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प्रथमांश · अध्याय 2

विष्णु का स्वरूप और सृष्टि का उद्भव

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (vishnu.1.2.1)

श्रीपराशर उवाच । अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे

śrīparāśara uvāca avikārāya śuddhāya nityāya paramātmane sadaikarūparūpāya viṣṇave sarvajiṣṇave

श्रीपराशर ने कहा — उस विष्णु को नमस्कार है, जो विकाररहित, शुद्ध, नित्य, परमात्मा हैं, जिनका स्वरूप सदा एकरस है, और जो सबके विजेता हैं।

श्लोक 2 (vishnu.1.2.2)

नमो हिरण्यगर्भाय हरये शंकराय च । वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिणे

namo hiraṇyagarbhāya haraye śaṁkarāya ca vāsudevāya tārāya sargasthityantakāriṇe

नमस्कार है हिरण्यगर्भ, हरि और शंकर को; वासुदेव को, जो तारने वाले हैं और सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय करने वाले हैं।

श्लोक 3 (vishnu.1.2.3)

एकानेकस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः । अव्यक्तव्यक्तरूपाय विष्णवे मुक्तिहेतवे

ekānekasvarūpāya sthūlasūkṣmātmane namaḥ avyaktavyaktarūpāya viṣṇave muktihetave

जिनका स्वरूप एक भी है और अनेक भी, जिनकी आत्मा स्थूल भी है और सूक्ष्म भी — उन्हें नमस्कार है; विष्णु को, जिनका रूप अव्यक्त भी है और व्यक्त भी, और जो मुक्ति के कारण हैं।

श्लोक 4 (vishnu.1.2.4)

सर्गस्थितिविनाशानां जगतो यो जगन्मयः । मूलभूतो नमस् तस्मै विष्णवे परमात्मने

sargasthitivināśānāṁ jagato yo jaganmayaḥ mūlabhūto namas tasmai viṣṇave paramātmane

जो जगत् की सृष्टि, स्थिति और विनाश के मूल कारण हैं और स्वयं जगत्मय हैं — उन विष्णु, परमात्मा को नमस्कार है।

श्लोक 5 (vishnu.1.2.5)

आधारभूतं विश्वस्याप्य् अणीयांसम् अणीयसाम् । प्रणम्य सर्वभूतस्थम् अच्युतं पुरुषोत्तमम्

ādhārabhūtaṁ viśvasyāpy aṇīyāṁsam aṇīyasām praṇamya sarvabhūtastham acyutaṁ puruṣottamam

विश्व के आधारभूत, सूक्ष्मतम से भी सूक्ष्मतर, समस्त प्राणियों में स्थित, अच्युत पुरुषोत्तम को प्रणाम करके —

श्लोक 6 (vishnu.1.2.6)

ज्ञानस्वरूपम् अत्यन्तनिर्मलं परमार्थतः । तम् एवार्थस्वरूपेण भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम्

jñānasvarūpam atyantanirmalaṁ paramārthataḥ tam evārthasvarūpeṇa bhrāntidarśanataḥ sthitam

जो परमार्थतः ज्ञानस्वरूप और अत्यन्त निर्मल हैं, किन्तु भ्रान्त दृष्टि के कारण वही पदार्थों के रूप में प्रतीत होते हैं —

श्लोक 7 (vishnu.1.2.7)

विष्णुं ग्रसिष्णुं विश्वस्य स्थितिसर्गे तथा प्रभुम् । प्रणम्य जगताम् ईशम् अजम् अक्षयम् अव्ययम्

viṣṇuṁ grasiṣṇuṁ viśvasya sthitisarge tathā prabhum praṇamya jagatām īśam ajam akṣayam avyayam

विश्व को ग्रसने वाले तथा उसकी स्थिति और सृष्टि करने में समर्थ, जगत् के अजन्मा, अक्षय, अव्यय ईश्वर विष्णु को प्रणाम करके —

श्लोक 8 (vishnu.1.2.8)

कथयामि यथापूर्वं दक्षाद्यैर् मुनिसत्तमैः । पृष्टः प्रोवाच भगवान् अब्जयोनिः पितामहः

kathayāmi yathāpūrvaṁ dakṣādyair munisattamaiḥ pṛṣṭaḥ provāca bhagavān abjayoniḥ pitāmahaḥ

मैं वैसे ही कहता हूँ जैसे पूर्वकाल में दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियों द्वारा पूछे जाने पर कमल-योनि भगवान् पितामह ब्रह्मा ने कहा था।

श्लोक 9 (vishnu.1.2.9)

तैश् चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदातटे । सारस्वताय तेनापि मम सारस्वतेन च

taiś coktaṁ purukutsāya bhūbhuje narmadātaṭe sārasvatāya tenāpi mama sārasvatena ca

उन्होंने यह नर्मदा-तट पर राजा पुरुकुत्स को बताया, उसने सारस्वत को बताया, और सारस्वत ने मुझे बताया।

श्लोक 10 (vishnu.1.2.10)

