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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 6

अभिषेक हेतु अयोध्या का श्रृंगार

सर्ग 5सर्ग-सूचीसर्ग 7

श्लोक 1 (ayodhya.6.1)

गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः । सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत् ॥ 6.1 ॥

gate purohite rāmaḥ snāto niyatamānasaḥ | saha patnyā viśālākṣyā nārāyaṇamupāgamat

पुरोहित के चले जाने पर राम ने स्नान किया और संयमित मन से अपनी विशाल-नेत्रों वाली पत्नी सीता के साथ भगवान् नारायण की उपासना की।

श्लोक 2 (ayodhya.6.2)

प्रगृह्य शिरसा पात्रीं हविषो विधिवत् ततः । महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले ॥ 6.2 ॥

pragṛhya śirasā pātrīṃ haviṣo vidhivat tataḥ | mahate daivatāyājyaṃ juhāva jvalitānale

फिर विधिपूर्वक हवि के पात्र को सिर पर उठाकर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि में उस महान् देवता भगवान् विष्णु के लिए घी की आहुति दी।

श्लोक 3 (ayodhya.6.3)

शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम् । ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे ॥ 6.3 ॥

śeṣaṃ ca haviṣastasya prāśyāśāsyātmanaḥ priyam | dhyāyannārāyaṇaṃ devaṃ svāstīrṇe kuśasaṃstare

अपने कल्याण की कामना करते हुए उन्होंने उस हवि का शेष भाग ग्रहण किया, और भगवान् नारायण का ध्यान करते हुए भलीभाँति बिछाई गई कुश की शय्या पर —

श्लोक 4 (ayodhya.6.4)

वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः । श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः ॥ 6.4 ॥

vāgyataḥ saha vaidehyā bhūtvā niyatamānasaḥ | śrīmatyāyatane viṣṇoḥ śiśye naravarātmajaḥ

— वाणी को संयत रखते हुए और मन को नियंत्रित करते हुए, नरश्रेष्ठ राजकुमार राम ने विदेहकुमारी सीता के साथ भगवान् विष्णु के उस भव्य मन्दिर में शयन किया।

श्लोक 5 (ayodhya.6.5)

एकयामावशिष्टायां रात्र्यां प्रतिविबुध्य सः । अलंकारविधिं सम्यक् कारयामास वेश्मनः ॥ 6.5 ॥

ekayāmāvaśiṣṭāyāṃ rātryāṃ prativibudhya saḥ | alaṃkāravidhiṃ samyak kārayāmāsa veśmanaḥ

जब रात्रि का केवल एक प्रहर शेष रह गया था, तब वे जाग उठे और उन्होंने राजभवन के सम्पूर्ण शृंगार-कार्य को भलीभाँति सम्पन्न कराया।

श्लोक 6 (ayodhya.6.6)

तत्र शृण्वन् सुखा वाचः सूतमागधवन्दिनाम् । पूर्वां संध्यामुपासीनो जजाप सुसमाहितः ॥ 6.6 ॥

tatra śṛṇvan sukhā vācaḥ sūtamāgadhavandinām | pūrvāṃ saṃdhyāmupāsīno jajāpa susamāhitaḥ

वहाँ सूत, मागध और वन्दीजनों की मधुर स्तुतियाँ सुनते हुए उन्होंने प्रातःकालीन संध्या की उपासना की और पूर्ण एकाग्रचित्त होकर जप किया।

श्लोक 7 (ayodhya.6.7)

तुष्टाव प्रणतश्चैव शिरसा मधुसूदनम् । विमलक्षौमसंवीतो वाचयामास स द्विजान् ॥ 6.7 ॥

tuṣṭāva praṇataścaiva śirasā madhusūdanam | vimalakṣaumasaṃvīto vācayāmāsa sa dvijān

उन्होंने सिर झुकाकर भगवान् मधुसूदन की स्तुति की, और निर्मल रेशमी वस्त्र धारण करके ब्राह्मणों से मंगल-पाठ करवाया।

श्लोक 8 (ayodhya.6.8)

