अयोध्याकाण्ड · सर्ग 54
भरद्वाज-आश्रम में
श्लोक 1 (ayodhya.54.1)
ते तु तस्मिन् महावृक्षे उषित्वा रजनीं शुभाम्। विमलेऽभ्युदिते सूर्ये तस्माद् देशात् प्रतस्थिरे॥ २-५४-१ ॥
te tu tasmin mahāvṛkṣe uṣitvā rajanīṃ śubhām | vimale'bhyudite sūrye tasmād deśāt pratasthire
उस महावृक्ष के नीचे शुभ रात्रि बिताकर, निर्मल सूर्योदय होने पर वे उस स्थान से आगे को चल पड़े।
श्लोक 2 (ayodhya.54.2)
यत्र भागीरथीं गङ्गां यमुनाभिप्रवर्तते। जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य सुमहद् वनम्॥ २-५४-२ ॥
yatra bhāgīrathīṃ gaṅgāṃ yamunābhipravartate | jagmustaṃ deśamuddiśya vigāhya sumahad vanam
जहाँ भागीरथी गङ्गा में यमुना मिलती है, उसी स्थान की ओर वे महान् वन में घुसते हुए चले।
श्लोक 3 (ayodhya.54.3)
ते भूमिभागान् विविधान् देशांश्चापि मनोहरान्। अदृष्टपूर्वान् पश्यन्तस्तत्र तत्र यशस्विनः॥ २-५४-३ ॥
te bhūmibhāgān vividhān deśāṃścāpi manoharān | adṛṣṭapūrvān paśyantastatra tatra yaśasvinaḥ
वे यशस्वी लोग वहाँ-वहाँ पहले कभी न देखे हुए विविध भूभागों और मनोहर प्रदेशों को देखते हुए चलते रहे।
श्लोक 4 (ayodhya.54.4)
यथा क्षेमेण सम्पश्यन् पुष्पितान् विविधान् द्रुमान्। निर्वृत्तमात्रे दिवसे रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥ २-५४-४ ॥
yathā kṣemeṇa sampaśyan puṣpitān vividhān drumān | nirvṛttamātre divase rāmaḥ saumitrimabravīt
इस प्रकार निश्चिन्त होकर विविध पुष्पित वृक्षों को देखते हुए, दिन के समाप्त होते ही राम ने सौमित्रि से कहा।
श्लोक 5 (ayodhya.54.5)
प्रयागमभितः पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम्। अग्नेर्भगवतः केतुं मन्ये संनिहितो मुनिः॥ २-५४-५ ॥
prayāgamabhitaḥ paśya saumitre dhūmamuttamam | agnerbhagavataḥ ketuṃ manye saṃnihito muniḥ
"हे सौमित्रे! प्रयाग की ओर वह उत्तम धुआँ देखो; मुझे लगता है, वह भगवान् अग्नि की ध्वजा है - अवश्य ही यहाँ कोई मुनि निवास करते हैं।"
श्लोक 6 (ayodhya.54.6)
नूनं प्राप्ताः स्म सम्भेदं गङ्गायमुनयोर्वयम्। तथा हि श्रूयते शब्दो वारिणोरिघर्षजः॥ २-५४-६ ॥
nūnaṃ prāptāḥ sma sambhedaṃ gaṅgāyamunayorvayam | tathā hi śrūyate śabdo vāriṇorigharṣajaḥ
"निश्चय ही हम गङ्गा-यमुना के संगम-स्थल तक पहुँच गए हैं; क्योंकि दो जलधाराओं के परस्पर टकराने से उत्पन्न वह ध्वनि सुनाई दे रही है।"
श्लोक 7 (ayodhya.54.7)
दारूणि परिभिन्नानि वनजैरुपजीविभिः। छिन्नाश्चाप्याश्रमे चैते दृश्यन्ते विविधा द्रुमाः॥ २-५४-७ ॥
dārūṇi paribhinnāni vanajairupajīvibhiḥ | chinnāścāpyāśrame caite dṛśyante vividhā drumāḥ
"वन में फल-मूल आदि से जीविका चलाने वालों के द्वारा काटी गई लकड़ियाँ बिखरी पड़ी हैं, और आश्रम के निकट भी नाना प्रकार के काटे हुए वृक्ष दिखाई देते हैं।"
