अयोध्याकाण्ड · सर्ग 105
अनित्यता का उपदेश
श्लोक 1 (ayodhya.105.1)
ततः पुरुष सिम्हानाम् वृतानाम् तैः सुहृद् गणैः । शोचताम् एव रजनी दुह्खेन व्यत्यवर्तत ॥ 105.1 ॥
tataḥ puruṣa simhānām vṛtānām taiḥ suhṛd gaṇaiḥ | śocatām eva rajanī duhkhena vyatyavartata
मित्रों के समूह से घिरे हुए वे नरसिंह शोक करते हुए बड़ी कठिनाई से उस रात्रि को व्यतीत कर सके।
श्लोक 2 (ayodhya.105.2)
रजन्याम् सुप्रभातायाम् भ्रातरः ते सुहृद् वृताः । मन्दाकिन्याम् हुतम् जप्यम् कृत्वा रामम् उपागमन् ॥ 105.2 ॥
rajanyām suprabhātāyām bhrātaraḥ te suhṛd vṛtāḥ | mandākinyām hutam japyam kṛtvā rāmam upāgaman
रात्रि के सुप्रभात होने पर वे भाई अपने सुहृदों सहित मंदाकिनी में हवन और जप करके राम के पास आए।
श्लोक 3 (ayodhya.105.3)
तूष्णीम् ते समुपासीना न कश्चित् किंचिद् अब्रवीत् । भरतः तु सुहृन् मध्ये राम वचनम् अब्रवीत् ॥ 105.3 ॥
tūṣṇīm te samupāsīnā na kaścit kiṃcid abravīt | bharataḥ tu suhṛn madhye rāma vacanam abravīt
वे सब मौन होकर बैठ गए और किसी ने कुछ नहीं कहा; तब भरत ने अपने सुहृदों के बीच राम से यह वचन कहा।
श्लोक 4 (ayodhya.105.4)
सान्त्विता मामिका माता दत्तम् राज्यम् इदम् मम । तद् ददामि तव एव अहम् भुन्क्ष्व राज्यम् अकण्टकम् ॥ 105.4 ॥
sāntvitā māmikā mātā dattam rājyam idam mama | tad dadāmi tava eva aham bhunkṣva rājyam akaṇṭakam
"मेरी माता को यह राज्य देकर संतुष्ट कर दिया गया है; अब मैं वही राज्य आपको लौटाता हूँ — आप इसे निष्कंटक भोगें।"
श्लोक 5 (ayodhya.105.5)
महता इव अम्बु वेगेन भिन्नः सेतुर् जल आगमे । दुरावारम् त्वद् अन्येन राज्य खण्डम् इदम् महत् ॥ 105.5 ॥
mahatā iva ambu vegena bhinnaḥ setur jala āgame | durāvāram tvad anyena rājya khaṇḍam idam mahat
"जैसे वर्षा ऋतु में जल के प्रबल वेग से टूटा हुआ बाँध सहज ही नहीं जोड़ा जा सकता, वैसे ही इस विशाल राज्यखंड को आपके अतिरिक्त और कोई सम्भाल नहीं सकता।"
श्लोक 6 (ayodhya.105.6)
गतिम् खर इव अश्वस्य तार्क्ष्यस्य इव पतत्रिणः । अनुगन्तुम् न शक्तिर् मे गतिम् तव मही पते ॥ 105.6 ॥
gatim khara iva aśvasya tārkṣyasya iva patatriṇaḥ | anugantum na śaktir me gatim tava mahī pate
"जैसे गधा घोड़े की गति का और साधारण पक्षी गरुड़ की गति का अनुसरण नहीं कर सकता, वैसे ही हे महीपते! मुझमें आपकी गति का अनुसरण करने की सामर्थ्य नहीं है।"
श्लोक 7 (ayodhya.105.7)
सुजीवम् नित्यशः तस्य यः परैर् उपजीव्यते । राम तेन तु दुर्जीवम् यः परान् उपजीवति ॥ 105.7 ॥
sujīvam nityaśaḥ tasya yaḥ parair upajīvyate | rāma tena tu durjīvam yaḥ parān upajīvati
