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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 112

भरत की पादुका-प्राप्ति

सर्ग 111सर्ग-सूचीसर्ग 113

श्लोक 1 (ayodhya.112.1)

तम् अप्रतिम तेजोभ्याम् भ्रातृभ्याम् रोम हर्षणम्। विस्मिताः संगमम् प्रेक्ष्य समवेता महर्षयः॥ 112.1 ॥

tam apratima tejobhyām bhrātṛbhyām roma harṣaṇam| vismitāḥ saṃgamam prekṣya samavetā maharṣayaḥ

उन दोनों अनुपम तेजस्वी भाइयों के रोमांचकारी संवाद को देखकर, वहाँ एकत्र हुए महर्षिगण विस्मित हो उठे।

श्लोक 2 (ayodhya.112.2)

अन्तर् हिताः तु ऋषि गणाः सिद्धाः च परम ऋषयः। तौ भ्रातरौ महात्मानौ काकुत्स्थौ प्रशशंसिरे॥ 112.2 ॥

antar hitāḥ tu ṛṣi gaṇāḥ siddhāḥ ca parama ṛṣayaḥ| tau bhrātarau mahātmānau kākutsthau praśaśaṃsire

अंतरिक्ष में अदृश्य रहने वाले ऋषिगण, सिद्ध तथा श्रेष्ठ ऋषि, उन दोनों महात्मा काकुत्स्थ भाइयों की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 3 (ayodhya.112.3)

स धन्यो यस्य पुत्रौ द्वौ धर्मज्ञौ धर्म विक्रमौ। श्रुत्वा वयम् हि सम्भाषाम् उभयोः स्पृहयामहे॥ 112.3 ॥

sa dhanyo yasya putrau dvau dharmajñau dharma vikramau| śrutvā vayam hi sambhāṣām ubhayoḥ spṛhayāmahe

"धन्य है वह, जिसके दोनों पुत्र धर्मज्ञ और धर्म से ही पराक्रमी हैं; इन दोनों का यह संवाद सुनकर हम अत्यंत प्रसन्न हैं।"

श्लोक 4 (ayodhya.112.4)

ततः तु ऋषि गणाः क्षिप्रम् दशग्रीव वध एषिणः। भरतम् राज शार्दूलम् इत्य् ऊचुः संगता वचः॥ 112.4 ॥

tataḥ tu ṛṣi gaṇāḥ kṣipram daśagrīva vadha eṣiṇaḥ| bharatam rāja śārdūlam ity ūcuḥ saṃgatā vacaḥ

तब रावण-वध चाहने वाले ऋषिगण शीघ्र ही एकत्र होकर राजश्रेष्ठ भरत से यह वचन बोले।

श्लोक 5 (ayodhya.112.5)

कुले जात महा प्राज्ञ महा वृत्त महा यशः। ग्राह्यम् रामस्य वाक्यम् ते पितरम् यद्य् अवेक्षसे॥ 112.5 ॥

kule jāta mahā prājña mahā vṛtta mahā yaśaḥ| grāhyam rāmasya vākyam te pitaram yady avekṣase

"हे उत्तम कुल में उत्पन्न, महाप्राज्ञ, महान् आचरण वाले, महायशस्वी! यदि तुम पिता का ध्यान रखते हो, तो राम का वचन स्वीकार करने योग्य है।

श्लोक 6 (ayodhya.112.6)

सदा अनृणम् इमम् रामम् वयम् इच्छामहे पितुः। अनृणत्वाच् च कैकेय्याः स्वर्गम् दशरथो गतः॥ 112.6 ॥

sadā anṛṇam imam rāmam vayam icchāmahe pituḥ| anṛṇatvāc ca kaikeyyāḥ svargam daśaratho gataḥ

हम सदा यही चाहते हैं कि यह राम पिता के प्रति ऋणमुक्त हो जाएँ; कैकेयी के प्रति ऋण चुकाकर ही तो दशरथ स्वर्ग गए।"

श्लोक 7 (ayodhya.112.7)

एतावद् उक्त्वा वचनम् गन्धर्वाः समहर्षयः। राज ऋषयः चैव तथा सर्वे स्वाम् स्वाम् गतिम् गताः॥ 112.7 ॥

etāvad uktvā vacanam gandharvāḥ samaharṣayaḥ| rāja ṛṣayaḥ caiva tathā sarve svām svām gatim gatāḥ

इतना कहकर वे सब गंधर्व, महर्षिगण तथा राजर्षिगण अपने-अपने मार्ग को चले गए।

श्लोक 8 (ayodhya.112.8)

ह्लादितः तेन वाक्येन शुभेन शुभ दर्शनः। रामः संहृष्ट वदनः तान् ऋषीन् अभ्यपूजयत्॥ 112.8 ॥

hlāditaḥ tena vākyena śubhena śubha darśanaḥ| rāmaḥ saṃhṛṣṭa vadanaḥ tān ṛṣīn abhyapūjayat

