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द्वितीयांश · अध्याय 14

राजा का प्रश्न और परमार्थ-स्वरूप

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (vishnu.2.14.1)

पराशर उवाच । निशम्य तस्येति वचः परमार्थसमन्वितम् । प्रश्रयावनतो भूत्वा तम् आह नृपतिर् द्विजम्

parāśara uvāca niśamya tasyeti vacaḥ paramārthasamanvitam praśrayāvanato bhūtvā tam āha nṛpatir dvijam

पराशर ने कहा — परमार्थ से युक्त उसके इस वचन को सुनकर वह राजा विनम्रतापूर्वक झुककर उस ब्राह्मण से बोला।

श्लोक 2 (vishnu.2.14.2)

राजोवाच । भगवन् यत् त्वया प्रोक्तं परमार्थमयं वचः । श्रुते तस्मिन् भ्रमन्तीव मनसो मम वृत्तयः

rājovāca bhagavan yat tvayā proktaṁ paramārthamayaṁ vacaḥ śrute tasmin bhramantīva manaso mama vṛttayaḥ

राजा ने कहा — हे भगवन्! आपके द्वारा कहे गए इस परमार्थमय वचन को सुनकर मेरे मन की वृत्तियाँ मानो भ्रमित हो रही हैं।

श्लोक 3 (vishnu.2.14.3)

एतद् विवेकविज्ञानं यद् अशेषेषु जन्तुषु । भवता दर्शितं विप्र तत् परं प्रकृतेर् महत्

etad vivekavijñānaṁ yad aśeṣeṣu jantuṣu bhavatā darśitaṁ vipra tat paraṁ prakṛter mahat

हे विप्र, समस्त प्राणियों में जो यह विवेक-ज्ञान आपने दिखाया, वह प्रकृति से भी महान् और परे है।

श्लोक 4 (vishnu.2.14.4)

नाहं वहामि शिबिकां शिबिका न मयि स्थिता । शरीरम् अन्यद् अस्मत्तो येनेयं शिबिका धृता

nāhaṁ vahāmi śibikāṁ śibikā na mayi sthitā śarīram anyad asmatto yeneyaṁ śibikā dhṛtā

'मैं पालकी नहीं उठाता, न पालकी मुझ पर टिकी है; यह पालकी तो हमसे भिन्न किसी अन्य शरीर द्वारा धारण की गई है' —

श्लोक 5 (vishnu.2.14.5)

गुणप्रवृत्त्या भूतानां प्रवृत्तिः कर्मचोदिता । प्रवर्तन्ते गुणाश् चैते किं ममेति त्वयोदितम्

guṇapravṛttyā bhūtānāṁ pravṛttiḥ karmacoditā pravartante guṇāś caite kiṁ mameti tvayoditam

'गुणों की प्रवृत्ति से ही प्राणियों की, कर्म से प्रेरित प्रवृत्ति होती है; ये गुण ही प्रवृत्त होते हैं, इसमें मेरा क्या है?' — ऐसा आपने कहा।

श्लोक 6 (vishnu.2.14.6)

एतस्मिन् परमार्थज्ञ मम श्रोत्रपथं गते । मनो विह्वलताम् एति परमार्थार्थितां गतम्

etasmin paramārthajña mama śrotrapathaṁ gate mano vihvalatām eti paramārthārthitāṁ gatam

हे परमार्थ के ज्ञाता, यह सब जब से मेरे कानों में पड़ा है, मेरा मन व्याकुल होकर उस परमार्थ के अर्थ की खोज में लग गया है।

श्लोक 7 (vishnu.2.14.7)

पूर्वम् एव महाभागं कपिलर्षिम् अहं द्विज । प्रष्टुम् अभ्युद्यतो गत्वा श्रेयः किं न्व् इत्य् असंशयम्

pūrvam eva mahābhāgaṁ kapilarṣim ahaṁ dvija praṣṭum abhyudyato gatvā śreyaḥ kiṁ nv ity asaṁśayam

हे द्विज, इससे पहले ही मैं महाभाग कपिल ऋषि से यही पूछने के लिए चल पड़ा था कि निःसंदेह श्रेय क्या है।

श्लोक 8 (vishnu.2.14.8)

तदन्तरे च भवता यद् इदं वाक्यम् ईरितम् । तेनैव परमार्थार्थं त्वयि चेतः प्रधावति

tadantare ca bhavatā yad idaṁ vākyam īritam tenaiva paramārthārthaṁ tvayi cetaḥ pradhāvati

और इसी बीच आपके द्वारा कहे गए इन वचनों से ही मेरा चित्त परमार्थ के अर्थ के लिए आपकी ओर दौड़ पड़ा है।

श्लोक 9 (vishnu.2.14.9)