परः पराणां परमः परमात्मात्मसंस्थितः । रूपवर्णादिनिर्देशविशेषणविवर्जितः

paraḥ parāṇāṁ paramaḥ paramātmātmasaṁsthitaḥ rūpavarṇādinirdeśaviśeṣaṇavivarjitaḥ

वह परमात्मा सबसे परे और सर्वश्रेष्ठ हैं, स्वयं में ही स्थित हैं, तथा रूप-वर्ण आदि किसी भी संकेत या विशेषण से रहित हैं —

श्लोक 11 (vishnu.1.2.11)

अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामर्द्धिजन्मभिः । वर्जितः शक्यते वक्तुं यः सदास्तीति केवलम्

apakṣayavināśābhyāṁ pariṇāmarddhijanmabhiḥ varjitaḥ śakyate vaktuṁ yaḥ sadāstīti kevalam

ह्रास, विनाश, परिणाम, वृद्धि और जन्म से रहित हैं; उनके विषय में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वे सदा हैं।

श्लोक 12 (vishnu.1.2.12)

सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्य् अत्रेति वै यतः । ततः स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते

sarvatrāsau samastaṁ ca vasaty atreti vai yataḥ tataḥ sa vāsudeveti vidvadbhiḥ paripaṭhyate

चूँकि वे सर्वत्र वास करते हैं और समस्त वस्तुएँ भी उन्हीं में वास करती हैं, इसीलिए विद्वान् लोग उन्हें 'वासुदेव' कहकर पुकारते हैं।

श्लोक 13 (vishnu.1.2.13)

तद् ब्रह्म परमं नित्यम् अजम् अक्षयम् अव्ययम् । एकस्वरूपं च सदा हेयाभावाच् च निर्मलम्

tad brahma paramaṁ nityam ajam akṣayam avyayam ekasvarūpaṁ ca sadā heyābhāvāc ca nirmalam

वह परम ब्रह्म नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय है; सदा एकस्वरूप है, और उसमें त्याज्य कुछ भी न होने के कारण वह सर्वथा निर्मल है।

श्लोक 14 (vishnu.1.2.14)

तद् एव सर्वम् एवैतद् व्यक्ताव्यक्तस्वरूपवत् । तथा पुरुषरूपेण कालरूपेण च स्थितम्

tad eva sarvam evaitad vyaktāvyaktasvarūpavat tathā puruṣarūpeṇa kālarūpeṇa ca sthitam

वह ब्रह्म ही यह सब कुछ है, व्यक्त और अव्यक्त दोनों स्वरूपों में; तथा पुरुष-रूप और काल-रूप में भी वही स्थित है।

श्लोक 15 (vishnu.1.2.15)

परस्य ब्रह्मणो रूपं पुरुषः प्रथमं द्विज । व्यक्ताव्यक्ते तथैवान्ये रूपे कालस् तथापरम्

parasya brahmaṇo rūpaṁ puruṣaḥ prathamaṁ dvija vyaktāvyakte tathaivānye rūpe kālas tathāparam

हे द्विज! परब्रह्म का प्रथम रूप पुरुष है; व्यक्त और अव्यक्त उसके अन्य दो रूप हैं, और काल उसका एक और रूप है।

श्लोक 16 (vishnu.1.2.16)

प्रधानपुरुषव्यक्तकालानां परमं हि यत् । पश्यन्ति सूरयः शुद्धं तद् विष्णोः परमं पदम्

pradhānapuruṣavyaktakālānāṁ paramaṁ hi yat paśyanti sūrayaḥ śuddhaṁ tad viṣṇoḥ paramaṁ padam

प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल — इन सबसे भी जो परे और शुद्ध तत्त्व है, विद्वान् उसी को विष्णु का परम पद देखते हैं।

श्लोक 17 (vishnu.1.2.17)

प्रधानपुरुषव्यक्तकालास् तु प्रविभागशः । रूपाणि स्थितिसर्गान्तव्यक्तिसद्भावहेतवः

pradhānapuruṣavyaktakālās tu pravibhāgaśaḥ rūpāṇi sthitisargāntavyaktisadbhāvahetavaḥ

प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल — पृथक्-पृथक् देखने पर ये वे रूप हैं जो स्थिति, सृष्टि और प्रलय की अभिव्यक्ति के कारण बनते हैं।

श्लोक 18 (vishnu.1.2.18)

व्यक्तं विष्णुस् तथाव्यक्तं पुरुषः काल एव च । क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय

vyaktaṁ viṣṇus tathāvyaktaṁ puruṣaḥ kāla eva ca krīḍato bālakasyeva ceṣṭāṁ tasya niśāmaya

व्यक्त विष्णु ही हैं, और अव्यक्त, पुरुष तथा काल भी वही हैं। अब उनकी लीला को सुनो, जो खेलते हुए बालक की चेष्टा के समान है।

श्लोक 19 (vishnu.1.2.19)

अव्यक्तं कारणं यत् तत् प्रधानम् ऋषिसत्तमैः । प्रोच्यते प्रकृतिः सूक्ष्मा नित्या सदसदात्मिका

avyaktaṁ kāraṇaṁ yat tat pradhānam ṛṣisattamaiḥ procyate prakṛtiḥ sūkṣmā nityā sadasadātmikā

