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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 17

हर्षोल्लसित नगरी में

सर्ग 16सर्ग-सूचीसर्ग 18

श्लोक 1 (ayodhya.17.1)

स रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जनः । पताकाध्वजसम्पन्नं महार्हागुरुधूपितम् ॥ 17.1 ॥

sa rāmo rathamāsthāya samprahṛṣṭasuhṛjjanaḥ | patākādhvajasampannaṃ mahārhāgurudhūpitam

वह राम रथ पर आरूढ़ हुए, जिसके साथी अत्यंत हर्षित थे - वह रथ पताकाओं और ध्वजों से सुसज्जित तथा उत्तम अगुरु धूप से सुगंधित था -

श्लोक 2 (ayodhya.17.2)

अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम् । स गृहैरभ्रसंकाशैः पाण्डुरैरुपशोभितम् ॥ 17.2 ॥

apaśyannagaraṃ śrīmān nānājanasamanvitam | sa gṛhairabhrasaṃkāśaiḥ pāṇḍurairupaśobhitam

उन तेजस्वी राम ने विविध प्रकार के लोगों से भरे तथा मेघों के समान श्वेत भवनों से सुशोभित नगर को देखा।

श्लोक 3 (ayodhya.17.3)

राजमार्गं ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम् । चन्दनानां च मुख्यानामगुरूणां च संचयैः ॥ 17.3 ॥

rājamārgaṃ yayau rāmo madhyenāgurudhūpitam | candanānāṃ ca mukhyānāmagurūṇāṃ ca saṃcayaiḥ

राम अगुरु की धूप से सुगंधित राजमार्ग पर चले, जो उत्तम चंदन और अगुरु के ढेरों से भरा था -

श्लोक 4 (ayodhya.17.4)

उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च । अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि ॥ 17.4 ॥

uttamānāṃ ca gandhānāṃ kṣaumakauśāmbarasya ca | aviddhābhiśca muktābhiruttamaiḥ sphāṭikairapi

जो उत्तम इत्रों, रेशमी-सूती वस्त्रों, अवेधित मोतियों और उत्तम स्फटिकों से भरा था।

श्लोक 5 (ayodhya.17.5)

शोभमानमसम्बाधं तं राजपथमुत्तमम् । संवृतं विविधैः पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि ॥ 17.5 ॥

śobhamānamasambādhaṃ taṃ rājapathamuttamam | saṃvṛtaṃ vividhaiḥ puṣpairbhakṣyairuccāvacairapi

वह श्रेष्ठ, शोभायमान और विस्तृत राजमार्ग नाना प्रकार के पुष्पों और तरह-तरह के मिष्ठान्नों से भरा हुआ था।

श्लोक 6 (ayodhya.17.6)

ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा । दध्यक्षतहविर्लाजैर्धूपैरगुरुचन्दनैः ॥ 17.6 ॥

dadarśa taṃ rājapathaṃ divi devapatiryathā | dadhyakṣatahavirlājairdhūpairagurucandanaiḥ

उन्होंने उस राजमार्ग को स्वर्ग में देवराज के मार्ग के समान देखा, जो दही, अक्षत, हवि, लाजा और अगुरु-चंदन की धूप से पूजित था -

श्लोक 7 (ayodhya.17.7)

नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम् । आशीर्वादान् बहून् शृण्वन् सुहृद्भिः समुदीरितान् ॥ 17.7 ॥

nānāmālyopagandhaiśca sadābhyarcitacatvaram | āśīrvādān bahūn śṛṇvan suhṛdbhiḥ samudīritān

- जिसके चौराहे अनेक प्रकार की मालाओं और सुगंधों से सदैव पूजित थे। वे अपने मित्रों द्वारा उच्चारित अनेक आशीर्वचन सुनते हुए,

श्लोक 8 (ayodhya.17.8)

यथार्हं चापि सम्पूज्य सर्वानेव नरान् ययौ । पितामहैराचरितं तथैव प्रपितामहैः ॥ 17.8 ॥

yathārhaṃ cāpi sampūjya sarvāneva narān yayau | pitāmahairācaritaṃ tathaiva prapitāmahaiḥ

