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अरण्यकाण्ड · सर्ग 23

अपशकुन

सर्ग 22सर्ग-सूचीसर्ग 24

श्लोक 1 (aranya.23.1)

तत् प्रयातम् बलम् घोरम् अशिवम् शोणित उदकम् | अभ्यवर्षत् महा मेघः तुमुलो गर्दभ अरुणः ॥ 3.23.1 ॥

tat prayātam balam ghoram aśivam śoṇita udakam | abhyavarṣat mahā meghaḥ tumulo gardabha aruṇaḥ || 23.1 ||

जब वह भयंकर सेना कूच कर रही थी, तब गधे के रंग जैसा एक तुमुल मेघ अशुभ रक्त-वर्ण जल की वर्षा करने लगा।

श्लोक 2 (aranya.23.2)

निपेतुः तुरगाः तस्य रथ युक्ता महाजवाः | समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छ्हया ॥ 3.23.2 ॥

nipetuḥ turagāḥ tasya ratha yuktā mahājavāḥ | same puṣpacite deśe rājamārge yadṛcchhayā || 23.2 ||

उसके रथ में जुते हुए अत्यंत वेगवान घोड़े समतल, फूलों से बिछे राजमार्ग पर भी अकारण ही लड़खड़ाकर गिर पड़े।

श्लोक 3 (aranya.23.3)

श्यामम् रुधिर पर्यन्तम् बभूव परिवेषणम् | अलात चक्र प्रतिमम् प्रतिगृह्य दिवाकरम् ॥ 3.23.3 ॥

śyāmam rudhira paryantam babhūva pariveṣaṇam | alāta cakra pratimam pratigṛhya divākaram || 23.3 ||

सूर्य के चारों ओर एक काला मंडल बन गया, जिसकी परिधि रक्तवर्ण थी, मानो घुमाई गई जलती लकड़ी के चक्र ने सूर्य को घेर लिया हो।

श्लोक 4 (aranya.23.4)

ततो ध्वजम् उपागम्य हेम दण्डम् समुच्छ्ह्रितम् | समाक्रम्य महाकायः तस्थौ गृध्रः सुदारुणः ॥ 3.23.4 ॥

tato dhvajam upāgamya hema daṇḍam samucchhritam | samākramya mahākāyaḥ tasthau gṛdhraḥ sudāruṇaḥ || 23.4 ||

तत्पश्चात् एक विशालकाय, भयंकर गिद्ध उसकी ऊँची स्वर्ण-दंडवाली ध्वजा पर आकर बैठ गया।

श्लोक 5 (aranya.23.5)

जनस्थान समीपे च समाक्रम्य खर स्वनाः | विस्वरान् विविधान् च चक्रुः मांस आदा मृग पक्षिणः ॥ 3.23.5 ॥

janasthāna samīpe ca samākramya khara svanāḥ | visvarān vividhān ca cakruḥ māṃsa ādā mṛga pakṣiṇaḥ || 23.5 ||

जनस्थान के निकट कर्कश स्वर वाले मांसभक्षी पशु-पक्षी एकत्र होकर विविध प्रकार की बेसुरी चीत्कारें करने लगे।

श्लोक 6 (aranya.23.6)

व्याजह्रुः च पदीप्तायाम् दिशि वै भैरव स्वनम् | अशिवा यातुधानानाम् शिवा घोरा महास्वनाः ॥ 3.23.6 ॥

vyājahruḥ ca padīptāyām diśi vai bhairava svanam | aśivā yātudhānānām śivā ghorā mahāsvanāḥ || 23.6 ||

और प्रज्वलित दिशा की ओर मुख करके, राक्षसों के लिए अशुभ शृगालियाँ भयंकर एवं महाध्वनि करती हुई डरावना स्वर निकालने लगीं।

श्लोक 7 (aranya.23.7)

प्रभिन्नगजसंकाशतोयशोणितधारिणः | आकाशम् तत् अनाकाशम् चक्रुः भीम अंबु वाहकाः ॥ 3.23.7 ॥

prabhinnagajasaṃkāśatoyaśoṇitadhāriṇaḥ | ākāśam tat anākāśam cakruḥ bhīma aṃbu vāhakāḥ || 23.7 ||

मदमत्त हाथियों के समान दिखने वाले, रक्तवर्ण जल धारण किए भयंकर मेघों ने आकाश को मानो आकाशरहित कर दिया।

