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चतुर्थांश · अध्याय 18

अनु का वंश तथा अंग के राजा

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (vishnu.4.18.1)

श्रीपराशर उवाच । ययातेश्चातुर्थपुत्रस्यानोः सभानलचक्षुपरमेषुसंज्ञास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ।

śrīparāśara uvāca yayāteścāturthaputrasyānoḥ sabhānalacakṣuparameṣusaṁjñāstrayaḥ putrā babhūvuḥ

श्रीपराशर जी ने कहा — ययाति के चौथे पुत्र अनु के सभानल, चक्षु और परमेषु नामक तीन पुत्र हुए।

श्लोक 2 (vishnu.4.18.2)

सभानलपुत्रः कालानलः ।

sabhānalaputraḥ kālānalaḥ

सभानल का पुत्र कालानल हुआ।

श्लोक 3 (vishnu.4.18.3)

कालानलात्सृंजयः ।

kālānalātsṛṁjayaḥ

कालानल से सृंजय हुआ।

श्लोक 4 (vishnu.4.18.4)

सृंजयात्पुरंजयः ।

sṛṁjayātpuraṁjayaḥ

सृंजय से पुरंजय हुआ।

श्लोक 5 (vishnu.4.18.5)

पुरंजयाज्जनमेजयः ।

puraṁjayājjanamejayaḥ

पुरंजय से जनमेजय हुआ।

श्लोक 6 (vishnu.4.18.6)

तस्मान्महाशालः ।

tasmānmahāśālaḥ

उससे महाशाल हुआ।

श्लोक 7 (vishnu.4.18.7)

तस्माच्च महामनाः ।

tasmācca mahāmanāḥ

उससे भी महामना हुआ।

श्लोक 8 (vishnu.4.18.8)

तस्मादुशीनरतितीक्षू द्वौ पुत्रावुत्पन्नौ ।

tasmāduśīnaratitīkṣū dvau putrāvutpannau

उससे उशीनर और तितीक्षु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 9 (vishnu.4.18.9)

उशीनरस्यापि शिबिनृगनवकृमिवर्माख्याः पंच पुत्रा बभूवुः ।

uśīnarasyāpi śibinṛganavakṛmivarmākhyāḥ paṁca putrā babhūvuḥ

उशीनर के भी शिबि, नृग, नव, कृमि और वर्मा नामक पांच पुत्र हुए।

श्लोक 10 (vishnu.4.18.10)

पृषदर्भसुवीरकेकयमद्रकाश्चत्वारः शिबिपुत्राः ।

pṛṣadarbhasuvīrakekayamadrakāścatvāraḥ śibiputrāḥ

पृषदर्भ, सुवीर, केकय और मद्रक — ये चार शिबि के पुत्र थे।

श्लोक 11 (vishnu.4.18.11)

तितीक्षोरपि रुशद्रथः पुत्रोऽभूत् ।

titīkṣorapi ruśadrathaḥ putro'bhūt

तितीक्षु का भी रुशद्रथ नामक पुत्र हुआ।

श्लोक 12 (vishnu.4.18.12)

तस्यापि हेमः, हेमस्यापि सुतपाः, सुतपसश्च बलिः ।

tasyāpi hemaḥ, hemasyāpi sutapāḥ, sutapasaśca baliḥ

उसका भी हेम, हेम का भी सुतपा, और सुतपा का बलि हुआ।

श्लोक 13 (vishnu.4.18.13)

यस्य क्षेत्रे दीर्घतमसा अंगवंगकलिंगसुह्मपौंड्राख्यं वालेयं क्षत्रमजन्यत ।

yasya kṣetre dīrghatamasā aṁgavaṁgakaliṁgasuhmapauṁḍrākhyaṁ vāleyaṁ kṣatramajanyata

जिसके क्षेत्र में दीर्घतमा ऋषि द्वारा अंग, वंग, कलिंग, सुह्म और पौंड्र नामक वालेय क्षत्रिय-वंश उत्पन्न किया गया।

श्लोक 14 (vishnu.4.18.14)

तन्नामसंज्ञाश्च पंच विषयाः बभूवुः ।

tannāmasaṁjñāśca paṁca viṣayāḥ babhūvuḥ

उन्हीं के नामों से पांच देश (विषय) प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 15 (vishnu.4.18.15)

अंगादनपानस्ततो दिविरथः तस्माद्धर्मरथः ।

aṁgādanapānastato divirathaḥ tasmāddharmarathaḥ

अंग से अनपान, उससे दिविरथ, उससे धर्मरथ हुआ।

श्लोक 16 (vishnu.4.18.16)

ततश्चित्ररथः रोमपादसंज्ञः ।

tataścitrarathaḥ romapādasaṁjñaḥ

उससे चित्ररथ, जो रोमपाद नाम से भी जाना गया।

श्लोक 17 (vishnu.4.18.17)

