अरण्यकाण्ड · सर्ग 52
सीता-हरण पर प्रकृति का विलाप
श्लोक 1 (aranya.52.1)
सा तु तारा अधिप मुखी रावणेन निरीक्ष्य तम् । गृध्र राजम् विनिहतम् विललाप सुदुःखिता ॥ 52.1 ॥
sā tu tārā adhipa mukhī rāvaṇena nirīkṣya tam | gṛdhra rājam vinihatam vilalāpa suduḥkhitā || 52.1 ||
चंद्रमुखी सीता रावण द्वारा घायल किए गए गिद्धराज को देखकर अत्यंत दुःखी होकर विलाप करने लगी।
श्लोक 2 (aranya.52.2)
निमित्तम् लक्षणम् स्वप्नम् शकुनि स्वर दर्शनम् । अवश्यम् सुख दुःखेषु नराणाम् परिदृश्यते ॥ 52.2 ॥
nimittam lakṣaṇam svapnam śakuni svara darśanam | avaśyam sukha duḥkheṣu narāṇām paridṛśyate || 52.2 ||
'शुभ-अशुभ चिह्न, स्वप्न तथा पक्षियों की बोली और दर्शन—मनुष्यों के सुख-दुःख से पहले अवश्य ही प्रकट होते हैं।'
श्लोक 3 (aranya.52.3)
न नूनम् राम जानासि महत् व्यसनम् आत्मनः । धावन्ति नूनम् काकुत्स्थ मत् अर्थम् मृग पक्षिणः ॥ 52.3 ॥
na nūnam rāma jānāsi mahat vyasanam ātmanaḥ | dhāvanti nūnam kākutstha mat artham mṛga pakṣiṇaḥ || 52.3 ||
'हे राम! निश्चय ही तुम अपने ऊपर आई इस महाविपत्ति को नहीं जानते; फिर भी हे काकुत्स्थ, ये मृग और पक्षी मेरे लिए तुम्हारी ओर दौड़ रहे हैं।'
श्लोक 4 (aranya.52.4)
अयम् हि कृपया राम माम् त्रातुम् इह संगतः । शेते विनिहतो भूमौ मम अभाग्यात् विहंगमः ॥ 52.4 ॥
ayam hi kṛpayā rāma mām trātum iha saṃgataḥ | śete vinihato bhūmau mama abhāgyāt vihaṃgamaḥ || 52.4 ||
'हे राम! यह पक्षी करुणावश मुझे बचाने यहाँ आया था, और मेरे ही दुर्भाग्य से आज घायल होकर भूमि पर पड़ा है।' इस प्रकार सीता विलाप करने लगी।
श्लोक 5 (aranya.52.5)
त्राहि माम् अद्य काकुत्स्थ लक्ष्मण इति वरांगना । सु संत्रस्ता समाक्रंदत् शृण्वताम् तु यथा अन्तिके ॥ 52.5 ॥
trāhi mām adya kākutstha lakṣmaṇa iti varāṃganā | su saṃtrastā samākraṃdat śṛṇvatām tu yathā antike || 52.5 ||
वह सुंदरी अत्यंत भयभीत होकर पुकार उठी, 'हे काकुत्स्थ! हे लक्ष्मण! अभी मुझे बचाओ!'—मानो वे दोनों निकट खड़े होकर सुन रहे हों।
श्लोक 6 (aranya.52.6)
ताम् क्लिष्ट माल्य आभरणाम् विलपन्तीम् अनाथवत् । अभ्यधावत वैदेहीम् रावणो राक्षस अधिपः ॥ 52.6 ॥
tām kliṣṭa mālya ābharaṇām vilapantīm anāthavat | abhyadhāvata vaidehīm rāvaṇo rākṣasa adhipaḥ || 52.6 ||
राक्षसराज रावण उस वैदेही की ओर झपटा, जिसकी माला और आभूषण बिखर गए थे और जो अनाथ की भाँति विलाप कर रही थी।
श्लोक 7 (aranya.52.7)
ताम् लताम् इव वेष्टन्तीम् आलिंगन्तीम् महाद्रुमान् । मुंच मुंच इति बहुशः प्रवदन् राक्षस अधिपः ॥ 52.7 ॥
tām latām iva veṣṭantīm āliṃgantīm mahādrumān | muṃca muṃca iti bahuśaḥ pravadan rākṣasa adhipaḥ || 52.7 ||
जब वह किसी लता की भाँति एक विशाल वृक्ष से लिपट गई, तो राक्षसराज बार-बार पुकारने लगा, 'छोड़ दे! छोड़ दे!'
