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द्वितीयांश · अध्याय 13

भरत का पुनर्जन्म और पालकी-उपदेश

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (vishnu.2.13.1)

मैत्रेय उवाच । भगवन् सम्यग् आख्यातं यत् पृष्टोऽसि मयाखिलम् । भूसमुद्रादिसरितां संस्थानं ग्रहसंस्थितिः

maitreya uvāca bhagavan samyag ākhyātaṁ yat pṛṣṭo'si mayākhilam bhūsamudrādisaritāṁ saṁsthānaṁ grahasaṁsthitiḥ

मैत्रेय ने कहा — हे भगवन्! जो कुछ मैंने आपसे पूछा था — पृथ्वी, समुद्र आदि नदियों की संरचना, ग्रहों की स्थिति —

श्लोक 2 (vishnu.2.13.2)

विष्ण्वाधारं यथा चैतत् त्रैलोक्यं समवस्थितम् । परमार्थश् च मे प्रोक्तो यथा ज्ञानं प्रधानतः

viṣṇvādhāraṁ yathā caitat trailokyaṁ samavasthitam paramārthaś ca me prokto yathā jñānaṁ pradhānataḥ

तथा यह त्रैलोक्य किस प्रकार विष्णु के आधार पर स्थित है, तथा यह परमार्थ भी मुझे बताया गया कि ज्ञान ही प्रधान है।

श्लोक 3 (vishnu.2.13.3)

यत् तु तद् भगवान् आह भरतस्य महीपतेः । कथयिष्यामि चरितं तन् ममाख्यातुम् अर्हसि

yat tu tad bhagavān āha bharatasya mahīpateḥ kathayiṣyāmi caritaṁ tan mamākhyātum arhasi

किन्तु जो आपने भरत राजा का चरित्र कहने की बात कही थी, कृपया वह मुझे बताइए।

श्लोक 4 (vishnu.2.13.4)

भरतः स महीपालः सालग्रामेऽवसत् किल । योगयुक्तः समाधाय वासुदेवे मनः सदा

bharataḥ sa mahīpālaḥ sālagrāme'vasat kila yogayuktaḥ samādhāya vāsudeve manaḥ sadā

वे राजा भरत, ऐसा सुना जाता है, शालग्राम में निवास करते थे, सदा योगयुक्त होकर वासुदेव में मन लगाए हुए।

श्लोक 5 (vishnu.2.13.5)

पुण्यदेशप्रभावेन ध्यायतश् च सदा हरिम् । कथं तु नाभवन् मुक्तिर् यदाभूत् स द्विजः पुनः

puṇyadeśaprabhāvena dhyāyataś ca sadā harim kathaṁ tu nābhavan muktir yadābhūt sa dvijaḥ punaḥ

उस पुण्य-स्थान के प्रभाव से तथा सदा हरि का ध्यान करते हुए भी, उन्हें मुक्ति क्यों नहीं मिली, जब वे पुनः ब्राह्मण के रूप में जन्मे?

श्लोक 6 (vishnu.2.13.6)

विप्रत्वे च कृतं तेन यद् भूयः सुमहात्मना । पूर्वकर्मस्वभावेन तन् ममाख्यातुम् अर्हसि

vipratve ca kṛtaṁ tena yad bhūyaḥ sumahātmanā pūrvakarmasvabhāvena tan mamākhyātum arhasi

तथा ब्राह्मण-जन्म में उन महात्मा ने पूर्व-कर्म के स्वभाव से जो पुनः किया, वह भी मुझे बताइए।

श्लोक 7 (vishnu.2.13.7)

पराशर उवाच । सालग्रामे महाभागो भगवन्न्यस्तमानसः । उवास सुचिरं कालं मैत्रेय पृथिवीपतिः

parāśara uvāca sālagrāme mahābhāgo bhagavannyastamānasaḥ uvāsa suciraṁ kālaṁ maitreya pṛthivīpatiḥ

पराशर ने कहा — हे मैत्रेय, भगवान् में मन अर्पित किए हुए वे महाभाग राजा शालग्राम में बहुत दीर्घ काल तक निवास करते रहे।

श्लोक 8 (vishnu.2.13.8)

अहिंसादिष्व् अशेषेषु गुणेषु गुणिनां वरः । अवाप परमां काष्ठां मनसश् चापि संयमे

ahiṁsādiṣv aśeṣeṣu guṇeṣu guṇināṁ varaḥ avāpa paramāṁ kāṣṭhāṁ manasaś cāpi saṁyame

अहिंसा आदि समस्त गुणों में गुणवानों में श्रेष्ठ वे राजा मन के संयम में भी परम सीमा को प्राप्त हुए।

श्लोक 9 (vishnu.2.13.9)

यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव । कृष्ण विष्णो हृषीकेशेत्य् आह राजा स केवलम्

yajñeśācyuta govinda mādhavānanta keśava kṛṣṇa viṣṇo hṛṣīkeśety āha rājā sa kevalam

'यज्ञेश, अच्युत, गोविन्द, माधव, अनन्त, केशव, कृष्ण, विष्णु, हृषीकेश' — वह राजा केवल यही कहते थे।

श्लोक 10 (vishnu.2.13.10)

नान्यज् जगाद मैत्रेय किंचित् स्वप्नान्तरेष्व् अपि । एतत् पदं तदर्थं च विना नान्यद् अचिन्तयत्

nānyaj jagāda maitreya kiṁcit svapnāntareṣv api etat padaṁ tadarthaṁ ca vinā nānyad acintayat

हे मैत्रेय, वे स्वप्न में भी अन्य कुछ नहीं कहते थे; इन्हीं नामों तथा उनके अर्थ के अतिरिक्त वे और कुछ भी नहीं सोचते थे।

श्लोक 11 (vishnu.2.13.11)

समित्पुष्पकुशादानं चक्रे देवक्रियाकृते । नान्यानि चक्रे कर्माणि निःसङ्गो योगतापसः

samitpuṣpakuśādānaṁ cakre devakriyākṛte nānyāni cakre karmāṇi niḥsaṅgo yogatāpasaḥ

वे देव-कार्य के लिए समिधा, पुष्प तथा कुश-संग्रह करते थे; निःसंग होकर योग-तप में लीन वे कोई अन्य कर्म नहीं करते थे।

श्लोक 12 (vishnu.2.13.12)

जगाम सोऽभिषेकार्थम् एकदा तु महानदीम् । सस्नौ तत्र तदा चक्रे स्नानस्यानन्तरक्रियाः

jagāma so'bhiṣekārtham ekadā tu mahānadīm sasnau tatra tadā cakre snānasyānantarakriyāḥ

एक बार वे स्नान के लिए महानदी को गए; वहाँ स्नान करके उन्होंने स्नान के पश्चात् की क्रियाएँ कीं।

श्लोक 13 (vishnu.2.13.13)

अथाजगाम तत् तीर्थं जलं पातुं पिपासिता । आसन्नप्रसवा ब्रह्मन्न् एकैव हरिणी वनात्

athājagāma tat tīrthaṁ jalaṁ pātuṁ pipāsitā āsannaprasavā brahmann ekaiva hariṇī vanāt

