अम्बिका खण्ड · अध्याय 84
युद्धयज्ञः
श्लोक 1 (skanda.8.84.1)
सनत्कुमार उवाच । स युद्धयज्ञस्तत्राग्र्यो राज्यार्थमभवत्तदा । तत्र यज्वा स्वयं देवः सहस्राक्षः प्रतापवान् ।
sanatkumāra uvāca | sa yuddhayajñastatrāgryo rājyārthamabhavattadā | tatra yajvā svayaṁ devaḥ sahasrākṣaḥ pratāpavān |
सनत्कुमार ने कहा - वहाँ राज्य के लिए वह श्रेष्ठ युद्ध-यज्ञ उस समय हुआ। उस यज्ञ में स्वयं प्रतापी सहस्राक्ष देवता (इन्द्र) यजमान बना,
श्लोक 2 (skanda.8.84.2)
सह देवैः सुराध्यक्षः कुशास्तस्य शरा मताः । आयुधानि विचित्राणि स्रुवा यैर्हूयते हविः ।
saha devaiḥ surādhyakṣaḥ kuśāstasya śarā matāḥ | āyudhāni vicitrāṇi sruvā yairhūyate haviḥ |
देवताओं सहित वह देवाध्यक्ष; उसके बाण कुशा के तिनके माने गये; उसके विचित्र आयुध वे स्रुवा थे, जिनसे हवि दी जाती है।
श्लोक 3 (skanda.8.84.3)
हविः प्राणाः समाख्याता अग्निर्मृत्युर्महाप्रभा । मन्त्राश्चास्त्राणि दिव्यानि पुरोडाशाः शिरांस्यपि ।
haviḥ prāṇāḥ samākhyātā agnirmṛtyurmahāprabhā | mantrāścāstrāṇi divyāni puroḍāśāḥ śirāṁsyapi |
प्राण ही हवि कहलाये; महातेजस्वी मृत्यु ही अग्नि थी; दिव्य अस्त्र ही मन्त्र थे, तथा कटे हुए सिर ही पुरोडाश (यज्ञ-पिण्ड) थे।
श्लोक 4 (skanda.8.84.4)
सोमस्तत्र जयोभून्नु रुद्राश्चाध्वर्यवोभवन् । आदित्या बह्वृचश्चासन् होत्रं च वसुभिः कृतम् ।
somastatra jayobhūnnu rudrāścādhvaryavobhavan | ādityā bahvṛcaścāsan hotraṁ ca vasubhiḥ kṛtam |
वहाँ विजय ही सोमरस था; रुद्रगण अध्वर्यु बने; आदित्यगण बह्वृच (ऋग्वेदी) पुरोहित थे, तथा वसुओं ने होता का कार्य किया।
श्लोक 5 (skanda.8.84.5)
ब्रह्मा समभवच्चात्र स्वयं देवो बृहस्पतिः । शामित्रं चाश्विनौ तौ तु यज्ञ एवं व्यवर्त्तत ।
brahmā samabhavaccātra svayaṁ devo bṛhaspatiḥ | śāmitraṁ cāśvinau tau tu yajña evaṁ vyavarttata |
वहाँ स्वयं देव बृहस्पति ब्रह्मा (प्रधान पुरोहित) बने, तथा दोनों अश्विनीकुमारों ने शामित्र (शान्तिकर्म) का कार्य किया; इस प्रकार वह यज्ञ चलता रहा।
श्लोक 6 (skanda.8.84.6)
पशुस्तत्राभवद्दैत्यो हिरण्याक्षः सहानुगः । एवं बभौ तदा यज्ञो दैत्यानां शिशिराधिपः ।
paśustatrābhavaddaityo hiraṇyākṣaḥ sahānugaḥ | evaṁ babhau tadā yajño daityānāṁ śiśirādhipaḥ |
उस यज्ञ में पशु दैत्य हिरण्याक्ष अपने अनुयायियों सहित बना। इस प्रकार दैत्यों का वह यज्ञ उस समय शोभित हो रहा था।
श्लोक 7 (skanda.8.84.7)