श्लोक 8 (ayodhya.54.8)
धन्विनौ तौ सुखं गत्वा लम्बमाने दिवाकरे। गङ्गायमुनयोः संधौ प्रापतुर्निलयं मुनेः॥ २-५४-८ ॥
dhanvinau tau sukhaṃ gatvā lambamāne divākare | gaṅgāyamunayoḥ saṃdhau prāpaturnilayaṃ muneḥ
इस प्रकार सुखपूर्वक चलते हुए वे दोनों धनुर्धर, सूर्य के ढलते समय, गङ्गा-यमुना के संगम पर मुनि के आश्रम में जा पहुँचे।
श्लोक 9 (ayodhya.54.9)
रामस्त्वाश्रममासाद्य त्रासयन् मृगपक्षिणः। गत्वा मुहूर्तमध्वानं भरद्वाजमुपागमत्॥ २-५४-९ ॥
rāmastvāśramamāsādya trāsayan mṛgapakṣiṇaḥ | gatvā muhūrtamadhvānaṃ bharadvājamupāgamat
आश्रम में पहुँचकर, अपने आगमन से पशु-पक्षियों को चौंकाते हुए, राम कुछ ही देर मार्ग पर चलकर भरद्वाज के पास पहुँचे।
श्लोक 10 (ayodhya.54.10)
ततस्त्वाश्रममासाद्य मुनेर्दर्शनकांक्षिणौ। सीतयानुगतौ वीरौ दूरादेवावतस्थतुः॥ २-५४-१० ॥
tatastvāśramamāsādya munerdarśanakāṃkṣiṇau | sītayānugatau vīrau dūrādevāvatasthatuḥ
तब आश्रम में पहुँचकर, मुनि के दर्शन की इच्छा रखते हुए, सीता सहित वे दोनों वीर दूर से ही ठहर गए।
श्लोक 11 (ayodhya.54.11)
स प्रविश्य महात्मानमृषिं शिष्यगणैर्वृतम्। संशितव्रतमेकाग्रं तपसा लब्धचक्षुषम्॥ २-५४-११ ॥
sa praviśya mahātmānamṛṣiṃ śiṣyagaṇairvṛtam | saṃśitavratamekāgraṃ tapasā labdhacakṣuṣam
शिष्यों से घिरे हुए, दृढ़-व्रती, एकाग्रचित्त, और तपस्या से दिव्य-दृष्टि प्राप्त उस महात्मा ऋषि के पास जाकर।
श्लोक 12 (ayodhya.54.12)
हुताग्निहोत्रं दृष्ट्वैव महाभागः कृताञ्जलिः। रामः सौमित्रिणा सार्धं सीतया चाभ्यवादयत्॥ २-५४-१२ ॥
hutāgnihotraṃ dṛṣṭvaiva mahābhāgaḥ kṛtāñjaliḥ | rāmaḥ saumitriṇā sārdhaṃ sītayā cābhyavādayat
अग्निहोत्र सम्पन्न किए हुए उन्हें देखते ही महाभाग राम ने हाथ जोड़कर, सौमित्रि और सीता सहित, उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 13 (ayodhya.54.13)
न्यवेदयत चात्मानं तस्मै लक्ष्मणपूर्वजः। पुत्रौ दशरथस्यावां भगवन् रामलक्ष्मणौ॥ २-५४-१३ ॥
nyavedayata cātmānaṃ tasmai lakṣmaṇapūrvajaḥ | putrau daśarathasyāvāṃ bhagavan rāmalakṣmaṇau
तब लक्ष्मण के अग्रज ने उनसे अपना परिचय दिया - "हे भगवन्! हम दोनों राम-लक्ष्मण दशरथ के पुत्र हैं।"
श्लोक 14 (ayodhya.54.14)
भार्या ममेयं कल्याणी वैदेही जनकात्मजा। मां चानुयाता विजनं तपोवनमनिन्दिता॥ २-५४-१४ ॥
bhāryā mameyaṃ kalyāṇī vaidehī janakātmajā | māṃ cānuyātā vijanaṃ tapovanamaninditā
"ये निष्पाप, कल्याणी, जनक की पुत्री वैदेही मेरी पत्नी हैं, जो मेरे साथ इस निर्जन तपोवन में भी चली आई हैं।"
श्लोक 15 (ayodhya.54.15)
पित्रा प्रव्राज्यमानं मां सौमित्रिरनुजः प्रियः। अयमन्वगमद् भ्राता वनमेव धृतव्रतः॥ २-५४-१५ ॥
