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षष्ठांश · अध्याय 2

कलियुग के एकमात्र गुण पर व्यास का उपदेश

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (vishnu.6.2.1)

पराशर उवाच । व्यासश् चाह महाबुद्धिर् यदत्रैव हि वस्तुनि । तच् छ्रूयतां महाभाग गदतो मम तत्त्वतः

parāśara uvāca vyāsaś cāha mahābuddhir yad atraiva hi vastuni tac chrūyatāṁ mahābhāga gadato mama tattvataḥ

पराशर जी ने कहा — हे महाभाग! इसी विषय में महाबुद्धिमान व्यास जी ने जो कहा था, वह मुझसे यथार्थ रूप में कहते हुए सुनो।

श्लोक 2 (vishnu.6.2.2)

कस्मिन् कालेऽल्पको धर्मो ददाति सुमहत् फलम् । मुनीनामप्यभूद् वादः कैश् चासौ क्रियते सुखम्

kasmin kāle 'lpako dharmo dadāti sumahat phalam munīnām apy abhūd vādaḥ kaiś cāsau kriyate sukham

"किस काल में थोड़ा-सा भी धर्म अत्यंत महान फल देता है?" — यह प्रश्न ऋषियों के बीच भी विवाद का विषय बना था; "और वह सुखपूर्वक किनके द्वारा साधा जाता है?"

श्लोक 3 (vishnu.6.2.3)

संदेहनिर्णयार्थाय वेदव्यासं महामुनिम् । ययुस् ते संशयं प्रष्टुं मैत्रेय मुनिपुंगवाः

saṁdehanirṇayārthāya vedavyāsaṁ mahāmunim yayus te saṁśayaṁ praṣṭuṁ maitreya munipuṁgavāḥ

हे मैत्रेय! इस संशय के निर्णय के लिए वे श्रेष्ठ मुनि अपनी शंका पूछने महामुनि वेदव्यास के पास गए।

श्लोक 4 (vishnu.6.2.4)

ददृशुस् ते मुनिं तत्र जाह्नवीसलिले द्विज । वेदव्यासं महाभागमर्धस्नातं सुतं मम

dadṛśus te muniṁ tatra jāhnavīsalile dvija vedavyāsaṁ mahābhāgam ardhasnātaṁ sutaṁ mama

हे द्विज! वहाँ उन्होंने मेरे पुत्र, महाभाग्यशाली मुनि वेदव्यास को गंगा के जल में आधा स्नान किए हुए देखा।

श्लोक 5 (vishnu.6.2.5)

स्नानावसानं ते तस्य प्रतीक्षन्तो महर्षयः । तस्थुस् तटे महानद्यास् तरुषण्डमुपाश्रिताः

snānāvasānaṁ te tasya pratīkṣanto maharṣayaḥ tasthus taṭe mahānadyās taruṣaṇḍam upāśritāḥ

उसके स्नान के समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हुए वे महर्षि उस महानदी के तट पर वृक्षों के झुरमुट में जा बैठे।

श्लोक 6 (vishnu.6.2.6)

मग्नोऽथ जाह्नवीतोयादुत्थायाह सुतो मम । व्यासः साधुः कलिः साधुरित्येवं शृण्वतां वचः । तेषां मुनीनां भूयश् च ममज्ज स नदीजले

magno 'tha jāhnavītoyād utthāyāha suto mama vyāsaḥ sādhuḥ kaliḥ sādhur ity evaṁ śṛṇvatāṁ vacaḥ teṣāṁ munīnāṁ bhūyaś ca mamajja sa nadījale

तब गंगा के जल से ऊपर उठकर मेरे पुत्र व्यास ने उन मुनियों के सुनते हुए कहा — "कलियुग साधु है! कलियुग साधु है!" — और यह कहकर वे पुनः नदी के जल में डूब गए।

श्लोक 7 (vishnu.6.2.7)

उत्थाय साधु साध्विति शूद्र धन्योऽसि चाब्रवीत्

utthāya sādhu sādhv iti śūdra dhanyo 'si cābravīt

फिर ऊपर उठकर उन्होंने कहा — "साधु, साधु! हे शूद्र, तुम धन्य हो!"