हे ब्रह्मन्, तभी उस तीर्थ पर, वन से प्यासी और प्रसव-निकट एक हिरणी अकेली जल पीने आई।

श्लोक 14 (vishnu.2.13.14)

ततः समभवत् तत्र पीतप्राये जले तया । सिंहस्य नादः सुमहान् सर्वप्राणिभयंकरः

tataḥ samabhavat tatra pītaprāye jale tayā siṁhasya nādaḥ sumahān sarvaprāṇibhayaṁkaraḥ

तब वहाँ, उसके जल पी चुकने के लगभग समय, एक अत्यन्त भयंकर सिंह-गर्जना हुई, जो समस्त प्राणियों को भयभीत करने वाली थी।

श्लोक 15 (vishnu.2.13.15)

ततः सा सहसा त्रासाद् आप्लुता निम्नगातटम् । अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात सः

tataḥ sā sahasā trāsād āplutā nimnagātaṭam atyuccārohaṇenāsyā nadyāṁ garbhaḥ papāta saḥ

तब वह भय से अचानक उछलकर नदी-तट की ओर कूदी, और उस अत्यन्त ऊँची छलांग से उसका गर्भ नदी में गिर पड़ा।

श्लोक 16 (vishnu.2.13.16)

तम् ऊह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिप्लुतम् । जग्राह स नृपो गर्भात् पतितं मृगपोतकम्

tam ūhyamānaṁ vegena vīcimālāpariplutam jagrāha sa nṛpo garbhāt patitaṁ mṛgapotakam

वेग से बहते हुए, लहरों की माला में डूबते हुए उस गर्भ से गिरे मृग-शिशु को राजा ने पकड़ लिया।

श्लोक 17 (vishnu.2.13.17)

गर्भप्रच्युतिदुःखेन प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च । मैत्रेय सापि हरिणी पपात च ममार च

garbhapracyutiduḥkhena prottuṅgākramaṇena ca maitreya sāpi hariṇī papāta ca mamāra ca

हे मैत्रेय, गर्भ के गिरने की पीड़ा से तथा उस ऊँची छलांग से वह हिरणी भी गिर पड़ी और मर गई।

श्लोक 18 (vishnu.2.13.18)

हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः । मृगपोतं समादाय पुनर् आश्रमम् आगतः

hariṇīṁ tāṁ vilokyātha vipannāṁ nṛpatāpasaḥ mṛgapotaṁ samādāya punar āśramam āgataḥ

उस हिरणी को मृत देखकर राजर्षि उस मृग-शिशु को लेकर पुनः अपने आश्रम को लौट आए।

श्लोक 19 (vishnu.2.13.19)

चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः । पोषणं पुष्यमाणश् च स तेन ववृधे मुने

cakārānudinaṁ cāsau mṛgapotasya vai nṛpaḥ poṣaṇaṁ puṣyamāṇaś ca sa tena vavṛdhe mune

वे राजा उस मृग-शिशु का प्रतिदिन पालन-पोषण करने लगे; हे मुने, उनके द्वारा पोषित होकर वह बढ़ने लगा।

श्लोक 20 (vishnu.2.13.20)

चचाराश्रमपर्यन्ते तृणानि गहनेषु सः । दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासाद् अभ्याययौ पुनः

cacārāśramaparyante tṛṇāni gahaneṣu saḥ dūraṁ gatvā ca śārdūlatrāsād abhyāyayau punaḥ

वह आश्रम के छोर पर सघन वनों में घास चरता था; दूर जाकर व्याघ्र के भय से वह पुनः लौट आता था।

श्लोक 21 (vishnu.2.13.21)

प्रातर् गत्वातिदूरं च सायम् आयात् तदाश्रमम् । पुनश् च भरतस्याभूद् आश्रमस्योटजाजिरे

prātar gatvātidūraṁ ca sāyam āyāt tadāśramam punaś ca bharatasyābhūd āśramasyoṭajājire

प्रातः दूर जाकर वह सायंकाल उस आश्रम को लौट आता, और पुनः भरत के आश्रम की कुटिया के आँगन में आ जाता।

श्लोक 22 (vishnu.2.13.22)

तस्य तस्मिन् मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि । आसीच् चेतः समासक्तं न ययाव् अन्यतो द्विज

tasya tasmin mṛge dūrasamīpaparivartini āsīc cetaḥ samāsaktaṁ na yayāv anyato dvija

उस मृग के दूर या निकट रहने पर उनका चित्त उसी में आसक्त रहता था; हे द्विज, वह कहीं और नहीं जाता था।

श्लोक 23 (vishnu.2.13.23)

विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबान्धवः । ममत्वं स चकारोच्चैस् तस्मिन् हरिणबालके

vimuktarājyatanayaḥ projjhitāśeṣabāndhavaḥ mamatvaṁ sa cakāroccais tasmin hariṇabālake

राज्य और पुत्र त्याग चुके, समस्त बन्धुओं को छोड़ चुके वे उस मृग-शिशु के प्रति अत्यधिक ममत्व करने लगे।

श्लोक 24 (vishnu.2.13.24)

किं वृकैर् भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः । चिरायमाणे निष्क्रान्ते तस्यासीद् इति मानसम्

kiṁ vṛkair bhakṣito vyāghraiḥ kiṁ siṁhena nipātitaḥ cirāyamāṇe niṣkrānte tasyāsīd iti mānasam

'क्या इसे भेड़ियों ने खा लिया? क्या इसे व्याघ्रों या सिंह ने मार डाला?' — इसके देर से लौटने पर उनके मन में ऐसा विचार आता था।

श्लोक 25 (vishnu.2.13.25)

एषा वसुमती तस्य खुराग्रक्षतकर्बुरा

eṣā vasumatī tasya khurāgrakṣatakarburā

'यह भूमि इसके खुरों के अग्रभाग से बने चिह्नों से यहाँ-वहाँ चित्रित है —

श्लोक 26 (vishnu.2.13.26)

प्रीतये मम यातोऽसौ क्व ममैणकबालकः । विषाणाग्रेण मद्बाहुकण्डूयनपरो हि सः । क्षेमेणाभ्यागतोऽरण्याद् अपि मां सुखयिष्यति

prītaye mama yāto'sau kva mamaiṇakabālakaḥ viṣāṇāgreṇa madbāhukaṇḍūyanaparo hi saḥ kṣemeṇābhyāgato'raṇyād api māṁ sukhayiṣyati

क्या यह मेरी प्रसन्नता के लिए आया है? मेरा वह मृग-शिशु कहाँ है? वह अपने सींग के अग्रभाग से मेरी बाँह खुजलाता था; वह वन से सकुशल लौटकर मुझे पुनः सुख देगा।'

श्लोक 27 (vishnu.2.13.27)

