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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 8

मन्थरा की भय-मन्त्रणा

सर्ग 7सर्ग-सूचीसर्ग 9

श्लोक 1 (ayodhya.8.1)

मन्थरा त्वभ्यसूय्यैनामुत्सृज्याभरणं हि तत् । उवाचेदं ततो वाक्यं कोपदुःखसमन्विता ॥ 8.1 ॥

mantharā tvabhyasūyyaināmutsṛjyābharaṇaṃ hi tat | uvācedaṃ tato vākyaṃ kopaduḥkhasamanvitā

परन्तु मन्थरा उससे ईर्ष्यायुक्त होकर उस आभूषण को ही फेंककर, क्रोध और दुःख से भरकर यह बोली —

श्लोक 2 (ayodhya.8.2)

हर्षं किमर्थमस्थाने कृतवत्यसि बालिशे । शोकसागरमध्यस्थं नात्मानमवबुध्यसे ॥ 8.2 ॥

harṣaṃ kimarthamasthāne kṛtavatyasi bāliśe | śokasāgaramadhyasthaṃ nātmānamavabudhyase

"हे भोली रानी! तुम अनुचित अवसर पर यह हर्ष क्यों प्रकट कर रही हो? तुम्हें यह भी पता नहीं कि तुम शोक के सागर के बीचोंबीच खड़ी हो।"

श्लोक 3 (ayodhya.8.3)

मनसा प्रसहामि त्वां देवि दुःखार्दिता सती । यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्य त्वं व्यसनं महत् ॥ 8.3 ॥

manasā prasahāmi tvāṃ devi duḥkhārditā satī | yacchocitavye hṛṣṭāsi prāpya tvaṃ vyasanaṃ mahat

"हे देवी, मैं स्वयं दुःख से पीड़ित होकर भी मन ही मन तुम पर हँसती हूँ — कि जिस महान् संकट का शोक करना चाहिए, उसे पाकर भी तुम हर्षित हो रही हो।"

श्लोक 4 (ayodhya.8.4)

शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत् । अरेः सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्योरिवागताम् ॥ 8.4 ॥

śocāmi durmatitvaṃ te kā hi prājñā praharṣayet | areḥ sapatnīputrasya vṛddhiṃ mṛtyorivāgatām

"मुझे तुम्हारी कुबुद्धि पर तरस आता है। ऐसी कौन बुद्धिमती स्त्री होगी, जो अपनी सौत के पुत्र — जो कि शत्रु के समान है — की उन्नति पर, मानो मृत्यु के आगमन पर ही, प्रसन्न हो?"

श्लोक 5 (ayodhya.8.5)

भरतादेव रामस्य राज्यसाधारणाद् भयम् । तद् विचिन्त्य विषण्णास्मि भयं भीताद्धि जायते ॥ 8.5 ॥

bharatādeva rāmasya rājyasādhāraṇād bhayam | tad vicintya viṣaṇṇāsmi bhayaṃ bhītāddhi jāyate

"राम को केवल भरत से ही भय है, क्योंकि राज्य पर उनका भी समान अधिकार है। यही सोचकर मैं विषण्ण हूँ — क्योंकि भय तो उन्हीं से उत्पन्न होता है जो स्वयं भयभीत होते हैं।"

श्लोक 6 (ayodhya.8.6)

लक्ष्मणो हि महाबाहू रामं सर्वात्मना गतः । शत्रुघ्नश्चापि भरतं काकुत्स्थं लक्ष्मणो यथा ॥ 8.6 ॥

lakṣmaṇo hi mahābāhū rāmaṃ sarvātmanā gataḥ | śatrughnaścāpi bharataṃ kākutsthaṃ lakṣmaṇo yathā

"महाबाहु लक्ष्मण तो सर्वथा राम के हो चुके हैं; और शत्रुघ्न भी भरत के प्रति वैसे ही समर्पित हैं, जैसे लक्ष्मण राम के प्रति।"

श्लोक 7 (ayodhya.8.7)