"हे राम! जिस पर दूसरे निर्भर रहते हैं, उसका जीवन सदा धन्य है; परंतु जो स्वयं दूसरों पर निर्भर रहता है, उसका जीवन कठिन है।"
श्लोक 8 (ayodhya.105.8)
यथा तु रोपितो वृक्षः पुरुषेण विवर्धितः । ह्रस्वकेन दुरारोहो रूढ स्कन्धो महा द्रुमः ॥ 105.8 ॥
yathā tu ropito vṛkṣaḥ puruṣeṇa vivardhitaḥ | hrasvakena durāroho rūḍha skandho mahā drumaḥ
"जैसे किसी नाटे मनुष्य के द्वारा लगाया और बड़ा किया गया वृक्ष सघन शाखाओं और विशाल तने वाला होकर भी उसके लिए दुरारोह्य (चढ़ने में कठिन) हो जाता है,"
श्लोक 9 (ayodhya.105.9)
स यदा पुष्पितो भूत्वा फलानि न विदर्शयेत् । स ताम् न अनुभवेत् प्रीतिम् यस्य हेतोः प्रभावितः ॥ 105.9 ॥
sa yadā puṣpito bhūtvā phalāni na vidarśayet | sa tām na anubhavet prītim yasya hetoḥ prabhāvitaḥ
"—वैसे ही यदि वह वृक्ष पुष्पित होकर फल न दिखाए, तो जिसके हेतु वह पाला गया था, उसे उससे कोई प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती।"
श्लोक 10 (ayodhya.105.10)
एषा उपमा महा बाहो त्वम् अर्थम् वेत्तुम् अर्हसि । यदि त्वम् अस्मान् ऋषभो भर्ता भृत्यान् न शाधि हि ॥ 105.10 ॥
eṣā upamā mahā bāho tvam artham vettum arhasi | yadi tvam asmān ṛṣabho bhartā bhṛtyān na śādhi hi
"हे महाबाहो! आप इस उपमा का अभिप्राय समझें — यदि आप, हमारे स्वामी होकर भी, अपने इन सेवकों को आदेश नहीं देंगे..."
श्लोक 11 (ayodhya.105.11)
श्रेणयः त्वाम् महा राज पश्यन्तु अग्र्याः च सर्वशः । प्रतपन्तम् इव आदित्यम् राज्ये स्थितम् अरिम् दमम् ॥ 105.11 ॥
śreṇayaḥ tvām mahā rāja paśyantu agryāḥ ca sarvaśaḥ | pratapantam iva ādityam rājye sthitam arim damam
"हे महाराज, अरिंदम! सभी श्रेष्ठ श्रेणी के लोग आपको सब ओर से सूर्य के समान देदीप्यमान, राज्यसिंहासन पर आसीन देखें।"
श्लोक 12 (ayodhya.105.12)
तव अनुयाने काकुत्ष्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जराः । अन्तः पुर गता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिताः ॥ 105.12 ॥
tava anuyāne kākutṣtha mattā nardantu kuñjarāḥ | antaḥ pura gatā nāryo nandantu susamāhitāḥ
"हे काकुत्स्थ! आपकी सवारी के साथ मदमस्त हाथी गर्जना करें और अंतःपुर की स्त्रियाँ परस्पर मिलकर आनंदित हों।"
श्लोक 13 (ayodhya.105.13)
तस्य साधु इत्य् अमन्यन्त नागरा विविधा जनाः । भरतस्य वचः श्रुत्वा रामम् प्रत्यनुयाचतः ॥ 105.13 ॥
tasya sādhu ity amanyanta nāgarā vividhā janāḥ | bharatasya vacaḥ śrutvā rāmam pratyanuyācataḥ
राम से इस प्रकार निवेदन करते हुए भरत के इन वचनों को सुनकर नगर के विविध लोगों ने सराहना करते हुए कहा, "बहुत अच्छा कहा!"
