अरण्यकाण्ड · सर्ग 71
कबन्ध का शाप-वृत्तान्त
श्लोक 1 (aranya.71.1)
पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम् । रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ 71.1 ॥
purā rāma mahābāho mahābalaparākramam | rūpamāsīnmamācintyaṃ triṣu lokeṣu viśrutam || 71.1 ||
हे महाबाहो, महाबल-पराक्रमी राम! पूर्वकाल में मेरा एक ऐसा रूप था जो अचिन्त्य था और तीनों लोकों में विख्यात था,
श्लोक 2 (aranya.71.2)
यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपुः । सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत् ॥ 71.2 ॥
yathā sūryasya somasya śakrasya ca yathā vapuḥ | so'haṃ rūpamidaṃ kṛtvā lokavitrāsanaṃ mahat || 71.2 ||
मानो सूर्य, चंद्रमा और इंद्र के समान तेजस्वी शरीर हो। वही मैं आज संसार को भयभीत करने वाला यह विशाल रूप धारण करके,
श्लोक 3 (aranya.71.3)
ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः । ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया ॥ 71.3 ॥
ṛṣīn vanagatān rāma trāsayāmi tatastataḥ | tataḥ sthūlaśirā nāma maharṣiḥ kopito mayā || 71.3 ||
हे राम, वन में विचरण करने वाले ऋषियों को यहाँ-वहाँ भयभीत करता रहता हूँ। एक बार मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षि को कुपित कर दिया,
श्लोक 4 (aranya.71.4)
स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षितः । तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना ॥ 71.4 ॥
sa cinvan vividhaṃ vanyaṃ rūpeṇānena dharṣitaḥ | tenāhamuktaḥ prekṣyaivaṃ ghoraśāpābhidhāyinā || 71.4 ||
वे विविध वनोपज एकत्र कर रहे थे और मेरे इस रूप को देखकर आतंकित हो उठे। मुझे देखकर उन घोर शाप देने वाले ऋषि ने कहा—
श्लोक 5 (aranya.71.5)
एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम् । स मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति ॥ 71.5 ॥
etadevaṃ nṛśaṃsaṃ te rūpamastu vigarhitam | sa mayā yācitaḥ kruddhaḥ śāpasyānto bhavediti || 71.5 ||
"तुम्हारा यह क्रूर और निंदित रूप ऐसा ही बना रहे!" जब मैंने उन क्रुद्ध ऋषि से याचना की कि क्या इस शाप का कभी अंत होगा,
श्लोक 6 (aranya.71.6)
अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः । यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने ॥ 71.6 ॥
abhiśāpakṛtasyeti tenedaṃ bhāṣitaṃ vacaḥ | yadā chittvā bhujau rāmastvāṃ dahed vijane vane || 71.6 ||
तो शाप देने वाले उन ऋषि ने मुझसे यह वचन कहा — "जिस दिन राम तुम्हारी दोनों भुजाओं को काटकर एकांत वन में तुम्हें जला देंगे,
श्लोक 7 (aranya.71.7)
तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम् । श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण ॥ 71.7 ॥
tadā tvaṃ prāpsyase rūpaṃ svameva vipulaṃ śubham | śriyā virājitaṃ putraṃ danostvaṃ viddhi lakṣmaṇa || 71.7 ||
उसी दिन तुम अपने विशाल और शुभ स्वरूप को पुनः प्राप्त कर लोगे।" हे लक्ष्मण, जान लो कि मैं दनु का पुत्र हूँ, जो श्री से सुशोभित था,
श्लोक 8 (aranya.71.8)
इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे । अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम् ॥ 71.8 ॥
indrakopādidaṃ rūpaṃ prāptamevaṃ raṇājire | ahaṃ hi tapasogreṇa pitāmahamatoṣayam || 71.8 ||
और इंद्र के क्रोध से रणभूमि में मुझे यह रूप प्राप्त हुआ। मैंने कठोर तपस्या से पितामह ब्रह्मा को प्रसन्न किया था,
श्लोक 9 (aranya.71.9)
दीर्घमायुः स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत् । दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्रः करिष्यति ॥ 71.9 ॥
dīrghamāyuḥ sa me prādāt tato māṃ vibhramo'spṛśat | dīrghamāyurmayā prāptaṃ kiṃ māṃ śakraḥ kariṣyati || 71.9 ||
और उन्होंने मुझे दीर्घ आयु का वरदान दिया। तत्पश्चात् मुझे अभिमान ने छू लिया, और मैंने सोचा—"जब मुझे दीर्घायु प्राप्त हो चुकी है, तो इंद्र मेरा क्या कर सकते हैं?"
