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पञ्चमांश · अध्याय 1

पृथ्वी की प्रार्थना और अवतार का वचन

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (vishnu.5.1.1)

मैत्रेय उवाच । नृपाणां कथितःसर्वो भवता वंशविस्तरः । वंशानुचरितं चैव यथावदनुवर्णितम्

maitreya uvāca nṛpāṇāṁ kathitaḥsarvo bhavatā vaṁśavistaraḥ vaṁśānucaritaṁ caiva yathāvadanuvarṇitam

मैत्रेय ने कहा — आपने राजाओं का समस्त विस्तृत वंश-वर्णन मुझे सुनाया और उस वंश के आचरण का भी यथावत् वर्णन किया।

श्लोक 2 (vishnu.5.1.2)

अंशावतारो ब्रह्मर्षे योऽयं यदुकुलोद्भवः । विष्णोस्तं विस्तरेणाहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

aṁśāvatāro brahmarṣe yo'yaṁ yadukulodbhavaḥ viṣṇostaṁ vistareṇāhaṁ śrotumicchāmi tattvataḥ

हे ब्रह्मर्षे! विष्णु का जो यह अंशावतार यदुकुल में उत्पन्न हुआ, उसे मैं विस्तारपूर्वक, यथार्थरूप में सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 3 (vishnu.5.1.3)

चकार यानि कर्माणि भगवान् पुरुषोत्तमः । अंशांशेनावतीर्योर्व्यां तत्र तानि मुने वद

cakāra yāni karmāṇi bhagavān puruṣottamaḥ aṁśāṁśenāvatīryorvyāṁ tatra tāni mune vada

भगवान् पुरुषोत्तम ने पृथ्वी पर अपने अंश के अंश-रूप में अवतीर्ण होकर जो कर्म किए, हे मुने! वे मुझे बताइए।

श्लोक 4 (vishnu.5.1.4)

श्रीपारशर उवाच । मैत्रेय श्रूयतामेतद्यत्पृष्टोऽहमिह त्वया । विष्णोरंशांशसंभूतिचरितं जगतो हितम्

śrīpāraśara uvāca maitreya śrūyatāmetadyatpṛṣṭo'hamiha tvayā viṣṇoraṁśāṁśasaṁbhūticaritaṁ jagato hitam

पराशर जी ने कहा — हे मैत्रेय! तुमने यहाँ मुझसे जो पूछा है, वह सुनो — विष्णु के उस अंशांश की उत्पत्ति का चरित्र, जो जगत् के हित के लिए हुआ।

श्लोक 5 (vishnu.5.1.5)

देवकस्य सुतां पूर्वं वसुदेवो महामुने । उपयेमे महाभागां देवकीं देवतोपमाम्

devakasya sutāṁ pūrvaṁ vasudevo mahāmune upayeme mahābhāgāṁ devakīṁ devatopamām

हे महामुने! पूर्वकाल में वसुदेव ने देवक की पुत्री, अत्यंत भाग्यशालिनी और देवी के समान देवकी से विवाह किया।

श्लोक 6 (vishnu.5.1.6)

कंसस्तयोर्वररथं चोदयामास सारथिः । वसुदेवस्य देवक्या संयोगे भोजनन्दनः

kaṁsastayorvararathaṁ codayāmāsa sārathiḥ vasudevasya devakyā saṁyoge bhojanandanaḥ

वसुदेव और देवकी के विवाह के समय भोजवंशी कंस स्वयं उनके श्रेष्ठ रथ का सारथी बना।

श्लोक 7 (vishnu.5.1.7)

आथान्तरिक्षे वागुच्चैः कंसमाभाष्य सादरम् । मेघगंभीरनिर्घोषं समाभाष्येदमब्रवीत्

āthāntarikṣe vāguccaiḥ kaṁsamābhāṣya sādaram meghagaṁbhīranirghoṣaṁ samābhāṣyedamabravīt

तभी आकाश में मेघ के समान गंभीर घोष वाली एक ऊँची वाणी ने आदरपूर्वक कंस को संबोधित करके यह कहा।

श्लोक 8 (vishnu.5.1.8)

यामेतां वहसे मूढ सह भर्त्रा रथे स्थिताम् । अस्यास्तवाष्टमो गर्भः प्राणानपहरिष्यति

yāmetāṁ vahase mūḍha saha bhartrā rathe sthitām asyāstavāṣṭamo garbhaḥ prāṇānapahariṣyati

हे मूर्ख! जिस स्त्री को तू उसके पति के साथ रथ पर बिठाकर ले जा रहा है, उसकी आठवीं संतान तेरे प्राण हर लेगी।

श्लोक 9 (vishnu.5.1.9)

श्रीपराशर उवाच । इत्याकर्ण्यं समुत्पाट्य खड्गं कंसो महाबलः । देवकीं हन्तुमारब्धो वसुदेवोऽब्रवीदिदम्

śrīparāśara uvāca ityākarṇyaṁ samutpāṭya khaḍgaṁ kaṁso mahābalaḥ devakīṁ hantumārabdho vasudevo'bravīdidam

पराशर जी ने कहा — यह सुनकर महाबली कंस ने तलवार खींचकर देवकी को मारने का उपक्रम किया। तब वसुदेव ने यह कहा।

श्लोक 10 (vishnu.5.1.10)

न हन्तव्या महाभाग देवकी भवतानघ । समर्पयिष्ये सकलान्गर्भानस्योदरोद्भवान्

na hantavyā mahābhāga devakī bhavatānagha samarpayiṣye sakalāngarbhānasyodarodbhavān

हे महाभाग! हे निष्पाप! देवकी को आपके द्वारा नहीं मारा जाना चाहिए। मैं इसके गर्भ से उत्पन्न होने वाली सभी संतानें आपको सौंप दूँगा।

श्लोक 11 (vishnu.5.1.11)

श्रीपराशर उवाच । तथेत्याह ततः कंसो वसुदेवं द्विजोत्तम । न घातयामास च तां देवकींसत्यगौरवात्

śrīparāśara uvāca tathetyāha tataḥ kaṁso vasudevaṁ dvijottama na ghātayāmāsa ca tāṁ devakīṁsatyagauravāt