एते लूनशिखास् तस्य दशनैर् अचिरोद्गतैः । कुशकाशा विराजन्ते बटवः सामगा इव

ete lūnaśikhās tasya daśanair acirodgataiḥ kuśakāśā virājante baṭavaḥ sāmagā iva

इसके दाँतों से अभी-अभी काटे गए कुश-काश के ये कटे हुए अग्रभाग, मानो सामवेद पढ़ते हुए युवा ब्रह्मचारियों के समान शोभित हो रहे हैं।'

श्लोक 28 (vishnu.2.13.28)

इत्थं चिरगते तस्मिन् स चक्रे मानसं मुनिः । प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन् मृगे

itthaṁ ciragate tasmin sa cakre mānasaṁ muniḥ prītiprasannavadanaḥ pārśvasthe cābhavan mṛge

इस प्रकार जब वह बहुत देर तक दूर रहता, तो मुनि का मन ऐसा ही सोचता रहता था, और जब वह मृग पास होता, तो उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठता था।

श्लोक 29 (vishnu.2.13.29)

समाधिभङ्गस् तस्यासीत् तन्मयत्वादृतात्मनः । संत्यक्तराज्यभोगर्द्धिस्वजनस्यापि भूपतेः

samādhibhaṅgas tasyāsīt tanmayatvādṛtātmanaḥ saṁtyaktarājyabhogarddhisvajanasyāpi bhūpateḥ

उसमें इतना तन्मय हो चुके थे वे राजा, जिन्होंने राज्य, भोग, वैभव तथा अपने स्वजन तक त्याग दिए थे, कि उनकी समाधि भंग हो गई।

श्लोक 30 (vishnu.2.13.30)

चपले चपलं तस्मिन् दूरगं दूरगामिनि । मृगपोतेऽभवच् चित्तं स्थैर्यवत् तस्य भूपतेः

capale capalaṁ tasmin dūragaṁ dūragāmini mṛgapote'bhavac cittaṁ sthairyavat tasya bhūpateḥ

जब वह चंचल मृग-शिशु दूर तक चंचलता से भटक जाता था, तब उस राजा का [स्वभाव से] स्थिर चित्त भी उसी की भाँति चंचल हो जाता था।

श्लोक 31 (vishnu.2.13.31)

कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः । पितेव सास्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः

kālena gacchatā so'tha kālaṁ cakre mahīpatiḥ piteva sāsraṁ putreṇa mṛgapotena vīkṣitaḥ

समय बीतने पर वह राजा भी काल-कवलित हुए, उस समय मृग-शिशु उन्हें पिता की भाँति अश्रुपूर्ण नेत्रों से देख रहा था।

श्लोक 32 (vishnu.2.13.32)

मृगम् एष तदाद्राक्षीत् त्यजन् प्राणान् असाव् अपि । तन्मयत्वेन मैत्रेय नान्यत् किंचिद् अचिन्तयत्

mṛgam eṣa tadādrākṣīt tyajan prāṇān asāv api tanmayatvena maitreya nānyat kiṁcid acintayat

उस समय प्राण त्यागते हुए उन्होंने भी उस मृग को ही देखा; हे मैत्रेय, उसी में तन्मय होकर उन्होंने और कुछ भी नहीं सोचा।

श्लोक 33 (vishnu.2.13.33)

ततश् च तत्कालकृतां भावनां प्राप्य तादृशीम् । जम्बूमार्गे महारण्ये जज्ञे जातिस्मरो मृगः

tataś ca tatkālakṛtāṁ bhāvanāṁ prāpya tādṛśīm jambūmārge mahāraṇye jajñe jātismaro mṛgaḥ

तत्पश्चात् उसी क्षण में बनी हुई वैसी भावना को प्राप्त कर, वे जम्बू-मार्ग के महावन में पूर्वजन्म-स्मरण-सहित मृग बनकर उत्पन्न हुए।

श्लोक 34 (vishnu.2.13.34)

जातिस्मरत्वाद् उद्विग्नः संसारात् स द्विजोत्तम । विहाय मातरं भूयः सालग्रामम् उपाययौ

jātismaratvād udvignaḥ saṁsārāt sa dvijottama vihāya mātaraṁ bhūyaḥ sālagrāmam upāyayau

हे द्विजोत्तम, पूर्वजन्म के स्मरण से संसार से उद्विग्न होकर उन्होंने अपनी माता को भी त्याग दिया और पुनः शालग्राम को चले गए।

श्लोक 35 (vishnu.2.13.35)

शुष्कैस् तृणैस् तथा पर्णैः स कुर्वन्न् आत्मपोषणम् । मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ

śuṣkais tṛṇais tathā parṇaiḥ sa kurvann ātmapoṣaṇam mṛgatvahetubhūtasya karmaṇo niṣkṛtiṁ yayau

सूखी घास और पत्तों से अपना निर्वाह करते हुए उन्होंने उस कर्म का प्रायश्चित्त किया जो मृग-जन्म का कारण बना था।

श्लोक 36 (vishnu.2.13.36)

तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः । सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले

tatra cotsṛṣṭadeho'sau jajñe jātismaro dvijaḥ sadācāravatāṁ śuddhe yogināṁ pravare kule

वहाँ शरीर त्यागकर वे पूर्वजन्म-स्मरण-सहित ब्राह्मण के रूप में, सदाचारी योगियों के शुद्ध, श्रेष्ठ कुल में पुनः जन्मे।

श्लोक 37 (vishnu.2.13.37)

सर्वविज्ञानसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् । अपश्यत् स च मैत्रेय आत्मानं प्रकृतेः परम्

sarvavijñānasaṁpannaḥ sarvaśāstrārthatattvavit apaśyat sa ca maitreya ātmānaṁ prakṛteḥ param

हे मैत्रेय, समस्त ज्ञान से सम्पन्न, समस्त शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व को जानने वाले उन्होंने आत्मा को प्रकृति से परे देखा।

श्लोक 38 (vishnu.2.13.38)

आत्मनोऽधिगतज्ञानो देवादीनि महामुने । सर्वभूतान्य् अभेदेन ददर्श स महामतिः

ātmano'dhigatajñāno devādīni mahāmune sarvabhūtāny abhedena dadarśa sa mahāmatiḥ

हे महामुने, आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर उन महामति ने देवों आदि समस्त प्राणियों को अभेद-भाव से देखा।

श्लोक 39 (vishnu.2.13.39)

न पपाठ गुरुप्रोक्तां कृतोपनयनः श्रुतिम् । न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च

na papāṭha guruproktāṁ kṛtopanayanaḥ śrutim na dadarśa ca karmāṇi śāstrāṇi jagṛhe na ca

यज्ञोपवीत होने पर भी उन्होंने गुरु द्वारा पढ़ाई गई श्रुति का अध्ययन नहीं किया; उन्होंने कर्मों में रुचि नहीं दिखाई और न ही शास्त्र ग्रहण किए।

श्लोक 40 (vishnu.2.13.40)

उक्तोऽपि बहुशः किंचिज् जडवाक्यम् अभाषत । तद् अप्य् असंस्कारगुणं ग्राम्यवाक्योक्तिसंश्रितम्

ukto'pi bahuśaḥ kiṁcij jaḍavākyam abhāṣata tad apy asaṁskāraguṇaṁ grāmyavākyoktisaṁśritam

