अरण्यकाण्ड · सर्ग 69
कबन्ध का पाश
श्लोक 1 (aranya.69.1)
कृत्वा एवम् उदकम् तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा । अवेक्षन्तौ वने सीताम् जग्मतुः पश्चिमाम् दिशम् ॥ 69.1 ॥
kṛtvā evam udakam tasmai prasthitau rāghavau tadā | avekṣantau vane sītām jagmatuḥ paścimām diśam || 69.1 ||
इस प्रकार जटायु के लिए जलांजलि देकर दोनों राघव तत्पश्चात् चल पड़े और वन में सीता को खोजते हुए पश्चिम दिशा की ओर बढ़े।
श्लोक 2 (aranya.69.2)
ताम् दिशम् दक्षिणाम् गत्वा शर चाप असि धारिणौ । अविप्रहतम् ऐक्ष्वाकौ पन्थानम् प्रतिपेदतुः ॥ 69.2 ॥
tām diśam dakṣiṇām gatvā śara cāpa asi dhāriṇau | aviprahatam aikṣvākau panthānam pratipedatuḥ || 69.2 ||
उस दक्षिण दिशा की ओर जाकर बाण, धनुष और तलवार धारण किये हुए वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी एक अगम्य मार्ग पर आ पहुँचे।
श्लोक 3 (aranya.69.3)
गुल्मैः वृक्षैः च बहुभिः लताभिः च प्रवेष्टितम् । आवृतम् सर्वतो दुर्गम् गहनम् घोर दर्शनम् ॥ 69.3 ॥
gulmaiḥ vṛkṣaiḥ ca bahubhiḥ latābhiḥ ca praveṣṭitam | āvṛtam sarvato durgam gahanam ghora darśanam || 69.3 ||
वह मार्ग झाड़ियों, अनेक वृक्षों और लताओं से आच्छादित था, चारों ओर से घिरा हुआ, दुर्गम, सघन और भयावह दिखने वाला था।
श्लोक 4 (aranya.69.4)
व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणाम् दिशम् । सु भीमम् तन् महाअरण्यम् व्यतियातौ महाबलौ ॥ 69.4 ॥
vyatikramya tu vegena gṛhītvā dakṣiṇām diśam | su bhīmam tan mahāaraṇyam vyatiyātau mahābalau || 69.4 ||
दक्षिण दिशा का अनुसरण करते हुए वे दोनों महाबली वेगपूर्वक उस भयंकर विशाल वन को पार कर गये।
श्लोक 5 (aranya.69.5)
ततः परम् जनस्थानात् त्रि क्रोशम् गम्य राघवौ । क्रौंच अरण्यम् विविशतुः गहनम् तौ महौजसौ ॥ 69.5 ॥
tataḥ param janasthānāt tri krośam gamya rāghavau | krauṃca araṇyam viviśatuḥ gahanam tau mahaujasau || 69.5 ||
तत्पश्चात् जनस्थान से तीन कोस आगे जाकर वे दोनों महातेजस्वी राघव सघन क्रौंच वन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 6 (aranya.69.6)
नाना मेघ घन प्रख्यम् प्रहृष्टम् इव सर्वतः । नाना वर्णैः शुभैः पुष्पैः मृग पक्षि गणैः युतम् ॥ 69.6 ॥
nānā megha ghana prakhyam prahṛṣṭam iva sarvataḥ | nānā varṇaiḥ śubhaiḥ puṣpaiḥ mṛga pakṣi gaṇaiḥ yutam || 69.6 ||
वह वन नाना प्रकार के मेघों के समूह के समान प्रतीत होता था और चारों ओर से मानो प्रसन्न-सा था, नाना वर्णों के शुभ पुष्पों तथा पशु-पक्षियों के समूहों से युक्त था,
श्लोक 7 (aranya.69.7)