श्लोक 10 (aranya.71.10)
इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम् । तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा ॥ 71.10 ॥
ityevaṃ buddhimāsthāya raṇe śakramadharṣayam | tasya bāhupramuktena vajreṇa śataparvaṇā || 71.10 ||
इसी विचार से प्रेरित होकर मैंने युद्ध में इंद्र पर आक्रमण किया। तब उनके हाथ से छूटे हुए शतपर्व वज्र ने,
श्लोक 11 (aranya.71.11)
सक्थिनी च शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम् । स मया याच्यमानः सन् नानयद् यमसादनम् ॥ 71.11 ॥
sakthinī ca śiraścaiva śarīre sampraveśitam | sa mayā yācyamānaḥ san nānayad yamasādanam || 71.11 ||
मेरी दोनों जाँघों और सिर को मेरे शरीर में धँसा दिया। मेरे बार-बार याचना करने पर भी उन्होंने मुझे यमलोक नहीं भेजा;
श्लोक 12 (aranya.71.12)
पितामहवचः सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत् । अनाहारः कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुखः ॥ 71.12 ॥
pitāmahavacaḥ satyaṃ tadastviti mamābravīt | anāhāraḥ kathaṃ śakto bhagnasakthiśiromukhaḥ || 71.12 ||
उन्होंने मुझसे कहा—"पितामह का वचन सत्य ही रहे।" अब भला जाँघें, सिर और मुख टूटे हुए तथा बिना आहार के मैं कैसे जीवित रह सकता था,
श्लोक 13 (aranya.71.13)
वज्रेणाभिहतः कालं सुदीर्घमपि जीवितुम् । स एवमुक्तः शक्रो मे बाहू योजनमायतौ ॥ 71.13 ॥
vajreṇābhihataḥ kālaṃ sudīrghamapi jīvitum | sa evamuktaḥ śakro me bāhū yojanamāyatau || 71.13 ||
वज्र से आहत होकर भी इतने लंबे काल तक जीवित रहना पड़े? जब मैंने ऐसा कहा, तब इंद्र ने मेरे लिए एक-एक योजन लंबी दो भुजाएँ बना दीं,
श्लोक 14 (aranya.71.14)
तदा चास्यं च मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत् । सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यास्मिन् वनेचरान् ॥ 71.14 ॥
tadā cāsyaṃ ca me kukṣau tīkṣṇadaṃṣṭramakalpayat | so'haṃ bhujābhyāṃ dīrghābhyāṃ saṃkṣipyāsmin vanecarān || 71.14 ||
और मेरे उदर में तीक्ष्ण दाढ़ों वाला एक मुख भी बना दिया। इस प्रकार मैं अपनी इन्हीं लंबी भुजाओं से इस वन में विचरने वाले प्राणियों को खींचकर,
श्लोक 15 (aranya.71.15)
सिंहद्वीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्ततः । स तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा रामः सलक्ष्मणः ॥ 71.15 ॥
siṃhadvīpimṛgavyāghrān bhakṣayāmi samantataḥ | sa tu māmabravīdindro yadā rāmaḥ salakṣmaṇaḥ || 71.15 ||
सिंह, चीते, मृग और व्याघ्रों को चारों ओर से पकड़कर खा जाता हूँ। परंतु इंद्र ने मुझसे यह भी कहा था—"जब राम लक्ष्मण के साथ,
श्लोक 16 (aranya.71.16)
छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि । अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम ॥ 71.16 ॥
chetsyate samare bāhū tadā svargaṃ gamiṣyasi | anena vapuṣā tāta vane'smin rājasattama || 71.16 ||
युद्ध में तुम्हारी दोनों भुजाएँ काट देंगे, तब तुम स्वर्ग को प्राप्त होगे।" हे तात, हे राजश्रेष्ठ, तब तक इसी शरीर से इस वन में,
श्लोक 17 (aranya.71.17)
यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये । अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति ॥ 71.17 ॥
yad yat paśyāmi sarvasya grahaṇaṃ sādhu rocaye | avaśyaṃ grahaṇaṃ rāmo manye'haṃ samupaiṣyati || 71.17 ||
जो-जो भी मुझे दिखाई देता है, उस सबको पकड़ लेना ही मुझे उचित जान पड़ता है। मुझे विश्वास था कि राम अवश्य ही एक दिन मेरे समीप आ जाएँगे —
श्लोक 18 (aranya.71.18)
इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रमः । स त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव ॥ 71.18 ॥
