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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 47

प्रभात में नगर का विलाप

सर्ग 46सर्ग-सूचीसर्ग 48

श्लोक 1 (ayodhya.47.1)

प्रभातायां तु शर्वर्यां पौरास्ते राघवं विना। शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतसः॥ 47.1 ॥

prabhātāyāṃ tu śarvaryāṃ paurāste rāghavaṃ vinā| śokopahataniśceṣṭā babhūvurhatacetasaḥ

जब रात्रि उषाकाल में बदली, तो नगरवासी राघव के बिना शोक से स्तब्ध और चेतनाशून्य हो गए।

श्लोक 2 (ayodhya.47.2)

शोकजाश्रुपरिद्यूना वीक्षमाणास्ततस्ततः। आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दुःखिताः॥ 47.2 ॥

śokajāśruparidyūnā vīkṣamāṇāstatastataḥ| ālokamapi rāmasya na paśyanti sma duḥkhitāḥ

शोक के आँसुओं से व्याकुल वे लोग इधर-उधर देखते रहे, पर दुःखी होकर भी राम की एक झलक तक न पा सके।

श्लोक 3 (ayodhya.47.3)

ते विषादार्तवदना रहितास्तेन धीमता। कृपणाः करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिणः॥ 47.3 ॥

te viṣādārtavadanā rahitāstena dhīmatā| kṛpaṇāḥ karuṇā vāco vadanti sma manīṣiṇaḥ

बुद्धिमान राम से बिछुड़े हुए वे विषाद से भरे मुख वाले, दीन बुद्धिमान लोग करुण वचन बोलने लगे।

श्लोक 4 (ayodhya.47.4)

धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहतचेतसः। नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम्॥ 47.4 ॥

dhigastu khalu nidrāṃ tāṃ yayāpahatacetasaḥ| nādya paśyāmahe rāmaṃ pṛthūraskaṃ mahābhujam

धिक्कार है उस निद्रा को, जिसके कारण हमारी बुद्धि हर ली गई; आज हम विशाल वक्षस्थल वाले महाबाहु राम को नहीं देख पा रहे हैं।

श्लोक 5 (ayodhya.47.5)

कथं नाम महाबाहुः स तथाऽवितथक्रियः। भक्तं जनं परित्यज्य प्रवासं राघवो गतः॥ 47.5 ॥

kathaṃ nāma mahābāhuḥ sa tathā'vitathakriyaḥ| bhaktaṃ janaṃ parityajya pravāsaṃ rāghavo gataḥ

अमोघ कर्मा महाबाहु राम भला अपनी भक्त प्रजा को त्यागकर वनवास को कैसे चले गए?

श्लोक 6 (ayodhya.47.6)

यो नः सदा पालयति पिता पुत्रानिवौरसान्। कथं रघूणां स श्रेष्ठस्त्यक्त्वा नो विपिनं गतः॥ 47.6 ॥

yo naḥ sadā pālayati pitā putrānivaurasān| kathaṃ raghūṇāṃ sa śreṣṭhastyaktvā no vipinaṃ gataḥ

जो पिता के समान हमें सदा अपने पुत्रों की भाँति पालता रहा, वह रघुकुल का श्रेष्ठ पुरुष हमें छोड़कर वन को कैसे चला गया?

श्लोक 7 (ayodhya.47.7)

इहैव निधनं याम महाप्रस्थानमेव वा। रामेण रहितानां नो किमर्थं जीवितं हितम्॥ 47.7 ॥

ihaiva nidhanaṃ yāma mahāprasthānameva vā| rāmeṇa rahitānāṃ no kimarthaṃ jīvitaṃ hitam

आइए, हम यहीं मर जाएँ या फिर महाप्रस्थान पर निकल पड़ें; राम से रहित होकर हमारे लिए जीवन का क्या प्रयोजन है?

श्लोक 8 (ayodhya.47.8)

सन्ति शुष्काणि काष्ठानि प्रभूतानि महान्ति च। तैः प्रज्वाल्य चितां सर्वे प्रविशामोऽथवा वयम्॥ 47.8 ॥

santi śuṣkāṇi kāṣṭhāni prabhūtāni mahānti ca| taiḥ prajvālya citāṃ sarve praviśāmo'thavā vayam

बहुत से सूखे और बड़े काष्ठ यहाँ उपलब्ध हैं; आओ, उनसे चिता जलाकर हम सब उसमें प्रवेश कर जाएँ।

श्लोक 9 (ayodhya.47.9)

किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूयः प्रियंवदः। नीतः स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम्॥ 47.9 ॥

kiṃ vakṣyāmo mahābāhuranasūyaḥ priyaṃvadaḥ| nītaḥ sa rāghavo'smābhiriti vaktuṃ kathaṃ kṣamam

अनसूयक और मधुरभाषी महाबाहु राम को हमने वन भिजवा दिया — यह बात हम अपने नगरवासियों से भला कैसे कह सकेंगे?

