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द्वितीयांश · अध्याय 6

नरक और विष्णु-स्मरण की महिमा

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (vishnu.2.6.1)

पराशर उवाच । ततश् च नरकान् विप्र भुवोऽधः सलिलस्य च । पापिनो येषु पात्यन्ते ताञ् छृणुष्व महामुने

parāśara uvāca tataś ca narakān vipra bhuvo'dhaḥ salilasya ca pāpino yeṣu pātyante tāñ chṛṇuṣva mahāmune

पराशर ने कहा — अब, हे विप्र, पृथ्वी और जल के नीचे स्थित उन नरकों को सुनो, जिनमें पापी लोग गिराए जाते हैं, हे महामुने।

श्लोक 2 (vishnu.2.6.2)

रौरवः सूकरो रोधस् तालो विशसनस् तथा । महाज्वालस् तप्तकुम्भो लवणोऽथ विलोहितः

rauravaḥ sūkaro rodhas tālo viśasanas tathā mahājvālas taptakumbho lavaṇo'tha vilohitaḥ

रौरव, सूकर, रोध, ताल, तथा विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, और विलोहित,

श्लोक 3 (vishnu.2.6.3)

रुधिराम्भो वैतरणी कृमिशः कृमिभोजनः । असिपत्रवनं कृष्णो लालाभक्षश् च दारुणः

rudhirāmbho vaitaraṇī kṛmiśaḥ kṛmibhojanaḥ asipatravanaṁ kṛṣṇo lālābhakṣaś ca dāruṇaḥ

रुधिराम्भ, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, और भयानक लालाभक्ष,

श्लोक 4 (vishnu.2.6.4)

तथा पूयवहः पापो वह्निज्वालो ह्य् अधःशिराः । संदंशः कृष्णसूत्रश् च तमश् चावीचिर् एव च

tathā pūyavahaḥ pāpo vahnijvālo hy adhaḥśirāḥ saṁdaṁśaḥ kṛṣṇasūtraś ca tamaś cāvīcir eva ca

तथा पूयवह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कृष्णसूत्र, तम तथा अवीचि स्वयं,

श्लोक 5 (vishnu.2.6.5)

श्वभोजनोऽथाप्रतिष्ठो अवीचिश् च तथापरः । इत्य् एवमादयश् चान्ये नरका भृशदारुणाः

śvabhojano'thāpratiṣṭho avīciś ca tathāparaḥ ity evamādayaś cānye narakā bhṛśadāruṇāḥ

श्वभोजन, तथा अप्रतिष्ठ, और एक और अवीचि — इस प्रकार ये तथा और भी अत्यन्त भयानक नरक हैं,

श्लोक 6 (vishnu.2.6.6)

यमस्य विषये घोराः शस्त्राग्निभयदायिनः । पतन्ति येषु पुरुषाः पापकर्मरतास् तु ये

yamasya viṣaye ghorāḥ śastrāgnibhayadāyinaḥ patanti yeṣu puruṣāḥ pāpakarmaratās tu ye

यम के लोक में भयंकर, शस्त्र और अग्नि का भय देने वाले, जिनमें पापकर्म में रत पुरुष गिरते हैं।

श्लोक 7 (vishnu.2.6.7)

कूटसाक्षी तथासम्यक् पक्षपातेन यो वदेत् । यश् चान्यद् अनृतं वक्ति स नरो याति रौरवम्

kūṭasākṣī tathāsamyak pakṣapātena yo vadet yaś cānyad anṛtaṁ vakti sa naro yāti rauravam

जो झूठा साक्षी बनता है, जो पक्षपात से अन्याय बोलता है, तथा जो अन्य कोई असत्य बोलता है, वह पुरुष रौरव को जाता है।

श्लोक 8 (vishnu.2.6.8)

भ्रूणहा गुरुहन्ता च गोघ्नश् च मुनिसत्तम । यान्ति ते नरकं रोधं यश् चोच्छ्वासनिरोधकः

bhrūṇahā guruhantā ca goghnaś ca munisattama yānti te narakaṁ rodhaṁ yaś cocchvāsanirodhakaḥ

