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अरण्यकाण्ड · सर्ग 50

जटायु का प्रतिरोध

सर्ग 49सर्ग-सूचीसर्ग 51

श्लोक 1 (aranya.50.1)

तम् शब्दम् अवसुप्तस्य जटायुः अथ शुश्रुवे । निरैक्षत् रावणम् क्षिप्रम् वैदेहीम् च ददर्श सः ॥ 50.1 ॥

tam śabdam avasuptasya jaṭāyuḥ atha śuśruve | niraikṣat rāvaṇam kṣipram vaidehīm ca dadarśa saḥ || 50.1 ||

तंद्रा में डूबे हुए जटायु ने वह पुकार सुनी; उसने तुरंत चारों ओर देखा और रावण को तथा वैदेही को भी देख लिया।

श्लोक 2 (aranya.50.2)

ततः पर्वत शृंग आभः तीक्ष्ण तुण्डः खग उत्तमः । वनस्पति गतः श्रीमान् व्याजहार शुभाम् गिरम् ॥ 50.2 ॥

tataḥ parvata śṛṃga ābhaḥ tīkṣṇa tuṇḍaḥ khaga uttamaḥ | vanaspati gataḥ śrīmān vyājahāra śubhām giram || 50.2 ||

तब पर्वतशिखर के समान विशाल, तीक्ष्ण चोंच वाले उस श्रेष्ठ पक्षी ने वृक्ष पर बैठे-बैठे ही ये उचित वचन कहे —

श्लोक 3 (aranya.50.3)

दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्य संश्रयः । भ्रातः सः त्वम् निन्दितम् कर्म कर्तुम् न अर्हसि संप्रताम् ॥ 50.3 ॥

daśagrīva sthito dharme purāṇe satya saṃśrayaḥ | bhrātaḥ saḥ tvam ninditam karma kartum na arhasi saṃpratām || 50.3 ||

"हे दशग्रीव! हे भ्राता! मैं तो सनातन धर्म में स्थित और सत्य का आश्रय लेने वाला हूँ। अब तुम्हें यह निंदित कर्म करना उचित नहीं है।

श्लोक 4 (aranya.50.4)

जटायुः नाम नाम्ना अहम् गृध्र राजो महाबलः । राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्र वरुण उपमः ॥ 50.4 ॥

jaṭāyuḥ nāma nāmnā aham gṛdhra rājo mahābalaḥ | rājā sarvasya lokasya mahendra varuṇa upamaḥ || 50.4 ||

मेरा नाम जटायु है, मैं गृध्रों का महाबली राजा हूँ। दशरथनंदन राम समस्त लोक के स्वामी हैं, महेन्द्र और वरुण के समान,

श्लोक 5 (aranya.50.5)

लोकानाम् च हिते युक्तो रामो दशरथ आत्मजः । तस्य एषा लोक नाथस्य धर्म पत्नी यशस्विनी ॥ 50.5 ॥

lokānām ca hite yukto rāmo daśaratha ātmajaḥ | tasya eṣā loka nāthasya dharma patnī yaśasvinī || 50.5 ||

और सदा समस्त लोकों के हित में तत्पर रहते हैं। यह यशस्विनी उन्हीं लोकनाथ की धर्मपत्नी है —

श्लोक 6 (aranya.50.6)

सीता नाम वरारोहा याम् त्वम् हर्तुम् इह इच्छसि । कथम् राजा स्थितो धर्मे पर दारान् परामृशेत् ॥ 50.6 ॥

sītā nāma varārohā yām tvam hartum iha icchasi | katham rājā sthito dharme para dārān parāmṛśet || 50.6 ||

नाम से सीता, जिसे तुम यहाँ हरना चाहते हो। भला धर्मपरायण राजा दूसरे की पत्नी पर हाथ कैसे डाल सकता है?

श्लोक 7 (aranya.50.7)

रक्षणीया विशेषेण राज दारा महाबलः । निवर्तय गतिम् नीचाम् पर दार अभिमर्शनात् ॥ 50.7 ॥

rakṣaṇīyā viśeṣeṇa rāja dārā mahābalaḥ | nivartaya gatim nīcām para dāra abhimarśanāt || 50.7 ||

हे महाबली रावण! राजा की पत्नी विशेष रूप से रक्षणीय होती है। दूसरे की पत्नी पर हाथ डालने की इस नीच वृत्ति से लौट आओ।

श्लोक 8 (aranya.50.8)