जो अव्यक्त कारण है, उसे ही श्रेष्ठ ऋषि 'प्रधान' कहते हैं — वह सूक्ष्म, नित्य प्रकृति, जिसका स्वरूप सत् और असत् दोनों है।

श्लोक 20 (vishnu.1.2.20)

अक्षयं नान्यदाधारम् अमेयम् अजरं ध्रुवम् । शब्दस्पर्शविहीनं तद् रूपादिभिर् असंहतम्

akṣayaṁ nānyadādhāram ameyam ajaraṁ dhruvam śabdasparśavihīnaṁ tad rūpādibhir asaṁhatam

वह अक्षय है, उसका कोई अन्य आधार नहीं है, वह अमेय, अजर, ध्रुव है; शब्द और स्पर्श से रहित तथा रूपादि गुणों के संयोग से रहित है —

श्लोक 21 (vishnu.1.2.21)

त्रिगुणं तज् जगद्योनिर् अनादिप्रभवाव्ययम् । तेनाग्रे सर्वम् एवासीद् व्याप्तं वै प्रलयाद् अनु

triguṇaṁ taj jagadyonir anādiprabhavāvyayam tenāgre sarvam evāsīd vyāptaṁ vai pralayād anu

वह त्रिगुणात्मक है, जगत् की योनि है, अनादि है और उसका उद्भव अव्यय है। प्रलय के पश्चात् पूर्व-काल में सब कुछ उसी से व्याप्त था।

श्लोक 22 (vishnu.1.2.22)

वेदवादविदो विद्वन् नियता ब्रह्मवादिनः । पठन्ति चैतम् एवार्थं प्रधानप्रतिपादकम्

vedavādavido vidvan niyatā brahmavādinaḥ paṭhanti caitam evārthaṁ pradhānapratipādakam

हे विद्वन्! वेदवाद के ज्ञाता, संयमी ब्रह्मवादी इसी अर्थ को प्रतिपादित करने वाले इस श्लोक का पाठ करते हैं —

श्लोक 23 (vishnu.1.2.23)

नाहो न रात्रिर् न नभो न भूमिर् नासीत् तमो ज्योतिर् अभून् न चान्यत् । श्रोत्रादिबुद्ध्यानुपलभ्यम् एकं प्राधानिकं ब्रह्म पुमांस् तदासीत्

nāho na rātrir na nabho na bhūmir nāsīt tamo jyotir abhūn na cānyat śrotrādibuddhyānupalabhyam ekaṁ prādhānikaṁ brahma pumāṁs tadāsīt

न दिन था, न रात्रि, न आकाश, न पृथ्वी; न अन्धकार था, न प्रकाश, न कुछ और। तब केवल वह एक प्राधानिक ब्रह्म, पुरुष सहित, विद्यमान था — जिसे श्रवण आदि किसी इन्द्रिय या बुद्धि से नहीं जाना जा सकता।

श्लोक 24 (vishnu.1.2.24)

विष्णोः स्वरूपात् परतो हि तेऽन्ये रूपे प्रधानं पुरुषश् च विप्र । तस्यैव तेऽन्येन धृते वियुक्ते रूपान्तरं तद् द्विज कालसंज्ञम्

viṣṇoḥ svarūpāt parato hi te 'nye rūpe pradhānaṁ puruṣaś ca vipra tasyaiva te 'nyena dhṛte viyukte rūpāntaraṁ tad dvija kālasaṁjñam

हे विप्र! प्रधान और पुरुष, विष्णु के स्वरूप से भिन्न किन्तु उसी के आश्रित दो अन्य रूप हैं। हे द्विज! जब वे दोनों उसी के द्वारा परस्पर पृथक् रखे जाते हैं, तो वह पृथक्करण-रूप ही 'काल' कहलाता है।

श्लोक 25 (vishnu.1.2.25)

प्रकृतौ च स्थितं व्यक्तम् अतीतप्रलये तु यत् । तस्मात् प्राकृतसंज्ञोऽयम् उच्यते प्रतिसंचरः

prakṛtau ca sthitaṁ vyaktam atītapralaye tu yat tasmāt prākṛtasaṁjño 'yam ucyate pratisaṁcaraḥ

पूर्व प्रलय के समय जो व्यक्त प्रकृति में लीन होकर स्थित रहता है, उसी के कारण इसे 'प्राकृत प्रलय' कहा जाता है।

श्लोक 26 (vishnu.1.2.26)

अनादिर् भगवान् कालो नान्तोऽस्य द्विज विद्यते । अव्युच्छिन्नास् ततस् त्व् एते सर्गस्थित्यन्तसंयमाः

anādir bhagavān kālo nānto 'sya dvija vidyate avyucchinnās tatas tv ete sargasthityantasaṁyamāḥ

हे द्विज! भगवान् काल अनादि है, और उसका कोई अन्त भी नहीं है; इसीलिए सृष्टि, स्थिति और प्रलयरूपी संयम निरन्तर चलते रहते हैं।

श्लोक 27 (vishnu.1.2.27)