श्लोक 8 (vishnu.6.2.8)

निमग्नश् च समुत्थाय पुनः प्राह महामुनिः । योषितः साधु धन्यास् तास् ताभ्यो धन्यतरोऽस्ति कः

nimagnaś ca samutthāya punaḥ prāha mahāmuniḥ yoṣitaḥ sādhu dhanyās tās tābhyo dhanyataro 'sti kaḥ

फिर डूबकर पुनः ऊपर उठे और महामुनि ने कहा — "स्त्रियाँ साधु हैं, वे धन्य हैं; उनसे अधिक धन्य और कौन है?"

श्लोक 9 (vishnu.6.2.9)

ततः स्नात्वा यथान्यायमाचान्तं तं कृतक्रियम् । उपतस्थुर् महाभागा मुनयस् ते सुतं मम

tataḥ snātvā yathānyāyam ācāntaṁ taṁ kṛtakriyam upatasthur mahābhāgā munayas te sutaṁ mama

तत्पश्चात् विधिवत् स्नान कर, आचमन कर तथा अपनी क्रियाएँ पूर्ण कर लेने पर, वे महाभाग्यशाली मुनि मेरे पुत्र के समीप आए।

श्लोक 10 (vishnu.6.2.10)

कृतसंवन्दनांश् चाह कृतासनपरिग्रहान् । किमर्थमागता यूयमिति सत्यवतीसुतः

kṛtasaṁvandanāṁś cāha kṛtāsanaparigrahān kimartham āgatā yūyam iti satyavatīsutaḥ

जब उन्होंने प्रणाम कर आसन ग्रहण कर लिया, तब सत्यवती-पुत्र (व्यास) ने उनसे पूछा — "आप किस प्रयोजन से आए हैं?"

श्लोक 11 (vishnu.6.2.11)

तमूचुः संशयं प्रष्टुं भवन्तं वयमागताः । अलं तेनास्तु तावन् नः कथ्यतामपरं त्वया

tam ūcuḥ saṁśayaṁ praṣṭuṁ bhavantaṁ vayam āgatāḥ alaṁ tenāstu tāvan naḥ kathyatām aparaṁ tvayā

उन्होंने उससे कहा — "हम अपना एक संशय पूछने आए हैं; किन्तु अभी उसे रहने दीजिए, पहले आप हमें कुछ और बताइए।"

श्लोक 12 (vishnu.6.2.12)

कलिः साध्विति यत् प्रोक्तं शूद्रः साध्विति योषितः । यच् चाह भगवान् साधु धन्याश् चेति पुनः पुनः

kaliḥ sādhv iti yat proktaṁ śūdraḥ sādhv iti yoṣitaḥ yac cāha bhagavān sādhu dhanyāś ceti punaḥ punaḥ

"आपने जो कहा कि 'कलियुग साधु है', 'शूद्र साधु है', और हे भगवन्! आपने जो बार-बार कहा कि 'स्त्रियाँ साधु हैं, वे धन्य हैं' —"

श्लोक 13 (vishnu.6.2.13)

तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामो न चेद् गुह्यं महामुने । तत् कथ्यतां ततो हृत्स्थं पृच्छामस् त्वां प्रयोजनम्

tat sarvaṁ śrotum icchāmo na ced guhyaṁ mahāmune tat kathyatāṁ tato hṛtsthaṁ pṛcchāmas tvāṁ prayojanam

— हे महामुने! यदि यह गुह्य न हो तो हम वह सब सुनना चाहते हैं। पहले वह बताइए, फिर हम आपसे अपने हृदय में रहे उस प्रयोजन को पूछेंगे।"

श्लोक 14 (vishnu.6.2.14)

