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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 9

दो वरदानों का स्मरण

सर्ग 8सर्ग-सूचीसर्ग 10

श्लोक 1 (ayodhya.9.1)

एवमुक्ता तु कैकेयी क्रोधेन ज्वलितानना । दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य मन्थरामिदमब्रवीत् ॥ 9.1 ॥

evamuktā tu kaikeyī krodhena jvalitānanā | dīrghamuṣṇaṃ viniḥśvasya mantharāmidamabravīt

यह सुनकर कैकेयी का मुख क्रोध से प्रज्वलित हो उठा; उन्होंने एक लम्बी, गरम साँस भरकर मन्थरा से यह कहा —

श्लोक 2 (ayodhya.9.2)

अद्य राममितः क्षिप्रं वनं प्रस्थापयाम्यहम् । यौवराज्येन भरतं क्षिप्रमद्याभिषेचये ॥ 9.2 ॥

adya rāmamitaḥ kṣipraṃ vanaṃ prasthāpayāmyaham | yauvarājyena bharataṃ kṣipramadyābhiṣecaye

"मैं आज ही राम को यहाँ से शीघ्र वन भेज दूँगी, और आज ही तुरन्त भरत का युवराज-पद पर अभिषेक करा दूँगी।"

श्लोक 3 (ayodhya.9.3)

इदं त्विदानीं सम्पश्य केनोपायेन साधये । भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन ॥ 9.3 ॥

idaṃ tvidānīṃ sampaśya kenopāyena sādhaye | bharataḥ prāpnuyād rājyaṃ na tu rāmaḥ kathaṃcana

"परन्तु अब यह देखो कि किस उपाय से मैं यह सिद्ध करूँ कि भरत को राज्य मिले और राम को किसी भी प्रकार न मिले।"

श्लोक 4 (ayodhya.9.4)

एवमुक्ता तु सा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी । रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ 9.4 ॥

evamuktā tu sā devyā mantharā pāpadarśinī | rāmārthamupahiṃsantī kaikeyīmidamabravīt

रानी के इस प्रकार कहने पर कुटिल-दृष्टि मन्थरा, राम के हित को नष्ट करने की मंशा से, कैकेयी से यह बोली —

श्लोक 5 (ayodhya.9.5)

हन्तेदानीं प्रपश्य त्वं कैकेयि श्रूयतां वचः । यथा ते भरतो राज्यं पुत्रः प्राप्स्यति केवलम् ॥ 9.5 ॥

hantedānīṃ prapaśya tvaṃ kaikeyi śrūyatāṃ vacaḥ | yathā te bharato rājyaṃ putraḥ prāpsyati kevalam

"अहा! अब ध्यान से सुनो, हे कैकेयी — मेरी यह बात सुनो कि किस प्रकार तुम्हारा पुत्र भरत ही अकेला राज्य को प्राप्त करेगा।"

श्लोक 6 (ayodhya.9.6)

किं न स्मरसि कैकेयि स्मरन्ती वा निगूहसे । यदुच्यमानमात्मार्थं मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥ 9.6 ॥

kiṃ na smarasi kaikeyi smarantī vā nigūhase | yaducyamānamātmārthaṃ mattastvaṃ śrotumicchasi

"हे कैकेयी, क्या तुम्हें वह बात स्मरण नहीं, जिसे तुम अपने हित के लिए मुझसे सुनना चाहती हो — या स्मरण होते हुए भी उसे छिपा रही हो?"

श्लोक 7 (ayodhya.9.7)

मयोच्यमानं यदि ते श्रोतुं छन्दो विलासिनि । श्रूयतामभिधास्यामि श्रुत्वा चैतद् विधीयताम् ॥ 9.7 ॥

mayocyamānaṃ yadi te śrotuṃ chando vilāsini | śrūyatāmabhidhāsyāmi śrutvā caitad vidhīyatām

"हे विलासिनी, यदि तुम्हें मुझसे यह बात सुनने की इच्छा हो, तो सुनो — मैं कहती हूँ; और सुनकर उसका पालन करना।"

श्लोक 8 (ayodhya.9.8)

श्रुत्वैवं वचनं तस्या मन्थरायास्तु कैकयी । किंचिदुत्थाय शयनात् स्वास्तीर्णादिदमब्रवीत् ॥ 9.8 ॥

śrutvaivaṃ vacanaṃ tasyā mantharāyāstu kaikayī | kiṃcidutthāya śayanāt svāstīrṇādidamabravīt

मन्थरा के ये वचन सुनकर कैकेयी अपनी सुसज्जित शय्या से कुछ उठ बैठीं, और यह बोलीं —

श्लोक 9 (ayodhya.9.9)

कथयस्व ममोपायं केनोपायेन मन्थरे । भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन ॥ 9.9 ॥

kathayasva mamopāyaṃ kenopāyena manthare | bharataḥ prāpnuyād rājyaṃ na tu rāmaḥ kathaṃcana

"हे मन्थरे, मुझे वह उपाय बताओ — जिससे भरत को राज्य मिले और राम को किसी भी प्रकार न मिले।"

