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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 58

राम और लक्ष्मण के संदेश

सर्ग 57सर्ग-सूचीसर्ग 59

श्लोक 1 (ayodhya.58.1)

प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात्प्रत्यागतः पुनः। अथाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात्॥ २-५८-१ ॥

pratyāśvasto yadā rājā mohāt pratyāgataḥ punaḥ| athājuhāva taṃ sūtaṃ rāmavṛttāntakāraṇāt

जब राजा मूर्च्छा से पुनः चेत में आकर सचेत हुए, तब उन्होंने राम का समाचार जानने के लिए उस सारथि को बुलाया।

श्लोक 2 (ayodhya.58.2)

तदा सूतो महाराज कृताञ्जलिरुपस्थितः। राममेवानुशोचन्तं दुःखशोकसमन्वितम्॥ २-५८-२ ॥

tadā sūto mahārāja kṛtāñjalir upasthitaḥ| rāmam evānuśocantaṃ duḥkhaśokasamanvitam

तब सारथि हाथ जोड़े हुए, उस वृद्ध राजा के पास पहुँचा, जो केवल राम का ही शोक करते हुए दुःख से व्याकुल थे।

श्लोक 3 (ayodhya.58.3)

वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम्। विनिःश्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम्॥ २-५८-३ ॥

vṛddhaṃ paramasaṃtaptaṃ navagraham iva dvipam| viniḥśvasantaṃ dhyāyantam asvastham iva kuñjaram

वह वृद्ध राजा अत्यन्त संतप्त, नवग्रहीत हाथी के समान लम्बी साँसें लेते हुए, तथा किसी रुग्ण गजराज के समान चिन्तामग्न थे।

श्लोक 4 (ayodhya.58.4)

राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम्। अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत्॥ २-५८-४ ॥

rājā tu rajasā sūtaṃ dhvastāṅgaṃ samupasthitam| aśrupūrṇamukhaṃ dīnam uvāca paramārtavat

धूल से मलिन शरीर वाले, आँसुओं से भरे मुख वाले, दीन होकर पास आए उस सारथि से राजा ने अत्यन्त व्याकुल होकर कहा।

श्लोक 5 (ayodhya.58.5)

क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रितः। सोऽत्यन्तसुखितः सूत किमशिष्यति राघवः॥ २-५८-५ ॥

kva nu vatsyati dharmātmā vṛkṣamūlam upāśritaḥ| so 'tyantasukhitaḥ sūta kim aśiṣyati rāghavaḥ

"हे सूत! धर्मात्मा राम, वृक्ष की जड़ का सहारा लेकर कहाँ रहते होंगे? वे जो सदा सुखों में पले, अब क्या खाते होंगे?"

श्लोक 6 (ayodhya.58.6)

दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः। भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत्॥ २-५८-६ ॥

duḥkhasyānucito duḥkhaṃ sumantra śayanocitaḥ| bhūmipālātmajo bhūmau śete katham anāthavat

"हे सुमन्त्र! जो दुःख के योग्य कभी नहीं था, वह राजपुत्र, जो सुखद शय्या का अभ्यस्त था, अब भूमि पर अनाथ के समान कैसे सोता होगा?"

श्लोक 7 (ayodhya.58.7)

यं यान्तमनुयान्ति स्म पदातिरथकुञ्जराः। स वत्स्यति कथं रामो विजनं वनमाश्रितः॥ २-५८-७ ॥

yaṃ yāntam anuyānti sma padātirathakuñjarāḥ| sa vatsyati kathaṃ rāmo vijanaṃ vanam āśritaḥ

जिसके पीछे-पीछे पैदल सेना, रथ और हाथी चला करते थे, वही राम अब निर्जन वन में सहारा लेकर कैसे रहते होंगे?

श्लोक 8 (ayodhya.58.8)

व्यालैर्मृगैराचरितं कृष्णसर्पनिषेवितम्। कथं कुमारौ वैदेह्या सार्धं वनमुपस्थितौ॥ २-५८-८ ॥

vyālair mṛgair ācaritaṃ kṛṣṇasarpaniṣevitam| kathaṃ kumārau vaidehyā sārdhaṃ vanam upasthitau

हिंसक पशुओं से भरे, काले सर्पों से युक्त उस वन में वे दोनों राजकुमार वैदेही के साथ कैसे पहुँचे होंगे?