श्लोक 8 (aranya.52.8)
क्रोशन्तीम् राम राम इति रामेण रहिताम् वने । जीवित अन्ताय केशेषु जग्राह अन्तक संनिभः ॥ 52.8 ॥
krośantīm rāma rāma iti rāmeṇa rahitām vane | jīvita antāya keśeṣu jagrāha antaka saṃnibhaḥ || 52.8 ||
वन में राम से विहीन होकर 'राम! राम!' पुकारती हुई उस सीता के केशों को यमराज के समान भयंकर उस रावण ने पकड़ लिया—यही पकड़ना उसके अपने विनाश का कारण बना।
श्लोक 9 (aranya.52.9)
प्रधर्षितायाम् वैदेह्याम् बभूव स चरा अचरम् । जगत् सर्वम् अमर्यादम् तमसा अन्धेन संवृतम् ॥ 52.9 ॥
pradharṣitāyām vaidehyām babhūva sa carā acaram | jagat sarvam amaryādam tamasā andhena saṃvṛtam || 52.9 ||
जब वैदेही पर यह अत्याचार हो रहा था, तब चराचर सहित समस्त जगत उच्छृंखल हो उठा और घोर अंधकार से आच्छादित हो गया।
श्लोक 10 (aranya.52.10)
न वाति मारुतः तत्र निष् प्रभो अभूत् दिवाकरः । दृष्ट्वा सीताम् परा मृष्टाम् देवो दिव्येन चक्षुषा ॥ 52.10 ॥
na vāti mārutaḥ tatra niṣ prabho abhūt divākaraḥ | dṛṣṭvā sītām parā mṛṣṭām devo divyena cakṣuṣā || 52.10 ||
वहाँ वायु बहनी बंद हो गई और सूर्य निष्प्रभ हो गया—क्योंकि ब्रह्मा ने अपने दिव्य नेत्र से सीता को पराए द्वारा स्पर्श किया जाता देख लिया था।
श्लोक 11 (aranya.52.11)
कृतम् कार्यम् इति श्रीमान् व्याजहार पितामहः । प्रहृष्टा व्यथिताः च आसन् सर्वे ते परम ऋषयः ॥ 52.11 ॥
kṛtam kāryam iti śrīmān vyājahāra pitāmahaḥ | prahṛṣṭā vyathitāḥ ca āsan sarve te parama ṛṣayaḥ || 52.11 ||
तेजस्वी ब्रह्मा ने कहा, 'कार्य सिद्ध हो गया'; और वहाँ उपस्थित सभी महर्षि एक साथ प्रसन्न भी हुए और व्यथित भी।
श्लोक 12 (aranya.52.12)
दृष्ट्वा सीताम् परा मृष्टाम् दण्डकारण्य वासिनः । रावणस्य विनाशम् च प्राप्तम् बुद्ध्वा यदृच्छया ॥ 52.12 ॥
dṛṣṭvā sītām parā mṛṣṭām daṇḍakāraṇya vāsinaḥ | rāvaṇasya vināśam ca prāptam buddhvā yadṛcchayā || 52.12 ||
दण्डकारण्य के वासियों ने सीता को इस प्रकार पराए द्वारा स्पर्श किया जाता देखकर यह जान लिया कि मानो अनायास ही रावण का विनाश निश्चित हो गया है।
श्लोक 13 (aranya.52.13)
स तु ताम् राम राम इति रुदन्तीम् लक्ष्मण इति च । जगाम आदाय च आकाशम् रावणो राक्षसेश्वरः ॥ 52.13 ॥
sa tu tām rāma rāma iti rudantīm lakṣmaṇa iti ca | jagāma ādāya ca ākāśam rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ || 52.13 ||
राक्षसेश्वर रावण 'राम! राम!' और 'लक्ष्मण!' पुकारकर रोती हुई सीता को लेकर आकाश में उड़ चला।
श्लोक 14 (aranya.52.14)