न तत् समाचरेत् धीरो यत् परो अस्य विगर्हयेत् । यथा आत्मनः तथा अन्येषाम् दारा रक्ष्या विमर्शनात् ॥ 50.8 ॥

na tat samācaret dhīro yat paro asya vigarhayet | yathā ātmanaḥ tathā anyeṣām dārā rakṣyā vimarśanāt || 50.8 ||

धीर पुरुष वह कार्य नहीं करता जिसके लिए दूसरे उसकी निंदा करें। जैसे अपनी पत्नी को दूसरे के स्पर्श से बचाया जाता है, वैसे ही दूसरों की पत्नियों की भी रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 9 (aranya.50.9)

अर्थम् वा यदि वा कामम् शिष्टाः शास्त्रेषु अनागतम् । व्यवस्यन्ति अनु राजानम् धर्मम् पौलस्त्य नंदन ॥ 50.9 ॥

artham vā yadi vā kāmam śiṣṭāḥ śāstreṣu anāgatam | vyavasyanti anu rājānam dharmam paulastya naṃdana || 50.9 ||

हे पौलस्त्यनंदन! अर्थ, काम अथवा धर्म के जिन विषयों का शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उनमें विद्वान लोग राजा के आचरण का ही अनुसरण करते हैं।

श्लोक 10 (aranya.50.10)

राजा धर्मः च कामः च द्रव्याणाम् च उत्तमो निधिः । धर्मः शुभम् वा पापम् वा राज मूलम् प्रवर्तते ॥ 50.10 ॥

rājā dharmaḥ ca kāmaḥ ca dravyāṇām ca uttamo nidhiḥ | dharmaḥ śubham vā pāpam vā rāja mūlam pravartate || 50.10 ||

राजा ही धर्म, काम और धन का सर्वोत्तम आश्रय होता है; चाहे शुभ हो या पाप, राजा ही उसका मूल स्रोत बनकर उसे फैलाता है।

श्लोक 11 (aranya.50.11)

पाप स्वभावः चपलः कथम् त्वम् रक्षसाम् वर । ऐश्वर्यम् अभिसंप्राप्तो विमानम् इव दुष्कृती ॥ 50.11 ॥

pāpa svabhāvaḥ capalaḥ katham tvam rakṣasām vara | aiśvaryam abhisaṃprāpto vimānam iva duṣkṛtī || 50.11 ||

हे राक्षसश्रेष्ठ! पापपूर्ण और चंचल स्वभाव वाले तुमने, एक दुष्कर्मी होते हुए भी, यह ऐश्वर्य कैसे पा लिया — मानो किसी पापी को विमान मिल गया हो?

श्लोक 12 (aranya.50.12)

काम स्वभावो यः सः असौ न शक्यः तम् प्रमार्जितुम् । न हि दुष्ट आत्मनाम् आर्यम् आवसति आलये चिरम् ॥ 50.12 ॥

kāma svabhāvo yaḥ saḥ asau na śakyaḥ tam pramārjitum | na hi duṣṭa ātmanām āryam āvasati ālaye ciram || 50.12 ||

जो जिसका स्वाभाविक गुण होता है, उसे मिटाना कठिन होता है; और दुष्ट-हृदय वाले के घर में सच्ची समृद्धि चिरकाल तक नहीं टिकती।

श्लोक 13 (aranya.50.13)

विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबलः । न अपराध्यति धर्मात्मा कथम् तस्य अपराध्यसि ॥ 50.13 ॥

viṣaye vā pure vā te yadā rāmo mahābalaḥ | na aparādhyati dharmātmā katham tasya aparādhyasi || 50.13 ||

जब वे महाबली और धर्मात्मा राम ने तुम्हारे राज्य में या तुम्हारे नगर में कोई अपराध नहीं किया, तो तुम उनके प्रति यह अपराध कैसे कर रहे हो?

श्लोक 14 (aranya.50.14)

यदि शूर्पणखा हेतोः जनस्थान गतः खरः । अतिवृत्तो हतः पूर्वम् रामेण अक्लिष्ट कर्मणा ॥ 50.14 ॥

yadi śūrpaṇakhā hetoḥ janasthāna gataḥ kharaḥ | ativṛtto hataḥ pūrvam rāmeṇa akliṣṭa karmaṇā || 50.14 ||

यदि शूर्पणखा के कारण जनस्थान में रहने वाले खर ने मर्यादा का उल्लंघन किया और इसीलिए अथक कर्मी राम ने पहले ही उसका वध कर दिया —

श्लोक 15 (aranya.50.15)

अत्र ब्रूहि यथा तत्त्वम् को रामस्य व्यतिक्रमः । यस्य त्वम् लोक नाथस्य हृत्वा भार्याम् गमिष्यसि ॥ 50.15 ॥

atra brūhi yathā tattvam ko rāmasya vyatikramaḥ | yasya tvam loka nāthasya hṛtvā bhāryām gamiṣyasi || 50.15 ||

तो सत्य-सत्य बताओ, राम का ऐसा क्या अपराध है, जिसके कारण तुम उस लोकनाथ की पत्नी का हरण करके जा रहे हो?