श्लोक 14 (ayodhya.105.14)
तम् एवम् दुह्खितम् प्रेक्ष्य विलपन्तम् यशस्विनम् । रामः कृत आत्मा भरतम् समाश्वासयद् आत्मवान् ॥ 105.14 ॥
tam evam duhkhitam prekṣya vilapantam yaśasvinam | rāmaḥ kṛta ātmā bharatam samāśvāsayad ātmavān
यशस्वी भरत को इस प्रकार दुःखी और विलाप करते देखकर संयत-चित्त, आत्मवान राम उन्हें सांत्वना देने लगे।
श्लोक 15 (ayodhya.105.15)
न आत्मनः काम कारो अस्ति पुरुषो अयम् अनीश्वरः । इतः च इतरतः च एनम् कृत अन्तः परिकर्षति ॥ 105.15 ॥
na ātmanaḥ kāma kāro asti puruṣo ayam anīśvaraḥ | itaḥ ca itarataḥ ca enam kṛta antaḥ parikarṣati
"यह पुरुष स्वेच्छा से कुछ करने में समर्थ नहीं, यह अपने अधीन नहीं है — नियति ही इसे इधर-उधर खींचती रहती है।"
श्लोक 16 (ayodhya.105.16)
सर्वे क्षय अन्ता निचयाः पतन अन्ताः समुग्च्छ्रयाः । सम्योगा विप्रयोग अन्ता मरण अन्तम् च जीवितम् ॥ 105.16 ॥
sarve kṣaya antā nicayāḥ patana antāḥ samugcchrayāḥ | samyogā viprayoga antā maraṇa antam ca jīvitam
"जो कुछ संचित किया जाता है, वह अंततः समाप्त हो जाता है; जो ऊँचा उठता है, वह गिरकर ही समाप्त होता है; संयोग का अंत वियोग है, और जीवन का अंत मृत्यु है।"
श्लोक 17 (ayodhya.105.17)
यथा फलानम् पक्वानाम् न अन्यत्र पतनाद् भयम् । एवम् नरस्य जातस्य न अन्यत्र मरणाद् भयम् ॥ 105.17 ॥
yathā phalānam pakvānām na anyatra patanād bhayam | evam narasya jātasya na anyatra maraṇād bhayam
"जैसे पके हुए फल को गिरने के अतिरिक्त और किसी बात का भय नहीं होता, वैसे ही जन्मे हुए मनुष्य को मृत्यु के अतिरिक्त और किसी बात का भय नहीं होता।"
श्लोक 18 (ayodhya.105.18)
यथा अगारम् दृढ स्थूणम् जीर्णम् भूत्वा अवसीदति । तथा अवसीदन्ति नरा जरा मृत्यु वशम् गताः ॥ 105.18 ॥
yathā agāram dṛḍha sthūṇam jīrṇam bhūtvā avasīdati | tathā avasīdanti narā jarā mṛtyu vaśam gatāḥ
"जैसे दृढ़ स्तंभों वाला घर भी पुराना होकर अंततः गिर जाता है, वैसे ही मनुष्य भी जरा और मृत्यु के वशीभूत होकर नष्ट हो जाते हैं।"
श्लोक 19 (ayodhya.105.19)
अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते । यात्येव यमुना पूर्णा समुद्रमुदकाकुलम् ॥ 105.19 ॥
atyeti rajanī yā tu sā na pratinivartate | yātyeva yamunā pūrṇā samudramudakākulam
"जो रात्रि बीत जाती है, वह लौटकर नहीं आती; उसी प्रकार जलपूर्ण यमुना निरंतर जल से भरे समुद्र की ओर बहती चली जाती है।"
श्लोक 20 (ayodhya.105.20)
अहो रात्राणि गग्च्छन्ति सर्वेषाम् प्राणिनाम् इह । आयूम्षि क्षपयन्त्य् आशु ग्रीष्मे जलम् इव अंशवः ॥ 105.20 ॥
aho rātrāṇi gagcchanti sarveṣām prāṇinām iha | āyūmṣi kṣapayanty āśu grīṣme jalam iva aṃśavaḥ
"यहाँ बीतते हुए दिन-रात समस्त प्राणियों की आयु को उसी शीघ्रता से क्षीण करते हैं, जैसे ग्रीष्म में सूर्य की किरणें जल को सुखा देती हैं।"