पराशर जी ने कहा — हे द्विजोत्तम! तब कंस ने वसुदेव से 'ऐसा ही हो' कहा और सत्य की गरिमा के कारण उसने देवकी का वध नहीं किया।

श्लोक 12 (vishnu.5.1.12)

एतस्मिन्नेवकाले तु भूरिभारावपीडिता । जगाम धरणी मेरौ समाजं त्रिदिवौकसाम्

etasminnevakāle tu bhūribhārāvapīḍitā jagāma dharaṇī merau samājaṁ tridivaukasām

इसी समय अत्यधिक भार से पीड़ित पृथ्वी मेरु पर्वत पर देवताओं की सभा में गई।

श्लोक 13 (vishnu.5.1.13)

स ब्रह्मकान्सुरान्सर्वान्प्रणिपत्याथ मेदिनि । कथयामास तत्सर्वं खेदात्करुणभाषिणी

sa brahmakānsurānsarvānpraṇipatyātha medini kathayāmāsa tatsarvaṁ khedātkaruṇabhāṣiṇī

पृथ्वी ने ब्रह्मा और समस्त देवताओं को प्रणाम करके, दुःख से करुण वाणी में वह सब कुछ कह सुनाया।

श्लोक 14 (vishnu.5.1.14)

भूमिरुवाच । अग्निःसुवर्णस्य गुरुर्गवां सूर्यः परो गुरुः । ममाप्यखिललो कानां कुरुर्नारायणो गुरुः

bhūmiruvāca agniḥsuvarṇasya gururgavāṁ sūryaḥ paro guruḥ mamāpyakhilalo kānāṁ kururnārāyaṇo guruḥ

पृथ्वी ने कहा — अग्नि सोने का परखने वाला स्वामी है, गौओं का परम स्वामी सूर्य है, और मेरा तथा समस्त लोकों का परम स्वामी नारायण ही हैं।

श्लोक 15 (vishnu.5.1.15)

प्रजापतिपतिर्ब्रह्म पूर्वेषामपि पूर्वजः । कलाकाष्ठानिमेषात्मा कालश्चाव्यक्तमूर्तिमान्

prajāpatipatirbrahma pūrveṣāmapi pūrvajaḥ kalākāṣṭhānimeṣātmā kālaścāvyaktamūrtimān

ब्रह्मा प्रजापतियों के भी स्वामी हैं, वे प्राचीनतम पुरुषों में भी सबसे पूर्वज हैं; और काल, जिसका स्वरूप कला, काष्ठा और निमेष है, अव्यक्त रूप वाला है।

श्लोक 16 (vishnu.5.1.16)

तदंशभूतःसर्वैषां समूहो वःसुरोत्तमाः

tadaṁśabhūtaḥsarvaiṣāṁ samūho vaḥsurottamāḥ

हे श्रेष्ठ देवगण! वह काल ही अंशरूप में आप सबका समूह है।

श्लोक 17 (vishnu.5.1.17)

आदित्या सरुतःसाध्या रुद्रा वस्वश्विवह्नयः । पितरो ये च लोकानां स्रष्टारोऽत्रिपुरोगमाः

ādityā sarutaḥsādhyā rudrā vasvaśvivahnayaḥ pitaro ye ca lokānāṁ sraṣṭāro'tripurogamāḥ

आदित्यगण, मरुद्गण, साध्यगण, रुद्रगण, वसुगण, अश्विनीकुमार, अग्नि, पितृगण, और अत्रि आदि जो लोकों के स्रष्टा हैं —

श्लोक 18 (vishnu.5.1.18)

एते तस्याप्रमेयस्य विष्णो रूपं महात्मनः

ete tasyāprameyasya viṣṇo rūpaṁ mahātmanaḥ

ये सब उस अप्रमेय महात्मा विष्णु के ही रूप हैं।

श्लोक 19 (vishnu.5.1.19)

यक्षराक्षसदैतेयपिशाचोरगदानवाः । गन्धर्वाप्सरसश्चैवरूपं विष्णोर्महात्मनः

yakṣarākṣasadaiteyapiśācoragadānavāḥ gandharvāpsarasaścaivarūpaṁ viṣṇormahātmanaḥ

यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, उरग (सर्प), दानव तथा गन्धर्व और अप्सराएँ भी महात्मा विष्णु के ही रूप हैं।

श्लोक 20 (vishnu.5.1.20)

ग्रहर्क्षतारकाचित्रगगनाग्निजलानिलाः । अहं च विषयाश्चैव सर्व विष्णुमयं जगत्

graharkṣatārakācitragaganāgnijalānilāḥ ahaṁ ca viṣayāścaiva sarva viṣṇumayaṁ jagat

ग्रह, नक्षत्र, तारागण, विचित्र आकाश, अग्नि, जल, वायु, मैं स्वयं और समस्त विषय — यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय है।

श्लोक 21 (vishnu.5.1.21)

तथा चानेकरूपस्य यस्य रूपाण्य हर्निशम् । बाध्यबाधकतां यान्ति कल्लोला इव सागरे

tathā cānekarūpasya yasya rūpāṇya harniśam bādhyabādhakatāṁ yānti kallolā iva sāgare

और उस अनेकरूप विष्णु के रूप रात-दिन एक-दूसरे को बाधित करते और बाधा पाते रहते हैं, जैसे सागर में लहरें।

श्लोक 22 (vishnu.5.1.22)

तत्सांप्रतममी दैत्याः कालनेमिपुरोगमाः । मर्त्यलोकं समाक्रम्य बाधन्तेऽहर्निशं प्रजाः

tatsāṁpratamamī daityāḥ kālanemipurogamāḥ martyalokaṁ samākramya bādhante'harniśaṁ prajāḥ

अब वर्तमान में कालनेमि आदि ये दैत्य मर्त्यलोक पर आक्रमण करके प्रजा को रात-दिन पीड़ित कर रहे हैं।

श्लोक 23 (vishnu.5.1.23)

कालनेमिर्हतो योऽसौ विष्णुना प्रभविष्णुना । उग्रसेनसुतः कंसःसंभूतःस महासुरः

kālanemirhato yo'sau viṣṇunā prabhaviṣṇunā ugrasenasutaḥ kaṁsaḥsaṁbhūtaḥsa mahāsuraḥ