कपिलर्षिर् भगवतः सर्वभूतस्य वै किल । विष्णोर् अंशो जगन्मोहनाशायोर्वीम् उपागतः

kapilarṣir bhagavataḥ sarvabhūtasya vai kila viṣṇor aṁśo jaganmohanāśāyorvīm upāgataḥ

यह कपिल ऋषि निश्चय ही सर्वभूतस्वरूप भगवान् विष्णु के अंश हैं, जो जगत् के मोह के नाश के लिए इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।

श्लोक 10 (vishnu.2.14.10)

स एव भगवान् नूनम् अस्माकं हितकाम्यया । प्रत्यक्षताम् अत्र गतो यथैतद् भवतोच्यते

sa eva bhagavān nūnam asmākaṁ hitakāmyayā pratyakṣatām atra gato yathaitad bhavatocyate

निश्चय ही वे भगवान् ही हमारे कल्याण की इच्छा से यहाँ प्रत्यक्ष रूप में आए हैं, जैसा आप स्वयं कह रहे हैं।

श्लोक 11 (vishnu.2.14.11)

तन् मह्यं प्रणताय त्वं यच् छ्रेयः परमं द्विज । तद् वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर् भवान्

tan mahyaṁ praṇatāya tvaṁ yac chreyaḥ paramaṁ dvija tad vadākhilavijñānajalavīcyudadhir bhavān

हे द्विज, आपके चरणों में प्रणत मुझे वह परम श्रेय बताइए; आप तो समस्त ज्ञानरूपी जल की लहरों के सागर हैं।

श्लोक 12 (vishnu.2.14.12)

ब्राह्मण उवाच । भूप पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थं नु पृच्छसि । श्रेयांस्य् अपरमार्थानि अशेषाण्य् एव भूपते

brāhmaṇa uvāca bhūpa pṛcchasi kiṁ śreyaḥ paramārthaṁ nu pṛcchasi śreyāṁsy aparamārthāni aśeṣāṇy eva bhūpate

ब्राह्मण ने कहा — हे राजन्, आप 'श्रेय' पूछते हैं या परमार्थ पूछते हैं? हे राजन्, अपरमार्थ रूप श्रेय तो असंख्य हैं।

श्लोक 13 (vishnu.2.14.13)

देवताराधनं कृत्वा धनसंपदम् इच्छति । पुत्रान् इच्छति राज्यं च श्रेयस् तत्प्राप्तिलक्षणम्

devatārādhanaṁ kṛtvā dhanasaṁpadam icchati putrān icchati rājyaṁ ca śreyas tatprāptilakṣaṇam

देवताओं की आराधना करके मनुष्य धन-सम्पत्ति की इच्छा करता है, पुत्रों और राज्य की इच्छा करता है — श्रेय इन्हीं की प्राप्ति के लक्षण वाला है।

श्लोक 14 (vishnu.2.14.14)

कर्म यज्ञात्मकं श्रेयः स्वर्लोकफलदायि यत् । श्रेयः प्रधानं च फले तद् एवानभिसंहिते

karma yajñātmakaṁ śreyaḥ svarlokaphaladāyi yat śreyaḥ pradhānaṁ ca phale tad evānabhisaṁhite

यज्ञमय कर्म भी श्रेय है, जो स्वर्गलोक का फल देता है; किन्तु यह श्रेय भी उसी सीमित फल तक ही प्रधान है।

श्लोक 15 (vishnu.2.14.15)

आत्मा ध्येयः सदा भूप योगयुक्तैस् तथा परम् । श्रेयस् तस्यैव संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः

ātmā dhyeyaḥ sadā bhūpa yogayuktais tathā param śreyas tasyaiva saṁyogaḥ śreyo yaḥ paramātmanaḥ

हे राजन्, योगयुक्त पुरुषों के लिए आत्मा का ही सदा ध्यान करना चाहिए, वही परम है; परमात्मा से संयोग ही सच्चा श्रेय है।

श्लोक 16 (vishnu.2.14.16)

श्रेयांस्य् एवम् अनेकानि शतशोऽथ सहस्रशः । सन्त्य् अत्र परमार्थास् तु न त्व् एते श्रूयतां च मे

śreyāṁsy evam anekāni śataśo'tha sahasraśaḥ santy atra paramārthās tu na tv ete śrūyatāṁ ca me

इस प्रकार सैकड़ों-हजारों श्रेय यहाँ विद्यमान हैं, किन्तु ये परमार्थ नहीं हैं; अब मुझसे [असली परमार्थ] सुनो।

श्लोक 17 (vishnu.2.14.17)

धर्माय त्यज्यते किं तु परमार्थो धनं यदि । व्ययश् च क्रियते कस्मात् कामप्राप्त्युपलक्षणः

dharmāya tyajyate kiṁ tu paramārtho dhanaṁ yadi vyayaś ca kriyate kasmāt kāmaprāptyupalakṣaṇaḥ

यदि धन का त्याग धर्म के लिए परमार्थ मानकर किया जाता है, तो फिर व्यय किसी अन्य [इच्छा] की प्राप्ति के चिह्नस्वरूप ही क्यों किया जाता है?