प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्यैव भामिनि । राज्यक्रमो विसृष्टस्तु तयोस्तावद्यवीयसोः ॥ 8.7 ॥

pratyāsannakrameṇāpi bharatasyaiva bhāmini | rājyakramo visṛṣṭastu tayostāvadyavīyasoḥ

"हे भामिनि, जन्म-क्रम की निकटता के अनुसार भी राज्य का अधिकार भरत का ही है; उन दोनों छोटे भाइयों के लिए तो यह अधिकार दूर ही है।"

श्लोक 8 (ayodhya.8.8)

विदुषः क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिणः । भयात् प्रवेपे रामस्य चिन्तयन्ती तवात्मजम् ॥ 8.8 ॥

viduṣaḥ kṣatracāritre prājñasya prāptakāriṇaḥ | bhayāt pravepe rāmasya cintayantī tavātmajam

"राम क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता, प्रज्ञावान् तथा सदा समयोचित कार्य करने वाले हैं — तुम्हारे पुत्र का भविष्य सोचकर मैं भय से काँप उठती हूँ।"

श्लोक 9 (ayodhya.8.9)

सुभगा किल कौसल्या यस्याः पुत्रोऽभिषेक्ष्यते । यौवराज्येन महता श्वः पुष्येण द्विजोत्तमैः ॥ 8.9 ॥

subhagā kila kausalyā yasyāḥ putro'bhiṣekṣyate | yauvarājyena mahatā śvaḥ puṣyeṇa dvijottamaiḥ

"कौसल्या सचमुच परम भाग्यशालिनी हैं, जिनके पुत्र का कल पुष्य नक्षत्र में श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा महान् युवराज-पद पर अभिषेक होने जा रहा है।"

श्लोक 10 (ayodhya.8.10)

प्राप्तां वसुमतीं प्रीतिं प्रतीतां हतविद्विषम् । उपस्थास्यसि कौसल्यां दासीवत् त्वं कृताञ्जलिः ॥ 8.10 ॥

prāptāṃ vasumatīṃ prītiṃ pratītāṃ hatavidviṣam | upasthāsyasi kausalyāṃ dāsīvat tvaṃ kṛtāñjaliḥ

"और तुम उस कौसल्या के सामने, जो पृथ्वी पा चुकी होंगी, आनन्दित होंगी तथा शत्रुओं से रहित हो चुकी होंगी, हाथ जोड़कर एक दासी के समान खड़ी रहोगी।"

श्लोक 11 (ayodhya.8.11)

एवं च त्वं सहास्माभिस्तस्याः प्रेष्या भविष्यसि । पुत्रश्च तव रामस्य प्रेष्यत्वं हि गमिष्यति ॥ 8.11 ॥

evaṃ ca tvaṃ sahāsmābhistasyāḥ preṣyā bhaviṣyasi | putraśca tava rāmasya preṣyatvaṃ hi gamiṣyati

"इस प्रकार तुम भी हम सबके साथ उन्हीं की दासी बनकर रह जाओगी, और तुम्हारा पुत्र भी राम की सेवा में दासत्व को प्राप्त होगा।"

श्लोक 12 (ayodhya.8.12)

हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः । अप्रहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये ॥ 8.12 ॥

hṛṣṭāḥ khalu bhaviṣyanti rāmasya paramāḥ striyaḥ | aprahṛṣṭā bhaviṣyanti snuṣāste bharatakṣaye

"राम की प्रमुख रानियाँ तो निश्चय ही आनन्दित होंगी, परन्तु भरत की अवनति देखकर तुम्हारी पुत्रवधुएँ दुःखी होंगी।"

श्लोक 13 (ayodhya.8.13)

तां दृष्ट्वा परमप्रीतां ब्रुवन्तीं मन्थरां ततः । रामस्यैव गुणान् देवी कैकेयी प्रशशंस ह ॥ 8.13 ॥

tāṃ dṛṣṭvā paramaprītāṃ bruvantīṃ mantharāṃ tataḥ | rāmasyaiva guṇān devī kaikeyī praśaśaṃsa ha

मन्थरा को इस प्रकार अत्यंत अप्रसन्न होकर बोलते देख, रानी कैकेयी तब स्वयं राम के गुणों की प्रशंसा करने लगीं —