जो कालनेमि सामर्थ्यवान् विष्णु द्वारा पूर्वकाल में मारा गया था, वही महान् असुर अब उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में जन्मा है।

श्लोक 24 (vishnu.5.1.24)

आरिष्टो धेनुकः केशी प्रलंबो नरकस्तथा । सुंदोऽसुरस्तथात्युग्रो बाणश्चापि बलेःसुतः

āriṣṭo dhenukaḥ keśī pralaṁbo narakastathā suṁdo'surastathātyugro bāṇaścāpi baleḥsutaḥ

अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, असुर सुन्द तथा अत्यंत उग्र बाणासुर, जो बलि का पुत्र है —

श्लोक 25 (vishnu.5.1.25)

तथान्ये च महावीर्या नृपाणां भवनेषु ये । समुत्पन्ना दुरात्मानस्तान्न संख्यातुमुत्सहे

tathānye ca mahāvīryā nṛpāṇāṁ bhavaneṣu ye samutpannā durātmānastānna saṁkhyātumutsahe

और भी अनेक महापराक्रमी दुरात्मा राजाओं के घरों में उत्पन्न हुए हैं, जिन्हें मैं गिन नहीं सकती।

श्लोक 26 (vishnu.5.1.26)

अक्षोहिण्योत्र बहुला दिव्यमूर्तिधराःसुराः । महाबलानां दृप्तानां दैत्येन्द्रणां ममोपरि

akṣohiṇyotra bahulā divyamūrtidharāḥsurāḥ mahābalānāṁ dṛptānāṁ daityendraṇāṁ mamopari

मुझ पर उन शक्तिशाली, अहंकारी दैत्येन्द्रों की अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ भारी दबाव डाल रही हैं।

श्लोक 27 (vishnu.5.1.27)

तद्भूरिभार पीडार्ता न शक्नोम्यमरेश्वराः । बिभर्तुमात्मानमहमिति विज्ञापयामि वः

tadbhūribhāra pīḍārtā na śaknomyamareśvarāḥ bibhartumātmānamahamiti vijñāpayāmi vaḥ

उस अत्यधिक भार से पीड़ित होकर, हे अमरेश्वरो! मैं स्वयं को धारण करने में असमर्थ हूँ — यही मैं आपसे निवेदन करती हूँ।

श्लोक 28 (vishnu.5.1.28)

क्रियतां तन्महाभागा मम भारावतारणम् । यथा रसातलं नाहं गच्छेयमतिविह्वला

kriyatāṁ tanmahābhāgā mama bhārāvatāraṇam yathā rasātalaṁ nāhaṁ gaccheyamativihvalā

हे महाभागो! मेरा भार उतारने का उपाय कीजिए, जिससे अत्यंत व्याकुल होकर मैं रसातल में न चली जाऊँ।

श्लोक 29 (vishnu.5.1.29)

इत्याकर्ण्य धरावाक्यमशेषैस्त्रिदशेश्वरैः । भुवो भारावतारार्थं ब्रह्मा प्राह प्रचोदितः

ityākarṇya dharāvākyamaśeṣaistridaśeśvaraiḥ bhuvo bhārāvatārārthaṁ brahmā prāha pracoditaḥ

पृथ्वी के इन वचनों को सुनकर तथा समस्त देवताओं द्वारा प्रेरित होकर, ब्रह्मा जी ने पृथ्वी का भार उतारने हेतु यह कहा।

श्लोक 30 (vishnu.5.1.30)

ब्रह्मोवाच । यथाह वसुधा सर्वं सत्यमेव दिवौकसः । अहं भवो भवन्तश्च सर्वे नारायणात्मकाः

brahmovāca yathāha vasudhā sarvaṁ satyameva divaukasaḥ ahaṁ bhavo bhavantaśca sarve nārāyaṇātmakāḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे देवताओ! पृथ्वी ने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य ही है। मैं, शिव और आप सभी नारायण-स्वरूप ही हैं।

श्लोक 31 (vishnu.5.1.31)

विभूतयश्च यास्तस्य तासामेव परस्परम् । आधिक्यन्यू६ अताबाध्यबाधकत्वेन वर्तते

vibhūtayaśca yāstasya tāsāmeva parasparam ādhikyanyū6 atābādhyabādhakatvena vartate

और उसकी जो विभूतियाँ हैं, उन्हीं में परस्पर अधिकता-न्यूनता तथा बाध्य-बाधकभाव विद्यमान रहता है।

श्लोक 32 (vishnu.5.1.32)

तदागच्छत गच्छामः क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम् । तत्राराध्य हरिं तस्मै सर्वं विज्ञापयाम वै

tadāgacchata gacchāmaḥ kṣīrābdhestaṭamuttamam tatrārādhya hariṁ tasmai sarvaṁ vijñāpayāma vai

अतः आइए, हम सब क्षीरसागर के उत्तम तट पर चलें; वहाँ हरि की आराधना करके उन्हें सब कुछ निवेदन करें।

श्लोक 33 (vishnu.5.1.33)

सर्वथैव जगत्यर्थे स सर्वात्मा जगन्मयः । सत्त्वांशेनावतीर्योर्व्यां धर्मस्य कुरुते स्थितिम्

sarvathaiva jagatyarthe sa sarvātmā jaganmayaḥ sattvāṁśenāvatīryorvyāṁ dharmasya kurute sthitim

वह सर्वात्मा, जगन्मय भगवान् सदैव जगत् के हित के लिए अपने सत्त्वांश से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर धर्म की स्थापना करते हैं।

श्लोक 34 (vishnu.5.1.34)

श्रीपराशर उवाच । इत्युक्त्वा प्रययो तत्र सह देवैः पितामहः । समाहितमनाश्चैवं तुष्टाव गरुडध्वजम्

śrīparāśara uvāca ityuktvā prayayo tatra saha devaiḥ pitāmahaḥ samāhitamanāścaivaṁ tuṣṭāva garuḍadhvajam

पराशर जी ने कहा — ऐसा कहकर पितामह ब्रह्मा देवताओं सहित वहाँ गए और एकाग्रचित्त होकर उन्होंने गरुड़ध्वज भगवान् की इस प्रकार स्तुति की।

श्लोक 35 (vishnu.5.1.35)

