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तृतीयांश · अध्याय 7

यम-उपदेश -- विष्णुभक्त यम की पहुँच से परे

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (vishnu.3.7.1)

यथावत्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया द्विज । श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वेकं तद्भवान् प्रब्रवीतु मे

yathāvatkathitaṁ sarvaṁ yatpṛṣṭo'si mayā dvija śrotumicchāmyahaṁ tvekaṁ tadbhavān prabravītu me

[मैत्रेय ने कहा --] हे द्विज, आपने जो कुछ मैंने पूछा, वह सब यथावत् कह दिया। अब मैं एक और बात सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझे बताइए।

श्लोक 2 (vishnu.3.7.2)

सप्तद्वीपानि पातालवीथ्यश्च सुमहामुने । सप्त लोकाश्च येऽन्तःस्था ब्रह्माण्डस्यास्य सर्वतः

saptadvīpāni pātālavīthyaśca sumahāmune sapta lokāśca ye'ntaḥsthā brahmāṇḍasyāsya sarvataḥ

हे महामुने, सप्त द्वीप, पाताल की गलियाँ, तथा इस ब्रह्माण्ड के भीतर चारों ओर जो सप्त लोक हैं --

श्लोक 3 (vishnu.3.7.3)

स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथासूक्ष्मैः सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरैस्तथा । स्थूलैः स्थूलतरैश्चैतत्सर्वं प्राणिभिरावृतम्

sthūlaiḥ sūkṣmaistathāsūkṣmaiḥ sūkṣmātsūkṣmataraistathā sthūlaiḥ sthūlataraiścaitatsarvaṁ prāṇibhirāvṛtam

ये सब स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, तथा स्थूल से भी स्थूलतर प्राणियों से भरे हुए हैं।

श्लोक 4 (vishnu.3.7.4)

अङ्गुलस्याष्टभागोऽपि न सोऽस्ति मुनिसत्तम । न सन्ति प्राणिनो यत्र कर्मबन्धनिबन्धनाः

aṅgulasyāṣṭabhāgo'pi na so'sti munisattama na santi prāṇino yatra karmabandhanibandhanāḥ

हे मुनिसत्तम, अंगुल का आठवाँ भाग भी ऐसा नहीं जहाँ कर्म-बन्धन में बँधे प्राणी न हों।

श्लोक 5 (vishnu.3.7.5)

सर्वे चैते वशं यान्ति यमस्य भगवन् किल । आयुषोऽन्ते ततो यान्ति यातनास्तत्प्रचोदिताः

sarve caite vaśaṁ yānti yamasya bhagavan kila āyuṣo'nte tato yānti yātanāstatpracoditāḥ

हे भगवन्, ये सभी यम के वश में जाते हैं; आयु के अन्त में उन्हीं से प्रेरित होकर वे यातनाओं को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 6 (vishnu.3.7.6)

यातनाभ्यः परिभ्रष्टा देवाद्यास्वथ योनिषु । जन्तवः परिवर्तन्ते शास्त्राणामेष निर्णयः

yātanābhyaḥ paribhraṣṭā devādyāsvatha yoniṣu jantavaḥ parivartante śāstrāṇāmeṣa nirṇayaḥ

यातनाओं से मुक्त होकर प्राणी फिर देव आदि योनियों में परिवर्तित होते हैं -- यही शास्त्रों का निर्णय है।

श्लोक 7 (vishnu.3.7.7)

सोऽहमिच्छामि तच्छ्रोतुं यमस्य वशवर्तिनः । न भवन्ति नरा येन तत्कर्म कथयाऽमलम्

so'hamicchāmi tacchrotuṁ yamasya vaśavartinaḥ na bhavanti narā yena tatkarma kathayā'malam

मैं यह सुनना चाहता हूँ कि किस कर्म से मनुष्य यम के वशवर्ती नहीं होते -- वह पवित्र कर्म मुझे बताइए।

श्लोक 8 (vishnu.3.7.8)

पराशर उवाच । अयमेव मुने प्रश्नो नकुलेन महात्मना । पृष्टः पितामहः प्राह भीष्मो यत्तच्छृणुष्व मे

parāśara uvāca ayameva mune praśno nakulena mahātmanā pṛṣṭaḥ pitāmahaḥ prāha bhīṣmo yattacchṛṇuṣva me

