अम्बिका खण्ड · अध्याय 86
युद्धम्
श्लोक 1 (skanda.8.86.1)
सनत्कुमार उवाच । ततो दग्धरथः खस्थो दानवः स विरोचनः । वेगेनासिं विनिष्कृष्य स पूष्णो निशिताञ्छरान् ।
sanatkumāra uvāca | tato dagdharathaḥ khastho dānavaḥ sa virocanaḥ | vegenāsiṁ viniṣkṛṣya sa pūṣṇo niśitāñcharān |
सनत्कुमार ने कहा - तब रथ के जल जाने पर आकाश में स्थित उस दानव विरोचन ने वेगपूर्वक तलवार खींचकर पूषा के तीक्ष्ण बाणों को,
श्लोक 2 (skanda.8.86.2)
चिच्छेदापततः सर्वान् कार्मुकं चैव वीर्यवान् । तथा चैनं पुनर्मूध्नि खङ्गेन समताडयत् ।
cicchedāpatataḥ sarvān kārmukaṁ caiva vīryavān | tathā cainaṁ punarmūdhni khaṅgena samatāḍayat |
झपटते हुए सभी को काट डाला, तथा उसके धनुष को भी। फिर उस पराक्रमी ने उसे तलवार से पुनः सिर पर मारा।
श्लोक 3 (skanda.8.86.3)
स तेन सुप्रहारेण क्षरद्रुधिरमस्तकः । रथोपस्थे पपाताशु वृत्तोत्सव इव ध्वजः ।
sa tena suprahāreṇa kṣaradrudhiramastakaḥ | rathopasthe papātāśu vṛttotsava iva dhvajaḥ |
उस भारी प्रहार से सिर से रक्त बहाता हुआ वह तुरन्त रथ के आसन पर वैसे गिर पड़ा, जैसे उत्सव समाप्त होने पर ध्वजा गिर पड़ती है।
श्लोक 4 (skanda.8.86.4)
पतितं तं स दैत्येन्द्रः प्रगृह्याशु महाबलः । चिक्षेप देवराजानं नर्दमानः पयोदवत् ।
patitaṁ taṁ sa daityendraḥ pragṛhyāśu mahābalaḥ | cikṣepa devarājānaṁ nardamānaḥ payodavat |
गिरे हुए उसे उस महाबली दैत्येन्द्र (पूषा को मारने वाले दैत्य के पक्ष के किसी योद्धा) ने तुरन्त पकड़कर, मेघ के समान गरजते हुए देवराज की ओर फेंक दिया।
श्लोक 5 (skanda.8.86.5)
बलिं विव्याध मित्रश्च जत्रुदेशे शरैस्त्रिभिः । बलिरेकेन भल्लेन तस्य चिच्छेद कार्मुकम् ।
baliṁ vivyādha mitraśca jatrudeśe śaraistribhiḥ | balirekena bhallena tasya ciccheda kārmukam |
मित्र ने बलि को कन्धे के पास तीन बाणों से बींध दिया; बलि ने एक ही भल्ल बाण से उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 6 (skanda.8.86.6)
अथैनं पुनरन्येन हृदये समताडयत् । स मूढो मृतकल्पश्च रथोपस्थे ससाद ह ।
athainaṁ punaranyena hṛdaye samatāḍayat | sa mūḍho mṛtakalpaśca rathopasthe sasāda ha |
फिर उसने एक और बाण से उसे हृदय में मारा। वह मूर्च्छित होकर मृतक-सा रथ के आसन पर बैठ गया।
श्लोक 7 (skanda.8.86.7)
तं सारथिर्मृत्युभयाद् विषण्णं समुपस्थितम् । अपोवाह तदा व्यास ततो दैत्या विचुक्रुशुः ।
taṁ sārathirmṛtyubhayād viṣaṇṇaṁ samupasthitam | apovāha tadā vyāsa tato daityā vicukruśuḥ |
हे व्यास! मृत्यु के भय से खिन्न उस स्थिति में पड़े हुए उसे सारथी वहाँ से हटा ले गया; तब दैत्यगण जय-जयकार करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.8.86.8)
बाणं विव्याध वरुणः पृषत्कानां शतेन ह । स कार्मुकशतानि स्म पञ्च बाणः प्रतापवान् ।
bāṇaṁ vivyādha varuṇaḥ pṛṣatkānāṁ śatena ha | sa kārmukaśatāni sma pañca bāṇaḥ pratāpavān |
वरुण ने बाण को सौ बाणों से बींध दिया; उस प्रतापी बाण ने पाँच सौ धनुष,
श्लोक 9 (skanda.8.86.9)
आकृष्य युगपत् क्रुद्धः शरांश्चिक्षेप तावतः । तानापतत एवाथ वरुणो लघुह्स्तवान् ।