ब्रह्मोवाच । द्वे विद्ये त्वमनाम्नायपरा चैवापरा तथा । त एव भवतो रूपे मूर्तामूर्तात्मिके प्रभो

brahmovāca dve vidye tvamanāmnāyaparā caivāparā tathā ta eva bhavato rūpe mūrtāmūrtātmike prabho

ब्रह्मा जी ने कहा — हे प्रभो! आप में दो विद्याएँ हैं — परा और अपरा; और वे ही आपके साकार और निराकार — दो रूप हैं।

श्लोक 36 (vishnu.5.1.36)

द्वे ब्रह्मणी त्वणीयोतिस्थूलात्मन्सर्व सर्ववित् । शब्दब्रह्मपरं चैव ब्रह्म ब्रह्ममयस्य यत्

dve brahmaṇī tvaṇīyotisthūlātmansarva sarvavit śabdabrahmaparaṁ caiva brahma brahmamayasya yat

हे सर्वज्ञ! आप ही अत्यंत सूक्ष्म और अत्यंत स्थूल — दोनों ब्रह्म हैं — शब्दब्रह्म और परब्रह्म, जो ब्रह्ममय के ही स्वरूप हैं।

श्लोक 37 (vishnu.5.1.37)

ऋग्वेदस्त्वं यजुर्वेदःसामवेदस्त्वथर्वणः । शिक्षाकल्पो निरुक्तं च च्छन्दो ज्योतिषमेव च

ṛgvedastvaṁ yajurvedaḥsāmavedastvatharvaṇaḥ śikṣākalpo niruktaṁ ca cchando jyotiṣameva ca

आप ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं; और शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष भी आप ही हैं।

श्लोक 38 (vishnu.5.1.38)

इतिहासपुराणे च तथा व्याकरणं प्रभो । मीमांसा न्यायशास्त्रं च धर्मशास्त्राण्यधोक्षज

itihāsapurāṇe ca tathā vyākaraṇaṁ prabho mīmāṁsā nyāyaśāstraṁ ca dharmaśāstrāṇyadhokṣaja

हे प्रभो! इतिहास, पुराण और व्याकरण भी आप ही हैं; और हे अधोक्षज! मीमांसा, न्यायशास्त्र तथा धर्मशास्त्र भी आप ही हैं।

श्लोक 39 (vishnu.5.1.39)

आत्माऽत्मदेहगुणवद्विचाराचारि यद्वच । तदप्याद्यपते नान्यदध्यात्मात्मस्वरूपवत्

ātmā'tmadehaguṇavadvicārācāri yadvaca tadapyādyapate nānyadadhyātmātmasvarūpavat

हे आदिनाथ! आत्मा, देह और गुणों से संबंधित जो भी विचार और आचार है, वह भी अध्यात्म और आत्मस्वरूप से भिन्न नहीं है।

श्लोक 40 (vishnu.5.1.40)

त्वमव्यक्तमनिर्देश्यमचिन्त्यानामवर्मवत् । अपाणिपादरूपं च शुद्धं नित्यं परात्परम्

tvamavyaktamanirdeśyamacintyānāmavarmavat apāṇipādarūpaṁ ca śuddhaṁ nityaṁ parātparam

आप अव्यक्त, अनिर्देश्य, अचिन्त्य, दोषरहित हैं; आप बिना हाथ-पैर के रूप वाले, शुद्ध, नित्य और परात्पर हैं।

श्लोक 41 (vishnu.5.1.41)

शृणोष्यकर्णः परिपश्यसि त्वमचक्षुरूपो बहुरूपरूपः । अपादहस्तो जवनो ग्रहीता त्वं वेत्सि सर्वं च सर्ववेद्यः

śṛṇoṣyakarṇaḥ paripaśyasi tvamacakṣurūpo bahurūparūpaḥ apādahasto javano grahītā tvaṁ vetsi sarvaṁ ca sarvavedyaḥ

आप बिना कानों के सुनते हैं, बिना नेत्रों के भी सब कुछ देखते हैं — आप अनेक रूपों वाले हैं; बिना पैर-हाथ के भी वेगवान् और ग्रहण करने वाले हैं; आप सब कुछ जानते हैं और सबके द्वारा जानने योग्य हैं।

श्लोक 42 (vishnu.5.1.42)

अणोरणीयां समसत्स्वरूपं त्वां पश्यतो ज्ञाननिवृत्तिरग्र्या । धीरस्य धीरस्य बिभर्ति नान्यद्वरेण्यरूपात्परतः परात्मन्

aṇoraṇīyāṁ samasatsvarūpaṁ tvāṁ paśyato jñānanivṛttiragryā dhīrasya dhīrasya bibharti nānyadvareṇyarūpātparataḥ parātman

हे परमात्मन्! अणु से भी अणु, समरूप आपको देखने वाले धीर पुरुष के लिए वही ज्ञान की चरम निवृत्ति है; आपके श्रेष्ठ रूप से परे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है।

श्लोक 43 (vishnu.5.1.43)

त्वं विश्वनाभिर्भुवनस्य गोप्ता सर्वाणि भूतानि तवान्तराणि । यद्भूतभव्यं यदणोरणीयः पुमांस्त्वमेकः प्रकृतेः परस्तात्

tvaṁ viśvanābhirbhuvanasya goptā sarvāṇi bhūtāni tavāntarāṇi yadbhūtabhavyaṁ yadaṇoraṇīyaḥ pumāṁstvamekaḥ prakṛteḥ parastāt

आप विश्व की नाभि हैं, भुवन के रक्षक हैं; समस्त प्राणी आपके भीतर हैं। जो कुछ हो चुका और जो होने वाला है, जो अणु से भी सूक्ष्म है — आप ही वह एक पुरुष हैं, प्रकृति से परे।

श्लोक 44 (vishnu.5.1.44)

एकश्चतुर्धा भगवान्हुताशो वर्चोविभूतं जगतो ददासि । त्वं विश्वतश्चक्षुरनन्तमूर्ते त्रेधा पदं त्वं निदधासि धातः

ekaścaturdhā bhagavānhutāśo varcovibhūtaṁ jagato dadāsi tvaṁ viśvataścakṣuranantamūrte tredhā padaṁ tvaṁ nidadhāsi dhātaḥ