तप्त आभरण वर्ण अन्गी पीत कौशेय वासनी । रराज राज पुत्री तु विद्युत् सौदामनी यथा ॥ 52.14 ॥
tapta ābharaṇa varṇa angī pīta kauśeya vāsanī | rarāja rāja putrī tu vidyut saudāmanī yathā || 52.14 ||
तप्त सुवर्ण के समान चमकते आभूषणों की आभा वाली, पीत रेशमी वस्त्र धारण किए हुए वह राजकुमारी बिजली की चमक के समान दमक रही थी।
श्लोक 15 (aranya.52.15)
उद्धूतेन च वस्त्रेण तस्याः पीतेन रावणः । अधिकम् परिबभ्राज गिरिः दीप इव अग्निना ॥ 52.15 ॥
uddhūtena ca vastreṇa tasyāḥ pītena rāvaṇaḥ | adhikam paribabhrāja giriḥ dīpa iva agninā || 52.15 ||
उसके उड़ते हुए पीत वस्त्र से घिरा हुआ रावण और भी अधिक चमक उठा, मानो अग्नि से प्रज्वलित कोई पर्वत हो।
श्लोक 16 (aranya.52.16)
तस्याः परम कल्याण्याः ताम्राणि सुरभीणि च । पद्म पत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम् ॥ 52.16 ॥
tasyāḥ parama kalyāṇyāḥ tāmrāṇi surabhīṇi ca | padma patrāṇi vaidehyā abhyakīryanta rāvaṇam || 52.16 ||
उस परम सुंदरी वैदेही के रक्तवर्णी, सुगंधित कमल-दल उससे झड़कर रावण पर बिखर गए।
श्लोक 17 (aranya.52.17)
तस्याः कौशेयम् उद्धूतम् आकाशे कनक प्रभम् । बभौ च आदित्य रागेण ताम्रम् अभ्रम् इव आतपे ॥ 52.17 ॥
tasyāḥ kauśeyam uddhūtam ākāśe kanaka prabham | babhau ca āditya rāgeṇa tāmram abhram iva ātape || 52.17 ||
आकाश में लहराता हुआ उसका स्वर्णाभ रेशमी वस्त्र सूर्य की लालिमा में मध्याह्न के ताम्रवर्णी मेघ के समान दमक रहा था।
श्लोक 18 (aranya.52.18)
तस्याः तत् विमलम् सु नसम् वक्त्रम् आकाशे रावण अंक गम् । न रराज विना रामम् विनालम् इव पंकजम् ॥ 52.18 ॥
tasyāḥ tat vimalam su nasam vaktram ākāśe rāvaṇa aṃka gam | na rarāja vinā rāmam vinālam iva paṃkajam || 52.18 ||
आकाश में रावण के पार्श्व में स्थित उसका वह निर्मल, सुंदर नासिका वाला मुख राम के बिना वैसे ही निस्तेज हो गया था जैसे डंठल से टूटा हुआ कमल।
श्लोक 19 (aranya.52.19)
बभूव जलदम् नीलम् भित्त्वा चन्द्र इव उदितः । सु ललाटम् सु केश अंतम् पद्म गर्भ आभम् अव्रणम् ॥ 52.19 ॥
babhūva jaladam nīlam bhittvā candra iva uditaḥ | su lalāṭam su keśa aṃtam padma garbha ābham avraṇam || 52.19 ||
सुंदर ललाट और सुंदर केशांत वाला, कमल-गर्भ के समान आभा वाला उसका निष्कलंक मुख मानो नीले मेघ को भेदकर उदित होते हुए चंद्रमा के समान प्रतीत होता था।
श्लोक 20 (aranya.52.20)
शुक्लैः सु विमलैर् दन्तैः प्रभावद्भिः अलंकृतम् । तस्याः सु नयनम् वक्त्रम् आकाशे रावण अंक गम् ॥ 52.20 ॥