तथा सब लोगों का यथोचित सम्मान करते हुए, अपने पितामहों और प्रपितामहों द्वारा अपनाए गए उसी मार्ग पर चले -

श्लोक 9 (ayodhya.17.9)

अद्योपादाय तं मार्गमभिषिक्तोऽनुपालय । यथा स्म पोषिताः पित्रा यथा सर्वैः पितामहैः । ततः सुखतरं सर्वे रामे वत्स्याम राजनि ॥ 17.9 ॥

adyopādāya taṃ mārgamabhiṣikto'nupālaya | yathā sma poṣitāḥ pitrā yathā sarvaiḥ pitāmahaiḥ | tataḥ sukhataraṃ sarve rāme vatsyāma rājani

"-- आज उसी मार्ग को अपनाकर अभिषिक्त होइए और राज्य का पालन कीजिए; जिस प्रकार हम आपके पिता और पूर्वजों द्वारा पाले-पोसे गए, उससे भी अधिक सुखपूर्वक हम सब राम के राजा होने पर रहेंगे।"

श्लोक 10 (ayodhya.17.10)

अलमद्य हि भुक्तेन परमार्थैरलं च नः । यदि पश्याम निर्यान्तं रामं राज्ये प्रतिष्ठितम् ॥ 17.10 ॥

alamadya hi bhuktena paramārthairalaṃ ca naḥ | yadi paśyāma niryāntaṃ rāmaṃ rājye pratiṣṭhitam

"यदि हम राज्य में प्रतिष्ठित होकर जाते हुए राम को देख लें, तो हमें भोजन अथवा अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं।"

श्लोक 11 (ayodhya.17.11)

ततो हि नः प्रियतरं नान्यत् किंचिद् भविष्यति । यथाभिषेको रामस्य राज्येनामिततेजसः ॥ 17.11 ॥

tato hi naḥ priyataraṃ nānyat kiṃcid bhaviṣyati | yathābhiṣeko rāmasya rājyenāmitatejasaḥ

"हमारे लिए इससे बढ़कर प्रिय और कुछ नहीं होगा जितना कि अपरिमित तेजस्वी राम का राज्याभिषेक।"

श्लोक 12 (ayodhya.17.12)

एताश्चान्याश्च सुहृदामुदासीनः शुभाः कथाः । आत्मसम्पूजनीः शृण्वन् ययौ रामो महापथम् ॥ 17.12 ॥

etāścānyāśca suhṛdāmudāsīnaḥ śubhāḥ kathāḥ | ātmasampūjanīḥ śṛṇvan yayau rāmo mahāpatham

अपने मित्रों की ऐसी और अन्य मंगलमय बातें, जो उनकी अपनी प्रशंसा में थीं, सुनते हुए भी उदासीन भाव से राम उस राजमार्ग पर आगे बढ़ते रहे।

श्लोक 13 (ayodhya.17.13)

न हि तस्मान्मनः कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात् । नरः शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेऽपि राघवे ॥ 17.13 ॥

na hi tasmānmanaḥ kaściccakṣuṣī vā narottamāt | naraḥ śaknotyapākraṣṭumatikrānte'pi rāghave

राघव के आगे निकल जाने पर भी कोई भी व्यक्ति उस नरश्रेष्ठ से अपने मन और नेत्रों को हटा नहीं पाता था।

श्लोक 14 (ayodhya.17.14)

यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति । निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ 17.14 ॥

yaśca rāmaṃ na paśyettu yaṃ ca rāmo na paśyati | ninditaḥ sarvalokeṣu svātmāpyenaṃ vigarhate

जो राम को नहीं देख पाता था, और जिसे राम नहीं देख पाते थे, वह समस्त लोक में निंदित होता था, और उसकी अपनी आत्मा भी उसे धिक्कारती थी।

श्लोक 15 (ayodhya.17.15)

सर्वेषु स हि धर्मात्मा वर्णानां कुरुते दयाम् । चतुर्णां हि वयःस्थानां तेन ते तमनुव्रताः ॥ 17.15 ॥

sarveṣu sa hi dharmātmā varṇānāṃ kurute dayām | caturṇāṃ hi vayaḥsthānāṃ tena te tamanuvratāḥ