ākṛṣya yugapat kruddhaḥ śarāṁścikṣepa tāvataḥ | tānāpatata evātha varuṇo laghuhstavān |
क्रोधपूर्वक एक साथ खींचकर उतने ही बाण छोड़ दिये। उन्हें झपटते ही देखकर हलके हाथ वाले वरुण ने,
श्लोक 10 (skanda.8.86.10)
एकैकं पञ्चधा कृत्वा बाणं विव्याध पञ्चभिः । ततोस्य कार्मुकान् सर्वान् वरुणः प्रहसन् बली ।
ekaikaṁ pañcadhā kṛtvā bāṇaṁ vivyādha pañcabhiḥ | tatosya kārmukān sarvān varuṇaḥ prahasan balī |
हर एक को पाँच-पाँच टुकड़ों में काटकर, पाँच-पाँच बाणों से बाण को बींध दिया। फिर बलशाली वरुण ने हँसते हुए उसके सभी धनुषों को,
श्लोक 11 (skanda.8.86.11)
चिच्छेद सायकैस्तीक्ष्णैस्तदद्भुतमिवाभवत् । अथ छिन्नधनुर्देत्यस्तस्य चिक्षेप वै गदाम् ।
ciccheda sāyakaistīkṣṇaistadadbhutamivābhavat | atha chinnadhanurdetyastasya cikṣepa vai gadām |
अपने तीक्ष्ण बाणों से काट डाला - यह मानो अद्भुत बात हुई। फिर धनुष कट जाने पर उस दैत्य ने उस पर गदा फेंकी।
श्लोक 12 (skanda.8.86.12)
छिन्नां दृष्ट्वा च तां भूयो गदाः पश्चासृजद्बली । स एकस्यां तदा सक्तस्ता गदा नाभ्यवैक्षत ।
chinnāṁ dṛṣṭvā ca tāṁ bhūyo gadāḥ paścāsṛjadbalī | sa ekasyāṁ tadā saktastā gadā nābhyavaikṣata |
उसे कटा हुआ देखकर उस बलशाली ने फिर से अनेक गदाएँ छोड़ दीं। वह एक को रोकने में लगा हुआ था, अतः अन्य गदाओं को न देख सका।
श्लोक 13 (skanda.8.86.13)
अविक्षताश्च ताः सर्वाः पेतुस्तस्य ततोपरि । काचिन्मुकुटमामर्द्य निपपात महीतले ।
avikṣatāśca tāḥ sarvāḥ petustasya tatopari | kācinmukuṭamāmardya nipapāta mahītale |
अनदेखी वे सभी गदाएँ उस पर आ गिरीं। उनमें से एक ने उसके मुकुट को कुचलकर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 14 (skanda.8.86.14)
काचिच्च कार्मुकं घोरं ह्स्तदेशान्न्यपातयत् । काचिद् ध्वजं दृढं दिव्यं चिक्षेप धरणीतले ।
kācicca kārmukaṁ ghoraṁ hstadeśānnyapātayat | kācid dhvajaṁ dṛḍhaṁ divyaṁ cikṣepa dharaṇītale |
किसी ने उसके भयंकर धनुष को हाथ से गिरा दिया, तो किसी ने उसकी दृढ़ दिव्य ध्वजा को भूमि पर फेंक दिया।
श्लोक 15 (skanda.8.86.15)
काचिद्रथं तदाहत्य पांसुग्रासं चकार ह । उरस्यूरूदरे कटयामपरास्तस्य ता गदाः ।
kācidrathaṁ tadāhatya pāṁsugrāsaṁ cakāra ha | urasyūrūdare kaṭayāmaparāstasya tā gadāḥ |
किसी ने उसके रथ को मारकर धूल का ढेर बना दिया; तथा अन्य गदाओं ने उसकी छाती, जाँघों, उदर और कटि पर,
श्लोक 16 (skanda.8.86.16)
पतंत्यः सुमहाघोरा आर्तिं चक्रुर्महाभयाः । एवं स तेन विरथः कृतः कृच्छ्रेण धीमता ।
pataṁtyaḥ sumahāghorā ārtiṁ cakrurmahābhayāḥ | evaṁ sa tena virathaḥ kṛtaḥ kṛcchreṇa dhīmatā |
अत्यन्त भयंकर होकर गिरते हुए महान पीड़ा पहुँचाई। इस प्रकार उस बुद्धिमान बाण ने बड़ी कठिनाई से वरुण को रथहीन कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.8.86.17)
वरुणस्तं समुत्सृज्य जगामान्यद्रणाजिरम् । यमोन्धकं समासाद्य तिष्ठतिष्ठेति चोदितः ।
varuṇastaṁ samutsṛjya jagāmānyadraṇājiram | yamondhakaṁ samāsādya tiṣṭhatiṣṭheti coditaḥ |
