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अम्बिका खण्ड · अध्याय 85

युद्धम्

अध्याय 84अध्याय-सूचीअध्याय 86

श्लोक 1 (skanda.8.85.1)

सनत्कुमार उवाच । विप्रचित्तिर्महामायो वायुं बहुभिराशुगैः । अवाकिरद्दनुसुतो वृष्ट्येव हि जलप्रदः ।

sanatkumāra uvāca | vipracittirmahāmāyo vāyuṁ bahubhirāśugaiḥ | avākiraddanusuto vṛṣṭyeva hi jalapradaḥ |

सनत्कुमार ने कहा - महामायावी दनुपुत्र विप्रचित्ति ने वायु को अनेक तीव्रगामी बाणों से ऐसे ढक दिया, जैसे जलवर्षक मेघ वर्षा से ढक देता है।

श्लोक 2 (skanda.8.85.2)

संछादयन् तदा व्यास मण्डलीकृतकार्मुकः । इषूँश्चिक्षेप तीक्ष्णाग्राञ्छलभान् सागरो यथा ।

saṁchādayan tadā vyāsa maṇḍalīkṛtakārmukaḥ | iṣū~ścikṣepa tīkṣṇāgrāñchalabhān sāgaro yathā |

हे व्यास! उस समय अपने धनुष को मण्डलाकार करके, वायु को ढकते हुए उसने तीक्ष्ण अग्रभाग वाले बाण इस प्रकार फेंके, जैसे समुद्र टिड्डियों के झुण्ड को उगलता है।

श्लोक 3 (skanda.8.85.3)

धारा बलाहकाद्यद्वज्ज्योत्स्नाश्चन्द्रमसो यथा । रश्मयो भास्कराद्यद्वद्धिमं हिमगिरेरिव ।

dhārā balāhakādyadvajjyotsnāścandramaso yathā | raśmayo bhāskarādyadvaddhimaṁ himagireriva |

जैसे मेघ से जलधारा, जैसे चन्द्रमा से चाँदनी, जैसे सूर्य से किरणें, तथा जैसे हिमगिरि से हिम झरता है,

श्लोक 4 (skanda.8.85.4)

तथा ते शरसंघाता धनुषो मण्डलीकृतात् । विप्रचित्तेर्विनिष्पेतु ।

tathā te śarasaṁghātā dhanuṣo maṇḍalīkṛtāt | vipracitterviniṣpetu |

उसी प्रकार विप्रचित्ति के मण्डलाकार धनुष से वे बाणों के समूह निकल पड़े... (इस श्लोक का शेष उत्तरार्ध मूल पाण्डुलिपि में सुरक्षित नहीं है)।

श्लोक 5 (skanda.8.85.5)

भास्करं छादयानाँस्ताञ्छरानापततो बली । भगवाननिलो वेगादसुरेषु न्यपातयत् ।

bhāskaraṁ chādayānā~stāñcharānāpatato balī | bhagavānanilo vegādasureṣu nyapātayat |

सूर्य को ढक देने वाले उन झपटते बाणों को उस बलशाली एवं तेजस्वी वायु ने वेगपूर्वक असुरों में ही गिरा दिया।

श्लोक 6 (skanda.8.85.6)

तैः शरैस्तस्य दैत्यस्य दानवा बहवो हताः । छिन्नाश्च निष्टनन्त्युर्व्यां निरयस्था यथा नराः ।

taiḥ śaraistasya daityasya dānavā bahavo hatāḥ | chinnāśca niṣṭanantyurvyāṁ nirayasthā yathā narāḥ |

उस दैत्य के उन्हीं बाणों से अनेक दानव मारे गये; कटे हुए वे भूमि पर वैसे कराह रहे थे, जैसे नरकवासी मनुष्य कराहते हैं।

श्लोक 7 (skanda.8.85.7)

तांस्तथा निहतान् दृष्ट्वा विप्रचित्तिर्महासुरः । अवप्लुत्य रथाद् वायोर्बाहुयुद्धमयुध्यत ।

tāṁstathā nihatān dṛṣṭvā vipracittirmahāsuraḥ | avaplutya rathād vāyorbāhuyuddhamayudhyata |

