Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 81

युद्धम्

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82

श्लोक 1 (skanda.8.81.1)

सनत्कुमार उवाच । हिरण्याक्षस्तदायान्तं दृष्ट्वा देवेन्द्रमग्रतः । उवाच रथयन्तारमिन्द्रं प्रति नयस्व माम् ।

sanatkumāra uvāca | hiraṇyākṣastadāyāntaṁ dṛṣṭvā devendramagrataḥ | uvāca rathayantāramindraṁ prati nayasva mām |

सनत्कुमार ने कहा - तब हिरण्याक्ष ने अपने सामने आते हुए देवेन्द्र को देखकर अपने सारथी से कहा - 'मुझे इन्द्र की ओर ले चलो।'

श्लोक 2 (skanda.8.81.2)

स तेन चोदितस्तस्य चोदयानस्तदा हयान् । अनयत्तं सुरेन्द्राय हुतं भागं यथानलः ।

sa tena coditastasya codayānastadā hayān | anayattaṁ surendrāya hutaṁ bhāgaṁ yathānalaḥ |

उसके द्वारा प्रेरित होकर सारथी ने घोड़ों को हाँका और उसे देवेन्द्र के पास इस प्रकार ले गया, जैसे अग्नि हवन किये गये भाग को ले जाती है।

श्लोक 3 (skanda.8.81.3)

स गजस्कन्धगं देवं सहस्राक्षं सुरेश्वरम् । शरपाते तदा स्थित्वा प्रोवाचासुरपुंगवः ।

sa gajaskandhagaṁ devaṁ sahasrākṣaṁ sureśvaram | śarapāte tadā sthitvā provācāsurapuṁgavaḥ |

हाथी के कन्धे पर बैठे हुए सहस्राक्ष देवेश्वर इन्द्र से बाण-पहुँच की दूरी पर खड़े होकर वह असुरश्रेष्ठ बोला -

श्लोक 4 (skanda.8.81.4)

शक्र यत्ते बलं किञ्चित् तद्विदर्शय मा चिरम् । पूर्वदेवा वयं चैव त्रैलोक्यं चाखिलं हि नः ।

śakra yatte balaṁ kiñcit tadvidarśaya mā ciram | pūrvadevā vayaṁ caiva trailokyaṁ cākhilaṁ hi naḥ |

'हे इन्द्र! तुझमें जो भी बल हो, उसे बिना विलम्ब के दिखा। हम प्राचीन देवता हैं, और समस्त त्रिलोक हमारा ही है,'

श्लोक 5 (skanda.8.81.5)

ज्येष्ठक्रमागतं कृत्वा न्यायेन च सुरोत्तम । ते यूयं न्यायमुत्सृज्य हत्वा मे भ्रातरं पुनः ।

jyeṣṭhakramāgataṁ kṛtvā nyāyena ca surottama | te yūyaṁ nyāyamutsṛjya hatvā me bhrātaraṁ punaḥ |

'हे सुरश्रेष्ठ! जो हमें ज्येष्ठता के क्रम से तथा न्यायपूर्वक प्राप्त हुआ है। किन्तु तुम लोगों ने न्याय त्यागकर, मेरे भाई को पुनः मारकर,'

श्लोक 6 (skanda.8.81.6)

विश्रम्भेण शठा भूत्वा पश्चाद् देवत्वमागताः । इमे वयं पूर्वदेवा न वा यूयञ्च देवताः ।

viśrambheṇa śaṭhā bhūtvā paścād devatvamāgatāḥ | ime vayaṁ pūrvadevā na vā yūyañca devatāḥ |

'विश्वासघात करके छल से बाद में देवत्व प्राप्त किया है। असली देवता तो हम ही हैं, तुम देवता नहीं हो।'

श्लोक 7 (skanda.8.81.7)

युध्यतां वोद्य सर्वेषां जीवितानि हराम्यहम् । सहानुगैस्त्वामिहाद्य हत्वा कृत्वा बलिं तथा ।

yudhyatāṁ vodya sarveṣāṁ jīvitāni harāmyaham | sahānugaistvāmihādya hatvā kṛtvā baliṁ tathā |