उन शुभ वचनों से आह्लादित, सुंदर मुख वाले राम प्रसन्न मुख होकर उन ऋषियों का सम्मान करने लगे।

श्लोक 9 (ayodhya.112.9)

स्रस्त गात्रः तु भरतः स वाचा सज्जमानया। कृत अञ्जलिर् इदम् वाक्यम् राघवम् पुनर् अब्रवीत्॥ 112.9 ॥

srasta gātraḥ tu bharataḥ sa vācā sajjamānayā| kṛta añjalir idam vākyam rāghavam punar abravīt

किंतु भरत के अंग शिथिल पड़ गए, और गद्गद वाणी से हाथ जोड़कर उसने राघव से फिर यह वचन कहा।

श्लोक 10 (ayodhya.112.10)

राज धर्मम् अनुप्रेक्ष्य कुल धर्म अनुसंततिम्। कर्तुम् अर्हसि काकुत्स्थ मम मातुः च याचनाम्॥ 112.10 ॥

rāja dharmam anuprekṣya kula dharma anusaṃtatim| kartum arhasi kākutstha mama mātuḥ ca yācanām

"हे काकुत्स्थ! राजधर्म तथा कुल-परंपरा की निरंतरता का ध्यान रखते हुए, आपको मेरी और माता की प्रार्थना स्वीकार करनी चाहिए।

श्लोक 11 (ayodhya.112.11)

रक्षितुम् सुमहद् राज्यम् अहम् एकः तु न उत्सहे। पौर जानपदामः च अपि रक्तान् रञ्जयितुम् तथा॥ 112.11 ॥

rakṣitum sumahad rājyam aham ekaḥ tu na utsahe| paura jānapadāmaḥ ca api raktān rañjayitum tathā

मैं अकेला इस विशाल राज्य की रक्षा करने में और आपसे अनुरक्त पौर-जनपद वासियों को प्रसन्न रखने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 12 (ayodhya.112.12)

ज्ञातयः च हि योधाः च मित्राणि सुहृदः च नः। त्वाम् एव प्रतिकाङ्क्षन्ते पर्जन्यम् इव कर्षकाः॥ 112.12 ॥

jñātayaḥ ca hi yodhāḥ ca mitrāṇi suhṛdaḥ ca naḥ| tvām eva pratikāṅkṣante parjanyam iva karṣakāḥ

हमारे ज्ञातिजन, योद्धा, मित्र और सुहृद सभी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, जैसे किसान वर्षा के मेघ की प्रतीक्षा करते हैं।

श्लोक 13 (ayodhya.112.13)

इदम् राज्यम् महा प्राज्ञ स्थापय प्रतिपद्य हि। शक्तिमान् असि काकुत्स्थ लोकस्य परिपालने॥ 112.13 ॥

idam rājyam mahā prājña sthāpaya pratipadya hi| śaktimān asi kākutstha lokasya paripālane

हे महाप्राज्ञ! इस राज्य को ग्रहण करके इसकी व्यवस्था कीजिए; हे काकुत्स्थ, आप लोक की रक्षा करने में समर्थ हैं।"

श्लोक 14 (ayodhya.112.14)

इत्य् उक्त्वा न्यपतद् भ्रातुः पादयोर् भरतः तदा। भृशम् सम्प्रार्थयाम् आस रामम् एवम् प्रियम् वदः॥ 112.14 ॥

ity uktvā nyapatad bhrātuḥ pādayor bharataḥ tadā| bhṛśam samprārthayām āsa rāmam evam priyam vadaḥ

ऐसा कहकर मृदुभाषी भरत बार-बार राम से प्रार्थना करते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा।

श्लोक 15 (ayodhya.112.15)

तम् अङ्के भ्रातरम् कृत्वा रामो वचनम् अब्रवीत्। श्यामम् नलिन पत्र अक्षम् मत्त हंस स्वरः स्वयम्॥ 112.15 ॥

tam aṅke bhrātaram kṛtvā rāmo vacanam abravīt| śyāmam nalina patra akṣam matta haṃsa svaraḥ svayam

कमल-दल के समान नेत्रों वाले और मत्त हंस के समान स्वर वाले उस श्याम भाई को गोद में लेकर राम ने स्वयं यह वचन कहा।

श्लोक 16 (ayodhya.112.16)

आगता त्वाम् इयम् बुद्धिः स्वजा वैनयिकी च या। भृशम् उत्सहसे तात रक्षितुम् पृथिवीम् अपि॥ 112.16 ॥

āgatā tvām iyam buddhiḥ svajā vainayikī ca yā| bhṛśam utsahase tāta rakṣitum pṛthivīm api

