक्षते दैत्यस्तं ततोभिजघान सः ।

yāntamāyāntamaprāptaṁ prāptaṁ dūrasthameva ca | yaṁ yato vīkṣate daityastaṁ tatobhijaghāna saḥ |

जाते हुए को, आते हुए को, दूर स्थित को अथवा निकट पहुँचे हुए को - वह दैत्य जिस देवता को जहाँ भी देखता, वहीं से उसे मार बैठता।

श्लोक 15 (skanda.8.80.15)

नित्यायतधनुर्देत्यः परिवेषीव भास्करः । दुर्निरीक्ष्यः समभवद् युगान्ताग्निरिवोत्थितः ।

nityāyatadhanurdetyaḥ pariveṣīva bhāskaraḥ | durnirīkṣyaḥ samabhavad yugāntāgnirivotthitaḥ |

सदा तना हुआ धनुष लिये वह दैत्य, मानो मण्डलयुक्त सूर्य हो, प्रलयकालीन अग्नि के समान उठकर देखने में असह्य हो गया।

श्लोक 16 (skanda.8.80.16)

अथैवमस्यतो व्यास वरुणः कार्मुकं तदा । चिच्छेद सुमहद्धीमाँस्तर्जयन्दानवेश्वरम् ।

athaivamasyato vyāsa varuṇaḥ kārmukaṁ tadā | ciccheda sumahaddhīmā~starjayandānaveśvaram |

हे व्यास! इस प्रकार बाण चलाते हुए उसके उस विशाल धनुष को बुद्धिमान वरुण ने उस दानवेश्वर को धिक्कारते हुए काट डाला।

श्लोक 17 (skanda.8.80.17)

वायुस्तीक्ष्णशरैस्तस्य कवचं सर्वतोहरत् । धनेशोशनिघातेन गजमस्य न्यसूदयत् ।

vāyustīkṣṇaśaraistasya kavacaṁ sarvatoharat | dhaneśośanighātena gajamasya nyasūdayat |

वायु ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसका कवच सब ओर से उतार दिया, तथा कुबेर ने वज्र के प्रहार से उसके हाथी को मार डाला।

श्लोक 18 (skanda.8.80.18)

तं तथा निकृतं दृष्टवा बलिर्बाणश्च तावुभौ । प्रह्लादो भ्रातृभिः सार्ध लोकपालानुपाद्रवन् ।

taṁ tathā nikṛtaṁ dṛṣṭavā balirbāṇaśca tāvubhau | prahlādo bhrātṛbhiḥ sārdha lokapālānupādravan |

उसे इस प्रकार पराजित देखकर बलि और बाण दोनों, तथा प्रह्लाद भी अपने भाइयों सहित लोकपालों पर टूट पड़े।

श्लोक 19 (skanda.8.80.19)

तेषामापततामेव लोकपाला महाबलाः । शरैराशीविषाकारैश्चक्ररक्षानपोथयन् ।

teṣāmāpatatāmeva lokapālā mahābalāḥ | śarairāśīviṣākāraiścakrarakṣānapothayan |

उनके आक्रमण करते ही महाबली लोकपालों ने विष-सर्प के समान बाणों से उनके रथ-रक्षकों को कुचल डाला।

श्लोक 20 (skanda.8.80.20)

वायुर्बाणस्य विशिखैः कार्मुकाणि विकर्षतः । चिच्छेद युगपद् व्यास तदद्भुतमिवाभवत् ।

vāyurbāṇasya viśikhaiḥ kārmukāṇi vikarṣataḥ | ciccheda yugapad vyāsa tadadbhutamivābhavat |

हे व्यास! वायु ने अपने बाणों से, धनुष खींचते हुए बाण के धनुषों को एक साथ काट डाला - यह मानो एक अद्भुत बात हुई।

श्लोक 21 (skanda.8.80.21)

विच्छिन्नधन्वा स क्रुद्धस्तोमराणि तदासृजत् । चिक्षेप तानि वेगेन वायुरन्यां दिशं पुनः ।

vicchinnadhanvā sa kruddhastomarāṇi tadāsṛjat | cikṣepa tāni vegena vāyuranyāṁ diśaṁ punaḥ |

धनुष कट जाने पर क्रोधित होकर उसने तोमर अस्त्र चलाये; वायु ने उन्हें वेगपूर्वक फिर दूसरी दिशा में फेंक दिया।

श्लोक 22 (skanda.8.80.22)