'आज युद्ध करते हुए तुम सबके प्राण मैं हर लूँगा; तुम्हें आज यहाँ तुम्हारे अनुचरों सहित मारकर तथा तुम्हारी बलि देकर,'

श्लोक 8 (skanda.8.81.8)

भविष्याम्यनृणो भ्रातुर्यस्त्वया मायया हतः । स एवमुक्त्वा बलवद्धनुराकृष्य वीर्यवान् । ललाटे पञ्चभिर्व्यास विव्याध निशितैः शरैः ।

bhaviṣyāmyanṛṇo bhrāturyastvayā māyayā hataḥ | sa evamuktvā balavaddhanurākṛṣya vīryavān | lalāṭe pañcabhirvyāsa vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ |

'मैं अपने उस भाई के प्रति ऋणमुक्त हो जाऊँगा, जिसे तुमने माया से मारा था।' ऐसा कहकर उस पराक्रमी ने बलपूर्वक धनुष खींचकर, हे व्यास! तीक्ष्ण बाणों से इन्द्र के ललाट को पाँच बाणों से बींध दिया।

श्लोक 9 (skanda.8.81.9)

स विद्धस्तेन देवानां ललाटे पञ्चभिः शरैः । राजा बभौ यथा मेरुः सूर्यपादैः समावृतः ।

sa viddhastena devānāṁ lalāṭe pañcabhiḥ śaraiḥ | rājā babhau yathā meruḥ sūryapādaiḥ samāvṛtaḥ |

उसके द्वारा ललाट में पाँच बाणों से बिंधा हुआ देवराज इन्द्र ऐसे सुशोभित हो रहा था, जैसे सूर्य की किरणों से आवृत मेरु पर्वत।

श्लोक 10 (skanda.8.81.10)

अथ तस्य तदा शक्रः पुनश्चङ्क्रमतो धनुः । चिच्छेद वज्रमादाय पुनश्चैनमताडयत् ।

atha tasya tadā śakraḥ punaścaṅkramato dhanuḥ | ciccheda vajramādāya punaścainamatāḍayat |

तब इन्द्र ने वज्र उठाकर, पुनः धनुष चढ़ाते हुए उस असुर के धनुष को काट दिया, और फिर से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 11 (skanda.8.81.11)

स तेन सुप्रहारेण दिशो दीप्ता ह्यपश्यतः । अन्यच्च धनुरादाय पुनरेव व्यकर्षत ।

sa tena suprahāreṇa diśo dīptā hyapaśyataḥ | anyacca dhanurādāya punareva vyakarṣata |

उस भारी प्रहार से, दिशाओं को चमकता हुआ न देख पाने पर भी, उसने दूसरा धनुष लेकर पुनः उसे खींचा।

श्लोक 12 (skanda.8.81.12)

तदप्यस्याच्छिनद्राजा तथान्यद् भूय एव च । अथ शक्तिं समादाय चिक्षेप रुषितस्तदा ।

tadapyasyācchinadrājā tathānyad bhūya eva ca | atha śaktiṁ samādāya cikṣepa ruṣitastadā |

उस धनुष को भी राजा इन्द्र ने काट डाला, और फिर एक और को भी। तब क्रोधित होकर उसने शक्ति (भाला) उठाकर फेंकी।

श्लोक 13 (skanda.8.81.13)

तामापतन्तीं दीप्तास्यामुग्रां मृत्योरिव स्वसाम् । वज्रेण राजा चिच्छेद तदद्भुतमिवाभवत् ।

tāmāpatantīṁ dīptāsyāmugrāṁ mṛtyoriva svasām | vajreṇa rājā ciccheda tadadbhutamivābhavat |

प्रज्वलित मुख वाली, मृत्यु की बहिन के समान भयंकर उस उड़ती हुई शक्ति को राजा इन्द्र ने वज्र से काट डाला - यह मानो अद्भुत बात हुई।

श्लोक 14 (skanda.8.81.14)

