अम्बिका खण्ड · अध्याय 82
असुराक्रोशनम्
श्लोक 1 (skanda.8.82.1)
सनत्कुमार उवाच । तांस्तथांशेन दैत्येन्द्रान् काल्यमानानितस्ततः । दृष्ट्वा बलो महामायो यन्तारमिदमब्रवीत् ।
sanatkumāra uvāca | tāṁstathāṁśena daityendrān kālyamānānitastataḥ | dṛṣṭvā balo mahāmāyo yantāramidamabravīt |
सनत्कुमार ने कहा - अंश के द्वारा उन दैत्येन्द्रों को इस प्रकार इधर-उधर खदेड़ा जाता देखकर, महामायावी बल ने अपने सारथी से यह कहा -
श्लोक 2 (skanda.8.82.2)
नयस्व मां यतोंशोयं दुरात्मा दहते बलम् । यावदेनं शितैर्बाणैर्नयामि यमसादनम् ।
nayasva māṁ yatoṁśoyaṁ durātmā dahate balam | yāvadenaṁ śitairbāṇairnayāmi yamasādanam |
'मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ यह दुरात्मा अंश हमारी सेना को जला रहा है, जिससे मैं तीक्ष्ण बाणों से इसे यमलोक भेज सकूँ।'
श्लोक 3 (skanda.8.82.3)
तस्यापतत एवांशस्तदा प्रहरतां वरः । ध्वजं चिच्छेद बाणेन हयाँश्चैकैकशस्तदा ।
tasyāpatata evāṁśastadā praharatāṁ varaḥ | dhvajaṁ ciccheda bāṇena hayā~ścaikaikaśastadā |
उसके झपटते ही प्रहारकों में श्रेष्ठ अंश ने उसकी ध्वजा को बाण से काट डाला, तथा उसके घोड़ों को भी एक-एक करके।
श्लोक 4 (skanda.8.82.4)
भल्लेन च शिरः कायाद्यन्तुराशु न्यपातयत् । तञ्चैव पञ्चभिर्बाणैर्ललाटे समविध्यत ।
bhallena ca śiraḥ kāyādyanturāśu nyapātayat | tañcaiva pañcabhirbāṇairlalāṭe samavidhyata |
भल्ल बाण से उसने सारथी के सिर को शरीर से शीघ्र अलग कर दिया, और उसे (बल को) भी पाँच बाणों से ललाट में बींध दिया।
श्लोक 5 (skanda.8.82.5)
तस्य दैत्यस्य ते भान्ति ललाटे पञ्च सायकाः । घनोदरविनिष्क्रान्ता भास्करस्येव रश्मयः ।
tasya daityasya te bhānti lalāṭe pañca sāyakāḥ | ghanodaraviniṣkrāntā bhāskarasyeva raśmayaḥ |
उस दैत्य के ललाट में वे पाँचों बाण ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे बादल के भीतर से निकलती हुई सूर्य की किरणें।
श्लोक 6 (skanda.8.82.6)
दैत्योपि हि तदा धन्वी वियदुत्पत्य रोषितः । सायकैर्बहुभिर्व्यास सोंशं समकिरद्बली ।
daityopi hi tadā dhanvī viyadutpatya roṣitaḥ | sāyakairbahubhirvyāsa soṁśaṁ samakiradbalī |
उस समय धनुर्धारी दैत्य भी क्रोधित होकर आकाश में उछल पड़ा; हे व्यास! उस बलशाली बल ने अंश को अनेक बाणों से ढक दिया।
श्लोक 7 (skanda.8.82.7)
सुवृष्टिमिव जीमूतः इवाशनिम् । करान् दिवाकरो यद्वत् तुषारं चन्द्रमा यथा ।
suvṛṣṭimiva jīmūtaḥ ivāśanim | karān divākaro yadvat tuṣāraṁ candramā yathā |
