अम्बिका खण्ड · अध्याय 87
राहुपातनम्
श्लोक 1 (skanda.8.87.1)
सनत्कुमार उवाच । मयश्चन्द्रमसं देवमर्दयत् क्रोधमूर्च्छितः । शरैराशीविषाकारैर्नर्दमानो यथाम्बुदः ।
sanatkumāra uvāca | mayaścandramasaṁ devamardayat krodhamūrcchitaḥ | śarairāśīviṣākārairnardamāno yathāmbudaḥ |
सनत्कुमार ने कहा - तब क्रोध से मूर्च्छित मय ने, सर्पविष के समान भयंकर बाणों से मेघ के समान गरजते हुए, चन्द्रदेव को पीड़ित किया।
श्लोक 2 (skanda.8.87.2)
तस्यास्यतस्ततो बाणान् चन्द्रमाः प्रहसन्निव । एकैकं सप्तधा कृत्वा मयं विव्याध पञ्चभिः ।
tasyāsyatastato bāṇān candramāḥ prahasanniva | ekaikaṁ saptadhā kṛtvā mayaṁ vivyādha pañcabhiḥ |
उसके द्वारा छोड़े गए उन बाणों को चन्द्रमा ने मानो हँसते हुए एक-एक करके सात-सात टुकड़ों में काट डाला, और पाँच बाणों से मय को बींध दिया।
श्लोक 3 (skanda.8.87.3)
तत एनं पृषत्केन ललाटे समविध्यत । जहास च पुनर्देवस्तस्य लज्जां समादधत् ।
tata enaṁ pṛṣatkena lalāṭe samavidhyata | jahāsa ca punardevastasya lajjāṁ samādadhat |
फिर उसने एक कंकपत्र बाण से मय के ललाट को बींध दिया, और उसे लज्जित करते हुए देव पुनः हँस पड़े।
श्लोक 4 (skanda.8.87.4)
स तस्य हसतः शीघ्रं ललाटे कंकपत्रिणा । विव्याध भृशमायस्तो यथा विघ्नो यतव्रतम् ।
sa tasya hasataḥ śīghraṁ lalāṭe kaṁkapatriṇā | vivyādha bhṛśamāyasto yathā vighno yatavratam |
उस हँसते हुए चन्द्रमा को मय ने अत्यन्त क्रोधित होकर तुरन्त ही एक कंकपत्र बाण से ललाट में उसी प्रकार बींध दिया जैसे कोई विघ्न किसी व्रतधारी साधक को पीड़ित करता है।
श्लोक 5 (skanda.8.87.5)
ततोस्य देव उद्दिश्य ध्वजं चिच्छेद नादयन् । चक्ररक्षाँश्च निस्त्रिंशैरनयद् यमसादनम् ।
tatosya deva uddiśya dhvajaṁ ciccheda nādayan | cakrarakṣāṁśca nistriṁśairanayad yamasādanam |
तब उस देव ने गर्जना करते हुए उसकी ध्वजा को लक्ष्य करके काट डाला, और तलवारों से उसके चक्ररक्षकों को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 6 (skanda.8.87.6)
तस्य तच्चापलं वीक्ष्य मयो दानवसत्तमः । मायां दिव्यां समास्थाय राहुः समभवत्तदा ।
tasya taccāpalaṁ vīkṣya mayo dānavasattamaḥ | māyāṁ divyāṁ samāsthāya rāhuḥ samabhavattadā |
चन्द्रमा की उस फुर्ती को देखकर, दानवश्रेष्ठ मय ने दिव्य माया का सहारा लेकर उसी क्षण राहु का रूप धारण कर लिया।
श्लोक 7 (skanda.8.87.7)
स राहुभूतो दैत्येन्द्रो देवेशं शशलक्षणम् । अभ्यद्रवद् यथा राहू रथेनाम्बुदनादिना ।
sa rāhubhūto daityendro deveśaṁ śaśalakṣaṇam | abhyadravad yathā rāhū rathenāmbudanādinā |
राहुरूप धारण किए हुए वह दैत्येन्द्र मेघ के समान गर्जते हुए रथ पर सवार होकर, ठीक जैसे राहु आक्रमण करता है, उस शशचिह्नधारी देवेश पर टूट पड़ा।
श्लोक 8 (skanda.8.87.8)