गदामन्यां समुद्यम्य हिरण्याक्षस्तदा शुभाम् । अभिदुद्राव वेगेन क्रुद्धः सिंह इव द्विपम् ।

gadāmanyāṁ samudyamya hiraṇyākṣastadā śubhām | abhidudrāva vegena kruddhaḥ siṁha iva dvipam |

तब हिरण्याक्ष एक और सुन्दर गदा उठाकर, क्रुद्ध सिंह के हाथी पर झपटने के समान, वेगपूर्वक झपटा।

श्लोक 15 (skanda.8.81.15)

तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम् । चिच्छेद बहुधा राजा धर्मार्थाविव नास्तिकः ।

tasyāpatata evāśu gadāṁ hemapariṣkṛtām | ciccheda bahudhā rājā dharmārthāviva nāstikaḥ |

उसके झपटते ही राजा इन्द्र ने उस सुवर्णजड़ित गदा को कई टुकड़ों में काट डाला, जैसे नास्तिक धर्म और अर्थ के मेल को खण्डित कर देता है।

श्लोक 16 (skanda.8.81.16)

अथैनं विप्रचित्तिश्च शिनिर्बाष्कलिरेव च । मयश्च सम्बरश्चैव असिलोमा च दानवः ।

athainaṁ vipracittiśca śinirbāṣkalireva ca | mayaśca sambaraścaiva asilomā ca dānavaḥ |

तब विप्रचित्ति, शिनि, वाष्कलि, मय, सम्बर तथा दानव असिलोमा,

श्लोक 17 (skanda.8.81.17)

तारश्च कारकश्चैव तथेन्द्रदमनः स च । कालनेमिश्च षण्डश्च विपाकः पाक एव च ।

tāraśca kārakaścaiva tathendradamanaḥ sa ca | kālanemiśca ṣaṇḍaśca vipākaḥ pāka eva ca |

तार, कारक, इन्द्रदमन, कालनेमि, षण्ड, तथा विपाक और पाक भी,

श्लोक 18 (skanda.8.81.18)

इल्वलो नमुचिश्चैव वातापी कालमुंजिकः । एते सर्वे महामाया देवेन्द्रमभिदुद्रुवुः ।

ilvalo namuciścaiva vātāpī kālamuṁjikaḥ | ete sarve mahāmāyā devendramabhidudruvuḥ |

इल्वल, नमुचि, वातापि तथा कालमुंजिक - ये सभी महामायावी दानव देवेन्द्र पर एक साथ झपट पड़े।

श्लोक 19 (skanda.8.81.19)

तानापतत एवाथ रुद्रादित्याः प्रमन्यवः । रुरुधुर्विजने यद्वद् गजान् सिंहाः समूर्जिताः ।

tānāpatata evātha rudrādityāḥ pramanyavaḥ | rurudhurvijane yadvad gajān siṁhāḥ samūrjitāḥ |

उन आक्रमण करते हुओं को क्रोधित रुद्र और आदित्यगणों ने खुले मैदान में उसी प्रकार रोक दिया, जैसे बलशाली सिंह हाथियों को रोक देते हैं।

श्लोक 20 (skanda.8.81.20)

तेषां तेषां च संग्रामः सुघोरः समपद्यत । अरण्येन्योन्यसंपातान्मत्तानां दन्तिनामिव ।

teṣāṁ teṣāṁ ca saṁgrāmaḥ sughoraḥ samapadyata | araṇyenyonyasaṁpātānmattānāṁ dantināmiva |

उनके-उनके बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया, जैसे वन में मतवाले हाथियों की परस्पर टक्कर होती है।

श्लोक 21 (skanda.8.81.21)

तत्रांशो नाम आदित्यो रथेनाम्बुदनादिना । आयम्य कार्मुकं व्यास दानवान् समुपाद्रवत् ।

tatrāṁśo nāma ādityo rathenāmbudanādinā | āyamya kārmukaṁ vyāsa dānavān samupādravat |

वहाँ अंश नामक आदित्य ने मेघ के समान गर्जने वाले रथ पर सवार होकर, हे व्यास! धनुष चढ़ाकर दानवों पर आक्रमण किया।

श्लोक 22 (skanda.8.81.22)