हिरण्याक्षोभवद्यज्वा दैत्यदानवनायकः । विप्रचित्तिरभूद् होता प्रस्थातारश्च दानवाः ।
hiraṇyākṣobhavadyajvā daityadānavanāyakaḥ | vipracittirabhūd hotā prasthātāraśca dānavāḥ |
दैत्य-दानवों का नेता हिरण्याक्ष यजमान बना; विप्रचित्ति होता बना, तथा दानवगण प्रस्थाता (सहायक पुरोहित) बने।
श्लोक 8 (skanda.8.84.8)
उद्गाता चैव प्रह्लादः शुक्रो ब्रह्मा च सुव्रतः । पशुरिन्द्रः सहस्राक्ष एवं सोयजदव्ययः ।
udgātā caiva prahlādaḥ śukro brahmā ca suvrataḥ | paśurindraḥ sahasrākṣa evaṁ soyajadavyayaḥ |
प्रह्लाद उद्गाता बना, तथा सुव्रत शुक्राचार्य ब्रह्मा (मुख्य पुरोहित) बने; और सहस्राक्ष इन्द्र उनके लिए पशु था - इस प्रकार उस अविनाशी हिरण्याक्ष ने भी अपने पक्ष से यज्ञ किया।
श्लोक 9 (skanda.8.84.9)
तस्मिँस्तदा महायज्ञे वर्तमाने महाभये । इन्द्रः समासदद्दैत्यं हिरण्याक्षं महाबलम् ।
tasmi~stadā mahāyajñe vartamāne mahābhaye | indraḥ samāsadaddaityaṁ hiraṇyākṣaṁ mahābalam |
उस महाभयंकर महायज्ञ के चलते हुए, इन्द्र महाबली दैत्य हिरण्याक्ष से भिड़ गया।
श्लोक 10 (skanda.8.84.10)
वायुरभ्याययौ तूर्णं विप्रचित्तिं महाबलः । सक्तोभूत् संवरेणांशो बलेन भग एव च ।
vāyurabhyāyayau tūrṇaṁ vipracittiṁ mahābalaḥ | saktobhūt saṁvareṇāṁśo balena bhaga eva ca |
महाबली वायु शीघ्रता से विप्रचित्ति के पास आया; अंश सम्बर से भिड़ गया, तथा भग बल से।
श्लोक 11 (skanda.8.84.11)
विरोचनेन पूषा च मित्रो बलिमथासजत् । बाणेन वरुणः सार्धमन्धकेन यमस्सह ।
virocanena pūṣā ca mitro balimathāsajat | bāṇena varuṇaḥ sārdhamandhakena yamassaha |
पूषा विरोचन से, तथा मित्र बलि से भिड़ गया; वरुण बाण के साथ, और यम अन्धक के साथ,
श्लोक 12 (skanda.8.84.12)
जयन्तेनेल्वलः सार्धं मयेन सह चन्द्रमाः । अहिर्बुध्न्येन राहुश्च कापाली शतकेतुना ।
jayantenelvalaḥ sārdhaṁ mayena saha candramāḥ | ahirbudhnyena rāhuśca kāpālī śataketunā |
इल्वल जयन्त के साथ, चन्द्रमा मय के साथ, राहु अहिर्बुध्न्य के साथ, तथा कापालि शतकेतु के साथ,
श्लोक 13 (skanda.8.84.13)
अजैकपात् कालनेमिं ज्वरः कार्तस्वनेन च । प्रह्लादेनार्यमा सार्धमनुह्लादेन वै धरः ।
ajaikapāt kālanemiṁ jvaraḥ kārtasvanena ca | prahlādenāryamā sārdhamanuhlādena vai dharaḥ |
अजैकपाद कालनेमि के साथ, ज्वर कार्तस्वन के साथ, अर्यमा प्रह्लाद के साथ, तथा धर अनुह्लाद के साथ,
श्लोक 14 (skanda.8.84.14)