imāṃ buddhiṃ puraskṛtya dehanyāsakṛtaśramaḥ | sa tvaṃ rāmo'si bhadraṃ te nāhamanyena rāghava || 71.18 ||
इसी विचार को सामने रखकर मैं अपने इस देह-त्याग की प्रतीक्षा में परिश्रम करता रहा। तुम ही वही राम हो, तुम्हारा कल्याण हो! हे राघव, तुम्हारे सिवा और कोई
श्लोक 19 (aranya.71.19)
शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा । अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ ॥ 71.19 ॥
śakyo hantuṃ yathā tattvamevamuktaṃ maharṣiṇā | ahaṃ hi matisācivyaṃ kariṣyāmi nararṣabha || 71.19 ||
मुझे नहीं मार सकता — यह बात स्वयं उन महर्षि ने कही थी। हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं तुम्हें अपनी बुद्धि से सहायता दूँगा,
श्लोक 20 (aranya.71.20)
मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना । एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघवः ॥ 71.20 ॥
mitraṃ caivopadekṣyāmi yuvābhyāṃ saṃskṛto'gninā | evamuktastu dharmātmā danunā tena rāghavaḥ || 71.20 ||
और अग्नि से संस्कार किए जाने पर तुम दोनों को एक मित्र का भी परिचय दूँगा।" दनुपुत्र कबन्ध के ऐसा कहने पर धर्मात्मा राघव ने,
श्लोक 21 (aranya.71.21)
इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य च पश्यतः । रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी ॥ 71.21 ॥
idaṃ jagāda vacanaṃ lakṣmaṇasya ca paśyataḥ | rāvaṇena hṛtā bhāryā sītā mama yaśasvinī || 71.21 ||
लक्ष्मण के देखते हुए ये वचन कहे — "रावण मेरी यशस्विनी पत्नी सीता का हरण कर ले गया है,
श्लोक 22 (aranya.71.22)
निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम् । नाममात्रं तु जानामि न रूपं तस्य रक्षसः ॥ 71.22 ॥
niṣkrāntasya janasthānāt saha bhrātrā yathāsukham | nāmamātraṃ tu jānāmi na rūpaṃ tasya rakṣasaḥ || 71.22 ||
जब मैं अपने भाई के साथ सुखपूर्वक जनस्थान से बाहर निकला हुआ था। मैं उस राक्षस का केवल नाम जानता हूँ, उसका रूप नहीं,
श्लोक 23 (aranya.71.23)
निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य न विद्महे । शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम् ॥ 71.23 ॥
nivāsaṃ vā prabhāvaṃ vā vayaṃ tasya na vidmahe | śokārtānāmanāthānāmevaṃ viparidhāvatām || 71.23 ||
न ही उसका निवासस्थान जानता हूँ और न उसका प्रभाव। हे वीर, शोकसंतप्त और अनाथ की भाँति इधर-उधर भटकते हुए हम पर,
श्लोक 24 (aranya.71.24)
कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम् । काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरैः ॥ 71.24 ॥
kāruṇyaṃ sadṛśaṃ kartumupakāreṇa vartatām | kāṣṭhānyānīya bhagnāni kāle śuṣkāṇi kuñjaraiḥ || 71.24 ||
उपकार करते हुए उचित करुणा दिखाना तुम्हें शोभा देगा।" "हे वीर, हाथियों द्वारा समय-समय पर तोड़ी गई सूखी लकड़ियाँ लाकर,
श्लोक 25 (aranya.71.25)
धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते । स त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वा हृता ॥ 71.25 ॥
dhakṣyāmastvāṃ vayaṃ vīra śvabhre mahati kalpite | sa tvaṃ sītāṃ samācakṣva yena vā yatra vā hṛtā || 71.25 ||
और एक बड़ा गड्ढा खोदकर हम तुम्हें उसमें जलाएँगे। यदि तुम सचमुच जानते हो, तो स्पष्ट बताओ कि सीता किसके द्वारा और कहाँ ले जाई गई है —
श्लोक 26 (aranya.71.26)
कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वतः । एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम् ॥ 71.26 ॥
kuru kalyāṇamatyarthaṃ yadi jānāsi tattvataḥ | evamuktastu rāmeṇa vākyaṃ danuranuttamam || 71.26 ||