"हे तात! यह जो बुद्धि तुम्हें सहज रूप से और शिक्षा से दोनों ओर से प्राप्त हुई है, उसके बल पर तुम पृथ्वी की भी रक्षा करने में पूरी तरह समर्थ हो।

श्लोक 17 (ayodhya.112.17)

अमात्यैः च सुहृद्भिः च बुद्धिमद्भिः च मन्त्रिभिः। सर्व कार्याणि सम्मन्त्र्य सुमहान्त्य् अपि कारय॥ 112.17 ॥

amātyaiḥ ca suhṛdbhiḥ ca buddhimadbhiḥ ca mantribhiḥ| sarva kāryāṇi sammantrya sumahānty api kāraya

मंत्रियों, सुहृदों तथा बुद्धिमान् मंत्रीजनों के साथ परामर्श करके, अत्यंत बड़े-बड़े कार्यों को भी संपन्न करना।

श्लोक 18 (ayodhya.112.18)

लक्ष्मीः चन्द्राद् अपेयाद् वा हिमवान् वा हिमम् त्यजेत्। अतीयात् सागरो वेलाम् न प्रतिज्ञाम् अहम् पितुः॥ 112.18 ॥

lakṣmīḥ candrād apeyād vā himavān vā himam tyajet| atīyāt sāgaro velām na pratijñām aham pituḥ

चंद्रमा से चाँदनी भले ही चली जाए, हिमवान् भले ही अपना हिम त्याग दे, सागर भले ही अपनी तट-सीमा लांघ जाए, किंतु मैं पिता की प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होऊँगा।

श्लोक 19 (ayodhya.112.19)

कामाद् वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यम् इदम् कृतम्। न तन् मनसि कर्तव्यम् वर्तितव्यम् च मातृवत्॥ 112.19 ॥

kāmād vā tāta lobhād vā mātrā tubhyam idam kṛtam| na tan manasi kartavyam vartitavyam ca mātṛvat

हे तात! चाहे कामना से हो या मोह से, माता ने तुम्हारे लिए यह किया; इसे मन में मत रखो, बल्कि माता के प्रति उचित आचरण ही करो।"

श्लोक 20 (ayodhya.112.20)

एवम् ब्रुवाणम् भरतः कौसल्या सुतम् अब्रवीत्। तेजसा आदित्य संकाशम् प्रतिपच् चन्द्र दर्शनम्॥ 112.20 ॥

evam bruvāṇam bharataḥ kausalyā sutam abravīt| tejasā āditya saṃkāśam pratipac candra darśanam

सूर्य के समान तेजस्वी और द्वितीया के चंद्रमा के समान दर्शनीय, इस प्रकार बोलते हुए कौसल्या-पुत्र राम को भरत ने उत्तर दिया।

श्लोक 21 (ayodhya.112.21)

अधिरोह आर्य पादाभ्याम् पादुके हेम भूषिते। एते हि सर्व लोकस्य योग क्षेमम् विधास्यतः॥ 112.21 ॥

adhiroha ārya pādābhyām pāduke hema bhūṣite| ete hi sarva lokasya yoga kṣemam vidhāsyataḥ

"हे आर्य! स्वर्ण-भूषित इन पादुकाओं पर अपने चरण रखिए; ये ही समस्त प्रजा के योग-क्षेम का विधान करेंगी।"

श्लोक 22 (ayodhya.112.22)

सो अधिरुह्य नर व्याघ्रः पादुके ह्य् अवरुह्य च। प्रायच्छत् सुमहा तेजा भरताय महात्मने॥ 112.22 ॥

so adhiruhya nara vyāghraḥ pāduke hy avaruhya ca| prāyacchat sumahā tejā bharatāya mahātmane

उस महातेजस्वी नरव्याघ्र ने पादुकाओं पर चरण रखकर फिर उन्हें उतार दिया, और महात्मा भरत को दे दिया।

श्लोक 23 (ayodhya.112.23)

स पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनम्ब्रवीत्। चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम्॥ 112.23 ॥

sa pāduke sampraṇamya rāmaṃ vacanambravīt| caturdaśa hi varṣāṇi jaṭācīradharo hyaham

पादुकाओं को भली-भाँति प्रणाम करके उसने राम से यह वचन कहा—"हे वीर! चौदह वर्षों तक मैं जटा और वल्कल धारण करूँगा,

श्लोक 24 (ayodhya.112.24)

फलमूलाशनो वीर भवेयम् रघुनंदन। तवागमनमाकाङ्क्षन् वसन्वै नगराद्बहिः॥ 112.24 ॥

phalamūlāśano vīra bhaveyam raghunaṃdana| tavāgamanamākāṅkṣan vasanvai nagarādbahiḥ

फल-मूल खाकर रहूँगा, हे रघुनंदन, नगर के बाहर निवास करते हुए तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा करूँगा,