pitrā pravrājyamānaṃ māṃ saumitriranujaḥ priyaḥ | ayamanvagamad bhrātā vanameva dhṛtavrataḥ
"पिता द्वारा वनवास दिए जाने पर, मेरे प्रिय अनुज सौमित्रि यह मेरे भाई भी व्रत धारण कर वन में मेरे पीछे-पीछे आए हैं।"
श्लोक 16 (ayodhya.54.16)
पित्रा नियुक्ता भगवन् प्रवेक्ष्यामस्तपोवनम्। धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः॥ २-५४-१६ ॥
pitrā niyuktā bhagavan pravekṣyāmastapovanam | dharmamevācariṣyāmastatra mūlaphalāśanāḥ
"हे भगवन्! पिता की आज्ञा से नियुक्त हुए हम तपोवन में प्रवेश करेंगे और वहाँ फल-मूल खाकर केवल धर्म का ही आचरण करेंगे।"
श्लोक 17 (ayodhya.54.17)
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः। उपानयत धर्मात्मा गामर्घ्यमुदकं ततः॥ २-५४-१७ ॥
tasya tad vacanaṃ śrutvā rājaputrasya dhīmataḥ | upānayata dharmātmā gāmarghyamudakaṃ tataḥ
बुद्धिमान् उस राजकुमार का वह वचन सुनकर, धर्मात्मा भरद्वाज ने तब गौ, अर्घ्य और जल भेंट किया।
श्लोक 18 (ayodhya.54.18)
नानाविधानन्नरसान् वन्यमूलफलाश्रयान्। तेभ्यो ददौ तप्ततपा वासं चैवाभ्यकल्पयत्॥ २-५४-१८ ॥
nānāvidhānannarasān vanyamūlaphalāśrayān | tebhyo dadau taptatapā vāsaṃ caivābhyakalpayat
वन में उपजे फल-मूल पर आश्रित नाना प्रकार के अन्न-रस उस तपस्वी ने उन्हें दिए, और उनके ठहरने की व्यवस्था भी कर दी।
श्लोक 19 (ayodhya.54.19)
मृगपक्षिभिरासीनो मुनिभिश्च समन्ततः। राममागतमभ्यर्च्य स्वागतेनागतं मुनिः॥ २-५४-१९ ॥
mṛgapakṣibhirāsīno munibhiśca samantataḥ | rāmamāgatamabhyarcya svāgatenāgataṃ muniḥ
चारों ओर मृगों, पक्षियों और मुनियों से घिरे हुए बैठे उस मुनि ने आए हुए राम का स्वागत-सत्कार करते हुए अभिनन्दन किया।
श्लोक 20 (ayodhya.54.20)
प्रतिगृह्य च तामर्चामुपविष्टं स राघवम्। भरद्वाजोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मयुक्तमिदं तदा॥ २-५४-२० ॥
pratigṛhya ca tāmarcāmupaviṣṭaṃ sa rāghavam | bharadvājo'bravīd vākyaṃ dharmayuktamidaṃ tadā
वह सत्कार स्वीकार कर बैठे हुए राघव से भरद्वाज ने तब यह धर्मानुकूल वचन कहा।
श्लोक 21 (ayodhya.54.21)
चिरस्य खलु काकुत्स्थ पश्याम्यहमुपागतम्। श्रुतं तव मया चैव विवासनमकारणम्॥ २-५४-२१ ॥
cirasya khalu kākutstha paśyāmyahamupāgatam | śrutaṃ tava mayā caiva vivāsanamakāraṇam
"हे काकुत्स्थ! बहुत समय बाद आज मैं तुम्हें आया हुआ देख रहा हूँ; मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास मिला है।"
श्लोक 22 (ayodhya.54.22)
अवकाशो विविक्तोऽयं महानद्योः समागमे। पुण्यश्च रमणीयश्च वसत्विह भवान् सुखम्॥ २-५४-२२ ॥
avakāśo vivikto'yaṃ mahānadyoḥ samāgame | puṇyaśca ramaṇīyaśca vasatviha bhavān sukham