हयाँश्च पुनरेवास्य शरैः सन्नतपर्वभिः । ससूतान् परमायस्तो ह्यनयद्यमसादनम् ।

hayā~śca punarevāsya śaraiḥ sannataparvabhiḥ | sasūtān paramāyasto hyanayadyamasādanam |

फिर अत्यन्त श्रमित हुए उस वायु ने सीधे पोरों वाले बाणों से उसके घोड़ों को सारथी सहित यमलोक भेज दिया।

श्लोक 23 (skanda.8.80.23)

स रथाद्बलिजः क्रोधादवप्लुत्य महाबलः । गदां गृहीत्वा वेगेन श्वसनं समुपाद्रवत् ।

sa rathādbalijaḥ krodhādavaplutya mahābalaḥ | gadāṁ gṛhītvā vegena śvasanaṁ samupādravat |

तब बलि का वह महाबली पुत्र (बाण) क्रोधवश रथ से कूदकर, गदा लेकर वेगपूर्वक वायु पर झपटा।

श्लोक 24 (skanda.8.80.24)

तस्यापतत एवाशु सगदस्यानिलस्तथा । शरैराशीविषाकारैर्गदां तां समकृन्तत ।

tasyāpatata evāśu sagadasyānilastathā | śarairāśīviṣākārairgadāṁ tāṁ samakṛntata |

गदा सहित तुरन्त झपटते हुए उस पर वायु ने विष-सर्प के समान बाणों से उस गदा को टुकड़े-टुकड़े कर डाला।

श्लोक 25 (skanda.8.80.25)

स निकृत्तगदश्चापि बाणः प्रहरतां वरः । प्रगृह्य तु गदामन्यां चिक्षेप च जहास च ।

sa nikṛttagadaścāpi bāṇaḥ praharatāṁ varaḥ | pragṛhya tu gadāmanyāṁ cikṣepa ca jahāsa ca |

गदा कट जाने पर भी प्रहारकों में श्रेष्ठ बाण ने दूसरी गदा उठाकर फेंकी और हँस पड़ा।

श्लोक 26 (skanda.8.80.26)

तामापतन्तीं वेगेन गदां बाणस्य खेचरीम् । आक्षिप्य वायुर्व्यधमदन्यां दिशमदीनवत् ।

tāmāpatantīṁ vegena gadāṁ bāṇasya khecarīm | ākṣipya vāyurvyadhamadanyāṁ diśamadīnavat |

बाण की उस आकाश में उड़ती हुई वेगवान गदा को वायु ने बिना घबराये पकड़कर दूसरी दिशा में फेंक दिया।

श्लोक 27 (skanda.8.80.27)

विरथं तमथालक्ष्य वायुना च भृशार्द्दितम् । पुत्रं बलिर्द्रुतं व्यास स्वरथे समपादयत् ।

virathaṁ tamathālakṣya vāyunā ca bhṛśārdditam | putraṁ balirdrutaṁ vyāsa svarathe samapādayat |

हे व्यास! अपने पुत्र को रथहीन तथा वायु द्वारा अत्यन्त पीड़ित देखकर बलि ने शीघ्रता से उसे अपने रथ पर बिठा लिया।

श्लोक 28 (skanda.8.80.28)

तावेकरथसंयत्तौ बभूतुर्दानवेश्वरौ । सूर्याचन्द्रमसौ यद्वत् पूर्णमास्यां समागतौ ।

tāvekarathasaṁyattau babhūturdānaveśvarau | sūryācandramasau yadvat pūrṇamāsyāṁ samāgatau |

एक ही रथ पर आरूढ़ हुए वे दोनों दानवेश्वर ऐसे शोभित हुए, जैसे पूर्णिमा के दिन सूर्य और चन्द्रमा एक साथ मिले हों।

श्लोक 29 (skanda.8.80.29)

अथ तेषाञ्च तेषाञ्च तद्युद्धमभवत्तदा । तान्निरुद्धानथाज्ञाय लोकपालैर्महाबलैः ।

atha teṣāñca teṣāñca tadyuddhamabhavattadā | tānniruddhānathājñāya lokapālairmahābalaiḥ |

तब उनके और दूसरों के बीच वह युद्ध चलता रहा... (इस श्लोक की मध्यवर्ती पंक्ति मूल पाण्डुलिपि में सर्वथा नष्ट है) ...और तब उन्हें रुका हुआ जानकर, महाबली लोकपालों द्वारा,

श्लोक 30 (skanda.8.80.30)

निवातकवचाः सर्वे कालकेयाश्च दंशिताः । पौलोमाः सैंहिकेयाश्च शम्बरः कालशम्बरः ।

nivātakavacāḥ sarve kālakeyāśca daṁśitāḥ | paulomāḥ saiṁhikeyāśca śambaraḥ kālaśambaraḥ |