ध्रुवो ह्रदेन संसक्तो ह्यन्ये चान्यैर्महाबलाः । हिरण्याक्षस्तदेन्द्रस्य दृढमायम्य कार्मुकम् ।
dhruvo hradena saṁsakto hyanye cānyairmahābalāḥ | hiraṇyākṣastadendrasya dṛḍhamāyamya kārmukam |
ध्रुव ह्रद से भिड़ गया, और अन्य महाबली अन्य-अन्य से भिड़ गये। तब हिरण्याक्ष ने इन्द्र के विरुद्ध अपना धनुष दृढ़तापूर्वक चढ़ाकर,
श्लोक 15 (skanda.8.84.15)
विव्याध गजमेकेन कुम्भदेशे महाबलः । देवेन्द्रं पञ्चभिर्बाणैर्जत्रुदेशे समाहनत् । षड्भिर्ललाटे विव्याध गजं भूयश्च सप्तभिः ।
vivyādha gajamekena kumbhadeśe mahābalaḥ | devendraṁ pañcabhirbāṇairjatrudeśe samāhanat | ṣaḍbhirlalāṭe vivyādha gajaṁ bhūyaśca saptabhiḥ |
उस महाबली ने एक ही बाण से हाथी को कुम्भस्थल में बींध दिया, तथा देवेन्द्र को पाँच बाणों से कन्धे के पास आहत किया; फिर हाथी को छः बाणों से ललाट में तथा पुनः सात बाणों से बींध दिया।
श्लोक 16 (skanda.8.84.16)
स गजस्तैः शरैर्भिन्नः क्षरन् रुधिरमाबभौ । गैरिकाम्बुपरिस्रावी श्वेतः पर्वतराडिव ।
sa gajastaiḥ śarairbhinnaḥ kṣaran rudhiramābabhau | gairikāmbuparisrāvī śvetaḥ parvatarāḍiva |
उन बाणों से बिंधा हुआ वह हाथी, रक्त बहाता हुआ, ऐसे शोभित हो रहा था, जैसे गेरू-मिश्रित जल बहाता हुआ श्वेत पर्वतराज।
श्लोक 17 (skanda.8.84.17)
तस्य क्रुद्धस्तदा शक्रो वज्रेण शतपर्वणा । प्रहारमददद् व्यास गण्डदेशे ननाद च ।
tasya kruddhastadā śakro vajreṇa śataparvaṇā | prahāramadadad vyāsa gaṇḍadeśe nanāda ca |
हे व्यास! तब क्रुद्ध होकर इन्द्र ने अपने शतपर्वा वज्र से उसके गाल पर प्रहार किया और गर्जना की।
श्लोक 18 (skanda.8.84.18)
स वज्रघातं दैत्येन्द्रः पुष्पघातमिवोर्जितम् । अचिन्तयानः सगजं शक्रमेवार्दयद्बली ।
sa vajraghātaṁ daityendraḥ puṣpaghātamivorjitam | acintayānaḥ sagajaṁ śakramevārdayadbalī |
उस बलशाली दैत्येन्द्र ने उस प्रबल वज्र-प्रहार को मानो पुष्प-प्रहार के समान बिना चिन्ता किये, हाथी सहित इन्द्र को ही पीड़ित करना जारी रखा।
श्लोक 19 (skanda.8.84.19)
गजोपि तेन निर्भिन्नः क्षरद्रुधिर आबभौ । हविषेवानलः क्रोधात् प्रजज्वाल जगर्ज च ।
gajopi tena nirbhinnaḥ kṣaradrudhira ābabhau | haviṣevānalaḥ krodhāt prajajvāla jagarja ca |
उससे बिंधा हुआ हाथी भी, रक्त बहाता हुआ, हवि से बढ़ती हुई अग्नि के समान क्रोध से प्रज्वलित हो उठा और गरजा।
श्लोक 20 (skanda.8.84.20)
