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पञ्चमांश · अध्याय 2

देवकी-गर्भाधान

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (vishnu.5.2.1)

यथोक्तं सा जगद्धात्री देवदेवेन वै तदा । षड़गर्भ-गर्भविन्यासं चक्र चान्यस्य कर्षणम्

yathoktaṁ sā jagaddhātrī devadevena vai tadā ṣar̤agarbha-garbhavinyāsaṁ cakra cānyasya karṣaṇam

तब जगद्धात्री (योगनिद्रा) ने देवाधिदेव के कहे अनुसार छह गर्भों का विन्यास किया और अन्य (सातवें) गर्भ का आकर्षण भी किया।

श्लोक 2 (vishnu.5.2.2)

सप्तमे रोहिणी प्राप्ते गर्भेगर्भं ततो हरिः । लोकत्रयोपकाराय देवक्याः प्रविवेश वै

saptame rohiṇī prāpte garbhegarbhaṁ tato hariḥ lokatrayopakārāya devakyāḥ praviveśa vai

जब सातवाँ गर्भ रोहिणी को प्राप्त हो गया, तब त्रिलोक के कल्याण हेतु हरि देवकी के गर्भ में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 3 (vishnu.5.2.3)

योगनिद्रा यशोदायास्तस्मिन्नेव ततो दिने । सम्भूता जठरे तदूदू यथोक्तं परमेष्ठिना

yoganidrā yaśodāyāstasminneva tato dine sambhūtā jaṭhare tadūdū yathoktaṁ parameṣṭhinā

उसी दिन योगनिद्रा भी परमेष्ठी भगवान् के कथनानुसार यशोदा के गर्भ में उत्पन्न हुई।

श्लोक 4 (vishnu.5.2.4)

ततो ग्रहगणाः सम्यक् प्रचचार दिवि द्रिज । विष्णोरंशे बुवं याते ऋतवश्वाभवन् शुभाः

tato grahagaṇāḥ samyak pracacāra divi drija viṣṇoraṁśe buvaṁ yāte ṛtavaśvābhavan śubhāḥ

हे द्विज! तब आकाश में ग्रहगण अनुकूल गति से विचरने लगे, और जब विष्णु का अंश पृथ्वी पर आ गया, तब ऋतुएँ भी शुभ हो गईं।

श्लोक 5 (vishnu.5.2.5)

न सेहे देवकी द्रष्टुं कश्विदप्यतितेजसा । जाज्वल्यमानां तां दृष्ट्वा मनांसि क्षोभमाययुः

na sehe devakī draṣṭuṁ kaśvidapyatitejasā jājvalyamānāṁ tāṁ dṛṣṭvā manāṁsi kṣobhamāyayuḥ

देवकी के अत्यंत तेज के कारण कोई भी उसे देख नहीं पाता था; उसे इस प्रकार जाज्वल्यमान देखकर सबके मन क्षुब्ध हो जाते थे।

श्लोक 6 (vishnu.5.2.6)

अदृष्टां पुरुषैः स्त्रीभिर्देवकीं देवतागणाः । विभ्राणां वपुषा विष्णुं तुष्टु वुस्तामहर्निशम्

adṛṣṭāṁ puruṣaiḥ strībhirdevakīṁ devatāgaṇāḥ vibhrāṇāṁ vapuṣā viṣṇuṁ tuṣṭu vustāmaharniśam

पुरुषों और स्त्रियों द्वारा भी अदृश्य देवकी, जो अपने शरीर में विष्णु को धारण किए हुई थीं, देवगणों द्वारा रात-दिन स्तुति की जाती रहीं।

श्लोक 7 (vishnu.5.2.7)

प्रकृतिस्त्व परा सुक्ष्मा ब्रह्मगर्भाभवः पुरा । ततो वाणी जगद्धातुर्व्वेदगर्भासि शोभने

prakṛtistva parā sukṣmā brahmagarbhābhavaḥ purā tato vāṇī jagaddhāturvvedagarbhāsi śobhane

'तुम ही परम सूक्ष्म प्रकृति हो, पूर्वकाल में तुम ब्रह्मा की गर्भ-स्वरूपा बनी थीं। हे शोभने! तुम जगत्-धाता की वाणी और वेदगर्भा हो।'

श्लोक 8 (vishnu.5.2.8)