गर्भहत्यारा, गुरुहत्यारा तथा गौहत्यारा, हे मुनिश्रेष्ठ, वे रोध नरक को जाते हैं, तथा वह भी जो किसी के श्वास को अवरुद्ध करता है।

श्लोक 9 (vishnu.2.6.9)

सुरापो ब्रह्महा हर्ता सुवर्णस्य च सूकरे । प्रयाति नरके यश् च तैः संसर्गम् उपैति वै

surāpo brahmahā hartā suvarṇasya ca sūkare prayāti narake yaś ca taiḥ saṁsargam upaiti vai

मद्यपायी, ब्रह्महत्यारा, स्वर्ण-चोर, तथा जो इनका संग करता है, वह सूकर नरक को जाता है।

श्लोक 10 (vishnu.2.6.10)

राजन्यवैश्यहा ताले तथैव गुरुतल्पगः । तप्तकुम्भे स्वसागामी हन्ति राजभटांश् च यः

rājanyavaiśyahā tāle tathaiva gurutalpagaḥ taptakumbhe svasāgāmī hanti rājabhaṭāṁś ca yaḥ

क्षत्रिय या वैश्य का वधक ताल में, गुरु-पत्नीगामी, अपनी बहन के पास जाने वाला, तथा राजसैनिकों का वधक तप्तकुम्भ में जाता है।

श्लोक 11 (vishnu.2.6.11)

साध्वीविक्रयकृद् बन्धपालः केसरिविक्रयी । तप्तलोहे पतन्त्य् एते यश् च भक्तं परित्यजेत्

sādhvīvikrayakṛd bandhapālaḥ kesarivikrayī taptalohe patanty ete yaś ca bhaktaṁ parityajet

सती स्त्री को बेचने वाला, बन्दीगृह-रक्षक, सिंह बेचने वाला, तथा जो अपने आश्रित को त्याग देता है — ये सब तप्तलोह में गिरते हैं।

श्लोक 12 (vishnu.2.6.12)

स्नुषां सुतां चापि गत्वा महाज्वाले निपात्यते । अवमन्ता गुरूणां यो यश् चाक्रोष्टा नराधमः

snuṣāṁ sutāṁ cāpi gatvā mahājvāle nipātyate avamantā gurūṇāṁ yo yaś cākroṣṭā narādhamaḥ

जो अपनी पुत्रवधू या पुत्री के पास जाता है, वह महाज्वाल में गिराया जाता है; तथा जो गुरुजनों का अपमान या तिरस्कार करने वाला नराधम है।

श्लोक 13 (vishnu.2.6.13)

वेददूषयिता यश् च वेदविक्रयकश् च यः । अगम्यगामी यश् च स्यात् ते यान्ति लवणं द्विज

vedadūṣayitā yaś ca vedavikrayakaś ca yaḥ agamyagāmī yaś ca syāt te yānti lavaṇaṁ dvija

जो वेदों को दूषित करता है, जो वेदों को बेचता है, तथा जो अगम्यागमन करता है — वे लवण नरक को जाते हैं, हे द्विज।

श्लोक 14 (vishnu.2.6.14)

चौरो विमोहे पतति मर्यादादूषकस् तथा

cauro vimohe patati maryādādūṣakas tathā

चोर विमोह में गिरता है, तथा वह भी जो मर्यादाओं को दूषित करता है।

श्लोक 15 (vishnu.2.6.15)

देवद्विजपितृद्वेष्टा रत्नदूषयिता च यः । स याति कृमिभक्षे वै कृमिशे च दुरिष्टकृत्

devadvijapitṛdveṣṭā ratnadūṣayitā ca yaḥ sa yāti kṛmibhakṣe vai kṛmiśe ca duriṣṭakṛt

जो देवों, ब्राह्मणों और पितरों से द्वेष करता है, तथा जो रत्नों को दूषित करता है, वह कृमिभक्ष को जाता है; और जो दुष्ट यज्ञ करने वाला है वह कृमिश को।

