अयोध्याकाण्ड · सर्ग 26
सीता को वनवास का समाचार
श्लोक 1 (ayodhya.26.1)
अभिवाद्य तु कौसल्याम् रामः सम्प्रस्थितः वनम् । कृत स्वस्त्ययनो मात्रा धर्मिष्ठे वर्त्मनि स्थितः ॥ २६.१ ॥
abhivādya tu kausalyām rāmaḥ samprasthitaḥ vanam | kṛta svastyayano mātrā dharmiṣṭhe vartmani sthitaḥ || 26.1 ||
माता कौसल्या को प्रणाम करके तथा माता द्वारा मंगल-स्वस्तिवाचन किये जाने पर, राम अपने धर्मपथ पर दृढ़ रहते हुए वन के लिए चल पड़े।
श्लोक 2 (ayodhya.26.2)
विराजयन् राज सुतः राज मार्गम् नरैः वृतम् । हृदयानि आममन्थ इव जनस्य गुणवत्तया ॥ २६.२ ॥
virājayan rāja sutaḥ rāja mārgam naraiḥ vṛtam | hṛdayāni āmamantha iva janasya guṇavattayā || 26.2 ||
राजकुमार राम मनुष्यों से भरे राजमार्ग को अपनी कान्ति से उद्भासित करते हुए चले, और मानो अपने सद्गुणों से ही लोगों के हृदयों को मथ रहे थे।
श्लोक 3 (ayodhya.26.3)
वैदेही च अपि तत् सर्वम् न शुश्राव तपस्विनी । तत् एव हृदि तस्याः च यौवराज्य अभिषेचनम् ॥ २६.३ ॥
vaidehī ca api tat sarvam na śuśrāva tapasvinī | tat eva hṛdi tasyāḥ ca yauvarājya abhiṣecanam || 26.3 ||
किन्तु विदेहनन्दिनी तपस्विनी सीता ने यह सब कुछ नहीं सुना था; उनके हृदय में तो केवल युवराज-पद के अभिषेक की ही बात बसी हुई थी।
श्लोक 4 (ayodhya.26.4)
देव कार्यम् स्म सा कृत्वा कृतज्ञा हृष्ट चेतना । अभिज्ञा राज धर्मानाम् राज पुत्रम् प्रतीक्षते ॥ २६.४ ॥
deva kāryam sma sā kṛtvā kṛtajñā hṛṣṭa cetanā | abhijñā rāja dharmānām rāja putram pratīkṣate || 26.4 ||
कृतज्ञ, प्रसन्नचित्त तथा राजधर्मों की ज्ञाता सीता देवताओं की पूजा करके राजकुमार राम की प्रतीक्षा कर रही थीं।
श्लोक 5 (ayodhya.26.5)
प्रविवेश अथ रामः तु स्व वेश्म सुविभूषितम् । प्रहृष्ट जन सम्पूर्णम् ह्रिया किंचित् अवान् मुखः ॥ २६.५ ॥
praviveśa atha rāmaḥ tu sva veśma suvibhūṣitam | prahṛṣṭa jana sampūrṇam hriyā kiṃcit avān mukhaḥ || 26.5 ||
तत्पश्चात् राम, लज्जा से कुछ मुख नीचा किये हुए, अपने भलीभाँति सजे हुए तथा हर्षित जनों से भरे भवन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 6 (ayodhya.26.6)
अथ सीता समुत्पत्य वेपमाना च तम् पतिम् । अपश्यत् शोक सम्तप्तम् चिन्ता व्याकुलिल इन्द्रियम् ॥ २६.६ ॥
atha sītā samutpatya vepamānā ca tam patim | apaśyat śoka samtaptam cintā vyākulila indriyam || 26.6 ||
तब सीता तुरन्त उठ खड़ी हुईं और काँपती हुई उन्होंने अपने पति को शोक से संतप्त तथा चिन्ता से व्याकुल इन्द्रियों वाला देखा।
श्लोक 7 (ayodhya.26.7)
ताम् दृष्ट्वा स हि धर्मात्मा न शशाक मनोगतम् । तम् शोकम् राघवह् सोढुम् ततो विवृतताम् गतः ॥ २६.७ ॥
tām dṛṣṭvā sa hi dharmātmā na śaśāka manogatam | tam śokam rāghavah soḍhum tato vivṛtatām gataḥ || 26.7 ||
उन्हें देखकर वे धर्मात्मा राघव अपने मन में छिपे उस शोक को सहन न कर सके, और वह प्रकट हो गया।
श्लोक 8 (ayodhya.26.8)
विवर्ण वदनम् दृष्ट्वा तम् प्रस्विन्नम् अमर्षणम् । आह दुह्ख अभिसम्तप्ता किम् इदानीम् इदम् प्रभो ॥ २६.८ ॥
vivarṇa vadanam dṛṣṭvā tam prasvinnam amarṣaṇam | āha duhkha abhisamtaptā kim idānīm idam prabho || 26.8 ||
उनके विवर्ण, पसीने से भीगे तथा उद्विग्न मुख को देखकर सीता दुःख से संतप्त होकर बोलीं—'हे प्रभो! यह अभी क्या हो गया है?'