पराशर बोले -- हे मुने, यही प्रश्न महात्मा नकुल ने पितामह भीष्म से पूछा था; उन्होंने जो कहा, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 9 (vishnu.3.7.9)

भीष्म उवाच । पुरा ममागतो वत्स सखा कालिङ्गको द्विजः । मामुवाच स पृष्टो वै मया जातिस्मरो मुनिः

bhīṣma uvāca purā mamāgato vatsa sakhā kāliṅgako dvijaḥ māmuvāca sa pṛṣṭo vai mayā jātismaro muniḥ

भीष्म बोले -- हे वत्स, पूर्वकाल में मेरे पास एक मित्र आया करते थे, कलिंग देश के एक द्विज; उनसे पूछने पर उन जातिस्मर मुनि ने मुझसे यह कहा था।

श्लोक 10 (vishnu.3.7.10)

तेनाख्यातमिदं चेदमित्थं चैतद्भविष्यति । तथा च तदभूद्वत्स यथोक्तं तेन धीमता

tenākhyātamidaṁ cedamitthaṁ caitadbhaviṣyati tathā ca tadabhūdvatsa yathoktaṁ tena dhīmatā

उन्होंने यह और वह बताया कि इस प्रकार यह घटित होगा; और हे वत्स, वह वैसा ही हुआ, जैसा उन बुद्धिमान् ने कहा था।

श्लोक 11 (vishnu.3.7.11)

स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्दधानेन वै द्विजः । यद्यदाह न तद्दृष्टमन्यथा हि मया क्वचित्

sa pṛṣṭaśca mayā bhūyaḥ śraddadhānena vai dvijaḥ yadyadāha na taddṛṣṭamanyathā hi mayā kvacit

मैंने श्रद्धापूर्वक उन द्विज से बार-बार पूछा; उन्होंने जो कुछ भी कहा, वह कभी मुझे अन्यथा नहीं दिखा।

श्लोक 12 (vishnu.3.7.12)

एकदा तु मया पृष्टं यदेतद्भवतोदितम् । प्राह कालिङ्गको विप्रः स्मृत्वा तस्य मुनेर्वचः

ekadā tu mayā pṛṣṭaṁ yadetadbhavatoditam prāha kāliṅgako vipraḥ smṛtvā tasya munervacaḥ

एक बार मैंने यही प्रश्न पूछा था, जो आपने अभी पूछा है; तब कलिंग के उस विप्र ने उस मुनि के वचन स्मरण करके यह कहा।

श्लोक 13 (vishnu.3.7.13)

जातिस्मरेण कथितं रहस्यं परमं मम । यमकिंकरयोर्योऽभूत्संवादस्तं ब्रवीमि ते

jātismareṇa kathitaṁ rahasyaṁ paramaṁ mama yamakiṁkarayoryo'bhūtsaṁvādastaṁ bravīmi te

उस जातिस्मर ने मुझे जो परम रहस्य बताया था, वह यम और उनके किंकर के बीच हुआ संवाद था, जो मैं तुम्हें कहता हूँ।

श्लोक 14 (vishnu.3.7.14)

कालिङ्ग उवाच । स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं वदति यमः किल तस्य कर्णमूले । परिहर मधुसूदनप्रपन्नान् प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम्

kāliṅga uvāca svapuruṣamabhivīkṣya pāśahastaṁ vadati yamaḥ kila tasya karṇamūle parihara madhusūdanaprapannān prabhurahamanyanṛṇāṁ na vaiṣṇavānām

कलिंग के विप्र बोले -- अपने सेवक को हाथ में पाश लिए देखकर यम उसके कान में यह कहते हैं -- 'मधुसूदन की शरण में गए लोगों को छोड़ देना; मैं अन्य ऋणियों (प्राणियों) का ही स्वामी हूँ, वैष्णवों का नहीं।'

श्लोक 15 (vishnu.3.7.15)

अहममरगणार्चितेन धात्रा यम इति लोकहितहिते नियुक्तः । हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः

ahamamaragaṇārcitena dhātrā yama iti lokahitahite niyuktaḥ hariguruvaśago'smi na svatantraḥ prabhavati saṁyamane mamāpi viṣṇuḥ

'देवगणों द्वारा पूजित विधाता ने मुझे लोक के हित-अहित के निमित्त यम के पद पर नियुक्त किया है; किन्तु मैं तो हरि-गुरु के अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं -- मेरे इस दण्ड-कार्य पर भी विष्णु का ही अधिकार चलता है।'