श्लोक 18 (vishnu.2.14.18)

पुत्रश् चेत् परमार्थाख्यः सोऽप्य् अन्यस्य नरेश्वर । परमार्थभूतः सोऽन्यस्य परमार्थो हि तत्पिता

putraś cet paramārthākhyaḥ so'py anyasya nareśvara paramārthabhūtaḥ so'nyasya paramārtho hi tatpitā

हे नरेश्वर, यदि पुत्र को परमार्थ कहा जाए, तो वह भी किसी अन्य के लिए परमार्थ है, और उसका पिता भी उसके लिए परमार्थ है।

श्लोक 19 (vishnu.2.14.19)

एवं न परमार्थोऽस्ति जगत्य् अस्मिंश् चराचरे । परमार्थो हि कार्याणि कारणानाम् अशेषतः

evaṁ na paramārtho'sti jagaty asmiṁś carācare paramārtho hi kāryāṇi kāraṇānām aśeṣataḥ

इस प्रकार इस चराचर जगत् में कोई [अन्तिम] परमार्थ नहीं है; क्योंकि यहाँ परमार्थ भी सदा किसी अन्य कारण का ही कार्य होता है।

श्लोक 20 (vishnu.2.14.20)

राज्यादिप्राप्तिर् अत्रोक्ता परमार्थतया यदि । परमार्था भवन्त्य् अत्र न भवन्ति च वै ततः

rājyādiprāptir atroktā paramārthatayā yadi paramārthā bhavanty atra na bhavanti ca vai tataḥ

यदि राज्य आदि की प्राप्ति यहाँ परमार्थ रूप में कही जाती है, तो ये वस्तुएँ एक सन्दर्भ में परमार्थ हैं, और दूसरे में नहीं भी हैं।

श्लोक 21 (vishnu.2.14.21)

ऋग्यजुःसामनिष्पाद्यं यज्ञकर्म मतं तव । परमार्थभूतं तत्रापि श्रूयतां गदतो मम

ṛgyajuḥsāmaniṣpādyaṁ yajñakarma mataṁ tava paramārthabhūtaṁ tatrāpi śrūyatāṁ gadato mama

आप ऋक्-यजुः-साम से सिद्ध होने वाले यज्ञ-कर्म को परमार्थ मानते हैं; उसमें भी, जो मैं कहता हूँ वह सुनिए।

श्लोक 22 (vishnu.2.14.22)

यत् तु निष्पाद्यते कार्यं मृदा कारणभूतया । तत् कारणानुगमनाज् ज्ञायते नृप मृण्मयम्

yat tu niṣpādyate kāryaṁ mṛdā kāraṇabhūtayā tat kāraṇānugamanāj jñāyate nṛpa mṛṇmayam

हे राजन्, जो कार्य कारणभूत मिट्टी से सिद्ध होता है, वह कारण का अनुसरण करने पर मिट्टी-मात्र ही जाना जाता है।

श्लोक 23 (vishnu.2.14.23)

एवं विनाशिभिर् द्रव्यैः समिदाज्यकुशादिभिः । निष्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनाशिनी

evaṁ vināśibhir dravyaiḥ samidājyakuśādibhiḥ niṣpādyate kriyā yā tu sā bhavitrī vināśinī

इसी प्रकार समिधा, घृत, कुश आदि नाशवान् द्रव्यों से जो क्रिया सिद्ध होती है, वह भी नाशवान् ही होगी।

श्लोक 24 (vishnu.2.14.24)

अनाशी परमार्थश् च प्राज्ञैर् अभ्युपगम्यते । तत् तु नाशि न संदेहो नाशिद्रव्योपपादितम्

anāśī paramārthaś ca prājñair abhyupagamyate tat tu nāśi na saṁdeho nāśidravyopapāditam

विद्वानों द्वारा अविनाशी को ही परमार्थ माना गया है; किन्तु वह [यज्ञ-कर्म] नाशवान् द्रव्यों से उत्पन्न होने के कारण निःसंदेह नाशवान् ही है।

श्लोक 25 (vishnu.2.14.25)

तद् एवाफलदं कर्म परमार्थो मतस् तव । मुक्तिसाधनभूतत्वात् परमार्थो न साधनम्

tad evāphaladaṁ karma paramārtho matas tava muktisādhanabhūtatvāt paramārtho na sādhanam

वह फल-रहित कर्म भी आप मुक्ति के साधन-रूप होने से परमार्थ मानते हैं; किन्तु साधन कभी परमार्थ नहीं होता।

