अम्बिका खण्ड · अध्याय 89
हिरण्याक्षकोपः
श्लोक 1 (skanda.8.89.1)
सनत्कुमार उवाच । तेषां तद्वेगनुन्नानां भग्नानां क्लिश्यतां पुनः । त्राणार्थमतिदीप्ताक्षो हिरण्याक्षोऽग्रहीत्पदम् ।
sanatkumāra uvāca | teṣāṁ tadveganunnānāṁ bhagnānāṁ kliśyatāṁ punaḥ | trāṇārthamatidīptākṣo hiraṇyākṣo'grahītpadam |
सनत्कुमार ने कहा - उस वेग से धकेले गए, भग्न होकर पुनः पीड़ित होते हुए उन दैत्यों की रक्षा के लिए, अत्यन्त तेजस्वी नेत्रों वाले हिरण्याक्ष ने आगे कदम बढ़ाया।
श्लोक 2 (skanda.8.89.2)
अन्धकश्च महामायो भ्रातरश्चास्य तत्समाः । शतं रथसहस्राणां सर्वेषामपलायिनाम् ।
andhakaśca mahāmāyo bhrātaraścāsya tatsamāḥ | śataṁ rathasahasrāṇāṁ sarveṣāmapalāyinām |
महामायावी अन्धक और उसके समान पराक्रमी उसके भाई, तथा युद्ध से न भागने वाले सौ हजार रथों वाले सभी योद्धा,
श्लोक 3 (skanda.8.89.3)
प्रह्लादश्च सहभ्राता हिरण्यकशिपोः सुतः । विप्रचितिः सहभ्राता सैंहिकेयैश्च तैस्सह ।
prahlādaśca sahabhrātā hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ | vipracitiḥ sahabhrātā saiṁhikeyaiśca taissaha |
हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद अपने भाइयों सहित, विप्रचित्ति अपने भाइयों सहित, तथा सैंहिकेय राहु आदि के साथ,
श्लोक 4 (skanda.8.89.4)
गृह्ण गृह्णेति नर्दन्तो देवान् प्रत्युद्ययुस्तदा । तेषां तेषां च संग्रामः सुघोरः समपद्यत ।
gṛhṇa gṛhṇeti nardanto devān pratyudyayustadā | teṣāṁ teṣāṁ ca saṁgrāmaḥ sughoraḥ samapadyata |
"पकड़ो, पकड़ो" ऐसा गरजते हुए तब देवताओं की ओर बढ़े। उनका वह घोर युद्ध पुनः छिड़ गया।
श्लोक 5 (skanda.8.89.5)
ग्राहाणामिव काण्डे च गजानामिव वा वने । इन्द्रस्त्वष्टा च पूषा च हिरण्याक्षमवारयन् ।
grāhāṇāmiva kāṇḍe ca gajānāmiva vā vane | indrastvaṣṭā ca pūṣā ca hiraṇyākṣamavārayan |
जैसे बाढ़ में मगरमच्छ, या जैसे वन में हाथी लड़ते हैं, उसी प्रकार इन्द्र, त्वष्टा और पूषा ने हिरण्याक्ष को रोका।
श्लोक 6 (skanda.8.89.6)
संगत्य सायकैस्तीक्ष्णैः सर्वमर्मस्वताडयन् । तेषां धनूंषि चित्राणि अस्यतां तु दिवौकसाम् ।
saṁgatya sāyakaistīkṣṇaiḥ sarvamarmasvatāḍayan | teṣāṁ dhanūṁṣi citrāṇi asyatāṁ tu divaukasām |
पास पहुँचकर उन्होंने तीक्ष्ण बाणों से उसके समस्त मर्मस्थलों पर प्रहार किया। बाण छोड़ते हुए उन देवताओं के विचित्र धनुषों को,
श्लोक 7 (skanda.8.89.7)
मायाबलेन दैत्येन्द्रो व्यष्टम्भयत दीप्तिमान् । तानि विष्टम्भितानि स्म तदा दैत्येन मायया ।
māyābalena daityendro vyaṣṭambhayata dīptimān | tāni viṣṭambhitāni sma tadā daityena māyayā |
उस तेजस्वी दैत्येन्द्र ने अपनी माया-शक्ति से जकड़ दिया। दैत्य की उस माया से वे धनुष उसी क्षण स्तम्भित हो गए,
श्लोक 8 (skanda.8.89.8)
नानमन्ति यथा पूर्वं ततस्ते ह्याकुलाभवन् । सोऽपि दैत्यो महामायो नदित्वा मेघनिस्वनम् ।
nānamanti yathā pūrvaṁ tataste hyākulābhavan | so'pi daityo mahāmāyo naditvā meghanisvanam |
और पहले की तरह झुकते नहीं थे; इससे वे व्याकुल हो गए। वह महामायावी दैत्य भी मेघगर्जन के समान गरजकर,
श्लोक 9 (skanda.8.89.9)
बबन्ध तेषां गात्राणि समन्तादस्त्रमायया । तान् बद्धाँश्च समीक्ष्यैवमकर्मण्यान् महाबलान् ।