स तां मायां तदा ज्ञात्वा देवो ह्यमृतसंभवः । अपर्ववद् वियत्स्थं वै तं शरैस्त्रिभिरार्दयत् ।
sa tāṁ māyāṁ tadā jñātvā devo hyamṛtasaṁbhavaḥ | aparvavad viyatsthaṁ vai taṁ śaraistribhirārdayat |
अमृत से उत्पन्न हुए उस देव ने उस माया को तुरन्त पहचान लिया, और बिना किसी पर्व (ग्रहणकाल) के ही आकाश में स्थित उस मय को तीन बाणों से पीड़ित कर दिया।
श्लोक 9 (skanda.8.87.9)
सोपि दैत्यो महामायस्ताञ्छरान्माययैव तु । वारयन्नभिदुद्राव शीतरश्मिं महासुरः ।
sopi daityo mahāmāyastāñcharānmāyayaiva tu | vārayannabhidudrāva śītaraśmiṁ mahāsuraḥ |
वह महामायावी दैत्य भी अपनी माया से ही उन बाणों को रोकता हुआ, उस शीतरश्मि चन्द्रमा की ओर वेगपूर्वक दौड़ा।
श्लोक 10 (skanda.8.87.10)
ततोस्य स्यन्दनं दिव्यं नागयन्तृ महाप्रभम् । गृहीत्वा कूबरे दैत्यश्चिक्षेप च ररास च ।
tatosya syandanaṁ divyaṁ nāgayantṛ mahāprabham | gṛhītvā kūbare daityaścikṣepa ca rarāsa ca |
तब उस दैत्य ने चन्द्रमा के नागों से चलाए जाने वाले तेजस्वी दिव्य रथ को उसके धुरे से पकड़कर फेंक दिया और गर्जना की।
श्लोक 11 (skanda.8.87.11)
अहिर्बुध्नः समासाद्य राहुश्चन्द्रमसो ग्रहम् । विशिखैः पञ्चभिर्विद्ध्वा ध्वजमस्य न्यपातयत् ।
ahirbudhnaḥ samāsādya rāhuścandramaso graham | viśikhaiḥ pañcabhirviddhvā dhvajamasya nyapātayat |
तब अहिर्बुध्न्य ने आगे बढ़कर, चन्द्रमा के ग्रह-रूप राहु को पाँच बाणों से बींधकर उसकी ध्वजा को गिरा दिया।
श्लोक 12 (skanda.8.87.12)
तस्योत्पत्य रथाद्राहुर्गदया भीमरूपया । धनुर्ध्वजं ह्याँश्चैव समचूर्णयदव्ययः ।
tasyotpatya rathādrāhurgadayā bhīmarūpayā | dhanurdhvajaṁ hyāṁścaiva samacūrṇayadavyayaḥ |
तब रथ से कूदकर राहु ने अपनी भयंकर गदा से अहिर्बुध्न्य के धनुष, ध्वजा और घोड़ों को चूर-चूर कर डाला।
श्लोक 13 (skanda.8.87.13)
अशनिं शतघंटां स दीप्तां मृत्योरिव स्नुषाम् । जग्राह भृशमायस्तः पाशं मृत्योरिवान्तकः ।
aśaniṁ śataghaṁṭāṁ sa dīptāṁ mṛtyoriva snuṣām | jagrāha bhṛśamāyastaḥ pāśaṁ mṛtyorivāntakaḥ |
फिर उसने सौ घंटियों से युक्त, प्रज्वलित, मानो मृत्यु की पुत्रवधू के समान उस वज्रास्त्र को उसी प्रकार वेगपूर्वक हाथ में ले लिया जैसे यम अपने पाश को ग्रहण करते हैं।
श्लोक 14 (skanda.8.87.14)
भ्रामयित्वा स तामुग्रां यमदण्डनिभां बलात् । चिक्षेप राहुमुद्दिश्य विद्युतं मेघराडिव ।
bhrāmayitvā sa tāmugrāṁ yamadaṇḍanibhāṁ balāt | cikṣepa rāhumuddiśya vidyutaṁ megharāḍiva |
यम के दण्ड के समान उस भयंकर अस्त्र को बलपूर्वक घुमाकर अहिर्बुध्न्य ने राहु को लक्ष्य करके फेंका, जैसे मेघराज बिजली गिराता है।
श्लोक 15 (skanda.8.87.15)
सा ज्वलन्ती महोल्केव मेघाशनिरिवोज्ज्वला । पपात राहोः शिरसि यथा वज्रं शिलोच्चये ।