सभी निवातकवच तथा कवचधारी कालकेय, पौलोम, सिंहिका के पुत्र, शम्बर तथा कालशम्बर,

श्लोक 31 (skanda.8.80.31)

अन्धकश्च महादैत्यो हिरण्याक्षश्च विश्रुतः । सर्वे व्यूहममुञ्चन्तो दानवा युद्धलालसाः ।

andhakaśca mahādaityo hiraṇyākṣaśca viśrutaḥ | sarve vyūhamamuñcanto dānavā yuddhalālasāḥ |

महादैत्य अन्धक तथा प्रसिद्ध हिरण्याक्ष - युद्ध के लिए लालायित वे सभी दानव अपने व्यूह को छोड़कर,

श्लोक 32 (skanda.8.80.32)

चक्रुर्वेगं महावेगाः समेघा इव सानवः । तानापतत एवाथ यमो दण्डेन वीर्यवान् ।

cakrurvegaṁ mahāvegāḥ sameghā iva sānavaḥ | tānāpatata evātha yamo daṇḍena vīryavān |

अत्यन्त वेगपूर्वक ऐसे झपटे, जैसे मेघों से घिरे पर्वत-शिखर; तब उन आक्रमण करते हुए दानवों को पराक्रमी यम ने अपने दण्ड से,

श्लोक 33 (skanda.8.80.33)

अवारयत ते तस्थुश्चित्रपट्ट इवार्पिताः । तान् यमस्य भयाद् दैत्यान् दृष्ट्वा सर्वानवस्थितान् ।

avārayata te tasthuścitrapaṭṭa ivārpitāḥ | tān yamasya bhayād daityān dṛṣṭvā sarvānavasthitān |

रोक दिया; वे सब ऐसे स्थिर खड़े रह गये, मानो चित्रपट पर अंकित हों। यम के भय से रुके हुए उन सभी दैत्यों को देखकर,

श्लोक 34 (skanda.8.80.34)

अन्धको यममभ्येत्य तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । महता स रथेनैत्य धनुर्विस्फाल्य चासकृत् ।

andhako yamamabhyetya tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | mahatā sa rathenaitya dhanurvisphālya cāsakṛt |

अन्धक यम के पास जाकर बोला - 'ठहरो, ठहरो!' विशाल रथ पर सवार होकर आते हुए उसने बार-बार धनुष टंकारा,

श्लोक 35 (skanda.8.80.35)

यमं ललाटे दशभिर्बाणैर्विव्याध वीर्यवान् । पञ्चभिर्महिषं चास्य षड्भिः कालं तथाग्रतः ।

yamaṁ lalāṭe daśabhirbāṇairvivyādha vīryavān | pañcabhirmahiṣaṁ cāsya ṣaḍbhiḥ kālaṁ tathāgrataḥ |

उस पराक्रमी ने यम को दस बाणों से ललाट में बींध दिया, पाँच बाणों से उसके भैंसे को, तथा छः बाणों से आगे खड़े काल को भी,

श्लोक 36 (skanda.8.80.36)

मृत्युञ्च दशभिश्चैव कृतान्तं चैव सप्तभिः । भ्रामयन् स पुनश्चापमिन्द्रायुधसमप्रभम् ।

mṛtyuñca daśabhiścaiva kṛtāntaṁ caiva saptabhiḥ | bhrāmayan sa punaścāpamindrāyudhasamaprabham |

मृत्यु को दस बाणों से, तथा कृतान्त को सात बाणों से बींध डाला; फिर इन्द्रधनुष के समान कान्तिमान अपने धनुष को घुमाते हुए,

श्लोक 37 (skanda.8.80.37)

ननादाम्बुदवच्चैव पुनर्विव्याध दैवतम् । हिरण्याक्षसुतो ज्येष्ठो ह्यन्धकोहं महाबलः ।

nanādāmbudavaccaiva punarvivyādha daivatam | hiraṇyākṣasuto jyeṣṭho hyandhakohaṁ mahābalaḥ |

वह मेघ के समान गरजा और फिर से उस देवता को बींध डाला - 'मैं हिरण्याक्ष का ज्येष्ठ पुत्र, महाबली अन्धक हूँ,'

श्लोक 38 (skanda.8.80.38)

ब्रह्मणा च वरो दत्तो मह्यमित्यवघोषयन् । तस्यैवं वदतस्तूर्णं सूर्यपुत्रः प्रतापवान् ।

brahmaṇā ca varo datto mahyamityavaghoṣayan | tasyaivaṁ vadatastūrṇaṁ sūryaputraḥ pratāpavān |