क्योंकि वे धर्मात्मा राम सभी वर्णों तथा चारों आयु-अवस्थाओं के लोगों पर समान रूप से दया करते थे; इसी कारण वे सब उनके प्रति समर्पित थे।

श्लोक 16 (ayodhya.17.16)

चतुष्पथान् देवपथांश्चैत्यांश्चायतनानि च । प्रदक्षिणं परिहरज्जगाम नृपतेः सुतः ॥ 17.16 ॥

catuṣpathān devapathāṃścaityāṃścāyatanāni ca | pradakṣiṇaṃ pariharajjagāma nṛpateḥ sutaḥ

राजकुमार चौराहों, देवपथों, चैत्यवृक्षों और मंदिरों को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए प्रदक्षिणा-भाव से आगे बढ़ते गए।

श्लोक 17 (ayodhya.17.17)

स राजकुलमासाद्य मेघसङ्घोपमैः शुभैः । प्रासादशृङ्गैर्विविधैः कैलासशिखरोपमैः ॥ 17.17 ॥

sa rājakulamāsādya meghasaṅghopamaiḥ śubhaiḥ | prāsādaśṛṅgairvividhaiḥ kailāsaśikharopamaiḥ

राजभवन के निकट पहुँचकर, जिसके नाना प्रकार के मंगलमय शिखर मेघसमूहों के समान अथवा कैलास-शिखरों के समान प्रतीत होते थे,

श्लोक 18 (ayodhya.17.18)

आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरैः । वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतैः ॥ 17.18 ॥

āvārayadbhirgaganaṃ vimānairiva pāṇḍuraiḥ | vardhamānagṛhaiścāpi ratnajālapariṣkṛtaiḥ

मानो आकाश को ढँके हुए श्वेत विमानों के समान, तथा रत्नजाल से अलंकृत, निरंतर समृद्ध होते भवनों के साथ -

श्लोक 19 (ayodhya.17.19)

तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम् । राजपुत्रः पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन् ॥ 17.19 ॥

tat pṛthivyāṃ gṛhavaraṃ mahendrasadanopamam | rājaputraḥ piturveśma praviveśa śriyā jvalan

-- वह राजकुमार अपने तेज से देदीप्यमान होते हुए पृथ्वी पर के उस श्रेष्ठ भवन में प्रविष्ट हुए, जो महेंद्र के भवन के समान था।

श्लोक 20 (ayodhya.17.20)

स कक्ष्या धन्विभिर्गुप्तास्तिस्रोऽतिक्रम्य वाजिभिः । पदातिरपरे कक्ष्ये द्वे जगाम नरोत्तमः ॥ 17.20 ॥

sa kakṣyā dhanvibhirguptāstisro'tikramya vājibhiḥ | padātirapare kakṣye dve jagāma narottamaḥ

उस नरश्रेष्ठ राम ने अश्वारूढ़ होकर धनुर्धारियों से रक्षित तीन घेरों को पार किया और फिर शेष दो घेरों को पैदल पार किया।

श्लोक 21 (ayodhya.17.21)

स सर्वाः समतिक्रम्य कक्ष्या दशरथात्मजः । संनिवर्त्य जनं सर्वं शुद्धान्तःपुरमत्यगात् ॥ 17.21 ॥

sa sarvāḥ samatikramya kakṣyā daśarathātmajaḥ | saṃnivartya janaṃ sarvaṃ śuddhāntaḥpuramatyagāt

सभी घेरों को पार करके दशरथनंदन ने संपूर्ण जनसमूह को लौटा दिया और अंतःपुर में प्रवेश किया।

श्लोक 22 (ayodhya.17.22)

तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा जनः स सर्वो मुदितो नृपात्मजे । प्रतीक्षते तस्य पुनः स्म निर्गमं यथोदयं चन्द्रमसः सरित्पतिः ॥ 17.22 ॥

tasmin praviṣṭe piturantikaṃ tadā janaḥ sa sarvo mudito nṛpātmaje | pratīkṣate tasya punaḥ sma nirgamaṃ yathodayaṃ candramasaḥ saritpatiḥ

जब राजकुमार अपने पिता के समीप चले गए, तब वह प्रसन्नचित्त जनसमूह उनके पुनः बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगा, जैसे समुद्र चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा करता है।

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