श्लोक 10 (ayodhya.9.10)

एवमुक्ता तदा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी । रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ 9.10 ॥

evamuktā tadā devyā mantharā pāpadarśinī | rāmārthamupahiṃsantī kaikeyīmidamabravīt

रानी के इस प्रकार पुनः पूछने पर कुटिल-दृष्टि मन्थरा, राम के हित को नष्ट करने की मंशा से, कैकेयी से यह बोली —

श्लोक 11 (ayodhya.9.11)

पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः । अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत् ॥ 9.11 ॥

purā devāsure yuddhe saha rājarṣibhiḥ patiḥ | agacchat tvāmupādāya devarājasya sāhyakṛt

"बहुत पहले, देवासुर-संग्राम में तुम्हारे पति तुम्हें साथ लेकर राजर्षियों के साथ देवराज इन्द्र की सहायता के लिए गए थे,

श्लोक 12 (ayodhya.9.12)

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति । वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः ॥ 9.12 ॥

diśamāsthāya kaikeyi dakṣiṇāṃ daṇḍakān prati | vaijayantamiti khyātaṃ puraṃ yatra timidhvajaḥ

दक्षिण दिशा की ओर, दण्डकारण्य के मार्ग से, वैजयन्त नामक उस प्रसिद्ध नगर की ओर, जहाँ तिमिध्वज रहता था।

श्लोक 13 (ayodhya.9.13)

स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः । ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसङ्घैरनिर्जितः ॥ 9.13 ॥

sa śambara iti khyātaḥ śatamāyo mahāsuraḥ | dadau śakrasya saṃgrāmaṃ devasaṅghairanirjitaḥ

शम्बर नाम से प्रसिद्ध वह महान् असुर, जो सैकड़ों मायाओं का स्वामी था और देव-समूहों से भी अपराजित था, इन्द्र से युद्ध करने लगा।

श्लोक 14 (ayodhya.9.14)

तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान् । रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः ॥ 9.14 ॥

tasmin mahati saṃgrāme puruṣān kṣatavikṣatān | rātrau prasuptān ghnanti sma tarasāpāsya rākṣasāḥ

उस महासंग्राम में राक्षस लोग बलपूर्वक झपटकर घायल हुए तथा रात्रि में सोए हुए पुरुषों का भी वध कर देते थे।

श्लोक 15 (ayodhya.9.15)

तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा । असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥ 9.15 ॥

tatrākaronmahāyuddhaṃ rājā daśarathastadā | asuraiśca mahābāhuḥ śastraiśca śakalīkṛtaḥ

वहाँ राजा दशरथ ने उस समय एक महान् युद्ध किया, और महाबाहु दशरथ असुरों के शस्त्रों से घायल होकर छिन्न-भिन्न हो गए।

श्लोक 16 (ayodhya.9.16)

अपवाह्य त्वया देवि संग्रामान्नष्टचेतनः । तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥ 9.16 ॥

apavāhya tvayā devi saṃgrāmānnaṣṭacetanaḥ | tatrāpi vikṣataḥ śastraiḥ patiste rakṣitastvayā

हे देवी, तुमने ही उन्हें संज्ञाहीन अवस्था में युद्धभूमि से हटाकर बचाया था; और वहाँ भी शस्त्रों से घायल तुम्हारे पति की रक्षा तुमने ही की थी।

श्लोक 17 (ayodhya.9.17)

तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने । स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम् ॥ 9.17 ॥

tuṣṭena tena dattau te dvau varau śubhadarśane | sa tvayoktaḥ patirdevi yadeccheyaṃ tadā varam

हे शुभदर्शने, उस समय प्रसन्न होकर उन्होंने तुम्हें दो वरदान दिए थे; और हे देवी, तुमने अपने पति से कहा था, 'जब मैं चाहूँगी, तब यह वरदान माँग लूँगी।'

श्लोक 18 (ayodhya.9.18)

गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना । अनभिज्ञा ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा ॥ 9.18 ॥

gṛhṇīyāṃ tu tadā bhartastathetyuktaṃ mahātmanā | anabhijñā hyahaṃ devi tvayaiva kathitaṃ purā

'हे स्वामी, तब मैं उन्हें ले लूँगी' — और उन महात्मा राजा ने कहा था, 'ऐसा ही हो।' हे देवी, मुझे तो इसकी कोई जानकारी न थी; यह तो तुमने ही मुझे पहले बताया था।

श्लोक 19 (ayodhya.9.19)

कथैषा तव तु स्नेहान्मनसा धार्यते मया । रामाभिषेकसम्भारान्निगृह्य विनिवर्तय ॥ 9.19 ॥

kathaiṣā tava tu snehānmanasā dhāryate mayā | rāmābhiṣekasambhārānnigṛhya vinivartaya

तुम्हारी यह बात मैंने केवल स्नेहवश अपने मन में धारण कर रखी थी। अतः अब तुम बलपूर्वक राम के अभिषेक की इन तैयारियों को रोककर पलट दो।