श्लोक 14 (ayodhya.8.14)

धर्मज्ञो गुणवान् दान्तः कृतज्ञः सत्यवान् शुचिः । रामो राजसुतो ज्येष्ठो यौवराज्यमतोऽर्हति ॥ 8.14 ॥

dharmajño guṇavān dāntaḥ kṛtajñaḥ satyavān śuciḥ | rāmo rājasuto jyeṣṭho yauvarājyamato'rhati

"राम धर्मज्ञ, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी तथा पवित्र-आचरण वाले हैं। वे राजा के ज्येष्ठ पुत्र हैं — इसीलिए वे युवराज-पद के अधिकारी हैं।"

श्लोक 15 (ayodhya.8.15)

भ्रातॄन् भृत्यांश्च दीर्घायुः पितृवत् पालयिष्यति । संतप्यसे कथं कुब्जे श्रुत्वा रामाभिषेचनम् ॥ 8.15 ॥

bhrātṝn bhṛtyāṃśca dīrghāyuḥ pitṛvat pālayiṣyati | saṃtapyase kathaṃ kubje śrutvā rāmābhiṣecanam

"वे दीर्घायु होकर अपने भाइयों और सेवकों की, पिता के समान, रक्षा करेंगे। हे कुबड़ी, राम के अभिषेक की बात सुनकर तुम इतनी संतप्त क्यों हो रही हो?"

श्लोक 16 (ayodhya.8.16)

भरतश्चापि रामस्य ध्रुवं वर्षशतात् परम् । पितृपैतामहं राज्यमवाप्स्यति नरर्षभः ॥ 8.16 ॥

bharataścāpi rāmasya dhruvaṃ varṣaśatāt param | pitṛpaitāmahaṃ rājyamavāpsyati nararṣabhaḥ

"और भरत भी, नरश्रेष्ठ, सौ वर्ष बीत जाने के पश्चात् राम के बाद निश्चय ही अपने पितरों के इस राज्य को प्राप्त करेंगे।"

श्लोक 17 (ayodhya.8.17)

सा त्वमभ्युदये प्राप्ते दह्यमानेव मन्थरे । भविष्यति च कल्याणे किमिदं परितप्यसे ॥ 8.17 ॥

sā tvamabhyudaye prāpte dahyamāneva manthare | bhaviṣyati ca kalyāṇe kimidaṃ paritapyase

"तो हे मन्थरे, इस वर्तमान शुभ अवसर पर तथा आने वाले उस मंगल के विषय में भी, तुम मानो जल क्यों रही हो? यह संताप क्यों?"

श्लोक 18 (ayodhya.8.18)

यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघवः । कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु ॥ 8.18 ॥

yathā vai bharato mānyastathā bhūyo'pi rāghavaḥ | kausalyāto'tiriktaṃ ca mama śuśrūṣate bahu

"जैसे भरत मुझे प्रिय हैं, वैसे ही राघव भी मुझे उतने ही, अपितु उससे भी अधिक प्रिय हैं; वे तो कौसल्या से भी बढ़कर मेरी सेवा करते हैं।"

श्लोक 19 (ayodhya.8.19)

राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत् तदा । मन्यते हि यथाऽऽत्मानं यथा भ्रातॄंस्तु राघवः ॥ 8.19 ॥

rājyaṃ yadi hi rāmasya bharatasyāpi tat tadā | manyate hi yathā''tmānaṃ yathā bhrātṝṃstu rāghavaḥ

"यदि राज्य राम का है, तो वह भरत का भी है ही — क्योंकि राघव अपने भाइयों को अपने ही समान मानते हैं।"

श्लोक 20 (ayodhya.8.20)

कैकेय्या वचनं श्रुत्वा मन्थरा भृशदुःखिता । दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ 8.20 ॥

kaikeyyā vacanaṃ śrutvā mantharā bhṛśaduḥkhitā | dīrghamuṣṇaṃ viniḥśvasya kaikeyīmidamabravīt

कैकेयी के इन वचनों को सुनकर मन्थरा अत्यंत दुःखी हो उठी, और एक लम्बी, गरम साँस भरकर कैकेयी से यह बोली —