sā jvalantī maholkeva meghāśanirivojjvalā | papāta rāhoḥ śirasi yathā vajraṁ śiloccaye |
प्रज्वलित होती हुई वह विशाल उल्का के समान, मेघ की चमकती हुई वज्र के समान, राहु के सिर पर उसी तरह गिरी जैसे पर्वत पर वज्र गिरता है।
श्लोक 16 (skanda.8.87.16)
अथ तेन प्रहारेण नार्तिमानभवत् स वै । स प्रहस्य भृशं राहुर्वेगं चक्रे महाबलः ।
atha tena prahāreṇa nārtimānabhavat sa vai | sa prahasya bhṛśaṁ rāhurvegaṁ cakre mahābalaḥ |
फिर भी उस प्रहार से राहु को कोई विशेष पीड़ा नहीं हुई; अत्यन्त हँसते हुए उस महाबली राहु ने और भी वेग धारण कर लिया।
श्लोक 17 (skanda.8.87.17)
अहिर्बुध्नं प्रति क्रुद्धो नागानामिव पक्षिराट् । आपतन्तं स वीक्ष्यैव भगवान्देवसत्तमः ।
ahirbudhnaṁ prati kruddho nāgānāmiva pakṣirāṭ | āpatantaṁ sa vīkṣyaiva bhagavāndevasattamaḥ |
सर्पों के प्रति क्रुद्ध पक्षिराज गरुड़ के समान क्रोधित होकर उसे अहिर्बुध्न्य की ओर झपटते देख, उस देवश्रेष्ठ भगवान ने,
श्लोक 18 (skanda.8.87.18)
जगाम तस्य पन्थानं मुक्त्वान्येन यथोरगः । शतकेतुश्च तं वीरो रथेनाम्बुदनादिना ।
jagāma tasya panthānaṁ muktvānyena yathoragaḥ | śataketuśca taṁ vīro rathenāmbudanādinā |
सर्प के समान अपना मार्ग बदलकर उसका रास्ता छोड़ दिया, और तब शतकेतु नामक वीर ने मेघगर्जन करते रथ पर सवार होकर उस पर आक्रमण किया।
श्लोक 19 (skanda.8.87.19)
अभ्यद्रवद्रणे क्रुद्धस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । आधावतोस्य कापाली हृदयं कंकपत्रिभिः ।
abhyadravadraṇe kruddhastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | ādhāvatosya kāpālī hṛdayaṁ kaṁkapatribhiḥ |
युद्ध में क्रुद्ध होकर उसने "ठहरो, ठहरो" कहते हुए आक्रमण किया; उस दौड़ते हुए राहु के हृदय को कापाली रुद्र ने कंकपत्र बाणों से,
श्लोक 20 (skanda.8.87.20)
बिभेद कुलिशः क्षिप्तो गिरिशृंगमिवोच्छ्रितम् । स भिन्नहृदयस्तेन रुद्रेण ग्रहसत्तमः ।
bibheda kuliśaḥ kṣipto giriśṛṁgamivocchritam | sa bhinnahṛdayastena rudreṇa grahasattamaḥ |
पर्वत के ऊँचे शिखर को विदीर्ण करते हुए वज्र के समान भेद डाला। उस रुद्र के द्वारा हृदय भेदे जाने पर वह ग्रहश्रेष्ठ राहु,
श्लोक 21 (skanda.8.87.21)
पपात स्वरथे मूढः शक्रध्वज इवोच्छ्रितः । ततो हाहाकृतं दैत्यैर्गृह्णगृह्णेति चाप्युत ।
papāta svarathe mūḍhaḥ śakradhvaja ivocchritaḥ | tato hāhākṛtaṁ daityairgṛhṇagṛhṇeti cāpyuta |
मूर्च्छित होकर अपने ही ऊँचे इन्द्रध्वज के समान रथ में गिर पड़ा। तब दैत्यों ने हाहाकार किया और "पकड़ो, पकड़ो" ऐसा भी पुकारा।
श्लोक 22 (skanda.8.87.22)
साधु साध्विति देवाश्च विनेदुर्जलदा इव । अथान्धको हिरण्याक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः ।
sādhu sādhviti devāśca vinedurjaladā iva | athāndhako hiraṇyākṣo vipracittirvirocanaḥ |