उन्हें इस प्रकार मारा गया देखकर महासुर विप्रचित्ति रथ से कूदकर वायु के साथ बाहुयुद्ध करने लगा।

श्लोक 8 (skanda.8.85.8)

तस्य युद्धप्रसक्तस्य वायोर्बलमवर्धत । अमन्यन्त सुराश्चैव निगृहीतं दनोः सुतम् ।

tasya yuddhaprasaktasya vāyorbalamavardhata | amanyanta surāścaiva nigṛhītaṁ danoḥ sutam |

युद्ध में लगे हुए वायु का बल बढ़ने लगा, और देवताओं ने यह मान लिया कि दनु का पुत्र वश में कर लिया गया है।

श्लोक 9 (skanda.8.85.9)

अथोत्पत्य तदा वेगाद् गदया पवनं दृढम् । अताडयत् हिरण्याक्षो गण्डदेशे महाबलः ।

athotpatya tadā vegād gadayā pavanaṁ dṛḍham | atāḍayat hiraṇyākṣo gaṇḍadeśe mahābalaḥ |

तब महाबली हिरण्याक्ष वेगपूर्वक उछलकर गदा से वायु के गाल पर दृढ़ता से प्रहार करने लगा।

श्लोक 10 (skanda.8.85.10)

स तेन सुप्रहारेण हिरण्याक्षस्य । न किञ्चिच्च तत एव स दानवम् ।

sa tena suprahāreṇa hiraṇyākṣasya | na kiñcicca tata eva sa dānavam |

उस भारी प्रहार से हिरण्याक्ष के... (इस श्लोक के दोनों पदों का अधिकांश भाग मूल पाण्डुलिपि में अस्पष्ट है) ...उस दानव को कुछ भी नहीं [हुआ]।

श्लोक 11 (skanda.8.85.11)

परित्यज्य ययौ तूर्णमन्यदेशं महाबलः । अंशसंवरयोश्चापि सुमहन्मुनिसत्तम ।

parityajya yayau tūrṇamanyadeśaṁ mahābalaḥ | aṁśasaṁvarayoścāpi sumahanmunisattama |

वह महाबली उसे छोड़कर शीघ्र ही दूसरी दिशा में चला गया। हे मुनिसत्तम! उधर अंश और सम्बर के बीच भी एक अत्यन्त महान,

श्लोक 12 (skanda.8.85.12)

युद्धं समभवद् घोरं द्रष्टॄणां तुष्टिवर्धनम् । अंशोस्यापततस्तूर्णँ संवरस्य महाबलः ।

yuddhaṁ samabhavad ghoraṁ draṣṭṝṇāṁ tuṣṭivardhanam | aṁśosyāpatatastūrṇa~ saṁvarasya mahābalaḥ |

भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो दर्शकों के आनन्द को बढ़ाने वाला था। तब मध्य में वेगपूर्वक झपटते हुए महाबली सम्बर के,

श्लोक 13 (skanda.8.85.13)

दर्शयँल्लाघवं सम्यग् ध्वजं चिच्छेद कांचनम् । धनुश्च पंचधा कृत्वा ह्यान्निन्ये यमक्षयम् ।

darśaya~llāghavaṁ samyag dhvajaṁ ciccheda kāṁcanam | dhanuśca paṁcadhā kṛtvā hyānninye yamakṣayam |

अंश ने अपनी निपुण चपलता दिखाते हुए, उसकी स्वर्णिम ध्वजा को काट डाला, और उसके धनुष को पाँच टुकड़ों में करके, [उसके सारथी को] यमलोक भेज दिया।

श्लोक 14 (skanda.8.85.14)

ततोस्य सारथेः कायाच्छिरो भूमावपातयत् । भूय एनं चतुःषष्ट्या सायकानामविध्यत ।

tatosya sāratheḥ kāyācchiro bhūmāvapātayat | bhūya enaṁ catuḥṣaṣṭyā sāyakānāmavidhyata |

फिर उसने उसके सारथी के सिर को शरीर से अलग करके भूमि पर गिरा दिया, और फिर से उसे (सम्बर को) चौंसठ बाणों से बींध डाला।

श्लोक 15 (skanda.8.85.15)