"दो महानदियों के संगम पर यह एकान्त, पवित्र और रमणीय स्थान है; तुम यहाँ सुखपूर्वक निवास करो।"
श्लोक 23 (ayodhya.54.23)
एवमुक्तस्तु वचनं भरद्वाजेन राघवः। प्रत्युवाच शुभं वाक्यं रामः सर्वहिते रतः॥ २-५४-२३ ॥
evamuktastu vacanaṃ bharadvājena rāghavaḥ | pratyuvāca śubhaṃ vākyaṃ rāmaḥ sarvahite rataḥ
भरद्वाज द्वारा इस प्रकार कहे गए वचन को सुनकर, सबके हित में रत राम ने उन्हें यह शुभ उत्तर दिया।
श्लोक 24 (ayodhya.54.24)
भगवन्नित आसन्नः पौरजानपदो जनः। सुदर्शमिह मां प्रेक्ष्य मन्येऽहमिममाश्रमम्॥ २-५४-२४ ॥
bhagavannita āsannaḥ paurajānapado janaḥ | sudarśamiha māṃ prekṣya manye'hamimamāśramam
"हे भगवन्! यहाँ से नगर और जनपद के लोग निकट हैं; मुझे यहाँ सहज दर्शनीय जानकर वे इस आश्रम में आते रहेंगे।"
श्लोक 25 (ayodhya.54.25)
आगमिष्यति वैदेहीं मां चापि प्रेक्षको जनः। अनेन कारणेनाहमिह वासं न रोचये॥ २-५४-२५ ॥
āgamiṣyati vaidehīṃ māṃ cāpi prekṣako janaḥ | anena kāraṇenāhamiha vāsaṃ na rocaye
"जो लोग यहाँ मुझे और वैदेही को देखने आएंगे, इसी कारण से मुझे यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता।"
श्लोक 26 (ayodhya.54.26)
एकान्ते पश्य भगवन्नाश्रमस्थानमुत्तमम्। रमते यत्र वैदेही सुखार्दा जनकात्मजा॥ २-५४-२६ ॥
ekānte paśya bhagavannāśramasthānamuttamam | ramate yatra vaidehī sukhārdā janakātmajā
"हे भगवन्! किसी एकान्त उत्तम आश्रम-स्थान को देखिए, जहाँ सुखार्ह जनकपुत्री वैदेही प्रसन्नतापूर्वक रह सकें।"
श्लोक 27 (ayodhya.54.27)
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरद्वाजो महामुनिः। राघवस्य तु तद् वाक्यमर्थग्राहकमब्रवीत्॥ २-५४-२७ ॥
etacchrutvā śubhaṃ vākyaṃ bharadvājo mahāmuniḥ | rāghavasya tu tad vākyamarthagrāhakamabravīt
यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाज ने राघव के उस वचन का अभिप्राय समझने वाला यह उत्तर दिया।
श्लोक 28 (ayodhya.54.28)
दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन् निवत्स्यसि। महर्षिसेवितः पुण्यः पर्वतः शुभदर्शनः॥ २-५४-२८ ॥
daśakrośa itastāta giriryasmin nivatsyasi | maharṣisevitaḥ puṇyaḥ parvataḥ śubhadarśanaḥ
"हे तात! यहाँ से दस कोस दूर एक पर्वत है, जहाँ तुम निवास करोगे; वह महर्षियों द्वारा सेवित, पवित्र और सुन्दर दिखने वाला है।"
श्लोक 29 (ayodhya.54.29)
गोलाङ्गूलानुचरितो वानरर्क्षनिषेवितः। चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसंनिभः॥ २-५४-२९ ॥
golāṅgūlānucarito vānararkṣaniṣevitaḥ | citrakūṭa iti khyāto gandhamādanasaṃnibhaḥ
"वहाँ लंगूर विचरते हैं, वानर और भालू भी उसका सेवन करते हैं; वह चित्रकूट नाम से विख्यात है और गन्धमादन के समान है।"