श्लोक 21 (ayodhya.8.21)

अनर्थदर्शिनी मौर्ख्यान्नात्मानमवबुध्यसे । शोकव्यसनविस्तीर्णे मज्जन्ती दुःखसागरे ॥ 8.21 ॥

anarthadarśinī maurkhyānnātmānamavabudhyase | śokavyasanavistīrṇe majjantī duḥkhasāgare

"तुम मूर्खतावश अपने अनर्थ को भी नहीं देख पातीं और स्वयं को नहीं पहचानतीं — तुम तो शोक और विपत्ति से भरे इस दुःख-सागर में डूबती ही जा रही हो!"

श्लोक 22 (ayodhya.8.22)

भविता राघवो राजा राघवस्य च यः सुतः । राजवंशात्तु भरतः कैकेयि परिहास्यते ॥ 8.22 ॥

bhavitā rāghavo rājā rāghavasya ca yaḥ sutaḥ | rājavaṃśāttu bharataḥ kaikeyi parihāsyate

"राघव राजा होंगे, और उनके बाद उन्हीं का पुत्र राजा होगा; और हे कैकेयी, भरत तो राजवंश से बाहर ही कर दिए जाएँगे।"

श्लोक 23 (ayodhya.8.23)

नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि । स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत् ॥ 8.23 ॥

nahi rājñaḥ sutāḥ sarve rājye tiṣṭhanti bhāmini | sthāpyamāneṣu sarveṣu sumahānanayo bhavet

"हे भामिनि, राजा के सभी पुत्र राज्य में प्रतिष्ठित नहीं रह पाते; यदि सभी को राज्य दे दिया जाए, तो महान् अव्यवस्था फैल जाएगी।"

श्लोक 24 (ayodhya.8.24)

तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः । स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि ॥ 8.24 ॥

tasmājjyeṣṭhe hi kaikeyi rājyatantrāṇi pārthivāḥ | sthāpayantyanavadyāṅgi guṇavatsvitareṣvapi

"इसीलिए हे निर्दोष अंगों वाली कैकेयी, राजा लोग राज्य का शासन-भार ज्येष्ठ पुत्र को ही सौंपते हैं, चाहे अन्य पुत्र भी गुणवान् ही क्यों न हों।"

श्लोक 25 (ayodhya.8.25)

असावत्यन्तनिर्भग्नस्तव पुत्रो भविष्यति । अनाथवत् सुखेभ्यश्च राजवंशाच्च वत्सले ॥ 8.25 ॥

asāvatyantanirbhagnastava putro bhaviṣyati | anāthavat sukhebhyaśca rājavaṃśācca vatsale

"हे वत्सले, तुम्हारा यह पुत्र सर्वथा नष्ट हो जाएगा — सुखों से भी और राजवंश से भी, मानो अनाथ के समान, वंचित रह जाएगा।"

श्लोक 26 (ayodhya.8.26)

साहं त्वदर्थे सम्प्राप्ता त्वं तु मां नावबुद्ध्यसे । सपत्निवृद्धौ या मे त्वं प्रदेयं दातुमर्हसि ॥ 8.26 ॥

sāhaṃ tvadarthe samprāptā tvaṃ tu māṃ nāvabuddhyase | sapatnivṛddhau yā me tvaṃ pradeyaṃ dātumarhasi

"मैं तो केवल तुम्हारे हित के लिए यहाँ आई थी, परन्तु तुम मुझे समझ ही नहीं रहीं — तुम्हें यह उचित लग रहा है कि अपनी सौत की उन्नति के अवसर पर ही मुझे यह पुरस्कार दो!"