गुणसाम्ये ततस् तस्मिन् पृथक् पुंसि व्यवस्थिते । कालस्वरूपं तद् विष्णोर् मैत्रेय परिवर्तते

guṇasāmye tatas tasmin pṛthak puṁsi vyavasthite kālasvarūpaṁ tad viṣṇor maitreya parivartate

हे मैत्रेय! जब गुण साम्यावस्था में रहते हैं और पुरुष उससे पृथक् स्थित रहता है, तब विष्णु का वह काल-स्वरूप ही प्रवर्तित होता है।

श्लोक 28 (vishnu.1.2.28)

ततस् तत् परमं ब्रह्म परमात्मा जगन्मयः । सर्वगः सर्वभूतेशः सर्वात्मा परमेश्वरः

tatas tat paramaṁ brahma paramātmā jaganmayaḥ sarvagaḥ sarvabhūteśaḥ sarvātmā parameśvaraḥ

तब वह परम ब्रह्म, परमात्मा, जगन्मय, सर्वव्यापी, समस्त प्राणियों का स्वामी, सर्वात्मा परमेश्वर —

श्लोक 29 (vishnu.1.2.29)

प्रधानं पुरुषं चापि प्रविश्यात्मेच्छया हरिः । क्षोभयाम् आस संप्राप्ते सर्गकाले व्ययाव्ययौ

pradhānaṁ puruṣaṁ cāpi praviśyātmecchayā hariḥ kṣobhayām āsa saṁprāpte sargakāle vyayāvyayau

हरि ने अपनी इच्छा से प्रधान और पुरुष दोनों में — जो क्रमशः नाशवान् और अविनाशी हैं — प्रवेश कर, सृष्टि का समय आने पर उन्हें क्षुब्ध किया।

श्लोक 30 (vishnu.1.2.30)

यथा संनिधिमात्रेण गन्धः क्षोभाय जायते । मनसो नोपकर्तृत्वात् तथासौ परमेश्वरः

yathā saṁnidhimātreṇa gandhaḥ kṣobhāya jāyate manaso nopakartṛtvāt tathāsau parameśvaraḥ

जिस प्रकार गन्ध केवल अपनी समीपता मात्र से मन में क्षोभ उत्पन्न कर देती है, बिना स्वयं कुछ किए, उसी प्रकार वह परमेश्वर भी है।

श्लोक 31 (vishnu.1.2.31)

स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश् च पुरुषोत्तमः । स संकोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः

sa eva kṣobhako brahman kṣobhyaś ca puruṣottamaḥ sa saṁkocavikāsābhyāṁ pradhānatve 'pi ca sthitaḥ

हे ब्रह्मन्! वह पुरुषोत्तम स्वयं ही क्षोभक भी है और क्षोभ्य भी; वह संकोच और विकास के द्वारा प्रधान-रूप में भी स्थित रहता है।

श्लोक 32 (vishnu.1.2.32)

विकासाणुस्वरूपैश् च ब्रह्मरूपादिभिस् तथा । व्यक्तस्वरूपश् च तथा विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः

vikāsāṇusvarūpaiś ca brahmarūpādibhis tathā vyaktasvarūpaś ca tathā viṣṇuḥ sarveśvareśvaraḥ

विस्तृत तथा अणु-स्वरूपों द्वारा, ब्रह्मादि रूपों द्वारा, और इसी प्रकार व्यक्त-स्वरूप द्वारा भी सर्वेश्वरों के ईश्वर विष्णु ही विद्यमान रहते हैं।

श्लोक 33 (vishnu.1.2.33)

गुणसाम्यात् ततस् तस्मात् क्षेत्रज्ञाधिष्ठितान् मुने । गुणव्यञ्जनसंभूतिः सर्गकाले द्विजोत्तम

guṇasāmyāt tatas tasmāt kṣetrajñādhiṣṭhitān mune guṇavyañjanasaṁbhūtiḥ sargakāle dvijottama

हे मुने! हे द्विजोत्तम! तब उस गुण-साम्यावस्था से, क्षेत्रज्ञ द्वारा अधिष्ठित होकर, सृष्टि-काल में गुणों की अभिव्यक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 34 (vishnu.1.2.34)

प्रधानतत्त्वम् उद्भूतं महान्तं तत् समावृणोत् । सात्त्विको राजसश् चैव तामसश् च त्रिधा महान् । प्रधानतत्त्वेन समं त्वचा बीजम् इवावृतम्

pradhānatattvam udbhūtaṁ mahāntaṁ tat samāvṛṇot sāttviko rājasaś caiva tāmasaś ca tridhā mahān pradhānatattvena samaṁ tvacā bījam ivāvṛtam

प्रधान-तत्त्व से महत् उत्पन्न हुआ, और प्रधान ने उसे आवृत कर लिया। वह महत् सात्त्विक, राजस और तामस — तीन प्रकार का है, और प्रधान-तत्त्व द्वारा इस प्रकार आवृत है जैसे बीज छिलके से आवृत रहता है।

श्लोक 35 (vishnu.1.2.35)