दिदृक्षमाणौ वैदेहीम् तत् वनम् तौ विचिक्यतुः । तत्र तत्र अवतिष्ठन्तौ सीता हरण दुःखितौ ॥ 69.7 ॥
didṛkṣamāṇau vaidehīm tat vanam tau vicikyatuḥ | tatra tatra avatiṣṭhantau sītā haraṇa duḥkhitau || 69.7 ||
और वैदेही को देखने की इच्छा से सीता-हरण से दुःखी वे दोनों उस वन में जगह-जगह ठहरते हुए उसकी खोज करते रहे।
श्लोक 8 (aranya.69.8)
ततः पूर्वेण तौ गत्वा त्रि क्रोसम् भ्रातरु तदा । क्रौंचारण्यम् अतिक्रम्य मातंग आश्रम अंतरा ॥ 69.8 ॥
tataḥ pūrveṇa tau gatvā tri krosam bhrātaru tadā | krauṃcāraṇyam atikramya mātaṃga āśrama aṃtarā || 69.8 ||
तत्पश्चात् वे दोनों भाई पूर्व दिशा में तीन कोस जाकर क्रौंच वन को पार करते हुए मातंग आश्रम के मध्यवर्ती प्रदेश में पहुँचे,
श्लोक 9 (aranya.69.9)
दृष्टा तु तद् वनम् घोरम् बहु भीम मृग द्विजम् । नाना वृक्ष समाकीर्णम् सर्वम् गहन पादपम् ॥ 69.9 ॥
dṛṣṭā tu tad vanam ghoram bahu bhīma mṛga dvijam | nānā vṛkṣa samākīrṇam sarvam gahana pādapam || 69.9 ||
और उस भयंकर वन को देखा जो अनेक भयानक पशु-पक्षियों से भरा हुआ था तथा सर्वत्र नाना प्रकार के वृक्षों और सघन झाड़ियों से आच्छादित था।
श्लोक 10 (aranya.69.10)
ददृशाः ते गिरौ तत्र दरीम् डशरथ आत्मजौ । पाताल सम गम्भीराम् तमसा नित्य संवृताम् ॥ 69.10 ॥
dadṛśāḥ te girau tatra darīm ḍaśaratha ātmajau | pātāla sama gambhīrām tamasā nitya saṃvṛtām || 69.10 ||
वहाँ पर्वत में दशरथ के दोनों पुत्रों ने एक गुफा देखी, जो पाताल के समान गहरी और सदा अंधकार से आच्छादित रहती थी।
श्लोक 11 (aranya.69.11)
आसाद्य च नरव्याघ्रौ दर्याः तस्या अविदूरतः । ददर्श तु महारूपाम् रक्षसीम् विकृत आननाम् ॥ 69.11 ॥
āsādya ca naravyāghrau daryāḥ tasyā avidūrataḥ | dadarśa tu mahārūpām rakṣasīm vikṛta ānanām || 69.11 ||
उस गुफा के निकट पहुँचकर उन दोनों नरश्रेष्ठों ने विशालकाय एवं विकृत मुख वाली एक राक्षसी को देखा।
श्लोक 12 (aranya.69.12)
भयदाम् अल्प सत्त्वानाम् भीभत्साम् रौद्र दर्शनाम् । लंबोदरीम् तीक्ष्ण दंष्ट्राम् करालीम् परुष त्वचम् ॥ 69.12 ॥
bhayadām alpa sattvānām bhībhatsām raudra darśanām | laṃbodarīm tīkṣṇa daṃṣṭrām karālīm paruṣa tvacam || 69.12 ||
वह अल्प सत्त्व वालों को भयभीत करने वाली, घृणास्पद, भयानक दिखने वाली, लम्बे उदर वाली, तीक्ष्ण दाढ़ों वाली, विकराल तथा खुरदरी त्वचा वाली थी,
श्लोक 13 (aranya.69.13)
भक्षयन्तीम् मृगान् भीमान् विकटाम् मुक्त मूर्धजाम् । अवैक्षताम् तु तौ तत्र भ्रातरौ राम लक्ष्मणौ ॥ 69.13 ॥
