अम्बिका खण्ड · अध्याय 88
रुधिरनदी
श्लोक 1 (skanda.8.88.1)
सनत्कुमार उवाच । अर्यमा बहुभिर्बाणैः प्रह्लादं दैत्यपुङ्गवम् । आजघान रथं घोरं ध्वजश्चास्य व्यशातयत् ।
sanatkumāra uvāca | aryamā bahubhirbāṇaiḥ prahlādaṁ daityapuṅgavam | ājaghāna rathaṁ ghoraṁ dhvajaścāsya vyaśātayat |
सनत्कुमार ने कहा - अर्यमा ने अनेक बाणों से दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद पर प्रहार किया, उसके भयंकर रथ को आहत किया और उसकी ध्वजा को काट डाला।
श्लोक 2 (skanda.8.88.2)
प्रह्लादोऽप्यर्यमन्तं वै रथं त्यक्त्वैव वीर्यवान् । प्रदुद्राव यथा राहुः समये तिमिरापहम् ।
prahlādo'pyaryamantaṁ vai rathaṁ tyaktvaiva vīryavān | pradudrāva yathā rāhuḥ samaye timirāpaham |
वीर्यवान प्रह्लाद भी अपना रथ छोड़कर उसी प्रकार अर्यमा की ओर दौड़ा जैसे ग्रहणकाल में राहु अन्धकार के नाशक सूर्य की ओर दौड़ता है।
श्लोक 3 (skanda.8.88.3)
आधावन्तं च वेगेन विहस्तं रिपुमर्यमा । जघान बहुभिर्बाणैर्वृष्ट्या मेघो यथाचलम् ।
ādhāvantaṁ ca vegena vihastaṁ ripumaryamā | jaghāna bahubhirbāṇairvṛṣṭyā megho yathācalam |
वेगपूर्वक दौड़ते हुए उस निःशस्त्र शत्रु को अर्यमा ने अनेक बाणों से उसी प्रकार आहत किया जैसे मेघ वर्षा से पर्वत को आहत करता है।
श्लोक 4 (skanda.8.88.4)
शरानगणयन्नेव हिरण्यकशिपोः सुतः । क्रोधान्मानाच्च दर्पाच्च वेगेन समधावत ।
śarānagaṇayanneva hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ | krodhānmānācca darpācca vegena samadhāvata |
हिरण्यकशिपु के उस पुत्र ने उन बाणों की परवाह न करते हुए क्रोध, मान और दर्प के वेग से आगे बढ़कर दौड़ लगाई।
श्लोक 5 (skanda.8.88.5)
गृहीत्वा कूबरे तस्य रथं हेमपरिष्कृतम् । चिक्षेप सह सूतेन ततो हर्षान्निनाद च ।
gṛhītvā kūbare tasya rathaṁ hemapariṣkṛtam | cikṣepa saha sūtena tato harṣānnināda ca |
उसने अर्यमा के स्वर्णजड़ित रथ को धुरे से पकड़कर सारथि सहित फेंक दिया, और फिर हर्ष से गर्जना की।
श्लोक 6 (skanda.8.88.6)
अनुह्रादो धरं प्राप्य तेन विद्धः स्तनान्तरे । असिं निष्कृष्य वेगेन धरस्य रथमासदत् ।
anuhrādo dharaṁ prāpya tena viddhaḥ stanāntare | asiṁ niṣkṛṣya vegena dharasya rathamāsadat |
इधर अनुह्राद ने धर के पास पहुँचकर उससे छाती में बींधा जाने पर तलवार खींचकर वेगपूर्वक धर के रथ पर जा चढ़ा।
श्लोक 7 (skanda.8.88.7)
ध्वजं तस्य हयाँश्चैव सारथिं धनुरेव च । छित्त्वा स्कन्धे धरं चैव पुनः स्वरथमभ्यगात् ।