श्लोक 16 (vishnu.2.6.16)

पितृदेवातिथीन् यस् तु पर्यश्नाति नराधमः । लालाभक्षे स यात्य् उग्रे शरकर्ता च वेधके

pitṛdevātithīn yas tu paryaśnāti narādhamaḥ lālābhakṣe sa yāty ugre śarakartā ca vedhake

जो नराधम पितरों, देवों या अतिथियों के भोजन को स्वयं खा लेता है, वह भयानक लालाभक्ष को जाता है; तथा बाण बनाने वाला और उन्हें छेदने वाला भी।

श्लोक 17 (vishnu.2.6.17)

करोति कर्णिनो यश् च यश् च खड्गादिकृन् नरः । प्रयान्त्य् एते विशसने नरके भृशदारुणे

karoti karṇino yaś ca yaś ca khaḍgādikṛn naraḥ prayānty ete viśasane narake bhṛśadāruṇe

तथा जो पुरुष तलवार आदि शस्त्र बनाता है — ये सब अत्यन्त भयानक विशसन नरक को जाते हैं।

श्लोक 18 (vishnu.2.6.18)

असत्प्रतिग्रहीता तु नरके यात्य् अधोमुखे । अयाज्ययाजकस् तत्र तथा नक्षत्रसूचकः

asatpratigrahītā tu narake yāty adhomukhe ayājyayājakas tatra tathā nakṣatrasūcakaḥ

अनुचित दान लेने वाला अधोमुख नरक को जाता है; वहीं अयोग्य के लिए यज्ञ करने वाला तथा नक्षत्रों से अपशकुन बताने वाला भी जाता है।

श्लोक 19 (vishnu.2.6.19)

वेगी पूयवहं चैको याति मिष्टान्नभुङ् नरः

vegī pūyavahaṁ caiko yāti miṣṭānnabhuṅ naraḥ

उतावला पुरुष तथा जो मिष्ट अन्न अकेला खाता है, वह पूयवह को जाता है।

श्लोक 20 (vishnu.2.6.20)

लाक्षामांसरसानां च तिलानां लवणस्य च । विक्रेता ब्राह्मणो याति तम् एव नरकं द्विज

lākṣāmāṁsarasānāṁ ca tilānāṁ lavaṇasya ca vikretā brāhmaṇo yāti tam eva narakaṁ dvija

लाख, मांस-रस, तिल तथा नमक बेचने वाला ब्राह्मण उसी नरक को जाता है, हे द्विज।

श्लोक 21 (vishnu.2.6.21)

मार्जारकुक्कुटच्छागश्ववराहविहंगमान् । पोषयन् नरकं याति तम् एव द्विजसत्तम

mārjārakukkuṭacchāgaśvavarāhavihaṁgamān poṣayan narakaṁ yāti tam eva dvijasattama

बिल्ली, मुर्गा, बकरी, कुत्ता, सूअर तथा पक्षियों को पालने वाला भी उसी नरक को जाता है, हे द्विजश्रेष्ठ।

श्लोक 22 (vishnu.2.6.22)

रङ्गोपजीवी कैवर्तः कुण्डाशी गरदस् तथा । सूची माहिषिकश् चैव पर्वगामी च यो द्विजः

raṅgopajīvī kaivartaḥ kuṇḍāśī garadas tathā sūcī māhiṣikaś caiva parvagāmī ca yo dvijaḥ

रंगमंच से जीविका चलाने वाला, मछुआरा, सामूहिक पात्र से खाने वाला, विषदाता, दर्जी, भैंस पालने वाला, तथा पर्व के दिनों में यात्रा करने वाला ब्राह्मण,

श्लोक 23 (vishnu.2.6.23)

अगारदाही मित्रघ्नः शाकुनिर् ग्रामयाजकः । रुधिरान्धे पतन्त्य् एते सोमं विक्रीणते च ये

agāradāhī mitraghnaḥ śākunir grāmayājakaḥ rudhirāndhe patanty ete somaṁ vikrīṇate ca ye