स विप्रचित्तिं दशभिः शिनिं पञ्चभिरेव च । त्रिभिश्च वाष्कलिं संख्ये मयं पञ्चभिरेव च ।

sa vipracittiṁ daśabhiḥ śiniṁ pañcabhireva ca | tribhiśca vāṣkaliṁ saṁkhye mayaṁ pañcabhireva ca |

उसने युद्ध में विप्रचित्ति को दस बाणों से, शिनि को पाँच बाणों से, वाष्कलि को तीन बाणों से, तथा मय को भी पाँच बाणों से बींधा,

श्लोक 23 (skanda.8.81.23)

संवरं चैव विंशत्या असिलोमानमेव च । तारं च तारकं चैव इल्वलं नमुचिं तथा ।

saṁvaraṁ caiva viṁśatyā asilomānameva ca | tāraṁ ca tārakaṁ caiva ilvalaṁ namuciṁ tathā |

सम्बर को बीस बाणों से, असिलोमा को भी, तार और तारक को, तथा इल्वल और नमुचि को भी,

श्लोक 24 (skanda.8.81.24)

वातापिं चेन्द्रदमनं विपाकं पाकमेव च । कालनेमिं च षण्डं च तथा चामीसृमुञ्जिकम् ।

vātāpiṁ cendradamanaṁ vipākaṁ pākameva ca | kālanemiṁ ca ṣaṇḍaṁ ca tathā cāmīsṛmuñjikam |

वातापि, इन्द्रदमन, विपाक तथा पाक को, कालनेमि और षण्ड को, तथा अमीसृमुंजिक को भी,

श्लोक 25 (skanda.8.81.25)

एतान्सर्वान् स विव्याध दशभिर्दशभिः शरैः । विकर्षतां च संग्रामे आदित्यो लघुहस्तवान् । धनूंषि युगपद्देवश्चिच्छेद च ननाद च ।

etānsarvān sa vivyādha daśabhirdaśabhiḥ śaraiḥ | vikarṣatāṁ ca saṁgrāme ādityo laghuhastavān | dhanūṁṣi yugapaddevaściccheda ca nanāda ca |

इन सभी को दस-दस बाणों से बींध डाला। युद्ध में धनुष खींचते हुए उन सबके धनुषों को उस लघुहस्त आदित्य देवता ने एक साथ काट दिया, और गर्जना की।

श्लोक 26 (skanda.8.81.26)

तत एषां पुनर्वाहान् सूतान् दिव्यान् जयध्वजान् । प्रहसन्निव विप्रेन्द्र सायकैर्बहुधाकरोत् ।

tata eṣāṁ punarvāhān sūtān divyān jayadhvajān | prahasanniva viprendra sāyakairbahudhākarot |

फिर, हे विप्रेन्द्र! मानो हँसते हुए उसने अपने बाणों से उनके वाहनों, सारथियों तथा दिव्य विजय-ध्वजों के अनेक टुकड़े कर दिये।

श्लोक 27 (skanda.8.81.27)

ते हताश्वा महेष्वासा हतसूताश्च सर्वशः । वेगेन खङ्गिनः सर्वे अंशमेवाभिदुद्रुवुः ।

te hatāśvā maheṣvāsā hatasūtāśca sarvaśaḥ | vegena khaṅginaḥ sarve aṁśamevābhidudruvuḥ |

वे सभी महाधनुर्धर, घोड़े मारे जाने पर तथा सारथी मारे जाने पर, तलवार हाथ में लेकर वेगपूर्वक अंश पर ही टूट पड़े।

श्लोक 28 (skanda.8.81.28)

तान्मूर्त्तीनिव शैलेन्द्रान् गर्जतो जलदानिव । असंभ्रान्तस्तदादित्यो जानुष्वेवावपूरयत् ।

tānmūrttīniva śailendrān garjato jaladāniva | asaṁbhrāntastadādityo jānuṣvevāvapūrayat |

मूर्तिमान पर्वतों के समान तथा गरजते हुए मेघों के समान उन दानवों को, अंश देवता ने विचलित हुए बिना बाणों से घुटनों तक भर दिया।

श्लोक 29 (skanda.8.81.29)