श्लोक 9 (ayodhya.26.9)
अद्य बार्हस्पतः श्रीमान् युक्तः पुष्यो न राघव । प्रोच्यते ब्राह्मणैः प्राज्ञैः केन त्वम् असि दुर्मनाः ॥ २६.९ ॥
adya bārhaspataḥ śrīmān yuktaḥ puṣyo na rāghava | procyate brāhmaṇaiḥ prājñaiḥ kena tvam asi durmanāḥ || 26.9 ||
'हे राघव! आज तो विद्वान् ब्राह्मणों ने बृहस्पति-प्रधान शुभ पुष्य नक्षत्र को ही उपयुक्त बताया है; फिर किस कारण आप इतने उदास हैं?'
श्लोक 10 (ayodhya.26.10)
न ते शत शलाकेन जल फेन निभेन च । आवृतम् वदनम् वल्गु चत्रेण अभिविराजते ॥ २६.१० ॥
na te śata śalākena jala phena nibhena ca | āvṛtam vadanam valgu catreṇa abhivirājate || 26.10 ||
'सौ तीलियों वाले, जल के फेन-सदृश श्वेत छत्र से आच्छादित आपका सुन्दर मुख आज शोभा नहीं पा रहा है।'
श्लोक 11 (ayodhya.26.11)
व्यजनाभ्याम् च मुख्याभ्याम् शत पत्र निभ ईक्षणम् । चन्द्र हंस प्रकाशाभ्याम् वीज्यते न तव आननम् ॥ २६.११ ॥
vyajanābhyām ca mukhyābhyām śata patra nibha īkṣaṇam | candra haṃsa prakāśābhyām vījyate na tava ānanam || 26.11 ||
'चन्द्रमा और हंस के समान उज्ज्वल दो श्रेष्ठ चँवरों से, कमल-सदृश नेत्रों वाला आपका मुख आज पंखा नहीं झला जा रहा है।'
श्लोक 12 (ayodhya.26.12)
वाग्मिनो बन्दिनः च अपि प्रहृष्टाः त्वम् नर ऋषभ । स्तुवन्तः न अद्य दृश्यन्ते मन्गलैः सूत मागधाः ॥ २६.१२ ॥
vāgmino bandinaḥ ca api prahṛṣṭāḥ tvam nara ṛṣabha | stuvantaḥ na adya dṛśyante mangalaiḥ sūta māgadhāḥ || 26.12 ||
'हे नरश्रेष्ठ! आज वाक्पटु, प्रसन्नचित्त सूत-मागध बन्दीजन मंगल वचनों से आपकी स्तुति करते हुए कहीं दिखायी नहीं देते।'
श्लोक 13 (ayodhya.26.13)
न ते क्षौद्रम् च दधि च ब्राह्मणा वेद पारगाः । मूर्ध्नि मूर्ध अवसिक्तस्य दधति स्म विधानतः ॥ २६.१३ ॥
na te kṣaudram ca dadhi ca brāhmaṇā veda pāragāḥ | mūrdhni mūrdha avasiktasya dadhati sma vidhānataḥ || 26.13 ||
'वेदपारंगत ब्राह्मणों ने भी विधिपूर्वक मूर्धाभिषिक्त के समान आपके मस्तक पर मधु और दधि आज नहीं रखा है।'
श्लोक 14 (ayodhya.26.14)
न त्वाम् प्रकृतयः सर्वा श्रेणी मुख्याः च भूषिताः । अनुव्रजितुम् इच्चन्ति पौर जापपदाः तथा ॥ २६.१४ ॥
na tvām prakṛtayaḥ sarvā śreṇī mukhyāḥ ca bhūṣitāḥ | anuvrajitum iccanti paura jāpapadāḥ tathā || 26.14 ||
'सभी मन्त्रिगण, विभूषित श्रेष्ठिगण तथा नगर और जनपद के लोग भी आज आपके पीछे-पीछे चलने की इच्छा नहीं कर रहे हैं।'
श्लोक 15 (ayodhya.26.15)