श्लोक 30 (ayodhya.54.30)
यावता चित्रकूटस्य नरः शृङ्गाण्यवेक्षते। कल्याणानि समाधत्ते न पापे कुरुते मनः॥ २-५४-३० ॥
yāvatā citrakūṭasya naraḥ śṛṅgāṇyavekṣate | kalyāṇāni samādhatte na pāpe kurute manaḥ
"जब तक मनुष्य चित्रकूट के शिखरों को देखता रहता है, तब तक वह कल्याणकारी कर्मों में मन लगाता है, पाप में नहीं।"
श्लोक 31 (ayodhya.54.31)
ऋषयस्तत्र बहवो विहृत्य शरदां शतम्। तपसा दिवमारूढाः कपालशिरसा सह॥ २-५४-३१ ॥
ṛṣayastatra bahavo vihṛtya śaradāṃ śatam | tapasā divamārūḍhāḥ kapālaśirasā saha
"वहाँ बहुत-से ऋषि, सैकड़ों शरद-ऋतुएँ विचरण करके, तप के द्वारा अपने खोपड़ी-जैसे सिरों सहित स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।"
श्लोक 32 (ayodhya.54.32)
प्रविविक्तमहं मन्ये तं वासं भवतः सुखम्। इह वा वनवासाय वस राम मया सह॥ २-५४-३२ ॥
praviviktamahaṃ manye taṃ vāsaṃ bhavataḥ sukham | iha vā vanavāsāya vasa rāma mayā saha
"मैं समझता हूँ कि वह एकान्त निवास तुम्हारे लिए सुखद है; अथवा, हे राम! वनवास के लिए यहीं मेरे साथ रहो।"
श्लोक 33 (ayodhya.54.33)
स रामं सर्वकामैस्तं भरद्वाजः प्रियातिथिम्। सभार्यं सह च भ्रात्रा प्रतिजग्राह हर्षयन्॥ २-५४-३३ ॥
sa rāmaṃ sarvakāmaistaṃ bharadvājaḥ priyātithim | sabhāryaṃ saha ca bhrātrā pratijagrāha harṣayan
इस प्रकार भरद्वाज ने पत्नी और भाई सहित उस प्रिय अतिथि राम का हर्षपूर्वक सब मनोवांछित वस्तुओं से सत्कार किया।
श्लोक 34 (ayodhya.54.34)
तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुषः। प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्राः कथयतः कथाः॥ २-५४-३४ ॥
tasya prayāge rāmasya taṃ maharṣimupeyuṣaḥ | prapannā rajanī puṇyā citrāḥ kathayataḥ kathāḥ
प्रयाग में उस महर्षि के पास पहुँचे हुए राम की वह पवित्र रात्रि विचित्र कथाएँ कहते-सुनते हुए बीत गई।
श्लोक 35 (ayodhya.54.35)
सीतातृतीयः काकुत्स्थः परिश्रान्तः सुखोचितः। भरद्वाजाश्रमे रम्ये तां रात्रिमवसत् सुखम्॥ २-५४-३५ ॥
sītātṛtīyaḥ kākutsthaḥ pariśrāntaḥ sukhocitaḥ | bharadvājāśrame ramye tāṃ rātrimavasat sukham
सीता सहित, यात्रा से थके हुए, किन्तु सुख के योग्य काकुत्स्थ ने भरद्वाज के उस रमणीय आश्रम में वह रात सुखपूर्वक बिताई।
श्लोक 36 (ayodhya.54.36)
प्रभातायां तु शर्वर्यां भरद्वाजमुपागमत्। उवाच नरशार्दूलो मुनिं ज्वलिततेजसम्॥ २-५४-३६ ॥
prabhātāyāṃ tu śarvaryāṃ bharadvājamupāgamat | uvāca naraśārdūlo muniṃ jvalitatejasam
प्रभात होने पर, नरश्रेष्ठ राम भरद्वाज के पास गए और तेजोमय उस मुनि से यह कहा।
श्लोक 37 (ayodhya.54.37)
शर्वरीं भगवन्नद्य सत्यशील तवाश्रमे। उषिताः स्मोऽद्य वसतिमनुजानातु नो भवान्॥ २-५४-३७ ॥