श्लोक 8 (aranya.23.8)

बभूव तिमिरम् घोरम् उद्धतम् रोम हर्षणम् | दिशो वा प्रदिशो वा अपि सुव्यक्तम् न चकाशिरे ॥ 3.23.8 ॥

babhūva timiram ghoram uddhatam roma harṣaṇam | diśo vā pradiśo vā api suvyaktam na cakāśire || 23.8 ||

एक भयंकर, प्रचंड, रोमांचकारी अंधकार छा गया, जिससे न दिशाएँ और न ही उपदिशाएँ स्पष्ट दिखाई दे रही थीं।

श्लोक 9 (aranya.23.9)

क्षतज आर्द्र सवर्णाभा संध्या कालम् विना बभौ | खरम् च अभिमुखम् नेदुः तदा घोरा मृगाः खगाः ॥ 3.23.9 ॥

kṣataja ārdra savarṇābhā saṃdhyā kālam vinā babhau | kharam ca abhimukham neduḥ tadā ghorā mṛgāḥ khagāḥ || 23.9 ||

बिना समय के ही एक संध्या ताजे रक्त के समान रंग लिए हुए चमक उठी, और तभी भयंकर पशु-पक्षी खर के सम्मुख होकर चीत्कार करने लगे।

श्लोक 10 (aranya.23.10)

कंक गोमायु गृध्राः च चुक्रुशुः भय संशिनः | नित्या अशिव करा युद्धे शिवा घोर निदर्शनाः ॥ 3.23.10 ॥

kaṃka gomāyu gṛdhrāḥ ca cukruśuḥ bhaya saṃśinaḥ | nityā aśiva karā yuddhe śivā ghora nidarśanāḥ || 23.10 ||

बाज़, गीदड़ और गिद्ध भय-सूचक चीत्कार करने लगे; और युद्ध में सदैव अशुभ का संकेत देने वाली, भयंकर लक्षणों से युक्त शृगालियाँ...

श्लोक 11 (aranya.23.11)

नेदुः बलस्य अभिमुखम् ज्वाल उद्गारिभिः आननैः | कबन्धः परिघ आभासो दृश्यते भास्कर अंतिके ॥ 3.23.11 ॥

neduḥ balasya abhimukham jvāla udgāribhiḥ ānanaiḥ | kabandhaḥ parigha ābhāso dṛśyate bhāskara aṃtike || 23.11 ||

...अपने मुखों से ज्वाला उगलती हुई सेना के सम्मुख गरजने लगीं; और सूर्य के निकट परिघ के समान एक कबंध (धड़) दिखाई देने लगा।

श्लोक 12 (aranya.23.12)

जग्राह सूर्यम् स्वर्भानुः अपर्वणि महाग्रहः | प्रवाति मारुतः शीघ्रम् निष्प्रभो अभूत् दिवाकरः ॥ 3.23.12 ॥

jagrāha sūryam svarbhānuḥ aparvaṇi mahāgrahaḥ | pravāti mārutaḥ śīghram niṣprabho abhūt divākaraḥ || 23.12 ||

पर्व-काल न होते हुए भी महाग्रह राहु ने सूर्य को ग्रस लिया; वायु तीव्र वेग से बहने लगी, और सूर्य निस्तेज हो गया।

श्लोक 13 (aranya.23.13)

उत्पेतुः च विना रात्रिम् ताराः खद्योतन प्रभाः | संलीन मीन विहगा नलिन्यः शुष्क पंकजाः ॥ 3.23.13 ॥

utpetuḥ ca vinā rātrim tārāḥ khadyotana prabhāḥ | saṃlīna mīna vihagā nalinyaḥ śuṣka paṃkajāḥ || 23.13 ||

बिना रात्रि के ही जुगनुओं के समान चमकते तारे उदित हो गए; मछलियाँ और जलपक्षी छिपकर स्थिर हो गए, और सरोवरों के कमल मुरझा गए।

श्लोक 14 (aranya.23.14)

तस्मिन् क्षणे बभूवुः च विना पुष्प फलैः द्रुमाः | उद्धूतः च विना वातम् रेणुः जलधर अरुणः ॥ 3.23.14 ॥

tasmin kṣaṇe babhūvuḥ ca vinā puṣpa phalaiḥ drumāḥ | uddhūtaḥ ca vinā vātam reṇuḥ jaladhara aruṇaḥ || 23.14 ||