स मायां तामसीं घोरां समाविश्याशु दानवः । उपलैश्चापि वज्रैश्च गदाभिः परिघैरपि ।

sa māyāṁ tāmasīṁ ghorāṁ samāviśyāśu dānavaḥ | upalaiścāpi vajraiśca gadābhiḥ parighairapi |

उस दानव ने शीघ्र ही एक भयंकर, तामसी माया का आश्रय लेकर, पत्थरों, वज्रों, गदाओं तथा परिघों से भी,

श्लोक 16 (skanda.8.85.16)

कंकटैः करवालैश्च भिन्दिपालैरयोघनैः । जघान सरथं देवमंशं व्यास रणाजिरे ।

kaṁkaṭaiḥ karavālaiśca bhindipālairayoghanaiḥ | jaghāna sarathaṁ devamaṁśaṁ vyāsa raṇājire |

कवचों, तलवारों, भिन्दिपालों तथा लौह-मुद्गरों से, हे व्यास! उस रणभूमि में रथ सहित देवता अंश पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 17 (skanda.8.85.17)

स संदृश्य समन्ताच्च पात्यमानं महाभयम् । अंशो मूढो रणं त्यक्त्वा प्रययावन्यतो भयात् ।

sa saṁdṛśya samantācca pātyamānaṁ mahābhayam | aṁśo mūḍho raṇaṁ tyaktvā prayayāvanyato bhayāt |

चारों ओर से गिरते हुए उस महाभयंकर प्रहार को देखकर अंश मोहित होकर युद्ध छोड़कर भय के कारण दूसरी ओर चला गया।

श्लोक 18 (skanda.8.85.18)

भगो बलं समासाद्य रथेनाम्बुदनादिना । तिष्ठतिष्ठेति तं दैत्यमुक्त्वा विव्याध पत्रिणा ।

bhago balaṁ samāsādya rathenāmbudanādinā | tiṣṭhatiṣṭheti taṁ daityamuktvā vivyādha patriṇā |

भग ने मेघ के समान गरजते हुए अपने रथ पर सवार होकर बल के पास पहुँचकर, 'ठहरो, ठहरो' कहकर उस दैत्य को पंखयुक्त बाण से बींध दिया।

श्लोक 19 (skanda.8.85.19)

स सायकं समादाय बलोसुरमहारथः । भगं हस्ततले तूर्णँ निर्बिभेद ररास च ।

sa sāyakaṁ samādāya balosuramahārathaḥ | bhagaṁ hastatale tūrṇa~ nirbibheda rarāsa ca |

उस असुर महारथी बल ने भी बाण उठाकर भग की हथेली को शीघ्र ही बींध डाला और गर्जना की।

श्लोक 20 (skanda.8.85.20)

तत एनं समासाद्य मायया प्रहसन्निव । आहत्योरसि पादेन स्वरथं पुनराव्रजत् ।

tata enaṁ samāsādya māyayā prahasanniva | āhatyorasi pādena svarathaṁ punarāvrajat |

फिर उसके पास पहुँचकर, माया से मानो हँसते हुए, उसने अपने पैर से उसकी छाती पर प्रहार किया और पुनः अपने रथ पर लौट गया।

श्लोक 21 (skanda.8.85.21)

तस्य तल्लाघवं शौर्यममूढत्वं सवीर्यताम् । दृष्ट्वा देवासुराः सर्वे साधुसाध्वित्यपूजयन् ।

tasya tallāghavaṁ śauryamamūḍhatvaṁ savīryatām | dṛṣṭvā devāsurāḥ sarve sādhusādhvityapūjayan |

उसकी उस निपुणता, शौर्य, अमूढ़ता तथा पराक्रम को देखकर सभी देवता और असुर 'साधु-साधु' कहकर उसकी प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 22 (skanda.8.85.22)

भगोपि लज्जयाविष्टः पदा तेनाहतस्तदा । मुशलेन ह्याश्वांस्तस्य रथञ्चैव ससारथिम् ।

bhagopi lajjayāviṣṭaḥ padā tenāhatastadā | muśalena hyāśvāṁstasya rathañcaiva sasārathim |

उस पैर से आहत होकर लज्जा से भरे हुए भग ने भी अपने मूसल से उसके घोड़ों, रथ तथा सारथी को,

श्लोक 23 (skanda.8.85.23)