शरपूरितगुल्फास्ते जानुष्वेव च दानवाः । अंशमुत्सृज्य वेगेन जग्मुरन्यां दिशं तदा ।

śarapūritagulphāste jānuṣveva ca dānavāḥ | aṁśamutsṛjya vegena jagmuranyāṁ diśaṁ tadā |

अपने टखनों और घुटनों तक बाणों से भरे हुए वे दानव, अंश को छोड़कर वेगपूर्वक उस समय दूसरी दिशा में भाग गये।

श्लोक 30 (skanda.8.81.30)

ततो देवास्तदा चक्रुर्महान्तं तूर्यनिस्वनम् । सिंहनादाश्च विपुलान् बाहुशब्दाँश्च पुष्कलान् ।

tato devāstadā cakrurmahāntaṁ tūryanisvanam | siṁhanādāśca vipulān bāhuśabdā~śca puṣkalān |

तब देवताओं ने महान तूर्यनाद किया, विपुल सिंहनाद किया तथा भुजाओं की प्रचुर थपथपाहट की।

श्लोक 31 (skanda.8.81.31)

अंशोप्यायम्य भगवान् धनुरिन्द्रायुधोपमम् । दानवानां सदैत्यानामकरोत् कदनं महत् ।

aṁśopyāyamya bhagavān dhanurindrāyudhopamam | dānavānāṁ sadaityānāmakarot kadanaṁ mahat |

भगवान अंश ने भी इन्द्रधनुष के समान अपने धनुष को चढ़ाकर दानवों तथा दैत्यों का महान संहार किया।

श्लोक 32 (skanda.8.81.32)

शिरांसि दानवेन्द्राणामंशः प्रहरतां वरः । अपातयत् फलानीव पक्वानि श्वसनो यथा ।

śirāṁsi dānavendrāṇāmaṁśaḥ praharatāṁ varaḥ | apātayat phalānīva pakvāni śvasano yathā |

प्रहारकों में श्रेष्ठ अंश ने दानवेन्द्रों के सिरों को वैसे गिरा दिया, जैसे वायु पके हुए फलों को गिरा देती है।

श्लोक 33 (skanda.8.81.33)

धावन्ति केचिदंशेन अशिरस्काः शरैः कृताः । गत्वा वेगेन संग्रामात् पतन्त्यूर्व्यां गतासवः ।

dhāvanti kecidaṁśena aśiraskāḥ śaraiḥ kṛtāḥ | gatvā vegena saṁgrāmāt patantyūrvyāṁ gatāsavaḥ |

अंश के बाणों से सिरविहीन किये गये कुछ दौड़ते रहे; युद्धभूमि से वेगपूर्वक जाकर वे प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ते थे।

श्लोक 34 (skanda.8.81.34)

अपरे बाहुभिश्छिन्नैरूरुभिश्च महाबलाः । पतिता निष्टनन्त्युग्रं निरयस्था यथा नराः ।

apare bāhubhiśchinnairūrubhiśca mahābalāḥ | patitā niṣṭanantyugraṁ nirayasthā yathā narāḥ |

दूसरे महाबली, भुजाएँ और जाँघें कटी होने पर गिरकर भयंकर स्वर में कराहते थे, जैसे नरकवासी मनुष्य कराहते हैं।

श्लोक 35 (skanda.8.81.35)

शरपूरितसर्वाङ्गाः शरसंबद्धबन्धनाः । भ्रमन्ति तत्र तत्रैव संसार इव देहिनः ।

śarapūritasarvāṅgāḥ śarasaṁbaddhabandhanāḥ | bhramanti tatra tatraiva saṁsāra iva dehinaḥ |

बाणों से समूचे अंग भरे हुए, बाणों के ही बन्धनों में बँधे हुए वे वहाँ-वहाँ इस प्रकार भटकते थे, जैसे संसार-चक्र में देहधारी जीव भटकते हैं।

श्लोक 36 (skanda.8.81.36)

न स तत्रास्ति दैत्यो वा दानवो वा महाबलः । यं शरा न विशन्त्युग्रा अंशस्य सुमहात्मनः ।

na sa tatrāsti daityo vā dānavo vā mahābalaḥ | yaṁ śarā na viśantyugrā aṁśasya sumahātmanaḥ |