babandha teṣāṁ gātrāṇi samantādastramāyayā | tān baddhāṁśca samīkṣyaivamakarmaṇyān mahābalān |
अपनी अस्त्र-माया से चारों ओर से उनके शरीरों को बाँध दिया। इस प्रकार बाँधे गए और असमर्थ हुए उन महाबली देवताओं को देखकर,
श्लोक 10 (skanda.8.89.10)
यन्तारो वाहनैः क्षिप्रं जह्रुस्तस्माद्रणाजिरात् । अथ कालो यमश्चैव धनेशो मित्र एव च ।
yantāro vāhanaiḥ kṣipraṁ jahrustasmādraṇājirāt | atha kālo yamaścaiva dhaneśo mitra eva ca |
उनके सारथियों ने वाहनों सहित शीघ्र ही उन्हें उस रणभूमि से हटा लिया। फिर काल, यम, कुबेर तथा मित्र,
श्लोक 11 (skanda.8.89.11)
वरुणो वसवः सर्वे अश्विनौ च महाबलौ । प्रगृहीतायुधाः क्रुद्धास्तिष्ठतिष्ठेतिवादिनः ।
varuṇo vasavaḥ sarve aśvinau ca mahābalau | pragṛhītāyudhāḥ kruddhāstiṣṭhatiṣṭhetivādinaḥ |
वरुण, समस्त वसुगण, तथा महाबली अश्विनीकुमार, अस्त्र-शस्त्र हाथ में लिए हुए क्रोधपूर्वक "ठहरो, ठहरो" ऐसा पुकारते हुए,
श्लोक 12 (skanda.8.89.12)
अभ्यद्रवन्त वेगेन हिरण्याक्षं महासुरम् । तेषामापततां संख्ये स दैत्यः क्रोधमूर्च्छितः ।
abhyadravanta vegena hiraṇyākṣaṁ mahāsuram | teṣāmāpatatāṁ saṁkhye sa daityaḥ krodhamūrcchitaḥ |
वेगपूर्वक महासुर हिरण्याक्ष की ओर दौड़े। युद्ध में झपटते हुए उन सबके सम्मुख वह क्रोध से मूर्च्छित दैत्य,
श्लोक 13 (skanda.8.89.13)
सर्वेषां सायकैस्तीक्ष्णैर्बिभेद कवचान् युधि । ते भिन्नकवचाः सर्वे क्रोधात् प्रज्वलिताननाः ।
sarveṣāṁ sāyakaistīkṣṇairbibheda kavacān yudhi | te bhinnakavacāḥ sarve krodhāt prajvalitānanāḥ |
तीक्ष्ण बाणों से युद्धस्थल में उन सबके कवच बींध डाले। कवच बिंध जाने पर वे सभी क्रोध से मुख जलाते हुए,
श्लोक 14 (skanda.8.89.14)
ससर्जुरस्त्रमुख्यानि तदाप्रतिहतान्युत । यमो दण्डं ससर्जास्य तथा कालश्च ।
sasarjurastramukhyāni tadāpratihatānyuta | yamo daṇḍaṁ sasarjāsya tathā kālaśca |
उन्होंने अपने प्रमुख अस्त्र छोड़े जो प्रतिरोधरहित थे। यम ने उस पर अपना दण्ड छोड़ा, तथा काल ने भी [इस पाद का शेष अंश पाण्डुलिपि में लुप्त है, संभवतः काल के अस्त्र का उल्लेख था]।
श्लोक 15 (skanda.8.89.15)
धनेशश्चाशनिं घोरं वरुणः पाशमेव च । भगश्च मुशलं घोरमन्ये चान्याँस्तथामराः ।
dhaneśaścāśaniṁ ghoraṁ varuṇaḥ pāśameva ca | bhagaśca muśalaṁ ghoramanye cānyāṁstathāmarāḥ |
कुबेर ने भयंकर वज्रास्त्र, वरुण ने अपना पाश, भग ने भयंकर मूसल, तथा अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने भयंकर अस्त्र छोड़े।
श्लोक 16 (skanda.8.89.16)
तान् स दैत्यो हसन्नेव सायकैर्मर्मभेदिभिः । व्यष्टम्भयददीनात्मा शक्रहस्तं यथा भवः ।
tān sa daityo hasanneva sāyakairmarmabhedibhiḥ | vyaṣṭambhayadadīnātmā śakrahastaṁ yathā bhavaḥ |
उन सबको उस दृढ़चित्त दैत्य ने हँसते हुए ही मर्मभेदी बाणों से रोक दिया, उसी प्रकार जैसे भगवान भव ने इन्द्र के हाथ को रोक दिया था।
श्लोक 17 (skanda.8.89.17)
साधुवादाँस्ततो हृष्टा दानवानां महारथाः । समं चक्रुश्च संपूज्य हिरण्याक्षं महासुरम् ।
sādhuvādāṁstato hṛṣṭā dānavānāṁ mahārathāḥ | samaṁ cakruśca saṁpūjya hiraṇyākṣaṁ mahāsuram |
