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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 60

सुमन्त्र द्वारा कौसल्या को सांत्वना

सर्ग 59सर्ग-सूचीसर्ग 61

श्लोक 1 (ayodhya.60.1)

ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुनः पुनः। धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत्॥ २-६०-१ ॥

tato bhūtopasṛṣṭeva vepamānā punaḥ punaḥ| dharaṇyāṃ gatasattveva kausalyā sūtam abravīt

तब मानो भूत-ग्रस्त हों, इस प्रकार बार-बार काँपती हुई, और मानो चेतनाशून्य होकर भूमि पर पड़ी कौसल्या ने सुमन्त्र से कहा।

श्लोक 2 (ayodhya.60.2)

नय मां यत्र काकुत्स्थः सीता यत्र च लक्ष्मणः। तान्विना क्षणमप्यत्र जीवितुं नोत्सहे ह्यहम्॥ २-६०-२ ॥

naya māṃ yatra kākutsthaḥ sītā yatra ca lakṣmaṇaḥ| tān vinā kṣaṇam apy atra jīvituṃ notsahe hy aham

"मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ काकुत्स्थ राम, सीता और लक्ष्मण हैं; उनके बिना यहाँ मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती।"

श्लोक 3 (ayodhya.60.3)

निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान्नय मामपि। अथ तान्नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम्॥ २-६०-३ ॥

nivartaya rathaṃ śīghraṃ daṇḍakān naya mām api| atha tān nānugacchāmi gamiṣyāmi yamakṣayam

"रथ को तुरन्त मोड़ो और मुझे भी दण्डक वन ले चलो; यदि मैं उनके पास नहीं जा सकी, तो मैं यमलोक चली जाऊँगी।"

श्लोक 4 (ayodhya.60.4)

बाष्पवेगोपहतया स वाचा सज्जमानया। इदमाश्वासयन् देवीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ २-६०-४ ॥

bāṣpavegopahatayā sa vācā sajjamānayā| idam āśvāsayan devīṃ sūtaḥ prāñjalir abravīt

आँसुओं के वेग से रुँधी, काँपती वाणी में, हाथ जोड़े हुए सुमन्त्र ने देवी को सांत्वना देते हुए यह कहा।

श्लोक 5 (ayodhya.60.5)

त्यज शोकं च मोहं च संभ्रमं दुःखजं तथा। व्यवधूय च संतापं वने वत्स्यति राघवः॥ २-६०-५ ॥

tyaja śokaṃ ca mohaṃ ca saṃbhramaṃ duḥkhajaṃ tathā| vyavadhūya ca saṃtāpaṃ vane vatsyati rāghavaḥ

"शोक, मोह और दुःख से उत्पन्न घबराहट त्याग दीजिए; राघव अपनी पीड़ा को दूर कर वन में सानन्द रह लेंगे।"

श्लोक 6 (ayodhya.60.6)

लक्ष्मणश्चापि रामस्य पादौ परिचरन् वने। आराधयति धर्मज्ञः परलोकं जितेन्द्रियः॥ २-६०-६ ॥

lakṣmaṇaścāpi rāmasya pādau paricaran vane| ārādhayati dharmajñaḥ paralokaṃ jitendriyaḥ

लक्ष्मण भी, धर्म के ज्ञाता और इन्द्रियों को जीतकर, वन में राम के चरणों की सेवा करते हुए मानो परलोक को साध रहे हैं।

श्लोक 7 (ayodhya.60.7)

विजनेऽपि वने सीता वासं प्राप्य गृहेष्विव। विस्रम्भं लभतेऽभीता रामे संन्यस्तमानसा॥ २-६०-७ ॥

vijane 'pi vane sītā vāsaṃ prāpya gṛheṣviva| visrambhaṃ labhate 'bhītā rāme saṃnyastamānasā

सीता भी, निर्जन वन में रहते हुए भी, मानो घर में हों, ऐसा भाव पाकर, अपने मन को राम में समर्पित कर, निर्भय होकर स्थिरता का अनुभव कर रही हैं।

श्लोक 8 (ayodhya.60.8)

नास्या दैन्यं कृतं किंचित्सुसूक्ष्ममपि लक्षये। उचितेव प्रवासानां वैदेही प्रतिभाति मा॥ २-६०-८ ॥

nāsyā dainyaṃ kṛtaṃ kiṃcit susūkṣmam api lakṣaye| uciteva pravāsānāṃ vaidehī pratibhāti mā

मुझे उनमें रंचमात्र भी दीनता दिखाई नहीं दी; वैदेही तो मुझे मानो वनवास की अभ्यस्त-सी प्रतीत हुईं।

