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अरण्यकाण्ड · सर्ग 64

संघर्ष के चिह्न

सर्ग 63सर्ग-सूचीसर्ग 65

श्लोक 1 (aranya.64.1)

स दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणम् वाक्यम् अब्रवीत् । शीघ्रम् लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरीम् नदीम् ॥ 64.1 ॥

sa dīno dīnayā vācā lakṣmaṇam vākyam abravīt | śīghram lakṣmaṇa jānīhi gatvā godāvarīm nadīm || 64.1 ||

वे दीन राम दीन वाणी में लक्ष्मण से बोले - "हे लक्ष्मण! शीघ्र जाकर गोदावरी नदी पर पता लगाओ -

श्लोक 2 (aranya.64.2)

अपि गोदावरीम् सीता पद्मानि आनयितुम् गता । एवम् उक्तः तु रामेण लक्ष्मणः पुनः एव हि ॥ 64.2 ॥

api godāvarīm sītā padmāni ānayitum gatā | evam uktaḥ tu rāmeṇa lakṣmaṇaḥ punaḥ eva hi || 64.2 ||

क्या सीता कमल लाने के लिए गोदावरी गई हैं।" राम द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर लक्ष्मण पुनः

श्लोक 3 (aranya.64.3)

नदीम् गोदावरीम् रम्याम् जगाम लघु विक्रमः । ताम् लक्ष्मणः तीर्थवतीम् विचित्वा रामम् अब्रवीत् ॥ 64.3 ॥

nadīm godāvarīm ramyām jagāma laghu vikramaḥ | tām lakṣmaṇaḥ tīrthavatīm vicitvā rāmam abravīt || 64.3 ||

फुर्ती से उस रमणीय गोदावरी नदी की ओर गए। तीर्थों से युक्त उस नदी को खोजकर लक्ष्मण ने राम से कहा -

श्लोक 4 (aranya.64.4)

नैनाम् पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो न शृणोति मे । कम् नु सा देशम् आपन्ना वैदेही क्लेश नाशिनी ॥ 64.4 ॥

nainām paśyāmi tīrtheṣu krośato na śṛṇoti me | kam nu sā deśam āpannā vaidehī kleśa nāśinī || 64.4 ||

"मुझे वे किसी तीर्थ पर दिखाई नहीं दीं, और पुकारने पर भी वे नहीं सुन रहीं। मेरे क्लेश को दूर करने वाली वैदेही किस देश को चली गई हैं?

श्लोक 5 (aranya.64.5)

न हि तम् वेद्मि वै राम यत्र सा तनु मध्यमा । लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दीनः संताप मोहितः ॥ 64.5 ॥

na hi tam vedmi vai rāma yatra sā tanu madhyamā | lakṣmaṇasya vacaḥ śrutvā dīnaḥ saṃtāpa mohitaḥ || 64.5 ||

हे राम! मुझे यह ज्ञात नहीं कि वह तनुमध्यमा कहाँ हैं।" लक्ष्मण के वचन सुनकर, संताप से मोहित दीन राम,

श्लोक 6 (aranya.64.6)

रामः समभिचक्राम स्वयम् गोदावरीम् नदीम् । स ताम् उपस्थितो रामः क्व सीते इति एवम् अब्रवीत् ॥ 64.6 ॥

rāmaḥ samabhicakrāma svayam godāvarīm nadīm | sa tām upasthito rāmaḥ kva sīte iti evam abravīt || 64.6 ||

स्वयं गोदावरी नदी की ओर गए। उस नदी के समीप खड़े होकर राम ने इस प्रकार पुकारा - "हे सीते! तुम कहाँ हो?"

श्लोक 7 (aranya.64.7)

भूतानि राक्षसेन्द्रेण वध अर्हेण हृताम् अपि । न ताम् शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी ॥ 64.7 ॥

bhūtāni rākṣasendreṇa vadha arheṇa hṛtām api | na tām śaśaṃsū rāmāya tathā godāvarī nadī || 64.7 ||

उस वध्य राक्षसराज द्वारा सीता के हरण की बात न तो वन के प्राणियों ने और न ही गोदावरी नदी ने राम को बताई।

श्लोक 8 (aranya.64.8)

ततः प्रचोदिता भूतैः शंस च अस्मै प्रियाम् इति । न च सा हि अवदत् सीताम् पृष्टा रामेण शोचता ॥ 64.8 ॥

tataḥ pracoditā bhūtaiḥ śaṃsa ca asmai priyām iti | na ca sā hi avadat sītām pṛṣṭā rāmeṇa śocatā || 64.8 ||

तब प्राणियों द्वारा प्रेरित किए जाने पर भी - "इन्हें इनकी प्रिया के बारे में बताओ" - शोकाकुल राम द्वारा पूछे जाने पर भी उस नदी ने सीता के विषय में कुछ नहीं बताया।

श्लोक 9 (aranya.64.9)

रावणस्य च तत् रूपम् कर्माणि च दुरात्मनः । ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीम् सा नदी न शशंस ह ॥ 64.9 ॥

rāvaṇasya ca tat rūpam karmāṇi ca durātmanaḥ | dhyātvā bhayāt tu vaidehīm sā nadī na śaśaṃsa ha || 64.9 ||

उस दुरात्मा रावण के रूप और कर्मों का स्मरण कर, भयवश उस नदी ने वैदेही के विषय में कुछ नहीं कहा।

श्लोक 10 (aranya.64.10)

निराशः तु तया नद्या सीताया दर्शने कृतः । उवाच रामः सौमित्रिम् सीता दर्शन कर्शितः ॥ 64.10 ॥

nirāśaḥ tu tayā nadyā sītāyā darśane kṛtaḥ | uvāca rāmaḥ saumitrim sītā darśana karśitaḥ || 64.10 ||

उस नदी द्वारा सीता को देख पाने की आशा से वंचित होकर, सीता-दर्शन की लालसा से क्षीण राम ने सौमित्र से कहा -

श्लोक 11 (aranya.64.11)

एषा गोदावरी सौम्य किंचन् न प्रतिभाषते । किम् नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकम् वचः ॥ 64.11 ॥

eṣā godāvarī saumya kiṃcan na pratibhāṣate | kim nu lakṣmaṇa vakṣyāmi sametya janakam vacaḥ || 64.11 ||

"हे सौम्य! यह गोदावरी मुझे कुछ भी उत्तर नहीं दे रही। हे लक्ष्मण! राजा जनक से मिलकर मैं क्या कहूँगा?

