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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 27

सीता की सहगमन-प्रार्थना

सर्ग 26सर्ग-सूचीसर्ग 28

श्लोक 1 (ayodhya.27.1)

एवम् उक्ता तु वैदेही प्रिय अर्हा प्रिय वादिनी । प्रणयात् एव सम्क्रुद्धा भर्तारम् इदम् अब्रवीत् ॥ २७.१ ॥

evam uktā tu vaidehī priya arhā priya vādinī | praṇayāt eva samkruddhā bhartāram idam abravīt || 27.1 ||

ऐसा कहे जाने पर, प्रियवचन बोलने वाली तथा प्रिय वचन की अधिकारिणी विदेहनन्दिनी सीता प्रेमवश ही कुछ कुपित होकर अपने पति से यह बोलीं।

श्लोक 2 (ayodhya.27.2)

किमिदम् भाषसे राम वाक्यम् लघुतया ध्रुवम् । त्वया यदपहास्यम् मे श्रुत्वा नरवरात्मज ॥ २७.२ ॥

kimidam bhāṣase rāma vākyam laghutayā dhruvam | tvayā yadapahāsyam me śrutvā naravarātmaja || 27.2 ||

'हे नरवरात्मज राम! आप यह कैसी तुच्छ बात कह रहे हैं, जिसे सुनकर निश्चय ही हम दोनों को हँसी आएगी?'

श्लोक 3 (ayodhya.27.3)

आर्य पुत्र पिता माता भ्राता पुत्रः तथा स्नुषा । स्वानि पुण्यानि भुन्जानाः स्वम् स्वम् भाग्यम् उपासते ॥ २७.३ ॥

ārya putra pitā mātā bhrātā putraḥ tathā snuṣā | svāni puṇyāni bhunjānāḥ svam svam bhāgyam upāsate || 27.3 ||

'हे आर्यपुत्र! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू — ये सब अपने-अपने पुण्य-कर्मों का फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य के अनुसार ही जीवन बिताते हैं।'

श्लोक 4 (ayodhya.27.4)

भर्तुर् भाग्यम् तु भार्या एका प्राप्नोति पुरुष ऋषभ । अतः चैव अहम् आदिष्टा वने वस्तव्यम् इति अपि ॥ २७.४ ॥

bhartur bhāgyam tu bhāryā ekā prāpnoti puruṣa ṛṣabha | ataḥ caiva aham ādiṣṭā vane vastavyam iti api || 27.4 ||

'किन्तु हे पुरुषश्रेष्ठ! केवल पत्नी ही पति के भाग्य में भागी होती है; इसी कारण मुझे भी वन में रहने की आज्ञा है।'

श्लोक 5 (ayodhya.27.5)

न पिता न आत्मजो न आत्मा न माता न सखी जनः । इह प्रेत्य च नारीणाम् पतिर् एको गतिः सदा ॥ २७.५ ॥

na pitā na ātmajo na ātmā na mātā na sakhī janaḥ | iha pretya ca nārīṇām patir eko gatiḥ sadā || 27.5 ||

'न पिता, न पुत्र, न स्वयं अपनी आत्मा, न माता, न सखीजन — स्त्रियों के लिए इस लोक और परलोक दोनों में सदा एकमात्र पति ही आश्रय है।'

श्लोक 6 (ayodhya.27.6)

यदि त्वम् प्रस्थितः दुर्गम् वनम् अद्य एव राघव । अग्रतः ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुश कण्टकान् ॥ २७.६ ॥

yadi tvam prasthitaḥ durgam vanam adya eva rāghava | agrataḥ te gamiṣyāmi mṛdnantī kuśa kaṇṭakān || 27.6 ||

'हे राघव! यदि आप आज ही दुर्गम वन के लिए प्रस्थान कर रहे हैं, तो मैं कुश-तृण और काँटों को कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूँगी।'

श्लोक 7 (ayodhya.27.7)

ईर्ष्या रोषौ बहिष् कृत्य भुक्त शेषम् इव उदकम् । नय माम् वीर विश्रब्धः पापम् मयि न विद्यते ॥ २७.७ ॥

īrṣyā roṣau bahiṣ kṛtya bhukta śeṣam iva udakam | naya mām vīra viśrabdhaḥ pāpam mayi na vidyate || 27.7 ||

'हे वीर! ईर्ष्या और क्रोध को उसी प्रकार त्याग दीजिए जैसे पिये हुए जल का शेष अंश त्यागा जाता है, और मुझे निःशंक होकर साथ ले चलिए; मुझमें कोई दोष नहीं है।'

श्लोक 8 (ayodhya.27.8)

प्रासाद अग्रैः विमानैः वा वैहायस गतेन वा । सर्व अवस्था गता भर्तुः पादच् चाया विशिष्यते ॥ २७.८ ॥

prāsāda agraiḥ vimānaiḥ vā vaihāyasa gatena vā | sarva avasthā gatā bhartuḥ pādac cāyā viśiṣyate || 27.8 ||