'और मुझे ब्रह्मा द्वारा वर प्रदान किया गया है' - ऐसा उद्घोष करते हुए उसने कहा। उसके इस प्रकार कहते ही, प्रतापी सूर्यपुत्र यम ने तुरन्त,

श्लोक 39 (skanda.8.80.39)

रथं चिच्छेद संक्रुद्धो दण्डेन विनिपातयन् । सकार्मुके रथे तत्र मथिते ह्यन्धकस्तदा ।

rathaṁ ciccheda saṁkruddho daṇḍena vinipātayan | sakārmuke rathe tatra mathite hyandhakastadā |

अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने दण्ड से उसके रथ को गिराकर तोड़ डाला। धनुष सहित उस रथ के वहीं चूर-चूर हो जाने पर अन्धक ने,

श्लोक 40 (skanda.8.80.40)

गदामुद्यम्य वेगेन प्रेताधिपमथाद्रवत् । तस्य तां दण्डघातेन गदां सोप्यवचूर्णयत् ।

gadāmudyamya vegena pretādhipamathādravat | tasya tāṁ daṇḍaghātena gadāṁ sopyavacūrṇayat |

गदा उठाकर वेगपूर्वक प्रेताधिपति यम पर झपटा; परन्तु यम ने भी अपने दण्ड के प्रहार से उसकी उस गदा को चूर-चूर कर डाला।

श्लोक 41 (skanda.8.80.41)

शिरस्येनं पुनः क्रुद्धो दण्डेन समताडयत् ।

śirasyenaṁ punaḥ kruddho daṇḍena samatāḍayat |

फिर से क्रोधित होकर यम ने उसे सिर पर दण्ड से प्रहार किया... (इस श्लोक की शेष पंक्ति मूल पाण्डुलिपि में सुरक्षित नहीं है)।

श्लोक 42 (skanda.8.80.42)

जितेन्द्रियो मुनिर्यद्वत् स्पृष्टो विषयगोचरैः । अथाप्रतिहतं दण्डमन्धकेन पराहतम् ।

jitendriyo muniryadvat spṛṣṭo viṣayagocaraiḥ | athāpratihataṁ daṇḍamandhakena parāhatam |

जैसे जितेन्द्रिय मुनि विषयों के स्पर्श से भी अविचलित रहता है, वैसे ही अन्धक भी अविचल रहा। तब यम के उस अप्रतिहत दण्ड को अन्धक ने भी प्रत्याघात से रोक दिया।

श्लोक 43 (skanda.8.80.43)

पुरः प्रतिहतं दृष्ट्वा जहसुर्दानवेश्वराः । सिंहनादान् सवादित्रान् बाहुशब्दाँश्च सुस्वरान् ।

puraḥ pratihataṁ dṛṣṭvā jahasurdānaveśvarāḥ | siṁhanādān savāditrān bāhuśabdā~śca susvarān |

उस दण्ड को इस प्रकार आगे ही रोका हुआ देखकर दानवेश्वर हँस पड़े, तथा वाद्यों सहित सिंहनाद और भुजाओं की मधुर थपथपाहट करने लगे।

श्लोक 44 (skanda.8.80.44)

चक्रुः साध्वन्धकेत्येवं चुक्रुशुश्च मुहुर्मुहुः । अन्धकोपि तदाभ्येत्य नर्दमानो यथार्णवः ।

cakruḥ sādhvandhaketyevaṁ cukruśuśca muhurmuhuḥ | andhakopi tadābhyetya nardamāno yathārṇavaḥ |

वे बार-बार 'साधु अन्धक, साधु!' पुकार उठे। अन्धक भी उस समय समुद्र के समान गरजता हुआ आगे बढ़ा,

श्लोक 45 (skanda.8.80.45)

तलेनाहत्य महिषाद्यमं भूमौ न्यपातयत् । ततो हाहाकृतं देवैर्गृह्णगृह्णेति दानवैः ।

talenāhatya mahiṣādyamaṁ bhūmau nyapātayat | tato hāhākṛtaṁ devairgṛhṇagṛhṇeti dānavaiḥ |

और भैंसे पर से हथेली के प्रहार से यम को भूमि पर गिरा दिया। तब देवताओं में हाहाकार उठा, और दानवों में 'पकड़ो, पकड़ो' का घोष हुआ।

श्लोक 46 (skanda.8.80.46)