श्लोक 12 (aranya.64.12)

मातरम् चैव वैदेह्या विना ताम् अहम् अप्रियम् । या मे राज्य विहीनस्य वने वन्येन जीवतः ॥ 64.12 ॥

mātaram caiva vaidehyā vinā tām aham apriyam | yā me rājya vihīnasya vane vanyena jīvataḥ || 64.12 ||

और वैदेही की माता से भी, उनके बिना मैं क्या अप्रिय बात कहूँगा - जो मुझ राज्यविहीन, वन में वन्य पदार्थों पर जीवन बिताने वाले के लिए,

श्लोक 13 (aranya.64.13)

सर्वम् व्यपनयत् शोकम् वैदेही क्व नु सा गता । ज्ञाति वर्ग विहीनस्य राज पुत्रीम् अपश्यतः ॥ 64.13 ॥

sarvam vyapanayat śokam vaidehī kva nu sā gatā | jñāti varga vihīnasya rāja putrīm apaśyataḥ || 64.13 ||

मेरे समस्त शोक को दूर कर देती थीं। वह वैदेही कहाँ चली गईं? अपने बंधु-बांधवों से दूर, राजकुमारी को न देख पाने वाले मुझे,

श्लोक 14 (aranya.64.14)

मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रतः । मंदाकिनीम् जनस्थानम् इमम् प्रस्रवणम् गिरिम् ॥ 64.14 ॥

manye dīrghā bhaviṣyanti rātrayo mama jāgrataḥ | maṃdākinīm janasthānam imam prasravaṇam girim || 64.14 ||

मुझे लगता है कि जागते हुए मेरी रातें अब बहुत लंबी हो जाएँगी। मंदाकिनी, इस जनस्थान और झरनों से भरे इस पर्वत को -

श्लोक 15 (aranya.64.15)

सर्वाणि अनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते । एते महा मृगा वीर माम् ईक्षन्ते पुनः पुनः ॥ 64.15 ॥

sarvāṇi anucariṣyāmi yadi sītā hi labhyate | ete mahā mṛgā vīra mām īkṣante punaḥ punaḥ || 64.15 ||

इन सबको मैं ढूँढूँगा, यदि सीता कहीं मिल जाएँ। हे वीर! ये विशाल मृग बार-बार मेरी ओर देख रहे हैं,

श्लोक 16 (aranya.64.16)

वक्तु कामा इह हि मे इंगितानि अनुपलक्षये । तान् तु दृष्ट्वा नरव्याघ्र राघवः प्रत्युवाच ह ॥ 64.16 ॥

vaktu kāmā iha hi me iṃgitāni anupalakṣaye | tān tu dṛṣṭvā naravyāghra rāghavaḥ pratyuvāca ha || 64.16 ||

मानो मुझसे कुछ कहना चाहते हों - मैं उनके संकेतों से यह समझ रहा हूँ।" उन्हें देखकर पुरुषसिंह राघव ने तुरंत उनसे कहा -

श्लोक 17 (aranya.64.17)

क्व सीत इति निरीक्षन् वै बाष्प संरुद्धया गिरा । एवम् उक्ता नरेन्द्रेण ते मृगाः सहसा उत्थिता ॥ 64.17 ॥

kva sīta iti nirīkṣan vai bāṣpa saṃruddhayā girā | evam uktā narendreṇa te mṛgāḥ sahasā utthitā || 64.17 ||

उन्हें ताकते हुए, आँसुओं से रुँधे स्वर में, "सीता कहाँ है?" इस प्रकार नरेन्द्र द्वारा पूछे जाने पर वे मृग तुरंत उठ खड़े हुए,

श्लोक 18 (aranya.64.18)

दक्षिण अभिमुखाः सर्वे दर्शयन्तो नभः स्थलम् । मैथिली ह्रियमाणा सा दिशम् याम् अभ्यपद्यत ॥ 64.18 ॥

dakṣiṇa abhimukhāḥ sarve darśayanto nabhaḥ sthalam | maithilī hriyamāṇā sā diśam yām abhyapadyata || 64.18 ||

और सब दक्षिण की ओर मुख करके, आकाश की ओर संकेत करते हुए, उसी दिशा को दिखाने लगे, जिस दिशा में मैथिली को हरकर ले जाया गया था।

श्लोक 19 (aranya.64.19)

तेन मार्गेण गच्छन्तो निरीक्षन्तो नराधिपम् । येन मार्गम् च भूमिम् च निरीक्षन्ते स्म ते मृगाः ॥ 64.19 ॥

tena mārgeṇa gacchanto nirīkṣanto narādhipam | yena mārgam ca bhūmim ca nirīkṣante sma te mṛgāḥ || 64.19 ||

उसी मार्ग पर चलते हुए, नरेश की ओर देखते हुए, वे मृग उसी मार्ग और भूमि की ओर बार-बार देख रहे थे -

श्लोक 20 (aranya.64.20)

पुनः नदन्तो गच्छन्ति लक्ष्मणेन उपलक्षिताः । तेषाम् वचन सर्वस्वम् लक्षयामास च इन्गितम् ॥ 64.20 ॥

punaḥ nadanto gacchanti lakṣmaṇena upalakṣitāḥ | teṣām vacana sarvasvam lakṣayāmāsa ca ingitam || 64.20 ||

बार-बार बोलते हुए वे आगे बढ़ रहे थे, और लक्ष्मण ने इसे लक्षित किया तथा उनके संकेतों का सम्पूर्ण भाव समझ लिया।

श्लोक 21 (aranya.64.21)