इत्युक्तो मुनिभिर् व्यासः प्रहस्येदमथाब्रवीत् । श्रूयतां भो मुनिश्रेष्ठा यदुक्तं साधु साध्विति

ity ukto munibhir vyāsaḥ prahasyedam athābravīt śrūyatāṁ bho muniśreṣṭhā yad uktaṁ sādhu sādhv iti

मुनियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर व्यास जी मुस्कुराए और बोले — "हे मुनिश्रेष्ठो! जो मैंने 'साधु, साधु' कहा था, उसे सुनो।

श्लोक 15 (vishnu.6.2.15)

यत् कृते दशभिर् वर्षैस् त्रेतायां हायनेन तत् । द्वापरे तच् च मासेन अहोरात्रेण तत् कलौ

yat kṛte daśabhir varṣais tretāyāṁ hāyanena tat dvāpare tac ca māsena ahorātreṇa tat kalau

जो फल कृतयुग में दस वर्षों में, त्रेता में एक वर्ष में, द्वापर में एक मास में प्राप्त होता है, वही फल कलियुग में एक ही दिन-रात में प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 16 (vishnu.6.2.16)

तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश् च फलं द्विजाः । प्राप्नोति पुरुषस् तेन कलिः साध्विति भाषितम्

tapaso brahmacaryasya japādeś ca phalaṁ dvijāḥ prāpnoti puruṣas tena kaliḥ sādhv iti bhāṣitam

हे द्विजो! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदि का फल इतनी शीघ्रता से प्राप्त कर लेता है — इसीलिए मैंने कहा 'कलियुग साधु है'।

श्लोक 17 (vishnu.6.2.17)

ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस् त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्

dhyāyan kṛte yajan yajñais tretāyāṁ dvāpare 'rcayan yad āpnoti tad āpnoti kalau saṁkīrtya keśavam

कृतयुग में ध्यान करने से, त्रेता में यज्ञों द्वारा यजन करने से, द्वापर में अर्चना करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल कलियुग में केवल केशव का संकीर्तन करने से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 18 (vishnu.6.2.18)

धर्मोत्कर्षमतीवात्र प्राप्नोति पुरुषः कलौ । स्वल्पायासेन धर्मज्ञास् तेन तुष्टोऽस्म्यहं कलेः

dharmotkarṣam atīvātra prāpnoti puruṣaḥ kalau svalpāyāsena dharmajñās tena tuṣṭo 'smy ahaṁ kaleḥ

हे धर्मज्ञो! इस कलियुग में मनुष्य अत्यल्प परिश्रम से ही धर्म की चरम उन्नति प्राप्त कर लेता है — इसीलिए मैं कलियुग से संतुष्ट हूँ।

श्लोक 19 (vishnu.6.2.19)

व्रतचर्योपहारैश् च ग्राह्यो वेदो द्विजातिभिः । ततः स्वधर्मसंप्राप्तैर् यष्टव्यं विधिवद् धनैः

vratacaryopahāraiś ca grāhyo vedo dvijātibhiḥ tataḥ svadharmasaṁprāptair yaṣṭavyaṁ vidhivad dhanaiḥ

द्विजों को व्रताचरण और उपहार देकर वेद ग्रहण करना चाहिए; फिर स्वधर्मानुसार प्राप्त धन से विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिए।

श्लोक 20 (vishnu.6.2.20)

वृथा कथा वृथा भोज्यं वृथेज्या च द्विजन्मनाम् । पतनाय तथा भाव्यं तैस् तु संयमिभिः सदा

vṛthā kathā vṛthā bhojyaṁ vṛthejyā ca dvijanmanām patanāya tathā bhāvyaṁ tais tu saṁyamibhiḥ sadā

द्विजों के लिए व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजन और व्यर्थ पूजा — ये पतन के कारण बनते हैं; अतः उन्हें सदैव संयमी रहना चाहिए।

श्लोक 21 (vishnu.6.2.21)