वरुण उसे छोड़कर युद्धभूमि के दूसरे भाग में चला गया। इधर यम अन्धक के पास पहुँचकर 'ठहरो, ठहरो' कहकर उसे ललकारने लगा।
श्लोक 18 (skanda.8.86.18)
अथ तस्य ततो दण्डं रथं प्रति समुत्सृजत् । स रथं तस्य संचूर्णं कृत्वा शतसहस्रशः ।
atha tasya tato daṇḍaṁ rathaṁ prati samutsṛjat | sa rathaṁ tasya saṁcūrṇaṁ kṛtvā śatasahasraśaḥ |
फिर उसने अपना दण्ड उसके रथ की ओर छोड़ दिया। उस रथ को लाखों टुकड़ों में चूर्ण करके,
श्लोक 19 (skanda.8.86.19)
यमह्स्तं पुनर्गत्वा तथैव समतिष्ठत । अन्धकोपि रथं त्यक्त्वा गदापाणिर्महाबलः ।
yamahstaṁ punargatvā tathaiva samatiṣṭhata | andhakopi rathaṁ tyaktvā gadāpāṇirmahābalaḥ |
वह दण्ड फिर से यम के हाथ में लौटकर वैसे ही स्थिर हो गया। अन्धक भी रथ त्यागकर, गदा हाथ में लेकर महाबली,
श्लोक 20 (skanda.8.86.20)
यमं समभिदुद्राव क्रोधाद्वह्निमिवोत्सृजन् । स तस्य धावतो वेगात् पितृराजो यमः स्वयम् ।
yamaṁ samabhidudrāva krodhādvahnimivotsṛjan | sa tasya dhāvato vegāt pitṛrājo yamaḥ svayam |
क्रोध से अग्नि के समान बरसाता हुआ यम पर झपटा। उसके दौड़ने के वेग को देखकर पितृराज यम ने स्वयं,
श्लोक 21 (skanda.8.86.21)
दण्डेनैव गदामुग्रां भस्मसायुज्यमानयत् । स प्रहस्य तदा चैनमुवाच प्रसभं यमः ।
daṇḍenaiva gadāmugrāṁ bhasmasāyujyamānayat | sa prahasya tadā cainamuvāca prasabhaṁ yamaḥ |
अपने दण्ड से ही उसकी उस भयंकर गदा को भस्म कर डाला। तब यम ने हँसते हुए बलपूर्वक उससे कहा -
श्लोक 22 (skanda.8.86.22)
भवतो धाम यदभूत्तते विनिहतं मया । सांप्रतं त्वामपि पुनन्नेष्याम्यद्य स्वमालयम् ।
bhavato dhāma yadabhūttate vinihataṁ mayā | sāṁprataṁ tvāmapi punanneṣyāmyadya svamālayam |
'तुम्हारा जो तेज था, वह मेरे द्वारा नष्ट कर दिया गया। अब मैं तुम्हें भी शुद्ध करके आज अपने ही घर ले जाऊँगा।'
श्लोक 23 (skanda.8.86.23)
अहं हि सर्वलोकस्य मरणे हेतुरीश्वरः । मया वैरं समासाद्य क्वान्ते जीवं विमोक्ष्यसे । अद्य त्वा निहनिष्यामि सुदृढं क्रियतां जगत् ।
ahaṁ hi sarvalokasya maraṇe heturīśvaraḥ | mayā vairaṁ samāsādya kvānte jīvaṁ vimokṣyase | adya tvā nihaniṣyāmi sudṛḍhaṁ kriyatāṁ jagat |
'मैं ही समस्त लोक की मृत्यु का स्वामी एवं कारण हूँ। मुझसे वैर बाँधकर तुम अन्त में अपना जीवन कहाँ छोड़ पाओगे? आज मैं तुम्हें मार डालूँगा - संसार को दृढ़तापूर्वक इसके लिए तैयार हो जाना चाहिए।'
श्लोक 24 (skanda.8.86.24)
अथवाद्य गतो बन्धं पूर्वं चान्धक मत्पुरम् । अग्रे द्रष्टासि तत्रैव सर्वानेतान् सुरद्विषः ।
athavādya gato bandhaṁ pūrvaṁ cāndhaka matpuram | agre draṣṭāsi tatraiva sarvānetān suradviṣaḥ |
'अथवा, हे अन्धक! पहले बन्धन में डालकर मेरे नगर में जाकर तुम वहीं इन सभी देवशत्रुओं को पहले से देख सकोगे।'
श्लोक 25 (skanda.8.86.25)
सनत्कुमार उवाच । अथैवंवादिनं युद्धं ह्यभीतोन्धकदानवः । उवाच तं यमं क्रुद्धं क्रोधाद् दीप्तानलेक्षणः ।
sanatkumāra uvāca | athaivaṁvādinaṁ yuddhaṁ hyabhītondhakadānavaḥ | uvāca taṁ yamaṁ kruddhaṁ krodhād dīptānalekṣaṇaḥ |