उवाच लक्ष्मणो धीमान् ज्येष्ठम् भ्रातरम् आर्तवत् । क्व सीत इति त्वया पृष्टा यथा इमे सहसा उथिताः ॥ 64.21 ॥

uvāca lakṣmaṇo dhīmān jyeṣṭham bhrātaram ārtavat | kva sīta iti tvayā pṛṣṭā yathā ime sahasā uthitāḥ || 64.21 ||

बुद्धिमान लक्ष्मण ने व्याकुल होकर अपने बड़े भाई से कहा - "जैसे ही आपने पूछा, 'सीता कहाँ है?', ये तुरंत उठ खड़े हुए,

श्लोक 22 (aranya.64.22)

दर्शयन्ति क्षितिम् चैव दक्षिणाम् च दिशम् मृगाः । सधु गच्छावहे देव दिशम् एताम् च नैर्ऋतीम् ॥ 64.22 ॥

darśayanti kṣitim caiva dakṣiṇām ca diśam mṛgāḥ | sadhu gacchāvahe deva diśam etām ca nairṛtīm || 64.22 ||

और भूमि तथा दक्षिण दिशा दोनों की ओर संकेत कर रहे हैं। हे देव! आइए, हम इस दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर चलें -

श्लोक 23 (aranya.64.23)

यदि तस्य आगमः कश्चित् आर्या वा सा अथ लक्ष्यते । बाढम् इति एव काकुत्स्थः प्रस्थितो दक्षिणाम् दिशम् ॥ 64.23 ॥

yadi tasya āgamaḥ kaścit āryā vā sā atha lakṣyate | bāḍham iti eva kākutsthaḥ prasthito dakṣiṇām diśam || 64.23 ||

शायद वहाँ उसका कोई सुराग मिले, अथवा वह आर्या स्वयं दिखाई दें।" "ऐसा ही हो," कहकर काकुत्स्थ दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

श्लोक 24 (aranya.64.24)

लक्ष्मण अनुगत श्रीमान् वीक्ष्यमाणो वसुन्धराम् । एवम् संभाषमाणौ तौ अन्योन्यम् भ्रातरौ उभौ ॥ 64.24 ॥

lakṣmaṇa anugata śrīmān vīkṣyamāṇo vasundharām | evam saṃbhāṣamāṇau tau anyonyam bhrātarau ubhau || 64.24 ||

श्रीमान राम, लक्ष्मण के साथ, पृथ्वी को निहारते हुए चले; इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करते हुए वे दोनों भाई,

श्लोक 25 (aranya.64.25)

वसुन्धरायाम् पतित पुष्प मार्गम् अपश्यताम् । पुष्प वृष्टिम् निपतिताम् दृष्ट्वा रामो मही तले ॥ 64.25 ॥

vasundharāyām patita puṣpa mārgam apaśyatām | puṣpa vṛṣṭim nipatitām dṛṣṭvā rāmo mahī tale || 64.25 ||

भूमि पर बिखरे हुए फूलों के मार्ग को देख गए। पृथ्वी पर बिखरी हुई उस पुष्पवृष्टि को देखकर राम ने,

श्लोक 26 (aranya.64.26)

उवाच लक्ष्मणम् वीरो दुःखितो दुःखितम् वचः । अभिजानामि पुष्पाणि तानि इमानि इह लक्ष्मण ॥ 64.26 ॥

uvāca lakṣmaṇam vīro duḥkhito duḥkhitam vacaḥ | abhijānāmi puṣpāṇi tāni imāni iha lakṣmaṇa || 64.26 ||

दुःखी वीर राम ने दुःखी लक्ष्मण से कहा - "हे लक्ष्मण! मैं इन फूलों को पहचानता हूँ -

श्लोक 27 (aranya.64.27)

अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने । मन्ये सूर्यः च वायुः च मेदिनी च यशस्विनी ॥ 64.27 ॥

apinaddhāni vaidehyā mayā dattāni kānane | manye sūryaḥ ca vāyuḥ ca medinī ca yaśasvinī || 64.27 ||

ये वे ही हैं जो मैंने वन में वैदेही को दिए थे और उन्होंने अपने केशों में सजाए थे। मुझे लगता है कि सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वी -

श्लोक 28 (aranya.64.28)

अभिरक्षन्ति पुष्पाणि प्रकुर्वन्तो मम प्रियम् । एवम् उक्त्वा महाबाहुः लक्ष्मणम् पुरुषर्षभम् ॥ 64.28 ॥

abhirakṣanti puṣpāṇi prakurvanto mama priyam | evam uktvā mahābāhuḥ lakṣmaṇam puruṣarṣabham || 64.28 ||

मुझ पर कृपा करते हुए इन फूलों की रक्षा कर रहे हैं।" पुरुषश्रेष्ठ लक्ष्मण से यह कहकर, महाबाहु राम ने,

श्लोक 29 (aranya.64.29)

उवाच रामो धर्मात्मा गिरिम् प्रसवण आकुलम् । कच्चित् क्षिति भृताम् नाथ दृष्टा सर्वांग सुंदरीम् ॥ 64.29 ॥

uvāca rāmo dharmātmā girim prasavaṇa ākulam | kaccit kṣiti bhṛtām nātha dṛṣṭā sarvāṃga suṃdarīm || 64.29 ||

धर्मात्मा राम ने झरनों से गुँजायमान उस पर्वत से कहा - "हे पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने सर्वांगसुंदरी उस स्त्री को देखा है,

श्लोक 30 (aranya.64.30)

रामा रम्ये वनोद् देशे मया विरहिता त्वया । क्रुद्धो अब्रवीत् गिरिम् तत्र सिंहः क्षुद्र मृगम् यथा ॥ 64.30 ॥

rāmā ramye vanod deśe mayā virahitā tvayā | kruddho abravīt girim tatra siṃhaḥ kṣudra mṛgam yathā || 64.30 ||

जो इस रमणीय वनप्रदेश में मुझसे बिछुड़ गई है?" उत्तर न मिलने पर राम उस पर्वत से क्रोधित होकर वैसे ही बोले, जैसे सिंह किसी तुच्छ पशु पर गरजता है -

श्लोक 31 (aranya.64.31)

ताम् हेम वर्णाम् हेम अंगीम् सीताम् दर्शय पर्वत । यावत् सानूनि सर्वाणि न ते विध्वंसयामि अहम् ॥ 64.31 ॥

tām hema varṇām hema aṃgīm sītām darśaya parvata | yāvat sānūni sarvāṇi na te vidhvaṃsayāmi aham || 64.31 ||

"हे पर्वत! उस स्वर्णवर्णा, स्वर्णांगी सीता को मुझे दिखा दो, इससे पहले कि मैं तुम्हारे समस्त शिखरों को नष्ट कर दूँ!"