तब प्रसन्न होकर दानवों के महारथियों ने एक साथ साधुवाद दिए और महासुर हिरण्याक्ष का पूजन-सत्कार किया।
श्लोक 18 (skanda.8.89.18)
अपरे नैतदाश्चर्यं दितिपुत्रस्य संयुगे । कश्यपेन प्रसूतस्य राज्ञोऽस्माकं च स्वामिनः ।
apare naitadāścaryaṁ ditiputrasya saṁyuge | kaśyapena prasūtasya rājño'smākaṁ ca svāminaḥ |
अन्य कुछ बोले - "युद्ध में दिति-पुत्र, कश्यप से उत्पन्न, हमारे राजा और स्वामी के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
श्लोक 19 (skanda.8.89.19)
अपरे सिंहनादाँश्च बाहुशब्दाँश्च पुष्कलान् । चक्रुर्हृष्टाश्च वाद्यानि तथा सर्वाण्यवादयन् ।
apare siṁhanādāṁśca bāhuśabdāṁśca puṣkalān | cakrurhṛṣṭāśca vādyāni tathā sarvāṇyavādayan |
अन्य कुछ हर्षित होकर सिंहनाद तथा प्रचुर भुजाओं की गर्जना करने लगे, और सभी प्रकार के वाद्य बजाने लगे।
श्लोक 20 (skanda.8.89.20)
एवं हि संप्रहृष्टानां दानवानां महाहवे । पाराशर्य गिरो बह्व्यः श्रूयन्ते स्तुति ।
evaṁ hi saṁprahṛṣṭānāṁ dānavānāṁ mahāhave | pārāśarya giro bahvyaḥ śrūyante stuti |
हे पाराशर्य! इस प्रकार उस महासंग्राम में अत्यन्त हर्षित हुए दानवों की स्तुति में अनेक वाणियाँ सुनाई देती थीं [इस श्लोक का शेष अंश पाण्डुलिपि में लुप्त है]।
श्लोक 21 (skanda.8.89.21)
तेषां प्रहर्षं ज्ञात्वेत्थं देवभंगं च तं तदा । सर्वप्राणिचरो वायुरसुरानभिदुद्रुवे ।
teṣāṁ praharṣaṁ jñātvetthaṁ devabhaṁgaṁ ca taṁ tadā | sarvaprāṇicaro vāyurasurānabhidudruve |
उनके इस हर्ष तथा देवताओं की उस पराजय को जानकर, सभी प्राणियों में संचरण करने वाले वायु ने असुरों पर आक्रमण कर दिया।
श्लोक 22 (skanda.8.89.22)
सहस्रनल्वमात्रेण स रथेन प्रभंजनः । समन्ताद् ध्वजयुक्तेन पताकाशतमालिना ।
sahasranalvamātreṇa sa rathena prabhaṁjanaḥ | samantād dhvajayuktena patākāśatamālinā |
वह प्रभंजन एक हजार नल्व लम्बे, चारों ओर से ध्वजाओं से युक्त, सैकड़ों पताकाओं की मालाओं वाले रथ पर सवार होकर,
श्लोक 23 (skanda.8.89.23)
जवेन यन्तृणां यत्नान्निगृहीतेन शब्दवान् । प्रपूरयन् दिशः सर्वाः सहसा प्रत्यदृश्यत ।
javena yantṛṇāṁ yatnānnigṛhītena śabdavān | prapūrayan diśaḥ sarvāḥ sahasā pratyadṛśyata |
सारथियों के प्रयत्नपूर्वक थामे हुए वेग से, गर्जना करता हुआ, सभी दिशाओं को भरता हुआ, अचानक प्रकट हो गया।
श्लोक 24 (skanda.8.89.24)
स पञ्चभिः शरैस्तीक्ष्णैर्दैत्यराजमथाव्यथः । आहृत्य योजने तस्माद्देशात् क्षिप्रमवासृजत् ।
sa pañcabhiḥ śaraistīkṣṇairdaityarājamathāvyathaḥ | āhṛtya yojane tasmāddeśāt kṣipramavāsṛjat |
निर्भय होकर उसने पाँच तीक्ष्ण बाणों से दैत्यराज को बींध दिया, और उसे उस स्थान से एक योजन दूर तक खींचकर शीघ्र ही छोड़ दिया।
श्लोक 25 (skanda.8.89.25)
अन्धकश्च ततः षष्ट्या विप्रचित्तिश्च सप्तभिः । मयं पञ्चाशता विद्ध्वा सप्तभिः सप्तभिः पुनः ।
andhakaśca tataḥ ṣaṣṭyā vipracittiśca saptabhiḥ | mayaṁ pañcāśatā viddhvā saptabhiḥ saptabhiḥ punaḥ |
फिर उसने साठ बाणों से अन्धक को, सात बाणों से विप्रचित्ति को, तथा पचास बाणों से मय को बींधा, और फिर सात-सात बाणों से,
श्लोक 26 (skanda.8.89.26)
दैत्याश्च दानवश्चैव सर्वान् विव्याध तत्क्षणात् । पुनः पुलोमपुत्राँश्च निवातकवचानपि ।