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध यम से, युद्ध में निर्भय दानव अन्धक ने, क्रोध से प्रज्वलित अग्नि के समान नेत्र किये हुए, यह कहा -
श्लोक 26 (skanda.8.86.26)
हिरण्याक्षसुतो दृप्त अन्धकोस्मि सुरान्तकः । महायोगबलोपेतो नास्मि प्राकृतदानवः ।
hiraṇyākṣasuto dṛpta andhakosmi surāntakaḥ | mahāyogabalopeto nāsmi prākṛtadānavaḥ |
'मैं गर्वित हिरण्याक्ष का पुत्र अन्धक हूँ, देवताओं का संहारक; मैं महायोगबल से युक्त हूँ, कोई साधारण दानव नहीं।'
श्लोक 27 (skanda.8.86.27)
अंगाद्येन समुत्कृत्य भागान् मांसस्य कार्षिकान् । संवत्सरशतान्यष्टौ पञ्च चैव हुतोनलः ।
aṁgādyena samutkṛtya bhāgān māṁsasya kārṣikān | saṁvatsaraśatānyaṣṭau pañca caiva hutonalaḥ |
'जिसने अपने शरीर से एक-एक कर्ष भर मांस के टुकड़े काटकर, आठ सौ पाँच वर्षों तक अग्नि में हवन किया,'
श्लोक 28 (skanda.8.86.28)
तुष्टो ब्रह्मा ददौ यस्य सदैवामरतां शुभाम् । सोहं नाम्ना महासत्वो मृत्युत्सेधो न संशयः ।
tuṣṭo brahmā dadau yasya sadaivāmaratāṁ śubhām | sohaṁ nāmnā mahāsatvo mṛtyutsedho na saṁśayaḥ |
'उससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने जिसे सदा के लिए शुभ अमरत्व प्रदान किया - वह महाशक्तिशाली मैं ही हूँ, जिसका नाम ही मृत्यु को रोकने वाला है, इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 29 (skanda.8.86.29)
न त्वं मम कृतो मृत्युः सिंहस्येव वने शशः । अहं तु भविता मृत्युस्तव नास्त्यत्र संशयः ।
na tvaṁ mama kṛto mṛtyuḥ siṁhasyeva vane śaśaḥ | ahaṁ tu bhavitā mṛtyustava nāstyatra saṁśayaḥ |
'तुम मेरी मृत्यु के रूप में नियत नहीं हो, जैसे खरगोश वन में सिंह की मृत्यु नहीं होता। बल्कि मैं ही तुम्हारी मृत्यु बनूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 30 (skanda.8.86.30)
अद्य त्वाहं दुरात्मानं सर्वलोकभयंकरम् । हत्वा श्रेयो विधास्यामि त्रैलोक्यस्येति मे मतिः ।
adya tvāhaṁ durātmānaṁ sarvalokabhayaṁkaram | hatvā śreyo vidhāsyāmi trailokyasyeti me matiḥ |
'आज मैं तुझ दुरात्मा को, जो समस्त लोक के लिए भयंकर है, मारकर त्रिलोक का कल्याण करूँगा - यह मेरा निश्चय है।'
श्लोक 31 (skanda.8.86.31)
देवानाञ्च भवान्नित्यं हन्तव्यो विप्रिये स्थितः । तेषामपि प्रियो ह्यद्य भविष्यति हते त्ययि ।
devānāñca bhavānnityaṁ hantavyo vipriye sthitaḥ | teṣāmapi priyo hyadya bhaviṣyati hate tyayi |
'तुम देवताओं का सदा अहित करते रहे हो, इसलिए तुम सदा वध्य हो। आज तुम्हारे मारे जाने पर उन्हें भी प्रसन्नता होगी।'
श्लोक 32 (skanda.8.86.32)
न त्वयासादितं पूर्वं हरता जीवितानि हि । किञ्चिद् भूतं महद्भूतं तेन त्वं निर्भयः सदा ।
na tvayāsāditaṁ pūrvaṁ haratā jīvitāni hi | kiñcid bhūtaṁ mahadbhūtaṁ tena tvaṁ nirbhayaḥ sadā |
'प्राणों को हरने वाले तुमसे पहले किसी छोटे या बड़े प्राणी का सामना नहीं हुआ, इसीलिए तुम सदा निर्भय रहे हो।'
श्लोक 33 (skanda.8.86.33)
देवास्तव भयाद् भीता अशक्तस्त्वद्वधे ततः । अमृतादीनि लिप्सन्ति पूजयन्ति सदा च ते ।
devāstava bhayād bhītā aśaktastvadvadhe tataḥ | amṛtādīni lipsanti pūjayanti sadā ca te |