यदि तुम्हें वस्तुतः ज्ञात हो तो यह महान कल्याण करो।" राम के ऐसा कहने पर, वाणी में कुशल दनुपुत्र कबन्ध ने,
श्लोक 27 (aranya.71.27)
प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम् । दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम् ॥ 71.27 ॥
provāca kuśalo vaktā vaktāramapi rāghavam | divyamasti na me jñānaṃ nābhijānāmi maithilīm || 71.27 ||
स्वयं वाक्पटु राघव को उत्तर दिया — "मुझमें अभी दिव्य ज्ञान नहीं है, न ही मैं मैथिली को पहचान पाता हूँ;
श्लोक 28 (aranya.71.28)
यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्धः स्वं रूपमास्थितः । योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम् ॥ 71.28 ॥
yastāṃ vakṣyati taṃ vakṣye dagdhaḥ svaṃ rūpamāsthitaḥ | yo'bhijānāti tadrakṣastad vakṣye rāma tatparam || 71.28 ||
किंतु जब मैं जलकर अपना वास्तविक रूप पुनः प्राप्त कर लूँगा, तो जो उसका पता बता सके, उसी का नाम मैं तुम्हें बताऊँगा। हे राम, जो उस राक्षस को जानता है, उसे मैं उसके बाद बताऊँगा —
श्लोक 29 (aranya.71.29)
अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति न मे प्रभो । राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव ॥ 71.29 ॥
adagdhasya hi vijñātuṃ śaktirasti na me prabho | rākṣasaṃ tu mahāvīryaṃ sītā yena hṛtā tava || 71.29 ||
क्योंकि हे प्रभो, बिना जले हुए, जिस महापराक्रमी राक्षस ने तुम्हारी सीता का हरण किया है, उसे जानने की शक्ति मुझमें नहीं है।
श्लोक 30 (aranya.71.30)
विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव । स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम् ॥ 71.30 ॥
vijñānaṃ hi mahad bhraṣṭaṃ śāpadoṣeṇa rāghava | svakṛtena mayā prāptaṃ rūpaṃ lokavigarhitam || 71.30 ||
हे राघव, शाप के दोष से मेरा महान ज्ञान नष्ट हो गया है; और यह लोकनिंदित रूप मुझे अपने ही किए हुए कर्मों से प्राप्त हुआ है।
श्लोक 31 (aranya.71.31)
किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहनः । तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि ॥ 71.31 ॥
kiṃ tu yāvanna yātyastaṃ savitā śrāntavāhanaḥ | tāvanmāmavaṭe kṣiptvā daha rāma yathāvidhi || 71.31 ||
किंतु जब तक थके हुए घोड़ों वाला सूर्य अस्ताचल को प्राप्त न हो, तब तक हे राम, मुझे गड्ढे में डालकर विधिपूर्वक जला दो —
श्लोक 32 (aranya.71.32)
दग्धस्त्वयाहमवटे न्यायेन रघुनन्दन । वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम् ॥ 71.32 ॥
dagdhastvayāhamavaṭe nyāyena raghunandana | vakṣyāmi taṃ mahāvīra yastaṃ vetsyati rākṣasam || 71.32 ||
हे रघुनंदन, जब तुम मुझे विधिपूर्वक गड्ढे में जला चुकोगे, तब हे महावीर, मैं तुम्हें उसका पता बताऊँगा जो उस राक्षस को भलीभाँति जानता है,
श्लोक 33 (aranya.71.33)
तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव । कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम ॥ 71.33 ॥
tena sakhyaṃ ca kartavyaṃ nyāyyavṛttena rāghava | kalpayiṣyati te vīra sāhāyyaṃ laghuvikrama || 71.33 ||
हे राघव, उसके साथ न्यायपूर्ण आचरण से मित्रता करनी चाहिए; हे वीर, वह लघुविक्रम अवश्य ही तुम्हें सहायता प्रदान करेगा,
श्लोक 34 (aranya.71.34)
नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव । सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे ॥ 71.34 ॥
nahi tasyāstyavijñātaṃ triṣu lokeṣu rāghava | sarvān parivṛto lokān purā vai kāraṇāntare || 71.34 ||
क्योंकि हे राघव, तीनों लोकों में उससे अज्ञात कुछ भी नहीं है, क्योंकि किसी अन्य कारण से बहुत पहले वह समस्त लोकों में घूम चुका है।