घर जलाने वाला, मित्रघाती, बहेलिया, तथा सारे गाँव के लिए यज्ञ करने वाला — ये सब रुधिरान्ध में गिरते हैं, तथा जो सोम बेचते हैं वे भी।

श्लोक 24 (vishnu.2.6.24)

मधुहा ग्रामहन्ता च याति वैतरणीं नरः

madhuhā grāmahantā ca yāti vaitaraṇīṁ naraḥ

मधु-चोर तथा गाँव को नष्ट करने वाला पुरुष वैतरणी को जाता है।

श्लोक 25 (vishnu.2.6.25)

धनयौवनमत्तास् तु मर्यादाभेदिनो हि ये । ते कृष्णे यान्त्य् अशौचाश् च कुहकाजीविनश् च ये

dhanayauvanamattās tu maryādābhedino hi ye te kṛṣṇe yānty aśaucāś ca kuhakājīvinaś ca ye

धन और यौवन के मद में जो मर्यादाओं को तोड़ते हैं, वे कृष्ण नरक को जाते हैं, तथा जो अशुद्ध हैं और जो छल-कपट से जीविका चलाते हैं वे भी।

श्लोक 26 (vishnu.2.6.26)

असिपत्रवनं याति वनच्छेदी वृथैव यः । औरभ्रिको मृगव्याधो वह्निज्वाले पतन्ति वै

asipatravanaṁ yāti vanacchedī vṛthaiva yaḥ aurabhriko mṛgavyādho vahnijvāle patanti vai

जो व्यर्थ ही वन काटता है वह असिपत्रवन को जाता है; भेड़-बकरी पालने वाला (वधार्थ) और मृगों का शिकारी वह्निज्वाल में गिरते हैं।

श्लोक 27 (vishnu.2.6.27)

यान्त्य् एते द्विज तत्रैव यश् चापाकेषु वह्निदः

yānty ete dvija tatraiva yaś cāpākeṣu vahnidaḥ

वे भी वहीं जाते हैं, हे द्विज, तथा जो कच्ची फसलों में आग लगाता है वह भी।

श्लोक 28 (vishnu.2.6.28)

व्रतेषु लोपको यश् च स्वाश्रमाद् विच्युतश् च यः । संदंशयातनामध्ये पततस् ताव् उभाव् अपि

vrateṣu lopako yaś ca svāśramād vicyutaś ca yaḥ saṁdaṁśayātanāmadhye patatas tāv ubhāv api

जो अपने व्रतों का त्याग करता है और जो अपने आश्रम से च्युत हो जाता है — ये दोनों संदंश की यातना में गिरते हैं।

श्लोक 29 (vishnu.2.6.29)

दिवा स्वप्नेषु स्कन्दन्ते ये नरा ब्रह्मचारिणः । पुत्रैर् अध्यापिता ये च ते पतन्ति श्वभोजने

divā svapneṣu skandante ye narā brahmacāriṇaḥ putrair adhyāpitā ye ca te patanti śvabhojane

जो ब्रह्मचारी दिन में स्वप्नदोष से गिरते हैं, तथा जो अपने ही पुत्रों से अध्ययन कराए जाते हैं, वे श्वभोजन में गिरते हैं।

श्लोक 30 (vishnu.2.6.30)

एते चान्ये च नरकाः शतशोऽथ सहस्रशः । येषु दुष्कृतकर्माणः पच्यन्ते यातनागताः

ete cānye ca narakāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ yeṣu duṣkṛtakarmāṇaḥ pacyante yātanāgatāḥ

ये तथा और भी सैकड़ों-हजारों नरक हैं, जिनमें दुष्कर्मी लोग यातना भोगते हुए पकाए जाते हैं।

श्लोक 31 (vishnu.2.6.31)

तथैव पापान्य् एतानि तथान्यानि सहस्रशः । भुज्यन्ते यानि पुरुषैर् नरकान्तरगोचरैः

tathaiva pāpāny etāni tathānyāni sahasraśaḥ bhujyante yāni puruṣair narakāntaragocaraiḥ