नामशेषाँस्तदा कृत्वा विननाद यथाम्बुदः । स्यन्दनं तु बलस्त्यक्त्वा चूर्णितं सहयं तदा ।

nāmaśeṣā~stadā kṛtvā vinanāda yathāmbudaḥ | syandanaṁ tu balastyaktvā cūrṇitaṁ sahayaṁ tadā |

मात्र नामशेष बनाकर मेघ के समान गर्जना की। बल भी अपने घोड़ों सहित चूर-चूर हुए रथ को छोड़कर,

श्लोक 24 (skanda.8.85.24)

भगस्य कार्मुक दिव्यं भूमिस्थश्चाच्छिनद्बली । तत एनं पृषत्केन ललाटे समताडयत् ।

bhagasya kārmuka divyaṁ bhūmisthaścācchinadbalī | tata enaṁ pṛṣatkena lalāṭe samatāḍayat |

भूमि पर खड़े होकर ही उस बलशाली ने भग के दिव्य धनुष को काट डाला, और फिर उसे बाण से ललाट में मारा।

श्लोक 25 (skanda.8.85.25)

हस्तयोश्च पुनर्व्यास शरैर्विव्याध सप्तभिः । गृह्णतः कार्मुकं चास्य पृष्ठदेशे बलोच्छिनत् ।

hastayośca punarvyāsa śarairvivyādha saptabhiḥ | gṛhṇataḥ kārmukaṁ cāsya pṛṣṭhadeśe balocchinat |

हे व्यास! फिर उसने उसके दोनों हाथों को सात बाणों से बींध दिया, और जैसे ही वह दूसरा धनुष उठाने लगा, बल ने उसे पीछे से ही काट डाला।

श्लोक 26 (skanda.8.85.26)

पुनश्चान्यत् पुनश्चान्यत् स जग्राह ततो भगः । मुशलं कालमूलं तत् सर्वघात्यनलप्रभम् ।

punaścānyat punaścānyat sa jagrāha tato bhagaḥ | muśalaṁ kālamūlaṁ tat sarvaghātyanalaprabham |

बार-बार वह दूसरा-दूसरा धनुष उठाता रहा; तब भग ने काल में जिसकी जड़ थी, सर्वसंहारक, अग्नि के समान तेजस्वी वह मूसल उठाया।

श्लोक 27 (skanda.8.85.27)

हतोसीति तमुक्त्वैव चिक्षेप बलनाशनम् । तमापतन्तं मुशलं बलो दानवपुंगवः ।

hatosīti tamuktvaiva cikṣepa balanāśanam | tamāpatantaṁ muśalaṁ balo dānavapuṁgavaḥ |

और 'तू मारा गया' ऐसा कहकर उस बल-विनाशक मूसल को फेंक दिया। झपटते हुए उस मूसल को दानवश्रेष्ठ बल ने,

श्लोक 28 (skanda.8.85.28)

शरैर्विष्टम्भयामास नन्दी मृत्युं यथात्मनः । अथ प्रतिह्तं मत्वा मुशलं सोसुरः पुनः ।

śarairviṣṭambhayāmāsa nandī mṛtyuṁ yathātmanaḥ | atha pratihtaṁ matvā muśalaṁ sosuraḥ punaḥ |

अपने बाणों से रोक दिया, जैसे नन्दी अपनी मृत्यु को रोक देते हैं। फिर अपने मूसल को रोका गया मानकर वह असुर (भग) पुनः,

श्लोक 29 (skanda.8.85.29)

धनुष्कोटया भगं मूर्ध्नि बलवान् समताडयत् । रथश्च सह सूतेन गृहीत्वा कूबरे पुनः ।

dhanuṣkoṭayā bhagaṁ mūrdhni balavān samatāḍayat | rathaśca saha sūtena gṛhītvā kūbare punaḥ |

धनुष के अग्रभाग से बलशाली बल के सिर पर प्रहार करने लगा; फिर उसने रथ को सारथी सहित उसके ईषादण्ड से पकड़कर,

श्लोक 30 (skanda.8.85.30)

चिक्षेप दक्षिणस्यां स वायुर्गिरिमिवार्णवे । पूषा विरोचनं देवः शरैर्बहुभिराशुगैः ।

cikṣepa dakṣiṇasyāṁ sa vāyurgirimivārṇave | pūṣā virocanaṁ devaḥ śarairbahubhirāśugaiḥ |