śuklaiḥ su vimalair dantaiḥ prabhāvadbhiḥ alaṃkṛtam | tasyāḥ su nayanam vaktram ākāśe rāvaṇa aṃka gam || 52.20 ||
श्वेत, निर्मल और चमकीले दाँतों से सुशोभित उसका वह सुंदर नेत्रों वाला मुख आकाश में रावण के पार्श्व में स्थित था।
श्लोक 21 (aranya.52.21)
रुदितम् व्यपमृष्ट अस्रम् चन्द्रवत् प्रिय दर्शनम् । सु नासम् चारु ताम्र ओष्ठम् आकाषे हाटक प्रभम् ॥ 52.21 ॥
ruditam vyapamṛṣṭa asram candravat priya darśanam | su nāsam cāru tāmra oṣṭham ākāṣe hāṭaka prabham || 52.21 ||
आँसू पोंछे जाने के बाद वह मुख, चंद्रमा के समान मनोहर, सुंदर नासिका और मनोहर ताम्रवर्णी अधरों वाला, आकाश में स्वर्ण के समान चमक रहा था।
श्लोक 22 (aranya.52.22)
राक्षसेन्द्र समाधूतम् तस्याः तत् वदनम् शुभम् । शुशुभे न विना रामम् दिवा चन्द्र इव उदितः ॥ 52.22 ॥
rākṣasendra samādhūtam tasyāḥ tat vadanam śubham | śuśubhe na vinā rāmam divā candra iva uditaḥ || 52.22 ||
राक्षसराज के द्वारा विचलित किया गया उसका वह सुंदर मुख राम के बिना वैसे ही निस्तेज था जैसे दिन में उदय हुआ चंद्रमा।
श्लोक 23 (aranya.52.23)
सा हेम वर्णा नील अंगम् मैथिली राक्षस अधिपम् । शुशुभे कांचनी कांची नीलम् मणिम् गजम् इव आश्रिता ॥ 52.23 ॥
sā hema varṇā nīla aṃgam maithilī rākṣasa adhipam | śuśubhe kāṃcanī kāṃcī nīlam maṇim gajam iva āśritā || 52.23 ||
स्वर्णवर्णी मैथिली उस श्यामवर्णी राक्षसराज के अंग पर टिकी हुई, नीलमणि पर जड़ी स्वर्णमाला के समान, अथवा हाथी पर बँधी सुनहरी करधनी के समान शोभायमान हो रही थी।
श्लोक 24 (aranya.52.24)
सा पद्म पीता हेम आभा रावणम् जनक आत्मजा । विद्युत् घनम् इव आविश्य शुशुभे तप्त भूषणा ॥ 52.24 ॥
sā padma pītā hema ābhā rāvaṇam janaka ātmajā | vidyut ghanam iva āviśya śuśubhe tapta bhūṣaṇā || 52.24 ||
कमल के समान पीत स्वर्णाभा वाली और तपाए हुए स्वर्ण के आभूषणों से सुशोभित वह जनकनंदिनी रावण पर वैसे ही चमक रही थी जैसे मेघ में समाई हुई बिजली।
श्लोक 25 (aranya.52.25)
तस्या भूषण घोषेण वैदेह्या राक्षस अधिपः । बभूव विमलो नीलः सघोष इव तोयदः ॥ 52.25 ॥
tasyā bhūṣaṇa ghoṣeṇa vaidehyā rākṣasa adhipaḥ | babhūva vimalo nīlaḥ saghoṣa iva toyadaḥ || 52.25 ||
वैदेही के आभूषणों की झंकार से वह राक्षसराज गर्जनशील, निर्मल एवं श्यामवर्णी मेघ के समान प्रतीत होने लगा।
श्लोक 26 (aranya.52.26)
उत्तम अंग च्युता तस्याः पुष्प वृष्टिः समन्ततः । सीताया ह्रियमाणायाः पपात धरणी तले ॥ 52.26 ॥
uttama aṃga cyutā tasyāḥ puṣpa vṛṣṭiḥ samantataḥ | sītāyā hriyamāṇāyāḥ papāta dharaṇī tale || 52.26 ||