इसी प्रकार ये पाप, तथा हजारों अन्य पाप भी, नरकों के भीतर विचरने वाले पुरुषों द्वारा भोगे जाते हैं।

श्लोक 32 (vishnu.2.6.32)

वर्णाश्रमविरुद्धं च कर्म कुर्वन्ति ये नराः । कर्मणा मनसा वाचा निरयेषु पतन्ति ते

varṇāśramaviruddhaṁ ca karma kurvanti ye narāḥ karmaṇā manasā vācā nirayeṣu patanti te

जो मनुष्य वर्ण और आश्रम के विरुद्ध कर्म करते हैं, कर्म से, मन से अथवा वाणी से — वे नरकों में गिरते हैं।

श्लोक 33 (vishnu.2.6.33)

अधःशिरोभिर् दृश्यन्ते नारकैर् दिवि देवताः । देवाश् चाधोमुखान् सर्वान् अधः पश्यन्ति नारकान्

adhaḥśirobhir dṛśyante nārakair divi devatāḥ devāś cādhomukhān sarvān adhaḥ paśyanti nārakān

नरकवासी आकाश में देवताओं को सिर के बल नीचे लटकते हुए देखते हैं, और देवता भी सभी नरकवासियों को नीचे मुख किए हुए देखते हैं।

श्लोक 34 (vishnu.2.6.34)

स्थावराः कृमयोऽब्जाश् च पक्षिणः पशवो नराः । धार्मिकास् त्रिदशास् तद्वन् मोक्षिणश् च यथाक्रमम्

sthāvarāḥ kṛmayo'bjāś ca pakṣiṇaḥ paśavo narāḥ dhārmikās tridaśās tadvan mokṣiṇaś ca yathākramam

स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धर्मात्मा, देवगण, तथा मुक्त जीव — इसी क्रम से,

श्लोक 35 (vishnu.2.6.35)

सहस्रभागप्रथमा द्वितीयानुक्रमास् तथा । सर्वे ह्य् एते महाभाग यावन् मुक्तिसमाश्रयाः

sahasrabhāgaprathamā dvitīyānukramās tathā sarve hy ete mahābhāga yāvan muktisamāśrayāḥ

हे महाभाग, इनमें से प्रत्येक पूर्ववर्ती वर्ग अगले की तुलना में सहस्रगुणा है, यहाँ तक कि मोक्ष का आश्रय लेने वालों तक।

श्लोक 36 (vishnu.2.6.36)

यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः । पापकृद् याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः

yāvanto jantavaḥ svarge tāvanto narakaukasaḥ pāpakṛd yāti narakaṁ prāyaścittaparāṅmukhaḥ

स्वर्ग में जितने प्राणी हैं उतने ही नरक में भी हैं; प्रायश्चित्त से मुख मोड़ने वाला पापी नरक को जाता है।

श्लोक 37 (vishnu.2.6.37)

पापानाम् अनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद् यथा । तथा तथैव संस्मृत्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः

pāpānām anurūpāṇi prāyaścittāni yad yathā tathā tathaiva saṁsmṛtya proktāni paramarṣibhiḥ

पापों के अनुरूप जो-जो प्रायश्चित्त हैं, उन्हें उसी प्रकार समझकर परम ऋषियों ने बताया है।

श्लोक 38 (vishnu.2.6.38)

पापे गुरूणि गुरुणि स्वल्पान्य् अल्पे च तद्विदः । प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायंभुवादयः

pāpe gurūṇi guruṇi svalpāny alpe ca tadvidaḥ prāyaścittāni maitreya jaguḥ svāyaṁbhuvādayaḥ

गुरु पाप के लिए गुरु, अल्प के लिए अल्प — इसे जानने वाले स्वायम्भुव मनु आदि ने, हे मैत्रेय, प्रायश्चित्त बताए हैं।

श्लोक 39 (vishnu.2.6.39)