असम्यक्करणे दोषस् तेषां सर्वेषु वस्तुषु । भोज्यपेयादिकं चैषां नेच्छाप्राप्तिकरं द्विजाः

asamyakkaraṇe doṣas teṣāṁ sarveṣu vastuṣu bhojyapeyādikaṁ caiṣāṁ necchāprāptikaraṁ dvijāḥ

हे द्विजो! उन द्विजों के लिए सभी वस्तुओं का असम्यक् प्रकार से ग्रहण दोषपूर्ण है, और उनके भोजन, पेय आदि की प्राप्ति इच्छानुसार नहीं होनी चाहिए।

श्लोक 22 (vishnu.6.2.22)

पारतन्त्र्यं समस्तेषु तेषां कार्येषु वै ततः । जयन्ति ते निजांल् लोकान् क्लेशेन महता द्विजाः

pāratantryaṁ samasteṣu teṣāṁ kāryeṣu vai tataḥ jayanti te nijāṁl lokān kleśena mahatā dvijāḥ

इसलिए उनके सभी कार्यों में पराधीनता बनी रहती है, हे द्विजो! वे केवल महान कष्ट सहकर ही अपने लोकों को जीतते हैं।

श्लोक 23 (vishnu.6.2.23)

द्विजशुश्रूषयैवैष पाकयज्ञाधिकारवान् । निजाञ् जयति वै लोकाञ् शूद्रो धन्यतरस् ततः

dvijaśuśrūṣayaivaiṣa pākayajñādhikāravān nijāñ jayati vai lokāñ śūdro dhanyataras tataḥ

शूद्र, जिसे केवल पाकयज्ञ (गृह्य यज्ञ) का ही अधिकार है, केवल द्विजों की सेवा मात्र से ही अपने लोकों को जीत लेता है — इसीलिए वह उनसे अधिक धन्य है।

श्लोक 24 (vishnu.6.2.24)

भक्ष्याभक्ष्येषु नास्यास्ति पेयापेयेषु वै यतः । नियमो मुनिशार्दूलास् तेनासौ साध्वितीरितम्

bhakṣyābhakṣyeṣu nāsyāsti peyāpeyeṣu vai yataḥ niyamo muniśārdūlās tenāsau sādhv itīritam

हे मुनिश्रेष्ठो! क्योंकि उसके लिए भक्ष्य-अभक्ष्य और पेय-अपेय का कोई नियम नहीं है, इसीलिए उसे 'साधु' कहा गया।

श्लोक 25 (vishnu.6.2.25)

स्वधर्मस्याविरोधेन नरैर् लब्धं धनं सदा । प्रतिपाद्यं च पात्रेषु यष्टव्यं च यथाविधि

svadharmasyāvirodhena narair labdhaṁ dhanaṁ sadā pratipādyaṁ ca pātreṣu yaṣṭavyaṁ ca yathāvidhi

स्वधर्म का उल्लंघन किए बिना मनुष्यों द्वारा प्राप्त धन को सदा सुपात्रों को देना चाहिए, और विधिपूर्वक उससे यज्ञ करना चाहिए।

श्लोक 26 (vishnu.6.2.26)

तस्यार्जने महान् क्लेशः पालने च द्विजोत्तमाः । तथासद्विनियोगाय विज्ञेयं गहनं नृणाम्

tasyārjane mahān kleśaḥ pālane ca dvijottamāḥ tathāsadviniyogāya vijñeyaṁ gahanaṁ nṛṇām

हे द्विजोत्तमो! उस धन को कमाने में और उसकी रक्षा करने में बड़ा कष्ट है, तथा उसके दुरुपयोग होने पर मनुष्यों की उलझन गहन जाननी चाहिए।

श्लोक 27 (vishnu.6.2.27)

एभिरन्यैस् तथा क्लेशैः पुरुषो द्विजसत्तमाः । निजाञ् जयति वै लोकान् प्राजापत्यादिकान् क्रमात्

ebhir anyais tathā kleśaiḥ puruṣo dvijasattamāḥ nijāñ jayati vai lokān prājāpatyādikān kramāt