श्लोक 9 (ayodhya.58.9)

सुकुमार्या तपस्विन्या सुमन्त्र सह सीतया। राजपुत्रौ कथं पादैरवरुह्य रथाद्गतौ॥ २-५८-९ ॥

sukumāryā tapasvinyā sumantra saha sītayā| rājaputrau kathaṃ pādair avaruhya rathād gatau

"हे सुमन्त्र! वे दोनों राजकुमार, कोमल और अभागिनी सीता के साथ, रथ से उतरकर पैदल कैसे चले होंगे?"

श्लोक 10 (ayodhya.58.10)

सिद्धार्थः खलु सूत त्वं येन दृष्टौ ममात्मजौ। वनान्तं प्रविशन्तौ ताववश्विनाविव मन्दरम्॥ २-५८-१० ॥

siddhārthaḥ khalu sūta tvaṃ yena dṛṣṭau mamātmajau| vanāntaṃ praviśantau tāv aśvināv iva mandaram

"हे सूत! तुम धन्य हो, जिसने मेरे दोनों पुत्रों को वन में प्रवेश करते देखा, मानो अश्विनीकुमार मन्दराचल में प्रवेश कर रहे हों।"

श्लोक 11 (ayodhya.58.11)

किमुवाच वचो रामः किमुवाच च लक्ष्मणः। सुमन्त्र वनमासाद्य किमुवाच च मैथिली॥ २-५८-११ ॥

kim uvāca vaco rāmaḥ kim uvāca ca lakṣmaṇaḥ| sumantra vanam āsādya kim uvāca ca maithilī

"हे सुमन्त्र! वन में पहुँचकर राम ने क्या कहा? लक्ष्मण ने क्या कहा? और मैथिली ने क्या कहा?"

श्लोक 12 (ayodhya.58.12)

आसितं शयितं भुक्तं सूत रामस्य कीर्तय। जीविष्याम्यहमेतेन ययातिरिव साधुषु॥ २-५८-१२ ॥

āsitaṃ śayitaṃ bhuktaṃ sūta rāmasya kīrtaya| jīviṣyāmy aham etena yayātir iva sādhuṣu

"हे सूत! राम कहाँ बैठे, कहाँ सोए, क्या खाया - यह सब बताओ; इससे मैं वैसे ही जीवित रहूँगा जैसे ययाति साधुओं के बीच रहकर जीवित रहे थे।"

श्लोक 13 (ayodhya.58.13)

इति सूतो नरेन्द्रेण चोदितः सज्जमानया। उवाच वाचा राजानं स बाष्पपरिबद्धया॥ २-५८-१३ ॥

iti sūto narendreṇa coditaḥ sajjamānayā| uvāca vācā rājānaṃ sa bāṣpaparibaddhayā

राजा के इस प्रकार पूछने पर सारथि ने आँसुओं से रुँधे, काँपते स्वर में राजा से कहा।

श्लोक 14 (ayodhya.58.14)

अब्रवीन्मां महाराज धर्ममेवानुपालयन्। अञ्जलिं राघवः कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य च॥ २-५८-१४ ॥

abravīn māṃ mahārāja dharmam evānupālayan| añjaliṃ rāghavaḥ kṛtvā śirasābhipraṇamya ca

"हे महाराज! धर्म का पालन करते हुए राघव ने हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर प्रणाम कर मुझसे कहा।"

श्लोक 15 (ayodhya.58.15)

सूत मद्वचनात्तस्य तातस्य विदितात्मनः। शिरसा वन्दनीयस्य वन्द्यौ पादौ महात्मनः॥ २-५८-१५ ॥

sūta madvacanāt tasya tātasya viditātmanaḥ| śirasā vandanīyasya vandyau pādau mahātmanaḥ

"हे सूत! मेरी ओर से उन तात के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करना, जिनका आत्मा महान है और जो सिर झुकाकर वन्दन करने योग्य हैं।"

श्लोक 16 (ayodhya.58.16)

सर्वमन्तःपुरं वाच्यं सूत मद्वचनात्त्वया। आरोग्यमविशेषेण यथार्हं चाभिवादनम्॥ २-५८-१६ ॥

sarvam antaḥpuraṃ vācyaṃ sūta madvacanāt tvayā| ārogyam aviśeṣeṇa yathārhaṃ cābhivādanam

