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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 7

मन्थरा की कुटिलता

सर्ग 6सर्ग-सूचीसर्ग 8

श्लोक 1 (ayodhya.7.1)

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता । प्रासादं चन्द्रसंकाशमारुरोह यदृच्छया ॥ 7.1 ॥

jñātidāsī yato jātā kaikeyyā tu sahoṣitā | prāsādaṃ candrasaṃkāśamāruroha yadṛcchayā

जन्म से ही कैकेयी के साथ रहने वाली उनकी दासी मन्थरा संयोगवश उस राजप्रासाद की छत पर चढ़ गई, जो चन्द्रमा के समान उज्ज्वल थी।

श्लोक 2 (ayodhya.7.2)

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकमलोत्पलाम् । अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत ॥ 7.2 ॥

siktarājapathāṃ kṛtsnāṃ prakīrṇakamalotpalām | ayodhyāṃ mantharā tasmāt prāsādādanvavaikṣata

उस छत से मन्थरा ने सम्पूर्ण अयोध्या को देखा — जिसके राजमार्ग जल से सिंचित थे और जहाँ कमल तथा उत्पल के फूल बिखरे पड़े थे।

श्लोक 3 (ayodhya.7.3)

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलंकृताम् । सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरःस्नातजनैर्युताम् ॥ 7.3 ॥

patākābhirvarārhābhirdhvajaiśca samalaṃkṛtām | siktāṃ candanatoyaiśca śiraḥsnātajanairyutām

वह नगरी सुन्दर पताकाओं और ध्वजाओं से सुसज्जित थी, चन्दन-मिश्रित जल से सिंचित थी, तथा सिर धोकर स्नान किए हुए लोगों से भरी थी,

श्लोक 4 (ayodhya.7.4)

माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम् । शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनादिताम् ॥ 7.4 ॥

mālyamodakahastaiśca dvijendrairabhināditām | śukladevagṛhadvārāṃ sarvavāditranāditām

जो माला और मोदक हाथों में लिए हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के स्वरों से गूँज रही थी, जिसके देवालयों के द्वार श्वेत थे, और जो समस्त वाद्यों की ध्वनि से निनादित हो रही थी,

श्लोक 5 (ayodhya.7.5)

सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषनिनादिताम् । प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम् ॥ 7.5 ॥

samprahṛṣṭajanākīrṇāṃ brahmaghoṣanināditām | prahṛṣṭavarahastyaśvāṃ sampraṇarditagovṛṣām

जो हर्षित जनसमूह से भरी थी और वेद-घोष से गूँज रही थी, जिसके श्रेष्ठ हाथी-घोड़े हर्षित थे और बैल-गौएँ आनन्दपूर्वक रँभा रहे थे —

श्लोक 6 (ayodhya.7.6)

हृष्टप्रमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम् । अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता ॥ 7.6 ॥

hṛṣṭapramuditaiḥ paurairucchritadhvajamālinīm | ayodhyāṃ mantharā dṛṣṭvā paraṃ vismayamāgatā

— इस प्रकार हर्षित एवं प्रमुदित नगरवासियों द्वारा ऊँची फहराई गई ध्वजाओं से सुसज्जित अयोध्या को देखकर मन्थरा अत्यंत विस्मित हो उठी।

श्लोक 7 (ayodhya.7.7)

सा हर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम् । अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा ॥ 7.7 ॥

sā harṣotphullanayanāṃ pāṇḍurakṣaumavāsinīm | avidūre sthitāṃ dṛṣṭvā dhātrīṃ papraccha mantharā

पास ही खड़ी एक धाय को, जिसकी आँखें हर्ष से खिली हुई थीं और जो श्वेत रेशमी वस्त्र पहने थी, देखकर मन्थरा ने उससे पूछा —

श्लोक 8 (ayodhya.7.8)

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती । राममाता धनं किं नु जनेभ्यः सम्प्रयच्छति ॥ 7.8 ॥

uttamenābhisaṃyuktā harṣeṇārthaparā satī | rāmamātā dhanaṃ kiṃ nu janebhyaḥ samprayacchati

"राम की माता, जो सदा धन का महत्त्व समझने वाली रही हैं, आज इतने हर्ष के साथ प्रजा को धन क्यों बाँट रही हैं?

श्लोक 9 (ayodhya.7.9)

अतिमात्रं प्रहर्षः किं जनस्यास्य च शंस मे । कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपतिः ॥ 7.9 ॥

atimātraṃ praharṣaḥ kiṃ janasyāsya ca śaṃsa me | kārayiṣyati kiṃ vāpi samprahṛṣṭo mahīpatiḥ

प्रजा में यह असाधारण हर्ष क्यों है — मुझे बताओ। और यह प्रसन्न महाराज भी क्या करने वाले हैं?"