daityāśca dānavaścaiva sarvān vivyādha tatkṣaṇāt | punaḥ pulomaputrāṁśca nivātakavacānapi |
उसी क्षण सभी दैत्यों और दानवों को बींध दिया, तथा पुनः पुलोमा-पुत्रों और निवातकवचों को भी बींध डाला।
श्लोक 27 (skanda.8.89.27)
ते तेन बहुभिर्विद्धाः शरैरसुरपुङ्गवाः । दिक्षु सर्वासु विक्षिप्ता योजनान्तरिताः स्थिताः ।
te tena bahubhirviddhāḥ śarairasurapuṅgavāḥ | dikṣu sarvāsu vikṣiptā yojanāntaritāḥ sthitāḥ |
उसके अनेक बाणों से बिंधकर वे असुरश्रेष्ठ सभी दिशाओं में बिखेर दिए गए और एक योजन की दूरी पर जा खड़े हुए।
श्लोक 28 (skanda.8.89.28)
यान्याँश्च ते विमुञ्चन्ति गदामुशलपट्टिशान् । तान् सर्वान् भगवान् वायुर्दानवोपर्यपातयत् ।
yānyāṁśca te vimuñcanti gadāmuśalapaṭṭiśān | tān sarvān bhagavān vāyurdānavoparyapātayat |
जो भी गदाएँ, मूसल और पट्टिश उन्होंने छोड़े, भगवान वायु ने उन सभी को दानवों के ऊपर ही पलटकर गिरा दिया।
श्लोक 29 (skanda.8.89.29)
ते हता हन्यमानाश्च स्वमुक्तैरायुधैर्भृशम् । आर्तनादान् प्रकुर्वाणाः प्राद्रवन्त दिशो दिशः ।
te hatā hanyamānāśca svamuktairāyudhairbhṛśam | ārtanādān prakurvāṇāḥ prādravanta diśo diśaḥ |
अपने ही छोड़े हुए अस्त्रों से बुरी तरह मार खाते हुए वे पीड़ा से चीत्कार करते हुए दिशा-दिशा में भाग गए।
श्लोक 30 (skanda.8.89.30)
सोऽपि वायुर्महावेगो बभञ्ज रथसत्तमान् । पांशुवर्षेण च पुनश्चक्षूंष्येषामपूरयत् ।
so'pi vāyurmahāvego babhañja rathasattamān | pāṁśuvarṣeṇa ca punaścakṣūṁṣyeṣāmapūrayat |
उस महावेगशाली वायु ने उनके श्रेष्ठ रथों को भी तोड़ डाला, और धूलिवर्षा से उनकी आँखों को भर दिया।
श्लोक 31 (skanda.8.89.31)
ततस्ते भयसन्त्रस्ता नोत्ससर्जुस्तदा शरान् । शस्त्राणि च तथान्यानि युꣳजशश्चावतस्थिरे ।
tataste bhayasantrastā notsasarjustadā śarān | śastrāṇi ca tathānyāni yuꣳjaśaścāvatasthire |
तब भय से त्रस्त होकर वे बाण भी नहीं छोड़ सके, और अन्य शस्त्रों को थामे हुए बस स्थिर खड़े रह गए।
श्लोक 32 (skanda.8.89.32)
तस्य तत्कर्म संवीक्ष्य हिरण्याक्षः प्रतापवान् । उवाच दानवान् सर्वान् गर्हयन् दितिनन्दनः ।
tasya tatkarma saṁvīkṣya hiraṇyākṣaḥ pratāpavān | uvāca dānavān sarvān garhayan ditinandanaḥ |
वायु के उस कर्म को देखकर, प्रतापी दितिनन्दन हिरण्याक्ष ने सभी दानवों को धिक्कारते हुए कहा -
श्लोक 33 (skanda.8.89.33)
धिग्वो दैत्या बलं सर्वं धिग्दर्पा धिक्पराक्रमाः । विसृज्य रणमव्यग्रा यात स्त्रीकर्म सेवत ।
dhigvo daityā balaṁ sarvaṁ dhigdarpā dhikparākramāḥ | visṛjya raṇamavyagrā yāta strīkarma sevata |
"हे दैत्यों, तुम्हारे इस समस्त बल को धिक्कार है, तुम्हारे दर्प को धिक्कार है, तुम्हारे पराक्रम को धिक्कार है। रणभूमि छोड़कर निश्चिन्त होकर जाओ, स्त्रियों के कार्य में लग जाओ।
श्लोक 34 (skanda.8.89.34)
ये यूयं रणमध्यस्था जीविते सति बालिशाः । एकेन वायुना भग्ना धिग्वस्तन्मन्त्रितं पुरा ।
ye yūyaṁ raṇamadhyasthā jīvite sati bāliśāḥ | ekena vāyunā bhagnā dhigvastanmantritaṁ purā |
तुम जो युद्ध के बीच में खड़े होकर भी, जीवित रहते हुए, बालकों के समान एक अकेले वायु से टूट गए - धिक्कार है उस मन्त्रणा को जो पहले तुमने की थी।