"हे सूत! मेरी ओर से सम्पूर्ण अन्तःपुर से बिना किसी भेद के कुशल-क्षेम पूछना और यथोचित प्रणाम कहना।"

श्लोक 17 (ayodhya.58.17)

माता च मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम्। अप्रमादं च वक्तव्या ब्रूयाश्चेदमपि वचः॥ २-५८-१७ ॥

mātā ca mama kausalyā kuśalaṃ cābhivādanam| apramādaṃ ca vaktavyā brūyāś cedam api vacaḥ

"मेरी माता कौसल्या से मेरा कुशल-समाचार, प्रणाम, और मेरी सावधानी के विषय में बताना, और यह वचन भी कहना।"

श्लोक 18 (ayodhya.58.18)

धर्मनित्या यथाकालमग्न्यागारपरा भव। देवि देवस्य पादौ च देववत् परिपालय॥ २-५८-१८ ॥

dharmanityā yathākālam agnyāgāraparā bhava| devi devasya pādau ca devavat paripālaya

"हे देवि! सदा धर्मपरायण रहिए, समयानुसार अग्निहोत्र में लगी रहिए, और महाराज के चरणों की सेवा देवता के समान करती रहिए।"

श्लोक 19 (ayodhya.58.19)

अभिमानं च मानं च त्यक्त्वा वर्तस्व मातृषु। अनुराजानमार्यां च कैकेयीमम्ब कारय॥ २-५८-१९ ॥

abhimānaṃ ca mānaṃ ca tyaktvā vartasva mātṛṣu| anurājānam āryāṃ ca kaikeyīm amba kāraya

"हे माता! अभिमान और मान त्यागकर अपनी सौतेली माताओं के प्रति व्यवहार करना, और आर्या कैकेयी को राजा के अनुकूल बनाए रखना।"

श्लोक 20 (ayodhya.58.20)

कुमारे भरते वृत्तिर्वर्तितव्या च राजवत्। अर्थज्येष्ठा हि राजानो राजधर्ममनुस्मर॥ २-५८-२० ॥

kumāre bharate vṛttir vartitavyā ca rājavat| arthajyeṣṭhā hi rājāno rājadharmam anusmara

"राजकुमार भरत के प्रति भी राजोचित व्यवहार रखना, क्योंकि राजा वास्तव में अर्थ (राज्य) से ही बड़े माने जाते हैं - राजधर्म का सदा स्मरण रखना।"

श्लोक 21 (ayodhya.58.21)

भरतः कुशलं वाच्यो वाच्यो मद्वचनेन च। सर्वास्वेव यथान्यायं वृत्तिं वर्तस्व मातृषु॥ २-५८-२१ ॥

bharataḥ kuśalaṃ vācyo vācyo madvacanena ca| sarvāsv eva yathānyāyaṃ vṛttiṃ vartasva mātṛṣu

"भरत से कुशल-क्षेम पूछना और मेरी ओर से यह भी कहना - 'सभी माताओं के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार बनाए रखना।'"

श्लोक 22 (ayodhya.58.22)

वक्तव्यश्च महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः। पितरं यौवराज्यस्थो राज्यस्थमनुपालय॥ २-५८-२२ ॥

vaktavyaśca mahābāhur ikṣvākukulanandanaḥ| pitaraṃ yauvarājyastho rājyastham anupālaya

"और उस महाबाहु, इक्ष्वाकु-वंश के आनन्दवर्धक भरत से यह भी कहना - 'युवराज-पद पर रहते हुए, राजसिंहासन पर स्थित पिता की सेवा करते रहना।'"

श्लोक 23 (ayodhya.58.23)

अतिक्रान्तवया राजा मास्मैनं व्यवरोरुधः। कुमारराज्ये जीव त्वं तस्यैवाज्ञाप्रवर्तनात्॥ २-५८-२३ ॥

atikrāntavayā rājā māsmainaṃ vyavarorudhaḥ| kumārarājye jīva tvaṃ tasyaivājñāpravartanāt

"'राजा अब वयोवृद्ध हो चुके हैं, इसलिए उन्हें राज्य से वंचित न करना; उन्हीं की आज्ञा के अनुसार चलते हुए तुम युवराज-पद पर बने रहना।'"