श्लोक 20 (ayodhya.9.20)

तौ च याचस्व भर्तारं भरतस्याभिषेचनम् । प्रव्राजनं च रामस्य वर्षाणि च चतुर्दश ॥ 9.20 ॥

tau ca yācasva bhartāraṃ bharatasyābhiṣecanam | pravrājanaṃ ca rāmasya varṣāṇi ca caturdaśa

और अपने पति से वे दोनों वरदान माँग लो — भरत का अभिषेक, और राम का चौदह वर्षों के लिए वनवास।

श्लोक 21 (ayodhya.9.21)

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम् । प्रजाभावगतस्नेहः स्थिरः पुत्रो भविष्यति ॥ 9.21 ॥

caturdaśa hi varṣāṇi rāme pravrājite vanam | prajābhāvagatasnehaḥ sthiraḥ putro bhaviṣyati

क्योंकि यदि राम चौदह वर्षों के लिए वन भेज दिए जाएँ, तो तुम्हारे पुत्र का प्रजा के हृदयों में स्नेह दृढ़ हो जाएगा।

श्लोक 22 (ayodhya.9.22)

क्रोधागारं प्रविश्याद्य क्रुद्धेवाश्वपतेः सुते । शेष्वानन्तर्हितायां त्वं भूमौ मलिनवासिनी ॥ 9.22 ॥

krodhāgāraṃ praviśyādya kruddhevāśvapateḥ sute | śeṣvānantarhitāyāṃ tvaṃ bhūmau malinavāsinī

हे अश्वपति-पुत्री, आज ही तुम क्रोध-गृह में प्रवेश करो, मानो सचमुच क्रुद्ध हो, और मैले वस्त्र पहनकर बिना बिछावन की नंगी भूमि पर लेट जाओ।

श्लोक 23 (ayodhya.9.23)

मा स्मैनं प्रत्युदीक्षेथा मा चैनमभिभाषथाः । रुदन्ती पार्थिवं दृष्ट्वा जगत्यां शोकलालसा ॥ 9.23 ॥

mā smainaṃ pratyudīkṣethā mā cainamabhibhāṣathāḥ | rudantī pārthivaṃ dṛṣṭvā jagatyāṃ śokalālasā

राजा को देखते ही रोती रहना, शोक में डूबी रहना, धरती पर पड़ी रहना — न तो उनकी ओर देखना, न ही उनसे कुछ बोलना।

श्लोक 24 (ayodhya.9.24)

दयिता त्वं सदा भर्तुरत्र मे नास्ति संशयः । त्वत्कृते च महाराजो विशेदपि हुताशनम् ॥ 9.24 ॥

dayitā tvaṃ sadā bharturatra me nāsti saṃśayaḥ | tvatkṛte ca mahārājo viśedapi hutāśanam

तुम अपने पति की सदा से प्रियतमा हो — इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं। तुम्हारे लिए तो महाराज प्रज्वलित अग्नि में भी प्रवेश कर सकते हैं।"

श्लोक 25 (ayodhya.9.25)

न त्वां क्रोधयितुं शक्तो न क्रुद्धां प्रत्युदीक्षितुम् । तव प्रियार्थं राजा तु प्राणानपि परित्यजेत् ॥ 9.25 ॥

na tvāṃ krodhayituṃ śakto na kruddhāṃ pratyudīkṣitum | tava priyārthaṃ rājā tu prāṇānapi parityajet

"वे न तो तुम्हें क्रोधित कर सकते हैं, और न ही क्रुद्ध तुम्हें देख सकते हैं; तुम्हारे प्रेम के लिए राजा तो अपने प्राण तक त्याग सकते हैं।"

श्लोक 26 (ayodhya.9.26)

न ह्यतिक्रमितुं शक्तस्तव वाक्यं महीपतिः । मन्दस्वभावे बुध्यस्व सौभाग्यबलमात्मनः ॥ 9.26 ॥

na hyatikramituṃ śaktastava vākyaṃ mahīpatiḥ | mandasvabhāve budhyasva saubhāgyabalamātmanaḥ

"राजा तुम्हारी बात को टाल ही नहीं सकते। हे भोली रानी, अपने सौभाग्य के इस बल को तो पहचानो!"

श्लोक 27 (ayodhya.9.27)

मणिमुक्तासुवर्णानि रत्नानि विविधानि च । दद्याद् दशरथो राजा मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥ 9.27 ॥

maṇimuktāsuvarṇāni ratnāni vividhāni ca | dadyād daśaratho rājā mā sma teṣu manaḥ kṛthāḥ

"राजा दशरथ तुम्हें मणि, मोती, स्वर्ण तथा नाना प्रकार के रत्न देने का प्रयत्न करेंगे — तुम उनमें मन मत लगाना।"

श्लोक 28 (ayodhya.9.28)

यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ । तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वा क्रमेदति ॥ 9.28 ॥

yau tau devāsure yuddhe varau daśaratho dadau | tau smāraya mahābhāge so'rtho na tvā kramedati