श्लोक 16 (aranya.50.16)

क्षिप्रम् विसृज वैदेहीम् मा त्वा घोरेण चक्षुषा । दहेत् दहनभूतेन वृत्रम् इन्द्र अशनिः यथा ॥ 50.16 ॥

kṣipram visṛja vaidehīm mā tvā ghoreṇa cakṣuṣā | dahet dahanabhūtena vṛtram indra aśaniḥ yathā || 50.16 ||

शीघ्र वैदेही को छोड़ दो, कहीं ऐसा न हो कि उनके अग्निस्वरूप भयंकर नेत्र तुम्हें उसी प्रकार जलाकर भस्म कर दें, जैसे इन्द्र के वज्र ने वृत्रासुर को भस्म किया था।

श्लोक 17 (aranya.50.17)

सर्पम् आशीविषम् बद्ध्वा वस्त्र अन्ते न अवबुध्यसे । ग्रीवायाम् प्रतिमुक्तम् च काल पाशम् न पश्यसि ॥ 50.17 ॥

sarpam āśīviṣam baddhvā vastra ante na avabudhyase | grīvāyām pratimuktam ca kāla pāśam na paśyasi || 50.17 ||

तुम्हें यह भी भान नहीं कि तुमने विषधर सर्प को अपने वस्त्र के छोर में बाँध लिया है, और यह भी नहीं देख रहे कि तुम्हारे गले में काल का पाश पड़ चुका है।

श्लोक 18 (aranya.50.18)

स भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरम् न अवसादयेत् । तत् अन्नम् अपि भोक्तव्यम् जीर्यते यत् अनामयम् ॥ 50.18 ॥

sa bhāraḥ saumya bhartavyo yo naram na avasādayet | tat annam api bhoktavyam jīryate yat anāmayam || 50.18 ||

हे सौम्य! वही भार उठाना चाहिए जो मनुष्य को कुचल न दे, और वही अन्न खाना चाहिए जो बिना कष्ट पचे।

श्लोक 19 (aranya.50.19)

यत् कृत्वा न भवेत् धर्मो न कीर्तिः न यशः ध्रुवम् । शरीरस्य भवेत् खेदः कः तत् कर्म समाचरेत् ॥ 50.19 ॥

yat kṛtvā na bhavet dharmo na kīrtiḥ na yaśaḥ dhruvam | śarīrasya bhavet khedaḥ kaḥ tat karma samācaret || 50.19 ||

जिस कर्म को करने से न धर्म मिले, न कीर्ति, न निश्चित यश, बल्कि केवल शरीर को क्लेश हो, वह कर्म भला कौन करेगा?

श्लोक 20 (aranya.50.20)

षष्टि वर्ष सहस्राणि जातस्य मम रावण । पितृ पैतामहम् राज्यम् यथावत् अनुतिष्ठतः ॥ 50.20 ॥

ṣaṣṭi varṣa sahasrāṇi jātasya mama rāvaṇa | pitṛ paitāmaham rājyam yathāvat anutiṣṭhataḥ || 50.20 ||

हे रावण! मुझे जन्म लिए साठ हजार वर्ष हो चुके हैं, और मैं इतने समय से अपने पिता-पितामहों के राज्य का यथाविधि पालन करता आया हूँ।

श्लोक 21 (aranya.50.21)

वृद्धो अहम् त्वम् युवा धन्वी स रथः कवची शरी । न च अपि आदाय कुशली वैदेहीम् न गमिष्यसि ॥ 50.21 ॥

vṛddho aham tvam yuvā dhanvī sa rathaḥ kavacī śarī | na ca api ādāya kuśalī vaidehīm na gamiṣyasi || 50.21 ||

मैं वृद्ध हूँ, तुम युवा हो; तुम धनुर्धारी, रथारूढ़, कवचधारी और बाणों से सुसज्जित हो — फिर भी वैदेही को लेकर तुम कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे।

श्लोक 22 (aranya.50.22)