श्लोक 32 (aranya.64.32)

एवम् उक्तः तु रामेण पर्वतो मैथिलीम् प्रति । दर्शयन् इव ताम् सीताम् न दर्शयत राघवे ॥ 64.32 ॥

evam uktaḥ tu rāmeṇa parvato maithilīm prati | darśayan iva tām sītām na darśayata rāghave || 64.32 ||

राम द्वारा मैथिली के विषय में इस प्रकार कहे जाने पर, वह पर्वत मानो सीता को दिखाता हुआ प्रतीत होकर भी, राघव को उन्हें वास्तव में नहीं दिखा सका।

श्लोक 33 (aranya.64.33)

ततो दाशरथी राम उवाच शिलोच्चयम् । मम बाण अग्नि निर्दग्धो भस्मी भूतो भविष्यसि ॥ 64.33 ॥

tato dāśarathī rāma uvāca śiloccayam | mama bāṇa agni nirdagdho bhasmī bhūto bhaviṣyasi || 64.33 ||

तब दशरथनंदन राम ने उस शिलासमूह से कहा - "मेरे बाणों की अग्नि से पूर्णतः दग्ध होकर तुम भस्म हो जाओगे;

श्लोक 34 (aranya.64.34)

असेव्यः सततम् चैव निस्तृण द्रुम पल्लवः । इमाम् वा सरितम् च अद्य शोषयिष्यामि लक्ष्मण ॥ 64.34 ॥

asevyaḥ satatam caiva nistṛṇa druma pallavaḥ | imām vā saritam ca adya śoṣayiṣyāmi lakṣmaṇa || 64.34 ||

सदैव के लिए घास, वृक्षों और पल्लवों से रहित हो जाओगे। हे लक्ष्मण! मैं आज इस नदी को भी सुखा डालूँगा,

श्लोक 35 (aranya.64.35)

यदि न आख्याति मे सीताम् अद्य चन्द्र निभ आननाम् । एवम् प्ररुषितो रामो दिधक्षन् इव चक्षुषा ॥ 64.35 ॥

yadi na ākhyāti me sītām adya candra nibha ānanām | evam praruṣito rāmo didhakṣan iva cakṣuṣā || 64.35 ||

यदि वह मुझे अभी चंद्रमुखी सीता के विषय में नहीं बताती।" इस प्रकार अत्यंत क्रुद्ध राम, मानो अपने नेत्रों से ही जला देने की इच्छा से,

श्लोक 36 (aranya.64.36)

ददर्श भूमौ निष्क्रांतम् राक्षसस्य पदम् महत् । त्रस्तया राम काङ्क्षिण्याः प्रधावन्त्या इतः ततः ॥ 64.36 ॥

dadarśa bhūmau niṣkrāṃtam rākṣasasya padam mahat | trastayā rāma kāṅkṣiṇyāḥ pradhāvantyā itaḥ tataḥ || 64.36 ||

उन्होंने भूमि पर पड़े हुए किसी राक्षस के विशाल पैरों के चिह्न देखे, और साथ ही राम की प्रतीक्षा में भयभीत होकर इधर-उधर भागती हुई सीता के पदचिह्न भी,

श्लोक 37 (aranya.64.37)

राक्षसेन अनुवृत्तया वैदेह्या च पादानि तु । स समीक्ष्य परिक्रान्तम् सीताया राक्षसस्य च ॥ 64.37 ॥

rākṣasena anuvṛttayā vaidehyā ca pādāni tu | sa samīkṣya parikrāntam sītāyā rākṣasasya ca || 64.37 ||

जिसका राक्षस पीछा कर रहा था। सीता और राक्षस दोनों के पैरों से रौंदी गई उस भूमि को भलीभाँति देखकर,

श्लोक 38 (aranya.64.38)

भंगम् धनुः च तूणी च विकीर्णाम् बहुधा रथम् । संभ्रांत हृदयो रामः शशंस भ्रातरम् प्रियम् ॥ 64.38 ॥

bhaṃgam dhanuḥ ca tūṇī ca vikīrṇām bahudhā ratham | saṃbhrāṃta hṛdayo rāmaḥ śaśaṃsa bhrātaram priyam || 64.38 ||

तथा टूटे हुए धनुष, बिखरे हुए तरकश और चूर-चूर हुए रथ को देखकर, व्याकुल हृदय राम ने अपने प्रिय भाई से कहा -

श्लोक 39 (aranya.64.39)

पश्य लक्ष्मण वैदेह्याः कीर्णाम् कनक बिन्दवः । भूषणानाम् हि सौमित्रे माल्यानि विविधानि च ॥ 64.39 ॥

paśya lakṣmaṇa vaidehyāḥ kīrṇām kanaka bindavaḥ | bhūṣaṇānām hi saumitre mālyāni vividhāni ca || 64.39 ||

"हे लक्ष्मण! देखो, वैदेही के आभूषणों के ये सुनहरे मनके यहाँ बिखरे पड़े हैं, और हे सौमित्र! उनकी विविध मालाएँ भी -

श्लोक 40 (aranya.64.40)

तप्त बिन्दु निकाशैः च चित्रैः क्षतज बिन्दुभिः । आवृतम् पश्य सौमित्रे सर्वतो धरणी तलम् ॥ 64.40 ॥

tapta bindu nikāśaiḥ ca citraiḥ kṣataja bindubhiḥ | āvṛtam paśya saumitre sarvato dharaṇī talam || 64.40 ||