बार-बार कहने पर भी वे कोई जड़ जैसी बात ही कहते थे, और वह भी असंस्कृत, ग्राम्य भाषा जैसी।

श्लोक 41 (vishnu.2.13.41)

अपध्वस्तवपुः सोऽथ मलिनाम्बरधृग् द्विजः । क्लिन्नदन्तान्तरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः

apadhvastavapuḥ so'tha malināmbaradhṛg dvijaḥ klinnadantāntaraḥ sarvaiḥ paribhūtaḥ sa nāgaraiḥ

अस्त-व्यस्त शरीर, मैले वस्त्र धारण किए, दाँतों के बीच मैल जमाए वे ब्राह्मण नगरवासियों द्वारा सर्वथा तिरस्कृत थे।

श्लोक 42 (vishnu.2.13.42)

संमानना परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः । जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विन्दति

saṁmānanā parāṁ hāniṁ yogarddheḥ kurute yataḥ janenāvamato yogī yogasiddhiṁ ca vindati

[वे सोचते थे —] 'सम्मान योग की समृद्धि की परम हानि करता है; जन-तिरस्कृत योगी ही योग-सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 43 (vishnu.2.13.43)

तस्माच् चरेत वै योगी सतां धर्मम् अदूषयन् । जना यथावमन्येरन् गच्छेयुर् नैव संगतिम्

tasmāc careta vai yogī satāṁ dharmam adūṣayan janā yathāvamanyeran gaccheyur naiva saṁgatim

इसलिए योगी को संतों के धर्म को दूषित किए बिना ऐसा आचरण करना चाहिए कि लोग उसका तिरस्कार करें और उससे आसक्ति न रखें।'

श्लोक 44 (vishnu.2.13.44)

हिरण्यगर्भवचनं विचिन्त्येत्थं महामतिः । आत्मानं दर्शयाम् आस जडोन्मत्ताकृतिं जने

hiraṇyagarbhavacanaṁ vicintyetthaṁ mahāmatiḥ ātmānaṁ darśayām āsa jaḍonmattākṛtiṁ jane

हिरण्यगर्भ के इस वचन का चिन्तन करते हुए वे महामति स्वयं को लोगों के सामने जड़-उन्मत्त के रूप में प्रस्तुत करने लगे।

श्लोक 45 (vishnu.2.13.45)

भुङ्क्ते कुल्माषवाट्यादिशाकं वन्यं फलं कणान् । यद् यद् आप्नोति सुबहु तद् अत्ते कालसंयमम्

bhuṅkte kulmāṣavāṭyādiśākaṁ vanyaṁ phalaṁ kaṇān yad yad āpnoti subahu tad atte kālasaṁyamam

वे कुल्माष (मोटा अनाज), बगीचे का साग, वन-फल तथा बचे हुए दाने खाते थे; जो कुछ भी बहुत मिल जाता, उसी से समयानुसार निर्वाह करते।

श्लोक 46 (vishnu.2.13.46)

पितर्य् उपरते सोऽथ भ्रातृभ्रातृव्यबान्धवैः । कारितः क्षेत्रकर्मादि कदन्नाहारपोषितः

pitary uparate so'tha bhrātṛbhrātṛvyabāndhavaiḥ kāritaḥ kṣetrakarmādi kadannāhārapoṣitaḥ

पिता के देहान्त के पश्चात् भाई, भतीजों तथा बन्धुओं द्वारा उन्हें खेत का काम आदि कराया गया, तथा निकृष्ट भोजन पर पाला गया।

श्लोक 47 (vishnu.2.13.47)

स रूक्षपीनावयवो जडकारी च कर्मणि । सर्वलोकोपकरणं बभूवाहारवेतनः

sa rūkṣapīnāvayavo jaḍakārī ca karmaṇi sarvalokopakaraṇaṁ babhūvāhāravetanaḥ

रूखे, स्थूल अंगों वाले, कार्य में जड़ता से काम करने वाले वे भोजन-वेतन पर सबके सेवक बन गए।

श्लोक 48 (vishnu.2.13.48)

तं तादृशम् असंस्कारं विप्राकृतिविचेष्टितम् । क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यम् अमन्यत

taṁ tādṛśam asaṁskāraṁ viprākṛtiviceṣṭitam kṣattā sauvīrarājasya viṣṭiyogyam amanyata

सौवीर-राज के कारिन्दे ने उन असंस्कृत, अब्राह्मणोचित आचरण वाले पुरुष को बेगार-सेवा (विष्टि) के योग्य समझा।

श्लोक 49 (vishnu.2.13.49)

स राजा शिबिकारूढो गन्तुं कृतमतिर् द्विज । बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलर्षेर् वराश्रमम्

sa rājā śibikārūḍho gantuṁ kṛtamatir dvija babhūvekṣumatītīre kapilarṣer varāśramam

हे द्विज, वे राजा पालकी पर सवार होकर इक्षुमती नदी के तट पर स्थित कपिल ऋषि के श्रेष्ठ आश्रम को जाने का निश्चय कर चले —

श्लोक 50 (vishnu.2.13.50)

श्रेयः किम् अत्र संसारे दुःखप्राये नृणाम् इति । प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम्

śreyaḥ kim atra saṁsāre duḥkhaprāye nṛṇām iti praṣṭuṁ taṁ mokṣadharmajñaṁ kapilākhyaṁ mahāmunim

यह पूछने के लिए कि दुःखमय इस संसार में मनुष्यों के लिए श्रेष्ठ क्या है, मोक्ष-धर्म के ज्ञाता कपिल नामक उस महामुनि से।

श्लोक 51 (vishnu.2.13.51)

उवाह शिबिकां तस्य क्षत्तुर् वचनचोदितः । नृणां विष्टिगृहीतानाम् अन्येषां सोऽपि मध्यगः

uvāha śibikāṁ tasya kṣattur vacanacoditaḥ nṛṇāṁ viṣṭigṛhītānām anyeṣāṁ so'pi madhyagaḥ

कारिन्दे के वचन से प्रेरित होकर उन्हें, अन्य बेगार में लगे लोगों के मध्य में, पालकी उठाने के लिए लगाया गया।

श्लोक 52 (vishnu.2.13.52)

गृहीतो विष्टिना विप्रः सर्वज्ञानैकभाजनः । जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम्

gṛhīto viṣṭinā vipraḥ sarvajñānaikabhājanaḥ jātismaro'sau pāpasya kṣayakāma uvāha tām

वह ब्राह्मण, समस्त ज्ञान का एकमात्र भण्डार, बेगार में पकड़ा गया, पूर्वजन्म-स्मरण-सहित, पाप के क्षय की कामना करते हुए उसे उठाकर चला।

श्लोक 53 (vishnu.2.13.53)

ययौ जडगतिः सोऽथ युगमात्रावलोकनम् । कुर्वन् मतिमतां श्रेष्ठस् ते त्व् अन्ये त्वरितं ययुः

yayau jaḍagatiḥ so'tha yugamātrāvalokanam kurvan matimatāṁ śreṣṭhas te tv anye tvaritaṁ yayuḥ