दक्षिण दिशा में फेंक दिया, जैसे वायु किसी पर्वत को समुद्र में फेंक दे। इधर देव पूषा ने विरोचन को अनेक तीव्रगामी बाणों से,

श्लोक 31 (skanda.8.85.31)

विव्याध समरे क्रुद्धः स च तं प्रत्यविध्यत । सप्तभिर्निशितैर्बाणैरिषुभिर्मर्मभेदिभिः ।

vivyādha samare kruddhaḥ sa ca taṁ pratyavidhyata | saptabhirniśitairbāṇairiṣubhirmarmabhedibhiḥ |

युद्ध में क्रोधपूर्वक बींध दिया, और उसने भी उसे मर्मभेदी सात तीक्ष्ण बाणों से प्रत्युत्तर में बींध दिया।

श्लोक 32 (skanda.8.85.32)

क्रुद्धः पूषा तथाकृष्य बलवान् कार्मुकं महत् ।

kruddhaḥ pūṣā tathākṛṣya balavān kārmukaṁ mahat |

क्रुद्ध होकर बलशाली पूषा ने उसी प्रकार अपने विशाल धनुष को खींचकर... (इस श्लोक की शेष पंक्ति मूल पाण्डुलिपि में सर्वथा नष्ट है)।

श्लोक 33 (skanda.8.85.33)

जीवितान्तकरं घोरं युगान्तादित्यवर्चसम् । मुमोच रिपुमुद्दिश्य हृतस्त्वमिति चोचिवान् ।

jīvitāntakaraṁ ghoraṁ yugāntādityavarcasam | mumoca ripumuddiśya hṛtastvamiti cocivān |

उसने प्रलयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी, भयंकर, जीवन का अन्त करने वाला वह अस्त्र शत्रु की ओर लक्ष्य करके छोड़ा, और कहा - 'तू हरा गया!'

श्लोक 34 (skanda.8.85.34)

तमापतन्तं बहुधा नदन्तं दिशश्च सर्वा अवभासयन्तम् । उल्काः स्फुलिंगाश्च समुद्गिरन्तं ययौ रिपून् वेगवदुत्पतन्तम् ।

tamāpatantaṁ bahudhā nadantaṁ diśaśca sarvā avabhāsayantam | ulkāḥ sphuliṁgāśca samudgirantaṁ yayau ripūn vegavadutpatantam |

बार-बार गर्जन करता हुआ, सभी दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ, उल्काएँ तथा चिनगारियाँ उगलता हुआ वह अस्त्र वेगपूर्वक उछलकर शत्रु की ओर बढ़ा।

श्लोक 35 (skanda.8.85.35)

स चाप्यवप्लुत्य महासुरेन्द्रो दृष्ट्वा तमादित्यसमानभासम् । मत्वाविषह्यं स्वरथं विहाय वियत् समाविश्य ततोवतस्थे ।

sa cāpyavaplutya mahāsurendro dṛṣṭvā tamādityasamānabhāsam | matvāviṣahyaṁ svarathaṁ vihāya viyat samāviśya tatovatasthe |

उस सूर्य के समान तेजस्वी अस्त्र को देखकर वह महासुरेन्द्र (विरोचन) भी उछल पड़ा, और उसे असह्य मानकर अपना रथ त्यागकर आकाश में प्रविष्ट होकर वहीं खड़ा हो गया।

श्लोक 36 (skanda.8.85.36)

तत्तस्य सूतञ्च ह्योपपन्नं महारथं सर्वगमस्त्रवर्यम् । कृत्वाशु भस्मेव यथा हुताशो जगाम खं दिव्यमदृश्यरूपम् ।

tattasya sūtañca hyopapannaṁ mahārathaṁ sarvagamastravaryam | kṛtvāśu bhasmeva yathā hutāśo jagāma khaṁ divyamadṛśyarūpam |

वह अस्त्र उसके सारथी और उसके उस उपयुक्त, सर्वत्रगामी, श्रेष्ठ महारथ को अग्नि के समान शीघ्र भस्म करके, अदृश्य रूप धारण कर दिव्य आकाश में चला गया।

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