हे भगवन्! आप ही एक होकर अग्निरूप में चार प्रकार से जगत् को तेज और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। हे अनन्तमूर्ते! आप विश्वतश्चक्षु हैं; हे विधाता! आप ही तीन प्रकार से अपने चरण धरते हैं।

श्लोक 45 (vishnu.5.1.45)

यथाग्निरेको बहुधा समिध्यते विकारभेदैरविकाररूपः । तथा भवान्सर्वगतैकरूपी रूपाण्यशेषाण्यनुपुष्यतीश

yathāgnireko bahudhā samidhyate vikārabhedairavikārarūpaḥ tathā bhavānsarvagataikarūpī rūpāṇyaśeṣāṇyanupuṣyatīśa

जैसे एक ही अग्नि विकार-भेदों के कारण अनेक रूपों में प्रज्वलित होती है, यद्यपि वह स्वयं अविकाररूप है, वैसे ही हे ईश! आप सर्वव्यापी एकरूप होकर भी समस्त रूपों का पोषण करते हैं।

श्लोक 46 (vishnu.5.1.46)

एकं तवाग्र्यं परमं पदं यत्पश्यन्ति त्वां सूरयो ज्ञानदृश्यम् । त्वत्तो नान्यत्किञ्चिदस्ति स्वरूपं यद्वा भूतं यच्च भव्यं परात्मन्

ekaṁ tavāgryaṁ paramaṁ padaṁ yatpaśyanti tvāṁ sūrayo jñānadṛśyam tvatto nānyatkiñcidasti svarūpaṁ yadvā bhūtaṁ yacca bhavyaṁ parātman

हे परमात्मन्! आपका जो एक अग्रगण्य, परम पद है, जिसे ज्ञानी पुरुष ज्ञान से देखते हैं — आपसे भिन्न कोई और स्वरूप नहीं है, न जो हो चुका और न जो होने वाला है।

श्लोक 47 (vishnu.5.1.47)

व्यक्ताव्यक्तस्वरूपस्त्वं समष्टिव्यष्टिरूपवान् । सर्वज्ञःसर्वनित्सर्वशक्तिज्ञानबलर्धिमान्

vyaktāvyaktasvarūpastvaṁ samaṣṭivyaṣṭirūpavān sarvajñaḥsarvanitsarvaśaktijñānabalardhimān

आप व्यक्त और अव्यक्त दोनों स्वरूप वाले हैं, समष्टि और व्यष्टि दोनों रूपों वाले हैं; आप सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा तथा सम्पूर्ण शक्ति, ज्ञान, बल और ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं।

श्लोक 48 (vishnu.5.1.48)

अन्यूनश्चाप्यवृद्धिश्च स्वाधीनो नादिमान्वशी । क्लमतन्द्री भयक्रोधकामादिभिरसंयुतः

anyūnaścāpyavṛddhiśca svādhīno nādimānvaśī klamatandrī bhayakrodhakāmādibhirasaṁyutaḥ

आप न कम होते हैं, न बढ़ते हैं; स्वाधीन, अनादि तथा वश में रखने वाले हैं; थकान, आलस्य, भय, क्रोध, काम आदि से रहित हैं।

श्लोक 49 (vishnu.5.1.49)

निरवद्यः परः प्राप्तेर्निरधिष्ठोऽक्षरः क्रमः । सर्वेश्वरः पराधारो धाम्नां धामात्मकोऽक्षयः

niravadyaḥ paraḥ prāpterniradhiṣṭho'kṣaraḥ kramaḥ sarveśvaraḥ parādhāro dhāmnāṁ dhāmātmako'kṣayaḥ

आप निर्दोष, प्राप्ति में सर्वोच्च, स्वयं-आधार, अक्षर तथा स्वयं क्रम-स्वरूप हैं; आप सर्वेश्वर, परम आधार, समस्त धामों के सार तथा अक्षय हैं।

श्लोक 50 (vishnu.5.1.50)

सकलावरणानीतनिरालंबनभावन । महाविभूतिसंस्थान नमस्ते पुरुषोत्तम

sakalāvaraṇānītanirālaṁbanabhāvana mahāvibhūtisaṁsthāna namaste puruṣottama

हे समस्त आवरणों से परे ले जाने वाले, निरालम्ब-भाव वाले, महाविभूति के आधार पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।

श्लोक 51 (vishnu.5.1.51)

नाकारणात्कारणाद्वा कारणाकारणान्न च । शरीरग्रहणं वापि धर्मत्राणाय केवलम्

nākāraṇātkāraṇādvā kāraṇākāraṇānna ca śarīragrahaṇaṁ vāpi dharmatrāṇāya kevalam

न बिना कारण के, न सामान्य कारण से, न कारण-अकारण से — आपका शरीर धारण करना केवल धर्म की रक्षा के लिए ही होता है।

श्लोक 52 (vishnu.5.1.52)

श्रीपराशर उवाच । इत्येवं संस्तवं श्रुत्वा मनसा भगवानजः । ब्रह्माणमाह प्रीतेन विश्वरूपं प्रकाशयन्

śrīparāśara uvāca ityevaṁ saṁstavaṁ śrutvā manasā bhagavānajaḥ brahmāṇamāha prītena viśvarūpaṁ prakāśayan

पराशर जी ने कहा — इस प्रकार की स्तुति सुनकर अजन्मा भगवान् ने प्रसन्न होकर अपना विश्वरूप प्रकट करते हुए ब्रह्मा जी से कहा।

श्लोक 53 (vishnu.5.1.53)

श्रीभगवानुवाच । भोभो ब्रह्मंस्त्वया मत्तःसह देवैर्यदिष्यते । तदुच्यतामशेषं च सिद्धमेवावधार्यताम्

śrībhagavānuvāca bhobho brahmaṁstvayā mattaḥsaha devairyadiṣyate taducyatāmaśeṣaṁ ca siddhamevāvadhāryatām

भगवान् ने कहा — हे ब्रह्मन्! देवताओं सहित तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, वह सब कह डालो; और यह निश्चित जानो कि वह सिद्ध ही है।

श्लोक 54 (vishnu.5.1.54)

श्रीपराशर उवाच । ततो ब्रह्मा हरेर्दिव्य विश्विरूपमवेक्ष्य तत् । तुष्टाव भूयो देवेषु साध्वसावनतात्मसु