व्यूहभंगश्च देवानामभवच्छक्तिनन्दन । अथ मृत्युश्च कालश्च कृतान्तश्चेति ते त्रयः ।

vyūhabhaṁgaśca devānāmabhavacchaktinandana | atha mṛtyuśca kālaśca kṛtāntaśceti te trayaḥ |

हे शक्तिनन्दन! देवताओं का व्यूह भंग हो गया। तब मृत्यु, काल तथा कृतान्त - ये तीनों,

श्लोक 47 (skanda.8.80.47)

अन्धकं बहुभिः पाशैर्बबन्धुः क्रोधमूर्च्छिताः । पाशाँश्चैव स दैत्येन्द्रो विच्छिद्य सुमहाबलः । बाहुपाशेन बलवान्कृतान्तमवबध्नत ।

andhakaṁ bahubhiḥ pāśairbabandhuḥ krodhamūrcchitāḥ | pāśā~ścaiva sa daityendro vicchidya sumahābalaḥ | bāhupāśena balavānkṛtāntamavabadhnata |

क्रोध से व्याकुल होकर अनेक पाशों से अन्धक को बाँध दिया; किन्तु उस महाबली दैत्येन्द्र ने उन पाशों को काटकर, अपनी बलशाली भुजा के पाश से कृतान्त को ही बाँध लिया।

श्लोक 48 (skanda.8.80.48)

स बद्धो बाहुपाशेन कृतान्तः क्रोधमूर्छितः । उत्क्षिप्यान्धकमुद्धूतो निनाय बलवान् बलात् ।

sa baddho bāhupāśena kṛtāntaḥ krodhamūrchitaḥ | utkṣipyāndhakamuddhūto nināya balavān balāt |

भुजा के पाश से बँधा हुआ, क्रोध से व्याकुल कृतान्त, अन्धक को उठाकर, उछालकर, बलपूर्वक बलशाली होकर ले चला।

श्लोक 49 (skanda.8.80.49)

तं नीयमानं संप्रेक्ष्य हिरण्याक्षः सुतं स्वकम् । जघान सायकैस्तीक्ष्णैः कृतान्तं सुभृशं दृढम् ।

taṁ nīyamānaṁ saṁprekṣya hiraṇyākṣaḥ sutaṁ svakam | jaghāna sāyakaistīkṣṇaiḥ kṛtāntaṁ subhṛśaṁ dṛḍham |

अपने पुत्र को इस प्रकार ले जाया जाता देखकर हिरण्याक्ष ने तीक्ष्ण बाणों से कृतान्त को अत्यन्त दृढ़तापूर्वक आहत किया।

श्लोक 50 (skanda.8.80.50)

तस्य गात्राणि सर्वाणि सन्धीँश्चैव महाबलः । विव्याध निशितैर्बाणैः स विष्टब्धो व्यतिष्ठत ।

tasya gātrāṇi sarvāṇi sandhī~ścaiva mahābalaḥ | vivyādha niśitairbāṇaiḥ sa viṣṭabdho vyatiṣṭhata |

उस महाबली ने अपने तीक्ष्ण बाणों से कृतान्त के समस्त अंगों तथा जोड़ों को बींध डाला, जिससे वह जकड़ा हुआ स्थिर खड़ा रह गया।

श्लोक 51 (skanda.8.80.51)

तं बाणैर्विवृतं दृष्ट्वा देवाः सर्वे सवासवाः । रक्षन्तः समपद्यन्त भीमोद्यतकरायुधाः ।

taṁ bāṇairvivṛtaṁ dṛṣṭvā devāḥ sarve savāsavāḥ | rakṣantaḥ samapadyanta bhīmodyatakarāyudhāḥ |

उसे बाणों से इस प्रकार बिंधा हुआ देखकर, इन्द्र सहित सभी देवता भयंकर आयुध हाथों में उठाकर उसकी रक्षा के लिए दौड़ पड़े।

श्लोक 52 (skanda.8.80.52)

अथ किंखर मृदंगवेणुवीणापणवसुघोषकडिण्डिमानकानाम् । असुरसुरबले महान् तदानीं समभवदुग्रतरः स तूर्यनादः ।

atha kiṁkhara mṛdaṁgaveṇuvīṇāpaṇavasughoṣakaḍiṇḍimānakānām | asurasurabale mahān tadānīṁ samabhavadugrataraḥ sa tūryanādaḥ |

फिर किंखर, मृदंग, वेणु, वीणा, पणव, सुघोषक, डिण्डिम तथा आनक वाद्यों का वह महान एवं अत्यन्त उग्र तूर्यनाद उस समय असुर और सुर दोनों सेनाओं में गूँज उठा।

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