तेषां पुण्याहघोषोऽथ गम्भीरमधुरस्तथा । अयोध्यां पूरयामास तूर्यघोषानुनादितः ॥ 6.8 ॥

teṣāṃ puṇyāhaghoṣo'tha gambhīramadhurastathā | ayodhyāṃ pūrayāmāsa tūryaghoṣānunāditaḥ

तब उनके मंगल-घोष की वह गम्भीर और मधुर ध्वनि वाद्य-यंत्रों की गूँज के साथ मिलकर सम्पूर्ण अयोध्या में गूँज उठी।

श्लोक 9 (ayodhya.6.9)

कृतोपवासं तु तदा वैदेह्या सह राघवम् । अयोध्यानिलयः श्रुत्वा सर्वः प्रमुदितो जनः ॥ 6.9 ॥

kṛtopavāsaṃ tu tadā vaidehyā saha rāghavam | ayodhyānilayaḥ śrutvā sarvaḥ pramudito janaḥ

तब अयोध्यावासी समस्त प्रजा यह सुनकर कि राघव ने सीता सहित उपवास-व्रत रखा है, अत्यंत हर्षित हो उठी।

श्लोक 10 (ayodhya.6.10)

ततः पौरजनः सर्वः श्रुत्वा रामाभिषेचनम् । प्रभातां रजनीं दृष्ट्वा चक्रे शोभयितुं पुरीम् ॥ 6.10 ॥

tataḥ paurajanaḥ sarvaḥ śrutvā rāmābhiṣecanam | prabhātāṃ rajanīṃ dṛṣṭvā cakre śobhayituṃ purīm

फिर राम के अभिषेक की बात सुनकर तथा रात्रि को उषाकाल में बदलते देखकर समस्त नगरवासियों ने नगरी को सजाना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 11 (ayodhya.6.11)

सिताभ्रशिखराभेषु देवतायतनेषु च । चतुष्पथेषु रथ्यासु चैत्येष्वट्टालकेषु च ॥ 6.11 ॥

sitābhraśikharābheṣu devatāyataneṣu ca | catuṣpatheṣu rathyāsu caityeṣvaṭṭālakeṣu ca

श्वेत मेघ-शिखरों के समान चमकते देवालयों पर, चौराहों पर, गलियों में, चैत्य-वृक्षों पर तथा अट्टालिकाओं पर,

श्लोक 12 (ayodhya.6.12)

नानापण्यसमृद्धेषु वणिजामापणेषु च । कुटुम्बिनां समृद्धेषु श्रीमत्सु भवनेषु च ॥ 6.12 ॥

nānāpaṇyasamṛddheṣu vaṇijāmāpaṇeṣu ca | kuṭumbināṃ samṛddheṣu śrīmatsu bhavaneṣu ca

नाना प्रकार की वस्तुओं से भरी व्यापारियों की दुकानों पर, तथा गृहस्थों के समृद्ध एवं वैभवशाली भवनों पर,

श्लोक 13 (ayodhya.6.13)

सभासु चैव सर्वासु वृक्षेष्वालक्षितेषु च । ध्वजाः समुच्छ्रिताः साधु पताकाश्चाभवंस्तथा ॥ 6.13 ॥

sabhāsu caiva sarvāsu vṛkṣeṣvālakṣiteṣu ca | dhvajāḥ samucchritāḥ sādhu patākāścābhavaṃstathā

तथा सभी सभा-भवनों में और दिखाई देने वाले प्रत्येक वृक्ष पर — सर्वत्र ऊँची ध्वजाएँ फहराई गईं और सुन्दर पताकाएँ लहराने लगीं।

श्लोक 14 (ayodhya.6.14)

नटनर्तकसङ्घानां गायकानां च गायताम् । मनःकर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥ 6.14 ॥

naṭanartakasaṅghānāṃ gāyakānāṃ ca gāyatām | manaḥkarṇasukhā vācaḥ śuśrāva janatā tataḥ

तत्पश्चात् जन-समुदाय ने चारों ओर से नट-नर्तकों की मण्डलियों तथा गायकों के गायन की, मन और कान को सुखद लगने वाली ध्वनियाँ सुनीं।

श्लोक 15 (ayodhya.6.15)