श्लोक 26 (vishnu.2.14.26)

ध्यानं चैवात्मनो भूप परमार्थार्थशब्दितम् । भेदकारि परेभ्यस् तत् परमार्थो न भेदवान्

dhyānaṁ caivātmano bhūpa paramārthārthaśabditam bhedakāri parebhyas tat paramārtho na bhedavān

हे राजन्, आत्मा का ध्यान भी परमार्थ का साधन कहलाता है; वह अन्यों से भेद उत्पन्न करता है — किन्तु परमार्थ स्वयं भेद-रहित है।

श्लोक 27 (vishnu.2.14.27)

परमात्मात्मनोर् योगः परमार्थ इतीष्यते । मिथ्यैतद् अन्यद्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः

paramātmātmanor yogaḥ paramārtha itīṣyate mithyaitad anyadravyaṁ hi naiti taddravyatāṁ yataḥ

परमात्मा और आत्मा का संयोग ही परमार्थ माना जाता है; यह [भेद] मिथ्या ही है, क्योंकि एक द्रव्य कभी दूसरे द्रव्य-रूप नहीं होता।

श्लोक 28 (vishnu.2.14.28)

तस्माच् छ्रेयांस्य् अशेषाणि नृपैतानि न संशयः । परमार्थस् तु भूपाल संक्षेपाच् छ्रूयतां मम

tasmāc chreyāṁsy aśeṣāṇi nṛpaitāni na saṁśayaḥ paramārthas tu bhūpāla saṁkṣepāc chrūyatāṁ mama

इसलिए, हे राजन्, ये सब [सापेक्ष] श्रेय ही हैं, इसमें संदेह नहीं; किन्तु हे राजन्, परमार्थ को संक्षेप में मुझसे सुनो।

श्लोक 29 (vishnu.2.14.29)

एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतेः परः । जन्मवृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतोऽव्ययः

eko vyāpī samaḥ śuddho nirguṇaḥ prakṛteḥ paraḥ janmavṛddhyādirahita ātmā sarvagato'vyayaḥ

एक, व्यापक, समान, शुद्ध, निर्गुण, प्रकृति से परे, जन्म-वृद्धि आदि से रहित — आत्मा सर्वव्यापी और अविनाशी है।

श्लोक 30 (vishnu.2.14.30)

परज्ञानमयोऽसद्भिर् नामजात्यादिभिर् विभुः । न योगवान् न युक्तोऽभून् नैव पार्थिव योक्ष्यति

parajñānamayo'sadbhir nāmajātyādibhir vibhuḥ na yogavān na yukto'bhūn naiva pārthiva yokṣyati

वह परम ज्ञानमय, व्यापक है, नाम-जाति आदि असत् उपाधियों से युक्त प्रतीत होता है; हे राजन्, वह न कभी युक्त हुआ, न युक्त है, न युक्त होगा।

श्लोक 31 (vishnu.2.14.31)

तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्य् एकमयं हि यत् । विज्ञानं परमार्थोऽसौ द्वैतिनोऽतत्त्वदर्शिनः

tasyātmaparadeheṣu sato'py ekamayaṁ hi yat vijñānaṁ paramārtho'sau dvaitino'tattvadarśinaḥ

अपने और अन्य शरीरों में विद्यमान होते हुए भी जो एकमय है, वही चेतना ही परमार्थ है; द्वैतवादी सच्चे तत्त्व को नहीं देखते।

श्लोक 32 (vishnu.2.14.32)

वेणुरन्ध्रविभेदेन भेदः षड्जादिसंज्ञितः । अभेदव्यापिनो वायोस् तथा तस्य महात्मनः

veṇurandhravibhedena bhedaḥ ṣaḍjādisaṁjñitaḥ abhedavyāpino vāyos tathā tasya mahātmanaḥ

जैसे बाँसुरी के छिद्रों के भेद से षड्ज आदि स्वरों का भेद उत्पन्न होता है, वैसे ही उस महात्मा-रूपी अभेद व्यापक वायु में भी [स्वर-भेद उत्पन्न होता है, स्वयं अभेद रहती है]।

श्लोक 33 (vishnu.2.14.33)

एकत्वं रूपभेदश् च बाह्यकर्मप्रवृत्तिजः । देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्य् एवावरणो हि सः

ekatvaṁ rūpabhedaś ca bāhyakarmapravṛttijaḥ devādibhede'padhvaste nāsty evāvaraṇo hi saḥ

एकत्व तथा रूप-भेद बाह्य कर्मों की प्रवृत्ति से उत्पन्न होते हैं; देव आदि के भेद के नष्ट हो जाने पर कोई आवरण ही शेष नहीं रह जाता।

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