श्लोक 35 (skanda.8.89.35)
अथवा यन्मया प्रोक्तं यूयं बाला रतिक्लमाः । तत्तथा नास्ति सन्देहो बालैरिव हि वः कृतम् ।
athavā yanmayā proktaṁ yūyaṁ bālā ratiklamāḥ | tattathā nāsti sandeho bālairiva hi vaḥ kṛtam |
अथवा जो मैंने कहा था कि तुम बालक हो, विलास में थके-मांदे हो, वह ठीक ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं; तुमने बालकों के समान ही आचरण किया है।
श्लोक 36 (skanda.8.89.36)
तिष्ठध्वं बालवत् सर्वे रक्षन्तो जीवितं स्वकम् । अहमेको विजेष्यामि वायुमेनं प्रपश्यत ।
tiṣṭhadhvaṁ bālavat sarve rakṣanto jīvitaṁ svakam | ahameko vijeṣyāmi vāyumenaṁ prapaśyata |
तुम सब बालकों के समान अपने-अपने प्राणों की रक्षा करते हुए यहीं खड़े रहो; मैं अकेला ही इस वायु को जीत लूँगा, तुम देखते रहो।"
श्लोक 37 (skanda.8.89.37)
ततः स पर्वतो भूत्वा दितिपुत्रः प्रतापवान् । समन्ताद् वायुवेगं तं समवारयदव्ययः ।
tataḥ sa parvato bhūtvā ditiputraḥ pratāpavān | samantād vāyuvegaṁ taṁ samavārayadavyayaḥ |
तब उस प्रतापी, अविनाशी दितिपुत्र ने पर्वत का रूप धारण करके सब ओर से वायु के उस वेग को रोक दिया।
श्लोक 38 (skanda.8.89.38)
त्वानिलं ज्ञात्वा पर्वतेन निवारितम् । अन्धको बाहुपाशेन अवप्लुत्याबबन्ध तम् ।
tvānilaṁ jñātvā parvatena nivāritam | andhako bāhupāśena avaplutyābabandha tam |
[इस पाद का आरम्भिक अंश पाण्डुलिपि में लुप्त है] ...वायु को पर्वत के द्वारा रोका गया जानकर, अन्धक ने कूदकर अपने भुजापाश से उसे बाँध लिया।
श्लोक 39 (skanda.8.89.39)
स बद्धो बाहुपाशेन तदा वायुः प्रतापवान् । संप्रगृह्यान्धकं शीघ्रमुत्पपात विहायसा ।
sa baddho bāhupāśena tadā vāyuḥ pratāpavān | saṁpragṛhyāndhakaṁ śīghramutpapāta vihāyasā |
भुजापाश से बँधा हुआ वह प्रतापी वायु भी अन्धक को शीघ्र ही पकड़कर आकाश में उड़ गया।
श्लोक 40 (skanda.8.89.40)
तस्योत्पतितमात्रस्य प्रगृह्यान्धकदानवम् । राहुर्गदां महारौद्रां क्षिप्रं मूर्ध्नि न्यपातयत् । अभ्येत्य पादयोश्चैव विप्रचितिर्महाबलः ।
tasyotpatitamātrasya pragṛhyāndhakadānavam | rāhurgadāṁ mahāraudrāṁ kṣipraṁ mūrdhni nyapātayat | abhyetya pādayoścaiva vipracitirmahābalaḥ |
उसके उड़ते ही राहु ने अन्धक दानव को अपनी अत्यन्त भयंकर गदा से तुरन्त सिर पर मार दिया, और महाबली विप्रचित्ति ने पास आकर उसके दोनों पैर पकड़ लिए।
श्लोक 41 (skanda.8.89.41)
जग्राह सुमहाग्राहो मत्स्यानिव महार्णवे । स तेन सुप्रहारेण विह्वलः प्राणिगोचरः ।
jagrāha sumahāgrāho matsyāniva mahārṇave | sa tena suprahāreṇa vihvalaḥ prāṇigocaraḥ |
जैसे विशाल मगरमच्छ महासागर में मछलियों को पकड़ लेता है, वैसे ही उसने अन्धक को पकड़ लिया। उस भारी प्रहार से वह प्राणीमात्र के देखते-देखते विह्वल हो उठा।
श्लोक 42 (skanda.8.89.42)
स्कन्धे केशाभिसंयुक्तो भ्रामितो विप्रचित्तिना । स भ्राम्यमाणो विबभौ स्रस्तहारस्रगम्बरः ।
skandhe keśābhisaṁyukto bhrāmito vipracittinā | sa bhrāmyamāṇo vibabhau srastahārasragambaraḥ |
विप्रचित्ति ने उसे बालों सहित कन्धे पर पकड़कर घुमाया। इस प्रकार घुमाए जाते हुए वह अपने खिसकते हुए हार, माला और वस्त्रों के साथ शोभित हो रहा था।