और देवगण मेघों के समान गरजते हुए "साधु, साधु" कहकर जय-जयकार करने लगे। तब अन्धक, हिरण्याक्ष, विप्रचित्ति, विरोचन,
श्लोक 23 (skanda.8.87.23)
शम्बरश्चेल्वलश्चैव बाणो बलिरथापि च । कालकेयास्सपौलोमा निवातकवचाश्च ये ।
śambaraścelvalaścaiva bāṇo balirathāpi ca | kālakeyāssapaulomā nivātakavacāśca ye |
शम्बर, इल्वल, बाण, बलि, तथा कालकेय, पौलोम और निवातकवच नामक दैत्यगण -
श्लोक 24 (skanda.8.87.24)
अन्ये च बहवो दैत्यास्तं रुद्रं पर्यवारयन् । ते शरैश्च गदाभिश्च मुशलैः प्राशतोमरैः ।
anye ca bahavo daityāstaṁ rudraṁ paryavārayan | te śaraiśca gadābhiśca muśalaiḥ prāśatomaraiḥ |
और अन्य भी अनेक दैत्यों ने उस रुद्र को चारों ओर से घेर लिया। वे बाणों, गदाओं, मूसलों और भालों-बरछों से,
श्लोक 25 (skanda.8.87.25)
न्यवारयन्त तं देवं तर्जयन्तः पुनः पुनः । स हन्यमानस्तैर्देवो बहुभिर्मुनिसत्तम । अपासर्तत वेगेन समीपात् सुरविद्विषाम् ।
nyavārayanta taṁ devaṁ tarjayantaḥ punaḥ punaḥ | sa hanyamānastairdevo bahubhirmunisattama | apāsartata vegena samīpāt suravidviṣām |
वे बार-बार धमकाते हुए उस देव को रोकने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ! उन बहुतों के द्वारा आहत होते हुए वह देव वेगपूर्वक उन देवशत्रुओं के समीप से हट गए।
श्लोक 26 (skanda.8.87.26)
अजैकपात् कालनेमिं गदिनं गदयासहम् । समाह्वयत दैत्येन्द्रं मधुं विष्णुरिवोर्जितम् ।
ajaikapāt kālanemiṁ gadinaṁ gadayāsaham | samāhvayata daityendraṁ madhuṁ viṣṇurivorjitam |
तब गदाधारी अजैकपाद ने, गदा सहन करने में समर्थ उस दैत्येन्द्र कालनेमि को उसी प्रकार युद्ध के लिए ललकारा जैसे बलशाली विष्णु ने मधु दैत्य को ललकारा था।
श्लोक 27 (skanda.8.87.27)
तौ सुयुद्धौ गदाहस्तौ मण्डलानि महाबलौ । अन्योन्यविजये सक्तौ ग्रहाविव विचेरतुः ।
tau suyuddhau gadāhastau maṇḍalāni mahābalau | anyonyavijaye saktau grahāviva viceratuḥ |
गदा हाथ में लिए हुए वे दोनों महाबली, एक-दूसरे पर विजय पाने में तत्पर होकर, दो ग्रहों के समान मण्डलाकार घूमते हुए उत्तम युद्ध करने लगे।
श्लोक 28 (skanda.8.87.28)
कालनेमिस्तु संक्रुद्धो गदां हेमपरिष्कृताम् । शतघंटाट्टहासां च मृत्योर्जिह्वामिवाद्भुताम् ।
kālanemistu saṁkruddho gadāṁ hemapariṣkṛtām | śataghaṁṭāṭṭahāsāṁ ca mṛtyorjihvāmivādbhutām |
अत्यन्त क्रुद्ध हुए कालनेमि ने सोने से जड़ी हुई, सौ घंटियों से गूँजती हुई, मृत्यु की जिह्वा के समान अद्भुत उस गदा को,
श्लोक 29 (skanda.8.87.29)
भ्रामयित्वासकृद् दैत्यो नर्दमानो यथा वृषः । मुमोच रुद्रमुद्दिश्य स्कन्दः शक्तिमिवाचले ।
bhrāmayitvāsakṛd daityo nardamāno yathā vṛṣaḥ | mumoca rudramuddiśya skandaḥ śaktimivācale |