श्लोक 24 (ayodhya.58.24)

अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन्। मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी॥ २-५८-२४ ॥

abravīc cāpi māṃ bhūyo bhṛśam aśrūṇi vartayan| māteva mama mātā te draṣṭavyā putragardhinī

फिर बहुत आँसू बहाते हुए राम ने मुझसे यह भी कहा - "मेरी माता, जो अपने पुत्र के लिए तरस रही हैं, उन्हें तुम अपनी ही माता समझकर देखभाल करना।"

श्लोक 25 (ayodhya.58.25)

इत्येवं मां महाराज ब्रुवन्नेव महायशाः। रामो राजीवताम्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत्॥ २-५८-२५ ॥

ity evaṃ māṃ mahārāja bruvann eva mahāyaśāḥ| rāmo rājīvatāmrākṣo bhṛśam aśrūṇy avartayat

हे महाराज! ऐसा कहते हुए ही वह अत्यन्त यशस्वी, कमल के समान लाल नेत्रों वाला राम बहुत आँसू बहाने लगा।

श्लोक 26 (ayodhya.58.26)

लक्ष्मणस्तु सुसंक्रुद्धो निःश्वसन् वाक्यमब्रवीत्। केनायमपराधेन राजपुत्रो विवासितः॥ २-५८-२६ ॥

lakṣmaṇastu susaṃkruddho niḥśvasan vākyam abravīt| kenāyam aparādhena rājaputro vivāsitaḥ

परन्तु लक्ष्मण अत्यन्त क्रुद्ध होकर, लम्बी साँस लेते हुए बोले - "इस राजपुत्र को किस अपराध के कारण निर्वासित किया गया है?"

श्लोक 27 (ayodhya.58.27)

राज्ञा तु खलु कैकेय्या लघुत्वाश्रित्य शासनम्। कृतं कार्यमकार्यं वा वयं येनाभिपीडिताः॥ २-५८-२७ ॥

rājñā tu khalu kaikeyyā laghutvāśritya śāsanam| kṛtaṃ kāryam akāryaṃ vā vayaṃ yenābhipīḍitāḥ

"राजा ने कैकेयी की तुच्छ आज्ञा का सहारा लेकर, चाहे यह उचित हो या अनुचित, ऐसा कार्य किया है जिससे हम सब पीड़ित हुए हैं।"

श्लोक 28 (ayodhya.58.28)

यदि प्रव्राजितो रामो लोभकारणकारितम्। वरदाननिमित्तं वा सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥ २-५८-२८ ॥

yadi pravrājito rāmo lobhakāraṇakāritam| varadānanimittaṃ vā sarvathā duṣkṛtaṃ kṛtam

"यदि राम को इस प्रकार निर्वासित किया गया है, तो चाहे यह लोभ के वशीभूत होकर किया गया हो या वरदान के कारण, यह हर तरह से अनुचित कर्म है।"

श्लोक 29 (ayodhya.58.29)

इदं तावद्यथाकाममीश्वरस्य कृते कृतम्। रामस्य तु परित्यागे न हेतुमुपलक्षये॥ २-५८-२९ ॥

idaṃ tāvad yathākāmam īśvarasya kṛte kṛtam| rāmasya tu parityāge na hetum upalakṣaye

"यह तो राजा की इच्छा के अनुसार भले ही किया गया हो, किन्तु राम के परित्याग का मुझे कोई औचित्य नहीं दिखाई देता।"

श्लोक 30 (ayodhya.58.30)

असमीक्ष्य समारब्धं विरुद्धं बुद्धिलाघवात्। जनयिष्यति संक्रोशं राघवस्य विवासनम्॥ २-५८-३० ॥

asamīkṣya samārabdhaṃ viruddhaṃ buddhilāghavāt| janayiṣyati saṃkrośaṃ rāghavasya vivāsanam

"बिना सोचे-समझे, बुद्धि की तुच्छता के कारण उठाया गया यह अनुचित कदम - राघव का यह निर्वासन - बड़े पैमाने पर लोगों में आक्रोश उत्पन्न करेगा।"

श्लोक 31 (ayodhya.58.31)

अहं तावन्महाराजे पितृत्वं नोपलक्षये। भ्राता भर्ता च बन्धुश्च पिता च मम राघवः॥ २-५८-३१ ॥

ahaṃ tāvan mahārāje pitṛtvaṃ nopalakṣaye| bhrātā bhartā ca bandhuśca pitā ca mama rāghavaḥ