हे द्विजसत्तमो! इन तथा अन्य ऐसे ही कष्टों को सहकर मनुष्य क्रमशः प्राजापत्य आदि अपने लोकों को जीतता है।

श्लोक 28 (vishnu.6.2.28)

योषिच् छुश्रूषणं भर्तुः कर्मणा मनसा गिरा । कुर्वती समवाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजाः

yoṣic chuśrūṣaṇaṁ bhartuḥ karmaṇā manasā girā kurvatī samavāpnoti tatsālokyaṁ yato dvijāḥ

हे द्विजो! जो स्त्री अपने पति की सेवा कर्म, मन और वाणी से करती है, वह उसी के लोक में निवास प्राप्त कर लेती है —

श्लोक 29 (vishnu.6.2.29)

नातिक्लेशेन महता तानेव पुरुषो यथा । तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषिताम्

nātikleśena mahatā tān eva puruṣo yathā tṛtīyaṁ vyāhṛtaṁ tena mayā sādhv iti yoṣitām

— बिना उस बड़े कष्ट के, जिससे पुरुष उन्हीं लोकों को प्राप्त करता है। इसीलिए मैंने स्त्रियों के विषय में तीसरी बार 'साधु' कहा था।

श्लोक 30 (vishnu.6.2.30)

एतद् वः कथितं विप्रा यन्निमित्तमिहागताः । तत् पृच्छत यथाकामं अहं वक्ष्यामि वः स्फुटम्

etad vaḥ kathitaṁ viprā yannimittam ihāgatāḥ tat pṛcchata yathākāmaṁ ahaṁ vakṣyāmi vaḥ sphuṭam

हे विप्रो! यह मैंने आपको बता दिया; अब आप जिस प्रयोजन से यहाँ आए थे, वह इच्छानुसार पूछिए — मैं आपको स्पष्ट रूप से बताऊँगा।

श्लोक 31 (vishnu.6.2.31)

पराशर उवाच । ततस् ते मुनयः प्रोचुर् यत् प्रष्टव्यं महामुने । अन्यस्मिन्नेव तत् प्रश्ने यथावत् कथितं त्वया

parāśara uvāca tatas te munayaḥ procur yat praṣṭavyaṁ mahāmune anyasminn eva tat praśne yathāvat kathitaṁ tvayā

पराशर जी ने कहा — तब उन मुनियों ने कहा — "हे महामुने! जो हमें पूछना था, वह आपने एक भिन्न प्रश्न के उत्तर में ही यथावत् कह दिया।"

श्लोक 32 (vishnu.6.2.32)

ततः प्रहस्य तान् प्राह कृष्णद्वैपायनो मुनिः । विस्मयोत्फुल्लनयनांस् तापसांस् तानुपागतान्

tataḥ prahasya tān prāha kṛṣṇadvaipāyano muniḥ vismayotphullanayanāṁs tāpasāṁs tān upāgatān

तब कृष्णद्वैपायन मुनि ने मुस्कुराते हुए, आश्चर्य से चकित नेत्रों वाले उन तापसों से, जो उनके पास आए थे, कहा।

श्लोक 33 (vishnu.6.2.33)

मयैष भवतां प्रश्नो ज्ञातो दिव्येन चक्षुषा । ततो हि वः प्रसङ्गेन साधु साध्विति भाषितम्

mayaiṣa bhavatāṁ praśno jñāto divyena cakṣuṣā tato hi vaḥ prasaṅgena sādhu sādhv iti bhāṣitam

"मैंने अपने दिव्य नेत्र से आपके इस प्रश्न को पहले ही जान लिया था; इसीलिए मैंने उसी प्रसंग में 'साधु, साधु' कहा था।

श्लोक 34 (vishnu.6.2.34)

स्वल्पेन हि प्रयत्नेन धर्मः सिध्यति वै कलौ । नरैरात्मगुणाम्भोभिः क्षालिताखिलकिल्बिषैः

svalpena hi prayatnena dharmaḥ sidhyati vai kalau narair ātmaguṇāmbhobhiḥ kṣālitākhilakilbiṣaiḥ