बैल के समान गरजते हुए उस दैत्य ने उसे बार-बार घुमाकर रुद्र को लक्ष्य करके उसी प्रकार छोड़ा जैसे स्कन्द ने पर्वत पर अपनी शक्ति छोड़ी थी।
श्लोक 30 (skanda.8.87.30)
शक्रमुक्तामिवायान्तीमशनिं पर्वतोपरि । विद्युतं वा महाशक्तां स रुद्रो भीमविक्रमः ।
śakramuktāmivāyāntīmaśaniṁ parvatopari | vidyutaṁ vā mahāśaktāṁ sa rudro bhīmavikramaḥ |
पर्वत पर गिरती हुई इन्द्र द्वारा छोड़ी गई वज्र के समान अथवा विशाल विद्युत के समान आती हुई उस गदा को, भयंकर पराक्रमी रुद्र ने,
श्लोक 31 (skanda.8.87.31)
वञ्चयामास वेगेन श्वेतो मृत्युमिवागताम् । तिष्ठतिष्ठेति चाप्युक्त्वा रुद्रः प्रहरतां वरः ।
vañcayāmāsa vegena śveto mṛtyumivāgatām | tiṣṭhatiṣṭheti cāpyuktvā rudraḥ praharatāṁ varaḥ |
और श्वेत वर्ण वाले रुद्र ने आती हुई मृत्यु के समान उस गदा को वेगपूर्वक चकमा दे दिया, तथा "ठहरो, ठहरो" यह कहकर प्रहारकों में श्रेष्ठ रुद्र ने,
श्लोक 32 (skanda.8.87.32)
भ्रामयित्वा गदां घोरां दैत्यस्योपर्यपातयत् । स तया गदया दैत्यो दीप्तया भीमरूपया ।
bhrāmayitvā gadāṁ ghorāṁ daityasyoparyapātayat | sa tayā gadayā daityo dīptayā bhīmarūpayā |
और अपनी भयंकर गदा घुमाकर उस दैत्य के ऊपर गिरा दी। उस जाज्वल्यमान, भीषण गदा से आहत होकर वह दैत्य,
श्लोक 33 (skanda.8.87.33)
हतो मूर्ध्नि दिशः सर्वा हारिद्राः समपश्यत । अथ दैत्यस्तदा सम्यग् भ्रामयन् स गदां पुनः ।
hato mūrdhni diśaḥ sarvā hāridrāḥ samapaśyata | atha daityastadā samyag bhrāmayan sa gadāṁ punaḥ |
सिर पर मार खाकर सभी दिशाओं को पीली-पीली देखने लगा। फिर भी वह दैत्य उसी क्षण फिर से भली प्रकार गदा घुमाते हुए,
श्लोक 34 (skanda.8.87.34)
मण्डलानि विचित्राणि दर्शयित्वा महाबलः । अजैकपादं गदया स्कन्धदेशे व्यताडयत् ।
maṇḍalāni vicitrāṇi darśayitvā mahābalaḥ | ajaikapādaṁ gadayā skandhadeśe vyatāḍayat |
उस महाबली ने विचित्र मण्डल दिखाते हुए अजैकपाद को गदा से कन्धे पर प्रहार कर दिया।
श्लोक 35 (skanda.8.87.35)
स चाप्यवहतस्तेन यथा वज्रेण भूधरः । विवेश भूमिं दुःखार्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
sa cāpyavahatastena yathā vajreṇa bhūdharaḥ | viveśa bhūmiṁ duḥkhārtastadadbhutamivābhavat |
उस प्रहार से आहत होकर, जैसे वज्र से पर्वत, वैसे ही वह भूमि में धँस गया और दुःख से पीड़ित हो उठा; यह मानो एक अद्भुत दृश्य था।
श्लोक 36 (skanda.8.87.36)
उत्थाय च स वेगेन रुद्रः क्रुद्धो महाबलः । अवसव्यं चरन् दैत्यसव्यतो मण्डलेचरः ।
utthāya ca sa vegena rudraḥ kruddho mahābalaḥ | avasavyaṁ caran daityasavyato maṇḍalecaraḥ |
फिर वह महाबली रुद्र क्रोधित होकर वेगपूर्वक उठ खड़ा हुआ, और मण्डलाकार घूमते हुए दैत्य के दायें से बायीं ओर चलने लगा।
श्लोक 37 (skanda.8.87.37)
भ्रामयित्वा गदां भूयो दैत्यस्योपर्यपातयत् । स दैत्यस्तेन घातेन भ्रमित्वा त्रिर्महाबलः ।