चतुर्भिर् वेग सम्पन्नैः हयैः कान्चन भूषणैः । मुख्यः पुष्य रथो युक्तः किम् न गच्चति ते अग्रतः ॥ २६.१५ ॥
caturbhir vega sampannaiḥ hayaiḥ kāncana bhūṣaṇaiḥ | mukhyaḥ puṣya ratho yuktaḥ kim na gaccati te agrataḥ || 26.15 ||
'स्वर्ण-आभूषणों से सजे तथा वेगवान् चार घोड़ों से जुता हुआ श्रेष्ठ पुष्परथ आज आपके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहा है?'
श्लोक 16 (ayodhya.26.16)
न हस्ती च अग्रतः श्रीमांस् तव लक्षण पूजितः । प्रयाणे लक्ष्यते वीर कृष्ण मेघ गिरि प्रभः ॥ २६.१६ ॥
na hastī ca agrataḥ śrīmāṃs tava lakṣaṇa pūjitaḥ | prayāṇe lakṣyate vīra kṛṣṇa megha giri prabhaḥ || 26.16 ||
'हे वीर! शुभ लक्षणों से युक्त, काले मेघाच्छादित पर्वत के समान तेजस्वी वह श्रीमान् गजराज भी आज आपके प्रस्थान में आगे नहीं दीख रहा है।'
श्लोक 17 (ayodhya.26.17)
न च कान्चन चित्रम् ते पश्यामि प्रिय दर्शन । भद्र आसनम् पुरः कृत्य यान्तम् वीर पुरह्सरम् ॥ २६.१७ ॥
na ca kāncana citram te paśyāmi priya darśana | bhadra āsanam puraḥ kṛtya yāntam vīra purahsaram || 26.17 ||
'हे प्रियदर्शन वीर! स्वर्ण-चित्रित भद्रासन को आगे लेकर चलने वाला अग्रगामी सेवक भी मुझे कहीं दिखायी नहीं देता।'
श्लोक 18 (ayodhya.26.18)
अभिषेको यदा सज्जः किम् इदानीम् इदम् तव । अपूर्वो मुख वर्णः च न प्रहर्षः च लक्ष्यते ॥ २६.१८ ॥
abhiṣeko yadā sajjaḥ kim idānīm idam tava | apūrvo mukha varṇaḥ ca na praharṣaḥ ca lakṣyate || 26.18 ||
'जब अभिषेक की सारी तैयारी हो चुकी है, तब आपकी यह कैसी दशा है? आपके मुख का रंग अभूतपूर्व है, और कहीं कोई प्रसन्नता दिखायी नहीं देती।'
श्लोक 19 (ayodhya.26.19)
इति इव विलपन्तीम् ताम् प्रोवाच रघु नन्दनः । सीते तत्रभवांस् तात प्रव्राजयति माम् वनम् ॥ २६.१९ ॥
iti iva vilapantīm tām provāca raghu nandanaḥ | sīte tatrabhavāṃs tāta pravrājayati mām vanam || 26.19 ||
इस प्रकार विलाप करती हुई सीता से रघुनन्दन राम ने कहा—'हे सीते! पूज्य पिताजी मुझे वन में भेज रहे हैं।'
श्लोक 20 (ayodhya.26.20)
कुले महति सम्भूते धर्मज्ञे धर्म चारिणि । शृणु जानकि येन इदम् क्रमेण अभ्यागतम् मम ॥ २६.२० ॥
kule mahati sambhūte dharmajñe dharma cāriṇi | śṛṇu jānaki yena idam krameṇa abhyāgatam mama || 26.20 ||
'हे जानकि! तुम महान् कुल में उत्पन्न, धर्मज्ञ तथा धर्माचारिणी हो; सुनो, यह मुझे किस क्रम से प्राप्त हुआ है।'
श्लोक 21 (ayodhya.26.21)