bhakṣayantīm mṛgān bhīmān vikaṭām mukta mūrdhajām | avaikṣatām tu tau tatra bhrātarau rāma lakṣmaṇau || 69.13 ||
बिखरे केशों वाली, विकट रूप वाली और भयंकर पशुओं को खाती हुई उस राक्षसी को दोनों भाई राम और लक्ष्मण ने वहाँ देखा।
श्लोक 14 (aranya.69.14)
सा समासाद्य तौ वीरौ व्रजन्तम् भ्रातुः अग्रतः । एहि रंस्यावहे इति उक्त्वा समालंबत लक्ष्मणम् ॥ 69.14 ॥
sā samāsādya tau vīrau vrajantam bhrātuḥ agrataḥ | ehi raṃsyāvahe iti uktvā samālaṃbata lakṣmaṇam || 69.14 ||
उन दोनों वीरों के पास पहुँचकर उसने अपने भाई से आगे चलते हुए लक्ष्मण से "आओ, हम रमण करें" ऐसा कहते हुए उन्हें पकड़ लिया।
श्लोक 15 (aranya.69.15)
उवाच च एनम् वचनम् सौमित्रिम् उपगुह्य सा । अहम् तु अयोमुखी नाम लाभः ते त्वम् असि प्रियः ॥ 69.15 ॥
uvāca ca enam vacanam saumitrim upaguhya sā | aham tu ayomukhī nāma lābhaḥ te tvam asi priyaḥ || 69.15 ||
सौमित्र को आलिंगन में लेकर उसने यह वचन कहा -- "मैं अयोमुखी नाम की हूँ; मुझे तुम्हारा लाभ हुआ है, तुम ही मेरे प्रियतम हो।
श्लोक 16 (aranya.69.16)
नाथ पर्वत दुर्गेषु नदीनाम् पुलिनेषु च । आयुः चिरम् इदम् वीर त्वम् मया सह रंस्यसे ॥ 69.16 ॥
nātha parvata durgeṣu nadīnām pulineṣu ca | āyuḥ ciram idam vīra tvam mayā saha raṃsyase || 69.16 ||
हे नाथ, हे वीर! पर्वतों के दुर्गम स्थानों में और नदियों के तटों पर तुम इस दीर्घ जीवन में मेरे साथ विहार करोगे।"
श्लोक 17 (aranya.69.17)
एवम् उक्तः तु कुपितः खडगम् उद्धृत्य लक्ष्मणः । कर्ण नास स्तनम् तस्या निचकर्ता अरिसूदनः ॥ 69.17 ॥
evam uktaḥ tu kupitaḥ khaḍagam uddhṛtya lakṣmaṇaḥ | karṇa nāsa stanam tasyā nicakartā arisūdanaḥ || 69.17 ||
ऐसा कहे जाने पर अरिसूदन लक्ष्मण क्रुद्ध हो गये और तलवार निकालकर उसके कान, नाक और स्तन को काट डाला।
श्लोक 18 (aranya.69.18)
कर्ण नासे निकृत्ते तु विस्वरम् विननाद सा । यथा आगतम् प्रदुद्राव राक्षसी घोर दर्शना ॥ 69.18 ॥
karṇa nāse nikṛtte tu visvaram vinanāda sā | yathā āgatam pradudrāva rākṣasī ghora darśanā || 69.18 ||
कान-नाक कट जाने पर वह भयानक दिखने वाली राक्षसी कर्कश स्वर में चीखती हुई जिस ओर से आयी थी उसी ओर भाग गयी।
श्लोक 19 (aranya.69.19)
तस्याम् गतायाम् गहनम् व्रजन्तौ वनम् ओजसा । आसेदतुः अरि मित्र घ्नौ भ्रातरौ राम लक्ष्मणौ ॥ 69.19 ॥
tasyām gatāyām gahanam vrajantau vanam ojasā | āsedatuḥ ari mitra ghnau bhrātarau rāma lakṣmaṇau || 69.19 ||
उसके चले जाने पर शत्रुओं के सहायकों का नाश करने वाले दोनों भाई राम-लक्ष्मण अपने बल से आगे बढ़ते हुए उस सघन वन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 20 (aranya.69.20)