श्लोक 9 (ayodhya.60.9)

नगरोपवनं गत्वा यथा स्म रमते पुरा। तथैव रमते सीता निर्जनेषु वनेष्वपि॥ २-६०-९ ॥

nagaropavanaṃ gatvā yathā sma ramate purā| tathaiva ramate sītā nirjaneṣu vaneṣv api

जिस प्रकार वे पहले नगर के उद्यानों में जाकर आनन्दित होती थीं, उसी प्रकार सीता निर्जन वनों में भी आनन्दित हो रही हैं।

श्लोक 10 (ayodhya.60.10)

बालेव रमते सीता बालचन्द्रनिभानना। रामे ह्यदीनात्मा रम्या विजनेऽपि वने सती॥ २-६०-१० ॥

bāleva ramate sītā bālacandranibhānanā| rāme hy adīnātmā ramyā vijane 'pi vane satī

बाल-चन्द्रमा के समान मुख वाली, चंचल बालिका के समान वे सीता, निर्जन वन में रहते हुए भी, राम में मन लगाए, तनिक भी विषण्ण नहीं, आनन्दित बनी हुई हैं।

श्लोक 11 (ayodhya.60.11)

तद्गतं हृदयं ह्यस्यास्तदधीनं च जीवितम्। अयोध्यापि भवेत्तस्या रामहीना तथा वनम्॥ २-६०-११ ॥

tadgataṃ hṛdayaṃ hy asyās tadadhīnaṃ ca jīvitam| ayodhyāpi bhavet tasyā rāmahīnā tathā vanam

उनका हृदय तो सर्वथा राम में ही लगा है, उनका जीवन भी उन्हीं पर निर्भर है; राम के बिना तो अयोध्या भी उनके लिए वन के समान ही होगी।

श्लोक 12 (ayodhya.60.12)

परिपृच्छति वैदेही ग्रामांश्च नगराणि च। गतिं दृष्ट्वा नदीनां च पादपान् विविधानपि॥ २-६०-१२ ॥

paripṛcchati vaidehī grāmāṃśca nagarāṇi ca| gatiṃ dṛṣṭvā nadīnāṃ ca pādapān vividhān api

वैदेही गाँवों और नगरों के विषय में, नदियों की धारा को और नाना प्रकार के वृक्षों को देखकर पूछती रहती हैं।

श्लोक 13 (ayodhya.60.13)

रामं हि लक्ष्मणं वापि पृष्ट्वा जानाति जानती। अयोध्याक्रोशमात्रे तु विहारमिव संश्रिता॥ २-६०-१३ ॥

rāmaṃ hi lakṣmaṇaṃ vāpi pṛṣṭvā jānāti jānatī| ayodhyākrośamātre tu vihāram iva saṃśritā

और राम या लक्ष्मण से पूछकर ही जान पाती हैं - मानो अयोध्या से बस थोड़ी ही दूर किसी उद्यान में विहार कर रही हों।

श्लोक 14 (ayodhya.60.14)

इदमेव स्मराम्यस्याः सहसैवोपजल्पितम्। कैकेयीसंश्रितं वाक्यं नेदानीं प्रतिभाति माम्॥ २-६०-१४ ॥

idam eva smarāmy asyāḥ sahasaivopajalpitam| kaikeyīsaṃśritaṃ vākyaṃ nedānīṃ pratibhāti mām

मुझे तो केवल उनकी यही बात याद रह गई है, जो उन्होंने कैकेयी के विषय में अनायास कह दी थी; और अब मुझे वह वचन दोहराना उचित नहीं लगता।

श्लोक 15 (ayodhya.60.15)

ध्वंसयित्वा तु तद्वाक्यं प्रमादात्पर्युपस्थितम्। ह्लादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत्॥ २-६०-१५ ॥

dhvaṃsayitvā tu tadvākyaṃ pramādāt paryupasthitam| hlādanaṃ vacanaṃ sūto devyā madhuram abravīt

अपने असावधानी से मुँह पर आ गए उस वचन को दबाकर, सुमन्त्र ने देवी से मधुर और सुखद वचन ही कहा।

श्लोक 16 (ayodhya.60.16)

अध्वना वातवेगेन संभ्रमेणातपेन च। न हि गच्छति वैदेह्याश्चन्द्रांशुसदृशी प्रभा॥ २-६०-१६ ॥

adhvanā vātavegena saṃbhrameṇātapena ca| na hi gacchati vaidehyāś candrāṃśusadṛśī prabhā

यात्रा से, वायु के वेग से, घबराहट से या धूप से भी, वैदेही की चन्द्रकिरण के समान आभा फीकी नहीं पड़ी है।