सूर्य्यस्वरूपगर्भासि सृष्टिभूता सनातनि । बीजभूता तु सर्व्वस्य यज्ञभूताभवस्त्रयी

sūryyasvarūpagarbhāsi sṛṣṭibhūtā sanātani bījabhūtā tu sarvvasya yajñabhūtābhavastrayī

'तुम सूर्य-स्वरूप की गर्भ-स्वरूपा हो, हे सनातनी! तुम सृष्टि-स्वरूपा हो; तुम सबकी बीज-स्वरूपा हो और यज्ञ-स्वरूप त्रयी बनी हो।'

श्लोक 9 (vishnu.5.2.9)

फलगर्भा त्वमेवेज्या वह्निगर्भा तथारणिः । अदितिर्देवगर्भा त्वं दैत्यगर्भा तथा दितिः

phalagarbhā tvamevejyā vahnigarbhā tathāraṇiḥ aditirdevagarbhā tvaṁ daityagarbhā tathā ditiḥ

'तुम ही पूजनीया, फल की गर्भ-स्वरूपा हो; तुम अग्नि की गर्भ-स्वरूपा अरणि भी हो। तुम देवताओं की गर्भ-स्वरूपा अदिति हो और दैत्यों की गर्भ-स्वरूपा दिति भी हो।'

श्लोक 10 (vishnu.5.2.10)

ज्योतूस्त्रा वासरगर्भा त्वं ज्ञानगर्भासि सन्नतिः । नयगर्भा परा नीतिर्लज्जा त्वं प्रश्रयोदूहा

jyotūstrā vāsaragarbhā tvaṁ jñānagarbhāsi sannatiḥ nayagarbhā parā nītirlajjā tvaṁ praśrayodūhā

'तुम ज्योत्स्ना और दिन की गर्भ-स्वरूपा हो; तुम सन्नति (विनय) हो, ज्ञान की गर्भ-स्वरूपा; तुम नीति की गर्भ-स्वरूपा परा नीति हो; तुम लज्जा हो, विनय से उत्पन्न।'

श्लोक 11 (vishnu.5.2.11)

कामगर्भा तथेच्छा त्वं तुष्टिः सन्तोषगर्भिणी । मेधा च भोधगर्भासि धैर्य्यगर्भोदूहा धृतिः

kāmagarbhā tathecchā tvaṁ tuṣṭiḥ santoṣagarbhiṇī medhā ca bhodhagarbhāsi dhairyyagarbhodūhā dhṛtiḥ

'तुम इच्छा हो, काम की गर्भ-स्वरूपा; तुम तुष्टि हो, संतोष की गर्भ-स्वरूपा; तुम मेधा हो, बोध की गर्भ-स्वरूपा; तुम धृति हो, धैर्य से उत्पन्न।'

श्लोक 12 (vishnu.5.2.12)

ग्रहर्क्षतारकागर्भा द्यौरस्य खिलहैतुकी । एता विभूतयो देवि । तथान्याश्व सहस्त्रशः

graharkṣatārakāgarbhā dyaurasya khilahaitukī etā vibhūtayo devi | tathānyāśva sahastraśaḥ

'यह आकाश, जो इस समस्त सृष्टि का कारण है, ग्रह-नक्षत्र-तारों की गर्भ-स्वरूपा है। हे देवि! ये तुम्हारी विभूतियाँ हैं, और इनके अतिरिक्त सहस्रों अन्य भी हैं।'

श्लोक 13 (vishnu.5.2.13)

तथासङ्खया जगद्धात्रि । साम्प्रतं जठरे तव । समुद्राद्रि-द्रीप-वन-पत्तनभूषणा

tathāsaṅkhayā jagaddhātri | sāmprataṁ jaṭhare tava samudrādri-drīpa-vana-pattanabhūṣaṇā

'हे जगद्धात्री! असंख्य हैं तुम्हारी विभूतियाँ। अब तुम्हारे गर्भ में वे विराजमान हैं, जो समुद्रों, पर्वतों, द्वीपों, वनों और नगरों से अलंकृत हैं —'

श्लोक 14 (vishnu.5.2.14)

ग्राम-खर्व्वट-खैटाढया समस्ता पृथिवी शुभे । समस्तवह्नयोऽम्भांसि सकलाश्व समीरणाः

grāma-kharvvaṭa-khaiṭāḍhayā samastā pṛthivī śubhe samastavahnayo'mbhāṁsi sakalāśva samīraṇāḥ

'हे शुभे! समस्त ग्राम, खर्वट, खेट आदि से समृद्ध सम्पूर्ण पृथ्वी, समस्त अग्नियाँ, जल तथा सभी वायुएँ;'