वहाँ ऐसा कोई दैत्य या महाबली दानव नहीं था, जिसमें उस महात्मा अंश के उग्र बाण न प्रविष्ट हुए हों।

श्लोक 37 (skanda.8.81.37)

बन्धुजीववनं यद्वद् वनमाभाति पुष्पितम् । अशोककिंशुकानां वा तथा दैत्यबलं बभौ ।

bandhujīvavanaṁ yadvad vanamābhāti puṣpitam | aśokakiṁśukānāṁ vā tathā daityabalaṁ babhau |

जैसे बन्धुजीव वृक्षों का वन, अथवा खिले हुए अशोक और किंशुक वृक्षों का वन शोभित होता है, वैसे ही रक्तरंजित दैत्य-सेना शोभित हो रही थी।

श्लोक 38 (skanda.8.81.38)

अयमंशोयमंशेति नेत्ययं चायमित्युत । सर्वमंशमयं दैत्या ह्यपश्यन्त भयार्दिताः ।

ayamaṁśoyamaṁśeti netyayaṁ cāyamityuta | sarvamaṁśamayaṁ daityā hyapaśyanta bhayārditāḥ |

'यह अंश है, वह अंश है' - 'नहीं, यह है, वह भी है' - इस प्रकार भय से पीड़ित दैत्य सब कुछ अंशमय ही देखने लगे।

श्लोक 39 (skanda.8.81.39)

सोपि नित्यायतधनुः परिवेषीव भास्करः । यं यतः पश्यते दैत्यं तं तं विव्याध पत्रिभिः ।

sopi nityāyatadhanuḥ pariveṣīva bhāskaraḥ | yaṁ yataḥ paśyate daityaṁ taṁ taṁ vivyādha patribhiḥ |

सदा तना हुआ धनुष लिये वह भी, मानो मण्डलयुक्त सूर्य हो, जिस-जिस दैत्य को जहाँ-जहाँ देखता, उसे-उसे अपने पंखयुक्त बाणों से बींध देता था।

श्लोक 40 (skanda.8.81.40)

नाददानस्तदा ह्यंशः सन्दधानस्तथापि वा । न विकर्षन्धनुश्चैव लक्ष्यते दैत्यदानवैः ।

nādadānastadā hyaṁśaḥ sandadhānastathāpi vā | na vikarṣandhanuścaiva lakṣyate daityadānavaiḥ |

अंश को न तो बाण उठाते हुए, न प्रत्यंचा पर चढ़ाते हुए, और न ही धनुष खींचते हुए दैत्य-दानव देख पाते थे।

श्लोक 41 (skanda.8.81.41)

मण्डलीकृतमेवास्य दृश्यन्ते कार्मुकं महत् । आदित्य इव मध्याह्ने दृश्यते स तदा युधि ।

maṇḍalīkṛtamevāsya dṛśyante kārmukaṁ mahat | āditya iva madhyāhne dṛśyate sa tadā yudhi |

उसका विशाल धनुष केवल मण्डलाकार ही दिखाई देता था; मध्याह्न के सूर्य के समान वह उस समय युद्ध में दिखाई पड़ता था।

श्लोक 42 (skanda.8.81.42)

स दिव्यचापो लघुहस्तवान् बली सदा महामण्डलभूतकार्मुकः । ददाह शत्रून् पवनेरितो रणे विभावसुः शुष्कमिवेन्धनं महद् ।

sa divyacāpo laghuhastavān balī sadā mahāmaṇḍalabhūtakārmukaḥ | dadāha śatrūn pavanerito raṇe vibhāvasuḥ śuṣkamivendhanaṁ mahad |

दिव्य धनुष धारण करने वाला, लघुहस्त, सदा बलवान, सदा वृहत् मण्डलाकार धनुष वाला वह अंश युद्ध में अपने शत्रुओं को इस प्रकार जला डालता था, जैसे वायु से प्रेरित प्रचण्ड अग्नि सूखी हुई महती लकड़ी को जला डालती है।

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82