रामाभिषेकयुक्ताश्च कथाश्चक्रुर्मिथो जनाः । रामाभिषेके सम्प्राप्ते चत्वरेषु गृहेषु च ॥ 6.15 ॥

rāmābhiṣekayuktāśca kathāścakrurmitho janāḥ | rāmābhiṣeke samprāpte catvareṣu gṛheṣu ca

राम के अभिषेक का समय निकट आते ही लोग घरों में और चौराहों पर परस्पर उसी की चर्चा करने लगे।

श्लोक 16 (ayodhya.6.16)

बाला अपि क्रीडमाना गृहद्वारेषु सङ्घशः । रामाभिषवसंयुक्ताश्चक्रुरेव कथा मिथः ॥ 6.16 ॥

bālā api krīḍamānā gṛhadvāreṣu saṅghaśaḥ | rāmābhiṣavasaṃyuktāścakrureva kathā mithaḥ

यहाँ तक कि घरों के द्वारों पर समूह बनाकर खेलते हुए बालक भी आपस में राम के अभिषेक की ही बातें करने लगे।

श्लोक 17 (ayodhya.6.17)

कृतपुष्पोपहारश्च धूपगन्धाधिवासितः । राजमार्गः कृतः श्रीमान् पौरै रामाभिषेचने ॥ 6.17 ॥

kṛtapuṣpopahāraśca dhūpagandhādhivāsitaḥ | rājamārgaḥ kṛtaḥ śrīmān paurai rāmābhiṣecane

राम के अभिषेक के अवसर पर नगरवासियों ने राजमार्ग को पुष्पों से सजाकर तथा सुगन्धित धूप से सुवासित करके अत्यंत भव्य बना दिया।

श्लोक 18 (ayodhya.6.18)

प्रकाशकरणार्थं च निशागमनशङ्कया । दीपवृक्षांस्तथा चक्रुरनुरथ्यासु सर्वशः ॥ 6.18 ॥

prakāśakaraṇārthaṃ ca niśāgamanaśaṅkayā | dīpavṛkṣāṃstathā cakruranurathyāsu sarvaśaḥ

तथा यह आशंका होने पर कि कहीं रात्रि न आ जाए, उन्होंने प्रकाश के लिए सभी गलियों में सर्वत्र दीप-वृक्ष सजा दिए।

श्लोक 19 (ayodhya.6.19)

अलंकारं पुरस्यैवं कृत्वा तत् पुरवासिनः । आकांक्षमाणा रामस्य यौवराज्याभिषेचनम् ॥ 6.19 ॥

alaṃkāraṃ purasyaivaṃ kṛtvā tat puravāsinaḥ | ākāṃkṣamāṇā rāmasya yauvarājyābhiṣecanam

नगर को इस प्रकार सजाकर, राम के युवराज-पद पर अभिषेक की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हुए वे नगरवासी,

श्लोक 20 (ayodhya.6.20)

समेत्य सङ्घशः सर्वे चत्वरेषु सभासु च । कथयन्तो मिथस्तत्र प्रशशंसुर्जनाधिपम् ॥ 6.20 ॥

sametya saṅghaśaḥ sarve catvareṣu sabhāsu ca | kathayanto mithastatra praśaśaṃsurjanādhipam

समूह बनाकर चौराहों और सभाओं में एकत्र हुए, और वहाँ आपस में बातें करते हुए महाराज की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 21 (ayodhya.6.21)

अहो महात्मा राजायमिक्ष्वाकुकुलनन्दनः । ज्ञात्वा वृद्धं स्वमात्मानं रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ 6.21 ॥

aho mahātmā rājāyamikṣvākukulanandanaḥ | jñātvā vṛddhaṃ svamātmānaṃ rāmaṃ rājye'bhiṣekṣyati

"अहा! यह इक्ष्वाकु-कुल को आनन्दित करने वाला राजा कितना महान् है! अपने वृद्ध हो जाने को जानकर ही वे राम का राज्याभिषेक करने जा रहे हैं।"

श्लोक 22 (ayodhya.6.22)

सर्वे ह्यनुगृहीताः स्म यन्नो रामो महीपतिः । चिराय भविता गोप्ता दृष्टलोकपरावरः ॥ 6.22 ॥

sarve hyanugṛhītāḥ sma yanno rāmo mahīpatiḥ | cirāya bhavitā goptā dṛṣṭalokaparāvaraḥ

