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अरण्यकाण्ड · सर्ग 54

सीता के आभूषण और रावण की लंका-वापसी

सर्ग 53सर्ग-सूचीसर्ग 55

श्लोक 1 (aranya.54.1)

ह्रियमाणा तु वैदेही कंचित् नाथम् अपश्यती । ददर्श गिरि शृंगस्थान् पंच वानर पुंगवान् ॥ 54.1 ॥

hriyamāṇā tu vaidehī kaṃcit nātham apaśyatī | dadarśa giri śṛṃgasthān paṃca vānara puṃgavān || 54.1 ||

हरी जाती हुई वैदेही ने कहीं कोई रक्षक न देखकर पर्वत-शिखर पर बैठे हुए पाँच श्रेष्ठ वानरों को देखा।

श्लोक 2 (aranya.54.2)

तेषाम् मध्ये विशालाक्षी कौशेयम् कनक प्रभम् । उत्तरीयम् वरारोहा शुभानि आभरणानि च ॥ 54.2 ॥

teṣām madhye viśālākṣī kauśeyam kanaka prabham | uttarīyam varārohā śubhāni ābharaṇāni ca || 54.2 ||

उन वानरों के बीच उस विशाल नेत्रों वाली सुंदरी ने अपने स्वर्णाभ रेशमी उत्तरीय वस्त्र और सुंदर आभूषणों के विषय में सोचा—

श्लोक 3 (aranya.54.3)

मुमोच यदि रामाय शंसेयुः इति भामिनी । वस्त्रम् उत्सृज्य तत् मध्ये विनिक्षिप्तम् स भूषणम् ॥ 54.3 ॥

mumoca yadi rāmāya śaṃseyuḥ iti bhāminī | vastram utsṛjya tat madhye vinikṣiptam sa bhūṣaṇam || 54.3 ||

—यह सोचकर कि 'शायद ये इन्हें राम को दिखा दें,' उस क्रोधयुक्त सीता ने अपने वस्त्र को आभूषणों सहित बाँधकर उनके बीच गिरा दिया।

श्लोक 4 (aranya.54.4)

संभ्रमात् तु दशग्रीवः तत् कर्म न च बुद्ध्वान् । पिंगाक्षाः ताम् विशालाक्षीम् नेत्रैः अनिमिषैः इव ॥ 54.4 ॥

saṃbhramāt tu daśagrīvaḥ tat karma na ca buddhvān | piṃgākṣāḥ tām viśālākṣīm netraiḥ animiṣaiḥ iva || 54.4 ||

अपनी शीघ्रता में दशग्रीव रावण ने उसके इस कार्य को नहीं देखा; और वे पीत नेत्रों वाले श्रेष्ठ वानर अपलक नेत्रों से—

श्लोक 5 (aranya.54.5)

विक्रोशन्तीम् तदा सीताम् ददृशुः वानर ऋषभाः । स च पंपाम् अतिक्रम्य लंकाम् अभिमुखः पुरीम् ॥ 54.5 ॥

vikrośantīm tadā sītām dadṛśuḥ vānara ṛṣabhāḥ | sa ca paṃpām atikramya laṃkām abhimukhaḥ purīm || 54.5 ||

—विशाल नेत्रों वाली सीता को उस समय विलाप करते हुए देखते रहे। और पंपा प्रदेश को पार करके, लंकापुरी की ओर मुख करके वह राक्षसराज—

श्लोक 6 (aranya.54.6)

जगाम रुदतीम् गृह्य मैथिलीम् राक्षस ईश्वरः । ताम् जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युम् आत्मनः ॥ 54.6 ॥

jagāma rudatīm gṛhya maithilīm rākṣasa īśvaraḥ | tām jahāra susaṃhṛṣṭo rāvaṇo mṛtyum ātmanaḥ || 54.6 ||

—रोती हुई मैथिली को लेकर आगे बढ़ता गया। रावण, अत्यंत प्रसन्न होकर, अपनी ही मृत्यु को उठाए हुए जा रहा था—