श्लोक 10 (ayodhya.7.10)

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा । आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम् ॥ 7.10 ॥

vidīryamāṇā harṣeṇa dhātrī tu parayā mudā | ācacakṣe'tha kubjāyai bhūyasīṃ rāghave śriyam

हर्ष से जैसे फटी जा रही वह धाय अत्यंत आनन्दपूर्वक कुबड़ी मन्थरा को राघव को मिलने वाले उस महान् वैभव के विषय में बताने लगी।

श्लोक 11 (ayodhya.7.11)

श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम् । राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम् ॥ 7.11 ॥

śvaḥ puṣyeṇa jitakrodhaṃ yauvarājyena cānagham | rājā daśaratho rāmamabhiṣektā hi rāghavam

"कल पुष्य नक्षत्र में महाराज दशरथ क्रोध पर विजय पाने वाले, निष्पाप राघव राम का युवराज-पद पर अभिषेक करने वाले हैं।"

श्लोक 12 (ayodhya.7.12)

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षितः । कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत ॥ 7.12 ॥

dhātryāstu vacanaṃ śrutvā kubjā kṣipramamarṣitaḥ | kailāsaśikharākārāt prāsādādavarohata

धाय की यह बात सुनते ही वह कुबड़ी क्रोध से तिलमिला उठी और कैलास-शिखर के समान उस प्रासाद से नीचे उतर आई।

श्लोक 13 (ayodhya.7.13)

सा दह्यमाना क्रोधेन मन्थरा पापदर्शिनी । शयानामेव कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 7.13 ॥

sā dahyamānā krodhena mantharā pāpadarśinī | śayānāmeva kaikeyīmidaṃ vacanamabravīt

क्रोध से जलती हुई वह कुटिल-बुद्धि मन्थरा शय्या पर लेटी हुई कैकेयी के पास जाकर यह बोली —

श्लोक 14 (ayodhya.7.14)

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते । उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे ॥ 7.14 ॥

uttiṣṭha mūḍhe kiṃ śeṣe bhayaṃ tvāmabhivartate | upaplutamaghaughena nātmānamavabudhyase

"उठो, मूर्ख! क्यों सोई पड़ी हो? भय तुम पर आ पड़ा है। तुम विपत्तियों की बाढ़ में डूबी जा रही हो, और तुम्हें अपनी सुध ही नहीं है!"

श्लोक 15 (ayodhya.7.15)

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे । चलं हि तव सौभाग्यं नद्याः स्रोत इवोष्णगे ॥ 7.15 ॥

aniṣṭe subhagākāre saubhāgyena vikatthase | calaṃ hi tava saubhāgyaṃ nadyāḥ srota ivoṣṇage

"देखने में तो तुम सौभाग्यशालिनी लगती हो, पर वस्तुतः अवांछित हो गई हो; फिर भी अपने सौभाग्य का बखान करती हो! तुम्हारा यह सौभाग्य ग्रीष्म ऋतु में नदी की धारा के समान क्षणभंगुर है।"

श्लोक 16 (ayodhya.7.16)

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वचः । कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत् परम् ॥ 7.16 ॥

evamuktā tu kaikeyī ruṣṭayā paruṣaṃ vacaḥ | kubjayā pāpadarśinyā viṣādamagamat param

क्रुद्ध एवं कुटिल-बुद्धि उस कुबड़ी के इन कठोर वचनों को सुनकर कैकेयी अत्यंत विषाद में डूब गईं।

श्लोक 17 (ayodhya.7.17)

कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे । विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदुःखिताम् ॥ 7.17 ॥

kaikeyī tvabravīt kubjāṃ kaccit kṣemaṃ na manthare | viṣaṇṇavadanāṃ hi tvāṃ lakṣaye bhṛśaduḥkhitām

कैकेयी ने कुबड़ी से कहा, "मन्थरे, क्या सब कुशल तो है? मैं देख रही हूँ कि तुम्हारा मुख उदास है और तुम अत्यंत दुःखी हो।"

श्लोक 18 (ayodhya.7.18)

मन्थरा तु वचः श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम् । उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ 7.18 ॥

mantharā tu vacaḥ śrutvā kaikeyyā madhurākṣaram | uvāca krodhasaṃyuktā vākyaṃ vākyaviśāradā

कैकेयी के इन मधुर वचनों को सुनकर वाक्-कुशल मन्थरा क्रोध से भरकर यह बोली —

श्लोक 19 (ayodhya.7.19)

सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्यां हितैषिणी । विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम् ॥ 7.19 ॥

sā viṣaṇṇatarā bhūtvā kubjā tasyāṃ hitaiṣiṇī | viṣādayantī provāca bhedayantī ca rāghavam