'ऊँचे प्रासादों के शिखरों, विमानों अथवा आकाश-गमन से भी बढ़कर, हर अवस्था में पति के चरणों की छाया श्रेष्ठ है।'

श्लोक 9 (ayodhya.27.9)

अनुशिष्टा अस्मि मात्रा च पित्रा च विविध आश्रयम् । न अस्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यम् यथा मया ॥ २७.९ ॥

anuśiṣṭā asmi mātrā ca pitrā ca vividha āśrayam | na asmi samprati vaktavyā vartitavyam yathā mayā || 27.9 ||

'मुझे किसके साथ कैसा बर्ताव करना है, इसकी शिक्षा मेरी माता और पिता पहले ही अनेक प्रकार से दे चुके हैं; अब मुझे इस विषय में और कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है।'

श्लोक 10 (ayodhya.27.10)

अहम् दुर्गम् गमिष्यामि वनम् पुरुषवर्जितम् । नानामृगगणाकीर्णम् शार्दूलवृकसेवितम् ॥ २७.१० ॥

aham durgam gamiṣyāmi vanam puruṣavarjitam | nānāmṛgagaṇākīrṇam śārdūlavṛkasevitam || 27.10 ||

'मैं उस दुर्गम, मनुष्यहीन, नाना प्रकार के पशुओं के झुंडों से भरे तथा बाघों और भेड़ियों से बसे वन में भी चलूँगी।'

श्लोक 11 (ayodhya.27.11)

सुखम् वने निवत्स्यामि यथा एव भवने पितुः । अचिन्तयन्ती त्रीम्ल् लोकामः चिन्तयन्ती पति व्रतम् ॥ २७.११ ॥

sukham vane nivatsyāmi yathā eva bhavane pituḥ | acintayantī trīml lokāmaḥ cintayantī pati vratam || 27.11 ||

'जैसे मैं पिता के घर में रहती थी, वैसे ही वन में भी सुखपूर्वक रहूँगी; तीनों लोकों की भी चिन्ता न करते हुए केवल पतिव्रत-धर्म का ही चिन्तन करूँगी।'

श्लोक 12 (ayodhya.27.12)

शुश्रूषमाणा ते नित्यम् नियता ब्रह्म चारिणी । सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधु गन्धिषु ॥ २७.१२ ॥

śuśrūṣamāṇā te nityam niyatā brahma cāriṇī | saha raṃsye tvayā vīra vaneṣu madhu gandhiṣu || 27.12 ||

'हे वीर! सदा आपकी सेवा में तत्पर रहकर, नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई, मैं आपके साथ मधु-गन्धित उन वनों में विचरण करूँगी।'

श्लोक 13 (ayodhya.27.13)

त्वम् हि कर्तुम् वने शक्तः राम सम्परिपालनम् । अन्यस्य पै जनस्य इह किम् पुनर् मम मानद ॥ २७.१३ ॥

tvam hi kartum vane śaktaḥ rāma samparipālanam | anyasya pai janasya iha kim punar mama mānada || 27.13 ||

'हे मानद राम! आप तो वन में रहकर दूसरे लोगों की भी रक्षा करने में समर्थ हैं; फिर मेरी रक्षा करना आपके लिए कौन बड़ी बात है?'

श्लोक 14 (ayodhya.27.14)

सह त्वया गमिश्यामि वसमद्य न संशयः । नाहम् शक्या महाभाग निवर्तयितु मुद्यता ॥ २७.१४ ॥

saha tvayā gamiśyāmi vasamadya na saṃśayaḥ | nāham śakyā mahābhāga nivartayitu mudyatā || 27.14 ||

'हे महाभाग! मैं आज ही आपके साथ वन को अवश्य चलूँगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है; मैं जाने को तैयार हूँ, मुझे किसी भी प्रकार रोका नहीं जा सकता।'

श्लोक 15 (ayodhya.27.15)

फल मूल अशना नित्यम् भविष्यामि न संशयः । न ते दुह्खम् करिष्यामि निवसन्ती सह त्वया ॥ २७.१५ ॥

phala mūla aśanā nityam bhaviṣyāmi na saṃśayaḥ | na te duhkham kariṣyāmi nivasantī saha tvayā || 27.15 ||

'मैं सदा फल-मूल खाकर ही रहूँगी, इसमें कोई सन्देह नहीं; आपके साथ रहते हुए मैं आपको कभी कोई दुःख नहीं दूँगी।'

श्लोक 16 (ayodhya.27.16)

इच्चामि सरितः शैलान् पल्वलानि वनानि च । द्रष्टुम् सर्वत्र निर्भीता त्वया नाथेन धीमता ॥ २७.१६ ॥

iccāmi saritaḥ śailān palvalāni vanāni ca | draṣṭum sarvatra nirbhītā tvayā nāthena dhīmatā || 27.16 ||

'हे बुद्धिमान् नाथ! आपके साथ रहकर मैं सर्वत्र निर्भय रहूँगी; मैं नदियों, पर्वतों, छोटे जलाशयों और वनों को देखना चाहती हूँ।'

श्लोक 17 (ayodhya.27.17)