श्लोक 7 (aranya.54.7)

उत्संगेन एव भुजगीम् तीक्ष्ण दंष्ट्राम् महाविषाम् । वनानि सरितः शैलान् सरांसि च विहायसा ॥ 54.7 ॥

utsaṃgena eva bhujagīm tīkṣṇa daṃṣṭrām mahāviṣām | vanāni saritaḥ śailān sarāṃsi ca vihāyasā || 54.7 ||

—मानो अपनी गोद में तीक्ष्ण दाढ़ों वाली और अत्यंत विषैली नागिन को लिए हो। वह आकाश-मार्ग से वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरों के ऊपर से होकर—

श्लोक 8 (aranya.54.8)

स क्षिप्रम् समतीयाय शरः चापात् इव च्युतः । तिमि नक्र निकेतम् तु वरुण आलयम् अक्षयम् ॥ 54.8 ॥

sa kṣipram samatīyāya śaraḥ cāpāt iva cyutaḥ | timi nakra niketam tu varuṇa ālayam akṣayam || 54.8 ||

—धनुष से छूटे हुए बाण की भाँति तीव्र गति से पार करता गया। वह वरुण के घर, तिमि और मगरमच्छों के अक्षय आवास, उस समुद्र के पास पहुँचा—

श्लोक 9 (aranya.54.9)

सरिताम् शरणम् गत्वा समतीयाय सागरम् । संभ्रमात् परिवृत्त ऊर्मी रुद्ध मीन महोरगः ॥ 54.9 ॥

saritām śaraṇam gatvā samatīyāya sāgaram | saṃbhramāt parivṛtta ūrmī ruddha mīna mahoragaḥ || 54.9 ||

—जो समस्त नदियों का अंतिम आश्रय है, और उसे शीघ्रता से पार कर गया। वैदेही के इस प्रकार ले जाए जाते समय वह वरुणालय, अपने उद्वेग में—

श्लोक 10 (aranya.54.10)

वैदेह्याम् ह्रियमाणायाम् बभूव वरुण आलयः । अन्तरिक्ष गता वाचः ससृजुः चारणाः तदा ॥ 54.10 ॥

vaidehyām hriyamāṇāyām babhūva varuṇa ālayaḥ | antarikṣa gatā vācaḥ sasṛjuḥ cāraṇāḥ tadā || 54.10 ||

—अपनी लहरों को उलट-पुलट कर उठा, और उसकी मछलियाँ तथा विशाल जलचर सर्प भयभीत होकर ठिठक गए। तभी आकाश में विचरण करते सिद्धों और चारणों ने—

श्लोक 11 (aranya.54.11)

एतत् अन्तो दशग्रीव इति सिद्धाः तदा अब्रुवन् । स तु सीताम् विचेष्टन्तीम् अंकेन आदाय रावणः ॥ 54.11 ॥

etat anto daśagrīva iti siddhāḥ tadā abruvan | sa tu sītām viceṣṭantīm aṃkena ādāya rāvaṇaḥ || 54.11 ||

—यह कहा, 'अब दशग्रीव का अंत निकट है!' और छटपटाती हुई सीता को अपने पार्श्व में लिए हुए रावण—

श्लोक 12 (aranya.54.12)

प्रविवेश पुरीम् लन्काम् रूपिणीम् मृत्युम् आत्मनः । सः अभिगम्य पुरीम् लंकाम् सुविभक्त महापथाम् ॥ 54.12 ॥

praviveśa purīm lankām rūpiṇīm mṛtyum ātmanaḥ | saḥ abhigamya purīm laṃkām suvibhakta mahāpathām || 54.12 ||

—लंकापुरी में प्रवेश कर गया, मानो साक्षात मृत्यु को ही सीता के रूप में लिए हुए। सुव्यवस्थित विशाल राजमार्गों वाली उस लंकापुरी के निकट पहुँचकर—

श्लोक 13 (aranya.54.13)