जैसे मेघ भारी वर्षा से... (इस पद्य के मध्य का अंश मूल पाण्डुलिपि में अस्पष्ट है) ...वज्र के समान; जैसे सूर्य अपनी किरणों से, जैसे चन्द्रमा तुषार से - (उसी प्रकार उसने अंश को ढक दिया)।
श्लोक 8 (skanda.8.82.8)
तथा स दानवो दर्पाद्बलः प्रहरतां वरः । अंशमेवाकिरत्तीक्ष्णैः सायकैर्मर्मभेदिभिः ।
tathā sa dānavo darpādbalaḥ praharatāṁ varaḥ | aṁśamevākirattīkṣṇaiḥ sāyakairmarmabhedibhiḥ |
इस प्रकार प्रहारकों में श्रेष्ठ वह दानव बल, अपने गर्व से, अंश को ही मर्मभेदी तीक्ष्ण बाणों से ढक देने लगा।
श्लोक 9 (skanda.8.82.9)
ध्वजं चैवास्य चिच्छेद बहुधा दानवेश्वरः । हयान् वेगहतान् कृत्वा सारथिं चाप्यसारथिम् ।
dhvajaṁ caivāsya ciccheda bahudhā dānaveśvaraḥ | hayān vegahatān kṛtvā sārathiṁ cāpyasārathim |
उस दानवेश्वर ने उसकी (अंश की) ध्वजा को भी अनेक टुकड़ों में काट डाला, उसके घोड़ों को वेगपूर्वक मार गिराया, तथा उसके सारथी को भी सारथीविहीन कर दिया।
श्लोक 10 (skanda.8.82.10)
कार्मुकं बहुभिर्बाणैर्व्यधम । यथांशं स चकारोग्रस्थान्यानपि दैवतान् ।
kārmukaṁ bahubhirbāṇairvyadhama | yathāṁśaṁ sa cakārograsthānyānapi daivatān |
अनेक बाणों से उसने धनुष को बींध डाला... (इस पद्य के आगे का कुछ अंश मूल पाण्डुलिपि में अस्पष्ट है) ...और अन्य भयंकर देवताओं को भी उसने वैसा ही बना डाला, जैसा उसने अंश को बनाया था।
श्लोक 11 (skanda.8.82.11)
निरुद्यमान् महामायश्चकार विररास च । क्वचिद् गीष्पतिसंकाशः क्वचिद् भास्करसंनिभः ।
nirudyamān mahāmāyaścakāra virarāsa ca | kvacid gīṣpatisaṁkāśaḥ kvacid bhāskarasaṁnibhaḥ |
उस महामायावी ने उन्हें निष्क्रिय कर दिया, और गर्जना की। वह कहीं बृहस्पति के समान, कहीं सूर्य के समान दिखाई पड़ता था,
श्लोक 12 (skanda.8.82.12)
क्वचित्सोमाग्निकल्पश्च क्वचित्ताराग्रहैस्समः । क्वचित्पर्वतसंकाशः क्वचिद् गृध्रवपुर्धरः ।
kvacitsomāgnikalpaśca kvacittārāgrahaissamaḥ | kvacitparvatasaṁkāśaḥ kvacid gṛdhravapurdharaḥ |
कहीं चन्द्रमा या अग्नि के समान, कहीं तारों और ग्रहों के तुल्य, कहीं पर्वत के समान, तथा कहीं गृध्र का रूप धारण किये हुए,
श्लोक 13 (skanda.8.82.13)
क्वचिच्चाकाशमाविश्य अदृश्यः सोसृजच्छरान् । शरोपचितगात्रं तच्छिन्नं भिन्नं विदारितम् ।
kvaciccākāśamāviśya adṛśyaḥ sosṛjaccharān | śaropacitagātraṁ tacchinnaṁ bhinnaṁ vidāritam |
और कहीं आकाश में प्रविष्ट होकर अदृश्य रूप में वह बाण छोड़ता था। बाणों से भरा हुआ, कटा हुआ, भिन्न-भिन्न और विदीर्ण वह देवसेना का शरीर,
श्लोक 14 (skanda.8.82.14)