राज्ञा सत्य प्रतिज्ञेन पित्रा दशरथेन मे । कैकेय्यै प्रीत मनसा पुरा दत्तौ महा वरौ ॥ २६.२१ ॥
rājñā satya pratijñena pitrā daśarathena me | kaikeyyai prīta manasā purā dattau mahā varau || 26.21 ||
'मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता महाराज दशरथ ने बहुत पहले प्रसन्नचित्त होकर माता कैकेयी को दो महान् वर दिये थे।'
श्लोक 22 (ayodhya.26.22)
तया अद्य मम सज्जे अस्मिन्न् अभिषेके नृप उद्यते । प्रचोदितः स समयो धर्मेण प्रतिनिर्जितः ॥ २६.२२ ॥
tayā adya mama sajje asminn abhiṣeke nṛpa udyate | pracoditaḥ sa samayo dharmeṇa pratinirjitaḥ || 26.22 ||
'अब जब राजा द्वारा मेरे अभिषेक की सब तैयारी आरम्भ हो चुकी थी, तब उसने उसी पुराने वचन का स्मरण दिलाकर धर्म के बल पर राजा को विवश कर दिया।'
श्लोक 23 (ayodhya.26.23)
चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यम् दण्डके मया । पित्रा मे भरतः च अपि यौवराज्ये नियोजितः ॥ २६.२३ ॥
caturdaśa hi varṣāṇi vastavyam daṇḍake mayā | pitrā me bharataḥ ca api yauvarājye niyojitaḥ || 26.23 ||
'मुझे चौदह वर्षों तक दण्डकवन में निवास करना है, और मेरे पिता ने भरत को युवराज-पद पर नियुक्त कर दिया है।'
श्लोक 24 (ayodhya.26.24)
सो अहम् त्वाम् आगतः द्रष्टुम् प्रस्थितः विजनम् वनम् । भरतस्य समीपे ते न अहम् कथ्यः कदाचन ॥ २६.२४ ॥
so aham tvām āgataḥ draṣṭum prasthitaḥ vijanam vanam | bharatasya samīpe te na aham kathyaḥ kadācana || 26.24 ||
'मैं निर्जन वन को जाने के लिए प्रस्थान करते हुए तुमसे मिलने आया हूँ। तुम्हें भरत के समीप कभी भी मेरी चर्चा नहीं करनी चाहिए।'
श्लोक 25 (ayodhya.26.25)
ऋद्धि युक्ता हि पुरुषा न सहन्ते पर स्तवम् । तस्मान् न ते गुणाः कथ्या भरतस्य अग्रतः मम ॥ २६.२५ ॥
ṛddhi yuktā hi puruṣā na sahante para stavam | tasmān na te guṇāḥ kathyā bharatasya agrataḥ mama || 26.25 ||
'क्योंकि समृद्धिशाली पुरुष दूसरे की प्रशंसा सहन नहीं कर पाते; अतः तुम्हें भरत के सामने मेरे गुणों की चर्चा कभी नहीं करनी चाहिए।'
श्लोक 26 (ayodhya.26.26)
न अपि त्वम् तेन भर्तव्या विशेषेण कदाचन । अनुकूलतया शक्यम् समीपे तस्य वर्तितुम् ॥ २६.२६ ॥
na api tvam tena bhartavyā viśeṣeṇa kadācana | anukūlatayā śakyam samīpe tasya vartitum || 26.26 ||
'तुम्हें उसके द्वारा कभी विशेष रूप से पोषित होने की आवश्यकता नहीं; अनुकूल आचरण करके ही तुम उसके निकट रह सकती हो।'
श्लोक 27 (ayodhya.26.27)