और देखो, हे सौमित्र! धरती की समस्त सतह चारों ओर तपे हुए सुनहरे बिंदुओं जैसे रक्त की बूँदों से ढँकी हुई है।

श्लोक 41 (aranya.64.41)

मन्ये लक्ष्मण वैदेही राक्षसैः काम रूपिभिः । भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति ॥ 64.41 ॥

manye lakṣmaṇa vaidehī rākṣasaiḥ kāma rūpibhiḥ | bhittvā bhittvā vibhaktā vā bhakṣitā vā bhaviṣyati || 64.41 ||

हे लक्ष्मण! मुझे लगता है कि कामरूपी राक्षसों ने वैदेही को टुकड़े-टुकड़े करके बाँट लिया है, अथवा उन्हें खा लिया है।

श्लोक 42 (aranya.64.42)

तस्या निमित्तम् वैदेह्या द्वयोः विवदमानयोः । बभूव युद्धम् सौमित्रे घोरम् राक्षसयोः इह ॥ 64.42 ॥

tasyā nimittam vaidehyā dvayoḥ vivadamānayoḥ | babhūva yuddham saumitre ghoram rākṣasayoḥ iha || 64.42 ||

हे सौमित्र! उन्हीं के कारण यहाँ दो राक्षसों के बीच परस्पर विवाद होकर घोर युद्ध हुआ प्रतीत होता है।

श्लोक 43 (aranya.64.43)

मुक्ता मणि चितम् च इदम् तपनीय विभूषितम् । धरण्याम् पतितम् सौम्य कस्य भग्नम् महत् धनुः ॥ 64.43 ॥

muktā maṇi citam ca idam tapanīya vibhūṣitam | dharaṇyām patitam saumya kasya bhagnam mahat dhanuḥ || 64.43 ||

हे सौम्य! मोतियों और मणियों से जड़ित, स्वर्ण से अलंकृत यह विशाल धनुष टूटकर भूमि पर पड़ा है - यह किसका है?

श्लोक 44 (aranya.64.44)

राक्षसानाम् इदम् वस्त सुराणाम् अधवा अपि । तरुण आदित्य संकाशम् वैदूर्य गुलिका चितम् ॥ 64.44 ॥

rākṣasānām idam vasta surāṇām adhavā api | taruṇa āditya saṃkāśam vaidūrya gulikā citam || 64.44 ||

क्या यह राक्षसों का है, हे वत्स, अथवा देवताओं का? और उदीयमान सूर्य के समान चमकने वाला, वैदूर्यमणि के मनकों से जड़ित यह -

श्लोक 45 (aranya.64.45)

विशीर्णम् पतितम् भूमौ कवचम् कस्य कांचनम् । छत्रम् शत शलाकम् च दिव्य माल्य उपशोभितम् ॥ 64.45 ॥

viśīrṇam patitam bhūmau kavacam kasya kāṃcanam | chatram śata śalākam ca divya mālya upaśobhitam || 64.45 ||

यह स्वर्णिम कवच टूटकर भूमि पर पड़ा है - यह किसका है? और सौ तीलियों वाला, दिव्य मालाओं से सुशोभित यह छत्र,

श्लोक 46 (aranya.64.46)

भग्न दण्डम् इदम् कस्य भूमौ सौम्य निपातितम् । कांचन उरः छदाः च इमे पिशाच वदनाः खराः ॥ 64.46 ॥

bhagna daṇḍam idam kasya bhūmau saumya nipātitam | kāṃcana uraḥ chadāḥ ca ime piśāca vadanāḥ kharāḥ || 64.46 ||

जिसका दंड टूटकर भूमि पर गिरा है, हे सौम्य! - यह किसका है? और स्वर्णिम कवच पहने ये पिशाचमुखी खच्चर,

श्लोक 47 (aranya.64.47)

भीम रूपा महाकायाः कस्य वा निहता रणे । दीप्त पावक संकाशो द्युतिमान् समर ध्वजः ॥ 64.47 ॥

bhīma rūpā mahākāyāḥ kasya vā nihatā raṇe | dīpta pāvaka saṃkāśo dyutimān samara dhvajaḥ || 64.47 ||

भयंकर रूप और विशाल शरीर वाले, युद्ध में मारे गए ये - किसके थे? और अग्नि के समान देदीप्यमान यह युद्ध-ध्वज,

श्लोक 48 (aranya.64.48)

अपविद्धः च भग्नः च कस्य सांग्रामिको रथः । रथ अक्ष मात्रा विशिखाः तपनीय विभूषणाः ॥ 64.48 ॥

apaviddhaḥ ca bhagnaḥ ca kasya sāṃgrāmiko rathaḥ | ratha akṣa mātrā viśikhāḥ tapanīya vibhūṣaṇāḥ || 64.48 ||

यह किसका रणरथ टूटकर यहाँ फेंका पड़ा है? और रथ के धुरे जैसी मोटाई वाले, स्वर्ण से अलंकृत ये बाण,

श्लोक 49 (aranya.64.49)

कस्य इमे निहता बाणाः प्रकीर्णा घोर दर्शनः । शरावरौ शरैः पूर्णौ विध्वस्तौ पश्य लक्ष्मण ॥ 64.49 ॥

kasya ime nihatā bāṇāḥ prakīrṇā ghora darśanaḥ | śarāvarau śaraiḥ pūrṇau vidhvastau paśya lakṣmaṇa || 64.49 ||

भयानक दिखने वाले, टूटकर बिखरे हुए ये बाण - किसके हैं? हे लक्ष्मण! देखो, बाणों से भरे ये दोनों तरकश टूटकर बिखरे पड़े हैं,

श्लोक 50 (aranya.64.50)