śrīparāśara uvāca tato brahmā harerdivya viśvirūpamavekṣya tat tuṣṭāva bhūyo deveṣu sādhvasāvanatātmasu

पराशर जी ने कहा — तब ब्रह्मा जी हरि के उस दिव्य विश्वरूप को देखकर, देवताओं के भय से नतमस्तक खड़े रहने के बीच, पुनः उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 55 (vishnu.5.1.55)

ब्रह्मोवाच । नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वःसहस्रबाहो बहुवक्त्रपाद । नमोनमस्ते जगतः प्रवृत्तिविनाशसंस्थानकराप्रमेय

brahmovāca namo namastestu sahasrakṛtvaḥsahasrabāho bahuvaktrapāda namonamaste jagataḥ pravṛttivināśasaṁsthānakarāprameya

ब्रह्मा जी ने कहा — हे सहस्रबाहो! अनेक मुख और चरणों वाले! आपको सहस्रों बार नमस्कार है। हे अप्रमेय! जगत् की उत्पत्ति, विनाश और स्थिति के कर्ता, आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 56 (vishnu.5.1.56)

सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिबृहत्प्रमाम गरीयसामप्यतिगौरवात्मन् । प्रधानबुद्धीन्द्रियवत्प्रधानमूलात्परात्मन्भगवन्प्रसीद

sūkṣmātisūkṣmātibṛhatpramāma garīyasāmapyatigauravātman pradhānabuddhīndriyavatpradhānamūlātparātmanbhagavanprasīda

हे अत्यंत सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और अत्यंत विशाल से भी विशाल, गुरुतम में भी अति गौरवशाली स्वरूप वाले! हे प्रधान, बुद्धि और इन्द्रियों के भी मूल कारण, परात्मन् भगवन्! प्रसन्न होइए।

श्लोक 57 (vishnu.5.1.57)

एषा मही देव महीप्रसूतैर्महासुरैः पीडितशैलबन्धा । परायणं त्वां जगतामुपैति भारावतारार्थमपारसार

eṣā mahī deva mahīprasūtairmahāsuraiḥ pīḍitaśailabandhā parāyaṇaṁ tvāṁ jagatāmupaiti bhārāvatārārthamapārasāra

हे देव! यह पृथ्वी, जिसके पर्वत-बन्ध महासुरों द्वारा पीड़ित हैं — जो स्वयं भी पृथ्वी से उत्पन्न हैं — हे अपार सार वाले! अपना भार उतरवाने के लिए जगत् के आश्रय आप ही की शरण में आई है।

श्लोक 58 (vishnu.5.1.58)

एते वयं वृत्ररिपुस्तथायं नासत्यदस्त्रौ वरुणस्तथैव । इमे च रुद्रा वसवःससूर्याःसमीरणाग्निप्रसुखास्तथान्ये

ete vayaṁ vṛtraripustathāyaṁ nāsatyadastrau varuṇastathaiva ime ca rudrā vasavaḥsasūryāḥsamīraṇāgniprasukhāstathānye

यहाँ हम सब हैं, यह वृत्रारि इन्द्र हैं, ये दोनों नासत्य (अश्विनीकुमार) और वरुण भी हैं; ये रुद्रगण, सूर्यसहित वसुगण, वायु, अग्नि तथा अन्य सुखद देवता भी उपस्थित हैं।

श्लोक 59 (vishnu.5.1.59)

सुराःसमस्ताःसुरनाथकार्यमेभिर्मया यच्च तदीश सर्वाम् । आज्ञापयाज्ञां परिपालयन्तस्तवैव तिष्ठाम सदास्तदोषाः

surāḥsamastāḥsuranāthakāryamebhirmayā yacca tadīśa sarvām ājñāpayājñāṁ paripālayantastavaiva tiṣṭhāma sadāstadoṣāḥ

हे सुरनाथ! हम सभी देवता तथा जो भी कार्य हमें और मुझे करना है — हे ईश! उस सबकी आज्ञा दीजिए; हम आपकी आज्ञा का पालन करते हुए सदैव निर्दोष होकर आपके ही अधीन रहेंगे।

श्लोक 60 (vishnu.5.1.60)

श्रीपराशर उवाच । एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः । उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महामुने

śrīparāśara uvāca evaṁ saṁstūyamānastu bhagavānparameśvaraḥ ujjahārātmanaḥ keśau sitakṛṣṇau mahāmune

पराशर जी ने कहा — हे महामुने! इस प्रकार स्तुति किए जाने पर भगवान् परमेश्वर ने अपने शरीर से एक श्वेत और एक श्याम — दो केश उखाड़े।

श्लोक 61 (vishnu.5.1.61)

उवाच च सुरानेतौ मत्केशौ वसुधातले । अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः

uvāca ca surānetau matkeśau vasudhātale avatīrya bhuvo bhārakleśahāniṁ kariṣyataḥ

और उन्होंने देवताओं से कहा — मेरे ये दोनों केश पृथ्वीतल पर अवतीर्ण होकर पृथ्वी के भार और क्लेश को दूर करेंगे।

श्लोक 62 (vishnu.5.1.62)

सुराश्च सकलाःस्वांशैरवतीर्य महीतले । कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तैः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः

surāśca sakalāḥsvāṁśairavatīrya mahītale kurvantu yuddhamunmattaiḥ pūrvotpannairmahāsuraiḥ

और समस्त देवता अपने-अपने अंशों सहित पृथ्वी पर अवतरित होकर पूर्वजन्म में उत्पन्न उन्मत्त महासुरों से युद्ध करें।

श्लोक 63 (vishnu.5.1.63)

ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरमीतले । प्रयास्यन्ति न संदेहो मद्दृपातविचूर्णिताः

tataḥ kṣayamaśeṣāste daiteyā dharamītale prayāsyanti na saṁdeho maddṛpātavicūrṇitāḥ

तब वे सभी दैत्य मेरी दृष्टिपात मात्र से चूर्ण होकर पृथ्वीतल पर निःसंदेह नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 64 (vishnu.5.1.64)

वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा । तत्रायमष्टमो गर्भो मत्केशो भविता सुराः

vasudevasya yā patnī devakī devatopamā tatrāyamaṣṭamo garbho matkeśo bhavitā surāḥ