स वेगं महदास्थाय अंकुशेन च चोदितः । हिरण्याक्षरथं तूर्णं जग्राह रथकूबरे ।
sa vegaṁ mahadāsthāya aṁkuśena ca coditaḥ | hiraṇyākṣarathaṁ tūrṇaṁ jagrāha rathakūbare |
अंकुश से प्रेरित होकर वह अत्यन्त वेगपूर्वक बढ़ा, और हिरण्याक्ष के रथ को शीघ्र ही उसके ईषादण्ड से पकड़ लिया।
श्लोक 21 (skanda.8.84.21)
गृहीत्वा स तमुत्क्षिप्य चिक्षेप गजसत्तमः । मेरुशृंगमिवोत्क्षिप्य समेघं श्वेतकुण्डली ।
gṛhītvā sa tamutkṣipya cikṣepa gajasattamaḥ | meruśṛṁgamivotkṣipya sameghaṁ śvetakuṇḍalī |
उसे पकड़कर उस श्रेष्ठ हाथी ने उसे ऊपर उठाकर फेंक दिया, जैसे मेघयुक्त मेरु-शिखर को कोई श्वेत कुण्डलधारी उठाकर फेंक दे।
श्लोक 22 (skanda.8.84.22)
गत्वा मुहूर्त्तं वेगेन पतन् रथवरो बभौ । स्वर्भानुना हतः पूर्वं सरथो भास्करो यथा ।
gatvā muhūrttaṁ vegena patan rathavaro babhau | svarbhānunā hataḥ pūrvaṁ saratho bhāskaro yathā |
क्षणभर वेगपूर्वक उड़कर गिरता हुआ वह उत्तम रथ ऐसे शोभित हुआ, जैसे पूर्वकाल में स्वर्भानु (राहु) द्वारा आहत रथ सहित सूर्य।
श्लोक 23 (skanda.8.84.23)
तत्र सम्यक् स्थितं भूमौ हिरण्याक्षरथं पुनः । आजगाम गजस्तूर्णं जिघृक्षुर्मुनिसत्तम ।
tatra samyak sthitaṁ bhūmau hiraṇyākṣarathaṁ punaḥ | ājagāma gajastūrṇaṁ jighṛkṣurmunisattama |
हे मुनिसत्तम! भूमि पर सीधा पड़े हुए हिरण्याक्ष के उस रथ को पुनः पकड़ने की इच्छा से वह हाथी शीघ्र वहाँ पहुँचा।
श्लोक 24 (skanda.8.84.24)
प्रसारितकरो दन्ती स्तब्धदृक्कर्णबालधिः । अभ्यधावत वेगेन गरुत्मानिव पन्नगम् ।
prasāritakaro dantī stabdhadṛkkarṇabāladhiḥ | abhyadhāvata vegena garutmāniva pannagam |
अपनी सूँड़ फैलाये, नेत्र, कान तथा पूँछ स्तब्ध किये हुए वह गजराज वेगपूर्वक इस प्रकार दौड़ा, जैसे गरुड़ किसी सर्प पर झपटता है।
श्लोक 25 (skanda.8.84.25)
तमापतन्तं वेगेन समीक्ष्यासुरसत्तमः । बभार स तदा व्योम्नि गरुत्मानिव पन्नगम् ।
tamāpatantaṁ vegena samīkṣyāsurasattamaḥ | babhāra sa tadā vyomni garutmāniva pannagam |
उसे वेगपूर्वक झपटते देखकर उस श्रेष्ठ असुर ने उस समय आकाश में उसे ऐसे पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ता है।
श्लोक 26 (skanda.8.84.26)
तं तु मण्डलमावृत्तं गजोप्यनु तथैव हि । स्तब्धदृक्कर्णलांगूलः प्रसारितकरोभ्रमत् ।
taṁ tu maṇḍalamāvṛttaṁ gajopyanu tathaiva hi | stabdhadṛkkarṇalāṁgūlaḥ prasāritakarobhramat |