लक्ष्मणः तु महातेजाः सत्त्ववान् शीलवान् शुचिः । अब्रवीत् प्रांजलिः वाक्यम् भ्रातरम् दीप्त तेजसम् ॥ 69.20 ॥
lakṣmaṇaḥ tu mahātejāḥ sattvavān śīlavān śuciḥ | abravīt prāṃjaliḥ vākyam bhrātaram dīpta tejasam || 69.20 ||
तब महातेजस्वी, बलवान, शीलवान और पवित्र लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर तेजस्वी भाई राम से यह वचन कहा।
श्लोक 21 (aranya.69.21)
स्पंदन्ते मे दृढम् बाहुः उद्विग्नम् इव मे मनः । प्रायशः च अपि अनिष्टानि निमित्तानि उपलक्षये ॥ 69.21 ॥
spaṃdante me dṛḍham bāhuḥ udvignam iva me manaḥ | prāyaśaḥ ca api aniṣṭāni nimittāni upalakṣaye || 69.21 ||
"मेरी भुजा प्रबल रूप से फड़क रही है, मेरा मन मानो उद्विग्न है, और मैं अनेक अशुभ शकुन भी देख रहा हूँ।
श्लोक 22 (aranya.69.22)
तस्मात् सज्जी भव आर्य त्वम् कुरुष्व वचनम् हितम् । मम एव हि निमित्तानि सद्यः शंसन्ति संभ्रमम् ॥ 69.22 ॥
tasmāt sajjī bhava ārya tvam kuruṣva vacanam hitam | mama eva hi nimittāni sadyaḥ śaṃsanti saṃbhramam || 69.22 ||
अतः हे आर्य! सावधान हो जाइए, मेरे हितकर वचन को मानिए; मेरे ये शकुन निश्चय ही किसी तत्काल आने वाले संकट का संकेत दे रहे हैं।
श्लोक 23 (aranya.69.23)
एष वंजुलको नाम पक्षी परम दारुणः । आवयोः विजयम् युद्धे शंसन् इव विनर्दति ॥ 69.23 ॥
eṣa vaṃjulako nāma pakṣī parama dāruṇaḥ | āvayoḥ vijayam yuddhe śaṃsan iva vinardati || 69.23 ||
यह वंजुलक नाम का अत्यन्त भयंकर पक्षी मानो हम दोनों की युद्ध में विजय की घोषणा करते हुए जोर से बोल रहा है।"
श्लोक 24 (aranya.69.24)
तयोः अन्वेषतोः एवम् सर्वम् तत् वनम् ओजसा । संजज्ञे विपुलः शब्दः प्रभंजन् इव तत् वनम् ॥ 69.24 ॥
tayoḥ anveṣatoḥ evam sarvam tat vanam ojasā | saṃjajñe vipulaḥ śabdaḥ prabhaṃjan iva tat vanam || 69.24 ||
उन दोनों के इस प्रकार उस सम्पूर्ण वन में बलपूर्वक खोज करते समय एक भारी शब्द उत्पन्न हुआ, मानो वह वन को ही तोड़ डालेगा।
श्लोक 25 (aranya.69.25)
संवेष्टितम् इव अत्यर्थम् गहनम् मातरिश्वना । वनस्य तस्य शब्दो अभूत् दिवम् आपूरयन् इव ॥ 69.25 ॥
saṃveṣṭitam iva atyartham gahanam mātariśvanā | vanasya tasya śabdo abhūt divam āpūrayan iva || 69.25 ||
मानो वह सघन वन प्रचण्ड आँधी से लपेटा जा रहा हो, उस वन की गर्जना आकाश को भी भर देने वाली-सी प्रतीत हुई।
श्लोक 26 (aranya.69.26)
तम् शब्दम् कांक्षमाणः तु रामः खड्गी सह अनुजः । ददर्श सु महा कायम् राक्षसम् विपुल उरसम् ॥ 69.26 ॥