क्योंकि कलियुग में मनुष्य अत्यल्प प्रयास से ही धर्म सिद्ध कर लेते हैं, अपने ही गुणों के जल से अपने समस्त पापों को धोकर।

श्लोक 35 (vishnu.6.2.35)

शूद्रैश् च द्विजशुश्रूषातत्परैर् मुनिसत्तमाः । तथा स्त्रीभिरनायासात् पतिशुश्रूषयैव हि

śūdraiś ca dvijaśuśrūṣātatparair munisattamāḥ tathā strībhir anāyāsāt patiśuśrūṣayaiva hi

हे मुनिसत्तमो! तथा द्विजों की सेवा में तत्पर शूद्रों द्वारा, और उसी प्रकार बिना किसी परिश्रम के केवल पति-सेवा के द्वारा स्त्रियों द्वारा भी।

श्लोक 36 (vishnu.6.2.36)

ततस् त्रितयमप्येतन् मम धन्यतमं मतम् । धर्मसंसाधने क्लेशो द्विजातीनां कृतादिषु

tatas tritayam apy etan mama dhanyatamaṁ matam dharmasaṁsādhane kleśo dvijātīnāṁ kṛtādiṣu

इसलिए ये तीनों मेरे मत में सर्वाधिक धन्य हैं — जबकि द्विजों के लिए कृतयुग आदि में धर्म-साधन कष्टसाध्य है।

श्लोक 37 (vishnu.6.2.37)

भवद्भिर् यदभिप्रेतं तदेतत् कथितं मया । अपृष्टेनापि धर्मज्ञाः किमन्यत् क्रियतां द्विजाः

bhavadbhir yad abhipretaṁ tad etat kathitaṁ mayā apṛṣṭenāpi dharmajñāḥ kim anyat kriyatāṁ dvijāḥ

"जो आपके मन में था, वह मैंने आपको बता दिया, हे धर्मज्ञो! बिना पूछे ही। हे द्विजो! अब मुझे और क्या करना चाहिए?"

श्लोक 38 (vishnu.6.2.38)

पराशर उवाच । ततः संपूज्य ते व्यासं प्रशशंसुः पुनः पुनः । यथागतं द्विजा जग्मुर् व्यासोक्तिक्षतसंशयाः

parāśara uvāca tataḥ saṁpūjya te vyāsaṁ praśaśaṁsuḥ punaḥ punaḥ yathāgataṁ dvijā jagmur vyāsoktikṣatasaṁśayāḥ

पराशर जी ने कहा — तब व्यास जी का पूजन कर और बार-बार उनकी प्रशंसा कर, वे द्विज, जिनके संशय व्यास जी के वचनों से नष्ट हो गए थे, जिस मार्ग से आए थे उसी मार्ग से लौट गए।

श्लोक 39 (vishnu.6.2.39)

भवतोऽपि महाभाग रहस्यं कथितं मया । अत्यन्तदुष्टस्य कलेरयमेको महान् गुणः

bhavato 'pi mahābhāga rahasyaṁ kathitaṁ mayā atyantaduṣṭasya kaler ayam eko mahān guṇaḥ

हे महाभाग! आपको भी मैंने यह रहस्य बता दिया — कि अत्यंत दुष्ट कलियुग का यही एक महान गुण है।

श्लोक 40 (vishnu.6.2.40)

यच् चाहं भवता पृष्टो जगतामुपसंहृतिम् । प्राकृतामन्तरालां च तामप्येष वदामि ते

yac cāhaṁ bhavatā pṛṣṭo jagatām upasaṁhṛtim prākṛtām antarālāṁ ca tām apy eṣa vadāmi te

और आपने मुझसे लोकों के उपसंहार के विषय में जो पूछा था — प्राकृत प्रलय और मध्यवर्ती (नैमित्तिक) प्रलय के विषय में — वह भी अब मैं आपसे कहता हूँ।

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