विष्टब्धं मूकवत्सर्वं देवानां बलमाबभौ । नष्टवादित्रनिनदं हयहेषितवर्जितम् ।
viṣṭabdhaṁ mūkavatsarvaṁ devānāṁ balamābabhau | naṣṭavāditraninadaṁ hayaheṣitavarjitam |
स्तब्ध होकर मूक के समान प्रतीत होता था। देवताओं की वह सेना, जिसके वाद्यों की ध्वनि नष्ट हो गई थी तथा जिसमें घोड़ों की हिनहिनाहट भी नहीं थी,
श्लोक 15 (skanda.8.82.15)
गजबृंहितविभ्रष्टं श्रान्तयोधोग्रनादितम् । निष्पन्दं तद्बलं भाति चित्रप्रत्यर्पितं यथा ।
gajabṛṁhitavibhraṣṭaṁ śrāntayodhogranāditam | niṣpandaṁ tadbalaṁ bhāti citrapratyarpitaṁ yathā |
हाथियों की चिंघाड़ से रहित, थके हुए योद्धाओं के भयंकर स्वरों से गूँजती हुई, निश्चल वह सेना ऐसी प्रतीत होती थी मानो चित्र में अंकित हो।
श्लोक 16 (skanda.8.82.16)
ऊर्ध्वं निरीक्षते तत्र यः कश्चिद्विबुधो बले । बलस्तस्य शरैर्वक्त्रमकरोद्विरूपवद्बली ।
ūrdhvaṁ nirīkṣate tatra yaḥ kaścidvibudho bale | balastasya śarairvaktramakarodvirūpavadbalī |
उस सेना में जो कोई भी देवता ऊपर देखता था, उस बलशाली बल ने अपने बाणों से उसका मुख कुरूप कर दिया (इस पद में एक शब्द मूल में अस्पष्ट है) - इतना बलवान था वह।
श्लोक 17 (skanda.8.82.17)
चेष्टाविराहिताश्चासन् यथा मोक्षपथि स्थिताः ।
ceṣṭāvirāhitāścāsan yathā mokṣapathi sthitāḥ |
(इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूल पाण्डुलिपि में सर्वथा नष्ट है) ...वे सभी चेष्टारहित हो गये, मानो मोक्ष के मार्ग पर स्थित हों।
श्लोक 18 (skanda.8.82.18)
तांस्तथा सीदतः सर्वान् दृष्ट्वा बलमहार्णवे । वायुर्जयन्तः पूषा च भगश्च सुमहाबलाः ।
tāṁstathā sīdataḥ sarvān dṛṣṭvā balamahārṇave | vāyurjayantaḥ pūṣā ca bhagaśca sumahābalāḥ |
उन सबको बल के उस महासागर-जैसे प्रहार में इस प्रकार डूबता देखकर, अत्यन्त महाबली वायु, जयन्त, पूषा तथा भग,
श्लोक 19 (skanda.8.82.19)
नदन्तस्ताञ्छराँस्तस्य बलस्य समवारयन् । वायुस्तस्य महाभाग शरान्मेघादिवोदितान् ।
nadantastāñcharā~stasya balasya samavārayan | vāyustasya mahābhāga śarānmeghādivoditān |
गर्जना करते हुए उस बल के बाणों को रोकने लगे। हे महाभाग! वायु ने मेघ से उठे हुए के समान उसके बाणों को,
श्लोक 20 (skanda.8.82.20)
मुञ्चतो मुच्यमानाँश्च मुक्ताँश्चैवाहरद्बली । भगोस्य कार्मुकं दिव्यमच्छिनत्प्रहसन्निव ।
muñcato mucyamānā~śca muktā~ścaivāharadbalī | bhagosya kārmukaṁ divyamacchinatprahasanniva |
चलाये जाते हुए, चलाये जा रहे तथा चलाये जा चुके - सभी को उस बलशाली वायु ने हर लिया। भग ने मानो हँसते हुए उसके दिव्य धनुष को काट डाला।