श्लोक 21 (ayodhya.105.21)
आत्मानम् अनुशोच त्वम् किम् अन्यम् अनुशोचसि । आयुः ते हीयते यस्य स्थितस्य च गतस्य च ॥ 105.21 ॥
ātmānam anuśoca tvam kim anyam anuśocasi | āyuḥ te hīyate yasya sthitasya ca gatasya ca
"तुम अपने लिए शोक करो — दूसरे के लिए क्यों शोक करते हो? चाहे तुम एक स्थान पर रहो या दूसरे स्थान चले जाओ, तुम्हारी अपनी आयु तो घटती ही जा रही है।"
श्लोक 22 (ayodhya.105.22)
सह एव मृत्युर् व्रजति सह मृत्युर् निषीदति । गत्वा सुदीर्घम् अध्वानम् सह मृत्युर् निवर्तते ॥ 105.22 ॥
saha eva mṛtyur vrajati saha mṛtyur niṣīdati | gatvā sudīrgham adhvānam saha mṛtyur nivartate
"मृत्यु हमारे साथ ही चलती है, हमारे साथ ही बैठती है; बहुत लंबी यात्रा साथ करके मृत्यु हमारे साथ ही लौट भी आती है।"
श्लोक 23 (ayodhya.105.23)
गात्रेषु वलयः प्राप्ताः श्वेताः चैव शिरो रुहाः । जरया पुरुषो जीर्णः किम् हि कृत्वा प्रभावयेत् ॥ 105.23 ॥
gātreṣu valayaḥ prāptāḥ śvetāḥ caiva śiro ruhāḥ | jarayā puruṣo jīrṇaḥ kim hi kṛtvā prabhāvayet
"जब अंगों पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और सिर के बाल श्वेत हो जाते हैं, तो जरा से जीर्ण हुआ मनुष्य किस उपाय से अपनी पूर्व कांति पा सकता है?"
श्लोक 24 (ayodhya.105.24)
नन्दन्त्य् उदित आदित्ये नन्दन्त्य् अस्तम् इते रवौ । आत्मनो न अवबुध्यन्ते मनुष्या जीवित क्षयम् ॥ 105.24 ॥
nandanty udita āditye nandanty astam ite ravau | ātmano na avabudhyante manuṣyā jīvita kṣayam
"सूर्य के उदय होने पर लोग हर्षित होते हैं, और अस्त होने पर भी हर्षित होते हैं, किंतु वे यह नहीं समझ पाते कि इससे उनका अपना जीवन ही क्षीण हो रहा है।"
श्लोक 25 (ayodhya.105.25)
हृष्यन्त्य् ऋतु मुखम् दृष्ट्वा नवम् नवम् इह आगतम् । ऋतूनाम् परिवर्तेन प्राणिनाम् प्राण सम्क्षयः ॥ 105.25 ॥
hṛṣyanty ṛtu mukham dṛṣṭvā navam navam iha āgatam | ṛtūnām parivartena prāṇinām prāṇa samkṣayaḥ
"नई-नई ऋतु के आगमन को देखकर लोग हर्षित होते हैं, मानो कुछ नया आया हो; परंतु ऋतुओं का यही परिवर्तन प्राणियों के प्राणों को क्षीण करता रहता है।"
श्लोक 26 (ayodhya.105.26)
यथा काष्ठम् च काष्ठम् च समेयाताम् महा अर्णवे । समेत्य च व्यपेयाताम् कालम् आसाद्य कंचन ॥ 105.26 ॥
yathā kāṣṭham ca kāṣṭham ca sameyātām mahā arṇave | sametya ca vyapeyātām kālam āsādya kaṃcana
"जैसे विशाल समुद्र में दो काष्ठ-खंड परस्पर मिल जाते हैं और कुछ काल तक साथ रहकर फिर अलग हो जाते हैं,"
श्लोक 27 (ayodhya.105.27)
एवम् भार्याः च पुत्राः च ज्नातयः च वसूनि च । समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्य् एषाम् विना भवः ॥ 105.27 ॥