वह कुबड़ी और भी अधिक उदास बनकर, कैकेयी की हितैषी होने का दिखावा करते हुए, उन्हें और भी विषाद में डालने तथा राघव के प्रति भेद उत्पन्न करने वाली बात कहने लगी।

श्लोक 20 (ayodhya.7.20)

अक्षयं सुमहद् देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम् । रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ 7.20 ॥

akṣayaṃ sumahad devi pravṛttaṃ tvadvināśanam | rāmaṃ daśaratho rājā yauvarājye'bhiṣekṣyati

"हे देवी! तुम्हारा अक्षय एवं महान् विनाश निकट आ गया है — राजा दशरथ राम का युवराज-पद पर अभिषेक करने जा रहे हैं।"

श्लोक 21 (ayodhya.7.21)

सास्म्यगाधे भये मग्ना दुःखशोकसमन्विता । दह्यमानानलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता ॥ 7.21 ॥

sāsmyagādhe bhaye magnā duḥkhaśokasamanvitā | dahyamānānaleneva tvaddhitārthamihāgatā

"मैं स्वयं भी अथाह भय में डूबी हुई, दुःख और शोक से व्याकुल हूँ, मानो अग्नि से जल रही हूँ — और तुम्हारे ही हित के लिए यहाँ आई हूँ।"

श्लोक 22 (ayodhya.7.22)

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद् भवेत् । त्वद्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशयः ॥ 7.22 ॥

tava duḥkhena kaikeyi mama duḥkhaṃ mahad bhavet | tvadvṛddhau mama vṛddhiśca bhavediha na saṃśayaḥ

"हे कैकेयी, तुम्हारे दुःख से मुझे भी बड़ा दुःख होता है; और तुम्हारी उन्नति में ही मेरी भी उन्नति है — इसमें कोई सन्देह नहीं।"

श्लोक 23 (ayodhya.7.23)

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपतेः । उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे ॥ 7.23 ॥

narādhipakule jātā mahiṣī tvaṃ mahīpateḥ | ugratvaṃ rājadharmāṇāṃ kathaṃ devi na budhyase

"राजकुल में जन्मी और स्वयं महाराज की पटरानी होकर भी, हे देवी, तुम राजधर्मों की क्रूरता को क्यों नहीं समझ पातीं?"

श्लोक 24 (ayodhya.7.24)

धर्मवादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुणः । शुद्धभावेन जानीषे तेनैवमतिसंधिता ॥ 7.24 ॥

dharmavādī śaṭho bhartā ślakṣṇavādī ca dāruṇaḥ | śuddhabhāvena jānīṣe tenaivamatisaṃdhitā

"तुम्हारे पति धर्म की बातें करते हैं पर हैं कपटी; मृदु वचन बोलते हैं पर हैं निष्ठुर। तुम स्वयं शुद्ध-हृदया हो, इसीलिए उन्होंने तुम्हें इस प्रकार छल लिया है।"

श्लोक 25 (ayodhya.7.25)

उपस्थितः प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम् । अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति ॥ 7.25 ॥

upasthitaḥ prayuñjānastvayi sāntvamanarthakam | arthenaivādya te bhartā kausalyāṃ yojayiṣyati

"वे तुम्हारे पास आकर केवल निरर्थक मीठी बातें करते हैं; परन्तु आज वास्तविक लाभ में तुम्हारे पति कौसल्या से ही जुड़ रहे हैं।"

श्लोक 26 (ayodhya.7.26)

अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु । काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके ॥ 7.26 ॥

apavāhya tu duṣṭātmā bharataṃ tava bandhuṣu | kālye sthāpayitā rāmaṃ rājye nihatakaṇṭake

"उस दुष्ट-हृदय राजा ने भरत को तुम्हारे मायके भेज दिया है, और कल प्रातःकाल वे निष्कण्टक राज्य पर राम को प्रतिष्ठित करने वाले हैं।"

श्लोक 27 (ayodhya.7.27)

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया । आशीविष इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया ॥ 7.27 ॥

śatruḥ patipravādena mātreva hitakāmyayā | āśīviṣa ivāṅgena bāle paridhṛtastvayā

"हे बालिके, पति के नाम पर एक शत्रु को तुमने माता के समान हितैषिणी भावना से अपने अंग से लगाकर पाला है — मानो कोई विषैला सर्प हो।"

श्लोक 28 (ayodhya.7.28)

यथा हि कुर्याच्छत्रुर्वा सर्पो वा प्रत्युपेक्षितः । राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता ॥ 7.28 ॥

yathā hi kuryācchatrurvā sarpo vā pratyupekṣitaḥ | rājñā daśarathenādya saputrā tvaṃ tathā kṛtā