dhvajaṁ tasya hayāṁścaiva sārathiṁ dhanureva ca | chittvā skandhe dharaṁ caiva punaḥ svarathamabhyagāt |
उसकी ध्वजा, घोड़ों, सारथि तथा धनुष को काटकर और धर के कन्धे पर भी वार करके अनुह्राद पुनः अपने रथ पर लौट गया।
श्लोक 8 (skanda.8.88.8)
कर्मणा तेन दैत्यस्य धरोऽभूद् भृशमर्दितः । एवमन्यैश्च दैत्येन्द्रैरन्ये देवा महाबलाः ।
karmaṇā tena daityasya dharo'bhūd bhṛśamarditaḥ | evamanyaiśca daityendrairanye devā mahābalāḥ |
उस पराक्रम से दैत्य धर अत्यन्त पीड़ित हो गया। इसी प्रकार अन्य दैत्येन्द्रों के द्वारा अन्य महाबली देवगण भी,
श्लोक 9 (skanda.8.88.9)
निर्जितास्तर्जिताश्चैव युद्धाय च पुनः स्थिताः । ततः संकुलमेवाभूद्देवानां दानवैस्सह ।
nirjitāstarjitāścaiva yuddhāya ca punaḥ sthitāḥ | tataḥ saṁkulamevābhūddevānāṁ dānavaissaha |
कहीं पराजित हुए, कहीं धमकाए गए, और फिर से युद्ध के लिए डट गए। तब देवों और दानवों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 10 (skanda.8.88.10)
परस्परजिगीषूणां युद्धं भीरुभयावहम् । ततो भेर्यश्च शंखाश्च पटहासेक्यपुष्कलाः ।
parasparajigīṣūṇāṁ yuddhaṁ bhīrubhayāvaham | tato bheryaśca śaṁkhāśca paṭahāsekyapuṣkalāḥ |
एक-दूसरे पर विजय चाहने वालों का वह युद्ध कायरों के लिए भयावह था। तब भेरियाँ, शंख, पटह, आसेक्य और पुष्कल वाद्य,
श्लोक 11 (skanda.8.88.11)
झर्झर्यः पेपुकाश्चैव डिण्डिमा गोविषाणकाः । अवाद्यन्त बले व्यास उभयेषां सहस्रशः ।
jharjharyaḥ pepukāścaiva ḍiṇḍimā goviṣāṇakāḥ | avādyanta bale vyāsa ubhayeṣāṁ sahasraśaḥ |
झर्झरी, पेपु, डिंडिम तथा गोविषाणक बाजे - हे व्यास! दोनों सेनाओं में हजारों की संख्या में एक साथ बज उठे।
श्लोक 12 (skanda.8.88.12)
ततोऽसृगोघप्रवहा पताकध्वजपादपा । गजाश्वग्राहबहुला रथप्रवरकच्छपा ।
tato'sṛgoghapravahā patākadhvajapādapā | gajāśvagrāhabahulā rathapravarakacchapā |
तब रक्त की धारा से बहती हुई, पताकाओं और ध्वजाओं के वृक्षों वाली, हाथी-घोड़ों के रूप में अनेक जलजन्तुओं वाली, तथा श्रेष्ठ रथों के रूप में कछुओं वाली,
श्लोक 13 (skanda.8.88.13)
केशशैवालबहुला धनुर्ज्याकृततन्तुका । निष्टनच्छस्त्रमण्डूका दुकूलच्छत्रफेनिला ।
keśaśaivālabahulā dhanurjyākṛtatantukā | niṣṭanacchastramaṇḍūkā dukūlacchatraphenilā |
बालों के रूप में प्रचुर शैवाल वाली, धनुष की डोरियों से बने हुए तन्तुओं वाली, हाहाकार करते शस्त्रों के रूप में मेंढ़कों वाली, तथा वस्त्रों और छत्रों के रूप में झाग वाली,
श्लोक 14 (skanda.8.88.14)