संरूढ कक्ष्या बहुलम् स्वम् अंतः पुरम् आविशत् । तत्र ताम् असित अपांगाम् शोक मोह परायणाम् ॥ 54.13 ॥

saṃrūḍha kakṣyā bahulam svam aṃtaḥ puram āviśat | tatra tām asita apāṃgām śoka moha parāyaṇām || 54.13 ||

—वह अनेक कक्षों से भरे अपने अंतःपुर में प्रविष्ट हुआ। वहाँ उसने कज्जल-नेत्रों वाली, शोक और मोह में डूबी हुई सीता को रखा—

श्लोक 14 (aranya.54.14)

निदधे रावणः सीताम् मयो मायाम् इव आसुरीम् । अब्रवीत् च दशग्रीवः पिशाचीः घोर दर्शनाः ॥ 54.14 ॥

nidadhe rāvaṇaḥ sītām mayo māyām iva āsurīm | abravīt ca daśagrīvaḥ piśācīḥ ghora darśanāḥ || 54.14 ||

—मानो राक्षस मय ने अपनी आसुरी माया को किसी गुप्त स्थान में रख दिया हो। और दशग्रीव रावण ने उन भयंकर दिखने वाली राक्षसियों से यह कहा—

श्लोक 15 (aranya.54.15)

यथा न एनाम् पुमान् स्त्री वा सीताम् पश्यति असम्मतः । मुक्ता मणि सुवर्णानि वस्त्राणि आभरणानि च ॥ 54.15 ॥

yathā na enām pumān strī vā sītām paśyati asammataḥ | muktā maṇi suvarṇāni vastrāṇi ābharaṇāni ca || 54.15 ||

—'ऐसा प्रबंध करो कि कोई भी पुरुष या स्त्री बिना अनुमति सीता को न देख सके।' मोती, रत्न, स्वर्ण, वस्त्र तथा आभूषण—

श्लोक 16 (aranya.54.16)

यत् यत् इच्छेत् तत् एव अस्या देयम् मत् च्छंदतो यथा । या च वक्ष्यति वैदेहीम् वचनम् किंचित् अप्रियम् ॥ 54.16 ॥

yat yat icchet tat eva asyā deyam mat cchaṃdato yathā | yā ca vakṣyati vaidehīm vacanam kiṃcit apriyam || 54.16 ||

—वह जो कुछ भी चाहे, वह सब उसे उसी प्रकार दिया जाए, जैसे मेरी अपनी इच्छा हो। और जो कोई भी वैदेही से थोड़ा भी अप्रिय वचन कहेगी—

श्लोक 17 (aranya.54.17)

अज्ञानात् यदि वा ज्ञानान् न तस्या जीवितम् प्रियम् । तथा उक्त्वा राक्षसीः ताः तु राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ 54.17 ॥

ajñānāt yadi vā jñānān na tasyā jīvitam priyam | tathā uktvā rākṣasīḥ tāḥ tu rākṣasendraḥ pratāpavān || 54.17 ||

—चाहे जानबूझकर या अनजाने में, उसका अपना जीवन ही उसके लिए अप्रिय हो जाएगा।' उन राक्षसियों से इस प्रकार कहकर, वह प्रतापी राक्षसराज—

श्लोक 18 (aranya.54.18)

निष्क्रम्य अन्तः पुरात् तस्मात् किम् कृत्यम् इति चिंतयन् । ददर्श अष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशित अशनान् ॥ 54.18 ॥

niṣkramya antaḥ purāt tasmāt kim kṛtyam iti ciṃtayan | dadarśa aṣṭau mahāvīryān rākṣasān piśita aśanān || 54.18 ||

—अंतःपुर से बाहर निकला, और आगे क्या करना है, यह सोचते हुए उसने महापराक्रमी, कच्चा माँस खाने वाले आठ राक्षसों को दर्शन दिए।

श्लोक 19 (aranya.54.19)

स तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वर दानेन मोहितः । उवाच तान् इदम् वाक्यम् प्रशस्य बल वीर्यतः ॥ 54.19 ॥

sa tān dṛṣṭvā mahāvīryo vara dānena mohitaḥ | uvāca tān idam vākyam praśasya bala vīryataḥ || 54.19 ||

उस वरदान से अभिमानी हुए महापराक्रमी रावण ने उन्हें देखकर तथा उनके बल-पराक्रम की सराहना करते हुए उनसे यह वचन कहा:

श्लोक 20 (aranya.54.20)

नाना प्रहरणाः क्षिप्रम् इतो गच्छत सत्वराः । जनस्थानम् हत स्थानम् भूत पूर्वम् खर आलयम् ॥ 54.20 ॥

nānā praharaṇāḥ kṣipram ito gacchata satvarāḥ | janasthānam hata sthānam bhūta pūrvam khara ālayam || 54.20 ||

'अनेक प्रकार के शस्त्र लेकर तुम शीघ्र ही यहाँ से जनस्थान की ओर जाओ—वही स्थान, जो पहले खर का निवास था और जहाँ अब राक्षस मारे जा चुके हैं—'

श्लोक 21 (aranya.54.21)

तत्र उष्यताम् जनस्थाने शून्ये निहत राक्षसे । पौरुषम् बलम् आश्रित्य त्रासम् उत्सृज्य दूरतः ॥ 54.21 ॥

tatra uṣyatām janasthāne śūnye nihata rākṣase | pauruṣam balam āśritya trāsam utsṛjya dūrataḥ || 54.21 ||

'—और उस राक्षसविहीन जनस्थान में अपने पुरुषार्थ का आश्रय लेकर, भय को दूर फेंककर निवास करो।'

श्लोक 22 (aranya.54.22)

बहु सैन्यम् महावीर्यम् जनस्थाने निवेशितम् । स दूषण खरम् युद्धे निहतम् राम सायकैः ॥ 54.22 ॥

bahu sainyam mahāvīryam janasthāne niveśitam | sa dūṣaṇa kharam yuddhe nihatam rāma sāyakaiḥ || 54.22 ||

'जनस्थान में एक विशाल और महाबली सेना तैनात थी; फिर भी राम के बाणों ने युद्ध में दूषण और खर सहित उसे नष्ट कर डाला।'

श्लोक 23 (aranya.54.23)

ततः क्रोधो मम अपूर्वो धैर्यस्य उपरि वर्धते । वैरम् च सुमहत् जातम् रामम् प्रति सुदारुणम् ॥ 54.23 ॥

tataḥ krodho mama apūrvo dhairyasya upari vardhate | vairam ca sumahat jātam rāmam prati sudāruṇam || 54.23 ||

'इसी कारण मेरे भीतर एक अभूतपूर्व क्रोध मेरे धैर्य से भी ऊपर बढ़ रहा है, और राम के प्रति अत्यंत भयंकर वैर उत्पन्न हो गया है।'

श्लोक 24 (aranya.54.24)

निर्यातयितुम् इच्छामि तत् च वैरम् अहम् रिपोः । न हि लप्स्यामि अहम् निद्राम् अहत्वा संयुगे रिपुम् ॥ 54.24 ॥

niryātayitum icchāmi tat ca vairam aham ripoḥ | na hi lapsyāmi aham nidrām ahatvā saṃyuge ripum || 54.24 ||

'मैं अपने उस शत्रु से यह वैर चुकाना चाहता हूँ—क्योंकि जब तक युद्ध में उस शत्रु का वध नहीं कर लेता, तब तक मुझे नींद नहीं आएगी।'

श्लोक 25 (aranya.54.25)

तम् तु इदानीम् अहम् हत्वा खर दूषण घातिनम् । रामम् शर्म उपलप्स्यामि धनम् लब्ध्वा इव निर्धनः ॥ 54.25 ॥

tam tu idānīm aham hatvā khara dūṣaṇa ghātinam | rāmam śarma upalapsyāmi dhanam labdhvā iva nirdhanaḥ || 54.25 ||