प्रतोद अभीशु हस्तो अयम् कस्य वा सारथिः हतः । पदवी पुरुषस्य एषा व्यक्तम् कस्य अपि राक्षसः ॥ 64.50 ॥

pratoda abhīśu hasto ayam kasya vā sārathiḥ hataḥ | padavī puruṣasya eṣā vyaktam kasya api rākṣasaḥ || 64.50 ||

और हाथ में चाबुक व लगाम लिए यह मरा हुआ सारथी - यह किसका था? यह स्पष्टतः किसी पुरुष का पदचिह्न है, और यह किसी राक्षस का।

श्लोक 51 (aranya.64.51)

वैरम् शत गुणम् पश्य मम तैः जीवित अंतकम् । सुघोर हृदयैः सौम्य राक्षसैः काम रूपिभिः ॥ 64.51 ॥

vairam śata guṇam paśya mama taiḥ jīvita aṃtakam | sughora hṛdayaiḥ saumya rākṣasaiḥ kāma rūpibhiḥ || 64.51 ||

हे सौम्य! देखो, इन अत्यंत क्रूर हृदय वाले, कामरूपी राक्षसों के प्रति, जिन्होंने यहाँ किसी का प्राणांत कर दिया, मेरा वैर सौ गुना बढ़ गया है।

श्लोक 52 (aranya.64.52)

हृता मृता वा सीता हि भक्षिता वा तपस्विनी । न धर्मः त्रायते सीताम् ह्रियमाणाम् महावने ॥ 64.52 ॥

hṛtā mṛtā vā sītā hi bhakṣitā vā tapasvinī | na dharmaḥ trāyate sītām hriyamāṇām mahāvane || 64.52 ||

उन तपस्विनी सीता का हरण हुआ हो, वे मारी गई हों, या खा ली गई हों - महावन में हरी जाती हुई सीता की धर्म ने भी रक्षा नहीं की।

श्लोक 53 (aranya.64.53)

भक्षितायाम् हि वैदेह्याम् हृतायाम् अपि लक्ष्मण । के हि लोके प्रियम् कर्तुम् शक्ताः सौम्य मम ईश्वराः ॥ 64.53 ॥

bhakṣitāyām hi vaidehyām hṛtāyām api lakṣmaṇa | ke hi loke priyam kartum śaktāḥ saumya mama īśvarāḥ || 64.53 ||

हे लक्ष्मण! यदि वैदेही को खा लिया गया है या हर लिया गया है, तो हे सौम्य! अब संसार में कौन-सी शक्तियाँ मेरा भला कर सकती हैं?

श्लोक 54 (aranya.64.54)

कर्तारम् अपि लोकानाम् शूरम् करुण वेदिनम् । अज्ञानात् अवमन्येरन् सर्व भूतानि लक्ष्मण ॥ 64.54 ॥

kartāram api lokānām śūram karuṇa vedinam | ajñānāt avamanyeran sarva bhūtāni lakṣmaṇa || 64.54 ||

हे लक्ष्मण! संसार के रचयिता को भी, यदि वह शूर होकर भी करुणावेदी हो, तो सभी प्राणी अज्ञानवश उसका तिरस्कार कर बैठते हैं।

श्लोक 55 (aranya.64.55)

मृदुम् लोक हिते युक्तम् दांतम् करुण वेदिनम् । निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनम् माम् त्रिदश ईश्वराः ॥ 64.55 ॥

mṛdum loka hite yuktam dāṃtam karuṇa vedinam | nirvīrya iti manyante nūnam mām tridaśa īśvarāḥ || 64.55 ||

कोमल, संसार के कल्याण में तत्पर, संयमी और करुणावेदी होते हुए भी, देवगण निश्चय ही मुझे शक्तिहीन समझ बैठे हैं।

श्लोक 56 (aranya.64.56)

माम् प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण । अद्य एव सर्व भूतानाम् रक्षसाम् अभवाय च ॥ 64.56 ॥

mām prāpya hi guṇo doṣaḥ saṃvṛttaḥ paśya lakṣmaṇa | adya eva sarva bhūtānām rakṣasām abhavāya ca || 64.56 ||

हे लक्ष्मण! देखो, मुझमें आकर गुण भी दोष बन गए हैं। आज ही मैं समस्त प्राणियों के, राक्षसों सहित, विनाश के लिए,

श्लोक 57 (aranya.64.57)

संहृत्य एव शशि ज्योत्स्नाम् महान् सूर्य इव उदितः । संहृत्य एव गुणान् सर्वान् मम तेजः प्रकाश्ते ॥ 64.57 ॥

saṃhṛtya eva śaśi jyotsnām mahān sūrya iva uditaḥ | saṃhṛtya eva guṇān sarvān mama tejaḥ prakāśte || 64.57 ||

जैसे उदित होता हुआ महान सूर्य चंद्रमा की चाँदनी को हर लेता है, वैसे ही मेरा तेज अपने समस्त सौम्य गुणों को समेट कर अब प्रकट हो रहा है।

श्लोक 58 (aranya.64.58)

न एव यक्षा न गंधर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । किन्नरा वा मनुष्या वा सुखम् प्राप्स्यन्ति लक्ष्मण ॥ 64.58 ॥

na eva yakṣā na gaṃdharvā na piśācā na rākṣasāḥ | kinnarā vā manuṣyā vā sukham prāpsyanti lakṣmaṇa || 64.58 ||

हे लक्ष्मण! न यक्ष, न गंधर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न ही मनुष्य - कोई भी अब सुख नहीं पा सकेगा,

श्लोक 59 (aranya.64.59)

मम अस्त्र बाण संपूर्णम् आकाशम् पश्य लक्ष्मण । असंपातम् करिष्यामि हि अद्य त्रैलोक्य चारिणाम् ॥ 64.59 ॥

mama astra bāṇa saṃpūrṇam ākāśam paśya lakṣmaṇa | asaṃpātam kariṣyāmi hi adya trailokya cāriṇām || 64.59 ||

हे लक्ष्मण! देखो, मैं आकाश को अपने अस्त्र-बाणों से पूर्णतः भर दूँगा, और आज ही त्रैलोक्य में विचरने वालों के लिए उसे अगम्य बना दूँगा।