उस क्षण वृक्ष बिना फूल और फल के हो गए, और बिना वायु के ही मेघ के समान लाल धूल उड़ने लगी।

श्लोक 15 (aranya.23.15)

चीची कूचि इति वाश्यन्तो बभूवुः तत्र सारिकाः | उल्काः च अपि स निर्घोषा निपेतुः घोर दर्शनाः ॥ 3.23.15 ॥

cīcī kūci iti vāśyanto babhūvuḥ tatra sārikāḥ | ulkāḥ ca api sa nirghoṣā nipetuḥ ghora darśanāḥ || 23.15 ||

वहाँ मैना पक्षी “ची-ची, कू-चि” की पुकार करने लगीं; और भयानक दिखने वाले उल्कापिंड गड़गड़ाहट के साथ गिरने लगे।

श्लोक 16 (aranya.23.16)

प्रचचाल मही च अपि स शैल वन कानना | खरस्य च रथस्थस्य नर्दमानस्य धीमतः ॥ 3.23.16 ॥

pracacāla mahī ca api sa śaila vana kānanā | kharasya ca rathasthasya nardamānasya dhīmataḥ || 23.16 ||

पृथ्वी अपने पर्वतों, वनों और कानन-वृक्षों सहित काँप उठी। और रथ पर बैठे, गरजते हुए बुद्धिमान खर के...

श्लोक 17 (aranya.23.17)

प्राकंपत भुजः सव्यः स्वरः च अस्य अवसज्जत | स अस्रा संपद्यते दृष्टिः पश्यमानस्य सर्वतः ॥ 3.23.17 ॥

prākaṃpata bhujaḥ savyaḥ svaraḥ ca asya avasajjata | sa asrā saṃpadyate dṛṣṭiḥ paśyamānasya sarvataḥ || 23.17 ||

...बायाँ भुजा फड़कने लगी, और उसका स्वर अवरुद्ध हो गया; तथा चारों ओर देखते हुए उसकी आँखों में आँसू भर आए।

श्लोक 18 (aranya.23.18)

ललाटे च रुजो जाता न च मोहात् न्यवर्तत | तान् समीक्ष्य महोत्पातान् उत्थितान् रोम हर्षणान् ॥ 3.23.18 ॥

lalāṭe ca rujo jātā na ca mohāt nyavartata | tān samīkṣya mahotpātān utthitān roma harṣaṇān || 23.18 ||

उसके ललाट में पीड़ा उत्पन्न हुई, फिर भी मोहवश वह लौटा नहीं। उन रोंगटे खड़े कर देने वाले महाउत्पातों को देखकर...

श्लोक 19 (aranya.23.19)

अब्रवीत् राक्षसान् सर्वान् प्रहसन् स खरः तदा | महा उत्पातान् इमान् सर्वान् उत्थितान् घोर दर्शनान् ॥ 3.23.19 ॥

abravīt rākṣasān sarvān prahasan sa kharaḥ tadā | mahā utpātān imān sarvān utthitān ghora darśanān || 23.19 ||

...खर तब हँसते हुए समस्त राक्षसों से बोला - “ये सब भयानक दिखने वाले महाउत्पात जो उत्पन्न हुए हैं...

श्लोक 20 (aranya.23.20)

न चिंतयामि अहम् वीर्यात् बलवान् दुर्बलान् इव | तारा अपि शरैः तीक्ष्णैः पातयेयम् नभः तलात् ॥ 3.23.20 ॥

na ciṃtayāmi aham vīryāt balavān durbalān iva | tārā api śaraiḥ tīkṣṇaiḥ pātayeyam nabhaḥ talāt || 23.20 ||

...इनकी मुझे कोई चिंता नहीं, जैसे बलवान को दुर्बलों की चिंता नहीं होती। मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से आकाश से तारों को भी गिरा सकता हूँ।

श्लोक 21 (aranya.23.21)

मृत्युम् मरण धर्मेण संक्रुद्धो योजयामि अहम् | राघवम् तम् बल उत्सिक्तम् भ्रातरम् च अस्य लक्ष्मणम् ॥ 3.23.21 ॥

mṛtyum maraṇa dharmeṇa saṃkruddho yojayāmi aham | rāghavam tam bala utsiktam bhrātaram ca asya lakṣmaṇam || 23.21 ||

यदि मैं क्रुद्ध हो जाऊँ तो मृत्यु को भी मृत्युधर्म से युक्त कर सकता हूँ। अपने बल के मद में डूबे उस राघव और उसके भाई लक्ष्मण को...