हरी जाती हुई सीता के सिर और शरीर से गिरे हुए फूलों की वह वर्षा चारों ओर बिखरकर भूमि पर जा गिरी।
श्लोक 27 (aranya.52.27)
सा तु रावण वेगेन पुष्प वृष्टिः समन्ततः । समाधूता दशग्रीवम् पुनः एव अभ्यवर्तत ॥ 52.27 ॥
sā tu rāvaṇa vegena puṣpa vṛṣṭiḥ samantataḥ | samādhūtā daśagrīvam punaḥ eva abhyavartata || 52.27 ||
किंतु रावण की वेगपूर्ण गति से उड़कर वह बिखरे हुए फूलों की वर्षा पुनः घूमकर उस दशग्रीव पर ही आ गिरी।
श्लोक 28 (aranya.52.28)
अभ्यवर्तत पुष्पाणाम् धारा वैश्रवण अनुजम् । नक्षत्र माला विमला मेरुम् नगम् इव उन्नतम् ॥ 52.28 ॥
abhyavartata puṣpāṇām dhārā vaiśravaṇa anujam | nakṣatra mālā vimalā merum nagam iva unnatam || 52.28 ||
वह पुष्पधारा कुबेर के अनुज रावण के चारों ओर वैसे ही घूमने लगी जैसे नक्षत्रों की निर्मल माला ऊँचे मेरु पर्वत के चारों ओर घूमती है।
श्लोक 29 (aranya.52.29)
चरणात् नूपुरम् भ्रष्टम् वैदेह्या रत्न भूषितम् । विद्युत् मण्डल संकाशम् पपात धरणी तले ॥ 52.29 ॥
caraṇāt nūpuram bhraṣṭam vaidehyā ratna bhūṣitam | vidyut maṇḍala saṃkāśam papāta dharaṇī tale || 52.29 ||
वैदेही के चरण से खिसका हुआ, रत्नों से सुशोभित उसका नूपुर बिजली के घेरे के समान चमकता हुआ भूमि पर जा गिरा।
श्लोक 30 (aranya.52.30)
तरु प्रवाल रक्ता सा नील अंगम् राक्षस ईश्वरम् । प्राशोभयत वैदेही गजम् कक्ष्या इव कांचनी ॥ 52.30 ॥
taru pravāla raktā sā nīla aṃgam rākṣasa īśvaram | prāśobhayata vaidehī gajam kakṣyā iva kāṃcanī || 52.30 ||
वृक्ष के नवीन लाल अंकुर के समान कोमल वैदेही उस श्यामवर्णी राक्षसराज को वैसे ही सुशोभित कर रही थी जैसे सुनहरी करधनी किसी हाथी को सुशोभित करती है।
श्लोक 31 (aranya.52.31)
ताम् महा उल्काम् इव आकाशे दीप्यमानाम् स्व तेजसा । जहार आकाशम् आविश्य सीताम् वैश्रवण अनुजः ॥ 52.31 ॥
tām mahā ulkām iva ākāśe dīpyamānām sva tejasā | jahāra ākāśam āviśya sītām vaiśravaṇa anujaḥ || 52.31 ||
कुबेर के अनुज रावण ने आकाश में प्रवेश कर उस सीता का हरण किया, जो अपने ही तेज से आकाश में महान उल्का के समान दीप्त हो रही थी।
श्लोक 32 (aranya.52.32)
तस्याः तानि अग्नि वर्णानि भूषणानि मही तले । स घोषाणि अवकीर्यन्त क्षीणाः तारा इव अंबरात् ॥ 52.32 ॥
tasyāḥ tāni agni varṇāni bhūṣaṇāni mahī tale | sa ghoṣāṇi avakīryanta kṣīṇāḥ tārā iva aṃbarāt || 52.32 ||
उसके अग्नि के समान चमकते आभूषण झंकार करते हुए भूमि पर बिखर गए, मानो आकाश से क्षीण होते तारे गिर रहे हों।
श्लोक 33 (aranya.52.33)