"जिस प्रकार उपेक्षा किया हुआ शत्रु अथवा सर्प अवश्य ही आघात करता है, उसी प्रकार राजा दशरथ ने आज तुम्हारे और तुम्हारे पुत्र के साथ किया है।"

श्लोक 29 (ayodhya.7.29)

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिता । रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि ॥ 7.29 ॥

pāpenānṛtasāntvena bāle nityaṃ sukhocitā | rāmaṃ sthāpayatā rājye sānubandhā hatā hyasi

"हे बालिके, जो सदा सुख की ही अधिकारिणी रही हो — उस पापी ने अपने झूठे प्रेम-वचनों से, राम को राज्य पर बिठाकर, तुम्हें तुम्हारे परिवार सहित ही आघात पहुँचाया है।"

श्लोक 30 (ayodhya.7.30)

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव । त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने ॥ 7.30 ॥

sā prāptakālaṃ kaikeyi kṣipraṃ kuru hitaṃ tava | trāyasva putramātmānaṃ māṃ ca vismayadarśane

"अतः हे कैकेयी, समय के अनुकूल जो तुम्हारे हित में हो, वह शीघ्र करो। हे अद्भुत सुन्दरी, अपने पुत्र को, स्वयं को और मुझे भी बचाओ।"

श्लोक 31 (ayodhya.7.31)

मन्थराया वचः श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना । उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी ॥ 7.31 ॥

mantharāyā vacaḥ śrutvā śayanāt sā śubhānanā | uttasthau harṣasampūrṇā candralekheva śāradī

मन्थरा की यह बात सुनकर वह सुमुखी कैकेयी हर्ष से भरकर शय्या से यों उठ खड़ी हुईं जैसे शरद ऋतु की चन्द्ररेखा उदित होती है।

श्लोक 32 (ayodhya.7.32)

अतीव सा तु संतुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता । दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम् ॥ 7.32 ॥

atīva sā tu saṃtuṣṭā kaikeyī vismayānvitā | divyamābharaṇaṃ tasyai kubjāyai pradadau śubham

अत्यंत प्रसन्न एवं विस्मित हुई कैकेयी ने उस कुबड़ी को एक दिव्य एवं सुन्दर आभूषण भेंट किया।

श्लोक 33 (ayodhya.7.33)

दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा । कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥ 7.33 ॥

dattvā tvābharaṇaṃ tasyai kubjāyai pramadottamā | kaikeyī mantharāṃ hṛṣṭā punarevābravīdidam

उस कुबड़ी को वह आभूषण देकर स्त्रियों में श्रेष्ठ कैकेयी ने अत्यंत प्रसन्न होकर मन्थरा से पुनः यह कहा —

श्लोक 34 (ayodhya.7.34)

इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम् । एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूयः करोमि ते ॥ 7.34 ॥

idaṃ tu manthare mahyamākhyātaṃ paramaṃ priyam | etanme priyamākhyātaṃ kiṃ vā bhūyaḥ karomi te

"हे मन्थरे, तुमने मुझे जो यह समाचार सुनाया है, वह मेरे लिए परम प्रिय है। तुमने मुझे यह इतनी प्रिय बात बताई है, अब मैं तुम्हारे लिए और क्या करूँ?"

श्लोक 35 (ayodhya.7.35)

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये । तस्मात् तुष्टास्मि यद् राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ 7.35 ॥

rāme vā bharate vāhaṃ viśeṣaṃ nopalakṣaye | tasmāt tuṣṭāsmi yad rājā rāmaṃ rājye'bhiṣekṣyati

"मैं राम और भरत में कोई भेद नहीं समझती; इसीलिए मुझे यह सुनकर प्रसन्नता हो रही है कि महाराज राम का राज्याभिषेक करने जा रहे हैं।"

श्लोक 36 (ayodhya.7.36)

न मे परं किंचिदितो वरं पुनः प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम् । तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं वरं परं ते प्रददामि तं वृणु ॥ 7.36 ॥

na me paraṃ kiṃcidito varaṃ punaḥ priyaṃ priyārhe suvacaṃ vaco'mṛtam | tathā hyavocastvamataḥ priyottaraṃ varaṃ paraṃ te pradadāmi taṃ vṛṇu

"हे प्रिय मन्थरे, मुझे इससे बढ़कर और कोई प्रिय वस्तु नहीं — तुम्हारे ये मधुर, अमृत-तुल्य वचन। तुमने मुझे ऐसा अत्यंत प्रिय समाचार सुनाया है, अतः मैं तुम्हें एक और वरदान देती हूँ — माँग लो।"

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