जब वह मण्डलाकार घूमने लगा, तब हाथी भी उसी प्रकार उसके पीछे-पीछे, नेत्र, कान तथा पूँछ स्तब्ध किये, सूँड़ फैलाये, चक्कर काटने लगा।
श्लोक 27 (skanda.8.84.27)
हाहाकृतमभूत् सर्वं साधुसाध्विति चोभयोः । बलयोर्देवदैत्यानां मूकवच्चाभवत्पुनः ।
hāhākṛtamabhūt sarvaṁ sādhusādhviti cobhayoḥ | balayordevadaityānāṁ mūkavaccābhavatpunaḥ |
चारों ओर हाहाकार उठा, तथा दोनों सेनाओं - देवताओं और दैत्यों की - से 'साधु-साधु' की ध्वनि उठी; फिर वह सब मानो मूक होकर शान्त हो गया।
श्लोक 28 (skanda.8.84.28)
साधु दैत्येति चान्येषां हिरण्याक्षेति चैव हि । स गजस्कन्धगो भाति भ्रमन् सुरगणेश्वरः ।
sādhu daityeti cānyeṣāṁ hiraṇyākṣeti caiva hi | sa gajaskandhago bhāti bhraman suragaṇeśvaraḥ |
कुछ 'साधु दैत्य!' और कुछ 'साधु हिरण्याक्ष!' पुकारने लगे; हाथी के कन्धे पर बैठे हुए वे देवगणेश्वर (इन्द्र) चक्कर काटते हुए ऐसे शोभित हो रहे थे,
श्लोक 29 (skanda.8.84.29)
सपक्ष इव शैलेन्द्रे महिषोग्रं समास्थितः । हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रो भ्रमित्वा त्रिर्महासुरः ।
sapakṣa iva śailendre mahiṣograṁ samāsthitaḥ | hiraṇyākṣaśca daityendro bhramitvā trirmahāsuraḥ |
जैसे किसी पंखधारी पर्वत पर भयंकर भैंसा स्थिर हो। और वह महासुर दैत्येन्द्र हिरण्याक्ष तीन बार घूमकर,
श्लोक 30 (skanda.8.84.30)
गजं द्रुतमिवोत्सार्य रथे तस्थौ महाबलः । युध्यमानस्तु दैत्येन्द्रो दृढमायम्य कार्मुकम् ।
gajaṁ drutamivotsārya rathe tasthau mahābalaḥ | yudhyamānastu daityendro dṛḍhamāyamya kārmukam |
हाथी को शीघ्रता से हटाकर उस महाबली ने अपने रथ पर स्थान ग्रहण किया; और युद्ध करते हुए उस दैत्येन्द्र ने अपना धनुष दृढ़तापूर्वक चढ़ाकर,
श्लोक 31 (skanda.8.84.31)
देवराजं शरैस्तीक्ष्णैः समन्तात् पर्यवारयत् । स तैः शरैस्तदा व्यास मर्मसंधिषु ताडितः ।
devarājaṁ śaraistīkṣṇaiḥ samantāt paryavārayat | sa taiḥ śaraistadā vyāsa marmasaṁdhiṣu tāḍitaḥ |
देवराज इन्द्र को तीक्ष्ण बाणों से चारों ओर से घेर लिया। हे व्यास! उन बाणों से अपने मर्मस्थलों और जोड़ों में आहत होकर इन्द्र ने,
श्लोक 32 (skanda.8.84.32)
वज्रेण शतधा तस्य कवचं प्रव्यशातयत् । हयानां चैव योक्त्राणि सर्वाण्येव त्वकृन्तत ।
vajreṇa śatadhā tasya kavacaṁ pravyaśātayat | hayānāṁ caiva yoktrāṇi sarvāṇyeva tvakṛntata |
अपने वज्र से उसके कवच को सौ टुकड़ों में शतशः बिखेर दिया, और उसके घोड़ों की सभी रस्सियों को भी काट डाला।