श्लोक 10 (ayodhya.47.10)

सा नूनं नगरी दीना दृष्ट्वास्मान् राघवं विना। भविष्यति निरानन्दा सस्त्रीबालवयोऽधिका॥ 47.10 ॥

sā nūnaṃ nagarī dīnā dṛṣṭvāsmān rāghavaṃ vinā| bhaviṣyati nirānandā sastrībālavayo'dhikā

राघव के बिना हमें देखकर यह नगरी निश्चय ही दीन और आनंदरहित हो जाएगी, चाहे उसमें स्त्री-बालक और वृद्ध अधिक ही क्यों न हों।

श्लोक 11 (ayodhya.47.11)

निर्यातास्तेन वीरेण सह नित्यं महात्मना। विहीनास्तेन च पुनः कथं द्रक्ष्याम तां पुरीम्॥ 47.11 ॥

niryātāstena vīreṇa saha nityaṃ mahātmanā| vihīnāstena ca punaḥ kathaṃ drakṣyāma tāṃ purīm

जिस महात्मा वीर के साथ हम सदा निकलते रहे, उन्हीं से बिछुड़कर अब हम उस नगरी को फिर से कैसे देख पाएँगे?

श्लोक 12 (ayodhya.47.12)

इतीव बहुधा वाचो बाहुमुद्यम्य ते जनाः। विलपन्ति स्म दुःखार्ता हृतवत्सा इवाग्र्यगाः॥ 47.12 ॥

itīva bahudhā vāco bāhumudyamya te janāḥ| vilapanti sma duḥkhārtā hṛtavatsā ivāgryagāḥ

इस प्रकार बारंबार भुजाएँ उठाकर विलाप करते हुए वे लोग दुःख से आर्त होकर उस गाय के समान रो रहे थे, जिसका बछड़ा छिन गया हो।

श्लोक 13 (ayodhya.47.13)

ततो मार्गानुसारेण गत्वा किंचित् ततः क्षणम्। मार्गनाशाद् विषादेन महता समभिप्लुताः॥ 47.13 ॥

tato mārgānusāreṇa gatvā kiṃcit tataḥ kṣaṇam| mārganāśād viṣādena mahatā samabhiplutāḥ

फिर पथ के चिह्नों का अनुसरण करते हुए कुछ दूर जाकर, चिह्न लुप्त हो जाने से वे घोर विषाद में डूब गए।

श्लोक 14 (ayodhya.47.14)

रथमार्गानुसारेण न्यवर्तन्त मनस्विनः। किमिदं किं करिष्यामो दैवेनोपहता इति॥ 47.14 ॥

rathamārgānusāreṇa nyavartanta manasvinaḥ| kimidaṃ kiṃ kariṣyāmo daivenopahatā iti

रथ के मार्ग-चिह्न मिट जाने से वे बुद्धिमान लोग वहीं से लौट पड़े, यह कहते हुए — अब क्या करें, हम तो दैव से ही मारे गए।

श्लोक 15 (ayodhya.47.15)

तदा यथागतेनैव मार्गेण क्लान्तचेतसः। अयोध्यामगमन् सर्वे पुरीं व्यथितसज्जनाम्॥ 47.15 ॥

tadā yathāgatenaiva mārgeṇa klāntacetasaḥ| ayodhyāmagaman sarve purīṃ vyathitasajjanām

तब उसी मार्ग से, जिससे वे आए थे, थके-हारे मन वाले वे सब लोग व्यथित सज्जनों से भरी अयोध्या नगरी में लौट आए।

श्लोक 16 (ayodhya.47.16)

आलोक्य नगरीं तां च क्षयव्याकुलमानसाः। आवर्तयन्त तेऽश्रूणि नयनैः शोकपीडितैः॥ 47.16 ॥

ālokya nagarīṃ tāṃ ca kṣayavyākulamānasāḥ| āvartayanta te'śrūṇi nayanaiḥ śokapīḍitaiḥ

उस नगरी को देखकर विनाश की आशंका से व्याकुल मन वाले वे लोग शोक-पीड़ित नेत्रों से बार-बार आँसू बहाने लगे।

श्लोक 17 (ayodhya.47.17)

एषा रामेण नगरी रहिता नातिशोभते। आपगा गरुडेनेव ह्रदादुद्धृतपन्नगा॥ 47.17 ॥

eṣā rāmeṇa nagarī rahitā nātiśobhate| āpagā garuḍeneva hradāduddhṛtapannagā

राम के बिना यह नगरी अब उतनी शोभा नहीं पाती, जैसे गरुड़ द्वारा सर्प को हर लिए जाने पर सरोवर की शोभा जाती रहती है।

श्लोक 18 (ayodhya.47.18)

चन्द्रहीनमिवाकाशं तोयहीनमिवार्णवम्। अपश्यन् निहतानन्दं नगरं ते विचेतसः॥ 47.18 ॥

candrahīnamivākāśaṃ toyahīnamivārṇavam| apaśyan nihatānandaṃ nagaraṃ te vicetasaḥ

चंद्रमा-रहित आकाश और जल-रहित सागर के समान उस आनंदहीन नगरी को देखकर वे विचेतन-से हो गए।

श्लोक 19 (ayodhya.47.19)

ते तानि वेश्मानि महाधनानि। दुःखेन दुःखोपहता विशन्तः। नैव प्रजज्ञुः स्वजनं परं वा। निरीक्ष्यमाणाः प्रविनष्टहर्षाः॥ 47.19 ॥

te tāni veśmāni mahādhanāni| duḥkhena duḥkhopahatā viśantaḥ| naiva prajajñuḥ svajanaṃ paraṃ vā| nirīkṣyamāṇāḥ pravinaṣṭaharṣāḥ

दुःख से आहत वे लोग अपने विशाल, धनसंपन्न घरों में तो प्रवेश करते थे, पर हर्ष सर्वथा नष्ट हो जाने के कारण देखते हुए भी अपने और पराए को पहचान नहीं पाते थे।

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