"हे महाभागे, देवासुर-संग्राम में दशरथ ने जो वे दो वरदान दिए थे, उन्हीं का स्मरण कराओ — यह अवसर तुम्हारे हाथ से न निकलने पाए।"

श्लोक 29 (ayodhya.9.29)

यदा तु ते वरं दद्यात् स्वयमुत्थाप्य राघवः । व्यवस्थाप्य महाराजं त्वमिमं वृणुया वरम् ॥ 9.29 ॥

yadā tu te varaṃ dadyāt svayamutthāpya rāghavaḥ | vyavasthāpya mahārājaṃ tvamimaṃ vṛṇuyā varam

"और जब राघव स्वयं तुम्हें उठाकर वरदान देने को कहें, तो महाराज को दृढ़तापूर्वक वचनबद्ध करके तुम यह वरदान माँगना —

श्लोक 30 (ayodhya.9.30)

रामप्रव्रजनं दूरं नव वर्षाणि पञ्च च । भरतः क्रियतां राजा पृथिव्यां पार्थिवर्षभ ॥ 9.30 ॥

rāmapravrajanaṃ dūraṃ nava varṣāṇi pañca ca | bharataḥ kriyatāṃ rājā pṛthivyāṃ pārthivarṣabha

'हे राजश्रेष्ठ, राम को दूर वनवास में नौ और पाँच — अर्थात् चौदह वर्षों के लिए भेज दिया जाए, और इस पृथ्वी पर भरत को राजा बनाया जाए।'"

श्लोक 31 (ayodhya.9.31)

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम् । रूढश्च कृतमूलश्च शेषं स्थास्यति ते सुतः ॥ 9.31 ॥

caturdaśa hi varṣāṇi rāme pravrājite vanam | rūḍhaśca kṛtamūlaśca śeṣaṃ sthāsyati te sutaḥ

"क्योंकि राम के चौदह वर्षों तक वन में रहने पर तुम्हारा पुत्र दृढ़मूल होकर स्थापित हो जाएगा और शेष समय तक वैसा ही बना रहेगा।"

श्लोक 32 (ayodhya.9.32)

रामप्रव्राजनं चैव देवि याचस्व तं वरम् । एवं सेत्स्यन्ति पुत्रस्य सर्वार्थास्तव कामिनि ॥ 9.32 ॥

rāmapravrājanaṃ caiva devi yācasva taṃ varam | evaṃ setsyanti putrasya sarvārthāstava kāmini

"अतः हे देवी, तुम राम के वनवास का ही यह वरदान माँगो। हे प्रिये, ऐसा करने से तुम्हारे पुत्र के सभी प्रयोजन सिद्ध हो जाएँगे।"

श्लोक 33 (ayodhya.9.33)

एवं प्रव्राजितश्चैव रामोऽरामो भविष्यति । भरतश्च गतामित्रस्तव राजा भविष्यति ॥ 9.33 ॥

evaṃ pravrājitaścaiva rāmo'rāmo bhaviṣyati | bharataśca gatāmitrastava rājā bhaviṣyati

"इस प्रकार वनवासी हुए राम अब लोगों को अप्रिय हो जाएँगे; और तुम्हारे भरत, शत्रुओं के समाप्त हो जाने पर, राजा बन जाएँगे।"

श्लोक 34 (ayodhya.9.34)

येन कालेन रामश्च वनात् प्रत्यागमिष्यति । अन्तर्बहिश्च पुत्रस्ते कृतमूलो भविष्यति ॥ 9.34 ॥

yena kālena rāmaśca vanāt pratyāgamiṣyati | antarbahiśca putraste kṛtamūlo bhaviṣyati

"जब तक राम वन से लौटेंगे, तब तक तुम्हारा पुत्र भीतर और बाहर दोनों ही ओर से अपनी जड़ें जमा चुका होगा।"

श्लोक 35 (ayodhya.9.35)

संगृहीतमनुष्यश्च सुहृद्भिः साकमात्मवान् । प्राप्तकालं नु मन्येऽहं राजानं वीतसाध्वसा ॥ 9.35 ॥

saṃgṛhītamanuṣyaśca suhṛdbhiḥ sākamātmavān | prāptakālaṃ nu manye'haṃ rājānaṃ vītasādhvasā

"अपने अनुकूल लोगों तथा मित्रों को साथ लेकर विवेकपूर्वक — मुझे लगता है कि यही उचित समय है; अतः निर्भय होकर राजा को इस निश्चय से विमुख कर दो।"

श्लोक 36 (ayodhya.9.36)

रामाभिषेकसंकल्पान्निगृह्य विनिवर्तय । अनर्थमर्थरूपेण ग्राहिता सा ततस्तया ॥ 9.36 ॥

rāmābhiṣekasaṃkalpānnigṛhya vinivartaya | anarthamartharūpeṇa grāhitā sā tatastayā

"राम के अभिषेक के इस संकल्प को बलपूर्वक रोककर पलट दो।" इस प्रकार मन्थरा ने कैकेयी को अनर्थ को ही अर्थ का रूप देकर ग्रहण करा दिया।