श्लोक 17 (ayodhya.60.17)

सदृशं शतपत्रस्य पूर्णचन्द्रोपमप्रभम्। वदनं तद्वदान्यायाः वैदेह्या न विकंपते॥ २-६०-१७ ॥

sadṛśaṃ śatapatrasya pūrṇacandropamaprabham| vadanaṃ tad vadānyāyāḥ vaidehyā na vikaṃpate

कमल के समान, पूर्णचन्द्र-सी आभा वाला वैदेही का वह उदार मुख तनिक भी विचलित नहीं हुआ है।

श्लोक 18 (ayodhya.60.18)

अलक्तरसरक्ताभावलक्तरसवर्जितौ। अद्यापि चरणौ तस्याः पद्मकोशसमप्रभौ॥ २-६०-१८ ॥

alaktarasaraktābhāv alaktarasavarjitau| adyāpi caraṇau tasyāḥ padmakośasamaprabhau

यद्यपि अब उनके चरणों पर लाक्षारस नहीं लगाया गया, फिर भी वे आज भी लाक्षा-रंजित से ही लाल दिखते हैं, कमल-कोश के समान कान्तिमान हैं।

श्लोक 19 (ayodhya.60.19)

नूपुरोद्घुष्टहेलेव खेलं गच्छति भामिनी। इदानीमपि वैदेही तद्रागान्न्यस्तभूषणा॥ २-६०-१९ ॥

nūpuroghuṣṭaheleva khelaṃ gacchati bhāminī| idānīm api vaidehī tadrāgān nyastabhūṣaṇā

वे सुन्दरी अब भी क्रीड़ा करती हुई-सी, अपने नूपुरों की झंकार के साथ चलती हैं; और अभी भी वैदेही ने राम के प्रति अपने प्रेम के कारण ही आभूषण धारण कर रखे हैं।

श्लोक 20 (ayodhya.60.20)

गजं वा वीक्ष्य सिंहं वा व्याघ्रं वा वनमाश्रिता। नाहारयति संत्रासं बाहू रामस्य संश्रिता॥ २-६०-२० ॥

gajaṃ vā vīkṣya siṃhaṃ vā vyāghraṃ vā vanam āśritā| nāhārayati saṃtrāsaṃ bāhū rāmasya saṃśritā

वन में रहते हुए, हाथी, सिंह अथवा व्याघ्र को देखकर भी, राम की भुजाओं का आश्रय पाकर उन्हें तनिक भी भय नहीं होता।

श्लोक 21 (ayodhya.60.21)

न शोच्यास्ते न चात्मा ते शोच्यो नापि जनाधिपः। इदं हि चरितं लोके प्रतिष्ठास्यति शाश्वतम्॥ २-६०-२१ ॥

na śocyās te na cātmā te śocyo nāpi janādhipaḥ| idaṃ hi caritaṃ loke pratiṣṭhāsyati śāśvatam

न तो उनके लिए शोक करना चाहिए, न स्वयं आपके लिए, न ही महाराज के लिए; क्योंकि यह चरित्र संसार में सदा-सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित रहेगा।

श्लोक 22 (ayodhya.60.22)

विधूय शोकं परिहृष्टमानसा महर्षियाते पथि सुव्यवस्थिताः। वने रता वन्यफलाशनाः पितुः शुभां प्रतिज्ञां परिपालयन्ति ते॥ २-६०-२२ ॥

vidhūya śokaṃ parihṛṣṭamānasā maharṣiyāte pathi suvyavasthitāḥ| vane ratā vanyaphalāśanāḥ pituḥ śubhāṃ pratijñāṃ paripālayanti te

शोक को त्यागकर, प्रसन्न-मन होकर, महर्षियों द्वारा अपनाए गए पथ पर सुस्थिर होकर, वन में रमते हुए और वन्य फलों का आहार करते हुए, वे तीनों अपने पिता की शुभ प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं।

श्लोक 23 (ayodhya.60.23)

तथापि सूतेन सुयुक्तवादिना निवार्यमाणा सुतशोककर्शिता। न चैव देवी विरराम कूजितात्प्रिय इति पुत्र इति च राघव इति च॥ २-६०-२३ ॥

tathāpi sūtena suyuktavādinā nivāryamāṇā sutaśokakarśitā| na caiva devī virarāma kūjitāt priya iti putra iti ca rāghava iti ca

सुमन्त्र द्वारा इतनी उचित बातों से रोके जाने पर भी, पुत्र-शोक से क्षीण हुई वह देवी अपने विलाप से नहीं रुकीं - "हे प्रिय!", "हे पुत्र!", "हे राघव!" कहते हुए वे रोती ही रहीं।

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