वे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, जड़ जैसी चाल से, केवल एक जुए-भर की दूरी तक देखते हुए चलते थे, जबकि अन्य लोग तेज़ी से चलते थे।

श्लोक 54 (vishnu.2.13.54)

विलोक्य नृपतिः सोऽपि विषमां शिबिकागतिम् । किम् एतद् इत्य् आह समं गम्यतां शिबिकावहाः

vilokya nṛpatiḥ so'pi viṣamāṁ śibikāgatim kim etad ity āha samaṁ gamyatāṁ śibikāvahāḥ

पालकी की उस असमान गति को देखकर राजा ने कहा — 'यह क्या है? पालकी उठाने वाले समान रूप से चलें।'

श्लोक 55 (vishnu.2.13.55)

पुनस् तथैव शिबिकां विलोक्य विषमां हसन् । नृपः किम् एतद् इत्य् आह भवद्भिर् गम्यतेऽन्यथा

punas tathaiva śibikāṁ vilokya viṣamāṁ hasan nṛpaḥ kim etad ity āha bhavadbhir gamyate'nyathā

पुनः पालकी को उसी प्रकार असमान देखकर हँसते हुए राजा ने कहा — 'यह क्या है? तुम सब भिन्न-भिन्न प्रकार से चल रहे हो।'

श्लोक 56 (vishnu.2.13.56)

भूपतेर् वदतस् तस्य श्रुत्वेत्थं बहुशो वचः । शिबिकोद्वाहकाः प्रोचुर् अयं यातीत्य् असत्वरम्

bhūpater vadatas tasya śrutvetthaṁ bahuśo vacaḥ śibikodvāhakāḥ procur ayaṁ yātīty asatvaram

राजा के बार-बार ऐसा कहने को सुनकर पालकी के अन्य वाहकों ने कहा — 'यह व्यक्ति शीघ्रता से नहीं चलता है।'

श्लोक 57 (vishnu.2.13.57)

राजोवाच । किं श्रान्तोऽस्य् अल्पम् अध्वानं त्वयोढा शिबिका मम । किम् आयाससहो न त्वं पीवान् असि निरीक्ष्यसे

rājovāca kiṁ śrānto'sy alpam adhvānaṁ tvayoḍhā śibikā mama kim āyāsasaho na tvaṁ pīvān asi nirīkṣyase

राजा ने कहा — क्या तुम मेरी पालकी को थोड़ी दूर उठाकर ही थक गए हो? क्या तुम श्रम सहन नहीं कर सकते? तुम मुझे स्थूल-शरीर वाले प्रतीत होते हो, फिर भी ऐसा क्यों?

श्लोक 58 (vishnu.2.13.58)

ब्राह्मण उवाच । नाहं पीवा न चैवोढा शिबिका भवतो मया । न श्रान्तोऽस्मि न चायासः सोढव्योऽस्ति महीपते

brāhmaṇa uvāca nāhaṁ pīvā na caivoḍhā śibikā bhavato mayā na śrānto'smi na cāyāsaḥ soḍhavyo'sti mahīpate

ब्राह्मण ने कहा — न तो मैं स्थूल हूँ, न ही मैंने आपकी पालकी उठाई है; न मैं थका हूँ, न मुझे कोई श्रम सहना है, हे राजन्।

श्लोक 59 (vishnu.2.13.59)

राजोवाच । प्रत्यक्षं दृश्यसे पीवान् अद्यापि शिबिका त्वयि । श्रमश् च भारोद्वहने भवत्य् एव हि देहिनाम्

rājovāca pratyakṣaṁ dṛśyase pīvān adyāpi śibikā tvayi śramaś ca bhārodvahane bhavaty eva hi dehinām

राजा ने कहा — आज भी तुम प्रत्यक्ष स्थूल दिखाई देते हो, और पालकी तुम पर ही टिकी है; भार उठाने में देहधारियों को श्रम अवश्य होता है।

श्लोक 60 (vishnu.2.13.60)

ब्राह्मण उवाच । प्रत्यक्षं भवता भूप यद् दृष्टं मम तद् वद । बलवान् अबलश् चेति वाच्यं पश्चाद् विशेषणम्

brāhmaṇa uvāca pratyakṣaṁ bhavatā bhūpa yad dṛṣṭaṁ mama tad vada balavān abalaś ceti vācyaṁ paścād viśeṣaṇam

ब्राह्मण ने कहा — हे राजन्, आपने मुझमें जो प्रत्यक्ष देखा है, वह पहले बताइए; 'बलवान्' या 'निर्बल' जैसे विशेषण तो बाद में कहे जाने चाहिए।

श्लोक 61 (vishnu.2.13.61)

त्वयोढा शिबिका चेति त्वय्य् अद्यापि च संस्थिता । मिथ्यैतद् अत्र तु भवाञ् शृणोतु वचनं मम

tvayoḍhā śibikā ceti tvayy adyāpi ca saṁsthitā mithyaitad atra tu bhavāñ śṛṇotu vacanaṁ mama

'पालकी तुमने उठाई' और 'वह आज भी तुम पर टिकी है' — यह मिथ्या है; इस विषय में मेरा वचन सुनिए।

श्लोक 62 (vishnu.2.13.62)

भूमौ पादयुगस्यास्था जङ्घे पादद्वये स्थिते । ऊरू जङ्घाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम्

bhūmau pādayugasyāsthā jaṅghe pādadvaye sthite ūrū jaṅghādvayāvasthau tadādhāraṁ tathodaram

भूमि पर दोनों पैर टिके हैं, दोनों पैरों पर पिंडलियाँ, पिंडलियों पर जांघें, तथा उन पर पेट टिका है।

श्लोक 63 (vishnu.2.13.63)

वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कन्धौ चोदरसंस्थितौ । स्कन्धाश्रितेयं शिबिका मम भारोऽत्र किं कृतः

vakṣaḥsthalaṁ tathā bāhū skandhau codarasaṁsthitau skandhāśriteyaṁ śibikā mama bhāro'tra kiṁ kṛtaḥ

वक्षस्थल, तथा दोनों भुजाएँ, कंधे, पेट पर टिके हुए हैं; यह पालकी कंधों पर टिकी है — फिर मुझ पर भार कहाँ पड़ा?