'देवता तुम्हारे भय से डरे हुए हैं, तुम्हें मारने में असमर्थ होकर वे अमृत आदि पाने की इच्छा करते हैं तथा सदा तुम्हारी पूजा करते हैं।'
श्लोक 34 (skanda.8.86.34)
अद्य त्वयि हते क्रूरे निर्द्वन्द्वास्तेपि सामरात् । अमृते न तथा प्रीतिं करिष्यन्ति न संशयः ।
adya tvayi hate krūre nirdvandvāstepi sāmarāt | amṛte na tathā prītiṁ kariṣyanti na saṁśayaḥ |
'आज तुझ क्रूर के मारे जाने पर, इन्द्र सहित वे भी द्वन्द्वरहित होकर, अमृत में भी वैसी प्रीति नहीं करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 35 (skanda.8.86.35)
अद्य गर्वश्च दर्पश्च योगमाहात्म्यमेव च । प्राणैः सहैव देहान्ते नाशयिष्यामि सर्वशः ।
adya garvaśca darpaśca yogamāhātmyameva ca | prāṇaiḥ sahaiva dehānte nāśayiṣyāmi sarvaśaḥ |
'आज तुम्हारे गर्व, अभिमान तथा योग-माहात्म्य को, प्राणों सहित, शरीर के अन्त में मैं सर्वथा नष्ट कर दूँगा।'
श्लोक 36 (skanda.8.86.36)
सनत्कुमार उवाच । स एवमसुरेन्द्रेण तर्जितो भास्करात्मजः । दण्डेनासुरशार्दूलमुत्तमांगेभ्यताडयत् ।
sanatkumāra uvāca | sa evamasurendreṇa tarjito bhāskarātmajaḥ | daṇḍenāsuraśārdūlamuttamāṁgebhyatāḍayat |
सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार उस असुरेन्द्र द्वारा धिक्कारे जाने पर सूर्यपुत्र यम ने अपने दण्ड से उस असुरश्रेष्ठ के सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 37 (skanda.8.86.37)
कालश्च तं करेणैव हृदये समताडयत् । मृत्युश्चाशनिना क्षिप्रं शिरस्येवाभ्यताडयत् ।
kālaśca taṁ kareṇaiva hṛdaye samatāḍayat | mṛtyuścāśaninā kṣipraṁ śirasyevābhyatāḍayat |
काल ने भी अपने हाथ से ही उसकी छाती पर प्रहार किया; मृत्यु ने वज्र से शीघ्र ही उसके सिर पर आघात किया।
श्लोक 38 (skanda.8.86.38)
कण्ठे च नियतिस्तस्य पाशं चिक्षेप दारुणम् । कृतान्तः परिघेनैव गण्डदेशे समाहनत् ।
kaṇṭhe ca niyatistasya pāśaṁ cikṣepa dāruṇam | kṛtāntaḥ parighenaiva gaṇḍadeśe samāhanat |
नियति ने उसके गले में भयंकर पाश फेंका; कृतान्त ने परिघ से ही उसके गाल पर प्रहार किया।
श्लोक 39 (skanda.8.86.39)
स तैरमोघैर्यामैश्च प्रहतोन्धकदानवः । पुष्पवृष्टया यथा कश्चिन्नार्तिमानभवत्तथा ।
sa tairamoghairyāmaiśca prahatondhakadānavaḥ | puṣpavṛṣṭayā yathā kaścinnārtimānabhavattathā |
यम के उन अमोघ आयुधों से आहत होने पर भी दानव अन्धक वैसे ही अविचलित रहा, जैसे कोई पुष्पवर्षा से पीड़ित नहीं होता।
श्लोक 40 (skanda.8.86.40)
न पाशास्तस्य लीयन्ते दण्डो वा परिघोपि वा । अन्यानि चास्य तीव्राणि न दुःखाय भवन्त्युत ।
na pāśāstasya līyante daṇḍo vā parighopi vā | anyāni cāsya tīvrāṇi na duḥkhāya bhavantyuta |
न तो पाश उस पर टिक सके, न दण्ड, न परिघ ही; और उसके अन्य तीव्र आयुध भी उसे दुःख नहीं दे सके।
श्लोक 41 (skanda.8.86.41)
ततस्सर्वैस्तदोत्क्रुष्टं दानवैः सर्वतोदिशम् । अवाद्यन्त च तूर्याणि मुमुदे चान्धको भृशम् ।
tatassarvaistadotkruṣṭaṁ dānavaiḥ sarvatodiśam | avādyanta ca tūryāṇi mumude cāndhako bhṛśam |