evam bhāryāḥ ca putrāḥ ca jnātayaḥ ca vasūni ca | sametya vyavadhāvanti dhruvo hy eṣām vinā bhavaḥ
"—वैसे ही पत्नी, पुत्र, बंधु-बांधव और धन-संपत्ति भी साथ आकर फिर बिछुड़ जाते हैं; इनका वियोग निश्चित ही अवश्यंभावी है।"
श्लोक 28 (ayodhya.105.28)
न अत्र कश्चिद् यथा भावम् प्राणी समभिवर्तते । तेन तस्मिन् न सामर्थ्यम् प्रेतस्य अस्त्य् अनुशोचतः ॥ 105.28 ॥
na atra kaścid yathā bhāvam prāṇī samabhivartate | tena tasmin na sāmarthyam pretasya asty anuśocataḥ
"यहाँ कोई भी प्राणी अपनी नियति का उल्लंघन नहीं कर सकता; इसलिए मृतक के लिए शोक करने वाले मनुष्य में उसे बदलने की सामर्थ्य नहीं होती।"
श्लोक 29 (ayodhya.105.29)
यथा हि सार्थम् गग्च्छन्तम् ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थितः । अहम् अप्य् आगमिष्यामि पृष्ठतो भवताम् इति ॥ 105.29 ॥
yathā hi sārtham gagcchantam brūyāt kaścit pathi sthitaḥ | aham apy āgamiṣyāmi pṛṣṭhato bhavatām iti
"जैसे मार्ग के किनारे खड़ा कोई पुरुष जाते हुए किसी काफिले से कहे, 'मैं भी तुम्हारे पीछे-पीछे आऊँगा' —"
श्लोक 30 (ayodhya.105.30)
एवम् पूर्वैर् गतो मार्गः पितृ पैतामहो ध्रुवः । तम् आपन्नः कथम् शोचेद् यस्य न अस्ति व्यतिक्रमः ॥ 105.30 ॥
evam pūrvair gato mārgaḥ pitṛ paitāmaho dhruvaḥ | tam āpannaḥ katham śoced yasya na asti vyatikramaḥ
"—वैसे ही पिता-पितामहों द्वारा पहले से अपनाया गया यह मार्ग हमारे लिए भी निश्चित है; जिस मार्ग से कोई लौटता नहीं, उस पर पहुँचे हुए व्यक्ति के लिए शोक क्यों किया जाए?"
श्लोक 31 (ayodhya.105.31)
वयसः पतमानस्य स्रोतसो वा अनिवर्तिनः । आत्मा सुखे नियोक्तव्यः सुख भाजः प्रजाः स्मृताः ॥ 105.31 ॥
vayasaḥ patamānasya srotaso vā anivartinaḥ | ātmā sukhe niyoktavyaḥ sukha bhājaḥ prajāḥ smṛtāḥ
"जैसे प्रवाह कभी न लौटने वाली धारा के समान आयु व्यतीत होती जाती है, मनुष्य को सुख में ही मन लगाना चाहिए — क्योंकि प्राणी सुख भोगने के लिए ही कहे गए हैं।"
श्लोक 32 (ayodhya.105.32)
धर्म आत्मा स शुभैः कृत्स्नैः क्रतुभिः च आप्त दक्षिणैः । धूत पापो गतः स्वर्गम् पिता नः पृथिवी पतिः ॥ 105.32 ॥
dharma ātmā sa śubhaiḥ kṛtsnaiḥ kratubhiḥ ca āpta dakṣiṇaiḥ | dhūta pāpo gataḥ svargam pitā naḥ pṛthivī patiḥ
"वे हमारे धर्मात्मा पिता, पृथ्वीपति, समस्त शुभ यज्ञों को प्रचुर दक्षिणा सहित संपन्न करके पापरहित होकर स्वर्गलोक को गए हैं।"
श्लोक 33 (ayodhya.105.33)
भृत्यानाम् भरणात् सम्यक् प्रजानाम् परिपालनात् । अर्थ आदानाच् च धार्मेण पिता नः त्रिदिवम् गतः ॥ 105.33 ॥
bhṛtyānām bharaṇāt samyak prajānām paripālanāt | artha ādānāc ca dhārmeṇa pitā naḥ tridivam gataḥ
"सेवकों का उचित भरण-पोषण करने से, प्रजा का भलीभाँति पालन करने से, और धर्मानुसार कर ग्रहण करने से हमारे पिता स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।"