श्लोक 64 (vishnu.2.13.64)

शिबिकायां स्थितं चेदं देहं त्वदुपलक्षितम् । तत्र त्वम् अहम् अप्य् अत्र प्रोच्यते चेदम् अन्यथा

śibikāyāṁ sthitaṁ cedaṁ dehaṁ tvadupalakṣitam tatra tvam aham apy atra procyate cedam anyathā

यह देह जिसे तुमने पालकी पर स्थित देखा — उसमें 'तुम' और 'मैं' — यह भी गलत ही कहा जाता है।

श्लोक 65 (vishnu.2.13.65)

अहं त्वं च तथान्ये च भूतैर् उह्याम पार्थिव । गुणप्रवाहपतितो भूतवर्गोऽपि यात्य् अयम्

ahaṁ tvaṁ ca tathānye ca bhūtair uhyāma pārthiva guṇapravāhapatito bhūtavargo'pi yāty ayam

हे राजन्, मैं, तुम तथा अन्य सब भी भूतों द्वारा वहन किए जाते हैं; गुणों के प्रवाह में गिरा हुआ भूत-समूह भी इसी प्रकार चलता है।

श्लोक 66 (vishnu.2.13.66)

कर्मवश्या गुणा ह्य् एते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते । अविद्यासंचितं कर्म तच् चाशेषेषु जन्तुषु

karmavaśyā guṇā hy ete sattvādyāḥ pṛthivīpate avidyāsaṁcitaṁ karma tac cāśeṣeṣu jantuṣu

हे पृथ्वीपते, सत्त्व आदि ये गुण कर्म के अधीन हैं; तथा अविद्या से संचित वह कर्म समस्त प्राणियों में विद्यमान है।

श्लोक 67 (vishnu.2.13.67)

आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो निर्गुणः प्रकृतेः परः । प्रवृद्ध्यपचयौ नास्य एकस्याखिलजन्तुषु

ātmā śuddho'kṣaraḥ śānto nirguṇaḥ prakṛteḥ paraḥ pravṛddhyapacayau nāsya ekasyākhilajantuṣu

आत्मा शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण, प्रकृति से परे है; समस्त प्राणियों में एक ही उस आत्मा की न वृद्धि है न क्षय।

श्लोक 68 (vishnu.2.13.68)

यदा नोपचयस् तस्य न चैवापचयो नृप । तदा पीवान् असीतीत्थं कया युक्त्या त्वयेरितम्

yadā nopacayas tasya na caivāpacayo nṛpa tadā pīvān asītītthaṁ kayā yuktyā tvayeritam

हे राजन्, जब उसकी न वृद्धि होती है न क्षय, तब किस युक्ति से तुमने कहा कि 'यह स्थूल है'?

श्लोक 69 (vishnu.2.13.69)

भूपादजङ्घाकट्यूरुजठरादिषु संस्थिते । शिबिकेयं यदा स्कन्धे तदा भारः समस् त्वया

bhūpādajaṅghākaṭyūrujaṭharādiṣu saṁsthite śibikeyaṁ yadā skandhe tadā bhāraḥ samas tvayā

यह पालकी जब पैर, पिंडली, कमर, जांघ, पेट आदि पर टिकी होती है, और जब वह कंधे पर होती है, तब ही आप इसे समान भार कहते हैं।

श्लोक 70 (vishnu.2.13.70)

तथान्यैर् जन्तुभिर् भूप शिबिकोत्थो न केवलम् । शैलद्रुमगृहोत्थोऽपि पृथिवीसंभवोऽपि वा

tathānyair jantubhir bhūpa śibikottho na kevalam śailadrumagṛhottho'pi pṛthivīsaṁbhavo'pi vā

हे राजन्, यह न केवल पालकी के विषय में, बल्कि पर्वत, वृक्ष, घर से उत्पन्न, या पृथ्वी से उत्पन्न किसी भी वस्तु के विषय में भी सत्य है।

श्लोक 71 (vishnu.2.13.71)

यदा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः कारणैर् नृप । वोढव्यस् तु तदा भारः कतमो नृपते मया

yadā puṁsaḥ pṛthagbhāvaḥ prākṛtaiḥ kāraṇair nṛpa voḍhavyas tu tadā bhāraḥ katamo nṛpate mayā

हे राजन्, जब पुरुष का प्राकृत कारणों से पृथक्करण हो जाता है, तब मुझसे कौन-सा भार उठाया जाना है, हे नरेश?

श्लोक 72 (vishnu.2.13.72)

यद्द्रव्या शिबिका चेयं तद्द्रव्यो भूतसंग्रहः । भवतो मेऽखिलस्यास्य ममत्वेनोपबृंहितः

yaddravyā śibikā ceyaṁ taddravyo bhūtasaṁgrahaḥ bhavato me'khilasyāsya mamatvenopabṛṁhitaḥ

यह पालकी जिस द्रव्य से बनी है, उसी द्रव्य से यह भूत-समूह भी बना है; यह सब केवल 'तुम्हारा' और 'मेरा' मानकर ही बढ़ाया गया है।

श्लोक 73 (vishnu.2.13.73)

पराशर उवाच । एवम् उक्त्वाभवन् मौनी स वहञ् छिबिकां द्विजः । सोऽपि राजावतीर्योर्व्यां तत्पादौ जगृहे त्वरन्

parāśara uvāca evam uktvābhavan maunī sa vahañ chibikāṁ dvijaḥ so'pi rājāvatīryorvyāṁ tatpādau jagṛhe tvaran

पराशर ने कहा — ऐसा कहकर वह ब्राह्मण पालकी उठाए हुए मौन हो गया; और वह राजा भी तुरन्त भूमि पर उतरकर उसके चरण पकड़ने लगा।

श्लोक 74 (vishnu.2.13.74)

राजोवाच । भो भो विसृज्य शिबिकां प्रसादं कुरु मे द्विज । कथ्यतां को भवान् अत्र जाल्मरूपधरः स्थितः

rājovāca bho bho visṛjya śibikāṁ prasādaṁ kuru me dvija kathyatāṁ ko bhavān atra jālmarūpadharaḥ sthitaḥ

राजा ने कहा — हे भो! पालकी को छोड़कर मुझ पर कृपा कीजिए; बताइए, आप कौन हैं जो यहाँ मूर्ख का रूप धारण किए हुए हैं?

श्लोक 75 (vishnu.2.13.75)

यो भवान् यन् निमित्तं वा यद् आगमनकारणम् । तत् सर्वं कथ्यतां विद्वन् मह्यं शुश्रूषवे त्वया

yo bhavān yan nimittaṁ vā yad āgamanakāraṇam tat sarvaṁ kathyatāṁ vidvan mahyaṁ śuśrūṣave tvayā

आप जो भी हैं, जो भी कारण हो, जो भी आपके आगमन का हेतु हो — हे विद्वन्, वह सब मुझे बताइए, जो सुनने को उत्सुक हूँ।

श्लोक 76 (vishnu.2.13.76)

ब्राह्मण उवाच । श्रूयतां कोऽहम् इत्य् एतद् वक्तुं भूप न शक्यते । उपभोगनिमित्तं च सर्वत्रागमनक्रिया

brāhmaṇa uvāca śrūyatāṁ ko'ham ity etad vaktuṁ bhūpa na śakyate upabhoganimittaṁ ca sarvatrāgamanakriyā

ब्राह्मण ने कहा — 'मैं कौन हूँ' यह बताना संभव नहीं है, हे राजन्; और सर्वत्र आगमन की क्रिया का कारण केवल भोग ही है।

श्लोक 77 (vishnu.2.13.77)

सुखदुःखोपभोगौ तु तौ देहाद्युपपादकौ । धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जन्तुर् देहादिम् ऋच्छति

sukhaduḥkhopabhogau tu tau dehādyupapādakau dharmādharmodbhavau bhoktuṁ jantur dehādim ṛcchati

धर्म और अधर्म से उत्पन्न सुख-दुःख का भोग ही देह आदि को उत्पन्न कराने वाला है; इसी को भोगने के लिए प्राणी देह आदि प्राप्त करता है।

श्लोक 78 (vishnu.2.13.78)

सर्वस्यैव हि भूपाल जन्तोः सर्वत्र कारणम् । धर्माधर्मौ यतस् तस्मात् कारणं पृच्छ्यते कुतः

sarvasyaiva hi bhūpāla jantoḥ sarvatra kāraṇam dharmādharmau yatas tasmāt kāraṇaṁ pṛcchyate kutaḥ

हे राजन्, चूँकि प्रत्येक प्राणी के लिए सर्वत्र धर्म और अधर्म ही कारण हैं, इसलिए फिर कारण क्यों पूछा जाता है?