श्लोक 60 (aranya.64.60)

संनिरुद्ध ग्रह गणम् आवारित निशा करम् । विप्रनष्ट अनल मरुत् भास्कर द्युति संवृतम् ॥ 64.60 ॥

saṃniruddha graha gaṇam āvārita niśā karam | vipranaṣṭa anala marut bhāskara dyuti saṃvṛtam || 64.60 ||

मैं ग्रहों के समूह को स्तंभित कर दूँगा, चंद्रमा को अवरुद्ध कर दूँगा, तथा अग्नि, वायु और सूर्य की प्रभा को विनष्ट करके सर्वत्र आवृत कर दूँगा;

श्लोक 61 (aranya.64.61)

विनिर्मथित शैल अग्रम् शुष्यमाण जल आशयम् । ध्वस्त द्रुम लता गुल्मम् विप्रणाशित सागरम् ॥ 64.61 ॥

vinirmathita śaila agram śuṣyamāṇa jala āśayam | dhvasta druma latā gulmam vipraṇāśita sāgaram || 64.61 ||

पर्वत-शिखरों को चूर-चूर कर दूँगा, जलाशयों को सुखा दूँगा, वृक्षों, लताओं और झाड़ियों को नष्ट कर दूँगा, तथा सागरों का भी विनाश कर दूँगा -

श्लोक 62 (aranya.64.62)

त्रै लोक्यम् तु करिष्यामि संयुक्तम् काल कर्मणा । न ते कुशलिनीम् सीताम् प्रदास्यन्ति मम ईश्वराः ॥ 64.62 ॥

trai lokyam tu kariṣyāmi saṃyuktam kāla karmaṇā | na te kuśalinīm sītām pradāsyanti mama īśvarāḥ || 64.62 ||

यदि देवगण मुझे कुशलपूर्वक सीता को नहीं लौटाते, तो मैं त्रैलोक्य को उसी अवस्था में पहुँचा दूँगा, जो कालचक्र के अंत में होती है।

श्लोक 63 (aranya.64.63)

अस्मिन् मुहूर्ते सौमित्रे मम द्रक्ष्यन्ति विक्रमम् । न आकाशम् उत्पतिष्यन्ति सर्व भूतानि लक्ष्मण ॥ 64.63 ॥

asmin muhūrte saumitre mama drakṣyanti vikramam | na ākāśam utpatiṣyanti sarva bhūtāni lakṣmaṇa || 64.63 ||

हे सौमित्र! अभी इसी क्षण वे मेरा पराक्रम देखेंगे। हे लक्ष्मण! कोई भी प्राणी आकाश में उड़ नहीं सकेगा -

श्लोक 64 (aranya.64.64)

मम चाप गुण उन्मुक्तैः बाण जालैः निरंतरम् । मर्दितम् मम नाराचैः ध्वस्त भ्रांत मृग द्विजम् ॥ 64.64 ॥

mama cāpa guṇa unmuktaiḥ bāṇa jālaiḥ niraṃtaram | marditam mama nārācaiḥ dhvasta bhrāṃta mṛga dvijam || 64.64 ||

क्योंकि मेरी प्रत्यंचा से छूटे हुए बाणों का जाल उसे निरंतर भर देगा; मेरे नाराचों से पीड़ित होकर पशु-पक्षी भ्रमित और विध्वस्त होकर भटकेंगे -

श्लोक 65 (aranya.64.65)

समाकुलम् अमर्यादम् जगत् पश्य अद्य लक्ष्मण । आकर्ण पूर्णैः इषुभिः जीव लोकम् दुरावरैः ॥ 64.65 ॥

samākulam amaryādam jagat paśya adya lakṣmaṇa | ākarṇa pūrṇaiḥ iṣubhiḥ jīva lokam durāvaraiḥ || 64.65 ||

हे लक्ष्मण! देखो, कान तक खींचे गए इन अजेय बाणों से यह जीवलोक आज घोर उथल-पुथल और अव्यवस्था में डूब जाएगा।

श्लोक 66 (aranya.64.66)

करिष्ये मैथिली हेतोः अपिशाचम् अराक्षसम् । मम रोष प्रयुक्तानाम् विशिखानाम् बलम् सुराः ॥ 64.66 ॥

kariṣye maithilī hetoḥ apiśācam arākṣasam | mama roṣa prayuktānām viśikhānām balam surāḥ || 64.66 ||

मैथिली के निमित्त मैं इस संसार को पिशाचों और राक्षसों से पूर्णतः रहित कर दूँगा। हे देवगण! अब मेरे क्रोध से छोड़े गए बाणों का बल देख लो,

श्लोक 67 (aranya.64.67)

द्रक्ष्यन्ति अद्य विमुक्तानाम् अमर्षात् दूर गामिनाम् । न एव देवा न दैतेया न पिशाचा न राक्षसाः ॥ 64.67 ॥

drakṣyanti adya vimuktānām amarṣāt dūra gāminām | na eva devā na daiteyā na piśācā na rākṣasāḥ || 64.67 ||

जो आज क्रोधवश छोड़े जाकर दूर तक जाएँगे। न देवता, न दैत्य, न पिशाच, न राक्षस -

श्लोक 68 (aranya.64.68)

भविष्यन्ति मम क्रोधात् त्रैलोक्ये विप्रणाशिते । देव दानव यक्षाणाम् लोका ये रक्षसाम् अपि ॥ 64.68 ॥

bhaviṣyanti mama krodhāt trailokye vipraṇāśite | deva dānava yakṣāṇām lokā ye rakṣasām api || 64.68 ||

मेरे क्रोध से त्रैलोक्य का विनाश हो जाने पर कोई भी शेष नहीं रहेगा। देवों, दानवों, यक्षों तथा राक्षसों के भी जो लोक हैं -

श्लोक 69 (aranya.64.69)

निपतिष्यन्ति बाण ओघैः शकली कृताः बहुधा । निर्मर्यादान् इमान् लोकान् करिष्यामि अद्य सायकैः ॥ 64.69 ॥

nipatiṣyanti bāṇa oghaiḥ śakalī kṛtāḥ bahudhā | nirmaryādān imān lokān kariṣyāmi adya sāyakaiḥ || 64.69 ||