श्लोक 37 (ayodhya.9.37)

हृष्टा प्रतीता कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत् । सा हि वाक्येन कुब्जायाः किशोरीवोत्पथं गता ॥ 9.37 ॥

hṛṣṭā pratītā kaikeyī mantharāmidamabravīt | sā hi vākyena kubjāyāḥ kiśorīvotpathaṃ gatā

प्रसन्न एवं आश्वस्त होकर कैकेयी मन्थरा से यह बोलीं — क्योंकि उस कुबड़ी की बातों से वे भी, मानो एक भोली बालिका के समान, कुमार्ग पर जा पड़ी थीं।

श्लोक 38 (ayodhya.9.38)

कैकेयी विस्मयं प्राप्य परं परमदर्शना । प्रज्ञां ते नावजानामि श्रेष्ठे श्रेष्ठाभिधायिनि ॥ 9.38 ॥

kaikeyī vismayaṃ prāpya paraṃ paramadarśanā | prajñāṃ te nāvajānāmi śreṣṭhe śreṣṭhābhidhāyini

सुन्दर मुख वाली कैकेयी अत्यंत विस्मित होकर बोलीं, "हे श्रेष्ठे, हे श्रेष्ठ वचन कहने वाली, मैंने तुम्हारी बुद्धि को अब तक पहचाना ही नहीं था।

श्लोक 39 (ayodhya.9.39)

पृथिव्यामसि कुब्जानामुत्तमा बुद्धिनिश्चये । त्वमेव तु ममार्थेषु नित्ययुक्ता हितैषिणी ॥ 9.39 ॥

pṛthivyāmasi kubjānāmuttamā buddhiniścaye | tvameva tu mamārtheṣu nityayuktā hitaiṣiṇī

तुम इस पृथ्वी की समस्त कुबड़ी स्त्रियों में बुद्धि-निश्चय में सर्वश्रेष्ठ हो; तुम ही सदा मेरे हित में लगी रहने वाली, मेरी सच्ची शुभचिन्तक हो।"

श्लोक 40 (ayodhya.9.40)

नाहं समवबुद्ध्येयं कुब्जे राज्ञश्चिकीर्षितम् । सन्ति दुःसंस्थिताः कुब्जाः वक्राः परमपापिकाः ॥ 9.40 ॥

nāhaṃ samavabuddhyeyaṃ kubje rājñaścikīrṣitam | santi duḥsaṃsthitāḥ kubjāḥ vakrāḥ paramapāpikāḥ

"हे कुबड़ी, तुम्हारे बिना मैं राजा की मंशा को कभी नहीं समझ पाती। कुबड़ी स्त्रियाँ तो प्रायः विकृत शरीर वाली, टेढ़ी और अत्यंत दुष्ट होती हैं —

श्लोक 41 (ayodhya.9.41)

त्वं पद्ममिव वातेन संनता प्रियदर्शना । उरस्तेऽभिनिविष्टं वै यावत् स्कन्धात् समुन्नतम् ॥ 9.41 ॥

tvaṃ padmamiva vātena saṃnatā priyadarśanā | uraste'bhiniviṣṭaṃ vai yāvat skandhāt samunnatam

परन्तु तुम तो वायु से झुके हुए कमल के समान मनोहर हो। तुम्हारा वक्षस्थल भरा-पूरा है और कंधों तक समान रूप से उन्नत है।

श्लोक 42 (ayodhya.9.42)

अधस्ताच्चोदरं शान्तं सुनाभमिव लज्जितम् । प्रतिपूर्णं च जघनं सुपीनौ च पयोधरौ ॥ 9.42 ॥

adhastāccodaraṃ śāntaṃ sunābhamiva lajjitam | pratipūrṇaṃ ca jaghanaṃ supīnau ca payodharau

उसके नीचे तुम्हारा उदर शान्त और सुगठित नाभि वाला है, मानो लज्जावश छिपा हो; तुम्हारे नितम्ब भरे हुए और स्तन सुडौल तथा भरे हुए हैं।

श्लोक 43 (ayodhya.9.43)

विमलेन्दुसमं वक्त्रमहो राजसि मन्थरे । जघनं तव निर्मृष्टं रशनादामभूषितम् ॥ 9.43 ॥

vimalendusamaṃ vaktramaho rājasi manthare | jaghanaṃ tava nirmṛṣṭaṃ raśanādāmabhūṣitam

तुम्हारा मुख निर्मल चन्द्रमा के समान है — अहा, मन्थरे, तुम कैसी शोभायमान हो! तुम्हारी कटि सुडौल है और करधनी की माला से सुशोभित है।

श्लोक 44 (ayodhya.9.44)

जङ्घे भृशमुपन्यस्ते पादौ च व्यायतावुभौ । त्वमायताभ्यां सक्थिभ्यां मन्थरे क्षौमवासिनी ॥ 9.44 ॥

jaṅghe bhṛśamupanyaste pādau ca vyāyatāvubhau | tvamāyatābhyāṃ sakthibhyāṃ manthare kṣaumavāsinī