तब सभी दानवों ने चारों दिशाओं में हर्षनाद किया, तूर्य बजाये, और अन्धक अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
श्लोक 42 (skanda.8.86.42)
स तेषां तुष्टिशब्देन मदवीर्यसमीरितः । विनद्याम्बुदवद् व्यास यममेवाभिदुद्रुवे ।
sa teṣāṁ tuṣṭiśabdena madavīryasamīritaḥ | vinadyāmbudavad vyāsa yamamevābhidudruve |
हे व्यास! उनके प्रसन्नता के शब्द से अपने बल के मद में उन्मत्त होकर, मेघ के समान गर्जना करता हुआ, वह यम पर ही झपटा।
श्लोक 43 (skanda.8.86.43)
स गत्वा तस्य वेगेन हन्यमानोपि किंकरैः । आाजघान महावेगो मुष्टिनोरसि तं यमम् ।
sa gatvā tasya vegena hanyamānopi kiṁkaraiḥ | āājaghāna mahāvego muṣṭinorasi taṁ yamam |
यम के किंकरों द्वारा मारा जाते हुए भी वह वेगपूर्वक उसके पास पहुँचकर, महावेगशाली होकर मुट्ठी से यम की छाती पर प्रहार करने लगा।
श्लोक 44 (skanda.8.86.44)
पुनश्च महिषं तस्य शिरस्यभिहनत्पदा । तावुभौ विह्वलौ तत्र भ्रमित्वा किञ्चिदन्तरम् ।
punaśca mahiṣaṁ tasya śirasyabhihanatpadā | tāvubhau vihvalau tatra bhramitvā kiñcidantaram |
फिर उसने उसके भैंसे को पैर से सिर पर मारा। वे दोनों (यम और उसका भैंसा) व्याकुल होकर वहाँ कुछ दूर तक चक्कर काटते रहे।
श्लोक 45 (skanda.8.86.45)
हित्वान्धकं ततस्तूर्णं ययतुर्मुनिसत्तम । जयन्तश्चेल्वलं प्राप्य विव्याध दशभिः शरैः ।
hitvāndhakaṁ tatastūrṇaṁ yayaturmunisattama | jayantaścelvalaṁ prāpya vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ |
हे मुनिसत्तम! फिर अन्धक को छोड़कर वे दोनों शीघ्रता से वहाँ से चले गये। इधर जयन्त ने इल्वल के पास पहुँचकर उसे दस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 46 (skanda.8.86.46)
तस्येल्वलश्चकर्ताशु ध्वजं रत्नविभूषितम् । हयानां चैव योक्त्राणि प्रतोदं चैव काञ्चनम् ।
tasyelvalaścakartāśu dhvajaṁ ratnavibhūṣitam | hayānāṁ caiva yoktrāṇi pratodaṁ caiva kāñcanam |
इल्वल ने तुरन्त उसकी रत्नजड़ित ध्वजा को, उसके घोड़ों की रस्सियों को, तथा उसके स्वर्णिम चाबुक को भी काट डाला।
श्लोक 47 (skanda.8.86.47)
विना योक्त्रैर्हयास्तस्य रथं त्यक्त्वा समुद्धताः । लाना विजग्मुर्हेषन्तो जयन्तो विरथोभवत् ।
vinā yoktrairhayāstasya rathaṁ tyaktvā samuddhatāḥ | lānā vijagmurheṣanto jayanto virathobhavat |
रस्सियों के बिना उसके घोड़े रथ को छोड़कर उत्तेजित होकर हिनहिनाते हुए इधर-उधर भाग गये; जयन्त रथहीन हो गया।
श्लोक 48 (skanda.8.86.48)
स रथं संपरित्यज्य भूस्थः शक्रात्मजः प्रभुः । इल्वलस्य हयान्सूतं ध्वजञ्चैव न्यपातयत् ।
sa rathaṁ saṁparityajya bhūsthaḥ śakrātmajaḥ prabhuḥ | ilvalasya hayānsūtaṁ dhvajañcaiva nyapātayat |
वह प्रभु इन्द्रपुत्र रथ को त्यागकर, भूमि पर खड़े होकर ही, इल्वल के घोड़ों, सारथी तथा ध्वजा को गिरा दिया।
श्लोक 49 (skanda.8.86.49)
अथोभौ विरथौ भूत्वा ह्यन्योन्यविजयैषिणौ । अविध्येतां तदा यस्य कार्मुके सायकैः शितैः ।
athobhau virathau bhūtvā hyanyonyavijayaiṣiṇau | avidhyetāṁ tadā yasya kārmuke sāyakaiḥ śitaiḥ |