तस्याः स्तन अन्तरात् भ्रष्टो हारः तारा अधिप द्युतिः । वैदेह्या निपतन् भाति गंगा इव गगनात् च्युता ॥ 52.33 ॥
tasyāḥ stana antarāt bhraṣṭo hāraḥ tārā adhipa dyutiḥ | vaidehyā nipatan bhāti gaṃgā iva gaganāt cyutā || 52.33 ||
वैदेही के वक्षस्थल से खिसका हुआ, चंद्रमा के समान द्युतिमान वह हार गिरते समय आकाश से उतरती हुई गंगा के समान चमक रहा था।
श्लोक 34 (aranya.52.34)
उत्पात वात अभिहता नाना द्विज गण आयुताः । मा भैः इति विधूत अग्रा व्याजह्रुः इव पादपाः ॥ 52.34 ॥
utpāta vāta abhihatā nānā dvija gaṇa āyutāḥ | mā bhaiḥ iti vidhūta agrā vyājahruḥ iva pādapāḥ || 52.34 ||
अनेक प्रकार के पक्षियों से भरे हुए वृक्ष, उस प्रचंड आँधी से हिलते हुए अपने लहराते शिखरों से मानो पुकार रहे थे, 'डरो मत! डरो मत!'
श्लोक 35 (aranya.52.35)
नलिन्यो ध्वस्त कमलाः त्रस्त मीन जले चराः । सखीम् इव गत उत्साहाम् शोचन्ति इव स्म मैथिलीम् ॥ 52.35 ॥
nalinyo dhvasta kamalāḥ trasta mīna jale carāḥ | sakhīm iva gata utsāhām śocanti iva sma maithilīm || 52.35 ||
अपने मसले हुए कमलों और भयभीत मछलियों तथा जलचरों वाले सरोवर मानो अपनी किसी प्रिय सखी की भाँति निरुत्साहित मैथिली के लिए शोक कर रहे थे।
श्लोक 36 (aranya.52.36)
संमंतात् अभिसंपत्य सिंह व्याघ्र मृग द्विजाः । अन्वधावन् तदा रोषात् सीताम् छाया अनुगामिनः ॥ 52.36 ॥
saṃmaṃtāt abhisaṃpatya siṃha vyāghra mṛga dvijāḥ | anvadhāvan tadā roṣāt sītām chāyā anugāminaḥ || 52.36 ||
चारों ओर से आकर एकत्र हुए सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी उस समय क्रोध से भरकर सीता की परछाईं का अनुसरण करते हुए दौड़ने लगे।
श्लोक 37 (aranya.52.37)
जल प्रपात अस्र मुखाः शृन्गैः उच्छ्रित बाहवः । सीतायाम् ह्रियमाणायाम् विक्रोशन्ति इव पर्वताः ॥ 52.37 ॥
jala prapāta asra mukhāḥ śṛngaiḥ ucchrita bāhavaḥ | sītāyām hriyamāṇāyām vikrośanti iva parvatāḥ || 52.37 ||
हरी जाती हुई सीता को देखकर पर्वत भी मानो विलाप कर रहे थे—उनके झरने आँसुओं से भीगे मुख के समान थे और उनकी चोटियाँ उठी हुई भुजाओं के समान।
श्लोक 38 (aranya.52.38)
ह्रियमाणाम् तु वैदेहीम् दृष्ट्वा दीनो दिवाकरः । प्रविध्वस्त प्रभः श्रीमान् आसीत् पाण्डुर मण्डलः ॥ 52.38 ॥
hriyamāṇām tu vaidehīm dṛṣṭvā dīno divākaraḥ | pravidhvasta prabhaḥ śrīmān āsīt pāṇḍura maṇḍalaḥ || 52.38 ||
वैदेही को इस प्रकार हरा जाता देखकर तेजस्वी सूर्य भी उदास हो गया; उसका तेज मलिन पड़ गया और उसका मंडल पीला पड़ गया।
श्लोक 39 (aranya.52.39)