प्रायश्चित्तान्य् अशेषाणि तपःकर्मात्मकानि वै । यानि तेषाम् अशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्

prāyaścittāny aśeṣāṇi tapaḥkarmātmakāni vai yāni teṣām aśeṣāṇāṁ kṛṣṇānusmaraṇaṁ param

तप और कर्मरूप वे सम्पूर्ण प्रायश्चित्त भी हैं, किन्तु उन सबमें कृष्ण का स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 40 (vishnu.2.6.40)

कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम्

kṛte pāpe'nutāpo vai yasya puṁsaḥ prajāyate prāyaścittaṁ tu tasyaikaṁ harisaṁsmaraṇaṁ param

पाप करने के बाद जिस पुरुष में पश्चाताप उत्पन्न होता है, उसके लिए हरि का स्मरण ही एकमात्र सर्वोत्तम प्रायश्चित्त है।

श्लोक 41 (vishnu.2.6.41)

प्रातर् निशि तथा संध्यामध्याह्नादिषु संस्मरन् । नारायणम् अवाप्नोति सद्यः पापक्षयं नरः

prātar niśi tathā saṁdhyāmadhyāhnādiṣu saṁsmaran nārāyaṇam avāpnoti sadyaḥ pāpakṣayaṁ naraḥ

प्रातःकाल, रात्रि, तथा सन्ध्या और मध्याह्न में नारायण का स्मरण करने वाला मनुष्य तत्काल पाप का क्षय पाता है।

श्लोक 42 (vishnu.2.6.42)

विष्णुसंस्मरणात् क्षीणसमस्तक्लेशसंचयः । मुक्तिं प्रयाति स्वर्गाप्तिस् तस्य विघ्नोऽनुमीयते

viṣṇusaṁsmaraṇāt kṣīṇasamastakleśasaṁcayaḥ muktiṁ prayāti svargāptis tasya vighno'numīyate

विष्णु के स्मरण से समस्त संचित क्लेश क्षीण हो जाते हैं; उसे मुक्ति प्राप्त होती है — स्वर्ग-प्राप्ति तो उसके लिए मानो एक बाधा ही मानी जाती है।

श्लोक 43 (vishnu.2.6.43)

वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु । तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रत्वादिकं फलम्

vāsudeve mano yasya japahomārcanādiṣu tasyāntarāyo maitreya devendratvādikaṁ phalam

जिसका मन जप, हवन, अर्चना आदि में वासुदेव पर लगा रहता है, हे मैत्रेय, उसके लिए इन्द्रपद जैसा फल भी एक बाधा ही है।

श्लोक 44 (vishnu.2.6.44)

क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् । क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजम् अनुत्तमम्

kva nākapṛṣṭhagamanaṁ punarāvṛttilakṣaṇam kva japo vāsudeveti muktibījam anuttamam

पुनरागमन के लक्षण वाली स्वर्ग-प्राप्ति कहाँ, और मुक्ति के अनुपम बीज 'वासुदेव' के जप कहाँ!

श्लोक 45 (vishnu.2.6.45)

तस्माद् अहर्निशं विष्णुं संस्मरन् पुरुषो मुने । न याति नरकं शुद्धः संक्षीणाखिलपातकः

tasmād aharniśaṁ viṣṇuṁ saṁsmaran puruṣo mune na yāti narakaṁ śuddhaḥ saṁkṣīṇākhilapātakaḥ

इसलिए, हे मुने, जो पुरुष रात-दिन विष्णु का स्मरण करता है, वह शुद्ध होकर, समस्त पापों का क्षय करके नरक को नहीं जाता।

श्लोक 46 (vishnu.2.6.46)

मनःप्रीतिकरः स्वर्गो नरकस् तद्विपर्ययः । नरकस्वर्गसंज्ञे वै पापपुण्ये द्विजोत्तम

manaḥprītikaraḥ svargo narakas tadviparyayaḥ narakasvargasaṁjñe vai pāpapuṇye dvijottama