श्लोक 16 (vishnu.3.7.16)

कटकमुकुटकर्णिकादिभेदैः कनकमभेदमपीष्यते यथैकम् । सुरपशुमनुजादिकल्पनाभिर्हरिरखिलाभिरुदीर्यते तथैकः

kaṭakamukuṭakarṇikādibhedaiḥ kanakamabhedamapīṣyate yathaikam surapaśumanujādikalpanābhirharirakhilābhirudīryate tathaikaḥ

'जिस प्रकार कंगन, मुकुट, कर्णफूल आदि रूप-भेदों से भी सोना अभिन्न ही माना जाता है, उसी प्रकार देव, पशु, मनुष्य आदि की समस्त कल्पनाओं से भी हरि एक ही होकर वर्णित होते हैं।'

श्लोक 17 (vishnu.3.7.17)

क्षितिजलपरमाणवोऽनिलान्ते पुनरपि यान्ति यथैकतां धरित्र्याः । सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते गुणकलुषेण सनातनेन तेन

kṣitijalaparamāṇavo'nilānte punarapi yānti yathaikatāṁ dharitryāḥ surapaśumanujādayastathānte guṇakaluṣeṇa sanātanena tena

'जिस प्रकार पृथ्वी और जल के परमाणु वायु के माध्यम से अन्त में पुनः पृथ्वी की एकता को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार देव, पशु, मनुष्य आदि भी अन्त में उसी सनातन गुण-कलुषित तत्त्व में लीन हो जाते हैं।'

श्लोक 18 (vishnu.3.7.18)

हरिममरगणार्चिताङ्घ्रिपद्मं प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः । तमपगतसमस्तपापबन्धं व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम्

harimamaragaṇārcitāṅghripadmaṁ praṇamati yaḥ paramārthato hi martyaḥ tamapagatasamastapāpabandhaṁ vraja parihṛtya yathāgnimājyasiktam

'जो मनुष्य देवगणों द्वारा पूजित हरि के चरण-कमलों को परमार्थ भाव से प्रणाम करता है, उसे -- जिसके समस्त पाप-बन्धन नष्ट हो चुके हैं -- घी से सिंचित अग्नि के समान समझकर छोड़ देना (उसके पास मत जाना)।'

श्लोक 19 (vishnu.3.7.19)

इति यमवचनं निशम्य पाशी यमपुरुषस्तमुवाच धर्मराजम् । कथय मम विभो समस्तधातुर्भवति हरेः खलु यादृशोऽस्य भक्तः

iti yamavacanaṁ niśamya pāśī yamapuruṣastamuvāca dharmarājam kathaya mama vibho samastadhāturbhavati hareḥ khalu yādṛśo'sya bhaktaḥ

यम के इस वचन को सुनकर पाशधारी यमदूत ने धर्मराज से कहा -- 'हे प्रभो, सर्वधाता, मुझे बताइए कि हरि का भक्त कैसा होता है।'

श्लोक 20 (vishnu.3.7.20)

यम उवाच । न चलति निजवर्णधर्मतो यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे । न हरति न च हन्ति किंचिदुच्चैः सितमनसं तमवैहि विष्णुभक्तम्

yama uvāca na calati nijavarṇadharmato yaḥ samamatirātmasuhṛdvipakṣapakṣe na harati na ca hanti kiṁciduccaiḥ sitamanasaṁ tamavaihi viṣṇubhaktam

यम बोले -- जो अपने वर्ण-धर्म से विचलित नहीं होता, जो मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान बुद्धि रखता है, जो कुछ भी नहीं हरता और न ही किसी को मारता है, निर्मल मन वाला -- उसे विष्णुभक्त जानो।

श्लोक 21 (vishnu.3.7.21)

कलिकलुषमलेन यस्य नात्मा विमलमतेर्मलिनीकृतोऽस्तमोहे । मनसि कृतजनार्दनं मनुष्यं सततमवैहि हरेरतीव भक्तम्

kalikaluṣamalena yasya nātmā vimalamatermalinīkṛto'stamohe manasi kṛtajanārdanaṁ manuṣyaṁ satatamavaihi hareratīva bhaktam