तुम्हारी पिंडलियाँ सुडौल हैं, और दोनों पैर लम्बे तथा सुगठित हैं; और हे मन्थरे, अपनी लम्बी जंघाओं के साथ रेशमी वस्त्र पहने हुए —

श्लोक 45 (ayodhya.9.45)

अग्रतो मम गच्छन्ती राजसेऽतीव शोभने । आसन् याः शम्बरे मायाः सहस्रम् असुराधिपे ॥ 9.45 ॥

agrato mama gacchantī rājase'tīva śobhane | āsan yāḥ śambare māyāḥ sahasram asurādhipe

— मेरे आगे-आगे चलती हुई तुम अत्यंत शोभायमान लगती हो, हे सुन्दरी! जो सहस्रों मायाएँ असुराधिपति शम्बर में थीं —

श्लोक 46 (ayodhya.9.46)

हृदये ते निविष्टास् ता भूयश् चान्याः सहस्रशः । तदेव स्थगु यद् दीर्घं रथ-घोणम् इवायतम् ॥ 9.46 ॥

hṛdaye te niviṣṭās tā bhūyaś cānyāḥ sahasraśaḥ | tadeva sthagu yad dīrghaṃ ratha-ghoṇam ivāyatam

— वे सब, और उनसे भी अधिक हज़ारों माया-शक्तियाँ, अब तुम्हारे हृदय में निवास करती हैं; और तुम्हारा यह लम्बा कूबड़, जो रथ के ईषा-दण्ड के समान फैला हुआ है,

श्लोक 47 (ayodhya.9.47)

मतयः क्षत्र-विद्याश् च मायाश्चात्र वसन्ति ते । अत्र तेऽहं प्रमोक्ष्यामि मालां कुब्जे हिरण्मयीम् ॥ 9.47 ॥

matayaḥ kṣatra-vidyāś ca māyāścātra vasanti te | atra te'haṃ pramokṣyāmi mālāṃ kubje hiraṇmayīm

— इसी में तुम्हारी बुद्धि, राजनीति-कुशलता और माया-शक्तियाँ निवास करती हैं! हे कुबड़ी, इसी पर मैं स्वयं एक स्वर्ण-माला पहनाऊँगी।

श्लोक 48 (ayodhya.9.48)

अभिषिक्ते च भरते राघवे च वनं गते । जात्येन च सुवर्णेन सुनिष्टप्तेन सुन्दरि ॥ 9.48 ॥

abhiṣikte ca bharate rāghave ca vanaṃ gate | jātyena ca suvarṇena suniṣṭaptena sundari

"जब भरत का अभिषेक हो जाएगा और राघव वन को चले जाएँगे, हे सुन्दरी, तब उत्तम कोटि के भलीभाँति तपाए गए स्वर्ण से —

श्लोक 49 (ayodhya.9.49)

लब्धार्था च प्रतीता च लेपयिष्यामि ते स्थगु । मुखे च तिलकं चित्रं जातरूपमयं शुभम् ॥ 9.49 ॥

labdhārthā ca pratītā ca lepayiṣyāmi te sthagu | mukhe ca tilakaṃ citraṃ jātarūpamayaṃ śubham

— अपना प्रयोजन सिद्ध होने पर, प्रसन्नचित्त होकर, मैं तुम्हारे कूबड़ पर स्वर्ण मढ़वाऊँगी और तुम्हारे मस्तक पर शुद्ध स्वर्ण का एक सुन्दर, विचित्र तिलक लगवाऊँगी।

श्लोक 50 (ayodhya.9.50)

कारयिष्यामि ते कुब्जे शुभान्याभरणानि च । परिधाय शुभे वस्त्रे देवतेव चरिष्यसि ॥ 9.50 ॥

kārayiṣyāmi te kubje śubhānyābharaṇāni ca | paridhāya śubhe vastre devateva cariṣyasi

हे कुबड़ी, मैं तुम्हारे लिए सुन्दर आभूषण भी बनवाऊँगी। सुन्दर वस्त्र धारण करके तुम एक देवी के समान विचरण करोगी।

श्लोक 51 (ayodhya.9.51)

चन्द्रमाह्वयमानेन मुखेनाप्रतिमानना । गमिष्यसि गतिं मुख्यां गर्वयन्ती द्विषज्जने ॥ 9.51 ॥

candramāhvayamānena mukhenāpratimānanā | gamiṣyasi gatiṃ mukhyāṃ garvayantī dviṣajjane

चन्द्रमा को मानो चुनौती देते हुए मुख से, हे अनुपम सुन्दरी, तुम शत्रुओं के समक्ष गर्व से सर्वश्रेष्ठ चाल से चलोगी।

श्लोक 52 (ayodhya.9.52)

तवापि कुब्जाः कुब्जायाः सर्वाभरणभूषिताः । पादौ परिचरिष्यन्ति यथैव त्वं सदा मम ॥ 9.52 ॥

tavāpi kubjāḥ kubjāyāḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ | pādau paricariṣyanti yathaiva tvaṃ sadā mama