श्लोक 21 (skanda.8.82.21)
देहत्राणं तथा पूषा जयन्तश्चेषुधी तथा ।
dehatrāṇaṁ tathā pūṣā jayantaśceṣudhī tathā |
इसी प्रकार पूषा ने उसका कवच तथा जयन्त ने उसके दोनों तूणीर [काट डाले]... (इस श्लोक की शेष पंक्ति मूल पाण्डुलिपि में सुरक्षित नहीं है)।
श्लोक 22 (skanda.8.82.22)
समार्दयन् शरैस्तीक्ष्णैर्देवा रविसमप्रभाः । सोर्द्यमानस्तदा देवैर्बली दनावपुंगवः ।
samārdayan śaraistīkṣṇairdevā ravisamaprabhāḥ | sordyamānastadā devairbalī danāvapuṁgavaḥ |
सूर्य के समान तेजस्वी उन देवताओं ने उसे तीक्ष्ण बाणों से पीड़ित किया। देवताओं द्वारा इस प्रकार पीड़ित होकर वह बलशाली दानवश्रेष्ठ बल,
श्लोक 23 (skanda.8.82.23)
वृक्षैः काननजैर्व्यास युयुधे भीमविक्रमः । तान्द्रुमाँस्ते तदाक्षिप्तान् बलेन बहुधा शुभान् ।
vṛkṣaiḥ kānanajairvyāsa yuyudhe bhīmavikramaḥ | tāndrumā~ste tadākṣiptān balena bahudhā śubhān |
हे व्यास! भयंकर पराक्रम वाला वह वन के वृक्षों से युद्ध करने लगा। बल द्वारा फेंके गये उन अनेक सुन्दर वृक्षों को,
श्लोक 24 (skanda.8.82.24)
क्रचुःशरैर्देवतेन्द्रास्ततः स गिरिमाव्रजत् । गृहीत्वा स महच्छृङ्गं समृगव्यालकिन्नरम् ।
kracuḥśarairdevatendrāstataḥ sa girimāvrajat | gṛhītvā sa mahacchṛṅgaṁ samṛgavyālakinnaram |
देवताओं के श्रेष्ठों ने अपने बाणों से काट डाला। तब वह एक पर्वत के पास गया, और मृग, सर्प तथा किन्नरों से युक्त उसके विशाल शिखर को पकड़कर,
श्लोक 25 (skanda.8.82.25)
चिक्षेप सुमहानादं प्रकुर्वाणोतिदारुणम् । तथा पतन् स वेगेन पवनो बलवान् बलात् ।
cikṣepa sumahānādaṁ prakurvāṇotidāruṇam | tathā patan sa vegena pavano balavān balāt |
अत्यन्त भयंकर महानाद करते हुए उसे फेंका। इस प्रकार गिरते हुए उस शिखर को बलवान वायु ने वेगपूर्वक बलपूर्वक,
श्लोक 26 (skanda.8.82.26)
जहार शृङ्गं तच्चापि पपातासुरमूर्धनि । दानवानां तदा कोटिमेकां वीर्यवतां युधि ।
jahāra śṛṅgaṁ taccāpi papātāsuramūrdhani | dānavānāṁ tadā koṭimekāṁ vīryavatāṁ yudhi |
छीन लिया, और वह असुरों के सिरों पर ही जा गिरा। उस समय युद्ध में एक करोड़ पराक्रमी दानवों को,
श्लोक 27 (skanda.8.82.27)
जघान बलमुक्तं तद् गिरिशृङ्गं महास्वनम् । तान् हतान् दानवास्तेन शृंगेण दितिनन्दनान् ।
jaghāna balamuktaṁ tad giriśṛṅgaṁ mahāsvanam | tān hatān dānavāstena śṛṁgeṇa ditinandanān |
बल द्वारा फेंके गये उस महाध्वनि पर्वतशिखर ने मार डाला। उस शिखर से मारे गये उन दिति के पुत्रों को देखकर,