श्लोक 43 (skanda.8.89.43)
अलातमिव संदीप्तं निशायां मुनिसत्तम । भ्राम्यमाणं समालक्ष्य पुनर्देवाः सवासवाः ।
alātamiva saṁdīptaṁ niśāyāṁ munisattama | bhrāmyamāṇaṁ samālakṣya punardevāḥ savāsavāḥ |
हे मुनिश्रेष्ठ! रात्रि में घुमाई गई प्रज्वलित लुकाठी के समान उसे घूमता हुआ देखकर, इन्द्र सहित देवगण पुनः,
श्लोक 44 (skanda.8.89.44)
वेगश्चक्रुर्महावेगा गृह्णगृह्णेति वादिनः । विप्रचित्तिस्तु तान् दैत्यः संरब्धानुद्यतायुधान् ।
vegaścakrurmahāvegā gṛhṇagṛhṇeti vādinaḥ | vipracittistu tān daityaḥ saṁrabdhānudyatāyudhān |
महान वेग से दौड़ पड़े, "पकड़ो, पकड़ो" ऐसा पुकारते हुए। किन्तु दैत्य विप्रचित्ति ने उन क्रुद्ध, शस्त्र उठाए हुए देवताओं को,
श्लोक 45 (skanda.8.89.45)
आलक्ष्य सुबहून् संख्ये गर्जमानः पयोदवत् । अभीक्ष्णं भीमसंह्रादं वायुं दानवयूथपः ।
ālakṣya subahūn saṁkhye garjamānaḥ payodavat | abhīkṣṇaṁ bhīmasaṁhrādaṁ vāyuṁ dānavayūthapaḥ |
युद्धस्थल में बहुत अधिक संख्या में आते देखकर, मेघ के समान गरजते हुए, बारम्बार भीषण गर्जन करने वाले उस वायु की ओर, दानवसेनापति ने,
श्लोक 46 (skanda.8.89.46)
चिक्षेप शक्रमुद्दिश्य गिरौ वज्रं यथैव सः । स चापि तेन विक्षिप्तो लब्धसंज्ञो महाबलः ।
cikṣepa śakramuddiśya girau vajraṁ yathaiva saḥ | sa cāpi tena vikṣipto labdhasaṁjño mahābalaḥ |
फिर अन्धक को ही इन्द्र की ओर लक्ष्य करके फेंक दिया, जैसे कोई वज्र पर्वत पर फेंकता है। उस फेंके जाने पर वह महाबली अन्धक भी होश में आ गया,
श्लोक 47 (skanda.8.89.47)
विधाय वेगं देवेन्द्रमुपतस्थे कृताञ्जलिः । ततो वायुश्च देवाश्च सर्व एव सहानुगाः ।
vidhāya vegaṁ devendramupatasthe kṛtāñjaliḥ | tato vāyuśca devāśca sarva eva sahānugāḥ |
और अपने वेग को शान्त करके हाथ जोड़े हुए देवेन्द्र इन्द्र के समक्ष उपस्थित हुआ। तब वायु और सभी देवगण अपने अनुचरों सहित,
श्लोक 48 (skanda.8.89.48)
अभ्यद्रवन्त दैत्येन्द्रान् प्रगृहीतवरायुधाः । तेषां तेषाँश्च संग्रामः सुघोरः समपद्यत ।
abhyadravanta daityendrān pragṛhītavarāyudhāḥ | teṣāṁ teṣāṁśca saṁgrāmaḥ sughoraḥ samapadyata |
श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र हाथ में लिए हुए दैत्येन्द्रों पर टूट पड़े। उनका वह अत्यन्त घोर युद्ध पुनः छिड़ गया।
श्लोक 49 (skanda.8.89.49)
सिंहानामिव दृप्तानां विजने शरभैः सह । तत्र केचिद्विनिहताः सुप्रहारेण मूर्च्छिताः ।
siṁhānāmiva dṛptānāṁ vijane śarabhaiḥ saha | tatra kecidvinihatāḥ suprahāreṇa mūrcchitāḥ |
जैसे निर्जन वन में उन्मत्त सिंहों का शरभों के साथ युद्ध होता है। वहाँ कुछ योद्धा भारी प्रहार से मूर्च्छित होकर मार गिराए गए,
श्लोक 50 (skanda.8.89.50)
साधुसाध्विति भाषन्तः प्राणानूर्ध्वं वितत्यजुः । अपरे दनुदैत्येन्द्रा मुदा युक्ता महाबलाः ।
sādhusādhviti bhāṣantaḥ prāṇānūrdhvaṁ vitatyajuḥ | apare danudaityendrā mudā yuktā mahābalāḥ |
और "साधु, साधु" कहते हुए ऊर्ध्वगामी होकर प्राण त्याग दिए। अन्य कुछ दनु के महाबली दैत्येन्द्र हर्ष से युक्त होकर,
श्लोक 51 (skanda.8.89.51)
परेणाभ्याहतं शूरं समरक्षन् सुपुत्रवत् । केचिद्धत्वापि सुबहून् देवदानवसत्तमाः ।