श्लोक 25 (ayodhya.112.25)

तव पादुकयोर्न्यस्तराज्यतन्त्रः परंतप। चतुर्दशे तु सम्पूर्णे वर्षेऽहानि रघूत्तम। न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ 112.25 ॥

tava pādukayornyastarājyatantraḥ paraṃtapa| caturdaśe tu sampūrṇe varṣe'hāni raghūttama| na drakṣyāmi yadi tvāṃ tu pravekṣyāmi hutāśanam

और हे परंतप, राज्य का सारा भार तुम्हारी पादुकाओं पर रखकर। हे रघूत्तम, यदि चौदहवें वर्ष के पूर्ण होने के दिन मैं तुम्हें न देखूँ, तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।"

श्लोक 26 (ayodhya.112.26)

तथेति च प्रतिज्ञाय तं परिष्वज्य सादरम्। शत्रुघ्नम् च परिष्वज्य भरतं चेदमब्रवीत्॥ 112.26 ॥

tatheti ca pratijñāya taṃ pariṣvajya sādaram| śatrughnam ca pariṣvajya bharataṃ cedamabravīt

"ऐसा ही हो," यह प्रतिज्ञा करके, तथा उसे स्नेहपूर्वक आलिंगन करके और शत्रुघ्न को भी आलिंगन करके, राम ने भरत से यह कहा—

श्लोक 27 (ayodhya.112.27)

मातरम् रक्ष कैकेयीम् मा रोषम् कुरु तां प्रति। मया च सीतया चैव शप्तोऽसि रघुसत्तम॥ 112.27 ॥

mātaram rakṣa kaikeyīm mā roṣam kuru tāṃ prati| mayā ca sītayā caiva śapto'si raghusattama

"माता कैकेयी की रक्षा करना, उनके प्रति क्रोध मत करना; क्योंकि मेरी और सीता दोनों की सौगंध देकर मैं तुमसे यह कहता हूँ, हे रघुसत्तम।"

श्लोक 28 (ayodhya.112.28)

इत्युक्त्वाश्रुपरीताक्षो भ्रातरं विससर्ज ह॥ 112.28 ॥

ityuktvāśruparītākṣo bhrātaraṃ visasarja ha

ऐसा कहकर, अश्रुपूरित नेत्रों वाले राम ने अपने भाई को विदा किया।

श्लोक 29 (ayodhya.112.29)

स पादुके ते भरतः प्रतापवान्। स्वलंकृते सम्परिगृह्य धर्मवित्। प्रदक्षिणम् चैव चकार राघवम्। चकार चैव उत्तम नाग मूर्धनि॥ 112.29 ॥

sa pāduke te bharataḥ pratāpavān| svalaṃkṛte samparigṛhya dharmavit| pradakṣiṇam caiva cakāra rāghavam| cakāra caiva uttama nāga mūrdhani

प्रतापी और धर्मज्ञ भरत ने उन सुसज्जित पादुकाओं को ग्रहण करके राघव की प्रदक्षिणा की, और उन्हें एक श्रेष्ठ हाथी के सिर पर रखवा दिया।

श्लोक 30 (ayodhya.112.30)

अथ आनुपूर्व्यात् प्रतिपूज्य तम् जनम्। गुरूमः च मन्त्रि प्रकृतीः तथा अनुजौ। व्यसर्जयद् राघव वंश वर्धनः। स्थितः स्व धर्मे हिमवान् इव अचलः॥ 112.30 ॥

atha ānupūrvyāt pratipūjya tam janam| gurūmaḥ ca mantri prakṛtīḥ tathā anujau| vyasarjayad rāghava vaṃśa vardhanaḥ| sthitaḥ sva dharme himavān iva acalaḥ

तब क्रमानुसार गुरुजनों, मंत्रियों, प्रजा तथा अपने अनुज भाइयों का सम्मान करके, रघुवंश-वर्धन राम ने, हिमालय के समान अपने धर्म में अटल रहते हुए, सबको विदा किया।

श्लोक 31 (ayodhya.112.31)

तम् मातरो बाष्प गृहीत कण्ठो। दुःखेन न आमन्त्रयितुम् हि शेकुः। स तु एव मातॄर् अभिवाद्य सर्वा। रुदन् कुटीम् स्वाम् प्रविवेश रामः॥ 112.31 ॥

tam mātaro bāṣpa gṛhīta kaṇṭho| duḥkhena na āmantrayitum hi śekuḥ| sa tu eva mātṝr abhivādya sarvā| rudan kuṭīm svām praviveśa rāmaḥ

अश्रुओं से गला अवरुद्ध हुई उसकी माताएँ शोक के कारण उसे विदा तक न कह सकीं; किंतु राम ने स्वयं ही सब माताओं को प्रणाम करके, रोते हुए अपनी कुटी में प्रवेश किया।

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