श्लोक 27 (ayodhya.8.27)

ध्रुवं तु भरतं रामः प्राप्य राज्यमकण्टकम् । देशान्तरं नाययिता लोकान्तरमथापि वा ॥ 8.27 ॥

dhruvaṃ tu bharataṃ rāmaḥ prāpya rājyamakaṇṭakam | deśāntaraṃ nāyayitā lokāntaramathāpi vā

"निष्कण्टक राज्य पाकर राम निश्चय ही भरत को किसी अन्य देश भेज देंगे — अथवा उन्हें परलोक भी पहुँचा सकते हैं।"

श्लोक 28 (ayodhya.8.28)

बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया । संनिकर्षाच्च सौहार्दं जायते स्थावरेष्विव ॥ 8.28 ॥

bāla eva tu mātulyaṃ bharato nāyitastvayā | saṃnikarṣācca sauhārdaṃ jāyate sthāvareṣviva

"तुमने स्वयं ही भरत को बचपन में ही उनके मामा के घर भेज दिया था; और स्नेह तो निकटता से ही उत्पन्न होता है, जैसा कि निर्जीव वस्तुओं में भी देखा जाता है।"

श्लोक 29 (ayodhya.8.29)

भरतानुवशात् सोऽपि शत्रुघ्नस्तत्समं गतः । लक्ष्मणो हि यथा रामं तथायं भरतं गतः ॥ 8.29 ॥

bharatānuvaśāt so'pi śatrughnastatsamaṃ gataḥ | lakṣmaṇo hi yathā rāmaṃ tathāyaṃ bharataṃ gataḥ

"भरत के प्रति स्नेहवश शत्रुघ्न भी उन्हीं के साथ चले गए — जैसे लक्ष्मण राम के साथ जुड़े हैं, वैसे ही यह शत्रुघ्न भरत के साथ जुड़े हैं।"

श्लोक 30 (ayodhya.8.30)

श्रूयते हि द्रुमः कश्चिच्छेत्तव्यो वनजीवनैः । संनिकर्षादिषीकाभिर्मोचितः परमाद् भयात् ॥ 8.30 ॥

śrūyate hi drumaḥ kaścicchettavyo vanajīvanaiḥ | saṃnikarṣādiṣīkābhirmocitaḥ paramād bhayāt

"सुना जाता है कि वनवासियों द्वारा काटे जाने के लिए चिह्नित कोई वृक्ष, पास ही उगी हुई सरकंडे की झाड़ी के कारण ही उस महान् भय से बच गया।"

श्लोक 31 (ayodhya.8.31)

गोप्ता हि रामं सौमित्रिर्लक्ष्मणं चापि राघवः । अश्विनोरिव सौभ्रात्रं तयोर्लोकेषु विश्रुतम् ॥ 8.31 ॥

goptā hi rāmaṃ saumitrirlakṣmaṇaṃ cāpi rāghavaḥ | aśvinoriva saubhrātraṃ tayorlokeṣu viśrutam

"सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण राम की रक्षा करते हैं, और राघव भी लक्ष्मण की रक्षा करते हैं; उन दोनों का यह भ्रातृ-प्रेम अश्विनीकुमारों के समान संसार में विख्यात है।"

श्लोक 32 (ayodhya.8.32)

तस्मान्न लक्ष्मणे रामः पापं किंचित् करिष्यति । रामस्तु भरते पापं कुर्यादेव न संशयः ॥ 8.32 ॥

tasmānna lakṣmaṇe rāmaḥ pāpaṃ kiṃcit kariṣyati | rāmastu bharate pāpaṃ kuryādeva na saṃśayaḥ

"इसलिए राम लक्ष्मण का कुछ भी अनिष्ट नहीं करेंगे; परन्तु भरत का अनिष्ट राम अवश्य करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।"

श्लोक 33 (ayodhya.8.33)

तस्माद् राजगृहादेव वनं गच्छतु राघवः । एतद्धि रोचते मह्यं भृशं चापि हितं तव ॥ 8.33 ॥

tasmād rājagṛhādeva vanaṃ gacchatu rāghavaḥ | etaddhi rocate mahyaṃ bhṛśaṃ cāpi hitaṃ tava

"इसलिए राघव राजभवन से सीधे वन को ही चले जाएँ। मुझे यही उचित प्रतीत होता है, और यह तुम्हारे लिए भी अत्यंत हितकर है।"

श्लोक 34 (ayodhya.8.34)