bhrāmayitvā gadāṁ bhūyo daityasyoparyapātayat | sa daityastena ghātena bhramitvā trirmahābalaḥ |
उसने फिर गदा घुमाकर उसे दैत्य के ऊपर गिरा दिया। उस प्रहार से वह महाबली दैत्य तीन बार चक्कर खाकर,
श्लोक 38 (skanda.8.87.38)
संस्तभ्य गदया भूयो रुद्रं कुक्षावताडयत् । स तया गदया नुन्नो यथा वाय्वीरितो नगः ।
saṁstabhya gadayā bhūyo rudraṁ kukṣāvatāḍayat | sa tayā gadayā nunno yathā vāyvīrito nagaḥ |
फिर सँभलकर गदा से रुद्र के पेट पर प्रहार कर दिया। उस गदा के आघात से धकेला जाकर, वायु से हिलाए गए पर्वत के समान,
श्लोक 39 (skanda.8.87.39)
पपात भूमौ वेगेन शतशृंगो यथा पुरा । पतितं तु ततोऽभ्येत्य पदे जग्राह सुव्रतम् ।
papāta bhūmau vegena śataśṛṁgo yathā purā | patitaṁ tu tato'bhyetya pade jagrāha suvratam |
रुद्र वेगपूर्वक भूमि पर उसी प्रकार गिर पड़े जैसे प्राचीनकाल में शतशृंग पर्वत गिरा था। गिरे हुए उस व्रतनिष्ठ रुद्र को दैत्य ने पास आकर पैरों से पकड़ लिया।
श्लोक 40 (skanda.8.87.40)
भ्रामयित्वा च चिक्षेप स चामृत्युरवस्थितः । कार्तस्वनं ज्वरश्चोग्रो रुद्रः प्रहरतां वरः ।
bhrāmayitvā ca cikṣepa sa cāmṛtyuravasthitaḥ | kārtasvanaṁ jvaraścogro rudraḥ praharatāṁ varaḥ |
घुमाकर उसने उसे फेंक दिया, किन्तु वह मानो अमर होकर स्थिर रहा। फिर प्रहारकों में श्रेष्ठ भयंकर रुद्र, ज्वर के सहचर सहित, कार्तस्वन पर,
श्लोक 41 (skanda.8.87.41)
जघान निशितैर्भल्लैर्दशभिः स्तनयोः समम् । कार्तस्वनश्च बाणेन कार्मुकं तस्य दीप्तिमत् । चिच्छेद बहुधा चैनं पुनर्विव्याध पत्रिभिः ।
jaghāna niśitairbhallairdaśabhiḥ stanayoḥ samam | kārtasvanaśca bāṇena kārmukaṁ tasya dīptimat | ciccheda bahudhā cainaṁ punarvivyādha patribhiḥ |
दस तीक्ष्ण भल्ल बाणों से कार्तस्वन की दोनों छातियों पर एक साथ प्रहार किया। कार्तस्वन ने भी एक बाण से उसके तेजस्वी धनुष को अनेक टुकड़ों में काट डाला, और फिर पंखयुक्त बाणों से उसे बींध दिया।
श्लोक 42 (skanda.8.87.42)
रुद्रोपि दण्डं सर्वार्थसाधकम् । भ्रामयित्वाशु चिक्षेप कार्तस्वनरथं प्रति ।
rudropi daṇḍaṁ sarvārthasādhakam | bhrāmayitvāśu cikṣepa kārtasvanarathaṁ prati |
[इस श्लोक का आरम्भिक अंश पाण्डुलिपि में लुप्त है] ...रुद्र ने भी सभी प्रयोजन सिद्ध करने वाले अपने दण्ड को तेजी से घुमाकर कार्तस्वन के रथ की ओर फेंक दिया।
श्लोक 43 (skanda.8.87.43)
तं युगान्तानलप्रख्यं शतसूर्यानलप्रभम् । जघान शरजालेन मेघो वृष्ट्या यथाचलम् ।
taṁ yugāntānalaprakhyaṁ śatasūryānalaprabham | jaghāna śarajālena megho vṛṣṭyā yathācalam |
प्रलयकालीन अग्नि के समान और सैकड़ों सूर्यों की अग्नि के समान तेजस्वी उस दण्ड ने उसे बाणों के जाल से उसी प्रकार आहत किया जैसे मेघ वर्षा से पर्वत को आहत करता है।