हे देवगण! वसुदेव की जो पत्नी देवकी देवी के समान है, उसके आठवें गर्भ के रूप में मेरा यह केश जन्म लेगा।

श्लोक 65 (vishnu.5.1.65)

अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि । कालनेमीं समुद्भूतमित्युक्त्वान्तर्दधे हरिः

avatīrya ca tatrāyaṁ kaṁsaṁ ghātayitā bhuvi kālanemīṁ samudbhūtamityuktvāntardadhe hariḥ

और वहाँ अवतीर्ण होकर वह पृथ्वी पर कालनेमि से उत्पन्न कंस का वध करेगा — ऐसा कहकर हरि अंतर्धान हो गए।

श्लोक 66 (vishnu.5.1.66)

अदृश्याय ततस्तस्मै प्रणिपत्य महामुने । मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले

adṛśyāya tatastasmai praṇipatya mahāmune merupṛṣṭhaṁ surā jagmuravateruśca bhūtale

हे महामुने! तत्पश्चात् अदृश्य हो चुके उन भगवान् को प्रणाम करके देवता मेरु के शिखर पर गए और पृथ्वी पर भी अवतरित हुए।

श्लोक 67 (vishnu.5.1.67)

कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीधरः । भविष्यतीत्याच चक्षे भगवान्नारदो मुनिः

kaṁsāya cāṣṭamo garbho devakyā dharaṇīdharaḥ bhaviṣyatītyāca cakṣe bhagavānnārado muniḥ

और भगवान् नारद मुनि ने कंस से कहा कि देवकी का आठवाँ गर्भ धरणीधर (महाबली) होगा।

श्लोक 68 (vishnu.5.1.68)

कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः । देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत्

kaṁso'pi tadupaśrutya nāradātkupitastataḥ devakīṁ vasudevaṁ ca gṛhe guptāvadhārayat

यह सुनकर कंस नारद पर क्रुद्ध हो गया और उसने देवकी तथा वसुदेव को घर में बंदी बनाकर कड़ी निगरानी में रखा।

श्लोक 69 (vishnu.5.1.69)

वसुदेवेन कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा । तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान् द्विज

vasudevena kaṁsāya tenaivoktaṁ yathā purā tathaiva vasudevo'pi putramarpitavān dvija

हे द्विज! जैसा वसुदेव ने पहले कंस से कहा था, वैसे ही वसुदेव ने प्रत्येक पुत्र को कंस को सौंप दिया।

श्लोक 70 (vishnu.5.1.70)

हिरण्यकशिपोः पुत्राःषड्गर्भा इति विश्रुताः । विष्णुप्रयुक्ता स्तान्निद्राक्रमाद्गर्भानयोजयत्

hiraṇyakaśipoḥ putrāḥṣaḍgarbhā iti viśrutāḥ viṣṇuprayuktā stānnidrākramādgarbhānayojayat

हिरण्यकशिपु के जो पुत्र 'षड्गर्भ' नाम से प्रसिद्ध थे, विष्णु की प्रेरणा से निद्रा (योगनिद्रा) ने उन्हें क्रमशः देवकी के गर्भ में स्थापित किया।

श्लोक 71 (vishnu.5.1.71)

योगनिद्रा महामाया वैष्णवी मोहितं यया । अविद्यया जगत्सर्वं तामाह भगवान्हरिः

yoganidrā mahāmāyā vaiṣṇavī mohitaṁ yayā avidyayā jagatsarvaṁ tāmāha bhagavānhariḥ

योगनिद्रा, जो विष्णु की महामाया है, जिसकी अविद्या से सम्पूर्ण जगत् मोहित है — उससे भगवान् हरि ने यह कहा।

श्लोक 72 (vishnu.5.1.72)

श्रीभगवानुवाच । निद्रे गच्छ ममादेशात्पातालातलसंश्रयान् । एकैकत्वेन षड्गर्भान्देवकीजठरं नय

śrībhagavānuvāca nidre gaccha mamādeśātpātālātalasaṁśrayān ekaikatvena ṣaḍgarbhāndevakījaṭharaṁ naya

भगवान् ने कहा — हे निद्रे! मेरी आज्ञा से जाओ और पाताल में स्थित उन छह गर्भों को एक-एक करके देवकी के गर्भ में ले जाओ।

श्लोक 73 (vishnu.5.1.73)

हतेषु तेषु कंसेन शेषाख्योंशस्ततो मम । अंशांशोनादरे तस्याःसप्तमः संभविष्यति

hateṣu teṣu kaṁsena śeṣākhyoṁśastato mama aṁśāṁśonādare tasyāḥsaptamaḥ saṁbhaviṣyati

जब कंस उन छहों का वध कर देगा, तब मेरे शेष-नामक अंश से उत्पन्न अंशांश उसका सातवाँ गर्भ होगा।

श्लोक 74 (vishnu.5.1.74)

गोकुले वसुदेवस्य भार्यान्या रोहिणी स्थिता । तस्याःस संभूतिसमं देवि नेयस्त्वयोदरम्

gokule vasudevasya bhāryānyā rohiṇī sthitā tasyāḥsa saṁbhūtisamaṁ devi neyastvayodaram

गोकुल में वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी रहती है; हे देवि! उस सातवें गर्भ को उत्पत्ति के साथ ही तुम्हें उसके गर्भ में स्थानांतरित करना होगा।

श्लोक 75 (vishnu.5.1.75)

सप्तमो भोजरा जस्य भयाद्रोधोपरोधतः । देवक्याः पितितो गर्भ इति लोको वदिष्यति

saptamo bhojarā jasya bhayādrodhoparodhataḥ devakyāḥ pitito garbha iti loko vadiṣyati

'भोजराज कंस के भय से बार-बार के दबाव के कारण देवकी का सातवाँ गर्भ गिर गया' — ऐसा लोग कहेंगे।

श्लोक 76 (vishnu.5.1.76)

गर्भसंकर्षणात्सोऽथ लोके संकर्षणेति वै । संज्ञामवाप्स्यते वीरः श्वेताद्रिशिखरोपमः

garbhasaṁkarṣaṇātso'tha loke saṁkarṣaṇeti vai saṁjñāmavāpsyate vīraḥ śvetādriśikharopamaḥ