श्लोक 28 (skanda.8.82.28)
दृष्ट्वा देवांश्च तानुग्रानभज्यन्त सहस्रशः । रथैरश्वैर्गजैश्चैव तथा चैव पदातयः ।
dṛṣṭvā devāṁśca tānugrānabhajyanta sahasraśaḥ | rathairaśvairgajaiścaiva tathā caiva padātayaḥ |
तथा उन भयंकर देवताओं को देखकर, वे हजारों की संख्या में रथों, घोड़ों, हाथियों तथा पैदल भी भाग खड़े हुए।
श्लोक 29 (skanda.8.82.29)
उत्सृज्य वाहनान्यन्ये जीविताभ्यर्थिनस्तदा । प्रमुञ्चन्तो महानादान् पलायन्त सहस्रशः ।
utsṛjya vāhanānyanye jīvitābhyarthinastadā | pramuñcanto mahānādān palāyanta sahasraśaḥ |
दूसरे लोग, अपने प्राणों की कामना करते हुए, वाहनों को त्यागकर, बड़े-बड़े शब्द करते हुए हजारों की संख्या में भाग गये।
श्लोक 30 (skanda.8.82.30)
द्रबतस्तान् तदाभ्येत्य हिरण्याक्षः स दानवः । विप्रचित्तिश्च दनुजः प्रह्लादश्च महाबलः । मयश्चान्धको दैत्यस्तारकः शक्रतापनः ।
drabatastān tadābhyetya hiraṇyākṣaḥ sa dānavaḥ | vipracittiśca danujaḥ prahlādaśca mahābalaḥ | mayaścāndhako daityastārakaḥ śakratāpanaḥ |
उन भागते हुओं के पास आकर दानव हिरण्याक्ष, दनुज विप्रचित्ति, महाबली प्रह्लाद, मय, दैत्य अन्धक तथा इन्द्र को संतप्त करने वाला तारक -
श्लोक 31 (skanda.8.82.31)
ऊचिरे दानवान् सर्वान् दैत्यांश्च भयविह्वलान् ।
ūcire dānavān sarvān daityāṁśca bhayavihvalān |
इन सबने भय से व्याकुल हुए समस्त दानवों और दैत्यों से कहा -
श्लोक 32 (skanda.8.82.32)
भो भो दानवशार्दूला दैत्याश्च सुरशत्रवः । किं पलायथ तिष्ठध्वं मा भयं वोस्तु दानवाः ।
bho bho dānavaśārdūlā daityāśca suraśatravaḥ | kiṁ palāyatha tiṣṭhadhvaṁ mā bhayaṁ vostu dānavāḥ |
'अरे-अरे बाघ के समान दानवो, और देवशत्रु दैत्यो! क्यों भाग रहे हो? ठहरो! हे दानवो! तुम्हें भय न हो।'
श्लोक 33 (skanda.8.82.33)
क्व गता दानवा यूयं सुखं लप्स्यथ वा न वा । एते बलमजानन्तो देवाः पूर्वं महाबलाः ।
kva gatā dānavā yūyaṁ sukhaṁ lapsyatha vā na vā | ete balamajānanto devāḥ pūrvaṁ mahābalāḥ |
'हे दानवो! तुम कहाँ जा रहे हो? क्या तुम्हें इस तरह सुख मिलेगा या नहीं? ये देवता, हमारे बल को न जानते हुए, पहले महाबली माने जाते रहे हैं।'
श्लोक 34 (skanda.8.82.34)
न प्रमर्दन्ति पाताले स्थितान्नाप्यसुरोत्तमाः । निःशेषान् प्रमथिष्यन्ति पातालेपि कुलाधमाः ।
na pramardanti pātāle sthitānnāpyasurottamāḥ | niḥśeṣān pramathiṣyanti pātālepi kulādhamāḥ |
'पाताल में स्थित असुरश्रेष्ठों को भी वे नहीं कुचल पाते; क्या ये कुलाधम पाताल में भी हमें निःशेष रूप से मथ डालेंगे?'