śarvarīṃ bhagavannadya satyaśīla tavāśrame | uṣitāḥ smo'dya vasatimanujānātu no bhavān
"हे भगवन्! हे सत्यशील! आज हमने आपके आश्रम में रात बिताई है; अब आप हमें आगे जाने की आज्ञा दें।"
श्लोक 38 (ayodhya.54.38)
रात्र्यां तु तस्यां व्युष्टायां भरद्वाजोऽब्रवीदिदम्। मधुमूलफलोपेतं चित्रकूटं व्रजेति ह॥ २-५४-३८ ॥
rātryāṃ tu tasyāṃ vyuṣṭāyāṃ bharadvājo'bravīdidam | madhumūlaphalopetaṃ citrakūṭaṃ vrajeti ha
वह रात बीत जाने पर भरद्वाज ने यह कहा, "मधु और फल-मूल से सम्पन्न चित्रकूट को जाओ।"
श्लोक 39 (ayodhya.54.39)
वासमौपयिकं मन्ये तव राम महाबल। नानानगगणोपेतः किन्नरोरगसेवितः॥ २-५४-३९ ॥
vāsamaupayikaṃ manye tava rāma mahābala | nānānagagaṇopetaḥ kinnaroragasevitaḥ
"हे महाबली राम! उस निवास को मैं तुम्हारे लिए उपयुक्त मानता हूँ; वह नाना वृक्ष-समूहों से युक्त तथा किन्नरों और नागों से सेवित है।"
श्लोक 40 (ayodhya.54.40)
मयूरनादाभिरुतो गजराजनिषेवितः। गम्यतां भवता शैलश्चित्रकूटः स विश्रुतः। पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुतः॥ २-५४-४० ॥
mayūranādābhiruto gajarājaniṣevitaḥ | gamyatāṃ bhavatā śailaścitrakūṭaḥ sa viśrutaḥ | puṇyaśca ramaṇīyaśca bahumūlaphalāyutaḥ
"वह मयूरों की ध्वनि से गुंजित, गजराजों से सेवित है; उसी विख्यात पर्वत चित्रकूट को तुम जाओ, जो पवित्र, रमणीय और बहुसंख्यक फल-मूलों से सम्पन्न है।"
श्लोक 41 (ayodhya.54.41)
तत्र कुञ्जरयूथानि मृगयूथानि चाभितः। विचरन्ति वनान्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव॥ २-५४-४१ ॥
tatra kuñjarayūthāni mṛgayūthāni cābhitaḥ | vicaranti vanānteṣu tāni drakṣyasi rāghava
"वहाँ वन के भीतर सब ओर हाथियों और मृगों के झुंड विचरते हैं; हे राघव! तुम उन्हें वहाँ देखोगे।"
श्लोक 42 (ayodhya.54.42)
सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्दरनिर्झरान्। चरतः सीतया सार्धं नन्दिष्यति मनस्तव॥ २-५४-४२ ॥
saritprasravaṇaprasthān darīkandaranirjharān | carataḥ sītayā sārdhaṃ nandiṣyati manastava
"नदियों, झरनों, पर्वत-प्रस्थों, गुफाओं, कन्दराओं और निर्झरों में सीता सहित विचरते हुए तुम्हारा मन प्रसन्न होगा।"
श्लोक 43 (ayodhya.54.43)
प्रहृष्टकोयष्टिककोकिलस्वनैर्विनादितं तं वसुधाधरं शिवम्। मृगैश्च मत्तैर्बहुभिश्च कुञ्जरैः सुरम्यमासाद्य समावसाश्रमम्॥ २-५४-४३ ॥
prahṛṣṭakoyaṣṭikakokilasvanairvināditaṃ taṃ vasudhādharaṃ śivam | mṛgaiśca mattairbahubhiśca kuñjaraiḥ suramyamāsādya samāvasāśramam
"प्रसन्न कोयष्टिक पक्षियों और कोकिलों के स्वरों से गुंजित, मत्त मृगों और अनेक हाथियों से युक्त उस अत्यन्त रमणीय, कल्याणकारी पर्वत पर पहुँचकर, वहीं आश्रम बनाकर निवास करो।"