न अस्ति धर्मः कुतः सत्यम् न आर्जवम् न अनृशंसता । यत्र रामस्य वैदेहीम् भार्याम् हरति रावणः ॥ 52.39 ॥
na asti dharmaḥ kutaḥ satyam na ārjavam na anṛśaṃsatā | yatra rāmasya vaidehīm bhāryām harati rāvaṇaḥ || 52.39 ||
'जहाँ रावण राम की पत्नी वैदेही का हरण कर सकता है, वहाँ धर्म कहाँ रहा? सत्य कहाँ रहा? न आर्जव है, न करुणा।'
श्लोक 40 (aranya.52.40)
इति भूतानि सर्वाणि गणशः पर्यदेवयन् । वित्रस्तका दीन मुखा रुरुदुः मृग पोतकाः ॥ 52.40 ॥
iti bhūtāni sarvāṇi gaṇaśaḥ paryadevayan | vitrastakā dīna mukhā ruruduḥ mṛga potakāḥ || 52.40 ||
इस प्रकार समस्त प्राणी झुंड बनाकर विलाप करने लगे; और भयभीत, दीन-मुख हिरण के बच्चे रोने लगे।
श्लोक 41 (aranya.52.41)
उद्वीक्ष्य उद्वीक्ष्य नयनैः अस्र पात आविल ईक्षणाः । सुप्रवेपित गात्राः च बभूवुः वन देवताः ॥ 52.41 ॥
udvīkṣya udvīkṣya nayanaiḥ asra pāta āvila īkṣaṇāḥ | supravepita gātrāḥ ca babhūvuḥ vana devatāḥ || 52.41 ||
बार-बार ऊपर देखते हुए, आँसुओं से धुँधले नेत्रों वाली वनदेवियाँ भी थर-थर काँपने लगीं।
श्लोक 42 (aranya.52.42)
विक्रोशन्तीम् दृढम् सीताम् दृष्ट्वा दुःखम् तथा गताम् । तां तु लक्ष्मण राम इति क्रोशन्तीम् मधुर स्वराम् ॥ 52.42 ॥
vikrośantīm dṛḍham sītām dṛṣṭvā duḥkham tathā gatām | tāṃ tu lakṣmaṇa rāma iti krośantīm madhura svarām || 52.42 ||
इतने दुःख में पड़ी सीता को इस प्रकार ऊँचे स्वर में विलाप करते तथा मधुर स्वर से बार-बार 'लक्ष्मण! राम!' पुकारते देखकर—
श्लोक 43 (aranya.52.43)
अवेक्षमाणाम् बहुशो वैदेहीम् धरणी तलम् । स ताम् आकुल केशान्ताम् विप्रमृष्ट विशेषकाम् । जहार आत्म विनाशाय दशग्रीवो मनस्विनाम् ॥ 52.43 ॥
avekṣamāṇām bahuśo vaidehīm dharaṇī talam | sa tām ākula keśāntām vipramṛṣṭa viśeṣakām | jahāra ātma vināśāya daśagrīvo manasvinām || 52.43 ||
—तथा बार-बार भूमि की ओर दृष्टि दौड़ाती हुई, बिखरे केशों और मिटे हुए तिलक वाली उस दृढ़चित्त पतिव्रता सीता का उस दशग्रीव ने हरण किया—अपने ही विनाश के लिए।
श्लोक 44 (aranya.52.44)
ततः तु सा चारु दती शुचि स्मिता विना कृता बन्धु जनेन मैथिली । अपश्यती राघव लक्ष्मणाउ उभौ विवर्ण वक्त्रा भय भार पीडिता ॥ 52.44 ॥
tataḥ tu sā cāru datī śuci smitā vinā kṛtā bandhu janena maithilī | apaśyatī rāghava lakṣmaṇāu ubhau vivarṇa vaktrā bhaya bhāra pīḍitā || 52.44 ||
तब वह सुंदर दंतपंक्ति और निर्मल मुस्कान वाली मैथिली, अपने बंधु-बांधवों से बिछुड़कर, राघव और लक्ष्मण—दोनों में से किसी को भी न देख पाने के कारण, भय के भार से दबकर विवर्ण मुख वाली हो गई।