tam śabdam kāṃkṣamāṇaḥ tu rāmaḥ khaḍgī saha anujaḥ | dadarśa su mahā kāyam rākṣasam vipula urasam || 69.26 ||
उस शब्द की दिशा में बढ़ते हुए तलवारधारी राम ने अपने छोटे भाई के साथ अत्यन्त विशालकाय और विशाल वक्षस्थल वाले एक राक्षस को देखा।
श्लोक 27 (aranya.69.27)
आसेदतुः च तत् रक्षः तौ उभौ प्रमुखे स्थितम् । विवृद्धम् अ-शिरो ग्रीवम् कबंधम् उदरे मुखम् ॥ 69.27 ॥
āsedatuḥ ca tat rakṣaḥ tau ubhau pramukhe sthitam | vivṛddham a-śiro grīvam kabaṃdham udare mukham || 69.27 ||
वे दोनों उस राक्षस के सामने जा पहुँचे, जो अत्यन्त विशालकाय था, जिसका न सिर था न गर्दन, और जिसका मुख उदर में स्थित था -- वह कबन्ध था।
श्लोक 28 (aranya.69.28)
रोमभिर्निश्चितैस्तीक्ष्णैर्महागिरिमिवोच्छ्रितम् । नील मेघ निभम् रौद्रम् मेघ स्तनित निःस्वनम् ॥ 69.28 ॥
romabhirniścitaistīkṣṇairmahāgirimivocchritam | nīla megha nibham raudram megha stanita niḥsvanam || 69.28 ||
वह तीक्ष्ण एवं सघन रोमों से युक्त होकर विशाल पर्वत के समान ऊँचा उठा हुआ था, नील मेघ के समान श्यामवर्ण, भयंकर तथा मेघ की गर्जना के समान गम्भीर स्वर वाला था।
श्लोक 29 (aranya.69.29)
अग्नि ज्वाल निकाशेन ललाटस्थेन दीप्यता । महापक्षेण पिंगेन विपुलेन आयतेन च ॥ 69.29 ॥
agni jvāla nikāśena lalāṭasthena dīpyatā | mahāpakṣeṇa piṃgena vipulena āyatena ca || 69.29 ||
उसके ललाट पर स्थित एक ही नेत्र था -- जो अग्नि की ज्वाला के समान चमकता हुआ, पीताभ, विशाल तथा चौड़ी पलकों वाला था,
श्लोक 30 (aranya.69.30)
एकेन उरसि घोरेण नयनेन आशु दर्शिना । महा दंष्ट्र उपपन्नम् तम् लेलिहानम् महा मुखम् ॥ 69.30 ॥
ekena urasi ghoreṇa nayanena āśu darśinā | mahā daṃṣṭra upapannam tam lelihānam mahā mukham || 69.30 ||
और वह भयंकर, तीक्ष्ण दृष्टि वाला नेत्र वक्षस्थल में स्थित था; उसका विशाल मुख बड़ी-बड़ी दाढ़ों से युक्त था, जिसे वह बार-बार अपनी जीभ से चाट रहा था।
श्लोक 31 (aranya.69.31)
भक्षयंतम् महा घोरान् ऋक्ष सिम्ह मृग द्विपान् । घोरौ भुजौ विकुर्वाणम् उभौ योजनम् आयतौ ॥ 69.31 ॥
bhakṣayaṃtam mahā ghorān ṛkṣa simha mṛga dvipān | ghorau bhujau vikurvāṇam ubhau yojanam āyatau || 69.31 ||
वह अत्यन्त भयंकर भालुओं, सिंहों, मृगों और हाथियों को खा रहा था तथा एक-एक योजन लम्बी अपनी दोनों भयानक भुजाओं को इधर-उधर फैला रहा था।
श्लोक 32 (aranya.69.32)
कराभ्याम् विविधान् गृह्य ऋक्षान् पक्षि गणान् मृगान् । आकर्षन्तम् विकर्षन्तम् अनेकान् मृग यूथपान् ॥ 69.32 ॥
karābhyām vividhān gṛhya ṛkṣān pakṣi gaṇān mṛgān | ākarṣantam vikarṣantam anekān mṛga yūthapān || 69.32 ||