कलियुग की मलिनता से जिसकी निर्मल बुद्धि कभी मलिन नहीं होती, जिसका मोह नष्ट हो चुका है, जिसने मन में सदा जनार्दन को धारण किया है -- उस मनुष्य को हरि का अत्यन्त भक्त जानो।

श्लोक 22 (vishnu.3.7.22)

कनकमपि रहस्यवेक्ष्य बुद्ध्या तृणमिव यः समवैति वै परस्वम् । भवति च भगवत्यनन्यचेताः पुरुषवरं तमवैहि विष्णुभक्तम्

kanakamapi rahasyavekṣya buddhyā tṛṇamiva yaḥ samavaiti vai parasvam bhavati ca bhagavatyananyacetāḥ puruṣavaraṁ tamavaihi viṣṇubhaktam

जो एकान्त में भी सोने को देखकर, बुद्धि से उसे तिनके के समान ही पराया धन समझता है, और जो भगवान् में अनन्य-चित्त होता है -- उस श्रेष्ठ पुरुष को विष्णुभक्त जानो।

श्लोक 23 (vishnu.3.7.23)

स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णुर्मनसि नृणां क्व च मत्सरादिदोषः । न हि तुहिनमयूखरश्मिपुञ्जे भवति हुताशनदीप्तिजः प्रतापः

sphaṭikagiriśilāmalaḥ kva viṣṇurmanasi nṛṇāṁ kva ca matsarādidoṣaḥ na hi tuhinamayūkharaśmipuñje bhavati hutāśanadīptijaḥ pratāpaḥ

जहाँ मनुष्यों के मन में स्फटिक-पर्वत की शिला के समान निर्मल विष्णु विराजते हैं, वहाँ ईर्ष्या आदि दोष कहाँ? क्योंकि शीतल चन्द्रमा की किरणों के समूह में अग्नि की दीप्ति से उत्पन्न ताप कभी नहीं होता।

श्लोक 24 (vishnu.3.7.24)

विमलमतिरमत्सरः प्रशान्तः शुचिचरितोऽखिलसत्त्वमित्रभूतः । प्रियहितवचनोऽस्तमानमायो वसति सदा हृदि तस्य वासुदेवः

vimalamatiramatsaraḥ praśāntaḥ śucicarito'khilasattvamitrabhūtaḥ priyahitavacano'stamānamāyo vasati sadā hṛdi tasya vāsudevaḥ

निर्मल बुद्धि, ईर्ष्यारहित, शान्त, पवित्र आचरण वाला, समस्त प्राणियों का मित्र, प्रिय और हितकर वचन बोलने वाला, अभिमान-माया से रहित -- ऐसे मनुष्य के हृदय में वासुदेव सदा निवास करते हैं।

श्लोक 25 (vishnu.3.7.25)

वसति हृदि सनातने च तस्मिन् भवति पुमाञ्जगतोऽस्य सौम्यरूपः । क्षितिरसमतिरम्यमात्मनोऽन्तः कथयति चारुतयैव शालपोतः

vasati hṛdi sanātane ca tasmin bhavati pumāñjagato'sya saumyarūpaḥ kṣitirasamatiramyamātmano'ntaḥ kathayati cārutayaiva śālapotaḥ

जब वह सनातन प्रभु हृदय में निवास करते हैं, तब मनुष्य इस जगत् के लिए सौम्य-रूप हो जाता है; जैसे पृथ्वी का अत्यन्त रमणीय रस अपने भीतर के शालवृक्ष की सुन्दरता से ही प्रकट होता है।

श्लोक 26 (vishnu.3.7.26)

यमनियमविधूतकल्मषाणामनुदिनमच्युतसक्तमानसानाम् । अपगतमदमानमत्सराणां व्रज भट दूरतरेण मानवानाम्

yamaniyamavidhūtakalmaṣāṇāmanudinamacyutasaktamānasānām apagatamadamānamatsarāṇāṁ vraja bhaṭa dūratareṇa mānavānām

हे यमदूत, जिनके पाप यम-नियम के पालन से नष्ट हो चुके हैं, जिनका मन प्रतिदिन अच्युत में लगा रहता है, जिनका मद, अभिमान और मत्सर दूर हो चुका है -- ऐसे मनुष्यों से बहुत दूर रहना।

श्लोक 27 (vishnu.3.7.27)