उष्णीषवरहंसा च करपादशिरःपला । हारकेयूरसिकता मुकुटोत्फुल्लपंकजा ।
uṣṇīṣavarahaṁsā ca karapādaśiraḥpalā | hārakeyūrasikatā mukuṭotphullapaṁkajā |
पगड़ियों के रूप में श्रेष्ठ हंसों वाली, हाथों-पैरों तथा सिरों के रूप में शिलाओं वाली, हारों और भुजबन्दों के रूप में बालू वाली, तथा मुकुटों के रूप में खिले हुए कमलों वाली,
श्लोक 15 (skanda.8.88.15)
मेदोऽस्रकफपंका च प्राणजीवितनाशनी । प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिनी ।
medo'srakaphapaṁkā ca prāṇajīvitanāśanī | prāvartata nadī ghorā hastyaśvarathavāhinī |
वसा, रक्त और कफ के कीचड़ वाली, प्राणों और जीवन का नाश करने वाली, हाथी-घोड़ों और रथों को बहाने वाली वह भयंकर नदी बह चली।
श्लोक 16 (skanda.8.88.16)
तस्यां स्नायन्ति रक्षांसि पिबन्ति च रमन्ति च । नृत्यन्ति चापि विविधा भीरूणां भयदास्तथा ।
tasyāṁ snāyanti rakṣāṁsi pibanti ca ramanti ca | nṛtyanti cāpi vividhā bhīrūṇāṁ bhayadāstathā |
उस नदी में राक्षस स्नान करते, उसका पान करते और रमण करते थे, तथा अनेक प्रकार से नृत्य भी करते थे - वे भीरुओं के लिए भय उत्पन्न करने वाले थे।
श्लोक 17 (skanda.8.88.17)
गृध्रा गोमायवश्चैव श्वानो मार्जारवायसाः । चक्षूंषि करपादान्त्रं भक्षयन्तीभिरेमिरे ।
gṛdhrā gomāyavaścaiva śvāno mārjāravāyasāḥ | cakṣūṁṣi karapādāntraṁ bhakṣayantībhiremire |
गीध, सियार, कुत्ते, बिल्लियाँ और कौए वहाँ आँखों, हाथों, पैरों और आँतों को खाते हुए इधर-उधर घूमते थे।
श्लोक 18 (skanda.8.88.18)
ममायं हस्तिनः पादो ममायं मेदपट्टकः । ममायं च करः शुक्रो बाहुश्च रुधिरस्यदः ।
mamāyaṁ hastinaḥ pādo mamāyaṁ medapaṭṭakaḥ | mamāyaṁ ca karaḥ śukro bāhuśca rudhirasyadaḥ |
"यह हाथी का पैर मेरा है, यह चर्बी का टुकड़ा मेरा है, यह शुभ्र हाथ मेरा है, और यह रक्त बहाती हुई भुजा मेरी है" -
श्लोक 19 (skanda.8.88.19)
ममायं तव नायं च गृह्ण पश्येति चैव हि । कलहं चक्रिरे तत्र क्रूराः पिशितभोजनाः ।
mamāyaṁ tava nāyaṁ ca gṛhṇa paśyeti caiva hi | kalahaṁ cakrire tatra krūrāḥ piśitabhojanāḥ |
"यह मेरा है, तुम्हारा नहीं है, ले लो, देखो" - इस प्रकार वहाँ मांसभक्षी क्रूर प्राणी आपस में झगड़ने लगे।
श्लोक 20 (skanda.8.88.20)
त्यक्त्वान्ये च हताँस्तत्र स्वदेहान् सुमहारथाः । विमानैः स्त्रीजनाकीर्णैः प्रययुर्ब्रह्मणः सदः ।
tyaktvānye ca hatāṁstatra svadehān sumahārathāḥ | vimānaiḥ strījanākīrṇaiḥ prayayurbrahmaṇaḥ sadaḥ |