श्लोक 15 (vishnu.5.2.15)

ग्रहर्क्षतारकाचित्रं विमानशतसङूकुलम् । अवकाशमशेषस्य यदूददातिनभःस्थलम्

graharkṣatārakācitraṁ vimānaśatasaṅūkulam avakāśamaśeṣasya yadūdadātinabhaḥsthalam

'ग्रह-नक्षत्र-तारों से विचित्र, सैकड़ों विमानों से भरा हुआ आकाश, जो समस्त सृष्टि को अवकाश प्रदान करता है;'

श्लोक 16 (vishnu.5.2.16)

भूर्लोकश्व भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महर्ज्जनः । तपश्व ब्रह्मलोकश्व ब्रह्माण्डमखिलं शुभे

bhūrlokaśva bhuvarlokaḥ svarloko'tha maharjjanaḥ tapaśva brahmalokaśva brahmāṇḍamakhilaṁ śubhe

'भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और ब्रह्मलोक — हे शुभे! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड;'

श्लोक 17 (vishnu.5.2.17)

तदन्तरे स्थिता देवा दैत्य-गन्धर्व्व-चारणाः । महोरगास्तथ यक्षा राक्षसाः प्रेतगुह्यकाः

tadantare sthitā devā daitya-gandharvva-cāraṇāḥ mahoragāstatha yakṣā rākṣasāḥ pretaguhyakāḥ

'और उसके भीतर स्थित देवता, दैत्य, गन्धर्व, चारण, महानाग, यक्ष, राक्षस, प्रेत और गुह्यक;'

श्लोक 18 (vishnu.5.2.18)

मनुष्याः पशवश्वान्ये ये ज जीवा यशस्विनि । तैरन्तः स्थैरनन्तोऽसौ सर्वेशः सर्व्वभावनः

manuṣyāḥ paśavaśvānye ye ja jīvā yaśasvini tairantaḥ sthairananto'sau sarveśaḥ sarvvabhāvanaḥ

'हे यशस्विनि! मनुष्य, पशु और अन्य जितने भी जीव हैं — इन सबको अपने भीतर धारण किए हुए वे अनन्त, सर्वेश्वर, सर्वभावन तुम्हारे गर्भ में हैं।'

श्लोक 19 (vishnu.5.2.19)

रूपकर्म्मखरूपाणि न परिच्छेदगोचरे । यस्याखिलप्रमाणानि सि विष्णुर्गर्भगस्तव

rūpakarmmakharūpāṇi na paricchedagocare yasyākhilapramāṇāni si viṣṇurgarbhagastava

'जिसके रूप और कर्म सीमा के परे हैं, जिसका सम्पूर्ण प्रमाण अगोचर है, वही विष्णु अब तुम्हारे गर्भ में स्थित है।'

श्लोक 20 (vishnu.5.2.20)

त्वं खाहा त्वं स्वधा विद्या सुधा त्वं ज्योतिरम्बरे । त्वं स्वाहा त्वं स्वधा विद्या सुधा त्वं ज्योतिरम्बरे । त्वं सर्व्वलोकरक्षार्थमवतीर्णा महीतले

tvaṁ khāhā tvaṁ svadhā vidyā sudhā tvaṁ jyotirambare tvaṁ svāhā tvaṁ svadhā vidyā sudhā tvaṁ jyotirambare tvaṁ sarvvalokarakṣārthamavatīrṇā mahītale

'तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा, विद्या और सुधा हो; तुम आकाश की ज्योति हो। तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा, विद्या और सुधा हो; तुम आकाश की ज्योति हो। तुम सम्पूर्ण लोकों की रक्षा के लिए पृथ्वीतल पर अवतीर्ण हुई हो।'

श्लोक 21 (vishnu.5.2.21)

प्रसीद देवि । सर्व्वस्य जगतः शं शुभे । कुरु । प्रीत्या त्वं धारयेशानं धृतं येनाखिलं जगत्

prasīda devi | sarvvasya jagataḥ śaṁ śubhe | kuru prītyā tvaṁ dhārayeśānaṁ dhṛtaṁ yenākhilaṁ jagat

'हे देवि! प्रसन्न होइए, हे शुभे! सम्पूर्ण जगत् का कल्याण कीजिए। जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया गया है, उन ईश्वर को प्रेमपूर्वक धारण कीजिए।'

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