हृदि यदि भगवाननादिरास्ते हरिरसिशङ्खगदाधरोऽव्ययात्मा । तदघमघविघातकर्तृभिन्नं भवति कथं सति चान्धकारमर्के

hṛdi yadi bhagavānanādirāste harirasiśaṅkhagadādharo'vyayātmā tadaghamaghavighātakartṛbhinnaṁ bhavati kathaṁ sati cāndhakāramarke

यदि हृदय में अनादि, अविनाशी, खड्ग-शंख-गदाधारी भगवान् हरि निवास करते हों, तो वहाँ पाप का नाशक पाप कैसे रह सकता है, जैसे सूर्य के रहते अन्धकार कैसे रह सकता है?

श्लोक 28 (vishnu.3.7.28)

हरति परधनं निहन्ति जन्तून् वदति तथानृतनिष्ठुराणि यश्च । अशुभजनितदुर्मदस्य पुंसः कलुषमतेर्हृदि तस्य नास्त्यनन्तः

harati paradhanaṁ nihanti jantūn vadati tathānṛtaniṣṭhurāṇi yaśca aśubhajanitadurmadasya puṁsaḥ kaluṣamaterhṛdi tasya nāstyanantaḥ

जो पराया धन हरता है, प्राणियों की हत्या करता है, तथा असत्य और कठोर वचन बोलता है -- ऐसे दुर्मद, कलुषित बुद्धि वाले पुरुष के हृदय में अनन्त (विष्णु) का निवास नहीं होता।

श्लोक 29 (vishnu.3.7.29)

न सहति परसम्पदं विनिन्दां कलुषमतिः कुरुते सतामसाधुः । न यजति न ददाति यश्च सन्तं मनसि न तस्य जनार्दनोऽधमस्य

na sahati parasampadaṁ vinindāṁ kaluṣamatiḥ kurute satāmasādhuḥ na yajati na dadāti yaśca santaṁ manasi na tasya janārdano'dhamasya

जो दूसरे की सम्पदा सहन नहीं कर पाता, जो कलुषित बुद्धि से सज्जनों की निन्दा करता है, जो असाधु है; जो न यज्ञ करता है, न सन्तों को दान देता है -- ऐसे नीच मनुष्य के मन में जनार्दन का निवास नहीं होता।

श्लोक 30 (vishnu.3.7.30)

परमसुहृदि बान्धवे कलत्रे सुततनयापितृमातृभृत्यवर्गे । शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य भक्तम्

paramasuhṛdi bāndhave kalatre sutatanayāpitṛmātṛbhṛtyavarge śaṭhamatirupayāti yo'rthatṛṣṇāṁ tamadhamaceṣṭamavaihi nāsya bhaktam

जिस कुटिल-बुद्धि व्यक्ति का मन अपने परम मित्र, बन्धु, पत्नी, पुत्र, माता-पिता तथा सेवकों तक के प्रति भी धन-लोभ से भर जाता है -- उस नीच-चेष्टा वाले को उनका (विष्णु का) भक्त मत जानो।

श्लोक 31 (vishnu.3.7.31)

अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्तः सततमनार्यविशालसङ्गमत्तः । अनुदिनकृतपापबन्धयत्नः पुरुषपशुर्न हि वासुदेवभक्तः

aśubhamatirasatpravṛttisaktaḥ satatamanāryaviśālasaṅgamattaḥ anudinakṛtapāpabandhayatnaḥ puruṣapaśurna hi vāsudevabhaktaḥ

अशुभ बुद्धि वाला, असत् प्रवृत्तियों में आसक्त, सदा नीच जनों के विस्तृत संग में मत्त रहने वाला, प्रतिदिन पाप-बन्धन में प्रयत्नशील -- ऐसा मनुष्य-पशु वासुदेव का भक्त नहीं होता।

श्लोक 32 (vishnu.3.7.32)

सकलमिदमहं च वासुदेवः परमपुमान् परमेश्वरः स एकः । इति मतिरमला भवत्यनन्ते हृदयगते व्रज तान् विहाय दूरात्

sakalamidamahaṁ ca vāsudevaḥ paramapumān parameśvaraḥ sa ekaḥ iti matiramalā bhavatyanante hṛdayagate vraja tān vihāya dūrāt