और हे कुबड़ी, दूसरी कुबड़ी स्त्रियाँ भी सर्व-आभूषणों से सजी हुई तुम्हारे चरणों की सेवा करेंगी, जैसे तुम सदा मेरे चरणों की सेवा करती आई हो।"

श्लोक 53 (ayodhya.9.53)

इति प्रशस्यमाना सा कैकेयीमिदमब्रवीत् । शयानां शयने शुभ्रे वेद्यामग्निशिखामिव ॥ 9.53 ॥

iti praśasyamānā sā kaikeyīmidamabravīt | śayānāṃ śayane śubhre vedyāmagniśikhāmiva

इस प्रकार प्रशंसित होकर मन्थरा उस उज्ज्वल शय्या पर लेटी हुई कैकेयी से — जो मानो वेदी पर अग्नि की लपट के समान प्रतीत हो रही थीं — यह बोली —

श्लोक 54 (ayodhya.9.54)

गतोदके सेतुबन्धो न कल्याणि विधीयते । उत्तिष्ठ कुरु कल्याणं राजानमनुदर्शय ॥ 9.54 ॥

gatodake setubandho na kalyāṇi vidhīyate | uttiṣṭha kuru kalyāṇaṃ rājānamanudarśaya

"हे कल्याणी, जल के बह जाने के बाद बाँध बाँधना व्यर्थ है। उठो, अपना हित साधो, और राजा को अपना प्रभाव दिखाओ!"

श्लोक 55 (ayodhya.9.55)

तथा प्रोत्साहिता देवी गत्वा मन्थरया सह । क्रोधागारं विशालाक्षी सौभाग्यमदगर्विता ॥ 9.55 ॥

tathā protsāhitā devī gatvā mantharayā saha | krodhāgāraṃ viśālākṣī saubhāgyamadagarvitā

इस प्रकार उत्साहित होकर विशाल नेत्रों वाली रानी कैकेयी, अपने सौभाग्य के मद में गर्वित होकर, मन्थरा के साथ क्रोध-गृह की ओर चल पड़ीं;

श्लोक 56 (ayodhya.9.56)

अनेकशतसाहस्रं मुक्ताहारं वराङ्गना । अवमुच्य वरार्हाणि शुभान्याभरणानि च ॥ 9.56 ॥

anekaśatasāhasraṃ muktāhāraṃ varāṅganā | avamucya varārhāṇi śubhānyābharaṇāni ca

और उस सुन्दरी ने अनेक लाख मूल्य वाला मोतियों का हार तथा अन्य बहुमूल्य एवं शुभ आभूषण उतार दिए,

श्लोक 57 (ayodhya.9.57)

तदा हेमोपमा तत्र कुब्जावाक्यवशंगता । संविश्य भूमौ कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत् ॥ 9.57 ॥

tadā hemopamā tatra kubjāvākyavaśaṃgatā | saṃviśya bhūmau kaikeyī mantharāmidamabravīt

और सोने के समान कान्तिमती वह कैकेयी, उस कुबड़ी के वचनों के पूर्ण वशीभूत होकर, वहाँ भूमि पर लेट गईं, तथा मन्थरा से यह बोलीं —

श्लोक 58 (ayodhya.9.58)

इह वा मां मृतां कुब्जे नृपायावेदयिष्यसि । वनं तु राघवे प्राप्ते भरतः प्राप्स्यते क्षितिम् ॥ 9.58 ॥

iha vā māṃ mṛtāṃ kubje nṛpāyāvedayiṣyasi | vanaṃ tu rāghave prāpte bharataḥ prāpsyate kṣitim

"हे कुबड़ी, या तो तुम राजा से जाकर कह देना कि मैं यहाँ मृत पड़ी हूँ; या फिर राघव के वन चले जाने पर ही भरत इस पृथ्वी को प्राप्त करेंगे।"

श्लोक 59 (ayodhya.9.59)

सुवर्णेन न मे ह्यर्थो न रत्नैर्न च भोजनैः । एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते ॥ 9.59 ॥

suvarṇena na me hyartho na ratnairna ca bhojanaiḥ | eṣa me jīvitasyānto rāmo yadyabhiṣicyate

"मुझे न तो स्वर्ण से प्रयोजन है, न रत्नों से, न भोजन से। यदि राम का अभिषेक हो गया, तो यही मेरे जीवन का अन्त होगा।"

श्लोक 60 (ayodhya.9.60)

ततः पुनस्तां महिषीं महीक्षितो वचोभिरत्यर्थमहापराक्रमैः । उवाच कुब्जा भरतस्य मातरं हितं वचो राममुपेत्य चाहितम् ॥ 9.60 ॥

tataḥ punastāṃ mahiṣīṃ mahīkṣito vacobhiratyarthamahāparākramaiḥ | uvāca kubjā bharatasya mātaraṃ hitaṃ vaco rāmamupetya cāhitam