तब दोनों रथहीन होकर, एक-दूसरे पर विजय चाहते हुए, अपने-अपने धनुषों से तीक्ष्ण बाणों से एक-दूसरे को बींधने लगे।
श्लोक 50 (skanda.8.86.50)
परस्परविनिर्मुक्तानुभौ संवार्य सायकान् । अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य नेदतुः सागराविव ।
parasparavinirmuktānubhau saṁvārya sāyakān | astrairastrāṇi saṁvārya nedatuḥ sāgarāviva |
एक-दूसरे के छोड़े हुए बाणों को दोनों ने रोक दिया, अस्त्रों से अस्त्रों को रोककर वे दोनों समुद्रों के समान गर्जना करने लगे।
श्लोक 51 (skanda.8.86.51)
अथ शक्रसुतः श्रीमाँल्लब्ध्वा तस्य तदान्तरम् । धनुश्चिच्छेद भल्लेन ननाद च पुनः पुनः ।
atha śakrasutaḥ śrīmā~llabdhvā tasya tadāntaram | dhanuściccheda bhallena nanāda ca punaḥ punaḥ |
तब श्रीमान इन्द्रपुत्र ने उसमें अवसर पाकर भल्ल बाण से उसका धनुष काट डाला और बार-बार गर्जना की।
श्लोक 52 (skanda.8.86.52)
स विकृत्तधनुर्दैत्यः खङ्गं दीप्तानलप्रभम् । भ्रामयित्वा विचिक्षेप तमप्यस्याच्छिनत्तदा ।
sa vikṛttadhanurdaityaḥ khaṅgaṁ dīptānalaprabham | bhrāmayitvā vicikṣepa tamapyasyācchinattadā |
धनुष कट जाने पर उस दैत्य ने प्रज्वलित अग्नि के समान चमकती हुई तलवार घुमाकर फेंकी; उसे भी उसने (जयन्त ने) उसी समय काट डाला।
श्लोक 53 (skanda.8.86.53)
गृहीत्वान्यस्य पतितां गदां हेमविभूषिताम् । भ्रामयित्वा तु चिक्षेप सापदुद्राव वेगवत् ।
gṛhītvānyasya patitāṁ gadāṁ hemavibhūṣitām | bhrāmayitvā tu cikṣepa sāpadudrāva vegavat |
फिर दूसरे की गिरी हुई स्वर्णभूषित गदा उठाकर उसने उसे घुमाकर फेंका; वह वेगपूर्वक उड़ चली।
श्लोक 54 (skanda.8.86.54)
स यावत्तां गदां घोरां शरैः सन्नतपर्वभिः । विचिच्छेद दितेः पुत्रस्तावदस्याच्छिनद्धनुः ।
sa yāvattāṁ gadāṁ ghorāṁ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | viciccheda diteḥ putrastāvadasyācchinaddhanuḥ |
जब तक दिति के पुत्र ने सीधे पोर वाले बाणों से उस भयंकर गदा को काटा, तब तक उसने (जयन्त ने) उसका (इल्वल का) धनुष भी काट डाला।
श्लोक 55 (skanda.8.86.55)
अथ यावत्स निस्त्रिंशं जग्राहादितिनन्दनः । तावदेनं पदा दैत्यो वामेनोरस्यताडयत् ।
atha yāvatsa nistriṁśaṁ jagrāhāditinandanaḥ | tāvadenaṁ padā daityo vāmenorasyatāḍayat |
फिर जब तक उस अदिति के पुत्र (जयन्त) ने तलवार पकड़ी, तब तक उस दैत्य ने अपने बायें पैर से उसकी छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 56 (skanda.8.86.56)
तमेव तस्य जग्राह पादं स च महाबलः । जयन्तो भ्रामयच्चैनं नर्दमानो यथाम्बुदः ।
tameva tasya jagrāha pādaṁ sa ca mahābalaḥ | jayanto bhrāmayaccainaṁ nardamāno yathāmbudaḥ |
किन्तु उस महाबली जयन्त ने उसके उसी पैर को पकड़ लिया, और मेघ के समान गरजते हुए उसे घुमा डाला।
श्लोक 57 (skanda.8.86.57)
ततो हाहाकृतमभूदसुराणां बले महत् । यात त्रायत दैत्येन्द्रमिल्वलं शीघ्रमित्युत ।
tato hāhākṛtamabhūdasurāṇāṁ bale mahat | yāta trāyata daityendramilvalaṁ śīghramityuta |
तब असुरों की सेना में महान हाहाकार मच गया - 'जाओ, दैत्येन्द्र इल्वल की शीघ्र रक्षा करो!'