वहीं अनेक महारथी योद्धा अपने मारे गए शरीरों को त्यागकर, अप्सराओं से भरे विमानों पर बैठकर ब्रह्मलोक की सभा में चले गए।
श्लोक 21 (skanda.8.88.21)
अपरे पापकर्माणो हन्यमाना रुषान्धितैः । पतन्ति नरके घोरे क्रन्दमाना मुहुर्मुहुः ।
apare pāpakarmāṇo hanyamānā ruṣāndhitaiḥ | patanti narake ghore krandamānā muhurmuhuḥ |
अन्य कुछ पापकर्म करने वाले, क्रोधान्ध शत्रुओं के द्वारा मारे जाकर, बारम्बार क्रन्दन करते हुए भयंकर नरक में गिरते थे।
श्लोक 22 (skanda.8.88.22)
केचिदार्तास्वरं कृत्वा षार्दिताः । म्रियन्ते पुरुषा युद्धे शतशोऽथ सहस्रशः ।
kecidārtāsvaraṁ kṛtvā ṣārditāḥ | mriyante puruṣā yuddhe śataśo'tha sahasraśaḥ |
कुछ लोग पीड़ा की चीत्कार करते हुए [इस पंक्ति का शेष अंश पाण्डुलिपि में लुप्त है], व्यथित होकर युद्ध में सैकड़ों और हजारों की संख्या में मरते थे।
श्लोक 23 (skanda.8.88.23)
दशन्तश्च तृणान्यन्ये भ्रातः पुत्रेति चापरे । क्रन्दमाना जना भीताः प्राणान् कृच्छ्रेण तत्यजुः ।
daśantaśca tṛṇānyanye bhrātaḥ putreti cāpare | krandamānā janā bhītāḥ prāṇān kṛcchreṇa tatyajuḥ |
कुछ लोग घास दाँतों से काटते हुए, अन्य "हे भाई", "हे पुत्र" ऐसा पुकारते हुए, भयभीत होकर क्रन्दन करते हुए बड़ी कठिनाई से प्राण त्याग रहे थे।
श्लोक 24 (skanda.8.88.24)
संदष्टौष्ठपुटाः केचिद् देवासुरमहारथाः । शरसन्नतमर्माणः पतन्त्युर्व्यां द्रुमा इव ।
saṁdaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kecid devāsuramahārathāḥ | śarasannatamarmāṇaḥ patantyurvyāṁ drumā iva |
होठों को दाँतों से दबाए हुए देव और असुरों के अनेक महारथी, बाणों से वीथियाँ बिंधकर वृक्षों के समान पृथ्वी पर गिर पड़ते थे।
श्लोक 25 (skanda.8.88.25)
अशिवानि शिवा नेदुरट्टहासाँश्च राक्षसाः । आर्तनादाँश्च पुरुषास्तथैव गजवाजिनः ।
aśivāni śivā neduraṭṭahāsāṁśca rākṣasāḥ | ārtanādāṁśca puruṣāstathaiva gajavājinaḥ |
सियारिनें अशुभ शब्द करती थीं, राक्षस अट्टहास करते थे, और मनुष्य, हाथी तथा घोड़े पीड़ा से चीत्कार करते थे।
श्लोक 26 (skanda.8.88.26)
सिंहनादाश्च शूराणां बाहुशब्दाश्च पुष्कलाः । धनुषां कृष्यमाणानां शब्दा वाद्यरवास्तथा ।
siṁhanādāśca śūrāṇāṁ bāhuśabdāśca puṣkalāḥ | dhanuṣāṁ kṛṣyamāṇānāṁ śabdā vādyaravāstathā |
वीरों के सिंहनाद, प्रचुर भुजाओं की थपथपाहट, खींचे जाते धनुषों की टंकार और वाद्यों की ध्वनि -
श्लोक 27 (skanda.8.88.27)
अथेन्द्रश्च धनेशश्च यमः कालश्च वीर्यवान् । वरुणो मरुतश्चैव विश्वेदेवाश्च सर्वशः ।