वैकारिकस् तैजसश् च भूतादिश् चैव तामसः । त्रिविधोऽयम् अहंकारो महत्तत्त्वाद् अजायत

vaikārikas taijasaś ca bhūtādiś caiva tāmasaḥ trividho 'yam ahaṁkāro mahattattvād ajāyata

महत्-तत्त्व से यह त्रिविध अहंकार उत्पन्न हुआ — वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस), और भूतादि (तामस)।

श्लोक 36 (vishnu.1.2.36)

भूतेन्द्रियाणां हेतुः स त्रिगुणत्वान् महामुने । यथा प्रधानेन महान् महता स तथावृतः

bhūtendriyāṇāṁ hetuḥ sa triguṇatvān mahāmune yathā pradhānena mahān mahatā sa tathāvṛtaḥ

हे महामुने! त्रिगुणात्मक होने के कारण वह अहंकार ही भूतों और इन्द्रियों का कारण है; और जैसे महत् प्रधान से आवृत था, वैसे ही अहंकार महत् से आवृत है।

श्लोक 37 (vishnu.1.2.37)

भूतादिस् तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः । ससर्ज शब्दतन्मात्राद् आकाशं शब्दलक्षणम्

bhūtādis tu vikurvāṇaḥ śabdatanmātrakaṁ tataḥ sasarja śabdatanmātrād ākāśaṁ śabdalakṣaṇam

भूतादि (तामस अहंकार) ने विकार को प्राप्त होकर शब्द-तन्मात्रा उत्पन्न की, और उस शब्द-तन्मात्रा से शब्द-गुण वाला आकाश उत्पन्न हुआ।

श्लोक 38 (vishnu.1.2.38)

शब्दमात्रं तथाकाशं भूतादिः स समावृणोत् । आकाशस् तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह

śabdamātraṁ tathākāśaṁ bhūtādiḥ sa samāvṛṇot ākāśas tu vikurvāṇaḥ sparśamātraṁ sasarja ha

उस भूतादि ने शब्द-तन्मात्रा सहित आकाश को आवृत कर लिया; और आकाश ने विकार को प्राप्त होकर स्पर्श-तन्मात्रा उत्पन्न की।

श्लोक 39 (vishnu.1.2.39)

बलवान् अभवद् वायुस् तस्य स्पर्शो गुणो मतः । आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्

balavān abhavad vāyus tasya sparśo guṇo mataḥ ākāśaṁ śabdamātraṁ tu sparśamātraṁ samāvṛṇot

उससे बलवान् वायु उत्पन्न हुआ, जिसका गुण स्पर्श माना गया है; और शब्द-तन्मात्रा सहित आकाश ने स्पर्श-तन्मात्रा को आवृत कर लिया।

श्लोक 40 (vishnu.1.2.40)

ततो वायुर् विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह । ज्योतिर् उत्पद्यते वायोस् तद् रूपगुणम् उच्यते

tato vāyur vikurvāṇo rūpamātraṁ sasarja ha jyotir utpadyate vāyos tad rūpaguṇam ucyate

तब वायु ने विकार को प्राप्त होकर रूप-तन्मात्रा उत्पन्न की; वायु से ज्योति उत्पन्न होती है, जिसका गुण रूप कहा जाता है।

श्लोक 41 (vishnu.1.2.41)

स्पर्शमात्रस् ततो वायू रूपमात्रं समावृणोत् । ज्योतिश् चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह

sparśamātras tato vāyū rūpamātraṁ samāvṛṇot jyotiś cāpi vikurvāṇaṁ rasamātraṁ sasarja ha

स्पर्श-तन्मात्रा सहित वायु ने रूप-तन्मात्रा को आवृत कर लिया; और ज्योति ने भी विकार को प्राप्त होकर रस-तन्मात्रा उत्पन्न की।

श्लोक 42 (vishnu.1.2.42)

संभवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि च । रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्रं समावृणोत्

saṁbhavanti tato 'mbhāṁsi rasādhārāṇi tāni ca rasamātrāṇi cāmbhāṁsi rūpamātraṁ samāvṛṇot

उससे जल उत्पन्न होता है, जो रस का आधार है; और रस-तन्मात्रा सहित जल ने रूप-तन्मात्रा को आवृत कर लिया।

श्लोक 43 (vishnu.1.2.43)

विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससर्जिरे । संघातो जायते तस्मात् तस्य गन्धो गुणो मतः

vikurvāṇāni cāmbhāṁsi gandhamātraṁ sasarjire saṁghāto jāyate tasmāt tasya gandho guṇo mataḥ

जल ने विकार को प्राप्त होकर गन्ध-तन्मात्रा उत्पन्न की; उससे ठोस पिण्ड (पृथ्वी) उत्पन्न होता है, जिसका गुण गन्ध माना गया है।

श्लोक 44 (vishnu.1.2.44)

तस्मिंस् तस्मिंस् तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता । तन्मात्राण्य् अविशेषाणि अविशेषास् ततो हि ते

tasmiṁs tasmiṁs tu tanmātrā tena tanmātratā smṛtā tanmātrāṇy aviśeṣāṇi aviśeṣās tato hi te