'खर और दूषण के हत्यारे उस राम को मारकर ही मुझे शांति मिलेगी—जैसे किसी निर्धन को अचानक धन प्राप्त हो जाए।'

श्लोक 26 (aranya.54.26)

जनस्थाने वसद्भिः तु भवद्भिः रामम् आश्रिता । प्रवृत्तिः उपनेतव्या किम् करोति इति तत्त्वतः ॥ 54.26 ॥

janasthāne vasadbhiḥ tu bhavadbhiḥ rāmam āśritā | pravṛttiḥ upanetavyā kim karoti iti tattvataḥ || 54.26 ||

'जनस्थान में रहते हुए तुम्हें राम की गतिविधियों और उसका आश्रय लेने वालों का यथार्थ समाचार मेरे पास लाना होगा—कि वह क्या कर रहा है।'

श्लोक 27 (aranya.54.27)

अप्रमादात् च गंतव्यम् सर्वैः एव निशाचरैः । कर्तव्यः च सदा यत्नो राघवस्य वधम् प्रति ॥ 54.27 ॥

apramādāt ca gaṃtavyam sarvaiḥ eva niśācaraiḥ | kartavyaḥ ca sadā yatno rāghavasya vadham prati || 54.27 ||

'तुम सब निशाचर बिना किसी असावधानी के वहाँ जाओ, और सदैव राघव के वध के लिए प्रयत्नशील रहो।'

श्लोक 28 (aranya.54.28)

युष्माकम् तु बलम् ज्ञातम् बहुशो रण मूर्धनि । अतः तु अस्मिन् जनस्थाने मया यूयम् नियोजिताः ॥ 54.28 ॥

yuṣmākam tu balam jñātam bahuśo raṇa mūrdhani | ataḥ tu asmin janasthāne mayā yūyam niyojitāḥ || 54.28 ||

'रणभूमि में अनेक बार सिद्ध हुए तुम्हारे बल को मैं भलीभाँति जानता हूँ; इसी कारण मैंने तुम्हें इस जनस्थान में नियुक्त किया है।' इस प्रकार रावण ने उन आठों राक्षसों से कहा।

श्लोक 29 (aranya.54.29)

ततः प्रियम् वाक्यम् उपेत्य राक्षसा महाअर्थम् अष्टौ अभिवाद्य रावणम् । विहाय लंकाम् सहिताः प्रतस्थिरे यतो जनस्थानम् अलक्ष्य दर्शनाः ॥ 54.29 ॥

tataḥ priyam vākyam upetya rākṣasā mahāartham aṣṭau abhivādya rāvaṇam | vihāya laṃkām sahitāḥ pratasthire yato janasthānam alakṣya darśanāḥ || 54.29 ||

तब वे आठों राक्षस रावण के इन प्रिय और गंभीर वचनों को सुनकर उसे प्रणाम कर, लंका को छोड़कर एक साथ अदृश्य रूप में जनस्थान की ओर चल पड़े।

श्लोक 30 (aranya.54.30)

ततः तु सीताम् उपलभ्य रावणः सुसंप्रहृष्टः परिगृह्य मैथिलीम् । प्रसज्य रामेण च वैरम् उत्तमम् बभूव मोहात् मुदितः स राक्षसः ॥ 54.30 ॥

tataḥ tu sītām upalabhya rāvaṇaḥ susaṃprahṛṣṭaḥ parigṛhya maithilīm | prasajya rāmeṇa ca vairam uttamam babhūva mohāt muditaḥ sa rākṣasaḥ || 54.30 ||

तब सीता को इस प्रकार प्राप्त कर तथा मैथिली पर अधिकार जमाकर रावण अत्यंत हर्षित हुआ—और साथ ही राम के साथ इस प्रकार गहन वैर उत्पन्न हो जाने से भी प्रसन्न होकर वह राक्षस अपने ही मोह में आनंदित होने लगा।

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