जो मन को प्रसन्न करे वही स्वर्ग है, उसका विपरीत नरक है; हे द्विजोत्तम, 'नरक' और 'स्वर्ग' तो पाप और पुण्य के ही नाम हैं।

श्लोक 47 (vishnu.2.6.47)

वस्त्व् एकम् एव दुःखाय सुखायेर्ष्योद्भवाय च । कोपाय च यतस् तस्माद् वस्तु वस्त्वात्मकं कुतः

vastv ekam eva duḥkhāya sukhāyerṣyodbhavāya ca kopāya ca yatas tasmād vastu vastvātmakaṁ kutaḥ

एक ही वस्तु दुःख का कारण बनती है, सुख का, ईर्ष्या की उत्पत्ति का, तथा क्रोध का भी — तो फिर किसी वस्तु का अपना स्वतन्त्र स्वरूप कैसे हो सकता है?

श्लोक 48 (vishnu.2.6.48)

तद् एव प्रीतये भूत्वा पुनर् दुःखाय जायते । तद् एव कोपाय यतः प्रसादाय च जायते

tad eva prītaye bhūtvā punar duḥkhāya jāyate tad eva kopāya yataḥ prasādāya ca jāyate

वही वस्तु प्रसन्नता देकर पुनः दुःख के लिए बन जाती है; वही क्रोध का कारण होकर पुनः प्रसन्नता का कारण बन जाती है।

श्लोक 49 (vishnu.2.6.49)

तस्माद् दुःखात्मकं नास्ति न च किंचित् सुखात्मकम् । मनसः परिणामोऽयं सुखदुःखादिलक्षणः

tasmād duḥkhātmakaṁ nāsti na ca kiṁcit sukhātmakam manasaḥ pariṇāmo'yaṁ sukhaduḥkhādilakṣaṇaḥ

इसलिए न तो कुछ स्वभाव से दुःखरूप है, न कुछ स्वभाव से सुखरूप; सुख-दुःख आदि तो मन का ही परिणाम है।

श्लोक 50 (vishnu.2.6.50)

ज्ञानम् एव परं ब्रह्म ज्ञानं बन्धाय चेष्यते । ज्ञानात्मकम् इदं विश्वं न ज्ञानाद् विद्यते परम्

jñānam eva paraṁ brahma jñānaṁ bandhāya ceṣyate jñānātmakam idaṁ viśvaṁ na jñānād vidyate param

ज्ञान ही परब्रह्म है, फिर भी ज्ञान को ही बन्धन का कारण भी माना गया है; यह सम्पूर्ण विश्व ज्ञानस्वरूप है; ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं है।

श्लोक 51 (vishnu.2.6.51)

विद्याविद्येति मैत्रेय ज्ञानम् एवोपधारय

vidyāvidyeti maitreya jñānam evopadhāraya

हे मैत्रेय, विद्या और अविद्या — इन दोनों को ज्ञान ही समझो।

श्लोक 52 (vishnu.2.6.52)

एवम् एतन् मयाख्यातं भवतो मण्डलं भुवः । पातालानि च सर्वाणि तथैव नरका द्विज

evam etan mayākhyātaṁ bhavato maṇḍalaṁ bhuvaḥ pātālāni ca sarvāṇi tathaiva narakā dvija

इस प्रकार, हे द्विज, मैंने तुम्हें पृथ्वी का यह सम्पूर्ण मण्डल, समस्त पाताल, तथा उसी प्रकार सब नरक बताए।

श्लोक 53 (vishnu.2.6.53)

समुद्राः पर्वताश् चैव द्वीपा वर्षाणि निम्नगाः । संक्षेपात् सर्वम् आख्यातं किं भूयः श्रोतुम् इच्छसि

samudrāḥ parvatāś caiva dvīpā varṣāṇi nimnagāḥ saṁkṣepāt sarvam ākhyātaṁ kiṁ bhūyaḥ śrotum icchasi

समुद्र, पर्वत, द्वीप, वर्ष तथा नदियाँ — यह सब संक्षेप में बताया गया; अब और क्या सुनना चाहते हो?

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