वह अपने दोनों हाथों से नाना प्रकार के भालुओं, पक्षि-समूहों और मृगों को तथा अनेक मृग-यूथपतियों को पकड़कर खींच रहा था और फेंक रहा था,
श्लोक 33 (aranya.69.33)
स्थितम् आवृत्य पन्थानम् तयोः भ्रात्रोः प्रपन्नयोः । अथ तम् समतिक्रम्य क्रोश मात्रम् ददर्शतुः ॥ 69.33 ॥
sthitam āvṛtya panthānam tayoḥ bhrātroḥ prapannayoḥ | atha tam samatikramya krośa mātram dadarśatuḥ || 69.33 ||
वह उन दोनों भाइयों के मार्ग को अवरुद्ध किये हुए खड़ा था। तत्पश्चात् एक कोस मात्र आगे बढ़ने पर ही उन्होंने उसे देख लिया था।
श्लोक 34 (aranya.69.34)
महान्तम् दारुणम् भीमम् कबंधम् भुज संवृतम् । कबंधम् इव संस्थानत् अति घोर प्रदशनम् ॥ 69.34 ॥
mahāntam dāruṇam bhīmam kabaṃdham bhuja saṃvṛtam | kabaṃdham iva saṃsthānat ati ghora pradaśanam || 69.34 ||
वह विशाल, भयंकर तथा अपनी भुजाओं से घिरा हुआ था -- कबन्ध, आकृति में मात्र एक धड़ के समान, अत्यन्त भयावह प्रतीत होने वाला।
श्लोक 35 (aranya.69.35)
स महा बाहुः अत्यर्थम् प्रसार्य विपुलौ भुजौ । जग्राह सहितौ एव राघवौ पीडयन् बलात् ॥ 69.35 ॥
sa mahā bāhuḥ atyartham prasārya vipulau bhujau | jagrāha sahitau eva rāghavau pīḍayan balāt || 69.35 ||
उस महाबाहु ने अपनी दोनों विशाल भुजाओं को खूब फैलाकर दोनों राघवों को एक साथ पकड़ लिया और बलपूर्वक जकड़ लिया।
श्लोक 36 (aranya.69.36)
खड्गिनौ दृढ धन्वानौ तिग्म तेजौ महा भुजौ । भ्रातरौ विवशम् प्राप्तौ कृष्यमाणौ महा बलौ ॥ 69.36 ॥
khaḍginau dṛḍha dhanvānau tigma tejau mahā bhujau | bhrātarau vivaśam prāptau kṛṣyamāṇau mahā balau || 69.36 ||
तलवारधारी, दृढ़ धनुष धारण करने वाले, तीव्र तेजस्वी, महाबाहु और महाबली वे दोनों भाई भी घसीटे जाते हुए विवश हो गये।
श्लोक 37 (aranya.69.37)
तत्र धैर्यात् च शूराः तु राघवो न एव विव्यधे । बाल्यात् अनाश्रयत्वात् च एव लक्ष्मणः तु अतिविव्यधे ॥ 69.37 ॥
tatra dhairyāt ca śūrāḥ tu rāghavo na eva vivyadhe | bālyāt anāśrayatvāt ca eva lakṣmaṇaḥ tu ativivyadhe || 69.37 ||
उस स्थिति में धैर्यवान वीर राम तनिक भी विचलित नहीं हुए, किन्तु लक्ष्मण अल्पवय तथा असहाय होने के कारण अत्यन्त विचलित हो गये।
श्लोक 38 (aranya.69.38)
उवाच च विषण्णम् सन् राघवम् राघव अनुजः । पश्य माम् विवशम् वीर राक्षसस्य वशम् गतम् ॥ 69.38 ॥
uvāca ca viṣaṇṇam san rāghavam rāghava anujaḥ | paśya mām vivaśam vīra rākṣasasya vaśam gatam || 69.38 ||
और राघव के छोटे भाई ने दुःखी होकर राघव से कहा -- "हे वीर! देखिए, मैं असहाय होकर इस राक्षस के वश में पड़ गया हूँ।
श्लोक 39 (aranya.69.39)