तस्मै दत्तम् नृवतिना यौवराज्यम् सनातनम् । स प्रसाद्यस्त्वया सीते नृपतिश्च विशेषतः ॥ २६.२७ ॥
tasmai dattam nṛvatinā yauvarājyam sanātanam | sa prasādyastvayā sīte nṛpatiśca viśeṣataḥ || 26.27 ||
'हे सीते! राजा ने उसे सदा के लिए युवराज-पद दे दिया है; अतः तुम्हें उसे, और विशेषतः राजा को भी, प्रसन्न रखना चाहिए।'
श्लोक 28 (ayodhya.26.28)
अहम् च अपि प्रतिज्ञाम् ताम् गुरोह् समनुपालयन् । वनम् अद्य एव यास्यामि स्थिरा भव मनस्विनि ॥ २६.२८ ॥
aham ca api pratijñām tām guroh samanupālayan | vanam adya eva yāsyāmi sthirā bhava manasvini || 26.28 ||
'मैं भी पिता की उस प्रतिज्ञा का पालन करते हुए आज ही वन को चला जाऊँगा। हे मनस्विनी! तुम धैर्य धारण करो।'
श्लोक 29 (ayodhya.26.29)
याते च मयि कल्याणि वनम् मुनि निषेवितम् । व्रत उपवास रतया भवितव्यम् त्वया अनघे ॥ २६.२९ ॥
yāte ca mayi kalyāṇi vanam muni niṣevitam | vrata upavāsa ratayā bhavitavyam tvayā anaghe || 26.29 ||
'हे कल्याणि! हे निष्पाप सीते! मेरे मुनिजन-सेवित वन को चले जाने पर तुम्हें व्रत और उपवास में तत्पर रहना चाहिए।'
श्लोक 30 (ayodhya.26.30)
काल्यम् उत्थाय देवानाम् कृत्वा पूजाम् यथा विधि । वन्दितव्यो दशरथः पिता मम नर ईश्वरः ॥ २६.३० ॥
kālyam utthāya devānām kṛtvā pūjām yathā vidhi | vanditavyo daśarathaḥ pitā mama nara īśvaraḥ || 26.30 ||
'प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक देवताओं की पूजा करके तुम्हें मेरे पिता, नरेश्वर दशरथ को प्रणाम करना चाहिए।'
श्लोक 31 (ayodhya.26.31)
माता च मम कौसल्या वृद्धा सम्ताप कर्शिता । धर्मम् एव अग्रतः कृत्वा त्वत्तः सम्मानम् अर्हति ॥ २६.३१ ॥
mātā ca mama kausalyā vṛddhā samtāpa karśitā | dharmam eva agrataḥ kṛtvā tvattaḥ sammānam arhati || 26.31 ||
'मेरी माता कौसल्या भी, जो वृद्ध हैं और शोक से क्षीण हो चली हैं, धर्म को ही आगे रखकर तुमसे विशेष सम्मान पाने योग्य हैं।'
श्लोक 32 (ayodhya.26.32)
वन्दितव्याः च ते नित्यम् याः शेषा मम मातरः । स्नेह प्रणय सम्भोगैः समा हि मम मातरः ॥ २६.३२ ॥
vanditavyāḥ ca te nityam yāḥ śeṣā mama mātaraḥ | sneha praṇaya sambhogaiḥ samā hi mama mātaraḥ || 26.32 ||
'मेरी शेष माताओं को भी तुम्हें सदा प्रणाम करना चाहिए; क्योंकि स्नेह, प्रेम और पालन-पोषण में मेरे लिए सभी माताएँ समान हैं।'
श्लोक 33 (ayodhya.26.33)
भ्रातृ पुत्र समौ च अपि द्रष्टव्यौ च विशेषतः । त्वया लक्ष्मण शत्रुघ्नौ प्राणैः प्रियतरौ मम ॥ २६.३३ ॥