वे मेरे बाणों के प्रवाह से खंड-खंड होकर बिखर जाएँगे। मैं आज ही अपने बाणों से इन लोकों की समस्त मर्यादाओं को नष्ट कर दूँगा।

श्लोक 70 (aranya.64.70)

हृताम् मृताम् वा सौमित्रे न दास्यन्ति मम ईश्वराः । तथा रूपम् हि वैदेहीम् न दास्यन्ति यदि प्रियाम् ॥ 64.70 ॥

hṛtām mṛtām vā saumitre na dāsyanti mama īśvarāḥ | tathā rūpam hi vaidehīm na dāsyanti yadi priyām || 64.70 ||

हे सौमित्र! यदि देवगण मुझे मेरी हृत अथवा मृत प्रिया वैदेही को उसी रूप में नहीं लौटाते,

श्लोक 71 (aranya.64.71)

नाशयामि जगत् सर्वम् त्रैलोक्यम् स चर अचरम् । यावत् दर्शनम् अस्या वै तापयामि च सायकैः ॥ 64.71 ॥

nāśayāmi jagat sarvam trailokyam sa cara acaram | yāvat darśanam asyā vai tāpayāmi ca sāyakaiḥ || 64.71 ||

तो मैं इस संपूर्ण त्रैलोक्य को, चर-अचर सहित, नष्ट कर दूँगा, और जब तक मुझे उनका दर्शन नहीं होता, तब तक इसे अपने बाणों से जलाता रहूँगा।

श्लोक 72 (aranya.64.72)

इति उक्त्वा क्रोध ताम्र अक्षः स्फुरमाण ओष्ट संपुटः । वल्कल अजिनम् आबद्ध्य जटा भारम् बन्धयत् ॥ 64.72 ॥

iti uktvā krodha tāmra akṣaḥ sphuramāṇa oṣṭa saṃpuṭaḥ | valkala ajinam ābaddhya jaṭā bhāram bandhayat || 64.72 ||

यह कहकर, क्रोध से लाल नेत्र और कँपते हुए ओठों वाले राम ने अपने वल्कल और मृगचर्म को कसकर बाँधा और अपनी जटाओं के भार को समेट लिया।

श्लोक 73 (aranya.64.73)

तस्य क्रुद्धस्य रामस्य तथा अभूतस्य धीमतः । त्रि पुरम् जग्नुषः पूर्वम् रुद्रस्य इव बभौ तनुः ॥ 64.73 ॥

tasya kruddhasya rāmasya tathā abhūtasya dhīmataḥ | tri puram jagnuṣaḥ pūrvam rudrasya iva babhau tanuḥ || 64.73 ||

इस प्रकार क्रुद्ध हुए बुद्धिमान राम का रूप वैसा ही चमक उठा, जैसा पूर्वकाल में त्रिपुर को भस्म करने के लिए उद्यत रुद्र का था।

श्लोक 74 (aranya.64.74)

लक्ष्मणात् अथ च आदाय रामो निष्पीड्य कार्मुकम् । शरम् आदाय संदीप्तम् घोरम् अशी विष उपमम् ॥ 64.74 ॥

lakṣmaṇāt atha ca ādāya rāmo niṣpīḍya kārmukam | śaram ādāya saṃdīptam ghoram aśī viṣa upamam || 64.74 ||

तब राम ने लक्ष्मण से अपना धनुष लेकर उसे कसकर पकड़ा, और विषधर सर्प के समान भयंकर, प्रज्वलित बाण को निकाला,

श्लोक 75 (aranya.64.75)

संदधे धनुषि श्रीमान् रामः पर पुरंजयः । युग अन्त अग्निः इव क्रुद्धः इदम् वचनम् अब्रवीत् ॥ 64.75 ॥

saṃdadhe dhanuṣi śrīmān rāmaḥ para puraṃjayaḥ | yuga anta agniḥ iva kruddhaḥ idam vacanam abravīt || 64.75 ||

और शत्रुनगर-विजयी श्रीमान राम ने उसे धनुष पर चढ़ाया; युगांतकारी अग्नि के समान क्रुद्ध होकर उन्होंने यह वचन कहा -

श्लोक 76 (aranya.64.76)

यथा जरा यथा मृत्युः यथा कालो यथा विधिः । नित्यम् न प्रतिहन्यन्ते सर्व भूतेषु लक्ष्मण । तथा अहम् क्रोध संयुक्तो न निवार्यो अस्मि असंशयम् ॥ 64.76 ॥

yathā jarā yathā mṛtyuḥ yathā kālo yathā vidhiḥ | nityam na pratihanyante sarva bhūteṣu lakṣmaṇa | tathā aham krodha saṃyukto na nivāryo asmi asaṃśayam || 64.76 ||

"जैसे बुढ़ापा, मृत्यु, काल और नियति किसी भी प्राणी में कभी नहीं रोके जा सकते, हे लक्ष्मण! वैसे ही क्रोध से युक्त हुआ मैं भी निःसंदेह अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।"

श्लोक 77 (aranya.64.77)

पुरा इव मे चारु दतीम् अनिन्दिताम् दिशन्ति सीताम् यदि न अद्य मैथिलीम् । सदेव गन्धर्व मनुष्य पन्नगम् जगत् स शैलम् परिवर्तयामि अहम् ॥ 64.77 ॥

purā iva me cāru datīm aninditām diśanti sītām yadi na adya maithilīm | sadeva gandharva manuṣya pannagam jagat sa śailam parivartayāmi aham || 64.77 ||

"यदि आज मुझे वह निर्दोष, सुंदर दंतपंक्ति वाली मैथिली सीता वैसी ही नहीं दिखाई जाती जैसी वे पहले थीं, तो मैं देवों, गंधर्वों, मनुष्यों, नागों और पर्वतों सहित इस समस्त जगत को उलट-पलट कर दूँगा।"

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