प्रत्येक भूत में यह तत्त्व केवल तन्मात्रा रूप में ही रहता है, इसलिए इसे 'तन्मात्रा' कहा गया है। ये तन्मात्राएँ अविशेष (अविभेदित) हैं, इसीलिए इन्हें 'अविशेष' भी कहा जाता है।

श्लोक 45 (vishnu.1.2.45)

न शान्ता नापि घोरास् ते न मूढाश् चाविशेषिणः । भूततन्मात्रसर्गोऽयम् अहंकारात् तु तामसात्

na śāntā nāpi ghorās te na mūḍhāś cāviśeṣiṇaḥ bhūtatanmātrasargo 'yam ahaṁkārāt tu tāmasāt

वे अविशेष होने के कारण न शान्त हैं, न घोर, न मूढ़। भूतों की इन तन्मात्राओं की यह सृष्टि तामस अहंकार से हुई है।

श्लोक 46 (vishnu.1.2.46)

तैजसानीन्द्रियाण्य् आहुर् देवा वैकारिका दश । एकादशं मनश् चात्र देवा वैकारिकाः स्मृताः

taijasānīndriyāṇy āhur devā vaikārikā daśa ekādaśaṁ manaś cātra devā vaikārikāḥ smṛtāḥ

इन्द्रियों को तैजस अहंकार से उत्पन्न कहा गया है, जबकि दस देवता वैकारिक अहंकार से उत्पन्न माने गए हैं; और ग्यारहवाँ, मन भी वैकारिक देवताओं में गिना गया है।

श्लोक 47 (vishnu.1.2.47)

त्वक् चक्षुर् नासिका जिह्वा श्रोत्रम् अत्र च पञ्चमम् । शब्दादीनाम् अवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि वै द्विज

tvak cakṣur nāsikā jihvā śrotram atra ca pañcamam śabdādīnām avāptyarthaṁ buddhiyuktāni vai dvija

हे द्विज! त्वचा, आँख, नाक, जीभ, और पाँचवाँ कान — ये सभी बुद्धि से युक्त होकर शब्दादि विषयों को ग्रहण करने के लिए हैं।

श्लोक 48 (vishnu.1.2.48)

पायूपस्थौ करौ पादौ वाक् च मैत्रेय पञ्चमी । विसर्गशिल्पगत्युक्ति कर्म तेषां च कथ्यते

pāyūpasthau karau pādau vāk ca maitreya pañcamī visargaśilpagatyukti karma teṣāṁ ca kathyate

हे मैत्रेय! गुदा और उपस्थ (जननेन्द्रिय), दोनों हाथ, दोनों पैर, और पाँचवीं वाणी — इनके कर्म क्रमशः विसर्जन (मलत्याग), शिल्प (कर्म-कौशल), गति और वाणी (कथन) कहे गए हैं।

श्लोक 49 (vishnu.1.2.49)

आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा । शब्दादिभिर् गुणैर् ब्रह्मन् संयुक्तान्य् उत्तरोत्तरैः

ākāśavāyutejāṁsi salilaṁ pṛthivī tathā śabdādibhir guṇair brahman saṁyuktāny uttarottaraiḥ

हे ब्रह्मन्! आकाश, वायु, तेज, जल तथा पृथ्वी — ये क्रमशः शब्द आदि गुणों से, एक के बाद एक अधिक गुणों से युक्त होते गए हैं।

श्लोक 50 (vishnu.1.2.50)

शान्ता घोराश् च मूढाश् च विशेषास् तेन ते स्मृताः

śāntā ghorāś ca mūḍhāś ca viśeṣās tena te smṛtāḥ

इसी कारण ये (महाभूत) शान्त, घोर और मूढ़ होते हैं, और इसीलिए इन्हें 'विशेष' (विभेदित) कहा गया है।

श्लोक 51 (vishnu.1.2.51)

नानावीर्याः पृथग्भूतास् ततस् ते संहतिं विना । नाशक्नुवन् प्रजाः स्रष्टुम् असमागम्य कृत्स्नशः

nānāvīryāḥ pṛthagbhūtās tatas te saṁhatiṁ vinā nāśaknuvan prajāḥ sraṣṭum asamāgamya kṛtsnaśaḥ

वे भिन्न-भिन्न शक्तियों वाले और पृथक्-पृथक् स्थित तत्त्व, बिना पूर्णतः एकत्रित हुए, संयोग के बिना प्राणियों की सृष्टि करने में समर्थ नहीं थे।

श्लोक 52 (vishnu.1.2.52)

समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयाः । एकसंघातलक्ष्याश् च संप्राप्यैक्यम् अशेषतः

sametyānyonyasaṁyogaṁ parasparasamāśrayāḥ ekasaṁghātalakṣyāś ca saṁprāpyaikyam aśeṣataḥ

अतः वे परस्पर संयुक्त होकर, एक-दूसरे का आश्रय लेकर, एक ही समुदाय के रूप में लक्षित होकर, पूर्णतया एकता को प्राप्त हुए —

श्लोक 53 (vishnu.1.2.53)