मया एकन तु निर्युक्तः परिमुच्यस्व राघव । माम् हि भूत बलिम् दत्त्वा पलास्व यथा सुखम् ॥ 69.39 ॥
mayā ekana tu niryuktaḥ parimucyasva rāghava | mām hi bhūta balim dattvā palāsva yathā sukham || 69.39 ||
हे राघव! मुझ अकेले से मुक्त होकर आप स्वयं को बचा लीजिए; मुझे इस प्राणी को बलि के रूप में देकर आप सुखपूर्वक भाग जाइए।
श्लोक 40 (aranya.69.40)
अधिगंता असि वैदेहीम् अचिरेण इति मे मतिः । प्रति लभ्य च काकुत्स्थ पितॄ पैतामहम् महीम् ॥ 69.40 ॥
adhigaṃtā asi vaidehīm acireṇa iti me matiḥ | prati labhya ca kākutstha pitṝ paitāmaham mahīm || 69.40 ||
मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही वैदेही को प्राप्त कर लेंगे। और हे काकुत्स्थ! पितृ-पितामह से प्राप्त इस राज्य को पुनः प्राप्त करके,
श्लोक 41 (aranya.69.41)
तत्र माम् राम राज्यस्थः स्मर्तुम् अर्हसि सर्वदा । लक्ष्मणेन एवम् उक्तः तु रामः सौमित्रिम् अब्रवीत् ॥ 69.41 ॥
tatra mām rāma rājyasthaḥ smartum arhasi sarvadā | lakṣmaṇena evam uktaḥ tu rāmaḥ saumitrim abravīt || 69.41 ||
-- वहाँ हे राम, राज्य में प्रतिष्ठित होकर सदा मेरा स्मरण कीजिएगा।" लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर राम ने सौमित्र से कहा,
श्लोक 42 (aranya.69.42)
मा स्म त्रासम् वृथा वीर न हि त्वा दृक् विषीदति । एतस्मिन् अन्तरे क्रूरो भ्रातरौ राम लक्ष्मणौ ॥ 69.42 ॥
mā sma trāsam vṛthā vīra na hi tvā dṛk viṣīdati | etasmin antare krūro bhrātarau rāma lakṣmaṇau || 69.42 ||
"हे वीर! व्यर्थ भय मत करो; तुम्हारे जैसा पुरुष विषाद को प्राप्त नहीं होता।" इसी बीच उस क्रूर राक्षस ने राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों से --
श्लोक 43 (aranya.69.43)
तौ उवाच महाबाहुः कबन्धो दानव उत्तमः । कौ युवाम् वृषभ स्कन्धौ महा खड्ग धनुर् धरौ ॥ 69.43 ॥
tau uvāca mahābāhuḥ kabandho dānava uttamaḥ | kau yuvām vṛṣabha skandhau mahā khaḍga dhanur dharau || 69.43 ||
-- कहा, वह महाबाहु दानवश्रेष्ठ कबन्ध बोल उठा: "वृषभ के समान कंधों वाले, विशाल तलवार और धनुष धारण करने वाले तुम दोनों कौन हो?
श्लोक 44 (aranya.69.44)
घोरम् देशम् इमम् प्राप्तौ दैवेन मम चाक्षुषौ । वदतम् कार्यम् इह वाम् किम् अर्थम् च आगतौ युवाम् ॥ 69.44 ॥
ghoram deśam imam prāptau daivena mama cākṣuṣau | vadatam kāryam iha vām kim artham ca āgatau yuvām || 69.44 ||
दैवयोग से तुम दोनों इस भयंकर प्रदेश में मेरी दृष्टि के सामने आ गये हो -- बताओ यहाँ तुम्हारा क्या प्रयोजन है, किस कारण तुम दोनों यहाँ आये हो?