श्लोक 35 (skanda.8.82.35)
मा यात विनिवर्तध्वं रिरक्षिषत सर्वशः । सुयुद्धेनात्मनो दैत्या मा भयं वोत्र जीविते ।
mā yāta vinivartadhvaṁ rirakṣiṣata sarvaśaḥ | suyuddhenātmano daityā mā bhayaṁ votra jīvite |
'मत जाओ, लौट आओ, सब प्रकार से अपनी रक्षा करो; हे दैत्यो! सुयुद्ध द्वारा अपने प्राणों के लिए यहाँ भय मत करो।'
श्लोक 36 (skanda.8.82.36)
क्व गतं दनुजत्वं वः क्व गता दैत्यता च वः । क्व च वैरं सुरैः सार्धं क्व राज्यहरणं गतम् ।
kva gataṁ danujatvaṁ vaḥ kva gatā daityatā ca vaḥ | kva ca vairaṁ suraiḥ sārdhaṁ kva rājyaharaṇaṁ gatam |
'तुम्हारा दानवत्व कहाँ गया? तुम्हारा दैत्यत्व कहाँ गया? देवताओं के साथ तुम्हारा वैर कहाँ गया, और तुम्हारे राज्य-हरण की स्मृति कहाँ गई?'
श्लोक 37 (skanda.8.82.37)
यद् धैर्यं यश्च वो दर्पः कुलं जन्म च यद्धि वः । यच्च वो गर्जितं पूर्वं तस्य कालोयमागतः ।
yad dhairyaṁ yaśca vo darpaḥ kulaṁ janma ca yaddhi vaḥ | yacca vo garjitaṁ pūrvaṁ tasya kāloyamāgataḥ |
'जो तुम्हारा धैर्य था, जो अभिमान था, जो कुल और जन्म था, तथा जो तुम्हारी पूर्वकालीन गर्जना थी - उसका समय अब आ पहुँचा है।'
श्लोक 38 (skanda.8.82.38)
तदा ब्रुवत यद दैत्या न बाला वयमित्युत । वयमेकैकशो योग्या देवानां नाशनेपि च ।
tadā bruvata yada daityā na bālā vayamityuta | vayamekaikaśo yogyā devānāṁ nāśanepi ca |
'हे दैत्यो! तब तो तुमने कहा था कि हम बालक नहीं हैं, और हम में से प्रत्येक अकेला भी देवताओं के नाश के लिए समर्थ है।'
श्लोक 39 (skanda.8.82.39)
तस्य कालोयमद्येह प्राप्तः किं विपलायथ । तत् सर्वं गर्जितं वोद्य जानाम्यहमतः परम् ।
tasya kāloyamadyeha prāptaḥ kiṁ vipalāyatha | tat sarvaṁ garjitaṁ vodya jānāmyahamataḥ param |
'उसी का समय आज यहाँ आ पहुँचा है, फिर क्यों भाग रहे हो? तुम्हारी उस समस्त गर्जना को मैं आज इसके आगे परखूँगा।'
श्लोक 40 (skanda.8.82.40)
शरदम्बुदवद् दैत्या व्यर्थं मा यात भीरिह । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं कृतनिश्चयाः ।
śaradambudavad daityā vyarthaṁ mā yāta bhīriha | nivartadhvamadharmajñā yudhyadhvaṁ kṛtaniścayāḥ |
'हे दैत्यो! शरत्कालीन मेघों के समान व्यर्थ भयभीत होकर मत जाओ। हे धर्म को भूलने वालो! लौट आओ, दृढ़ निश्चय करके युद्ध करो।'
श्लोक 41 (skanda.8.82.41)
वीक्षध्वं मे सपुत्रस्य महत् कर्म कुलाधमाः । कश्यपस्य सुतः श्रीमान् हिरण्याक्षोस्मि दानवाः ।
vīkṣadhvaṁ me saputrasya mahat karma kulādhamāḥ | kaśyapasya sutaḥ śrīmān hiraṇyākṣosmi dānavāḥ |
'हे कुलाधमो! अपने पुत्र सहित मेरा महान कर्म देखो। हे दानवो! मैं कश्यप का श्रीमान पुत्र हिरण्याक्ष हूँ,'