pareṇābhyāhataṁ śūraṁ samarakṣan suputravat | keciddhatvāpi subahūn devadānavasattamāḥ |
शत्रु द्वारा आहत किसी वीर की पुत्रवत् रक्षा करते थे। देवों और दानवों में से कुछ श्रेष्ठ योद्धा बहुतों को मारकर भी,
श्लोक 52 (skanda.8.89.52)
अविक्षताः शितैः शस्त्रैरात्मानं गर्हयन्त्युत । अशस्त्रं केचिदभ्येत्य देवदैत्या महाबलाः ।
avikṣatāḥ śitaiḥ śastrairātmānaṁ garhayantyuta | aśastraṁ kecidabhyetya devadaityā mahābalāḥ |
स्वयं तीक्ष्ण शस्त्रों से घायल न होने पर अपनी ही निन्दा करने लगते थे। कुछ महाबली देव और दैत्य निःशस्त्र होकर सामने आकर,
श्लोक 53 (skanda.8.89.53)
धर्मयुद्धमभीप्सन्तस्त्यक्त्वा शस्त्राण्ययोधयन् । बह्वस्तत्र दैत्येन्द्रा युयुधुर्भीमविक्रमाः ।
dharmayuddhamabhīpsantastyaktvā śastrāṇyayodhayan | bahvastatra daityendrā yuyudhurbhīmavikramāḥ |
धर्मयुद्ध की इच्छा से शस्त्र त्यागकर लड़ने लगे। वहाँ अनेक भयंकर पराक्रमी दैत्येन्द्र इस प्रकार युद्ध करते रहे।
श्लोक 54 (skanda.8.89.54)
देवाश्च नाहता ये वै नाभिघ्नन्ति कदाचन । पदातयस्तत्र सर्वे योधयन्ति पदातिभिः ।
devāśca nāhatā ye vai nābhighnanti kadācana | padātayastatra sarve yodhayanti padātibhiḥ |
जो देवगण घायल नहीं हुए थे, वे भी किसी को आघात नहीं करते थे; वहाँ सभी पैदल योद्धा पैदल योद्धाओं से ही लड़ते थे।
श्लोक 55 (skanda.8.89.55)
सादिनः सादिभिः सार्धं रथिनो रथिभिः सह । गजिनो गजिभिश्चैव तथा युद्धमवर्तत ।
sādinaḥ sādibhiḥ sārdhaṁ rathino rathibhiḥ saha | gajino gajibhiścaiva tathā yuddhamavartata |
घुड़सवार घुड़सवारों के साथ, रथी रथियों के साथ, तथा हाथीसवार हाथीसवारों के साथ इस प्रकार युद्ध होता रहा।
श्लोक 56 (skanda.8.89.56)
एवं तेषां हि संग्रामो देवानां दानवैस्सह । आवर्तत शतान्यष्टौ वर्षाणि सुमहाभयः ।
evaṁ teṣāṁ hi saṁgrāmo devānāṁ dānavaissaha | āvartata śatānyaṣṭau varṣāṇi sumahābhayaḥ |
इस प्रकार देवों और दानवों का वह अत्यन्त भयंकर संग्राम आठ सौ वर्षों तक चलता रहा।
श्लोक 57 (skanda.8.89.57)
अथ दैत्यो महामायो गजेनाम्बुदवर्चसा । तोमरं सुमहद् बिभ्रद्युगान्तानलवर्चसम् ।
atha daityo mahāmāyo gajenāmbudavarcasā | tomaraṁ sumahad bibhradyugāntānalavarcasam |
तब महामायावी दैत्य विरोचन, मेघ के समान वर्ण वाले हाथी पर सवार होकर, प्रलयकाल की अग्नि के समान तेजस्वी विशाल तोमर धारण किए हुए,
श्लोक 58 (skanda.8.89.58)
कोकिलाञ्जनमेघाभो विद्रुतो यो विरोचनः । सोऽभ्यद्रवत्तदा देवानतिसव्यानिवोत्थितान् ।
kokilāñjanameghābho vidruto yo virocanaḥ | so'bhyadravattadā devānatisavyānivotthitān |
कोयल के समान काले अंजन तथा मेघ जैसी आभा वाला, वेगपूर्वक दौड़ता हुआ वह विरोचन, मानो एक ओर से उठे हुए देवताओं की ओर उसी क्षण झपटा।
श्लोक 59 (skanda.8.89.59)
स गजेन प्रभिन्नेन मुखाडम्बरघोषिणा । अभिदुद्राव देवेन्द्रं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ।
sa gajena prabhinnena mukhāḍambaraghoṣiṇā | abhidudrāva devendraṁ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt |
मद से झरते हुए, मुख से गम्भीर गर्जना करते हुए उस हाथी पर सवार होकर उसने देवेन्द्र की ओर दौड़ लगाई और "ठहरो, ठहरो" ऐसा कहा।
श्लोक 60 (skanda.8.89.60)