श्लोक 45 (aranya.69.45)
इमम् देशम् अनुप्राप्तौ क्षुधा आर्तस्य इह तिष्ठतः । स बाण चाप खड्गौ च तीक्ष्ण शृंगौ इव ऋषभौ ॥ 69.45 ॥
imam deśam anuprāptau kṣudhā ārtasya iha tiṣṭhataḥ | sa bāṇa cāpa khaḍgau ca tīkṣṇa śṛṃgau iva ṛṣabhau || 69.45 ||
भूख से पीड़ित होकर यहाँ बैठे हुए मेरे पास तुम दोनों बाण, धनुष और तलवार लिये हुए इस प्रदेश में आ पहुँचे हो, मानो तीक्ष्ण सींगों वाले दो साँड़ हो,
श्लोक 46 (aranya.69.46)
मम तूर्णम् उपसंप्राप्तौ दुर्लभम् जीवितम् वाम् । तस्य तत् वचनम् श्रुत्वा कबंधस्य दुरात्मनः ॥ 69.46 ॥
mama tūrṇam upasaṃprāptau durlabham jīvitam vām | tasya tat vacanam śrutvā kabaṃdhasya durātmanaḥ || 69.46 ||
-- किन्तु शीघ्रता से मेरे निकट आ जाने के कारण अब तुम दोनों का जीवित रहना दुर्लभ है।" उस दुरात्मा कबन्ध के इन वचनों को सुनकर,
श्लोक 47 (aranya.69.47)
उवाच लक्ष्मणम् रामो मुखेन परिशुष्यता । कृच्छ्रात् कृच्छ्रतरम् प्राप्य दारुणम् सत्य विक्रम ॥ 69.47 ॥
uvāca lakṣmaṇam rāmo mukhena pariśuṣyatā | kṛcchrāt kṛcchrataram prāpya dāruṇam satya vikrama || 69.47 ||
मुख सूख जाने पर राम ने लक्ष्मण से कहा -- "हे सत्यपराक्रमी! एक संकट से दूसरे भीषणतर संकट को प्राप्त होकर,
श्लोक 48 (aranya.69.48)
व्यसनम् जीवित अन्ताय प्राप्तम् अप्राप्य ताम् प्रियाम् । कालस्य सुमहत् वीर्यम् सर्व भूतेषु लक्ष्मण ॥ 69.48 ॥
vyasanam jīvita antāya prāptam aprāpya tām priyām | kālasya sumahat vīryam sarva bhūteṣu lakṣmaṇa || 69.48 ||
-- अपनी उस प्रिया को प्राप्त किये बिना ही अब हम प्राणों के अन्त करने वाले संकट में पड़ गये हैं। हे लक्ष्मण! समस्त प्राणियों पर काल का प्रभाव अत्यन्त महान है;
श्लोक 49 (aranya.69.49)
त्वाम् च माम् च नरव्याघ्र व्यसनैः पश्य मोहितौ । न हि भारो अस्ति दैवस्य सर्व भुतेषु लक्ष्मण ॥ 69.49 ॥
tvām ca mām ca naravyāghra vyasanaiḥ paśya mohitau | na hi bhāro asti daivasya sarva bhuteṣu lakṣmaṇa || 69.49 ||
-- हे नरव्याघ्र! देखो, तुम और मैं दोनों ही विपत्तियों से किस प्रकार मोहित हो गये हैं। हे लक्ष्मण! समस्त प्राणियों के लिए दैव को कोई भार नहीं है --
श्लोक 50 (aranya.69.50)
शूराः च बलवंतः च कृत अस्त्राः च रण आजिरे । काल अभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुक सेतवः ॥ 69.50 ॥
śūrāḥ ca balavaṃtaḥ ca kṛta astrāḥ ca raṇa ājire | kāla abhipannāḥ sīdanti yathā vāluka setavaḥ || 69.50 ||
-- शूरवीर, बलवान तथा युद्धभूमि में शस्त्रविद्या में निपुण पुरुष भी काल के वश में पड़कर उसी प्रकार ढह जाते हैं, जैसे बालू का बाँध।"
श्लोक 51 (aranya.69.51)
इति ब्रुवाणो दृढ सत्य विक्रमो महायशा दाशरथिः प्रतापवान् । अवेक्ष्य सौमित्रिम् उदग्र विक्रमम् स्थिराम् तदा स्वाम् मतिम् आत्मना अकरोत् ॥ 69.51 ॥
iti bruvāṇo dṛḍha satya vikramo mahāyaśā dāśarathiḥ pratāpavān | avekṣya saumitrim udagra vikramam sthirām tadā svām matim ātmanā akarot || 69.51 ||
इस प्रकार कहते हुए दृढ़ और सत्य पराक्रमी, महायशस्वी तथा प्रतापी दशरथनन्दन ने उग्र पराक्रमी सौमित्र की ओर देखकर स्वयं अपने मन को स्थिर किया।