पुरुषाधिष्ठितत्वाच् च अव्यक्तानुग्रहेण च । महदाद्या विशेषान्ता ह्य् अण्डम् उत्पादयन्ति ते

puruṣādhiṣṭhitatvāc ca avyaktānugraheṇa ca mahadādyā viśeṣāntā hy aṇḍam utpādayanti te

पुरुष द्वारा अधिष्ठित होने के कारण, और अव्यक्त की कृपा से, वे सभी तत्त्व — महत् से लेकर विशेष (महाभूतों) तक — मिलकर अण्ड को उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 54 (vishnu.1.2.54)

तत् क्रमेण विवृद्धं तु जलबुद्बुदवत् समम् । भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे बृहत् तद् उदकेशयम् । प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानम् अनुत्तमम्

tat krameṇa vivṛddhaṁ tu jalabudbudavat samam bhūtebhyo 'ṇḍaṁ mahābuddhe bṛhat tad udakeśayam prākṛtaṁ brahmarūpasya viṣṇoḥ sthānam anuttamam

हे महाबुद्धे! वह अण्ड क्रमशः जल के बुलबुले के समान बढ़ता गया — भूतों से बना वह विशाल अण्ड जल पर स्थित है; यही ब्रह्मरूपी विष्णु का प्राकृतिक और सर्वोत्तम स्थान है।

श्लोक 55 (vishnu.1.2.55)

तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ व्यक्तरूपी जगत्पतिः । विष्णुर् ब्रह्मस्वरूपेण स्वयम् एव व्यवस्थितः

tatrāvyaktasvarūpo 'sau vyaktarūpī jagatpatiḥ viṣṇur brahmasvarūpeṇa svayam eva vyavasthitaḥ

वहाँ वह अव्यक्त-स्वरूप, जगत्पति विष्णु, व्यक्त रूप धारण कर, स्वयं ब्रह्मा के रूप में स्थित हो गए।

श्लोक 56 (vishnu.1.2.56)

मेरुर् उल्बम् अभूत् तस्य जरायुश् च महीधराः । गर्भोदकं समुद्राश् च तस्यासन् सुमहात्मनः

merur ulbam abhūt tasya jarāyuś ca mahīdharāḥ garbhodakaṁ samudrāś ca tasyāsan sumahātmanaḥ

उन महात्मा के लिए मेरु ही आम्निओन (गर्भ-आवरण) बना, पर्वत ही जरायु (गर्भ-झिल्ली) बने, और समुद्र ही गर्भोदक (गर्भ-जल) बने।

श्लोक 57 (vishnu.1.2.57)

साद्रिद्वीपसमुद्राश् च सज्योतिर् लोकसंग्रहः । तस्मिन्न् अण्डेऽभवद् विप्र सदेवासुरमानुषः

sādridvīpasamudrāś ca sajyotir lokasaṁgrahaḥ tasminn aṇḍe 'bhavad vipra sadevāsuramānuṣaḥ

हे विप्र! उस अण्ड में ही पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों और ज्योतिष्मण्डल सहित समस्त लोकों का समूह, देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित, उत्पन्न हुआ।

श्लोक 58 (vishnu.1.2.58)

वारिवह्न्यनिलाकाशैस् ततो भूतादिना बहिः । वृतं दशगुणैर् अण्डं भूतादिर् महता तथा

vārivahnyanilākāśais tato bhūtādinā bahiḥ vṛtaṁ daśaguṇair aṇḍaṁ bhūtādir mahatā tathā

वह अण्ड बाहर से जल, अग्नि, वायु, आकाश, तथा भूतादि से — प्रत्येक अपने से पूर्व वाले से दस गुना — आवृत था; और भूतादि स्वयं महत् से आवृत था।

श्लोक 59 (vishnu.1.2.59)

अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मंस् तैः सर्वैः सहितो महान् । एभिर् आवरणैर् अण्डं सप्तभिः प्राकृतैर् वृतम् । नालिकेरफलस्यान्तर् बीजं बाह्यदलैर् इव

avyaktenāvṛto brahmaṁs taiḥ sarvaiḥ sahito mahān ebhir āvaraṇair aṇḍaṁ saptabhiḥ prākṛtair vṛtam nālikeraphalasyāntar bījaṁ bāhyadalair iva

हे ब्रह्मन्! और वह महत्, इन सबके साथ, अव्यक्त द्वारा आवृत था। इन सात प्राकृतिक आवरणों से वह अण्ड इस प्रकार घिरा हुआ था, जैसे नारियल के फल में बीज उसके बाहरी छिलकों से घिरा रहता है।

श्लोक 60 (vishnu.1.2.60)

जुषन् रजोगुणं तत्र स्वयं विश्वेश्वरो हरिः । ब्रह्मा भूत्वास्य जगतो विसृष्टौ संप्रवर्तते

juṣan rajoguṇaṁ tatra svayaṁ viśveśvaro hariḥ brahmā bhūtvāsya jagato visṛṣṭau saṁpravartate

वहाँ विश्वेश्वर हरि स्वयं रजोगुण को धारण कर, ब्रह्मा बनकर इस जगत् की रचना में प्रवृत्त होते हैं।

श्लोक 61 (vishnu.1.2.61)