"हम सब पर तो कृपा ही हुई है, कि लोक के परम-अपरम को देख चुके राम अब दीर्घकाल तक हमारे रक्षक होंगे।"

श्लोक 23 (ayodhya.6.23)

अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सलः । यथा च भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघवः ॥ 6.23 ॥

anuddhatamanā vidvān dharmātmā bhrātṛvatsalaḥ | yathā ca bhrātṛṣu snigdhastathāsmāsvapi rāghavaḥ

"वे अभिमानरहित, विद्वान्, धर्मात्मा तथा भाइयों के प्रति स्नेहवान् हैं; और राघव अपने भाइयों के समान ही हम पर भी स्नेह रखते हैं।"

श्लोक 24 (ayodhya.6.24)

चिरं जीवतु धर्मात्मा राजा दशरथोऽनघः । यत्प्रसादेनाभिषिक्तं रामं द्रक्ष्यामहे वयम् ॥ 6.24 ॥

ciraṃ jīvatu dharmātmā rājā daśaratho'naghaḥ | yatprasādenābhiṣiktaṃ rāmaṃ drakṣyāmahe vayam

"धर्मात्मा और निष्पाप राजा दशरथ चिरंजीवी हों, जिनकी कृपा से हम राम को अभिषिक्त होते हुए देखेंगे!"

श्लोक 25 (ayodhya.6.25)

एवंविधं कथयतां पौराणां शुश्रुवुः परे । दिग्भ्यो विश्रुतवृत्तान्ताः प्राप्ता जानपदा जनाः ॥ 6.25 ॥

evaṃvidhaṃ kathayatāṃ paurāṇāṃ śuśruvuḥ pare | digbhyo viśrutavṛttāntāḥ prāptā jānapadā janāḥ

नगरवासी इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि दूर-दूर से यह समाचार सुनकर पहुँचे हुए जनपदवासी लोग भी उन्हें सुनने लगे।

श्लोक 26 (ayodhya.6.26)

ते तु दिग्भ्यः पुरीं प्राप्ता द्रष्टुं रामाभिषेचनम् । रामस्य पूरयामासुः पुरीं जानपदा जनाः ॥ 6.26 ॥

te tu digbhyaḥ purīṃ prāptā draṣṭuṃ rāmābhiṣecanam | rāmasya pūrayāmāsuḥ purīṃ jānapadā janāḥ

चारों दिशाओं से राम के अभिषेक को देखने के लिए नगर में पहुँचे उन जनपदवासियों से राम की वह नगरी खचाखच भर गई।

श्लोक 27 (ayodhya.6.27)

जनौघैस्तैर्विसर्पद्भिः शुश्रुवे तत्र निःस्वनः । पर्वसूदीर्णवेगस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ 6.27 ॥

janaughaistairvisarpadbhiḥ śuśruve tatra niḥsvanaḥ | parvasūdīrṇavegasya sāgarasyeva niḥsvanaḥ

उन उमड़ते हुए जन-समूहों का कोलाहल वहाँ ऐसे सुनाई देने लगा जैसे पर्व के दिनों में उमड़ते हुए वेगवान् समुद्र की गर्जना हो।

श्लोक 28 (ayodhya.6.28)

ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं दिदृक्षुभिर्जानपदैरुपाहितैः । समन्ततः सस्वनमाकुलं बभौ समुद्रयादोभिरिवार्णवोदकम् ॥ 6.28 ॥

tatastadindrakṣayasaṃnibhaṃ puraṃ didṛkṣubhirjānapadairupāhitaiḥ | samantataḥ sasvanamākulaṃ babhau samudrayādobhirivārṇavodakam

तब इन्द्र के निवास-स्थान के समान वह नगरी, देखने की उत्कण्ठा से आए हुए जनपदवासियों के कोलाहल से चारों ओर से भर गई, और समुद्री जीवों से हलचल भरे सागर के जल के समान प्रकाशित होने लगी।

सर्ग 5सर्ग-सूचीसर्ग 7