श्लोक 58 (skanda.8.86.58)
देवानां सिंहनादाश्च शंखशब्दाश्च पुष्कलाः । तूर्याणि चाप्यवाद्यन्त साधुसाध्विति चाभवत् ।
devānāṁ siṁhanādāśca śaṁkhaśabdāśca puṣkalāḥ | tūryāṇi cāpyavādyanta sādhusādhviti cābhavat |
देवताओं के सिंहनाद तथा प्रचुर शंखध्वनियाँ उठीं, तूर्य भी बज उठे, और 'साधु-साधु' की ध्वनि गूँज उठी।
श्लोक 59 (skanda.8.86.59)
जयन्तोपि यथा चक्रं विधाता बलवाँस्तदा । भ्रामयामास देत्येन्द्रं युगान्ताम्बुदवन्नदन् ।
jayantopi yathā cakraṁ vidhātā balavā~stadā | bhrāmayāmāsa detyendraṁ yugāntāmbudavannadan |
बलशाली जयन्त भी, जैसे विधाता चक्र को घुमाता है, उस समय उस दैत्येन्द्र को प्रलयकालीन मेघ के समान गरजते हुए घुमाता रहा।
श्लोक 60 (skanda.8.86.60)
अथ स्वयं हिरण्याक्षः सोन्धको बलिरेव च । बाणोथ विप्रचित्तिश्च शंबरोथ विरोचनः ।
atha svayaṁ hiraṇyākṣaḥ sondhako balireva ca | bāṇotha vipracittiśca śaṁbarotha virocanaḥ |
तब स्वयं हिरण्याक्ष, अन्धक, बलि, बाण, विप्रचित्ति, शम्बर तथा विरोचन,
श्लोक 61 (skanda.8.86.61)
कालकेयाश्च ते दैत्याः पौलोमाः सिंहिकासुताः । निवातकवचाश्चैनं समन्तात् पर्यवारयन् ।
kālakeyāśca te daityāḥ paulomāḥ siṁhikāsutāḥ | nivātakavacāścainaṁ samantāt paryavārayan |
तथा वे कालकेय दैत्य, पौलोम, सिंहिका के पुत्र तथा निवातकवच - इन सबने उसे (जयन्त को) चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 62 (skanda.8.86.62)
स तैः शरैर्गदाभिश्च परिघैर्दीघवेधनैः । अन्यैश्च बहुभिश्चित्रैरायुधैः प्रहतो भृशम् ।
sa taiḥ śarairgadābhiśca parighairdīghavedhanaiḥ | anyaiśca bahubhiścitrairāyudhaiḥ prahato bhṛśam |
गहरी चोट पहुँचाने वाले उनके बाणों, गदाओं तथा परिघों से, और अन्य अनेक विचित्र आयुधों से वह अत्यन्त आहत हुआ।
श्लोक 63 (skanda.8.86.63)
स हन्यमानस्तं देवो जयन्तः शक्रनन्दनः । हिरण्याक्षपथे क्षिप्त्वा प्राद्रवद् येन देवताः ।
sa hanyamānastaṁ devo jayantaḥ śakranandanaḥ | hiraṇyākṣapathe kṣiptvā prādravad yena devatāḥ |
इस प्रकार आहत होते हुए देवता जयन्त, इन्द्र के पुत्र, ने उसे (इल्वल को) हिरण्याक्ष के मार्ग में फेंककर, जहाँ देवगण थे, वहीं भाग गया।