गर्भ के आकर्षण के कारण वह श्वेत पर्वत-शिखर के समान वीर लोक में 'संकर्षण' नाम प्राप्त करेगा।

श्लोक 77 (vishnu.5.1.77)

ततोऽहं संभविष्यामि देवकीजठरे शुभे । भर्गं त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलंबितम्

tato'haṁ saṁbhaviṣyāmi devakījaṭhare śubhe bhargaṁ tvayā yaśodāyā gantavyamavilaṁbitam

तब मैं देवकी के शुभ गर्भ में उत्पन्न होऊँगा। तुम्हें बिना विलम्ब यशोदा के पास जाना होगा।

श्लोक 78 (vishnu.5.1.78)

प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि । उत्पत्स्यामि नवम्यां तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि

prāvṛṭkāle ca nabhasi kṛṣṇāṣṭamyāmahaṁ niśi utpatsyāmi navamyāṁ tu prasūtiṁ tvamavāpsyasi

वर्षा ऋतु में, भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी की रात्रि को मैं उत्पन्न होऊँगा; और तुम नवमी को अपना प्रसव प्राप्त करोगी।

श्लोक 79 (vishnu.5.1.79)

यशोदाशयने मां तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते । मच्छक्तिप्रोरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति

yaśodāśayane māṁ tu devakyāstvāmanindite macchaktiproritamatirvasudevo nayiṣyati

हे अनिन्दिते! मेरी शक्ति से प्रेरितबुद्धि वसुदेव मुझे यशोदा की शय्या पर ले जाएँगे, और तुम्हें देवकी के पास लाएँगे।

श्लोक 80 (vishnu.5.1.80)

कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले । प्रक्षेप्स्यत्यन्तारिक्षे च संस्थानं त्वमवाप्स्यसि

kaṁsaśca tvāmupādāya devi śailaśilātale prakṣepsyatyantārikṣe ca saṁsthānaṁ tvamavāpsyasi

हे देवि! कंस तुम्हें पकड़कर पत्थर की शिला पर पटक देगा; और तब तुम आकाश में अपने स्थान को प्राप्त करोगी।

श्लोक 81 (vishnu.5.1.81)

ततस्त्वां शतदृक्छक्रः प्रणम्य मम गौरवात् । प्रणिपातानतशिरा भगिनीत्वे ग्रहीष्यति

tatastvāṁ śatadṛkchakraḥ praṇamya mama gauravāt praṇipātānataśirā bhaginītve grahīṣyati

तब शतनेत्रधारी इन्द्र मेरी गरिमा के कारण तुम्हें प्रणाम करके, सिर झुकाकर तुम्हें अपनी बहन के रूप में स्वीकार करेंगे।

श्लोक 82 (vishnu.5.1.82)

त्वं च शुंभनिशुंभादीन्हत्वा दैत्यान्सहस्रशः । स्थानैरनेकैः पृथिवीमशेषां मण्डयिष्यसि

tvaṁ ca śuṁbhaniśuṁbhādīnhatvā daityānsahasraśaḥ sthānairanekaiḥ pṛthivīmaśeṣāṁ maṇḍayiṣyasi

और तुम शुम्भ, निशुम्भ आदि सहस्रों दैत्यों का वध करके अनेक स्थानों से सम्पूर्ण पृथ्वी को अलंकृत करोगी।

श्लोक 83 (vishnu.5.1.83)

त्वं भूतिः सन्नतिः क्षान्तिः कान्तिर्द्यौः पृथिवी धृतिः । लज्जापुष्टी रुषा या तु काचिदन्या त्वमेव सा

tvaṁ bhūtiḥ sannatiḥ kṣāntiḥ kāntirdyauḥ pṛthivī dhṛtiḥ lajjāpuṣṭī ruṣā yā tu kācidanyā tvameva sā

तुम ही भूति, सन्नति, क्षमा, कान्ति, द्यौ, पृथ्वी, धृति, लज्जा और पुष्टि हो; और जो भी अन्य शक्ति है, वह भी तुम्हीं हो।

श्लोक 84 (vishnu.5.1.84)

ये त्वामार्येति दुर्गेति वेदगर्भांबिकेति च । भद्रेति भद्रकालीति क्षेमदा भग्यदेति च

ye tvāmāryeti durgeti vedagarbhāṁbiketi ca bhadreti bhadrakālīti kṣemadā bhagyadeti ca

जो लोग तुम्हें आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेमदा और भाग्यदा कहकर पुकारते हैं —

श्लोक 85 (vishnu.5.1.85)

प्रातश्चैवापराह्ने च स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः । तेषां हि प्रार्थितं सर्वं मत्प्रसादाद्भविष्यति

prātaścaivāparāhne ca stoṣyantyānamramūrtayaḥ teṣāṁ hi prārthitaṁ sarvaṁ matprasādādbhaviṣyati

और प्रातः तथा सायं नतमस्तक होकर तुम्हारी स्तुति करेंगे — उनकी सभी प्रार्थनाएँ मेरी कृपा से पूर्ण होंगी।

श्लोक 86 (vishnu.5.1.86)

सुरामांसोपहरैश्च भक्ष्यभोज्यैश्च पूजिता । नॄणामशेषसामांस्त्वं प्रसन्ना संप्रदास्यसि

surāmāṁsopaharaiśca bhakṣyabhojyaiśca pūjitā nṝṇāmaśeṣasāmāṁstvaṁ prasannā saṁpradāsyasi

सुरा और मांस के उपहारों तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से पूजित होकर तुम प्रसन्न होकर मनुष्यों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करोगी।

श्लोक 87 (vishnu.5.1.87)

ते सर्वे सर्वदा भद्रे मत्प्रसादादसंशयम् । असंदिग्धा भविष्यन्ति गच्छ देवि यथोदितम्

te sarve sarvadā bhadre matprasādādasaṁśayam asaṁdigdhā bhaviṣyanti gaccha devi yathoditam

हे भद्रे! वे सभी कामनाएँ सदैव मेरी कृपा से निःसंदेह और निश्चित होंगी। हे देवि! अब जैसा कहा गया है, वैसे ही जाओ।

अध्याय-सूचीअध्याय 2