bhrātṛ putra samau ca api draṣṭavyau ca viśeṣataḥ | tvayā lakṣmaṇa śatrughnau prāṇaiḥ priyatarau mama || 26.33 ||
'लक्ष्मण और शत्रुघ्न, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, उन दोनों को तुम्हें विशेष रूप से भाई और पुत्र, दोनों के समान मानना चाहिए।'
श्लोक 34 (ayodhya.26.34)
विप्रियम् न च कर्तव्यम् भरतस्य कदाचन । स हि राजा प्रभुः चैव देशस्य च कुलस्य च ॥ २६.३४ ॥
vipriyam na ca kartavyam bharatasya kadācana | sa hi rājā prabhuḥ caiva deśasya ca kulasya ca || 26.34 ||
'भरत के लिए अप्रिय कोई कार्य कभी नहीं करना चाहिए; क्योंकि अब वे ही इस देश और कुल के राजा और स्वामी हैं।'
श्लोक 35 (ayodhya.26.35)
आराधिता हि शीलेन प्रयत्नैः च उपसेविताः । राजानः सम्प्रसीदन्ति प्रकुप्यन्ति विपर्यये ॥ २६.३५ ॥
ārādhitā hi śīlena prayatnaiḥ ca upasevitāḥ | rājānaḥ samprasīdanti prakupyanti viparyaye || 26.35 ||
'राजा लोग सुशीलता से आराधित और परिश्रमपूर्वक सेवित होने पर प्रसन्न होते हैं, और इसके विपरीत होने पर कुपित हो जाते हैं।'
श्लोक 36 (ayodhya.26.36)
औरसान् अपि पुत्रान् हि त्यजन्ति अहित कारिणः । समर्थान् सम्प्रगृह्णन्ति जनान् अपि नर अधिपाः ॥ २६.३६ ॥
aurasān api putrān hi tyajanti ahita kāriṇaḥ | samarthān sampragṛhṇanti janān api nara adhipāḥ || 26.36 ||
'राजा अपने औरस पुत्रों को भी, यदि वे अहितकारी हों, त्याग देते हैं, और सामर्थ्यवान् होने पर अन्य जनों को भी अपना लेते हैं।'
श्लोक 37 (ayodhya.26.37)
सा त्वम् वसेह कल्याणि राज्ञः समनुवर्तिनी । भरतस्य रता धर्मे सत्यव्रतपरायणा ॥ २६.३७ ॥
sā tvam vaseha kalyāṇi rājñaḥ samanuvartinī | bharatasya ratā dharme satyavrataparāyaṇā || 26.37 ||
'अतः हे कल्याणि! तुम राजा भरत के अनुकूल आचरण करती हुई, धर्म और सत्यव्रत में तत्पर रहकर यहीं निवास करो।'
श्लोक 38 (ayodhya.26.38)
अहम् गमिष्यामि महा वनम् प्रिये । त्वया हि वस्तव्यम् इह एव भामिनि । यथा व्यलीकम् कुरुषे न कस्यचित् । तथा त्वया कार्यम् इदम् वचो मम ॥ २६.३८ ॥
aham gamiṣyāmi mahā vanam priye | tvayā hi vastavyam iha eva bhāmini | yathā vyalīkam kuruṣe na kasyacit | tathā tvayā kāryam idam vaco mama || 26.38 ||
'हे प्रिये! मैं महावन को चला जाऊँगा, और हे भामिनि! तुम्हें यहीं रहना होगा। तुम ऐसा आचरण करना कि किसी को भी कष्ट न पहुँचे — मेरी इस बात का तुम्हें पालन करना है।'