athendraśca dhaneśaśca yamaḥ kālaśca vīryavān | varuṇo marutaścaiva viśvedevāśca sarvaśaḥ |
तब इन्द्र, कुबेर, यम, बलशाली काल, वरुण, मरुद्गण तथा सभी विश्वेदेव,
श्लोक 28 (skanda.8.88.28)
मित्रश्चैव जयन्तश्च भगः पूषार्यमा तथा । कापाली चापि यो रुद्रो वसवश्च महाबलाः ।
mitraścaiva jayantaśca bhagaḥ pūṣāryamā tathā | kāpālī cāpi yo rudro vasavaśca mahābalāḥ |
मित्र, जयन्त, भग, पूषा, अर्यमा, कापाली रुद्र, तथा महाबली वसुगण,
श्लोक 29 (skanda.8.88.29)
नासत्यश्चैव दस्रश्च पृश्नयश्च सुरोत्तमाः । एते चान्ये च देवानां प्रवरा बाहुशालिनः ।
nāsatyaścaiva dasraśca pṛśnayaśca surottamāḥ | ete cānye ca devānāṁ pravarā bāhuśālinaḥ |
नासत्य, दस्र तथा पृश्नि के पुत्र मरुद्गण जैसे श्रेष्ठ देवगण - ये तथा अन्य भी शक्तिशाली भुजाओं वाले देवताओं में श्रेष्ठ,
श्लोक 30 (skanda.8.88.30)
दानवानां बले वेगं बलवन्तोऽभिचक्रिरे । सागरा इव गर्जन्तो युगान्ते अनला इव ।
dānavānāṁ bale vegaṁ balavanto'bhicakrire | sāgarā iva garjanto yugānte analā iva |
दानवों की सेना पर बलपूर्वक वेगपूर्वक टूट पड़े - समुद्रों के समान गर्जते हुए, प्रलयकाल की अग्नि के समान,
श्लोक 31 (skanda.8.88.31)
प्रभञ्जना इवाकाले महान्त इव चाचलाः । वृषभा इव नर्दन्तो बृहन्त इव कुञ्जराः ।
prabhañjanā ivākāle mahānta iva cācalāḥ | vṛṣabhā iva nardanto bṛhanta iva kuñjarāḥ |
असमय के तूफानों के समान, विशाल पर्वतों के समान, गरजते हुए बैलों के समान, तथा विशालकाय हाथियों के समान,
श्लोक 32 (skanda.8.88.32)
ग्रसन्तश्च यथा ग्राहाश्छिन्दन्तो मकरा इव । वर्षमाणा इव घनाः सिंहा इव च नर्दिनः । दानवानां बलं सर्वे वेगेनैवाभ्यवारयन् ।
grasantaśca yathā grāhāśchindanto makarā iva | varṣamāṇā iva ghanāḥ siṁhā iva ca nardinaḥ | dānavānāṁ balaṁ sarve vegenaivābhyavārayan |
मगरमच्छों के समान निगलते हुए, मत्स्यों के समान काटते हुए, बरसते हुए मेघों के समान, और गरजते सिंहों के समान - इस प्रकार सभी देवगण दानवों की सेना को वेगपूर्वक रोकने में जुट गए।
श्लोक 33 (skanda.8.88.33)
तद्देववेगप्रहताभिवेगं बलं सयत्नं दनुदानवानाम् । भवत्यनाधारमतिप्रसक्तं तृणं यथा वह्निमुखावसक्तम् ।
taddevavegaprahatābhivegaṁ balaṁ sayatnaṁ danudānavānām | bhavatyanādhāramatiprasaktaṁ tṛṇaṁ yathā vahnimukhāvasaktam |
देवताओं के वेग से आहत होकर, दनु के दानवों की वह अभिमानपूर्ण और प्रयत्नशील सेना उसी प्रकार निराधार हो गई जैसे अग्निमुख में लगा हुआ तृण जलकर निराधार हो जाता है।