तब कुबड़ी ने उस महारानी, भरत की माता, से पुनः अत्यंत सशक्त वचनों में कहा — ऐसे वचन, जो उनके लिए हितकर थे, परन्तु राम के प्रति अहितकर।

श्लोक 61 (ayodhya.9.61)

प्रपत्स्यते राज्यमिदं हि राघवो यदि ध्रुवं त्वं ससुता च तप्स्यसे । ततो हि कल्याणि यतस्व तत् तथा यथा सुतस्ते भरतोऽभिषेक्ष्यते ॥ 9.61 ॥

prapatsyate rājyamidaṃ hi rāghavo yadi dhruvaṃ tvaṃ sasutā ca tapsyase | tato hi kalyāṇi yatasva tat tathā yathā sutaste bharato'bhiṣekṣyate

"यदि राघव को यह राज्य मिल गया, तो तुम अपने पुत्र सहित निश्चय ही दुःख भोगोगी। अतः हे कल्याणी, पूरा प्रयास करो कि तुम्हारा पुत्र भरत ही अभिषिक्त हो।"

श्लोक 62 (ayodhya.9.62)

तथातिविद्धा महिषीति कुब्जया समाहता वागिषुभिर्मुहुर्मुहुः । विधाय हस्तौ हृदयेऽतिविस्मिता शशंस कुब्जां कुपिता पुनः पुनः ॥ 9.62 ॥

tathātividdhā mahiṣīti kubjayā samāhatā vāgiṣubhirmuhurmuhuḥ | vidhāya hastau hṛdaye'tivismitā śaśaṃsa kubjāṃ kupitā punaḥ punaḥ

इस प्रकार कुबड़ी के वाग्बाणों से बार-बार बिंधी हुई वह महारानी अत्यंत विचलित हो उठीं; हाथ हृदय पर रखकर, भीतर से क्रुद्ध होते हुए भी, वे बार-बार उस कुबड़ी की प्रशंसा करने लगीं।

श्लोक 63 (ayodhya.9.63)

यमस्य वा मां विषयं गतामितो निशम्य कुब्जे प्रतिवेदयिष्यसि । वनं गते वा सुचिराय राघवे समृद्धकामो भरतो भविष्यति ॥ 9.63 ॥

yamasya vā māṃ viṣayaṃ gatāmito niśamya kubje prativedayiṣyasi | vanaṃ gate vā sucirāya rāghave samṛddhakāmo bharato bhaviṣyati

"हे कुबड़ी, या तो यह जानकर कि मैं यहाँ से यमलोक को चली गई हूँ, तुम यह समाचार दे देना — या फिर राघव के दीर्घकाल तक वन चले जाने पर भरत की सभी कामनाएँ सिद्ध होंगी।"

श्लोक 64 (ayodhya.9.64)

अहं हि नैवास्तरणानि न स्रजो न चन्दनं नाञ्जनपानभोजनम् । न किंचिदिच्छामि न चेह जीवनं न चेदितो गच्छति राघवो वनम् ॥ 9.64 ॥

ahaṃ hi naivāstaraṇāni na srajo na candanaṃ nāñjanapānabhojanam | na kiṃcidicchāmi na ceha jīvanaṃ na cedito gacchati rāghavo vanam

"मुझे न तो बिछौने चाहिए, न माला, न चन्दन, न अंजन, न पान-भोजन — मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, यहाँ तक कि जीवन भी नहीं, यदि राघव यहाँ से वन को न जाएँ।"

श्लोक 65 (ayodhya.9.65)

अथैवमुक्त्वा वचनं सुदारुणं निधाय सर्वाभरणानि भामिनी । असंस्कृतामास्तरणेन मेदिनीं तदाधिशिश्ये पतितेव किंनरी ॥ 9.65 ॥

athaivamuktvā vacanaṃ sudāruṇaṃ nidhāya sarvābharaṇāni bhāminī | asaṃskṛtāmāstaraṇena medinīṃ tadādhiśiśye patiteva kiṃnarī

यह अत्यंत कठोर वचन कहकर उस मानिनी रानी ने अपने सभी आभूषण उतार दिए, और बिना बिछावन की नंगी भूमि पर, मानो गिरी हुई किन्नरी के समान, लेट गईं।

श्लोक 66 (ayodhya.9.66)

उदीर्णसंरम्भतमोवृतानना तदावमुक्तोत्तममाल्यभूषणा । नरेन्द्रपत्नी विमना बभूव सा तमोवृता द्यौरिव मग्नतारका ॥ 9.66 ॥

udīrṇasaṃrambhatamovṛtānanā tadāvamuktottamamālyabhūṣaṇā | narendrapatnī vimanā babhūva sā tamovṛtā dyauriva magnatārakā

उठते हुए क्रोध के अंधकार से आच्छादित मुख वाली, अपनी सुन्दर माला और आभूषणों को उतार चुकी वह राजपत्नी अत्यंत उदास हो उठीं, मानो अंधकार से घिरा और तारों से रहित आकाश हो।

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