एवं ते ज्ञातिपक्षस्य श्रेयश्चैव भविष्यति । यदि चेद् भरतो धर्मात् पित्र्यं राज्यमवाप्स्यति ॥ 8.34 ॥

evaṃ te jñātipakṣasya śreyaścaiva bhaviṣyati | yadi ced bharato dharmāt pitryaṃ rājyamavāpsyati

"इस प्रकार यह तुम्हारे मायके वालों के भी हित में होगा, यदि भरत धर्मपूर्वक अपने पिता के इस राज्य को प्राप्त कर लें।"

श्लोक 35 (ayodhya.8.35)

स ते सुखोचितो बालो रामस्य सहजो रिपुः । समृद्धार्थस्य नष्टार्थो जीविष्यति कथं वशे ॥ 8.35 ॥

sa te sukhocito bālo rāmasya sahajo ripuḥ | samṛddhārthasya naṣṭārtho jīviṣyati kathaṃ vaśe

"तुम्हारा वह सुखभोगी बालक स्वभावतः राम का प्रतिद्वंद्वी है — जिसका उद्देश्य विफल हो गया हो, वह उस व्यक्ति के अधीन कैसे जीवित रह सकेगा जिसका उद्देश्य पूर्ण हो चुका हो?"

श्लोक 36 (ayodhya.8.36)

अभिद्रुतमिवारण्ये सिंहेन गजयूथपम् । प्रच्छाद्यमानं रामेण भरतं त्रातुमर्हसि ॥ 8.36 ॥

abhidrutamivāraṇye siṃhena gajayūthapam | pracchādyamānaṃ rāmeṇa bharataṃ trātumarhasi

"जिस प्रकार वन में सिंह द्वारा आक्रान्त गजयूथपति की रक्षा करनी होती है, उसी प्रकार राम द्वारा आच्छादित होते जा रहे भरत की तुम्हें रक्षा करनी चाहिए।"

श्लोक 37 (ayodhya.8.37)

दर्पान्निराकृता पूर्वं त्वया सौभाग्यवत्तया । राममाता सपत्नी ते कथं वैरं न यापयेत् ॥ 8.37 ॥

darpānnirākṛtā pūrvaṃ tvayā saubhāgyavattayā | rāmamātā sapatnī te kathaṃ vairaṃ na yāpayet

"तुमने पहले अपने सौभाग्य के अभिमान में अपनी सौत राम की माता का तिरस्कार किया था — वे उस वैर का बदला क्यों नहीं लेंगी?"

श्लोक 38 (ayodhya.8.38)

यदा च रामः पृथिवीमवाप्स्यते प्रभूतरत्नाकरशैलसंयुताम् । तदा गमिष्यस्यशुभं पराभवं सहैव दीना भरतेन भामिनि ॥ 8.38 ॥

yadā ca rāmaḥ pṛthivīmavāpsyate prabhūtaratnākaraśailasaṃyutām | tadā gamiṣyasyaśubhaṃ parābhavaṃ sahaiva dīnā bharatena bhāmini

"और हे भामिनि, जिस दिन राम विपुल रत्नाकरों और पर्वतों से युक्त इस पृथ्वी को प्राप्त कर लेंगे, उसी दिन तुम भरत सहित दीन होकर अशुभ पराभव को प्राप्त होओगी।"

श्लोक 39 (ayodhya.8.39)

यदा हि रामः पृथिवीमवाप्स्यते ध्रुवं प्रणष्टो भरतो भविष्यति । अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे परस्य चैवास्य विवासकारणम् ॥ 8.39 ॥

yadā hi rāmaḥ pṛthivīmavāpsyate dhruvaṃ praṇaṣṭo bharato bhaviṣyati | ato hi saṃcintaya rājyamātmaje parasya caivāsya vivāsakāraṇam

"क्योंकि जब राम पृथ्वी को प्राप्त कर लेंगे, तब भरत निश्चय ही नष्ट हो जाएँगे। अतः तुम भलीभाँति विचार करो कि राज्य अपने पुत्र को कैसे मिले, और यह दूसरा — राम — वनवास का कारण कैसे बने।"

सर्ग 7सर्ग-सूचीसर्ग 9