"मैं तो अब महाराज में पितृत्व नहीं देखता - मेरे लिए तो राघव ही भाई हैं, स्वामी हैं, बन्धु हैं और पिता भी हैं।"

श्लोक 32 (ayodhya.58.32)

सर्वलोकप्रियं त्यक्त्वा सर्वलोकहिते रतम्। सर्वलोकोऽनुरज्येत कथं त्वामनेन कर्मणा॥ २-५८-३२ ॥

sarvalokapriyaṃ tyaktvā sarvalokahite ratam| sarvaloko 'nurajyeta kathaṃ tvām anena karmaṇā

"समस्त लोक के प्रिय, समस्त लोक के हित में रत राम को त्यागकर, इस कर्म से भला समस्त प्रजा तुम्हारे प्रति कैसे स्नेह रखेगी?"

श्लोक 33 (ayodhya.58.33)

सर्वप्रजाभिरामं हि रामं प्रव्राज्य धार्मिकम्। सर्वलोकं विरुध्यैनं कथं राजा भविष्यसि॥ २-५८-३३ ॥

sarvaprajābhirāmaṃ hi rāmaṃ pravrājya dhārmikam| sarvalokaṃ virudhyainaṃ kathaṃ rājā bhaviṣyasi

"समस्त प्रजा के प्रिय, धर्मात्मा राम को निर्वासित कर, इस प्रकार समस्त संसार का विरोध मोल लेकर, तुम राजा कैसे बने रहोगे?"

श्लोक 34 (ayodhya.58.34)

जानकी तु महाराज निःश्वसन्ती तपस्विनी। भूतोपहतचित्तेव विष्ठिता विस्मृता स्थिता॥ २-५८-३४ ॥

jānakī tu mahārāja niḥśvasantī tapasvinī| bhūtopahatacitteva viṣṭhitā vismṛtā sthitā

"हे महाराज! तपस्विनी जानकी लम्बी साँसें लेते हुए, मानो भूतग्रस्त-चित्त हो, स्तब्ध और आत्म-विस्मृत-सी खड़ी रह गईं।"

श्लोक 35 (ayodhya.58.35)

अदृष्टपूर्वव्यसना राजपुत्री यशस्विनी। तेन दुःखेन रुदती नैव मां किंचिदब्रवीत्॥ २-५८-३५ ॥

adṛṣṭapūrvavyasanā rājaputrī yaśasvinī| tena duḥkhena rudatī naiva māṃ kiṃcid abravīt

उस यशस्विनी राजकुमारी ने, जिसने पहले कभी ऐसा दुःख नहीं देखा था, उस पीड़ा में रोते हुए मुझसे कुछ भी नहीं कहा।

श्लोक 36 (ayodhya.58.36)

उद्वीक्षमाणा भर्तारं मुखेन परिशुष्यता। मुमोच सहसा बाष्पं मां प्रयान्तमुदीक्ष्य सा॥ २-५८-३६ ॥

udvīkṣamāṇā bhartāraṃ mukhena pariśuṣyatā| mumoca sahasā bāṣpaṃ māṃ prayāntam udīkṣya sā

वह अपने पति की ओर देखती हुई, मुरझाए हुए मुख से, मुझे विदा होते देखकर अचानक आँसू बहाने लगीं।

श्लोक 37 (ayodhya.58.37)

तथैव रामोऽश्रुमुखः कृताञ्जलिः स्थितोऽभवल्लक्ष्मणबाहुपालितः। तथैव सीता रुदती तपस्विनी निरीक्षते राजरथं तथैव माम्॥ २-५८-३७ ॥

tathaiva rāmo 'śrumukhaḥ kṛtāñjaliḥ sthito 'bhaval lakṣmaṇabāhupālitaḥ| tathaiva sītā rudatī tapasvinī nirīkṣate rājarathaṃ tathaiva mām

उसी प्रकार राम भी आँसू-भरे मुख से, हाथ जोड़े, लक्ष्मण की भुजाओं द्वारा सम्भाले हुए खड़े रहे; और वह अभागिनी सीता भी रोती हुई राजरथ को और मुझे इसी प्रकार देखती रहीं।

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