श्लोक 22 (aranya.23.22)

अहत्वा सायकैः तीक्ष्णैः न उपावर्तितुम् उत्सहे | यन् निमित्तम् तु रामस्य लक्ष्मणस्य विपर्ययः ॥ 3.23.22 ॥

ahatvā sāyakaiḥ tīkṣṇaiḥ na upāvartitum utsahe | yan nimittam tu rāmasya lakṣmaṇasya viparyayaḥ || 23.22 ||

...अपने तीक्ष्ण बाणों से मारे बिना मैं लौटना नहीं चाहता। और जिसके कारण राम और लक्ष्मण का यह विनाश होने जा रहा है...

श्लोक 23 (aranya.23.23)

सकामा भगिनी मे अस्तु पीत्वा तु रुधिरम् तयोः | न क्वचित् प्राप्त पूर्वो मे संयुगेषु पराजयः ॥ 3.23.23 ॥

sakāmā bhaginī me astu pītvā tu rudhiram tayoḥ | na kvacit prāpta pūrvo me saṃyugeṣu parājayaḥ || 23.23 ||

...वह मेरी बहन उन दोनों का रक्त पीकर अपनी इच्छा पूर्ण करे। मुझे युद्धों में कभी भी, कहीं भी पराजय प्राप्त नहीं हुई...

श्लोक 24 (aranya.23.24)

युष्माकम् एतत् प्रत्यक्षम् न अनृतम् कथयामि अहम् | देव राजम् अपि क्रुद्धो मत्त ऐरावत गामिनम् ॥ 3.23.24 ॥

yuṣmākam etat pratyakṣam na anṛtam kathayāmi aham | deva rājam api kruddho matta airāvata gāminam || 23.24 ||

...यह तुम सबने स्वयं देखा है; मैं झूठ नहीं कहता। मदमत्त ऐरावत पर सवार देवराज इंद्र को भी, यदि मैं क्रुद्ध हो जाऊँ...

श्लोक 25 (aranya.23.25)

वज्र हस्तम् रणे हन्याम् किम् पुनः तौ च मानुषौ | सा तस्य गर्जितम् श्रुत्वा राक्षसाअनाम् महा चमूः ॥ 3.23.25 ॥

vajra hastam raṇe hanyām kim punaḥ tau ca mānuṣau | sā tasya garjitam śrutvā rākṣasāanām mahā camūḥ || 23.25 ||

...हाथ में वज्र लिए हुए भी युद्ध में मार सकता हूँ, फिर इन दो मनुष्यों की तो बात ही क्या!” उसकी इस गर्जना को सुनकर राक्षसों की वह विशाल सेना...

श्लोक 26 (aranya.23.26)

प्रहर्षम् अतुलम् लेभे मृत्यु पाश अवपाशिता | समेयुः च महात्मानो युद्ध दर्शन कांक्षिणः ॥ 3.23.26 ॥

praharṣam atulam lebhe mṛtyu pāśa avapāśitā | sameyuḥ ca mahātmāno yuddha darśana kāṃkṣiṇaḥ || 23.26 ||

...मृत्यु के पाश में बँधी होते हुए भी अपार हर्ष से भर उठी। और युद्ध देखने की इच्छा से महात्मा लोग एकत्र होने लगे...

श्लोक 27 (aranya.23.27)

ऋषयो देव गन्धर्वाः सिद्धाः च सह चारणैः | समेत्य च ऊचुः सहिताः ते अन्यायम् पुण्यकर्मणः ॥ 3.23.27 ॥

ṛṣayo deva gandharvāḥ siddhāḥ ca saha cāraṇaiḥ | sametya ca ūcuḥ sahitāḥ te anyāyam puṇyakarmaṇaḥ || 23.27 ||

ऋषिगण, देवता, गंधर्व, सिद्ध और चारण सब मिलकर एकत्र हुए और वे पुण्यकर्मी परस्पर बोल उठे -

श्लोक 28 (aranya.23.28)