श्लोक 42 (skanda.8.82.42)
अन्धकश्च सुतोयं मे ब्रह्मदत्तवरः शुभः । हिरण्यकशिपोर्वीर्यं यदभूदसुरोत्तमाः ।
andhakaśca sutoyaṁ me brahmadattavaraḥ śubhaḥ | hiraṇyakaśiporvīryaṁ yadabhūdasurottamāḥ |
'और यह मेरा पुत्र अन्धक है, जिसे ब्रह्मा से शुभ वर प्राप्त है। हे असुरश्रेष्ठो! हिरण्यकशिपु में जो पराक्रम था,'
श्लोक 43 (skanda.8.82.43)
द्विगुणं तन्ममाप्यस्ति वीक्षध्वं तदशंकिताः । अद्य चैतान् मया सर्वान् हतान् पश्यत दानवाः ।
dviguṇaṁ tanmamāpyasti vīkṣadhvaṁ tadaśaṁkitāḥ | adya caitān mayā sarvān hatān paśyata dānavāḥ |
'वह मुझमें दोगुना है - निःशंक होकर देखो। और हे दानवो! आज इन सबको मेरे द्वारा मारा हुआ देखो।'
श्लोक 44 (skanda.8.82.44)
संग्रामे यदि तिष्ठन्ति सर्वे देवा ममाग्रतः । अद्य त्रैलोक्यमव्यग्रं हतेष्वसुरशत्रुषु ।
saṁgrāme yadi tiṣṭhanti sarve devā mamāgrataḥ | adya trailokyamavyagraṁ hateṣvasuraśatruṣu |
'यदि युद्ध में सभी देवता मेरे सामने खड़े रहें, तो आज असुरशत्रुओं के मारे जाने पर त्रिलोक निश्चिन्त हो जायेगा,'
श्लोक 45 (skanda.8.82.45)
विज्वरा भोक्ष्यथ सुखं मयेन्द्रेणासुरोत्तमाः । मा वोस्तु भयमद्येह यथा तिष्ठन्ति साधवः । सपुत्रं मां युधि यथा वीक्षमाणास्तु तिष्ठत ।
vijvarā bhokṣyatha sukhaṁ mayendreṇāsurottamāḥ | mā vostu bhayamadyeha yathā tiṣṭhanti sādhavaḥ | saputraṁ māṁ yudhi yathā vīkṣamāṇāstu tiṣṭhata |
'और हे असुरश्रेष्ठो! मुझे इन्द्र मानकर तुम निश्चिन्त होकर सुख भोगोगे। आज यहाँ तुम्हें भय न हो; साधुजनों की भाँति खड़े रहकर, अपने पुत्र सहित मुझे युद्ध में देखते रहो।'
श्लोक 46 (skanda.8.82.46)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता विप्रेन्द्र गजास्तोत्रार्दिता इव । विनिवृत्ताः पुनः सर्वे लज्जयातिसमावृताः ।
sanatkumāra uvāca | ta evamuktā viprendra gajāstotrārditā iva | vinivṛttāḥ punaḥ sarve lajjayātisamāvṛtāḥ |
सनत्कुमार ने कहा - हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार कहे जाने पर वे सभी, अंकुश से पीड़ित हाथियों के समान, अत्यन्त लज्जा से आवृत होकर पुनः लौट आये।
श्लोक 47 (skanda.8.82.47)
ते छत्रसंछादितवक्त्रपद्मा लज्जासमाविष्टविरागवक्त्राः । न तस्य राज्ञो मुखतोवतस्थुस्तिमेरिवार्त्ताः सलिलेल्पमीनाः ।
te chatrasaṁchāditavaktrapadmā lajjāsamāviṣṭavirāgavaktrāḥ | na tasya rājño mukhatovatasthustimerivārttāḥ salilelpamīnāḥ |
अपने छत्रों से मुखकमल को ढके हुए, लज्जा से विवर्ण मुख वाले वे उस राजा के सम्मुख वैसे खड़े न रह सके, जैसे संकटग्रस्त छोटी मछलियाँ बड़ी मछलियों के सामने जल में नहीं ठहर पातीं।