न शक्तः त्वम् बलात् हर्तुम् वैदेहीम् मम पश्यतः । हेतुभिः न्याय संयुक्तैः ध्रुवाम् वेद श्रुतीम् इव ॥ 50.22 ॥

na śaktaḥ tvam balāt hartum vaidehīm mama paśyataḥ | hetubhiḥ nyāya saṃyuktaiḥ dhruvām veda śrutīm iva || 50.22 ||

मेरे देखते हुए तुम वैदेही को बलपूर्वक नहीं हर सकते — जैसे तर्कों से युक्त कुतर्कों से भी वेदों की निश्चित श्रुति को चलायमान नहीं किया जा सकता।

श्लोक 23 (aranya.50.23)

युध्यस्व यदि शूरो असि मुहूर्तम् तिष्ठ रावण । शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वम् खरः तथा ॥ 50.23 ॥

yudhyasva yadi śūro asi muhūrtam tiṣṭha rāvaṇa | śayiṣyase hato bhūmau yathā pūrvam kharaḥ tathā || 50.23 ||

हे रावण! यदि तुम शूरवीर हो तो युद्ध करो, क्षणभर ठहरो — तुम भी उसी प्रकार मारे जाकर धरती पर सो जाओगे, जैसे पहले खर सोया था।

श्लोक 24 (aranya.50.24)

असकृत् संयुगे येन निहता दैत्य दानवाः । न चिरात् चीर वासाः त्वाम् रामो युधि वधिष्यति ॥ 50.24 ॥

asakṛt saṃyuge yena nihatā daitya dānavāḥ | na cirāt cīra vāsāḥ tvām rāmo yudhi vadhiṣyati || 50.24 ||

जिसने युद्ध में बार-बार दैत्यों और दानवों का वध किया है, वही वल्कलधारी राम शीघ्र ही युद्ध में तुम्हारा भी वध कर देंगे।

श्लोक 25 (aranya.50.25)

किम् नु शक्यम् मया कर्तुम् गतौ दूरम् नृप आत्मजौ । क्षिप्रम् त्वम् नश्यसे नीच तयोः भीतो न संशयः ॥ 50.25 ॥

kim nu śakyam mayā kartum gatau dūram nṛpa ātmajau | kṣipram tvam naśyase nīca tayoḥ bhīto na saṃśayaḥ || 50.25 ||

अब मैं भला क्या कर सकता हूँ, जबकि दोनों राजकुमार दूर जा चुके हैं? किंतु हे नीच! तू शीघ्र ही उनके भय से नष्ट हो जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 26 (aranya.50.26)

न हि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभाम् इमाम् । सीताम् कमल पत्र अक्षीम् रामस्य महषीम् प्रियाम् ॥ 50.26 ॥

na hi me jīvamānasya nayiṣyasi śubhām imām | sītām kamala patra akṣīm rāmasya mahaṣīm priyām || 50.26 ||

जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक तुम इस शुभ, कमलपत्राक्षी सीता को, जो राम की प्रिय महिषी हैं, नहीं ले जा सकते।

श्लोक 27 (aranya.50.27)

अवश्यम् तु मया कार्यम् प्रियम् तस्य महात्मनः । जीवितेन अपि रामस्य तथा दशरथस्य च ॥ 50.27 ॥

avaśyam tu mayā kāryam priyam tasya mahātmanaḥ | jīvitena api rāmasya tathā daśarathasya ca || 50.27 ||

मुझे उन महात्मा राम को तथा दशरथ को भी प्रसन्न करने वाला कोई कार्य अवश्य करना है — भले ही इसके लिए मुझे अपने प्राण भी क्यों न देने पड़ें।

श्लोक 28 (aranya.50.28)

तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तम् पश्य रावण । वृन्तात् इव फलम् त्वाम् तु पातयेयम् रथ उत्तमात् । युद्ध आतिथ्यम् प्रदास्यामि यथा प्राणम् निशा चर ॥ 50.28 ॥

tiṣṭha tiṣṭha daśagrīva muhūrtam paśya rāvaṇa | vṛntāt iva phalam tvām tu pātayeyam ratha uttamāt | yuddha ātithyam pradāsyāmi yathā prāṇam niśā cara || 50.28 ||

"रुको, रुको, हे दशग्रीव! हे रावण! क्षणभर देखो — मैं तुम्हें इस उत्तम रथ से वैसे ही गिरा दूँगा जैसे डंठल से फल गिरा दिया जाता है। हे निशाचर! जब तक मेरे प्राण हैं, तब तक मैं तुम्हें युद्ध का आतिथ्य अवश्य दूँगा!"

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