स्वस्ति गो ब्राह्मणेभ्यो अस्तु लोकानाम् ये च सम्मताः | जयताम् राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनी चरान् ॥ 3.23.28 ॥

svasti go brāhmaṇebhyo astu lokānām ye ca sammatāḥ | jayatām rāghavo yuddhe paulastyān rajanī carān || 23.28 ||

“गौओं और ब्राह्मणों का कल्याण हो, तथा जो लोक-सम्मानित हैं उन सबका कल्याण हो; युद्ध में राघव पौलस्त्यवंशी इन निशाचरों पर विजयी हों -

श्लोक 29 (aranya.23.29)

चक्रहस्तो यथा विष्णुः सर्वान् असुर सत्तमान् | एतत् च अन्यत् च बहुशो ब्रुवाणाः परम ऋषयः ॥ 3.23.29 ॥

cakrahasto yathā viṣṇuḥ sarvān asura sattamān | etat ca anyat ca bahuśo bruvāṇāḥ parama ṛṣayaḥ || 23.29 ||

-जैसे चक्रधारी विष्णु ने समस्त श्रेष्ठ असुरों पर विजय पाई थी।” यह और इसी प्रकार की अनेक बातें कहते हुए वे परम ऋषिगण...

श्लोक 30 (aranya.23.30)

जात कौतूहलात् तत्र विमानस्थाः च देवताः | ददृशुर् वाहिनीम् तेषाम् राक्षसानाम् गत आयुषाम् ॥ 3.23.30 ॥

jāta kautūhalāt tatra vimānasthāḥ ca devatāḥ | dadṛśur vāhinīm teṣām rākṣasānām gata āyuṣām || 23.30 ||

...तथा अपने विमानों में बैठे देवगण, कौतूहलवश उन राक्षसों की सेना को देखने लगे, जिनकी आयु अब समाप्त हो चुकी थी।

श्लोक 31 (aranya.23.31)

रथेन तु खरो वेगात् सैन्यस्य अग्रात् विनिःसृतः | श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुः विहंगमः ॥ 3.23.31 ॥

rathena tu kharo vegāt sainyasya agrāt viniḥsṛtaḥ | śyenagāmī pṛthugrīvo yajñaśatruḥ vihaṃgamaḥ || 23.31 ||

खर अपने रथ पर वेगपूर्वक सेना के आगे निकल पड़ा; उसके साथ श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम...

श्लोक 32 (aranya.23.32)

दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः | हेममाली महामाली सर्पाअस्यो रुधिराशनः ॥ 3.23.32 ॥

durjayaḥ karavīrākṣaḥ paruṣaḥ kālakārmukaḥ | hemamālī mahāmālī sarpāasyo rudhirāśanaḥ || 23.32 ||

...दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य और रुधिराशन -

श्लोक 33 (aranya.23.33)

द्वादश एते महावीर्याः प्रतस्थुः अभितः खरम् | महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथी त्रिशिराः तथा | चत्वार एते सेना अग्रे दूषणम् पृष्ठतो अन्वयुः ॥ 3.23.33 ॥

dvādaśa ete mahāvīryāḥ pratasthuḥ abhitaḥ kharam | mahākapālaḥ sthūlākṣaḥ pramāthī triśirāḥ tathā | catvāra ete senā agre dūṣaṇam pṛṣṭhato anvayuḥ || 23.33 ||

-ये बारह महापराक्रमी राक्षस खर के चारों ओर आगे बढ़े। तथा महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथी और त्रिशिरा - ये चार सेना के अग्रभाग में दूषण के पीछे-पीछे चले।

श्लोक 34 (aranya.23.34)

सा भीम वेगा समर अभिकांक्षिणी सुदारुणा राक्षस वीर सेना | तौ राज पुत्रौ सहसा अभ्युपेता माला ग्रहाणाम् इव चन्द्र सूर्यौ ॥ 3.23.34 ॥

sā bhīma vegā samara abhikāṃkṣiṇī sudāruṇā rākṣasa vīra senā | tau rāja putrau sahasā abhyupetā mālā grahāṇām iva candra sūryau || 23.34 ||

वह भयंकर वेगवाली, युद्ध की अभिलाषी, अत्यंत क्रूर राक्षसवीरों की सेना उन दोनों राजकुमारों पर अचानक आ टूटी, मानो ग्रहों की एक माला चंद्रमा और सूर्य पर झपट पड़ी हो।

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