श्लोक 34 (ayodhya.105.34)
कर्मभिस्तु शुभैरिष्टैः क्रतुभिश्चाव्तदक्षिणः । स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः ॥ 105.34 ॥
karmabhistu śubhairiṣṭaiḥ kratubhiścāvtadakṣiṇaḥ | svargaṃ daśarathaḥ prāptaḥ pitā naḥ pṛthivīpatiḥ
"शुभ और इष्ट कर्मों से, प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों के अनुष्ठान से हमारे पिता महाराज दशरथ स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।"
श्लोक 35 (ayodhya.105.35)
इष्ट्वा बहुविधैर् यज्नैर् भोगामः च अवाप्य पुष्कलान् । उत्तमम् च आयुर् आसाद्य स्वर् गतः पृथिवी पतिः ॥ 105.35 ॥
iṣṭvā bahuvidhair yajnair bhogāmaḥ ca avāpya puṣkalān | uttamam ca āyur āsādya svar gataḥ pṛthivī patiḥ
"नाना प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करके, प्रचुर भोगों का उपभोग करके और उत्तम आयु प्राप्त करके वे पृथ्वीपति स्वर्गलोक को गए हैं।"
श्लोक 36 (ayodhya.105.36)
आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि च राघवः । स न शोच्यः पिता तात स्वर्गतः सत्कृतः सताम् ॥ 105.36 ॥
āyuruttamamāsādya bhogānapi ca rāghavaḥ | sa na śocyaḥ pitā tāta svargataḥ satkṛtaḥ satām
"हे तात! उत्तम आयु और भोगों को प्राप्त करने वाले, सज्जनों द्वारा सम्मानित हमारे पिता स्वर्गवासी होकर शोक के पात्र नहीं हैं।"
श्लोक 37 (ayodhya.105.37)
स जीर्णम् मानुषम् देहम् परित्यज्य पिता हि नः । दैवीम् ऋद्धिम् अनुप्राप्तो ब्रह्म लोक विहारिणीम् ॥ 105.37 ॥
sa jīrṇam mānuṣam deham parityajya pitā hi naḥ | daivīm ṛddhim anuprāpto brahma loka vihāriṇīm
"हमारे पिता अपनी जीर्ण मानव देह त्यागकर उस दिव्य ऐश्वर्य को प्राप्त हुए हैं, जिससे वे ब्रह्मलोक में विचरण करते हैं।"
श्लोक 38 (ayodhya.105.38)
तम् तु न एवम् विधः कश्चित् प्राज्नः शोचितुम् अर्हति । त्वद् विधो यद् विधः च अपि श्रुतवान् बुद्धिमत्तरः ॥ 105.38 ॥
tam tu na evam vidhaḥ kaścit prājnaḥ śocitum arhati | tvad vidho yad vidhaḥ ca api śrutavān buddhimattaraḥ
"तुम्हारे और मेरे समान श्रुतिज्ञ, बुद्धिमान विद्वान पुरुष को इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है।"
श्लोक 39 (ayodhya.105.39)
एते बहु विधाः शोका विलाप रुदिते तथा । वर्जनीया हि धीरेण सर्व अवस्थासु धीमता ॥ 105.39 ॥
ete bahu vidhāḥ śokā vilāpa rudite tathā | varjanīyā hi dhīreṇa sarva avasthāsu dhīmatā
"धैर्यवान और बुद्धिमान पुरुष को हर अवस्था में इन नाना प्रकार के शोक, विलाप और रुदन को त्याग देना चाहिए।"
श्लोक 40 (ayodhya.105.40)
स स्वस्थो भव मा शोचो यात्वा च आवस ताम् पुरीम् । तथा पित्रा नियुक्तो असि वशिना वदतामु वर ॥ 105.40 ॥