यस्य दशरथो मित्रं जज्ञे ।

yasya daśaratho mitraṁ jajñe

जिसका मित्र दशरथ हुआ।

श्लोक 18 (vishnu.4.18.18)

यस्याजपुत्रो दशरथः शांतां नाम कन्यामनपत्यस्य दुहितृत्वे युयोज ।

yasyājaputro daśarathaḥ śāṁtāṁ nāma kanyāmanapatyasya duhitṛtve yuyoja

जिस निःसंतान रोमपाद को दशरथ के पुत्र होने के कारण अज-पुत्र दशरथ ने अपनी शांता नामक कन्या को गोद देने के लिए संयुक्त किया।

श्लोक 19 (vishnu.4.18.19)

रोमपादाच्चतुरंगः तस्मात्पृथुलाक्षः ।

romapādāccaturaṁgaḥ tasmātpṛthulākṣaḥ

रोमपाद से चतुरंग, उससे पृथुलाक्ष हुआ।

श्लोक 20 (vishnu.4.18.20)

ततश्चंपः यश्चंपां निवेशयामास ।

tataścaṁpaḥ yaścaṁpāṁ niveśayāmāsa

उससे चंप हुआ, जिसने चंपा नगरी बसाई।

श्लोक 21 (vishnu.4.18.21)

चंपस्य हर्यंगो नामात्मजोऽभूत् ।

caṁpasya haryaṁgo nāmātmajo'bhūt

चंप का हर्यंग नामक पुत्र हुआ।

श्लोक 22 (vishnu.4.18.22)

हर्यंगाद्भद्ररथः, भद्ररथाद्बृहद्रथः, बृहद्रथाद्बृहत्कर्मा, बृहत्कर्मणश्च बृहद्भानुः, तस्माच्च बृहन्मनाः, बृहन्मनसो जयद्रथः ।

haryaṁgādbhadrarathaḥ, bhadrarathādbṛhadrathaḥ, bṛhadrathādbṛhatkarmā, bṛhatkarmaṇaśca bṛhadbhānuḥ, tasmācca bṛhanmanāḥ, bṛhanmanaso jayadrathaḥ

हर्यंग से भद्ररथ, भद्ररथ से बृहद्रथ, बृहद्रथ से बृहत्कर्मा, बृहत्कर्मा से बृहद्भानु, उससे बृहन्मना, बृहन्मना से जयद्रथ हुआ।

श्लोक 23 (vishnu.4.18.23)

जयद्रथो ब्रह्मक्षत्रांतरालसंभूत्यां पत्न्यां विजयं नाम पुत्रमजीजनत् ।

jayadratho brahmakṣatrāṁtarālasaṁbhūtyāṁ patnyāṁ vijayaṁ nāma putramajījanat

जयद्रथ ने ब्रह्म और क्षत्र के मध्य से उत्पन्न पत्नी से विजय नामक पुत्र उत्पन्न किया।

श्लोक 24 (vishnu.4.18.24)

विजयश्च धृतिं पुत्रमवाप ।

vijayaśca dhṛtiṁ putramavāpa

विजय का पुत्र धृति हुआ।

श्लोक 25 (vishnu.4.18.25)

तस्यापि धृतव्रतः पुत्रोऽभूत् ।

tasyāpi dhṛtavrataḥ putro'bhūt

उसका भी धृतव्रत नामक पुत्र हुआ।

श्लोक 26 (vishnu.4.18.26)

धृतव्रतात्सत्यकर्मा ।

dhṛtavratātsatyakarmā

धृतव्रत से सत्यकर्मा हुआ।

श्लोक 27 (vishnu.4.18.27)

सत्यकर्मणस्त्वतिरथः ।

satyakarmaṇastvatirathaḥ

सत्यकर्मा का पुत्र अतिरथ हुआ,

श्लोक 28 (vishnu.4.18.28)

यो गंगांगतो मंजूषागतं पृथापविद्धं कर्णं पुत्रमवाप ।

yo gaṁgāṁgato maṁjūṣāgataṁ pṛthāpaviddhaṁ karṇaṁ putramavāpa

जिसने गंगा-तट पर, मंजूषा (पेटी) में रखे, पृथा द्वारा त्यागे गए कर्ण नामक पुत्र को प्राप्त किया।

श्लोक 29 (vishnu.4.18.29)

कर्णाद्वृषसेनः । इत्येतदंता अंगवंश्याः ।

karṇādvṛṣasenaḥ ityetadaṁtā aṁgavaṁśyāḥ

कर्ण से वृषसेन हुआ। यहीं तक अंगवंशी राजा हुए।

श्लोक 30 (vishnu.4.18.30)

अतश्च पुरुवंशं श्रोतुमर्हसि ।

ataśca puruvaṁśaṁ śrotumarhasi

अब इसके आगे पुरुवंश को सुनना योग्य है।

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