श्लोक 79 (vishnu.2.13.79)

राजोवाच । धर्माधर्मौ न संदेहः सर्वकार्येषु कारणम् । उपभोगनिमित्तं च देहीदेशान्तरागमः

rājovāca dharmādharmau na saṁdehaḥ sarvakāryeṣu kāraṇam upabhoganimittaṁ ca dehīdeśāntarāgamaḥ

राजा ने कहा — इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म ही सब कार्यों के कारण हैं, तथा देहधारी का अन्यत्र गमन भोग के लिए ही होता है।

श्लोक 80 (vishnu.2.13.80)

यत् त्व् एतद् भवता प्रोक्तं कोऽहम् इत्य् एतद् आत्मनः । वक्तुं न शक्यते श्रोतुं तन् ममेच्छा प्रवर्तते

yat tv etad bhavatā proktaṁ ko'ham ity etad ātmanaḥ vaktuṁ na śakyate śrotuṁ tan mamecchā pravartate

किन्तु आपने जो यह कहा कि 'मैं कौन हूँ' यह बताना संभव नहीं है — उसे सुनने की इच्छा मेरे मन में उत्पन्न होती है।

श्लोक 81 (vishnu.2.13.81)

योऽस्ति सोऽहम् इति ब्रह्मन् कथं वक्तुं न शक्यते । आत्मन्य् एव न दोषाय शब्दोऽहम् इति यो द्विज

yo'sti so'ham iti brahman kathaṁ vaktuṁ na śakyate ātmany eva na doṣāya śabdo'ham iti yo dvija

'जो है, वही मैं हूँ' — हे ब्रह्मन्, यह कहना असंभव क्यों है? आत्मा के विषय में ही 'मैं' शब्द दोषपूर्ण नहीं है, हे द्विज।

श्लोक 82 (vishnu.2.13.82)

ब्राह्मण उवाच । शब्दोऽहम् इति दोषाय नात्मन्य् एष तथैव तत् । अनात्मन्य् आत्मविज्ञानं शब्दो वा भ्रान्तिलक्षणः

brāhmaṇa uvāca śabdo'ham iti doṣāya nātmany eṣa tathaiva tat anātmany ātmavijñānaṁ śabdo vā bhrāntilakṣaṇaḥ

ब्राह्मण ने कहा — 'मैं' शब्द दोषपूर्ण ही है जब वह आत्मा के विषय में न हो; अनात्मा में आत्मा का ज्ञान, अथवा वह शब्द, भ्रान्ति का लक्षण है।

श्लोक 83 (vishnu.2.13.83)

जिह्वा ब्रवीत्य् अहम् इति दन्तौष्ठौ तालुकं नृप । एते नाहं यतः सर्वे वाङ्निष्पादनहेतवः

jihvā bravīty aham iti dantauṣṭhau tālukaṁ nṛpa ete nāhaṁ yataḥ sarve vāṅniṣpādanahetavaḥ

हे राजन्, जिह्वा कहती है 'मैं'; दाँत, होंठ, तालु भी — किन्तु ये सब 'मैं' नहीं हैं, क्योंकि ये सब तो केवल वाणी उत्पन्न करने के साधन हैं।

श्लोक 84 (vishnu.2.13.84)

किं हेतुभिर् वदत्य् एषा वाग् एवाहम् इति स्वयम् । तथापि वाङ् नाहम् एतद् वक्तुम् इत्थं न युज्यते

kiṁ hetubhir vadaty eṣā vāg evāham iti svayam tathāpi vāṅ nāham etad vaktum itthaṁ na yujyate

क्या यह वाणी इन कारणों से बोलती है, या वाणी स्वयं ही 'मैं' कहती है? फिर भी वाणी को 'मैं' कहना उचित नहीं है।

श्लोक 85 (vishnu.2.13.85)

पिण्डः पृथग् यतः पुंसः शिरःपाण्यादिलक्षणः । ततोऽहम् इति कुत्रैतां संज्ञां राजन् करोम्य् अहम्

piṇḍaḥ pṛthag yataḥ puṁsaḥ śiraḥpāṇyādilakṣaṇaḥ tato'ham iti kutraitāṁ saṁjñāṁ rājan karomy aham

जब सिर, हाथ आदि लक्षणों वाला मनुष्य का पिण्ड ही पृथक् है, तो हे राजन्, यह 'मैं' की संज्ञा मैं कहाँ लगाऊँ?

श्लोक 86 (vishnu.2.13.86)

यद्य् अन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम । तदैषोऽहम् अयं चान्यो वक्तुम् एवम् अपीष्यते

yady anyo'sti paraḥ ko'pi mattaḥ pārthivasattama tadaiṣo'ham ayaṁ cānyo vaktum evam apīṣyate

हे पार्थिव-श्रेष्ठ, यदि मुझसे भिन्न कोई अन्य पर वस्तु है, तभी 'यह मैं हूँ' और 'यह अन्य है' — ऐसा कहना उचित होगा।

श्लोक 87 (vishnu.2.13.87)

यदा समस्तदेहेषु पुमान् एको व्यवस्थितः । तदा हि को भवान् कोऽहम् इत्य् एतद् विफलं वचः

yadā samastadeheṣu pumān eko vyavasthitaḥ tadā hi ko bhavān ko'ham ity etad viphalaṁ vacaḥ

किन्तु जब समस्त शरीरों में एक ही पुरुष स्थित है, तब 'तुम कौन हो', 'मैं कौन हूँ' — यह वाणी ही निष्फल है।

श्लोक 88 (vishnu.2.13.88)

त्वं राजा शिबिका चेयम् वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको न सद् एतन् नृपोच्यते

tvaṁ rājā śibikā ceyam vayaṁ vāhāḥ puraḥsarāḥ ayaṁ ca bhavato loko na sad etan nṛpocyate

'तुम राजा हो', 'यह पालकी है', 'हम आगे चलने वाले वाहक हैं' — यह जो तुम्हारा संसार है, हे राजन्, यह वास्तविक नहीं कहा जाता।

श्लोक 89 (vishnu.2.13.89)

वृक्षाद् दारु ततश् चेयं शिबिका त्वदधिष्ठिता । क्व वृक्षसंज्ञा याता स्याद् दारुसंज्ञाथ वा नृप

vṛkṣād dāru tataś ceyaṁ śibikā tvadadhiṣṭhitā kva vṛkṣasaṁjñā yātā syād dārusaṁjñātha vā nṛpa

वृक्ष से लकड़ी बनी, और उससे यह पालकी जिस पर तुम बैठे हो — फिर हे राजन्, 'वृक्ष' नाम कहाँ गया, या 'लकड़ी' नाम भी कहाँ गया?