'यह सम्पूर्ण जगत् और मैं भी वासुदेव ही हूँ, वे ही एकमात्र परम पुरुष, परमेश्वर हैं' -- हृदयस्थ अनन्त के प्रति जब ऐसी निर्मल बुद्धि उत्पन्न हो जाए, तब उन्हें छोड़कर दूर चले जाना।

श्लोक 33 (vishnu.3.7.33)

कमलनयन वासुदेव विष्णो धरणिधराच्युत शङ्खचक्रपाणे । भव शरणमितीरयन्ति ये वै त्यज भट दूरतरेण तानपापान्

kamalanayana vāsudeva viṣṇo dharaṇidharācyuta śaṅkhacakrapāṇe bhava śaraṇamitīrayanti ye vai tyaja bhaṭa dūratareṇa tānapāpān

'हे कमलनयन वासुदेव विष्णो, पृथ्वीधारक अच्युत, शंख-चक्रधारी, आप ही मेरी शरण हों' -- जो लोग ऐसा कहते हैं, हे यमदूत, उन निष्पाप जनों से बहुत दूर रहना।

श्लोक 34 (vishnu.3.7.34)

वसति मनसि यस्य सोऽव्ययात्मा पुरुषवरस्य न तस्य दृष्टिपाते । तव गतिरथवा ममास्ति चक्र प्रतिहतवीर्यबलस्य सोऽन्यलोक्यः

vasati manasi yasya so'vyayātmā puruṣavarasya na tasya dṛṣṭipāte tava gatirathavā mamāsti cakra pratihatavīryabalasya so'nyalokyaḥ

जिसके मन में वह अविनाशी, श्रेष्ठ पुरुष निवास करते हैं, उस पर न तुम्हारी दृष्टि चल सकती है और न मेरी; हे चक्र, उसका बल-पराक्रम अप्रतिहत है, वह अन्य लोक का ही निवासी है।

श्लोक 35 (vishnu.3.7.35)

कालिङ्ग उवाच । इति निजभटशासनाय देवो रवितनयः स किलाह धर्मराजः । मम कथितमिदं च तेन तुभ्यं कुरुवर सम्यगिदं मयापि चोक्तम्

kāliṅga uvāca iti nijabhaṭaśāsanāya devo ravitanayaḥ sa kilāha dharmarājaḥ mama kathitamidaṁ ca tena tubhyaṁ kuruvara samyagidaṁ mayāpi coktam

कलिंग के विप्र बोले -- इस प्रकार, अपने सेवक को शिक्षा देने के लिए, सूर्यपुत्र देव धर्मराज ने यह कहा था। यह मुझसे कहा गया था, हे कुरुश्रेष्ठ, और यही मैंने भी तुम्हें भलीभाँति बता दिया।

श्लोक 36 (vishnu.3.7.36)

भीष्म उवाच । नकुलैतन्ममाख्यातं पूर्वं तेन द्विजन्मना । कलिङ्गदेशादभ्येत्य प्रीयता सुमहात्मना

bhīṣma uvāca nakulaitanmamākhyātaṁ pūrvaṁ tena dvijanmanā kaliṅgadeśādabhyetya prīyatā sumahātmanā

भीष्म बोले -- हे नकुल, यह मुझे पूर्वकाल में कलिंग देश से आए उस महात्मा द्विज ने स्नेहवश बताया था।

श्लोक 37 (vishnu.3.7.37)

मयाप्येतद्यथान्यायं सम्यग्वत्स तवोदितम् । यथा विष्णुमृते नान्यत्त्राणं संसारसागरे

mayāpyetadyathānyāyaṁ samyagvatsa tavoditam yathā viṣṇumṛte nānyattrāṇaṁ saṁsārasāgare

हे वत्स, मैंने भी वही बात यथोचित रूप से तुम्हें भलीभाँति बता दी -- कि संसार-सागर में विष्णु के अतिरिक्त और कोई शरण नहीं है।

श्लोक 38 (vishnu.3.7.38)

किंकरा दण्डपाशौ वा न यमो न च यातना । समर्थास्तस्य यस्यात्मा केशवालम्बनः सदा

kiṁkarā daṇḍapāśau vā na yamo na ca yātanā samarthāstasya yasyātmā keśavālambanaḥ sadā

जिसकी आत्मा सदा केशव का ही आश्रय लिए रहती है, उसके लिए न किंकर, न दण्ड-पाश, न यम, और न ही कोई यातना समर्थ होती है।

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