हंस कारण्डव आकीर्णाः पद्मिनीः साधु पुष्पिताः । इच्चेयम् सुखिनी द्रष्टुम् त्वया वीरेण सम्गता ॥ २७.१७ ॥

haṃsa kāraṇḍava ākīrṇāḥ padminīḥ sādhu puṣpitāḥ | icceyam sukhinī draṣṭum tvayā vīreṇa samgatā || 27.17 ||

'हे वीर! आपके साथ रहकर, प्रसन्न होकर, मैं हंस और कारण्डव पक्षियों से भरे तथा सुन्दर पुष्पों से खिले हुए कमल-सरोवरों को देखना चाहती हूँ।'

श्लोक 18 (ayodhya.27.18)

अभिषेकम् करिष्यामि तासु नित्यम् यतव्रता । सह त्वया विशाल अक्ष रंस्ये परम नन्दिनी ॥ २७.१८ ॥

abhiṣekam kariṣyāmi tāsu nityam yatavratā | saha tvayā viśāla akṣa raṃsye parama nandinī || 27.18 ||

'हे विशालनेत्र! व्रतनिष्ठ रहकर मैं उन सरोवरों में प्रतिदिन स्नान करूँगी, और परम आनन्दित होकर आपके साथ विचरूँगी।'

श्लोक 19 (ayodhya.27.19)

एवम् वर्ष सहस्राणाम् शतम् वा अहम् त्वया सह । व्यतिक्रमम् न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मतः ॥ २७.१९ ॥

evam varṣa sahasrāṇām śatam vā aham tvayā saha | vyatikramam na vetsyāmi svargo'pi hi na me mataḥ || 27.19 ||

'इस प्रकार आपके साथ सैकड़ों या हजारों वर्ष भी बीत जाएँ, तो मुझे कोई कष्ट नहीं होगा; आपके बिना तो स्वर्ग भी मुझे अभीष्ट नहीं है।'

श्लोक 20 (ayodhya.27.20)

स्वर्गे अपि च विना वासो भविता यदि राघव । त्वया मम नर व्याघ्र न अहम् तम् अपि रोचये ॥ २७.२० ॥

svarge api ca vinā vāso bhavitā yadi rāghava | tvayā mama nara vyāghra na aham tam api rocaye || 27.20 ||

'हे नरव्याघ्र राघव! यदि आपके बिना मुझे स्वर्ग में भी निवास मिले, तो भी वह मुझे रुचिकर नहीं होगा।'

श्लोक 21 (ayodhya.27.21)

अहम् गमिष्यामि वनम् सुदुर्गमम् । मृग आयुतम् वानर वारणैः युतम् । वने निवत्स्यामि यथा पितुर् गृहे । तव एव पादाव् उपगृह्य सम्मता ॥ २७.२१ ॥

aham gamiṣyāmi vanam sudurgamam | mṛga āyutam vānara vāraṇaiḥ yutam | vane nivatsyāmi yathā pitur gṛhe | tava eva pādāv upagṛhya sammatā || 27.21 ||

'मैं उस अत्यन्त दुर्गम, मृगों से भरे तथा वानरों और गजों से युक्त वन में भी चलूँगी; वहाँ आपके ही चरणों का आश्रय लेकर, आदरपूर्वक, मैं पिता के घर के समान निवास करूँगी।'

श्लोक 22 (ayodhya.27.22)

अनन्य भावाम् अनुरक्त चेतसम् । त्वया वियुक्ताम् मरणाय निश्चिताम् । नयस्व माम् साधु कुरुष्व याचनाम् । न ते मया अतः गुरुता भविष्यति ॥ २७.२२ ॥

ananya bhāvām anurakta cetasam | tvayā viyuktām maraṇāya niścitām | nayasva mām sādhu kuruṣva yācanām | na te mayā ataḥ gurutā bhaviṣyati || 27.22 ||

'मेरा हृदय अनन्य भाव से केवल आपमें ही अनुरक्त है; आपसे बिछड़ने पर तो मैंने मरण का ही निश्चय कर लिया है। मुझे साथ ले चलिए, मेरी यह याचना स्वीकार कीजिए — इससे मैं आप पर कोई भार नहीं बनूँगी।'

श्लोक 23 (ayodhya.27.23)

तथा ब्रुवाणाम् अपि धर्म वत्सलो । न च स्म सीताम् नृ वरः निनीषति । उवाच च एनाम् बहु सम्निवर्तने । वने निवासस्य च दुह्खिताम् प्रति ॥ २७.२३ ॥

tathā bruvāṇām api dharma vatsalo | na ca sma sītām nṛ varaḥ ninīṣati | uvāca ca enām bahu samnivartane | vane nivāsasya ca duhkhitām prati || 27.23 ||

सीता के इस प्रकार कहने पर भी, धर्मवत्सल नरश्रेष्ठ राम ने उन्हें साथ ले जाने का विचार नहीं किया, और उन्हें लौटाने के लिए वन-निवास के दुःखों के विषय में विस्तार से बहुत कुछ कहा।

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