श्लोक 90 (vishnu.2.13.90)

वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति ते जनः । न च दारुणि सर्वस् त्वां ब्रवीति शिबिकागतम्

vṛkṣārūḍho mahārājo nāyaṁ vadati te janaḥ na ca dāruṇi sarvas tvāṁ bravīti śibikāgatam

तुम्हारी प्रजा यह नहीं कहती कि 'महाराज वृक्ष पर सवार हैं'; और सभी यह भी नहीं कहते कि 'तुम लकड़ियों पर चढ़े हुए हो'।

श्लोक 91 (vishnu.2.13.91)

शिबिकादारुसंघातो रचनास्थितिसंस्थितिः । अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठ तद्भेदे शिबिका त्वया

śibikādārusaṁghāto racanāsthitisaṁsthitiḥ anviṣyatāṁ nṛpaśreṣṭha tadbhede śibikā tvayā

हे राजश्रेष्ठ, पालकी और लकड़ी के संयोग की रचना और स्थिति का अन्वेषण करो, तथा उसके भेद में पालकी को खोजो।

श्लोक 92 (vishnu.2.13.92)

एवं छत्रशलाकानां पृथग्भावो विमृश्यताम् । क्व यातं छत्रम् इत्य् एष न्यायस् त्वयि तथा मयि

evaṁ chatraśalākānāṁ pṛthagbhāvo vimṛśyatām kva yātaṁ chatram ity eṣa nyāyas tvayi tathā mayi

इसी प्रकार छत्र और उसकी तीलियों की पृथकता पर भी विचार करो; 'छत्र कहाँ गया' — यही न्याय तुम पर भी और मुझ पर भी लागू होता है।

श्लोक 93 (vishnu.2.13.93)

पुमान् स्त्री गौर् अयं वाजी कुञ्जरो विहगस् तरुः । देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु

pumān strī gaur ayaṁ vājī kuñjaro vihagas taruḥ deheṣu lokasaṁjñeyaṁ vijñeyā karmahetuṣu

पुरुष, स्त्री, गाय, यह घोड़ा, हाथी, पक्षी, वृक्ष — ये शरीरों पर आधारित लोक-संज्ञाएँ हैं, जो कर्म के कारणों से ही जानी जानी चाहिए।

श्लोक 94 (vishnu.2.13.94)

पुमान् न देवो न नरो न पशुर् न च पादपः । शरीराकृतिभेदास् तु भूपैते कर्मयोनयः

pumān na devo na naro na paśur na ca pādapaḥ śarīrākṛtibhedās tu bhūpaite karmayonayaḥ

हे राजन्, पुरुष न देव है, न मनुष्य, न पशु, न वृक्ष; ये तो शरीर के आकार के भेद ही हैं, जो कर्म से उत्पन्न हैं।

श्लोक 95 (vishnu.2.13.95)

वस्तु राजेति यल् लोके यच् च राजभटात्मकम् । तथान्यच् च नृपेत्थं तन् न सत्संकल्पनामयम्

vastu rājeti yal loke yac ca rājabhaṭātmakam tathānyac ca nṛpetthaṁ tan na satsaṁkalpanāmayam

संसार में जो 'राजा' नामक वस्तु है, तथा जो राजा के सैनिकों से बनी है, और उसी प्रकार जो अन्य भी है, हे राजन्, वह सब वास्तविक नहीं, केवल कल्पना-मात्र है।

श्लोक 96 (vishnu.2.13.96)

यत् तु कालान्तरेणापि नान्यसंज्ञाम् उपैति वै । परिणामादिसंभूतं तद् वस्तु नृप तच् च किम्

yat tu kālāntareṇāpi nānyasaṁjñām upaiti vai pariṇāmādisaṁbhūtaṁ tad vastu nṛpa tac ca kim

परन्तु जो काल बीतने पर भी, परिणाम आदि से उत्पन्न होते हुए भी, कभी अन्य संज्ञा को प्राप्त नहीं होता — हे राजन्, वह वास्तविक वस्तु क्या है?

श्लोक 97 (vishnu.2.13.97)

त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः । पत्न्याः पतिः पिता सूनोः कं त्वां भूप वदाम्य् अहम्

tvaṁ rājā sarvalokasya pituḥ putro ripo ripuḥ patnyāḥ patiḥ pitā sūnoḥ kaṁ tvāṁ bhūpa vadāmy aham

तुम समस्त प्रजा के लिए राजा हो, पिता के लिए पुत्र, शत्रु के लिए शत्रु, पत्नी के लिए पति, पुत्र के लिए पिता — तुम्हें मैं क्या कहूँ, हे राजन्?

श्लोक 98 (vishnu.2.13.98)

त्वं किम् एतच् छिरः किं नु शिरस् तव तथोदरम् । किम् उ पादादिकं त्वं वै तवैतत् किं महीपते

tvaṁ kim etac chiraḥ kiṁ nu śiras tava tathodaram kim u pādādikaṁ tvaṁ vai tavaitat kiṁ mahīpate

क्या तुम यह सिर हो, या सिर तुम्हारा है? तथा वैसे ही यह पेट? क्या तुम पैर आदि हो, या ये तुम्हारे हैं, हे पृथ्वीपते?

श्लोक 99 (vishnu.2.13.99)

समस्तावयवेभ्यस् त्वं पृथग् भूप व्यवस्थितः । कोऽहम् इत्य् एव निपुणो भूत्वा चिन्तय पार्थिव

samastāvayavebhyas tvaṁ pṛthag bhūpa vyavasthitaḥ ko'ham ity eva nipuṇo bhūtvā cintaya pārthiva

हे राजन्, तुम समस्त अंगों से पृथक् स्थित हो; 'मैं कौन हूँ' — इसी पर कुशल होकर विचार करो, हे नरेश।

श्लोक 100 (vishnu.2.13.100)

एवं व्यवस्थिते तत्त्वे मयाहम् इति भाषितुम् । पृथक्करणनिष्पाद्यं शक्यते नृपते कथम्

evaṁ vyavasthite tattve mayāham iti bhāṣitum pṛthakkaraṇaniṣpādyaṁ śakyate nṛpate katham

जब तत्त्व इस प्रकार स्थिर हो जाता है, तब 'मैं' और 'मेरा' कहना, जो पृथक्करण से ही सिद्ध होता है, हे राजन्, भला कैसे संभव हो सकता है?

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