sa svastho bhava mā śoco yātvā ca āvasa tām purīm | tathā pitrā niyukto asi vaśinā vadatāmu vara
"हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! स्वस्थ हो जाओ, शोक मत करो, और उस नगरी में जाकर निवास करो — क्योंकि जितेंद्रिय हमारे पिता ने तुम्हें यही आज्ञा दी है।"
श्लोक 41 (ayodhya.105.41)
यत्र अहम् अपि तेन एव नियुक्तः पुण्य कर्मणा । तत्र एव अहम् करिष्यामि पितुर् आर्यस्य शासनम् ॥ 105.41 ॥
yatra aham api tena eva niyuktaḥ puṇya karmaṇā | tatra eva aham kariṣyāmi pitur āryasya śāsanam
"मैं भी उन्हीं पुण्यकर्मा पिता द्वारा जिस स्थान पर नियुक्त किया गया हूँ, वहीं रहकर आर्य पिता की आज्ञा का पालन करूँगा।"
श्लोक 42 (ayodhya.105.42)
न मया शासनम् तस्य त्यक्तुम् न्याय्यम् अरिम् दम । तत् त्वया अपि सदा मान्यम् स वै बन्धुः स नः पिता ॥ 105.42 ॥
na mayā śāsanam tasya tyaktum nyāyyam arim dama | tat tvayā api sadā mānyam sa vai bandhuḥ sa naḥ pitā
"हे अरिंदम! उनकी आज्ञा का त्याग करना मेरे लिए उचित नहीं; तुम्हें भी इसे सदा मान्य रखना चाहिए, क्योंकि वे ही हमारे बंधु और हमारे पिता थे।"
श्लोक 43 (ayodhya.105.43)
तद्वचः पितुरेवाहं सम्मतम् धर्मचारिणः । कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव ॥ 105.43 ॥
tadvacaḥ piturevāhaṃ sammatam dharmacāriṇaḥ | karmaṇā pālayiṣyāmi vanavāsena rāghava
"हे भरत! अतः मैं वन में निवास करने के अपने कर्म द्वारा धर्माचारी पिता के उस सम्मत वचन का पालन करूँगा।"
श्लोक 44 (ayodhya.105.44)
धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना । भवितव्यं नरव्याघ्रम् परलोकं जिगीषता ॥ 105.44 ॥
dhārmikeṇānṛśaṃsena nareṇa guruvartinā | bhavitavyaṃ naravyāghram paralokaṃ jigīṣatā
"हे नरव्याघ्र! धर्मात्मा, अहिंसक, गुरुजनों की आज्ञा का पालन करने वाला और परलोक को जीतने की इच्छा रखने वाला पुरुष इसी प्रकार आचरण करता है।"
श्लोक 45 (ayodhya.105.45)
आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ । निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य नः ॥ 105.45 ॥
ātmānamanutiṣṭha tvaṃ svabhāvena nararṣabha | niśāmya tu śubhaṃ vṛttaṃ piturdaśarathasya naḥ
"हे नरश्रेष्ठ! हमारे पिता महाराज दशरथ के शुभ आचरण को देखकर तुम भी अपने स्वभाव के अनुरूप ही आचरण करो।"
श्लोक 46 (ayodhya.105.46)
इत्येवमुक्त्वा वचनम् महात्मा । पितुर्निदेशप्रतिपालनार्थम् । युवीयसम् भ्रातरमर्थवच्च । प्रभुर्मुहूर्ताद्विरराम रामः ॥ 105.46 ॥
ityevamuktvā vacanam mahātmā | piturnideśapratipālanārtham | yuvīyasam bhrātaramarthavacca | prabhurmuhūrtādvirarāma rāmaḥ
अपने छोटे भाई को पिता की आज्ञा के पालन हेतु प्रेरित करते हुए ये सारगर्भित वचन लगभग एक मुहूर्त तक कहकर महात्मा, समर्थ राम मौन हो गए।