श्लोक 44 (skanda.8.87.44)
हन्यमानश्च तैर्दण्डो हविषेद्ध इवानलः । भूयस्तरं प्रज्ज्वाल वेगवच्चाप्यधावत ।
hanyamānaśca tairdaṇḍo haviṣeddha ivānalaḥ | bhūyastaraṁ prajjvāla vegavaccāpyadhāvata |
उन बाणों से आहत होने पर भी वह दण्ड, आहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान और भी अधिक धधक उठा और वेगपूर्वक आगे बढ़ने लगा।
श्लोक 45 (skanda.8.87.45)
तमप्रतिहतं दण्डं ज्ञात्वा कार्तस्वनस्तु । रथमुत्सृज्य वेगेन आकाशस्थोभवद्बली ।
tamapratihataṁ daṇḍaṁ jñātvā kārtasvanastu | rathamutsṛjya vegena ākāśasthobhavadbalī |
उस अजेय दण्ड को पहचानकर, बलवान कार्तस्वन ने अपना रथ त्याग दिया और वेगपूर्वक आकाश में जा खड़ा हुआ।
श्लोक 46 (skanda.8.87.46)
दण्डश्च रथमभ्येत्य सहयं सह यन्तृणा । सध्वजं सपताकश्च भस्म कृत्वा ययौ पुनः ।
daṇḍaśca rathamabhyetya sahayaṁ saha yantṛṇā | sadhvajaṁ sapatākaśca bhasma kṛtvā yayau punaḥ |
वह दण्ड रथ के पास पहुँचकर, घोड़ों सहित, सारथि सहित, ध्वजा और पताका सहित उसे भस्म करके पुनः लौट गया।
श्लोक 47 (skanda.8.87.47)
यावद् दण्डो न पतति रथेनैति च तं प्रति । तावत् कार्तस्वनो रुद्रं शरैरभ्यद्रवद्बली ।
yāvad daṇḍo na patati rathenaiti ca taṁ prati | tāvat kārtasvano rudraṁ śarairabhyadravadbalī |
जब तक वह दण्ड लौटकर नहीं गिरा और रथ द्वारा उसकी ओर नहीं पहुँचा, तब तक बलवान कार्तस्वन ने बाणों से रुद्र पर आक्रमण कर दिया।
श्लोक 48 (skanda.8.87.48)
छित्त्वा ध्वजं धनुश्चास्य तथा योक्त्राणि वाजिनाम् । विरथं तं ज्वरं कृत्वा असिना मूर्ध्न्यताडयत् ।
chittvā dhvajaṁ dhanuścāsya tathā yoktrāṇi vājinām | virathaṁ taṁ jvaraṁ kṛtvā asinā mūrdhnyatāḍayat |
उसकी ध्वजा, धनुष तथा घोड़ों की रस्सियाँ काटकर, उसे तथा ज्वर को रथहीन कर देने के बाद, कार्तस्वन ने तलवार से उसके सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 49 (skanda.8.87.49)
असिघातपरीतात्मा स रुद्रः शत्रुसंसदम् । त्यक्त्वान्यतो ययौ तूर्णं पदातिर्मुनिसत्तम ।
asighātaparītātmā sa rudraḥ śatrusaṁsadam | tyaktvānyato yayau tūrṇaṁ padātirmunisattama |
तलवार के उस प्रहार से चेतनाशून्य-सा होकर रुद्र ने शत्रुओं की उस सभा को त्याग दिया, और हे मुनिश्रेष्ठ! पैदल ही तुरन्त दूसरी ओर चले गए।
श्लोक 50 (skanda.8.87.50)
सोसिघातविपरीतचेतनो रक्तचन्दनविलेपनप्रभः । तं विहाय रिपुमग्र्यविक्रमं द्रुतः सुरबलं यतस्ततः ।
sosighātaviparītacetano raktacandanavilepanaprabhaḥ | taṁ vihāya ripumagryavikramaṁ drutaḥ surabalaṁ yatastataḥ |
तलवार के आघात से जिसकी चेतना उलट गई थी, तथा रक्तचन्दन के लेप के समान आभावाला वह रुद्र, उस अत्यन्त पराक्रमी शत्रु को छोड़कर, जहाँ भी देवसेना थी, वहाँ की ओर वेगपूर्वक भाग गया।