तस्यापतत एवाथ भगवान् पाकशासनः । जत्रुदेशे शरं घोरं निचखान ररास च ।
tasyāpatata evātha bhagavān pākaśāsanaḥ | jatrudeśe śaraṁ ghoraṁ nicakhāna rarāsa ca |
उसके झपटते ही भगवान पाकशासन ने उसकी कन्धे की हड्डी में एक भयंकर बाण गहराई तक धँसा दिया और गर्जना की।
श्लोक 61 (skanda.8.89.61)
अनुभूय प्रहारं तं स दैत्यो भीमविक्रमः । तस्यास्य तोमरेणाथ बिभेद करमुन्नतम् ।
anubhūya prahāraṁ taṁ sa daityo bhīmavikramaḥ | tasyāsya tomareṇātha bibheda karamunnatam |
उस प्रहार को सहन करके उस भयंकर पराक्रमी दैत्य ने तब अपने तोमर से इन्द्र के उठे हुए हाथ को बींध दिया।
श्लोक 62 (skanda.8.89.62)
अथास्य तोमरोद्भिन्नाद्धस्ताद्धेमविभूषितात् । पपात तद्धनुर्दिव्यं महाशनिसमप्रभम् ।
athāsya tomarodbhinnāddhastāddhemavibhūṣitāt | papāta taddhanurdivyaṁ mahāśanisamaprabham |
तोमर से बींधे गए उसके स्वर्णभूषित हाथ से महावज्र के समान तेजस्वी वह दिव्य धनुष गिर पड़ा।
श्लोक 63 (skanda.8.89.63)
ततोऽस्य भूयो दैत्येन्द्रो व्याकुलस्य तदा गजम् । तोमरेण बिभेदाशु कुम्भदेशे महाबलः ।
tato'sya bhūyo daityendro vyākulasya tadā gajam | tomareṇa bibhedāśu kumbhadeśe mahābalaḥ |
तब उस व्याकुल हुए इन्द्र के गज को उस महाबली दैत्येन्द्र ने पुनः तोमर से तुरन्त कुम्भस्थल में बींध दिया।
श्लोक 64 (skanda.8.89.64)
स भिन्नस्तेन दैत्येन वने मत्त इव द्विपः । अनङ्कुशः शनैर्घृ स्वं बलं ह्यनिवारितः ।
sa bhinnastena daityena vane matta iva dvipaḥ | anaṅkuśaḥ śanairghṛ svaṁ balaṁ hyanivāritaḥ |
उस दैत्य के द्वारा बींधा गया वह गज वन में मतवाले हाथी के समान, अंकुशरहित होकर धीरे-धीरे [इस पाद का मध्य भाग पाण्डुलिपि में लुप्त है] अपने बल को किसी से रोका न जाकर प्रकट करने लगा। इसके पश्चात् की एक पूरी पंक्ति भी पाण्डुलिपि में सर्वथा लुप्त होने के कारण यहाँ छोड़ दी गई है।
श्लोक 65 (skanda.8.89.65)
ते तथा वध्यमानास्तु आदित्या दैत्यदानवैः । भयार्दिता दिशः सर्वाः पलायन्ते स्म सर्वशः ।
te tathā vadhyamānāstu ādityā daityadānavaiḥ | bhayārditā diśaḥ sarvāḥ palāyante sma sarvaśaḥ |
इस प्रकार दैत्यों और दानवों द्वारा मारे जाते हुए वे आदित्यगण भयभीत होकर सभी दिशाओं में सब ओर भाग गए।
श्लोक 66 (skanda.8.89.66)
ततः शंखाश्च भेर्यश्च वाद्यानि विविधान्यपि । सिंहनादाँश्च सञ्चक्रुर्दैत्यदानवसंमताः ।
tataḥ śaṁkhāśca bheryaśca vādyāni vividhānyapi | siṁhanādāṁśca sañcakrurdaityadānavasaṁmatāḥ |
तब शंख, भेरियाँ तथा नाना प्रकार के वाद्य [इस पंक्ति का मध्य भाग पाण्डुलिपि में लुप्त है] बजते रहे, और दैत्यों तथा दानवों द्वारा सम्मानित योद्धाओं ने सिंहनाद किए।
श्लोक 67 (skanda.8.89.67)
तच्छिन्नभिन्नप्रविदारितान्तरं गजेन दैत्यैश्च पुनर्विलोडितम् । बलं महद्दैवतपालितं बभौ यथार्णवो मन्दरमन्थविक्षतः ।
tacchinnabhinnapravidāritāntaraṁ gajena daityaiśca punarviloḍitam | balaṁ mahaddaivatapālitaṁ babhau yathārṇavo mandaramanthavikṣataḥ |
इस प्रकार कटी-फटी और विदीर्ण हुई, तथा हाथियों और दैत्यों द्वारा पुनः मथी गई वह देवताओं की विशाल सेना उसी प्रकार शोभित हो रही थी जैसे मन्दराचल के मन्थन से क्षुब्ध हुआ समुद्र।