श्लोक 33 (skanda.8.84.33)
रश्मीँश्च सूतहस्तस्थान् प्रतोदं चैव काञ्चनम् । चिच्छेद वहुधा शक्रः प्रहसन्निव वीर्यवान् ।
raśmī~śca sūtahastasthān pratodaṁ caiva kāñcanam | ciccheda vahudhā śakraḥ prahasanniva vīryavān |
सारथी के हाथ में स्थित लगामों को तथा स्वर्णिम चाबुक को भी उस पराक्रमी इन्द्र ने मानो हँसते हुए अनेक टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 34 (skanda.8.84.34)
छिन्नयोक्त्रास्ततोस्याश्वाः स्वछन्दाः संप्रतस्थिरे । हिरण्याक्षोप्यवप्लुत्य गदया समताडयत् ।
chinnayoktrāstatosyāśvāḥ svachandāḥ saṁpratasthire | hiraṇyākṣopyavaplutya gadayā samatāḍayat |
रस्सियाँ कटने पर उसके घोड़े स्वच्छन्द होकर भाग खड़े हुए। हिरण्याक्ष भी रथ से कूदकर गदा से प्रहार करने लगा -
श्लोक 35 (skanda.8.84.35)
गजं सुरपतिं चैव खङ्गेन स महासुरः । स गजस्तेन घातेन त्यक्त्वा तं रथसत्तमम् ।
gajaṁ surapatiṁ caiva khaṅgena sa mahāsuraḥ | sa gajastena ghātena tyaktvā taṁ rathasattamam |
हाथी को, तथा तलवार से देवराज को भी वह महासुर मारने लगा। उस प्रहार से वह हाथी उस उत्तम रथ को छोड़कर,
श्लोक 36 (skanda.8.84.36)
शकृन्मूत्रं सृजन् व्यास प्राद्रवद् बलवांस्तदा । मर्दयानो नदँश्चैव भ्रामयन् सुरसत्तमम् ।
śakṛnmūtraṁ sṛjan vyāsa prādravad balavāṁstadā | mardayāno nada~ścaiva bhrāmayan surasattamam |
हे व्यास! भयभीत होकर मल-मूत्र त्यागते हुए वह बलशाली हाथी उस समय भाग खड़ा हुआ, कुचलता, गरजता तथा देवश्रेष्ठ इन्द्र को इधर-उधर घुमाता हुआ।
श्लोक 37 (skanda.8.84.37)
असिनाभ्याहतश्चापि देवराजो महाबलः । नार्त्तिमानभवत् संख्ये न ।
asinābhyāhataścāpi devarājo mahābalaḥ | nārttimānabhavat saṁkhye na |
तलवार से भी आहत होने पर महाबली देवराज युद्ध में विचलित नहीं हुए, न ही... (इस श्लोक की शेष पंक्ति मूल पाण्डुलिपि में अस्पष्ट है)।
श्लोक 38 (skanda.8.84.38)
स दानवेन्द्रप्रहतेन दन्तिना महाबलः प्रस्रुतदानगन्धिना । अमृष्यमाणः प्रययौ प्रमाथिना हिरण्यनेत्रेण युधि प्रमाथितः ।
sa dānavendraprahatena dantinā mahābalaḥ prasrutadānagandhinā | amṛṣyamāṇaḥ prayayau pramāthinā hiraṇyanetreṇa yudhi pramāthitaḥ |
वह महाबली इन्द्र, दानवेन्द्र द्वारा आहत तथा मदजल की गन्ध बिखेरते हुए अपने हाथी पर सवार होकर, उस उत्पीड़क स्वर्णनेत्र हिरण्याक्ष द्वारा युद्ध में सताया जाकर, अत्यन्त असहिष्णु होकर आगे बढ़ा।