सृष्टं च पात्य् अनुयुगं यावत् कल्पविकल्पना । सत्त्वभृद् भगवान् विष्णुर् अप्रमेयपराक्रमः

sṛṣṭaṁ ca pāty anuyugaṁ yāvat kalpavikalpanā sattvabhṛd bhagavān viṣṇur aprameyaparākramaḥ

और सत्त्वगुण को धारण करने वाले, अप्रमेय पराक्रमी भगवान् विष्णु, जब तक कल्प की गणना चलती है, तब तक युग-युग में सृष्टि की रक्षा करते हैं।

श्लोक 62 (vishnu.1.2.62)

तमोउद्रेकी च कल्पान्ते रुद्ररूपी जनार्दनः । मैत्रेयाखिलभूतानि भक्षयत्य् अतिभीषणः

tamoudrekī ca kalpānte rudrarūpī janārdanaḥ maitreyākhilabhūtāni bhakṣayaty atibhīṣaṇaḥ

और हे मैत्रेय! कल्प के अन्त में तमोगुण की प्रधानता से रुद्र-रूप धारण किए हुए जनार्दन अत्यन्त भीषण होकर समस्त प्राणियों को निगल जाते हैं।

श्लोक 63 (vishnu.1.2.63)

संभक्षयित्वा भूतानि जगत्य् एकार्णवीकृते । नागपर्यङ्कशयने शेतेऽसौ परमेश्वरः

saṁbhakṣayitvā bhūtāni jagaty ekārṇavīkṛte nāgaparyaṅkaśayane śete 'sau parameśvaraḥ

समस्त प्राणियों को निगल कर, जब जगत् एक ही महासागर बन जाता है, तब वह परमेश्वर शेषनाग की शय्या पर लेट जाते हैं।

श्लोक 64 (vishnu.1.2.64)

प्रबुद्धश् च पुनः सृष्टिं करोति ब्रह्मरूपधृक्

prabuddhaś ca punaḥ sṛṣṭiṁ karoti brahmarūpadhṛk

और पुनः जागकर, ब्रह्मा का रूप धारण कर, वे फिर से सृष्टि करते हैं।

श्लोक 65 (vishnu.1.2.65)

सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् । स संज्ञां याति भगवान् एक एव जनार्दनः

sṛṣṭisthityantakaraṇād brahmaviṣṇuśivātmikāṁ sa saṁjñāṁ yāti bhagavān eka eva janārdanaḥ

सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने के कारण ही वह भगवान् जनार्दन, यद्यपि एक ही है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव — इन संज्ञाओं को प्राप्त होता है।

श्लोक 66 (vishnu.1.2.66)

स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यं च पाति च । उपसंहरते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः

sraṣṭā sṛjati cātmānaṁ viṣṇuḥ pālyaṁ ca pāti ca upasaṁharate cānte saṁhartā ca svayaṁ prabhuḥ

स्रष्टा के रूप में वे स्वयं अपने आपको ही उत्पन्न करते हैं; विष्णु के रूप में जो रक्षणीय है उसकी रक्षा करते हैं; और अन्त में संहर्ता के रूप में वे प्रभु स्वयं ही उसका संहार करते हैं।

श्लोक 67 (vishnu.1.2.67)

पृथिव्य् आपस् तथा तेजो वायुर् आकाशम् एव च । सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज् जगत्

pṛthivy āpas tathā tejo vāyur ākāśam eva ca sarvendriyāntaḥkaraṇaṁ puruṣākhyaṁ hi yaj jagat

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, तथा समस्त इन्द्रियों और अन्तःकरण सहित यह सम्पूर्ण जगत् ही 'पुरुष' कहलाता है।

श्लोक 68 (vishnu.1.2.68)

स एव सर्वभूतेशो विश्वरूपो यतोऽव्ययः । सर्गादिकं ततोऽस्यैव भूतस्थम् उपकारकम्

sa eva sarvabhūteśo viśvarūpo yato 'vyayaḥ sargādikaṁ tato 'syaiva bhūtastham upakārakam

वह अव्यय ही समस्त प्राणियों का स्वामी और विश्वरूप है; अतः सृष्टि आदि उन्हीं के भीतर स्थित प्राणियों के हितार्थ उन्हीं की क्रियाएँ हैं।

श्लोक 69 (vishnu.1.2.69)

स एव सृज्यः स च सर्गकर्ता स एव पात्य् अत्ति च पाल्यते च । ब्रह्माद्यवस्थाभिर् अशेषमूर्तिर् विष्णुर् वरिष्ठो वरदो वरेण्यः

sa eva sṛjyaḥ sa ca sargakartā sa eva pāty atti ca pālyate ca brahmādyavasthābhir aśeṣamūrtir viṣṇur variṣṭho varado vareṇyaḥ

वही सृज्य है और वही सृष्टि-कर्ता भी; वही रक्षा करता है, वही निगलता है, और वही रक्षित भी होता है। ब्रह्मा आदि अवस्थाओं द्वारा सर्वरूप, विष्णु ही सर्वश्रेष्ठ, वरदाता और सबसे वरण करने योग्य हैं।

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